Male domination : बच्चे पैदा करेगी, वंश बढ़ाएगी. हसबैंड्स सोच कर चलते हैं कि वाइफ कमा कर भी लाएगी और घर भी चलाएगी और पेरैंट्स का खयाल भी रखेगी. साथ ही वह पार्टनर की तरह हर तरह की पार्टियों में भी चलेगी जहां देर रात तक डिनर, डांस वगैरा होगा और थक कर लौटेंगे.
अभी मेल डौमिनेशन की सोच खत्म नहीं हुई है जबकि लड़कियां अब पढ़लिख कर अपने को हर जगह शादी से पहले बराबर मान रही हैं. अब लड़कियों के मामलों में पेरैंट्स चाहे उदार हों पर जब बहू नाम की ऐंटिटी घर में आती है तो वे चाहे उसी घर में रह रहे हों या कहीं दूर अलग, चाहते हैं कि वह बराबरी का अहम छोड़ कर 1950 की बहू बन जाए जो सुबह सासससुर के पैर छुए या फोन पर ही छूने की रस्म अदा करे.
कहने को प्यारा हबी हो पर पति का पद अपने कैरेक्टर के साथ जोड़ने में देर नहीं लगती. आजकल यह समस्या सिर उठाने लगी जहां नई कमाऊ पत्नी पति से बराबर का काम में सहयोग भी मांगती है और अपने पेरैंट्स का खयाल भी पति के पेरैंट्स की तरह का रखना चाहती है.
अब पति के पास चीखनेचिल्लाने या मारनेपीटने का हक भी कम होता जा रहा है. जो इसे इस्तेमाल करते हैं वे पत्नी को खो बैठते हैं. पत्नियां प्यारे हबी को छोड़ने में देर नहीं करतीं. उन के लिए अब उन के पेरैंट्स के दरवाजे ज्यादा खुले हैं क्योंकि वे कमाऊ हैं, बोझ नहीं. बहुत घरों में तो लड़की का घर लौट आना पेरैंट्स के लिए खुशी होती है क्योंकि वहां उन्हें अकेलापन खा रहा होता है.
असल में भारतीय समाज में टैक्टोनिक शिफ्ट हो रहा है और इसी कारण घरों में अर्थक्वेक आ रहे हैं. पृथ्वी के साथ भी यही होता है. जमीन में सैकड़ों मील नीचे एक परत के ऊपर दूसरी परत रखी है जो हिलती रहती है. जब उस में बड़ी शिफ्टिंग हो जाए तो सर्फेस पर अर्थक्वेक आ जाता है. भारतीय समाज पर परत दर परत जो धर्म ने लेयर्स बिछाई हुई थीं वे अब लड़कियोें की पढ़ाई, मोबिलिटी, नौलेज के फैलाव के कारण ज्यादा तेजी से खिसक रही हैं. पुरानी पीढ़ी ने नई पीढ़ी को पालपोस कर बड़ा तो किया पर वे समझ नहीं पाए कि उन्होंने इन गहरी परतों को ही खिसका दिया है.
आज के पति को समझने में टाइम लग रहा है कि वह घर में पार्टनर ला रहा है या र्स्वेंट ला रहा है या अपना बोझ ला रहा है या सिर्फ रोबोट ला रहा है. आज नए घर में जो आती है वह अपने ट्रौली बैग में इंडीपैंडैंस, कौन्फिडैंस, बोल्डनैस, इक्वैलिटी भर कर ला रही है. ये गिफ्ट उसे पढ़ाई ने दिए हैं, उसे काम की जगह ने दिए हैं, हमारे कंस्टीच्यूशन ने दिए हैं, सिस्टम ने दिए हैं. पंडों की बिछाई चटाई और उस पर लाल पोटली में बदबूदार पुरानी परंपराएं अब कूड़ेदान में जा चुकी हैं.
क्या आप चौंक रहे हैं कि लड़कियां पतियों को मार रही हैं, उन पर मुकदमे कर रही हैं, अपने लवर्स के साथ भाग रही हैं, बच्चे पैदा करने से इनकार कर रही हैं, बिना इजाजत के फैसले ले रही हैं? इस में चौंकने की कोई बात नहीं है क्योंकि यह टिमटिमाते दीयों की जगह फ्लडलाइट्स हैं जो कुछ समय के लिए आंखों को चौंधियांगी पर बाद में पता चलेगा कि इन्हीं से पूरा परिवार ब्राइट हैप्पी और सौलिड ग्राउंड पर चलेगा. यह बदलाव डराने के लिए नहीं है, यह सिर्फ नई घास लगाने से पहले की जमीन की जुताई की तरह है. जब घास लग जाएगी तो ही शानदार दिखेगी.
