Family Drama Story: दिल का बोझ

Family Drama Story: ‘‘इतना लापरवाह कोई कैसे हो सकता है? मैं बता रहा हूं, यह ऐसे ही गैरजिम्मेदार रहा न तो फिर जीवन के हर मोड़ पर हमेशा गिरता रहेगा और संभालने के लिए हम वहां नहीं होंगे,’’ आशीष अपने 15 साल के बेटे वैभव पर चिल्ला रहा था.

2 दिन बाद वैभव की 10वीं कक्षा की परीक्षा शुरू होने वाली थी और उस ने प्रवेशपत्र खो दिया था. वैभव रोआंसा सा चुपचाप खड़ा था. वह बारबार याद कर रहा था कि उस ने तो प्रवेशपत्र लैमिनेट करवाया था फिर रमन और आकाश के साथ औटो में बैठ कर सीधे घर आ गया था. अनजाने में ही सही, गलती तो हुई थी. पूरा दिन अपनी फाइल ढूंढ़ता रहा, लेकिन कहीं पता न चला.

तभी उसे याद आया कि उस के हाथ में बैग और फाइल थी, जिस कारण गलती से फाइल शायद औटो में ही छूट गई होगी. काश, उस ने फाइल अपने बैग में रखी होती तो पापा से इतनी जलीकटी नहीं सुननी पड़ती. उस ने डर के मारे यह बात पापा को नहीं बताई.

आशीष ने फैसला किया कि वह वैभव के स्कूल जा कर इस बारे में प्रिंसिपल से बात करेगा. शायद कोई समाधान निकल आए और वैभव को परीक्षा में बैठने की अनुमति मिल जाए. लता ने भी सहमति जताई. दोनों स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगे तभी दरवाजे की घंटी बजी. लता ने दरवाजा खोला तो सामने बहुत ही अजनबी महिला खड़ी थी.

‘‘जी… कहिए?’’ लता ने पूछा.

‘‘क्या यह आशीषजी का घर है?’’ महिला ने पूछा.

‘‘जी… हां,’’ लता ने उत्तर दिया.

‘‘आप… मैं ने पहचाना नहीं,’’ लता ने सकपकाते हुए कहा.

‘‘जी मेरा नाम रत्ना है और मैं…’’

तभी आशीष हड़बड़ी में वैभव के साथ बाहर जाने के लिए निकलने लगा. उस की नजर रत्ना पर पड़ी और जातेजाते अचानक रुक गया और वापस रत्ना के पास आ कर बोला, ‘‘अरे, रत्न तुम? यहां? कितने सालों बाद तुम्हें…’’ आशीष कहतेकहते रुक गया.

‘‘शुक्र है, तुम ने मुझे पहचान लिया. मुझे तो लगा कि तुम मुझे भूल ही गए होंगे.’’

रत्ना आशीष को कुछ देर देखते रह गई. बीता हुआ कल आंखों के सामने जैसे फिल्म की तरह ताजा हो आया…

‘‘इन से मिलो, ये लता हैं मेरी पत्नी और लता ये रत्ना हैं. मैं ने तुम्हें बताया था न, ये

हमारी पड़ोसी हुआ करती थीं. ये वही हैं,’’ आशीष, रत्ना का ध्यान स्वयं से हटाने के

लिए लता और रत्ना का एकदूसरे से परिचय करवाने लगा.

‘‘अच्छा… तो यही रत्नाजी हैं. आप सच में बहुत खूबसूरत हैं,’’ लता ने कहा.

‘‘धन्यवाद, आप भी तो खूबसूरत हैं,’’ रत्ना ने कहा.

लता मुसकरा भर दी.

‘‘बैठिए न,’’ लता ने कहा.

आशीष की नजर घड़ी पर पड़ी, ‘‘अरे

10 बज गए,’’ वह हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ.

‘‘अच्छा रत्ना, तुम लता के साथ गपशप करो. मैं, वैभव के स्कूल से 1 घंटे में आता हूं,’’ कह कर आशीष और वैभव जाने लगे.

‘‘तुम्हें स्कूल जाने की जरूरत नहीं, जो

चीज तुम ढूंढ़ रहे हो, वह मेरे पास है,’’ रत्ना

ने कहा.

सब एकटक रत्ना को देखने लगे. तभी रत्ना ने अपने हैंडबैग से फाइल निकाल कर आशीष के हाथ में रख दी.

‘‘अरे इस फाइल को ही हम ढूंढ़ रहे थे पर यह, तुम्हारे पास कैसे आई?’’ आशीष ने सवाल किया.

वैभव ने झट से पापा के हाथों से फाइल ले ली और फाइल खोल कर अपने सर्टिफिकेट देखने लगा. प्रवेशपत्र देखते ही वह सुकून और आत्मविश्वास से भर गया.

‘‘दरअसल, मैं परसों हौस्पिटल जा रही

थी जैसे ही औटो में बैठी मु?ो यह फाइल दिखी. मैं ने औटो वाले से इस फाइल के बारे में पूछा तो उसने कहा कि ये फाइल उस की नहीं है. उस ने कहा कि अभी कुछ बच्चे पिछले सिगनल पर छोड़ गए हैं शायद उन में से किसी की होगी. मैं ने उस से कहा भी कि चलो जा कर देखते हैं. इस पर औटो वाले ने कहा कि अब तक तो बच्चे

चले गए होंगे. कहां ढूंढ़ेंगे उन्हें? फिर मैं ने यह फाइल रख ली ताकि मैं उस बच्चे को यह फाइल लौटा सकूं.

लेकिन उस समय मैं बहुत जल्दी में थी इसलिए लौटा नहीं पाई. आज मेरी नजर इस फाइल पर पड़ी- खोल कर देखा तो परीक्षा का प्रवेशपत्र और पहचानपत्र था. मैं समझ गई कि ये बच्चे के लिए कितने जरूरी हैं और कल मेरी वापसी की फ्लाइट है तो सोचा, आज ही फाइल लौटा दू,’’ रत्ना ने कहा.

‘‘आप ने मेरे बेटे का यह साल खराब

होने से बचा लिया. आप का जितना भी शुक्रिया करूं, कम होगा,’’ आभार व्यक्त करते हुए लता

ने कहा.

‘‘लता सही कह रही है. तुम्हारा बहुतबहुत धन्यवाद,’’ आशीष ने कहा.

‘‘तुम तो मुझे जितना धन्यवाद दो उतना कम है. मैं ने तुम्हारे कपड़े, नोटबुक और जाने क्याक्या…’’ कहतेकहते रत्ना रुक गई.

आशीष झेंप गया और माहौल को सामान्य करते हुए उस ने कहा, ‘‘अरे तुम ने यह तो बताया ही नहीं कि तुम दिल्ली में कैसे?’’

‘‘बड़े पापा के लड़के… वसंत भइया 3 साल से दिल्ली में ही पोस्टेड हैं. यही रोहिणी में रहते हैं,’’ रत्ना ने कहा.

‘‘अच्छा तो तुम उन से मिलने आई थी,’’ आशीष ने कहा.

‘‘नहीं दरअसल पिताजी बीमार थे और उन का यहां इलाज चल रहा था. मैं उन से मिलने

आई थी.’’

‘‘अच्छा… अब उन की तबीयत कैसी है?’’

‘‘अब वे नहीं रहे,’’ रत्ना ने कहा.

‘‘ओह, बहुत अफसोस हुआ जानकर,’’ आशीष ने अफसोस जताते हुए कहा.

तभी लता चायनाश्ता ले आई.

‘‘आप कहां रहती हैं? पति क्या करते हैं? आप के कितने बच्चे हैं?’’ लता ने सवालों की झड़ी लगा दी.

‘‘मैं ने शादी नहीं की,’’ रत्ना ने आशीष की तरफ देखते हुए कहा.

आशीष, उस की बात सुन कर स्तब्ध रह गया.

