Girls and religious : गरीबी का रोना अमीर भी रोते हैं और अमेरिका जैसे देश में भी रोते रहते हैं. अमेरिका में जो लोग 3 करोड़ रुपए से 5 करोड़ रुपए सालाना कमा रहे हैं, उन में से 40% इस बात का रोना रोते हैं कि उन की जिंदगी चैक से चैक पर टिकी है यानी जिस के चैक मिलते हैं उतने ही चैक काट कर पेमेंट करने होते हैं और कुछ बचत नहीं होती. मजेदार बात यह है कि जो लोग 5 करोड़ रुपए से ज्यादा हर साल कमा रहे हैं उन में से भी 40% की कंप्लेंट है कि महीने के आखिर में तो कुछ बचता ही नहीं है.

यह रोना भारत के उन अमीरों में भी है जिन के घरों के आगे एसयूवी खड़ी हैं और हर एडल्ट के पास अपनी कार है, अपना आईफोन है, अपना एप्पल लैपटौप है, अपने बैडरूम में अपना 50 इंच का एंड्रौयड है. बच्चे अगर हैं तो प्राइवेट स्कूल में जाते हैं, घर में वीक में 3 बार खाना बाहर खाया जाता है, 2 बार स्वीगी या जोमैटो से मंगाया जाता है. वे भी कंप्लेंट करते रहते हैं कि सारी ईएमआई भरने के बाद कुछ बचता ही नहीं है. अमीरों का रोना जरूरी है क्योंकि तभी वे गरीबों को चुप करा सकते हैं कि वे न रोएं कि हाय, महंगाई बढ़ रही है, एथेनोल की वजह से माइलेज कम मिल रही है, किराए बढ़ रहे हैं, गली के नुक्कड़ वाला इंगलिश मीडियम स्कूल वाला फीस बढ़ा रहा है, दालचावल के दाम बढ़ गए हैं, पैट्रोल महंगा हो रहा है.

अमीरों का हल्ला हमेशा से सुना जाता रहा है. जितने भी इकोनोमिक न्यूज देने वाले न्यूजपेपर हैं वे हैडलाइनों में चिल्लाते हैं कि सैंसेक्स के 100 पौइंट गिरने से 2 लाख करोड़ का नुकसान शेयरों में इनवैस्टरों को हो गया है तो सरकार कुछ करे. वे उन सड़कों की वाहवाही करते हैं जिन पर सिर्फ एसयूवी चल सकती हैं पर सिटी ट्रैफिक में बैटरी रिकशाओं के लिए रोना रोते हैं कि उन्होंने सड़कें क्यों घेर रखी हैं.

अमीरों का रोना चाहे गलत न हो पर गरीबों की कीमत पर जब होता है तो पूरी तरह गलत है. अपनी मेहनत के बलबूते अमीर होना एक तारीफ की बात है. यह समाज का सर्टिफिकेट है कि आप ने समाज को कुछ दिया है. पर भारत हो या अमेरिका सब जगह असल पैसा तो जबरन वसूले गए टैक्स और चंदे की मिलबांट करने पर मिलता है. जो अमीर हैं उन में से अधिकांश सरकारी टेंडर पाते हैं. किसी को डिफैंस कौंट्रैक्ट मिलते हैं, किसी को सरकारी बिल्डिंगों के कौंट्रैक्ट मिलते हैं, किसी को सरकार के सर्विलैंस के लिए कैमरे सप्लाई कर के मिलते हैं, किसी को करप्टों को पकड़ने वाली एजेंसी में काम करने पर मिलते हैं.

