Modern society: पितृसत्ता एक सत्ताधिकार है जो केवल संपत्ति से नहीं जुड़ा बल्कि यह ऐसी धार्मिक व्यवस्था है जहां पुरुषों के पास हर प्राथमिक शक्ति और अधिकार दे दिए गए. इस का उद्देश्य कोई सामाजिक कल्याण या पारिवारिक कल्याण नहीं सिर्फ महिला वर्ग को पुरुषों के नीचे रखना है ताकि धर्म के कामों को बदले में पूरा करते रहें अर्थात महिला की हर छोटी से बड़ी बात और अधिकार का निर्णय सिर्फ पुरुष समाज ही ले. चाहे सामाजिक स्तर हो या पारिवारिक अथवा वैयक्तिक.

आज भले यह दावा किया जाता है कि यह सत्ता या दासता अब बहुत कम हो गई और कई स्थानों पर खत्म हो गई है परंतु वास्तविकता इस से अलग है. आज भले महिला घूंघट से निकल आई है लेकिन उस से मुक्ति नहीं मिली. आज की सत्ता का रूप, रंग और रोब बदल चुका है. आज पुरुषों की यह अधिकार की भावना पजैसिव नेचर, ऐक्स्ट्रा केयरिंग, ओवर प्रोटैक्टिंग के रूप में देखने को मिलती है. धर्म का प्रभाव जो कम हो रहा था फिर दिनबदिन बढ़ रहा है.

अब इस सत्ता में यह नहीं कहा जाता कि तुम यानी महिला हमारे यानी पुरुष के कहने से चलोगी बल्कि अब यह दिखाया जाता है कि ‘हमें तुम्हारी बहुत फिक्र है, हमें तुम्हारी बहुत जरूरत है या हम तुम्हारा भला चाहते हैं इसलिए तुम्हें दूर नहीं करते, बाहर की भागदौड़ से बचाना चाहते हैं. यह शब्दों का जाल है जो धर्म के विचारकों ने बुना है.

यह कैसी सोच

सुनने में यह बहुत अटपटा लग रहा है लेकिन क्या सच नहीं कि आज भी कमाऊ, पढ़ीलिखी औरतें शहर से बाहर जाने से पहले पति से पूछती हैं. यहां पूछने का अर्थ उन की राय जानना नहीं होता बल्कि उन की मरजी, उन की परमीशन मांगना होता है. आज कितनी औरतें केवल यह कह कर घर से निकल सकती हैं कि वे अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक या वैकेशन पर जा रही हैं? शायद ही 100 में से 1 न जब तक पति इजाजत नहीं देता वे नहीं जा पातीं.

लेकिन यहां पर इजाजत न देना स्पष्ट नहीं बल्कि छिपे रूप में कई बहानों से झलकता है. जैसे ‘‘तुम चली जाओगी तो मैं कैसे मैनेज करूंगा?’’ ‘‘मैं अकेला फील करूंगा,’’ ‘‘बच्चे मेरी नहीं सुनते,’’ ‘‘अरे तुम्हारी चिंता होगी मुझे, तुम्हारा खयाल कौन रखेगा,’’ ‘‘वहां अभी मत जाओ, यह समय ठीक नहीं, मौसम ठीक नहीं,’’ ‘‘सिर्फ औरतें अरे कोई परेशानी हुई तो?’’ इन बातों में दिखती जिक्रऔर फरियाद एक तरह का दबाव ही है जो महिलाओं को घर से बांधे रखता है.

आज हम सोसायटी में अच्छा दिखने के लिए मौडर्न कल्चर भले अपना चुके हैं लेकिन सोच अभी भी सत्ताधिकार की जकड़ में है. आज भी औरतों को बचपन से सिखा दिया जाता है कि नियम से दिन की 2 आरती बिना किसी देरी के गानी हैं, पूजापाठ के हर नियम को पूरा करना है. सुबह की चाय से ले कर रात के खाने तक, परिवार के हर सदस्य की रोटी से ले कर कपड़े तक की हर जिम्मेदारी बिना किसी देरी, परेशानी और आराम के बिना तो वह करती ही है.

ये औरतें वे नहीं जो गांव में रह रही हों या अनपढ़ हैं तो इसलिए सिर्फ घर के कामों से बंधी हैं बल्कि यह समाज में औरतों का वह बड़ा समूह है जो अच्छी तरह से शिक्षित हो कर मौडर्न कल्चर से जुड़ा है, उसी में रह रहा है. यहां औरतों ने जींस और टीशर्ट पहनी है, वे औनलाइन शौपिंग भी कर रही हैं, ओटीटी प्लेटफौर्म पर शो भी देखती हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर रही हैं लेकिन जब इन्हें एक पर्सनल ग्रोथ या निजी फैसले लेने हों तो ये मुंह अपने पति का ही ताकती हैं.