‘‘ परीक्षा के लिए ‘औल द बैस्ट,’ बेटा. चलो, मैं अब निकलती हूं. मु?ो पैकिंग भी करनी है. आप सब से मिल कर बहुत अच्छा लगा,’’ कह कर रत्ना ने विदा ली.

‘‘आशीष आत्मग्लानि से भर गया और लता को एक कप चाय बनाने को कह कर वहीं सोफे पर बैठ पुरानी यादों में खो गया…

रत्ना और आशीष एक ही कालेज में पढ़ते थे. रत्ना के पिता विश्वनाथजी सिविल इंजीनियर थे. दूसरे शहर से तबादला होने के बाद कानपुर आए और अशीष के पड़ोसी बन गए. आशीष के पिता महेंद्रजी बिजली विभाग में कार्यरत थे. शहर में नए होने के कारण आशीष के परिवार ने विश्वनाथजी को यहां बसने में बहुत मदद की. कुछ ही दिनों में दोनों परिवार एकदूसरे से घुलमिल गए.

आशीष के कहने पर ही रत्ना का एडमिशन उसी के कालेज में करवा दिया गया. धीरेधीरे दोनों परिवारों में गहरी दोस्ती हो गई. दोनों परिवार दुखसुख में एकदूसरे का साथ देने लगे. रत्ना और आशीष के लिए दोनों घर अपने ही थे. धीरेधीरे आशीष और रत्ना के बीच प्यार का अंकुर फूटने लगा और फिर प्यार परवान चढ़ने लगा. समय बीतने लगा आशीष इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने दूसरे शहर चला गया. रत्ना इंटरमीडिएट पास करने के बाद बी. कौम. की पढ़ाई करने लगी. रत्ना आशीष के मातापिता का खूब खयाल रखती थी. आशीष की मां तो रत्ना को मन ही मन अपनी बहू मान चुकी थी. बस रत्ना के मातापिता की रजामंदी बाकी थी.

दशहरे की छुट्टियों में आशीष घर आया था. शांतिजी चाहती थीं इस बार शादी

की बात पक्की कर लें. बातों ही बातों में एक दिन आशीष की मां शांति ने माया से कह दिया, ‘‘माया, अगर तुम्हारी जानकारी में कोई अच्छी लड़की हो तो मेरे आशीष के लिए बताना.

1-2 सालों में मैं अपने घर बहू लाना चाहती हूं.’’

‘‘दीदी मेरी नज़र में एक लड़की तो है अगर आप चाहें तो,’’ कहतेकहते माया ने कमरे में पढ़ रही रत्ना को ला कर शांति के सामने खड़ा कर दिया. शांति खुशी से फूली न समाई और रत्ना को गले से लगा लिया. दोनों की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले.

‘‘दीदी, मैं आप के मन की बात जानती थी क्योंकि मैं भी यही चाहती थी पर आप से बात करने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी. रत्ना अगर आप की बहू बन जाए तो मुझ से अधिक खुश कौन होगा.’’

दोनों की बातें सुन कर रत्ना खुशी से फूले नहीं समा रही थी.

अब वह आशीष का इंतजार करने लगी कि कब वह बाजार से घर वापस आए और वह उसे यह खुशखबरी दे.

इसी खुशी में माया ने रात के खाने पर आशीष के परिवार को बुला लिया. अभी आशीष के पिता और रत्ना के पिता को इस बात की जानकारी न थी तो माया ने सोचा इसी बहाने

दोनों परिवार मिलबैठ कर इस विषय पर बात

कर लेंगे.

आशीष के पिता जब औफिस से आए तो शांति ने अपने मन की बात कही जिसे सुन कर महेंद्रजी भी खुश हो गए, ‘‘शांति, मुझे रत्ना बेटी पहले से ही पसंद थी लेकिन… खैर, चलो विश्वनाथ के घर चलते हैं.’’

समय पर आशीष का परिवार रत्ना के घर पहुंच गया और फिर महेंद्र ने बात छेड़ी जिसे सुन कर विश्वनाथ के चेहरे का र%A

Social Story: शुभअशुभ कुछ नहीं होता

Social Story: सावित्री देवी के घरआंगन में शहनाई की मधुर ध्वनि गूंज रही थी. सारे घर में उल्लास का वातावरण था. नईनवेली दुलहन शुचि व दूल्हा अभय ऐसे लग रहे थे जैसे वे एकदूसरे के लिए ही बने हों.

अभय का साथ पा कर शुचि प्रसन्न थी. परंतु दिन बीतने के साथ शुचि को यह एहसास होने लगा था कि एक असमानता उस के व अभय के बीच है. शुचि जहां एक प्रगतिशील परिवार की मेधावी लड़की थी, वहीं अभय का परंपरागत रूढिवादी परिवार था. यहां तक कि इंजीनियर होते हुए भी अभय के व्यक्तित्व में परिवार में व्याप्त अंधविश्वास की   झलक शुचि को स्पष्ट दिखाई देने लगी थी.

शुचि को याद है कि शादी के बाद पहली बार जब वह अभय के साथ बाहर घूमने जा रही थी तो बड़ी जेठानी ने उसे टोक दिया था, ‘‘शुचि, नई दुलहन तब तक घर से बाहर नहीं निकलती जब तक पंडितजी शुभ मुहूर्त नहीं बताते. यह इस घर की परंपरा है.’’ और फिर एक सरसरी निगाह शुचि व अभय पर डाल कर वे चली गई थीं.

शुचि तब और दुखी हो गई, जब अभय ने भी उन की बात मान कर घूमने जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया.

हर रोज इसी तरह की कोई न कोई घटना होती. शुचि का मन विद्रोह करने को आतुर हो उठता, परंतु नई बहू की लज्जा उसे रोक देती. हर कार्य के लिए सावित्री देवी को पंडित से सलाह लेना जरूरी था. घर का हर सदस्य पंडित की बताई बातों को ही मानता था. इस के लिए पता

नहीं कितने रुपए पंडितों के घर पहुंच जाते.

दिन बीतने लगे. अभय को शुचि सम  झाती पर बचपन के संस्कार और जो अंधविश्वास उस में भर दिए गए थे उन से वह मुक्त नहीं हो पा रहा था. तभी एक दिन जब घर के सदस्यों को शुचि के पांव भारी होने की खबर मिली  तो सारे घर में खुशी की लहर दौड़ गई. जल्दी से शुचि की सास सावित्री देवी मंदिर में प्रसाद चढ़ा आईं. उधर खबर मिलते ही पंडित रामधन शास्त्री अपने पोथेपत्रियों को ले कर आ धमके.

भरपेट जलपान करने के बाद अपनी भारीभरकम तोंद पर हाथ फेरते हुए पंडित सावित्री देवी से बोले, ‘‘देखो पुत्री, अब तुम्हें बहू का खास ध्यान रखना होगा. पूरे

9 महीने बहू को मुहूर्त देख कर ही घर से बाहर निकलने देना होगा. और हां, कोई ऊंचीनीच न हो, इस के लिए भी उपाय करने होंगे.’’

‘‘क्या उपाय हैं पंडितजी? मैं आने वाले बच्चे की भलाई के लिए सब करूंगी,’’ सावित्री देवी पंडित रामधन शास्त्री के चरणों में   झुक कर बोलीं.

मुसकराते रामधन शात्री मन ही मन प्रसन्न थे कि चलो अब साल भर तक तो मुफ्त का चढ़ावा मिलेगा. फिर बोले, ‘‘देखो पुत्री, अभीअभी बहू के पांव भारी हुए हैं, इसलिए अभी तुम्हें हवन कराना होगा ताकि शुरू का महीना ठीक से बीते.’’

‘‘कितना खर्च आएगा पंडितजी?’’ सावित्री देवी ने पूछा.

‘‘यही कोई 5 हजार रुपए. हवन की सामग्री मंगानी होगी और मेरे साथ हवन संपन्न

कराने 4 ब्राह्मण और आएंगे,’’ पंडित बोले.