सौफ्टवेयर कंपनियां अरबों बना रही हैं इसलिए कि सरकार को वे कंप्यूटर, सौफ्टवेयर सिस्टम, पोर्टल बना कर दे रही हैं और मुंहमांगा पैसा कमा रही हैं. इन्हीं सब अमीरों के साथ मंदिरों के पूजापाठी मालिक जुड़े हुए हैं जो अरबों रुपए के मंदिर उद्योग बनाते हैं और इन अमीरों के साथ उठतेबैठते हैं. मुकेश अंबानी के घर में हुई शादियों में लगभग हर त्यागी, संसार से विरक्त स्पैशल चार्टर प्लेन से आया, 3-4 करोड़ की गाड़ी में बैठ कर संयम, संस्कार, संस्कृति का उपदेश दे शादी समारोह में गया.

भारत और अमेरिका में एकजैसा माहौल है. वहां के अमीर और अमीर होना चाहते हैं और वे ऐसा गरीबों को गरीब रख कर कर सकते हैं. भारत में पिछड़े, दलित, मुसलिम और सवर्ण औरतों को मुहताज बना कर रख कर काम चलाया जाता है. अमेरिका में कालों और इम्मीग्रैंट्स को रख कर. दोनों जगह इन गरीबों के अधिकार कानूनों ने आज से नहीं सैकड़ों सालों से छीन रखे हैं.

सवर्ण औरतें गरीबी, अन्याय, भेदभाव के खिलाफ लड़ने के लिए सब से ज्यादा कंपीटैंट हैं. उन की खुद की अपने पति की नजर में जगह गुलामों के बराबर हैं. टोकन के रूप में जैसे अमेरिका में ब्लैक, इंडियन, स्पैनिस, चाइनीज अच्छे जगहों पर दिख जाएंगे वैसे ही औरतें दिख जाएंगी पर जब हिलेरी क्लिंटन या कमला हैरिस को राष्ट्रपति बनाने की बात आती है तो गोरे लामबंद हो जाते हैं, यूनाईटेड हो जाते हैं. बराक ओबामा अपनी स्पैशल क्वालिटी के बलबूते जब 2 बार राष्ट्रपति बन गए तो गोरों ने सिरफिरे अमीर, औरतबाज, सनकी डौनाल्ड ट्रंप को एक बार नहीं 2 बार राष्ट्रपति चुन लिया.

यही भारत में हो रहा है. यहां औरतों को, अमीर घरों की ऊंची जातियों की औरतों को सुंदर कपड़े पहना कर, गहनों से लादकर एहसास दिलाया जाता है कि वे स्पैशल हैं पर असल में वे राजनीति हो या समाज, उद्योग हो या ऐजुकेशन, सिर्फ टोकन हैं. अमीर घरों की औरतों को स्वामियों के चरणों में धकेला जाता है, घंटों पूजाओं में बैठाया जाता है, दिनों की थकान भरी यात्राएं कर के तीर्थों में पहुंचाया जाता है. उद्देश्य है कि वे बिजी रहें, अपनी योग्यता के अनुसार मांग न करें.

आज अमीर घरों की, सवर्ण घरों की, ऊंची जातियों की लड़कियां बराबर का पढ़ रही हैं पर आदमियों और उन के बनाए गए धर्म की ब्रेन वाशिंग की शिकार हैं. उन की हालत पार्वती, सीता, द्रौपदी जैसी आज भी है जिन की क्षमता और चरित्र दोनों पर शक किया गया जबकि तीनों धार्मिक कहानियों में ही कंपीटैंट थीं, जोखिम लेने वाली थीं, वाकपटु थीं. आज की एमबीए पढ़ी इसी धर्म के कारण पति के सामने दुबकी रहती हैं, बराबर की नहीं रहतीं.

यह गरीब औरतों के लिए गलत ऐग्जांपल है. पढ़लिख कर, मेहनत कर के भी गुलाम ही बने रहना है. समाज बदलने वाला नहीं है क्योंकि पुरुष धर्म को इस्तेमाल करना बंद नहीं करेंगे. औप्रैशन और इनइक्विलिटी का सब से बड़ा वैपन रिलीजन ही है. सवर्ण औरतें भी दलितों, पिछड़ों, गरीबों की तरह ही सोच वाली रहें सब से बड़ी प्रायोरिटी है.

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