पैसे का क्या मोल

दरअसल, यहां एकजैसी शिक्षा लेने के बाद भी औरतों को यही लगता है कि पुरुष ही अधिक जानता है या वह ज्यादा समर्थ है. अब इस का एक कारण यह भी है कि कुछ महिलाएं कोई जौब या नौकरी नहीं करतीं. अब यहां नौकरी न करने की वजह यह नहीं कि नौकरी नहीं मिली बल्कि इच्छा है, इच्छा जो उन की खुद की कम होती है और उन के ‘अपनों’ की ज्यादा.

उन की अपनी इच्छा इसलिए क्योंकि उन्हें यानी महिलाओं को कभी सिखाया ही नहीं गया कि अपने पैरों पर खड़ा होना क्या होता है? अपनी कमाई के पैसे का क्या मोल होता है? अपने कमाए पैसे से कैसे मन में विश्वास पैदा होता है? कैसे एक स्वतंत्र पहचान मिलती है?

उन्हें तो हमेशा से यह बताया गया है कि सुबह की आरती में क्या होना जरूरी है, सुबह की चाय कितने बजे देनी चाहिए, रसोई में राशन कितना, कैसे इस्तेमाल होना चाहिए, भिंडी में पानी नहीं डालता से ले कर किस सब्जी में कौन सा छौंक लगता है, बचपन से ही यह सब बताया समझाया जाता है.

लेकिन अपने पैरों पर खड़ा होने की, पैसे कमाने की और अपने लिए सेविंग करने की बात कोई नहीं बताता क्योंकि ये सारी बातें और राय लड़कों को सम?ाई और सिखाई जाती हैं. लड़कियों के लिए तो यही ज्ञान चलता आ रहा है कि पति कमाएगा और तुम्हें पैसा देगा घर चलाने के लिए.

मानसिक धारणा

आज भले लड़कियां साइंस, मार्केटिंग, एमबीए पढ़ीलिखी हो या डिस्ट्रिक्ट नैशनल लैवल की खिलाड़ी हों, बहुत सारी लड़कियां शादी के बाद सिर्फ वाइफ बन कर बैठी रहती हैं क्योंकि शादी के बाद वाइफ बने रहने की मानसिक धारणा बचपन से एक लड़की के दिमाग में एक बीज की तरह बो दी गई थी.

आज महिलाएं अगर बाहर जा कर काम करने का सोचती भी हैं तो यह सोच ही उन्हें एक अपराधबोध लगता है कि हाय मेरे बिना मेरा घर ठीक से नहीं चल पाएगा. अगर मैं घरपरिवार को पूरा समय नहीं दे पाई तो? अगर कोई बीमार हो गया तो? मेरे घर पर नहीं रहने से पति या परिवार को कोई परेशानी उठानी पड़ी तो?’’

अब ये सारे सवाल कभी पुरुषों के मन में तो नहीं आते क्योंकि उन के दिमाग में बचपन से ही सिर्फ कमाने और स्वतंत्र रहने की प्रोग्रामिंग की गई है. उन्हें यह नहीं बताया गया कि अगर बीवी नौकरी करने जाए तो घर का आधा काम तुम भी देख लेना, कोई बीमार हुआ तो तुम छुट्टी करना, बीवी लेट आए तो रोटी तुम बना लेना. उन्हें तो सिर्फ यही बताया है कि जब तुम काम से लौटोगे तो बीवी गरम रोटी देगी.

जो महिलाएं काम कर रही हैं वे भी इस दासता से पूरी तरह से मुक्त नहीं क्योंकि जब वे औफिस से लौटेंगी तो पूरे परिवार का खाना अकेले बनाएंगी, सोने से पहले रसोई साफ करेंगी, सुबह क्या बनाना है उस की तैयारी करेंगी, बच्चों का होमवर्क, प्रोजैक्ट में हैल्प करेंगी, बुजुर्गों की दवापानी देखेंगी, पति की रात वाली फरमाइश पूरी करेंगी तो यह सारा काम एक तरह का 2 शिफ्ट ही है जो उन के औफिस से लौटने पर शुरू होता है.