सावित्री देवी पैसे ले आईं,

‘‘लीजिए पंडितजी, अब सब जिम्मेदारी आप की है और हां, हवन शीघ्र करवाइए.’’

‘‘चिंता न करो पुत्री सब भला होगा,’’ अपनी पोथी उठा कर शास्त्रीजी उठ खड़े हुए.

शुचि यह सब देख कर

दुखी हो उठी. हिम्मत कर के सावित्री देवी के पास जा कर बोली, ‘‘मांजी, विज्ञान के इस

युग में पंडितों की बात का विश्वास नहीं करना चाहिए.

ये हवनपूजन सब अंधविश्वास

है मांजी.’’

‘‘देखो बहू, माना तुम नए जमाने की हो पर हम ने भी दुनिया देखी है. ये केश धूप में सफेद नहीं हुए हैं हमारे. और हां, आइंदा हमारे काम में दखल नहीं देना,’’ सावित्री देवी बोलीं.

शुचि चुप हो गई. वह सम  झ गई कि मांजी उस की बात नहीं सम  झेंगी. मांजी क्या, इस परिवार का कोई भी सदस्य नहीं सम  झेगा.

कुछ दिन बीतने के बाद पंडित रामधन शास्त्री अपने

साथी पंडितों के साथ हवन

कराने आ पहुंचे. सावित्री देवी ने उन्हें आदरपूर्वक बैठा कर उन के चरण स्पर्श किए. फिर परिवार के सभी सदस्यों ने भी उन के चरण स्पर्श किए.

‘‘पंडितजी, हवन करने से सब बाधाएं दूर हो जाएंगी न?’’ सावित्री देवी बोलीं.

‘‘हां पुत्री, सब कुशल होगा,’’ पंडितजी बोले.

शुचि को भी अभय के साथ हवन में बैठना पड़ा. मन ही मन इन ढोंगी पंडितों को देख कर शुचि दुखी थी पर परिवार के सभी सदस्यों के मन पर छाए अंधविश्वास ने जो चक्रव्यूह शुचि के इर्दगिर्द रचा था, उसे वह तोड़ नहीं पा रही थी.

हवन की समाप्ति के बाद पंडितजी और उन के साथियों ने जलपान किया और दानदक्षिणा ले कर विदा ली.

रात में शुचि ने अभय को सम  झाने की कोशिश की, ‘‘अभय, देखो यह अंधविश्वास है. हवनपूजन में इतना समय और पैसा खर्च करना गलत है. आजकल डाक्टर ही यह बता सकते हैं कि बच्चा स्वस्थ होगा या नहीं. पंडित तो सिर्फ ग्रहों के   झूठे हेरफेर में फंसा कर अपनी रोजीरोटी चलाते हैं.’’

‘‘देखो शुचि, मां और परिवार के बाकी सदस्य तुम्हारे भले के लिए ही सोच रहे हैं. हमारे घर में हमेशा ही पंडितों

से पूछ कर सारे शुभ कार्य होते हैं, इसलिए तुम चुप रहो यही अच्छा होगा,’’ अभय गुस्से से बोला.

दिन बीतने लगे. शुचि स्वयं को

असहाय महसूस करने लगी. पर वह डा. सीमा के पास जब भी चैकअप के लिए जाती उसे यह सुन कर तसल्ली मिलती कि सब

ठीक है.

2 महीने बाद एक दिन दोपहर को दरवाजे की घंटी

बजने पर सावित्री देवी ने दरवाजा खोला तो सामने एक पंडितजी खड़े थे. रामनामी धोती, माथे

पर बड़ा सा टीका लगाए जनेऊ पहने पंडितजी के हाथों में पोथीपत्रियां थीं. अंदर आने

को आतुर पंडितीजी से

सावित्री देवी बोलीं, ‘‘मैं ने आप को पहचाना नहीं पंडितजी?’’

पंडितजी इधरउधर नजरें घुमाते हुए बोले, ‘‘घोर संकट. पुत्री, घोर संकट. मैं इस घर के सामने से गुजर रहा था तभी मु  झे महसूस हुआ कि इस घर में एक नया मेहमान आने वाला है और उस पर ग्रहों का भारी संकट है. उन का उपाय जरूरी है पुत्री.’’

‘‘पर पंडितजी…’’ सावित्री देवी की बात बीच में ही काट कर पंडितजी बोल पड़े, ‘‘कुछ न कहो पुत्री, तुम ने पंडित दीनानाथ शर्मा का नाम नहीं सुना? मैं वही हूं. मेरी बात कभी न टालना वरना अनर्थ हो जाएगा.’’

घबरा कर सावित्री देवी बोलीं, ‘‘जैसा आप कहेंगे वैसा ही होगा पंडितजी.’’

यह सब देख कर शुचि तिलमिला उठी. अब फिर वही सब होगा. राह चलता कोई भी घर आ कर पूजापाठ के बहाने पैसे ऐंठ ले, यह कैसी विडंबना है. वह कुछ कहने ही वाली थी कि तुरंत सावित्री देवी ने उसे घूर कर देखा, ‘‘शुचि, जाओ स्वामीजी के लिए जलपान ले कर आओ.’’

शुचि मन ही मन दुखी थी. चुपचाप वह अंदर चली गई. उसे सम  झ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

उधर पंडितजी पंचांग निकाल कर ग्रहों की गणना कर रहे थे.

‘‘तुम्हारी बहू का चौथा महीना चल रहा है न पुत्री? क्या राशि है बहू की?’’ उन्होंने पूछा,

‘‘जी तुला राशि है बहू की,’’ सावित्री देवी ने कहा.

‘‘बहुत भारी ग्रह है पुत्री. बच्चे

व मां की रक्षा के लिए उपाय आवश्यक है.’’

‘‘कुछ दानदक्षिणा दो, उपाय हम स्वयं कर देंगे,’’ मन ही मन मुसकराते हुए पंडितजी सावित्री देवी से बोले. जलपान कर के पूरे 1,100 रुपए दक्षिणा ले कर पंडितजी विदा हुए.

तभी अभय भी घर आ गया. पूरी बात जानने के बाद वह बहुत प्रसन्न हुआ, ‘‘चलो मां, राह चलते ही सही, उन्होंने इस घर का भला तो सोचा.’’

शुचि जानती थी कि इन को सम  झाना बेकार है.

इसी तरह दिन बीतते जा रहे थे. किसी

को भी यह पता नहीं था कि वह राह चलता पंडित, जो उन का भला करने की कह गया था पंडित रामधन शास्त्री का ही भेजा गया था. उसे पहले से शुचि और सावित्री देवी परिवार के बारे में जानकारी थी. सब खुश थे कि अब उन का कुछ नहीं बिगड़ सकता.

एक दिन शुचि रसोई में थी. तभी पंडित रामधन शास्त्री की आवाज सुनी तो सम  झ गई कि एक बार फिर वही सब दोहराया जाएगा.

शुचि का 9वां महीना चल रहा था. उस की सास ने ही पंडितजी को बुलवाया था. अपनी सास व पंडितजी की बात सुन कर शुचि सन्न रह गई. इतना अधिक अंधविश्वास इतनी रूढिवादिता. शुचि की सास उस की जन्मपत्री पंडितजी को दिखा कर यह पूछ रही थीं कि वह कौन सा शुभ मुहूर्त है, जिस में बच्चे का जन्म होने पर वह तेजस्वी, प्रतिभावान व

दीर्घायु होगा?

पंडितजी पत्री देख कर गणना कर रहे थे. उधर शुचि सकते में थी. वह सोच रही थी कि यह कैसा अंधविश्वास है, यह कैसा इंसाफ है कि प्रकृति के बनाए नियमों में भी इंसान ने अपना दखल देना शुरू कर दिया है?

एक बच्चे का जन्म, जो पूर्णतया प्रकृति के हाथ में है उस पर भी ग्रहनक्षत्रों का तानाबाना बुन दिया गया है और पढ़ेलिखे व्यक्ति दिग्भ्रमित होने लगे हैं.

