Hindi satire : जब से हमारी पहली और अंतिम इकलौती घरेलू पत्नीश्री ने एक दफ्तर में नौकरी करनी शुरू की है और वे एक अधिकारी की पर्सनल सैक्रेटरी बन गई हैं तब से उन के संबल कंधे रोजमर्रा के छोटेबड़े कामों का बो झ उठाने में असमर्थ हो गए हैं क्योंकि अब पत्नीश्री की हालत यह हो गई है कि जिस्म का बो झ उठाए नहीं उठता उन से घर के कामों का कड़ा बो झ उठाएं कैसे?
शादी से पहले भी वे काम थी पर बच्चों के बाद उन्होंने छोड़ दिया था. अब उन्हें अपनी कीमत का एहसास फिर होने लगा था और हमारी परवाह किए बिना नौकरी ढूंढ़ ली थी.
इन बुरे हालात में हमारे घर को एक नौकरानी की आवश्यकता अधिक ही अनुभव होने लगी. ऐसा नहीं है कि हमारा बढि़या बहुमूल्य घर जिसे हम कुटिया कहते हैं ताकि किसी की नजर न लगे. यों तो भगवान की कृपा से हमारे घर आंगन में अनेक नौकरानियां और बाइयां आईं और किसी न किसी कारण से चली गईं या उन्हें चलता कर दिया गया. उदाहरणार्थ एक नौकरानी घर की सफाई करने आई और घर का सफाया कर के अर्थात श्रीमतीजी का नोटों भरा पर्स तथा आभूषणों का डब्बा ले कर नो दो ग्यारह हो गई और श्रीमतीजी उसे कोसती रह गईं, पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई लेकिन हमारी कर्तव्यनिष्ठ पुलिस को श्रीमतीजी की शिकायत पर ध्यान देने का समय ही नहीं मिल पाया और हमारी पत्नीश्री अपने जेवरों का शोक मनातेमनाते चुप हो कर बैठ गईं.
हमारी तलाश के परिणामस्वरूप एक सुंदर और सुशील बाई भी आई परंतु उस
भली मानस से एक बड़ी गलती यह हो गई कि घर का खयाल रखने के साथसाथ वह हमारा भी छोटामोटा काम कर देती थी जैसे शेव के लिए हमें ठंड के मौसम में पानी गरम कर के दे देती या हमारे दफ्तर जाने से पहले जूतों पर पौलिश कर देती और कभीकभी धोबीजी के न आने की हालत में हमारे कपड़ों पर प्रैस भी कर देती थी परंतु एक दिन हम से बड़ी भूल हो गई. हुआ यों कि हम ने एक दिन श्रीमतीजी के सामने उस भली बाई की प्रशंसा कर दी. हमारे बेदाग चरित्र को शक की नजर से देखने वाली श्रीमतीजी ने हमें पाकसाफ और चरित्रवान रखने हेतु बस उसी दिन तुरंत उस बाई का हिसाब कर के उस की स्थाई रूप से छुट्टी कर दी.
इस प्रकार हमारा चरित्रता दागदार होने से बच गया लेकिन हमारा घर एक बार फिर बिन बाई का हो गया और जब हालत यह हो गई कि हमें भी कलम छोड़ कर झाड़ू पकड़नी पड़ी तो हम ने श्रीमतीजी से करबद्ध निवेदन किया, ‘‘क्यों न टाइम्स औफ इंडिया में नौकरानी हेतु विज्ञापन दे दिया जाए.’’
श्रीमतीजी हमारा यह सु झाव सुन कर गुस्से से बोलीं, ‘‘हां बाई तो आप की तरह इंग्लिश भाषा में एमए होगी और इंग्लिश अखबार टाइम्स औफ इंडिया में विज्ञापन पढ़ कर फौरन दौड़ी चली आएगी हमारी सेवा करने. इसलिए यदि विज्ञापन ही देना है तो अपने क्षेत्र के किसी हिंदी समाचारपत्र में दीजिए, परंतु हां, आप विज्ञापन में अपना मोबाइल नंबर बिलकुल नहीं देंगे केवल मेरा नंबर देंगे और लिखेंगे कि हमारे घर को एक अधेड़ और काली बाई की आवश्यकता है.