घर की महिला बिना वेतन या सैलरी की वर्कर है, जिसे सही शब्द में सलेव या दास कहा जाता है. बस यहां पढ़ेलिखे होने का यह फायदा है कि कुछ काम, जहां पढ़ाईलिखाई की जरूरत होती है वे काम पति के आने तक रुकते नहीं बल्कि आसानी से हो जाते हैं. जैसे घर की मैंटेनैस, बिल्स, कोई फैमिली या बैंक का डौक्यूमैंटेशन.

बाहर की दुनिया की समझ

यहां महिलाएं बिना सैलरी की वे वर्कर हैं जो काम तो करती हैं लेकिन अपने फैसले या राय नहीं दे सकतीं क्योंकि जब ये कुछ कहने या बताने जाएंगी तो इन से कहा जाएगा कि तुम चुप करो, तुम रहने दो, तुम्हें कुछ नहीं पता और इन कटाक्ष का आधार सिर्फ यह है कि वे कमाती नहीं हैं. तो जो बाहर जा कर कमाता नहीं है उसे बाहर की दुनिया की सम?ा नहीं, जबकि वे यह भूल जाते हैं कि उस के बाहर जा कर न कमाने की वजह तो वे खुद हैं जो स्वयं अपनी चाय नहीं बना सकते, जिन्हें वाइफ के घर में नहीं रहने पर घर सूनासूना लगता है या जो यह कहते हैं कि ये सब काम, सब की देखभाल हम नहीं कर सकते.

यहां इन सब बहानों में सब से बड़ा छिपा कारण होता है डर. डर सामाजिक दायरे का. घर से बाहर निकल कर नौकरी करने से महिला का सामाजिक दायरा बढ़ता है. वह घरपरिवार के साथसाथ देशदुनिया की भी समझ रखने लगती है. उसे अपनी स्वतंत्रता का मोल पता चलता है, उस के हाथ में बचत की पकड़ होती है, स्वयं के लिए फैसले लेने की आजादी मिलती है, जिस से पितृसत्ता का उसे घर की चारदीवारी में रखने का प्रभाव खत्म हो जाता है.

एक सच यह भी

मगर सच यह भी है कि सत्ताधिकार केवल घर तक सीमित नहीं. आज भी बहुत सी जगह एकसमान काम करने पर भी, सेम पोस्ट पर काम करने पर भी महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन मिलता है, कम अधिकार और सुविधा मिलती है और आदर भी कम मिलता है.

पहले लड़कियों को शिक्षा न देना पितृसत्ता की आड़ में धर्म का मुख्य काम था. मगर आज लड़कियों को पढ़ाया तो जा रहा है, डिगरियां भी खूब दिलाई जा रही हैं लेकिन सिर्फ शादी के लिए. आज माहौल यह है कि लड़की जितनी पढ़ीलिखी होगी दामाद भी उतना ज्यादा पढ़ालिखा और कमाऊ मिलेगा. अब लड़कियों को शिक्षा आत्मनिर्भर बनने के लिए नहीं बल्कि ज्यादा कमाने वाला पति मिलने के लिए दी जा रही है.

मगर क्या इस दासता से मुक्ति नहीं है? है लेकिन पूरी नहीं क्योंकि यहां सिर्फ महिलाओं का अपने लिए खड़ा होना काफी नहीं है बल्कि पुरुषों की भी बराबरी की भागीदारी है. इसलिए एक पुरुष पति बनने से पहले एक भाई, एक पिता बनता है. तो जब वह भाई, वह पिता उन्हें उस दासता से मुक्त रखेगा, उन्हें शिक्षा और शिक्षा का सही उपयोग, अपने कैरियर, अपने पैसों की कीमत सम?ाएगा तभी वह अपने पति की दासता में बंधने से बच पाएगी.

तो पितृसत्ता तभी खत्म होगी जब पिता ही बचपन से बेटियों को भी यह कहे कि शिक्षा पूरी करनी है, पढ़ने के बाद कमाना है शादी नहीं, खुद के लिए सेविंग करनी है, अपने फैसले स्वयं लेने हैं.

मगर दुखद वास्तविकता यही है कि इस प्रकार की सीख और पोषण बहुत ही सीमित मात्रा में है क्योंकि आज पढ़ेलिखे मांबाप भी स्वयं को पितृसत्ता की सदियों से चली आ रही कलन विधि यानी अल्गोरिद्म से नहीं बचा पाए है. तो जो अल्गोरिद्म उन के मन में बचपन से चरण दर चरण एक फीड की तरह नौनस्टौप चलती आ रही है, वही फीड तो अपने आगे की पीढ़ी को देते रहेंगे.

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