परंतु यह सब सुन कर उस ने निश्चय कर लिया था कि उसे ही इस अंधविश्वास का अंत करना है. इस सोच के साथ ही शुचि अपनी योजना को मूर्तरूप देने के लिए तत्पर हो उठी. वह इस योजना में डा. सीमा को भी शामिल करना चाहती थी, क्योंकि उन के सहयोग के बिना यह असंभव था.

2 दिन बाद ही शुचि को डा. सीमा के यहां चैकअप के लिए जाना पड़ा. चैकअप के बाद उस ने डा. सीमा को शुभ मुहूर्त में बच्चे के जन्म करवाने की अपनी सास की इच्छा के विषय में बताया और साथ ही यह भी कहा कि वह ऐसा नहीं चाहती है, इसलिए उन्हें उस की योजना में उस का साथ देना होगा.

डा. सीमा शुचि की बात सुन कर बोलीं, ‘‘शुचि, आजकल समाज के हर वर्ग में शुभ मुहूर्त देख कर औपरेशन द्वारा बच्चे का जन्म करवाना प्रचलन में है. यह काम जो पूर्णतया प्रकृति के वश में था, उस पर भी  अब पंडितों ने ग्रहनक्षत्रों का लेबल लगा दिया है.’’

कुछ विशेष परिस्थितियों में तो औपरेशन कर के बच्चे का जन्म कराया जाता है, परंतु अब पंडितों के साथसाथ कुछ नर्सिंगहोम्स में भी डाक्टर पैसों के लिए लोगों द्वारा बताए गए समय पर ही बच्चों का जन्म कराने लगे हैं. पर तुम चिंता न करो, क्योंकि किसी न किसी को तो पहल करनी ही होगी. मैं तुम्हारे साथ हूं.

डा. सीमा के कैबिन से बाहर निकल कर शुचि ने महसूस किया कि अब वह निश्चिंत

थी कि उस का बच्चा अंधविश्वास की बलि

नहीं चढ़ेगा.

बड़ी जेठानी नेहा पूछती रहीं कि शुचि तुम्हें अंदर बहुत देर लग गई, परंतु शुचि ने उन की बात टाल दी.

उधर 9वां महीना पूरा होने के पश्चात शुचि

की सास पंडितजी द्वारा बताए मुहूर्त पर शुचि को ले कर नर्सिंगहोम पहुंचीं. डा. सीमा ने उन्हें शुचि का चैकअप कर के बताया, ‘‘इसे ऐडमिट करना होगा, क्योंकि रक्तचाप बहुत बढ़ा हुआ है.’’

‘‘पर डा. साहब, कल ही तो वह शुभ मुहूर्त है, जिस में बच्चे का जन्म होना चाहिए. मैं आप को मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हूं ताकि शुभ मुहूर्त पर ही बच्चे का जन्म हो,’’ सावित्री देवी बोलीं.

‘‘हद करती हैं आप मांजी. बढ़े हुए रक्तचाप में मैं ऐसा कुछ नहीं कर सकती. पहले शुचि की शारीरिक स्थिति ठीक होने दीजिए. और हां, यह कीमत अपने पास ही रखिए, क्योंकि मु  झे शुचि व उस के बच्चे की जान ज्यादा प्यारी है,’’ डा. सीमा क्रोध से बोलीं.

सावित्री देवी गुमसुम सी एक तरफ बैठ गईं. परिवार के सभी सदस्य एकएक कर के नर्सिंगहोम पहुंच चुके थे. शायद सभी शुभ मुहूर्त पर होने वाले बच्चे को देखना चाहते थे पर शुचि की हालत की बात जान कर सभी चुप हो गए.

उधर शुचि मन ही मन प्रसन्न थी, क्योंकि वह डा. सीमा के साथ अपने मकसद में कामयाब हो रही थी.

उधर सावित्री देवी फिर से पंडित रामधन शास्त्री के पास पहुंचीं और उन्हें बहू की हालत बताई. पंडितजी तो लालची थे ही. अत: उन्होंने तुरंत उन्हें 1 हफ्ते बाद का मुहूर्त बता दिया और आसानी से 501 रुपए दक्षिणा में प्राप्त कर लिए. अब सावित्री देवी खुश थीं. वे 1 हफ्ते के लिए चिंतामुक्त जो हो गई थीं.

उधर 2 दिन बाद शुचि ने एक स्वस्थ व सुंदर बालक को जन्म दिया. जहां अपने पोते को देख सावित्री देवी व परिवार के सभी सदस्य प्रसन्न थे, वहीं उस के शुभ मुहूर्त में न होने को ले कर उस के भविष्य को ले कर शंकित भी थे. तभी डा. सीमा ने वहां प्रवेश किया.

‘‘डाक्टर साहिबा, पंडितजी ने तो 1 हफ्ते बाद का मुहूर्त निकाला था पर बच्चे का जन्म तो आज ही हो गया. आप देख लीजिए यह स्वस्थ तो है या नहीं? मैं अभी पंडितजी को बुलवाती हूं,’’ घबराए स्वर में सावित्री देवी बोलीं.

‘‘मांजी, कैसी बात कर रही हैं आप. इस का जन्म तो प्रकृति के विधान के अनुसार ही हुआ है. इसीलिए तो यह पूर्णतया स्वस्थ है. और हां, आज मैं आप को एक राज की बात बताना चाहती हूं. वास्तव में यह मेरी और शुचि की योजना थी. शुचि बिलकुल स्वस्थ थी, पर हम आप के पंडित द्वारा बताए मुहूर्त पर इसलिए बच्चे का जन्म नहीं कराना चाहते थे, क्योंकि हम आप के दिल व दिमाग पर छाए अंधविश्वास को हटाना चाहते थे.

‘‘आज शुचि ने एक स्वस्थ एवं सुंदर  बालक को प्रकृति द्वारा निश्चित समय पर जन्म दिया है और इस से यह बात साबित हो गई है कि शुभअशुभ कुछ नहीं होता. ये सब अंधविश्वास हैं, जो पंडितों  द्वारा फैलाए गए हैं. शुचि ने ही इस अंधविश्वास को दूर करने की पहल की है, इसलिए यह बधाई की पात्र है.’’

डा. सीमा की बात सुन कर सभी सन्न थे मानो उन्होंने सब की आंखों से परदा हटा दिया हो.

सभी आने वाले कल की कल्पना कर के मुसकरा उठे. Social Story

Online Hindi Story: बहू ने निभाया बेटे का फर्ज

Online Hindi Story: बहू शब्द सुनते ही मन में सब से पहला विचार यही आता है कि बहू तो सदा पराई होती है. लेकिन मेरी शोभा भाभी से मिल कर हर व्यक्ति यही कहने लगता है कि बहू हो तो ऐसी. शोभा भाभी ने न केवल बहू का, बल्कि बेटे का भी फर्ज निभाया. 15 साल पहले जब उन्होंने दीपक भैया के साथ फेरे ले कर यह वादा किया था कि वे उन के परिवार का ध्यान रखेंगी व उन के सुखदुख में उन का साथ देंगी, तब से वह वचन उन्होंने सदैव निभाया.

जब बाबूजी दीपक भैया के लिए शोभा भाभी को पसंद कर के आए थे तब बूआजी ने कहा था, ‘‘बड़े शहर की लड़की है भैयाजी, बातें भी बड़ीबड़ी करेगी. हमारे छोटे शहर में रह नहीं पाएगी.’’

तब बाबूजी ने मुसकरा कर कहा था, ‘‘दीदी, मुझे लड़की की सादगी भा गई. देखना, वह हमारे परिवार में खुशीखुशी अपनी जगह बना लेगी.’’