‘हम ने डरतेडरते प्रश्न किया, ‘‘काली लिखने की जरूरत किया है? आमतौर पर गरीब नौकरानियां और बाइयां काली ही होती हैं क्योंकि गरीबी सुंदरता की शत्रु होती है. वह किसी शायर ने कहा है, न कि पसीना बदबू मुकद्दर गरीब दुलहन का कहां नसीब में उस के शृंगार की खुश्बू’. हम ने विनम्रतापूर्वक कहा तो श्रीमतीजी कठोरता से बोलीं, ‘‘बस अपनी प्रगतिशीलता मत बघारिए, काली की शर्त इसलिए लगा रही हूं क्योंकि आप जैसे मर्द गोरी महिलाओं की ओर तुरंत आकर्षित हो जाते हैं, इसलिए मैं जैसा कह रही हूं वैसा ही विज्ञापन दीजिए. काली और अधेड़ की शर्त जरूर लिखनी है, अन्यथा…’’
यह सुन कर हमें भी गुस्सा तो आया परंतु सदा की भांति उसे हम कड़वे जहर के घूंट की
तरह पी गए मगर इतना अवश्य कहा, ‘‘अब यह विज्ञापन तैयार कर के स्वयं दे आइए.’’
हमारी बात सुन कर श्रीमतीजी तुनक कर उठीं, अखबार हेतु विज्ञापन तैयार किया और हिंदी के एक स्थानीय दैनिक अखबार में दे आईं. विज्ञापन छपा भी परंतु हमें यह देख कर संतोष हुआ कि कोई अधेड़ और काली बाई ही नहीं बल्कि कोई नार्मल नौकरानी भी काम मांगने
हेतु नहीं आई और न ही कोई काल श्रीमतीजी
के मोबाइल पर ही किसी अधेड़ और काली
बाई आई.
हम यह सोच कर प्रसन्न थे कि शायद बाई इसलिए नहीं आई कि उस ने सोचा होगा
कि जिस मालकिन ने इतनी कठोर शर्तें रखी हैं वह अवश्य ही बहुत सख्त और गुस्सेवाली होगी, परंतु हमारी खुशी क्षणिक साबित हुई क्योंकि घर की काल बैल बजी और एक अधेड़ और बिलकुल काली कलूटी बाई हमारे घर में आई जिसे देख कर हमारा मुखड़ा तो उतर गया परंतु श्रीमतीजी की बांछें खिल गईं मानो उन की बहुत बड़ी कामना पूर्ण हो गई हो. अत: श्रमतीजी बाई को बड़े सम्मान से ड्राइंगरूम में लाईं तथा उसे एक स्टूल पर बैठने को कहा.
नौकरानी बड़ी अकड़ के साथ स्टूल पर विराजमान हुई. कदाचित उस ने अनुभव कर लिया था कि मालिकन को बाई की बहुत अधिक आवश्यकता है. अत: उस ने पूछा, ‘‘मैडमजी, हमें कौनकौन से काम करने होंगे?’’
‘‘सुबह को झाड़ूपोंछा करना होगा और बरतन धोने होंगे तथा खाना भी पकाना होगा क्योंकि हम दोनों पतिपत्नी दोपहर का भोजन अपने साथ ले कर ही दफ्तर जाते हैं अलबत्ता बच्चे स्कूल से 2 बजे आ कर ही घर पर भोजन करते हैं. बच्चों को खाना दे कर तुम अपने घर चली जाना और फिर सां झ को बरतन धोने के बाद फिर रात का खाना बना कर अपने घर चली जाना. परंतु हर दूसरे दिन तुम्हें वाशिंग मशीन से कपड़े भी धोने होंगे.’’
‘‘अच्छा तो आप मु झे अपना घर दिखा दीजिए ताकि हम यह जांच सकें कि झाड़ूपोंछे में कितना समय लगेगा.’’
श्रीमतीजी उसे बड़े चाव से घर दिखाने लगीं जिसे देख कर बाई ने कुछ सोच कर कहा, ‘‘आप का घर तो मैडमजी बहुत बड़ा है, झाड़ूपोंछे में कम से कम 2 घंटे तो लगेंगे ही.’’
‘‘नहीं बाई डेढ़ घंटे से ज्यादा समय नहीं लगेगा, पहले जो बाई थी वह डेढ़ घंटे में ही दोनों काम निबटा देती थी.’’ श्रीमतीजी ने धीरे से कहा तो बाई ने तुरंत सवाल दागा, ‘‘पहली बाई ने फिर आप का घर क्यों छोड़ा?’’
