Insurance policy : इंश्योरैंस कंपनियों के सेल्समैन और सेल्स गर्ल्स बारबार दी गई लिस्टों पर फोन कर के ऐसे किसी भी कस्टमर को परेशान करने के लिए जाने जाते हैं जो उन की चिकनीचुपड़ी बातों में आ जाएं. एग्रेसिव सैलिंग से बहुत से लोग इंश्योरैंस कराने के बाद फ्री चैकअप, ट्रीटमैंट के ?ांसे में आ जाते हैं. पर बाद में इंश्योरैंस कंपनियां अपने एप्स इस तरह बदलने लगती हैं और दी गई फैसिलिटीज विदड्रा करने लगती हैं कि कस्टमर्स परेशान हो जाते हैं.

7.3 लाख करोड़ रुपए का प्रीमियम पाने वाली कंपनियां क्लेम रिजैक्ट करने के लिए अब माहिर हो गई हैं. एलआईसी जैसी कंपनियां जो मैच्योरिटी पर पैसा देती हैं अब पा रही हैं कि बीच में 3 साल तक प्रीमियम भरने के बाद विदड्रा करने वाले ज्यादा होने लगे हैं. इंश्योरैंस कंपनी कुल पेमेंट का 36.9% मैच्योरिटी पर दे रही हैं और 38.3% बीच में इंश्योरैंस कंपनी के  रूल्स के हिसाब से पे कर रही हैं.

डैथ पर क्लेम कुल पेआउट का 8.1% ही है.

प्राइवेट कंपनियों में यह बीमारी ज्यादा है क्योंकि वे बहुत एग्रेसिव सैलिंग करती हैं और फर्राटेदार भाषा बोलने वाले सेल्स पर्सन अच्छेअच्छों को कनविंस कर देते हैं. बाद में पता चलता है कि सब घोटाला है. जो फोन पर कहा गया वह है तो पौलिसी में पर बहुत से किंतुपरंतु के बाद. सेल्स पर्सन ऊपर की बात फोन पर करते हैं.

इंश्योरैंस कंपनी को फोन करने या पत्र लिखने पर जो जवाब मिलते हैं वे बड़े रूटीन होते हैं और पौलिसी की कंडीशनों का हवाला दे कर कस्टमर को चुप करा देते हैं.

हां, प्रीमियम इंस्टालमैंट समय पर न पे करने पर सैकड़ों फोन आ सकते हैं. लाइफ इंश्योरैंस की तरह एक्सीडैंट और हैल्थ इंश्योरैंस का यही सा हाल है.

इंश्योरैंस एक कोओपरेटिव हैल्प सिस्टम है जिस में हर जना थोड़ाथोड़ा पैसा हर साल देता है ताकि किसी भी पीडि़त को बड़ी रकम किसी खास मौके पर मिल सके. इंश्योरैंस कंपनियां असल में बनी तो सेवा के लिए थीं पर अब बाजार के बीच में आ जाने के कारण यह मुनाफे का धंधा बनती जा रही हैं और इसीलिए साल 2 साल बाद ग्राहक बोर या नाराज हो कर प्रीमियम देना बंद कर रिफंड मांगने लगा है.

इंश्योरैंस इंडस्ट्री एक मौडल सर्विस इंडस्ट्री है और बिजली टैलिफोन कंपनियों की तरह इन्हें लौंग टर्म प्रौफिट और ऐक्स्ट्रा औरडिनरी प्रौफिट की चाह नहीं रखनी चाहिए. सेल्सटीम हो या क्लेम सैल्समैन टीम, यह जनता की सेवा के लिए बनी है, सब से बड़ी बात दिमाग में होनी चाहिए.

कस्टमर्स को एक तरफ जहां इंश्योरैंस पर निर्भर रहना चाहिए, वहीं लगातार दबाव बनाना चाहिए कि इंश्योरैंस अपना वादा पूरा करें और पौलिसी की स्प्रिट का ध्यान रखें, वर्ड्स का नहीं.

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