बाबूजी की यह बात सच साबित हुई और शोभा भाभी कब हमारे परिवार का हिस्सा बन गईं, पता ही नहीं चला. भाभी हमारे परिवार की जान थीं. उन के बिना त्योहार, विवाह आदि फीके लगते थे. भैया सदैव काम में व्यस्त रहते थे, इसलिए घर के काम के साथसाथ घर के बाहर के काम जैसे बिजली का बिल जमा करना, बाबूजी की दवा आदि लाना सब भाभी ही किया करती थीं.

मां के देहांत के बाद उन्होंने मुझे कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी. इसी बीच राहुल के जन्म ने घर में खुशियों का माहौल बना दिया. सारा दिन बाबूजी उसी के साथ खेलते रहते. मेरे दोनों बच्चे अपनी मामी के इस नन्हे तोहफे से बेहद खुश थे. वे स्कूल से आते ही राहुल से मिलने की जिद करते थे. मैं जब

भी अपने पति दिनेश के साथ अपने मायके जाती तो भाभी न दिन देखतीं न रात, बस

सेवा में लग जातीं. इतना लाड़ तो मां भी नहीं करती थीं.

एक दिन बाबूजी का फोन आया और उन्होंने कहा, ‘‘शालिनी, दिनेश को ले कर फौरन चली आ बेटी, शोभा को तेरी जरूरत है.’’

मैं ने तुरंत दिनेश को दुकान से बुलवाया और हम दोनों घर के लिए निकल पड़े. मैं सारा रास्ता परेशान थी कि आखिर बाबूजी ने इस समय हमें क्यों बुलाया और भाभी को मेरी जरूरत है, ऐसा क्यों कहा? मन में सवाल ले कर जैसे ही घर पहुंची तो देखा कि बाहर टैक्सी खड़ी थी और दरवाजे पर 2 बड़े सूटकेस रखे थे. कुछ समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है. अंदर जाते ही देखा कि बाबूजी परेशान बैठे थे और भाभी चुपचाप मूर्ति बन कर खड़ी थीं.

भैया गुस्से में आए और बोले, ‘‘उफ, तो अब अपनी

वकालत करने के लिए शोभा ने आप लोगों को बुला लिया.’’

भैया के ये बोल दिल में तीर की तरह लगे. तभी दिनेश बोले, ‘‘क्या हुआ भैया आप सब इतने परेशान क्यों हैं?’’

इतना सुनते ही भाभी फूटफूट कर रोने लगीं.

भैया ने गुस्से में कहा, ‘‘कुछ नहीं दिनेश, मैं ने अपने जीवन में एक महत्त्वपूर्ण फैसला लिया है जिस से बाबूजी सहमत नहीं हैं. मैं विदेश जाना चाहता हूं, वहां बहुत अच्छी नौकरी मिल रही है, रहने को मकान व गाड़ी भी.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है भैया,’’ दिनेश ने कहा.

दिनेश कुछ और कह पाते, तभी भैया बोले, ‘‘मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई दिनेश, मैं अब अपना जीवन अपनी पसंद से जीना चाहता हूं, अपनी पसंद के जीवनसाथी के साथ.’’

यह सुनते ही मैं और दिनेश हैरानी से भैया को देखने लगे. भैया ऐसा सोच भी कैसे सकते थे. भैया अपने दफ्तर में काम करने वाली नीला के साथ घर बसाना चाहते थे.

‘‘शोभा मेरी पसंद कभी थी ही नहीं. बाबूजी के डर के कारण मुझे यह विवाह करना पड़ा. परंतु कब तक मैं इन की खुशी के लिए अपनी इच्छाएं दबाता रहूंगा?’’

मैं बाबूजी के पैरों पर गिर कर रोती हुई बोली, ‘‘बाबूजी, आप भैया से कुछ कहते क्यों नहीं? इन से कहिए ऐसा न करें, रोकिए इन्हें बाबूजी, रोक लीजिए.’’

चारों ओर सन्नाटा छा गया, काफी सोच कर बाबूजी ने भैया से कहा, ‘‘दीपक, यह अच्छी बात है कि तुम जीवन में सफलता प्राप्त कर रहे हो पर अपनी सफलता में तुम शोभा को शामिल नहीं कर रहे हो, यह गलत है. मत भूलो कि तुम आज जहां हो वहां पहुंचने में शोभा ने तुम्हारा भरपूर साथ दिया. उस के प्यार और विश्वास का यह इनाम मत दो उसे, वह मर जाएगी,’’ कहते हुए बाबूजी की आंखों में आंसू आ गए.

भैया का जवाब तब भी वही था और वे हम सब को छोड़ कर अपनी अलग

दुनिया बसाने चले गए.

बाबूजी सदा यही कहते थे कि वक्त और दुनिया किसी के लिए नहीं रुकती, इस बात का आभास भैया के जाने के बाद हुआ. सगेसंबंधी कुछ दिन तक घर आते रहे दुख व्यक्त करने, फिर उन्होंने भी आना बंद कर दिया.

जैसेजैसे बात फैलती गई वैसेवैसे लोगों का व्यवहार हमारे प्रति बदलता गया. फिर एक दिन बूआजी आईं और जैसे ही भाभी उन के पांव छूने लगीं वैसे ही उन्होंने चिल्ला कर कहा, ‘‘हट बेशर्म, अब आशीर्वाद ले कर क्या करेगी? हमारा बेटा तो तेरी वजह से हमें छोड़ कर चला गया. बूढ़े बाप का सहारा छीन कर चैन नहीं मिला तुझे अब क्या जान लेगी हमारी? मैं तो कहती हूं भैया इसे इस के मायके भिजवा दो, दीपक वापस चला आएगा.’’

बाबूजी तुरंत बोले, ‘‘बस दीदी, बहुत हुआ. अब मैं एक भी शब्द नहीं सुनूंगा. शोभा इस घर की बहू नहीं, बेटी है. दीपक हमें इस की वजह से नहीं अपने स्वार्थ के लिए छोड़ कर गया है. मैं इसे कहीं नहीं भेजूंगा, यह मेरी बेटी है और मेरे पास ही रहेगी.’’

बूआजी ने फिर कहा, ‘‘कहना बहुत आसान है भैयाजी, पर जवान बहू और छोटे से पोते को कब तक अपने पास रखोगे? आप तो कुछ कमाते भी नहीं, फिर इन्हें कैसे पालोगे? मेरी सलाह मानो इन दोनों को वापस भिजवा दो. क्या पता शोभा में ऐसा क्या दोष है, जो दीपक इसे अपने साथ रखना ही नहीं चाहता.’’

यह सुनते ही बाबूजी को गुस्सा आ गया और उन्होंने बूआजी को अपने घर से चले जाने को कहा. बूआजी तो चली गईं पर उन की

कही बात बाबूजी को चैन से बैठने नहीं दे रही थी. उन्होंने भाभी को अपने पास बैठाया और कहा, ‘‘बस शोभा, अब रो कर अपने आने

वाले जीवन को नहीं जी सकतीं. तुझे बहादुर बनना पड़ेगा बेटा. अपने लिए, अपने बच्चे

के लिए तुझे इस समाज से लड़ना पड़ेगा.

तेरी कोई गलती नहीं है. दीपक के हिस्से

तेरी जैसी सुशील लड़की का प्यार नहीं है.

तू चिंता न कर बेटा, मैं हूं न तेरे साथ और हमेशा रहूंगा.’’

वक्त के साथ भाभी ने अपनेआप को संभाल लिया. उन्होंने कालेज में नौकरी कर ली और शाम को घर पर भी बच्चों को पढ़ाने लगीं. समाज की उंगलियां भाभी पर उठती रहीं, पर उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा. राहुल को स्कूल में डालते वक्त थोड़ी परेशानी हुई पर भाभी ने सब कुछ संभालते हुए सारे घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली.

भाभी ने यह साबित कर दिया कि अगर औरत ठान ले तो वह अकेले पूरे समाज से लड़ सकती है. इस बीच भैया की कोई खबर नहीं आई. उन्होंने कभी अपने परिवार की खोजखबर नहीं ली. सालों बीत गए भाभी अकेली परिवार चलाती रहीं, पर भैया की ओर से कोई मदद नहीं आई.