यह प्रश्न सुन कर श्रीमतीजी सकपका गईं, अब उस से कैसे कहतीं कि पहली बाई
सुंदर और सुशील थी और मेरे पति का जरूरत से ज्यादा ही ध्यान रखती थी. अत: अपने पति और बाई का चरित्र बचाने के लिए उस सुंदर नौकरानी को हटाया था, इसलिए हम ने बात को संभालते हुए तुरंत कहा, ‘‘दरअसल पहली बाई के पति बंगाल में बीमार हो गए थे, इसलिए उसे अपने घर जाना पड़ा और वह हमारा काम छोड़ गई.’’
‘‘अच्छा बाबूजी आप के कितने बच्चे हैं?’’ अब बाई हम से बात करने लगी थी. अत: हम ने जवाब दिया, ‘‘हम परिवार नियोजन में विश्वास रखते हैं इसलिए हम 2 और हमारे बच्चे भी 2 ही हैं.’’
‘‘उन की उम्र क्याक्या है?’’ बाई का यह प्रश्न सुन कर श्रीमतीजी झल्ला कर बोलीं, ‘‘तुम्हें बच्चों की उम्रों से क्या लेनादेना?’’
‘‘क्यों नहीं लेनादेना, बड़े बच्चों के कपड़े भी बड़े होते हैं जिन्हें धोने में समय भी ज्यादा लगता है और वे भोजन भी अधिक करते हैं, इसलिए दोनों समय खाना भी अधिक बनाना पड़ता है.’’
‘‘हमारा बेटा 12 वर्ष का और बेटी 8 साल की और क्या पूछना है?’’
हम ने कहा तो बाई ने तुरंत बोला, ‘‘बच्चे तो बड़े हैं. मु झे अधिक समय देना पड़ेगा, इसलिए पगार 10 हजार रुपए मासिक होगी और दोनों समय का खाना व नाश्ता.’’
‘‘लेकिन यह तो बहुत ज्यादा है,’’ श्रीमतीजी ने विरोध जताया.
‘‘काम भी तो ज्यादा है,’’ बाई ने झट से जवाब दिया.
बहरहाल, कुछ तुम आगे बढ़े और कुछ हम पीछे हटें के उसूल पर चलते हुए कुछ वह पीछे हटी और कुछ हम आगे बढ़े और उस की पगार 8 हजार रुपए मासिक तय हो गई.
मगर पगार निश्चित होने के बाद बाईजी ने श्रीमतीजी से कहा, ‘‘मैडमजी मेरी कुछ और भी शर्तें हैं.’’
‘‘क्या कहा और भी शर्तें हैं, तुम तो बाई हद कर रही हो, खैर, बताओ और क्या शर्तें हैं?’’ हमारी श्रीमतीजी ने परेशान हो कर पूछा तो बाई ने धैर्य से कहा, ‘‘हम हर इतवार को छुट्टी किया करेंगे, हर 2 महीने बाद 8 दिन के लिए अपने गांव जाया करेंगे लेकिन आप इन दिनों की पगार नहीं काटा करेंगी.’’
‘‘चलो नहीं काटेंगे,’’ श्रीमातजी ने यह शर्त मान ली तो बाई फिर बोली, ‘‘हमारी एक शर्त यह भी है कि हम बढि़या क्वालिटी के फिनायल से ही फर्श की सफाई करेंगे और बरतन धोने के लिए भी अच्छा पाउडर और झूना इस्तेमाल करेंगे, जाड़े में गरम पानी से ही बरतन धोएंगे, अपने 5 बच्चों और उन के पापा के लिए दोनों समय का भोजन भी ले जाया करेंगे.
‘‘मगर बाई 6 आदमियों का खाना तो
बहुत होता है,’’ श्रीमतीजी ने दबे शब्दों में
विरोध किया तो बाई भड़क उठी, ‘‘देखिए मैडमजी, हम और सब सहन कर सकते हैं परंतु अपने बच्चों और उन के पापा की उपेक्षा सहन नहीं कर सकते. भोजन तो हम ले ही जाया करेंगे नहीं तो हम चले.’’
और वास्तव में उस ने जाने के लिए खड़े होने की ऐक्टिंग की तो मजबूरी में हमें बाई की यह शर्त भी माननी पड़ी.
बाई फिर भी संतुष्ट नहीं हुई और बोली,
‘‘2 और आखिरी शर्तें हैं, एक शर्त का
संबंध तो मैडमजी आप से है.’’