एक दिन भाभी का कालेज से फोन आया, ‘‘दीदी, घर पर ही हो न शाम को?

आप से कुछ बातें करनी हैं.’’

‘‘हांहां भाभी, मैं घर पर ही हूं आप

आ जाओ.’’

शाम 6 बजे भाभी मेरे घर पहुंचीं. थोड़ी परेशान लग रही थीं. चाय पीने के बाद मैं ने उन से पूछा, ‘‘क्या बात है भाभी कुछ परेशान लग रही हो? घर पर सब ठीक है?’’

थोड़ा हिचकते हुए भाभी बोलीं, ‘‘दीदी, आप के भैया का खत आया है.’’

मैं अपने कानों पर विश्वास नहीं कर पा रही थी. बोली, ‘‘इतने सालों बाद याद आई उन को अपने परिवार की या फिर नई बीवी ने बाहर निकाल दिया उन को?’’

‘‘ऐसा न कहो दीदी, आखिर वे आप के भाई हैं.’’

भाभी की बात सुन कर एहसास हुआ कि आज भी भाभी के दिल के किसी कोने में भैया हैं. मैं ने आगे बढ़ कर पूछा, ‘‘भाभी, क्या लिखा है भैया ने?’’

भाभी थोड़ा सोच कर बोलीं, ‘‘दीदी, वे चाहते हैं कि बाबूजी मकान बेच कर उन के साथ चल कर विदेश में रहें.’’

‘‘क्या कहा? बाबूजी मकान बेच दें? भाभी, बाबूजी ऐसा कभी नहीं करेंगे और अगर वे ऐसा करना भी चाहेंगे तो मैं उन्हें कभी ऐसा करने नहीं दूंगी. भाभी, आप जवाब दे दीजिए कि ऐसा कभी नहीं होगा. वह मकान बाबूजी के लिए सब कुछ है, मैं उसे कभी बिकने नहीं दूंगी. वह मकान आप का और राहुल का सहारा है. भैया को एहसास है कि अगर वह मकान नहीं होगा तो आप लोग कहां जाएंगे? आप के बारे में तो नहीं पर राहुल के बारे में तो सोचते. आखिर वह उन का बेटा है.’’

मेरी बातें सुन कर भाभी चुप हो गईं और गंभीरता से कुछ सोचने लगीं. उन्होंने यह बात अभी बाबूजी से छिपा रखी थी. हमें समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें, तभी दिनेश आ गए और हमें परेशान देख कर सारी बात पूछी. बात सुन कर दिनेश ने भाभी से कहा, ‘‘भाभी, आप को यह बात बाबूजी को बता देनी चाहिए. दीपक भैया के इरादे कुछ ठीक नहीं लग रहे.’’

यह सुनते ही भाभी डर गईं. फिर हम तीनों तुरंत घर के लिए निकल पड़े. घर जा कर

भाभी ने सारी बात विस्तार से बाबूजी को बता दी. बाबूजी कुछ विचार करने लगे. उन के चेहरे से लग रहा था कि भैया ऐसा करेंगे उन्हें इस बात की उम्मीद थी. उन्होंने दिनेश से पूछा, ‘‘दिनेश, तुम बताओ कि हमें क्या करना चाहिए?’’

दिनेश ने कहा, ‘‘दीपक आप के बेटे हैं तो जाहिर सी बात है कि इस मकान पर उन का अधिकार बनता है. पर यदि आप अपने रहते यह मकान भाभी या राहुल के नाम कर देते हैं तो फिर भैया चाह कर भी कुछ नहीं कर सकेंगे.’’

दिनेश की यह बात सुन कर बाबूजी ने तुरंत फैसला ले लिया कि वे अपना मकान भाभी के नाम कर देंगे. मैं ने बाबूजी के इस फैसले को मंजूरी दे दी और उन्हें विश्वास दिलाया कि वे सही कर रहे हैं.

ठीक 10 दिन बाद भैया घर आ पहुंचे और आ कर अपना हक मांगने लगे. भाभी पर इलजाम लगाने लगे कि उन्होंने बाबूजी के बुढ़ापे का फायदा उठाया है और धोखे से मकान अपने नाम करवा लिया है.

भैया की कड़वी बातें सुन कर बाबूजी को गुस्सा आ गया. वे भैया को थप्पड़ मारते हुए बोले, ‘‘नालायक कोई तो अच्छा काम किया होता. शोभा को छोड़ कर तू ने पहली गलती की और अब इतनी घटिया बात कहते हुए तुझे जरा सी भी लज्जा नहीं आई. उस ने मेरा फायदा नहीं उठाया, बल्कि मुझे सहारा दिया. चाहती तो वह भी मुझे छोड़ कर जा सकती

थी, अपनी अलग दुनिया बसा सकती थी पर उस ने वे जिम्मेदारियां निभाईं जो तेरी थीं.

तुझे अपना बेटा कहते हुए मुझे अफसोस

होता है.’’

भाभी तभी बीच में बोलीं, ‘‘दीपक, आप बाबूजी को और दुख मत दीजिए, हम सब की भलाई इसी में है कि आप यहां से चले जाएं.’’

भाभी का आत्मविश्वास देख कर भैया दंग रह गए और चुपचाप लौट गए.

भाभी घर की बहू से अब हमारे घर का बेटा बन गई थीं. Online Hindi Story

Best Family Story: एक्स मंगेतर बनी मजिस्ट्रेट

Best Family Story: जून का अंतिम सप्ताह और आकाश में कहीं बादल नहीं. अभय को आज हर हाल में रामपुर पहुंचना है वरना ऐसी गरमी में वह क्यों यात्रा करता? वह तो स्टेशन पहुंचने से ले कर रिजर्वेशन चार्ट में अपना नाम ढूंढ़ने तक में ही पसीनापसीना हो गया. पर अपने फर्स्ट क्लास एसी डब्बे में पहुंचते ही उस ने राहत की सांस ली. सामने की सीट पर एक सुंदर महिला बैठी थी. यात्रा में ऐसे सहयात्री का सान्निध्य अच्छा लगता है.

‘‘सामान सीट के नीचे लगा दो,’’ अभय ने पानी की बोतल को खिड़की के पास की खूंटी से टांगते हुए कुली से कहा.

अभय ने महिला को कनखियों से देखा. वह एक बार उन लोगों को उचटती नजर से देख कुछ पढ़ने में व्यस्त हो गई है. इस बीच कुली ने सामान सीट के नीचे रख दिया. जेब से पर्स निकाल कर कुली को मुंहमांगी मजदूरी के साथसाथ अभय ने 10 रुपए बख्शिश भी दी. कुली के डब्बे से उतरते ही गाड़ी ने रेंगना शुरू कर दिया. गाड़ी स्टेशन, शहर पीछे छोड़ती जा रही थी. अब बेफिक्र हो कर अभय ने पूरे डब्बे में नजर दौड़ाई. पूरे डब्बे में सिर्फ वे दोनों ही थे. ऐसा सुखद संयोग पा कर अभय खुश हो उठा. थोड़ी देर बाद अपने जूते उतार कर, बाल संवार कर वह बर्थ पर इस प्रकार टेक लगा कर बैठा कि उस महिला को भलीभांति निहार सके. महिला वास्तव में सुंदर थी. वह लगभग 34-35 वर्ष की तो रही होगी पर देखने से काफी कम आयु की लग रही थी.

अभय उस महिला से संवाद स्थापित करने हेतु व्यग्र हो उठा. पर महिला अपने आसपास के वातावरण से बेखबर पढ़ने में व्यस्त थी. उस की बर्थ पर एक ओर कई समाचारपत्र और पत्रिकाएं रखी हुई थीं और वह एक पुस्तक खोले उस से अपनी नोटबुक में कुछ नोट करती जा रही थी. अभय के बैग में भी 2-3 पत्रिकाएं रखी थीं. पर उन्हें निकालने के बजाय महिला से संवाद करने के उद्देश्य से उस ने शालीनता से पूछा, ‘‘ऐक्सक्यूज मी मैडम, क्या मैं यह मैगजीन देख सकता हूं?’’ महिला ने एक बार सपाट नजर से उसे देखा. 36-37 वर्ष का स्वस्थ, ऊंचे कद का व्यक्ति, गेहुआं रंग और उन्नत मस्तक. कुल मिला कर आकारप्रकार से संभ्रांत और सुशिक्षित दिखाई देता व्यक्ति. महिला ने बिना कुछ कहे मैगजीन उस की ओर बढ़ा दी. तभी अचानक उसे लगा कि इस व्यक्ति को उस ने कहीं देखा है? पर कब और कहां?

दिमाग पर जोर देने पर भी उसे कुछ याद नहीं आया. थक कर उस ने यह विचार मन से झटक दिया और पुन: अपने काम में मशगूल हो गई. गाड़ी लखनऊ स्टेशन पर रुक रही थी. महिला को अपना सामान समेटते देख कर अभय इस आशंका से भयभीत हो उठा कि कहीं यह सुखद सान्निध्य यहीं तक का तो नहीं? अभी तो कोई बात भी नहीं हो पाई है. तभी महिला ने दूसरी नोटबुक और किताब निकाल ली और पुन: कुछ लिखने में व्यस्त हो गई. अभय ने यह देख राहत की सांस ली.

अचानक डब्बे का दरवाजा खुला. टीटी ने अंदर झांका और फिर सौरी कह कर दरवाजा बंद कर दिया. दरवाजा फिर खुला और सफेद वरदी में एक व्यक्ति, जो उस महिला का अरदली था और द्वितीय श्रेणी में यात्रा कर रहा था, ने आ कर उस महिला से सम्मान से पूछा, ‘‘मेम साहब, चाय, कौफी या फिर ठंडा लाऊं?’’

‘‘हां, स्ट्रौंग कौफी ले आओ,’’ महिला ने बिना नजरें उठाए कहा.

जब अरदली जाने लगा तो अभय ने उसे आवाज दे कर बुलाया, ‘‘सुनो, 1 कप कौफी मेरे लिए भी ले आना.’’

अरदली ने ठिठक कर महिला की ओर देखा और उस की मौन स्वीकृति पा कर चला गया. महिला अब अभय के बारे में सोचने लगी कि पुरुष मानसिकता की कितनी स्पष्ट छाप है इस की हर गतिविधि में. थोड़ी ही देर में अरदली 2 कप कौफी दे कर लौट गया. अभय ने कौफी का सिप लेते ही कहा, ‘‘कौफी अच्छी बनी है.’’

मगर महिला बिना कुछ बोले कौफी पीती रही. अभय समझ नहीं पा रहा था कि अब वह महिला से कैसे संवाद स्थापित करे. वह कुछ बोलने ही जा रहा था कि तभी बैरा अंदर आ गया. उस ने पूछा, ‘‘साहब, लंच कहां सर्व किया जाए?’’

‘‘लखनऊ में तो दूसरा बैरा आया था, अब तुम कहां से आ गए?’’ अभय ने पूछा.

‘‘नहीं तो साहब… लखनऊ में भी मैं ही इस डब्बे के साथ था.’’

दोनों के वार्त्तालाप के मध्य हस्तक्षेप कर महिला ने कहा, ‘‘वह बैरा नहीं, मेरा अरदली था.’’ यह सुन कर अभय लज्जित हो उठा. उस ने बैरे को फौरन लंच के लिए और्डर दे कर विदा कर दिया. महिला ने पहले ही अपने लिए कुछ भी लाने को मना कर दिया था. वह मन ही मन सोच रहा था कि उच्चपदासीन होने के बावजूद उस के जीवन में अब तक ऐसी कोई महिला नहीं आई, जिस से संवाद स्थापित करने की ऐसी प्रबल इच्छा होती. कार और सुंदर बंगला मिलने के प्रलोभन में ऐसी पत्नी मिली, जिस से उस का मानसिक स्तर पर कभी अनुकूलन न हो सका. ‘काश, ऐसी महिला आज से कुछ वर्ष पहले मेरे जीवन में आई होती.’

अभय ने पुन: वार्त्ता का सूत्र जोड़ने का प्रयास किया, ‘‘मैडम, आप ने लंच और्डर नहीं किया. क्या आप हरदोई या शाहजहांपुर तक ही जा रही हैं?’’

महिला ने उसे ध्यान से देखा. उसे खीज हुई कि यह व्यक्ति उस की रुखाई के बावजूद निरंतर उस से बात करने का प्रयास किए जा रहा है. ‘इसे पहले कहीं देखा है’ एक बार फिर इस प्रश्न के कुतूहल ने सिर उठाया, पर व्यर्थ. उसे कुछ याद नहीं आ रहा था. फिर अपने दिमाग पर अनावश्यक जोर देने के बजाय उस ने संक्षिप्त उत्तर दिया, ‘‘नहीं, मैं बरेली तक जा रही हूं.’’

‘‘क्या वहां आप का मायका है?’’

‘‘नहीं, मेरा मायका तो फैजाबाद में है. दरअसल, मैं बरेली में एडीशनल मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात हूं.’’

यह सुनते ही अभय के मन में एक हूक सी उठी. फिर उस ने लुभावने अंदाज में कहा, ‘‘आप जैसी शख्सीयत से मिलने पर बहुत खुशी हो रही है.’’

फिर अभय सहसा अपने बारे में बताने के लिए बेचैन हो उठा. बोला, ‘‘मैडम, मैं भी जनपद फैजाबाद का रहने वाला हूं. इस समय मैं हरिद्वार में पीडब्लूडी में अधीक्षण अभियंता के पद पर हूं. अभय प्रताप सिंह नाम है मेरा. मेरे पिता ठाकुर विक्रम प्रताप सिंह भी अपने क्षेत्र के नामी ठेकेदार हैं.

‘‘मेरा विवाह सुलतानपुर के एक संभ्रांत ठाकुर घराने में हुआ है. मेरे ससुर भी हाइडिल विभाग में उच्चाधिकारी हैं,’’ अभय नौनस्टौप बोले जा रहा था.

पर ठाकुर विक्रम प्रताप सिंह का नाम सुनते ही महिला को कुछ और सुनाई देना बंद हो गया. एक झटके से विस्मृति के सारे द्वार खुल गए. उसे अपने जीवन की घनघोर पीड़ा का वह अध्याय याद हो आया, जिसे वह अब तक भूल न सकी थी. फिर एक गहरी सांस छोड़ कर महिला ने सोचा कि कुदरत जो करती है, अच्छा ही करती है.

एक दिन इसी अभय से उस की सगाई हुई थी. वह तो मन ही मन उसे अपना पति मान चुकी थी, पर धनसंपदा के प्रलोभन में अभय के पिता ने यह सगाई तोड़ दी थी. बड़ा अपमान हुआ था उस के सीधेसादे बाबूजी का. मगर उसी अपमान के तीखे दंश उसे निरंतर आगे बढ़ने को प्रेरित करते रहे. अपने बाबूजी के खोए सम्मान को वापस पाने हेतु उस ने कड़ी मेहनत की. आज उस के पास सब कुछ है फिर भी उस में एक अजब सा वैराग्य आ गया है, जो शायद इसी व्यक्ति के प्रति कभी रहे उस के गहन अनुराग को ठुकराए जाने का परिणाम है. पर आज अभय की आंखों में अपने प्रति सम्मान और प्रशंसा देख कर उस की सारी गांठें जैसे अपनेआप खुलती चली गईं. गाड़ी बरेली स्टेशन पर रुकी. अरदली ने महिला का सामान उठाया. महिला डब्बे से बाहर जाने के लिए बढ़ी, फिर अनायास अभय की ओर मुड़ी और बोली, ‘‘पहचानते हैं मुझे? मैं उन्हीं ठाकुर विजय सिंह की बेटी निकिता हूं, जिस से कभी आप की सगाई हुई थी,’’ और फिर अभय को अवाक छोड़ डब्बे से उतर गई. बाहर उस के पति और बच्चे उसे रिसीव करने आए थे. Best Family Story

Furniture Care: मौनसून में भी फर्नीचर दिखेगा नया जैसा, करें स्मार्ट केयर

Furniture Care: बारिश के मौसम के दौरान लकड़ियों के फर्नीचर की देखभाल बेहद जरूरी है. विशेषज्ञों का कहना है कि फर्नीचर के कोने, उसके निचले और पिछले भागों को महीने में कम से कम एक बार जरूर साफ करना चाहिए. मौनसून के मौसम में फर्नीचर की खास देखभाल जरूरी होती है. इन सुझावों की मदद से आप अपने फर्नीचर को बिल्कुल नए जैसा रख सकती हैं.