‘‘मु झ से?’’ श्रीमतीजी ने आश्चर्य से पूछा तो बाई ने धैर्यपूर्वक कहा, ‘‘जी आप से ही है और वह यह कि आप हमारे काम में कमियां निकल कर हमें डांटेंगी नहीं बल्कि प्यार से सम झाएंगी कि कोई काम किस तरह अच्छे ढंग
से हो सकता है, इसलिए आप हमें उस तरह फटकार नहीं लगाएंगी जिस तरह बाबूजी को लगाती हैं.’’
यह सुन कर हम कुछ लज्जित हुए और श्रीमतीजी ने यह शर्त भी मान ली. फिर श्रीमतीजी ने मालूम किया, ‘‘तो बाई तुम कल से काम पर आ रही हो?’’
तो बाई ने हम से पूछा, ‘‘बाबूजी, आशा है कि आप पत्नी और नौकरानी के अंतर को सदा ध्यान में रखेंगे और भूल से भी ऐसी कोई हरकत नहीं करेंगे जैसी मैडमजी के साथ करते हैं.’’
बाई का यह केअर सुन कर श्रीमतीजी ने हमें संदेह भरी निगाहों से देखा परंतु हमें बाई की इस बात पर बहुत गुस्सा आया कि यह बाई हमें इतना नीच सम झती है. यह ठीक है कि हम कवि हैं परंतु इतने आशिकमिजाज भी नहीं हैं कि एक अधेड़ और बातूनी बाई से इश्क लड़ाएंगे, इसलिए हमारा जी तो चाहा कि उस से पूछें कि कभी दर्पण में अपना थोबड़ा भी देखा है लेकिन श्रीमतीजी की आंखों की चिनगारी और इस संशय से हम चुप रहे कि कहीं यह बाई भी हाथ से न निकल जाए. अत: हम ने उसे आश्वस्त करने हेतु कहा, ‘‘बाई हम खानदानी शरीफ आदमी हैं, हमारे पिताजी और दादाजी भी सज्जन थे और हमारा तो नाम भी सज्जन कुमार है. यों भी आप तो हमारी मां और बड़ी बहन की तरह हैं.’’
यह सुन कर बाई का पारा आसमान पर चढ़ गया और वह गरजी, ‘‘देखिए बाबूजी हमारी उम्र न बढ़ाइए और न ही हमें अपनी मांबहन बनाइए अगर आइंदा आप ने ऐसी बात की तो हम आप के घर काम करना छोड़ देंगे.’’
हम ने घबरा कर तुरंत कहा, ‘‘नहींनहीं हम आइंदा ऐसा नहीं कहेंगे, हमारा मतलब तो यह था कि हमारे घर में तुम्हारी इज्जतआबरू बिलकुल सुरक्षित रहेगी.’’
अब श्रीमतीजी भी हमारे समर्थन में शायद इसलिए आ गई थीं कि कहीं बाई काम
करने से मना न कर दे अन्यथा वह तो सदा हमें शक की दृष्टि से ही देखती हैं. अत: वे बोलीं, ‘‘देखिए बाई हमारे पति बहुत सज्जन हैं, किसी और से तो क्या मेरे साथ भी ये ऐसीवैसी हरकत नहीं करते.’’
‘‘मैडमजी, अगर ये आप के साथ भी ऐसीवैसी हरकतें नहीं करते तो फिर आप 2 बच्चों की मां कैसे…’’
बाई का वाक्य तुरंत काटते हुए श्रीमतीजी ने लजाते हुए कहा, ‘‘मेरा मतलब वह नहीं था जो तुम सम झ रही हो. ऐसीवैसी हरकत से मेरा मतलब था छेड़छाड़ और बेइज्जती.’’
‘‘ठीक है मैडमजी, मैं आप से क्षमा मांगती हूं कि मैं ने भूल से आप की सही बात का कुछ और ही मतलब निकला परंतु सभी बातों को खोल कर कहना जरूरी था. अब मैं कल से आप के घर काम पर आ जाऊंगी,’’ कह कर बाई तो चली गई परंतु हम अपनी पत्नीश्री के साथ मिल कर नौकरानी पर अपनी निर्भरता और बेबसी का मातम करते रह गए.
इस अपनी शोचनीय और चिंतनीय स्थिति को देख कर हमारे मुख से अनायास निकला, ‘‘रोचक है तेरी कहानी, जय नौकरानी महारानी.’’
राइटर- सैयद असद रजा नकवी