1. दरवाजे खिड़कियों से रखें दूर

अपने लकड़ी के फर्नीचर को दरवाजों, खिड़कियों से दूर रखें, ताकि ये बारिश के पानी या लीकेज के संपर्क में नहीं आ सकें.

2. पौलिशिंग है जरूरी

फर्नीचर की पालिश भी उसे मजबूत, चमकदार और टिकाऊ बनाती है, इसलिए हमेशा लैकर (रोगन) या वार्निश का एक कोट दो सालों में जरूर लगाएं, जिससे पोर या छोटे सुराख भर जाएं और ये ज्यादा दिन टिक पाए. छोटे फर्नीचर के लिए लैकर स्प्रे आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है, जो नजदीकी हार्डवेयर स्टोर में उपलब्ध होता है.

3. नमी का रखें खास ख्याल

फर्नीचर के लेग को फर्श की नमी के संपर्क में आने से रोकने के लिए लेग के नीचे वाशर लगाएं. घर को साफ रखें, जिससे घर में नमी का सही स्तर सुनिश्चित होगा, जो लकड़ी के फर्नीचर के अनुकूल है. एयर कंडीशनर भी मददगार साबित हो सकते हैं, क्योंकि ये घर में हवा को ताजा रख कर और घर को ठंडा रखकर नमी के स्तर में वृद्धि को रोकते हैं.

4. गीले कपड़ों का इस्तेमाल ना करें

लकड़ी के फर्नीचर को साफ करने के लिए गीले कपड़े का इस्तेमाल नहीं करें, बल्कि साफ, सूखे कपड़े का इस्तेमाल करें. मौनसून के दौरान लकड़ी का फर्नीचर नमी के चलते फूल जाता है, इससे ड्रौर खोलने और बंद करने में दिक्कत होती है. फर्नीचर पर आयलिंग या वैक्सिंग कर इसे रोका जा सकता है. बढ़िया फिनिश के लिए स्प्रे-औन-वैक्स आजमाएं.

5. मेकओवर करने से बचें

मानसून के दौरान घर की मरम्मत या सौंदर्यीकरण के काम को शुरू करने से बचें. इस समय नमी का स्तर ज्यादा होता है. ऐसे में पेंटिंग या पौलिशिंग बढ़िया परिणाम नहीं देंगे और इससे आपका लकड़ी का फर्नीचर खराब हो सकता है.

6. नेप्थलीन बाल का करें इस्तेमाल

कपूर या नेप्थलीन बाल नमी को अच्छे से अवशोषित कर लेते हैं. ये कपड़ों के साथ ही वार्डरोब को दीमक और अन्य कीड़े लगने से बचाते हैं. इस काम के लिए नीम की पत्तियों और लौंग का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. Furniture Care

Personal Hygiene: नजरअंदाज करने की भूल न करें, जानिए नुकसान

Personal Hygiene : पर्सनल हाइजीन का खयाल रखना बहुत जरूरी है ताकि हम स्वस्थ रह सकें. हाइजीन का ध्यान न रखना कई समस्याओं का कारण बन सकता है. हर जगह बैक्टीरिया और अन्य कीटाणु होते हैं, जो इन्फेक्शंस और कई रोगों का मुख्य कारण हैं. पर्सनल हाइजीन का ध्यान न रख कर हम इन बैक्टीरिया और कीटाणुओं के संपर्क में आ सकते हैं और बीमार पड़ सकते हैं. इसलिए हाइजीन रखने को अपनी आदत बना लें. आइए जानें कैसे :

रात को ब्रश कर के सोना

हम में से अधिकतर लोग रात में ब्रश कर के सोने में आलस्य करते हैं. रात में डिनर के बाद दांतों में खाना फंसा हुआ रह जाता है जिस से दांत में कीड़े लग सकते हैं. इसलिए सोने से पहले अपने दांत जरूर साफ करें.

बालों का भी खयाल रखें

हफ्ते में 2 बार बालों को धोने से आप यह न समझें कि आप बालों की हाइजीन का पूरा खयाल रख रहे हैं. यह सही है, लेकिन अगर बालों में रूसी है या जुएं हैं, तो इसे भी इग्नोर न करें. इस से सिर्फ बाल ही खराब नहीं होते बल्कि त्वचा में मुंहासे आदि की समस्याएं भी हो जाती हैं. इसलिए रूसी या जुएं हैं, तो सिर को अच्छी तरह क्लीन कर लें.

फिजिकल हाइजीन

सब से पहले आप को अपने शरीर को साफ करना चाहिए क्योंकि सारी समस्याएं आप के शरीर से ही शुरू होती हैं. इसे दूर करने के लिए रोजाना नहाएं. शरीर की गंदगी को साफ करने के लिए नहाना बहुत जरूरी है क्योंकि हमारी स्किन में चाहे कोई भी मौसम हो पसीना आता है. गरमियों में थोड़ा ज्यादा पसीना आता है. इसे दूर करने के लिए नहाना बहुत जरूरी है. इस से हमारी स्किन से डेड सेल्स भी दूर होते हैं.

मेकअप क्लीन कर के सोएं

पर्सनल हाइजीन मैंटेन करने के लिए रात को सोने से पहले मेकअप उतार कर सोना चाहिए. कई मेकअप में कैमिकल मिला होता है जिस से स्किन खराब हो जाती है. स्किन पर पपड़ी जम जाती है और दाने निकल आते हैं.

बौडी की बैड स्मैल को दूर करें

अगर आप के शरीर से अधिक दुर्गंध आती है. खासतौर पर अंडरआर्म्स में, तो अच्छे डिओड्रैंट का इस्तेमाल करें. इस के साथ ही अंडरआर्म्स हेयर को वैक्स या ट्रिम कराएं.

मैंस्ट्रुअल हाइजीन

बाथरूम इस्तेमाल करने के बाद प्राइवेट पार्ट्स को अच्छी तरह साफ जरूर करें. इस के साथ ही मैंस्ट्रुअल हाइजीन को भी कभी हलके में नहीं लेना चाहिए. वेजाइना के आसपास हार्श साबुन का इस्तेमाल न करें. कौटन पेंटीज का इस्तेमाल करें ताकि यह अधिक नमी न ऐब्जौर्ब करे. पैड, मैंस्ट्रुअल कप या टैंपोन, जिन का भी आप इस्तेमाल करते हैं, इन का इस्तेमाल करते हुए भी साफसफाई का ध्यान रखें.

धुले हुए साफ कपड़े पहनें

कपड़ों में बहुत से कीटाणु होते हैं और अगर इन्हें रोजाना न धोया जाए, तो समस्या का कारण बन सकते हैं, इसलिए कपड़े रोजाना बदलें.

बाथ लूफा के हाइजीन का भी खयाल रखें

क्या आप जानती हैं कि आप के लूफा में यीस्ट, बैक्टीरिया और मोल्ड्स आदि होते हैं, इसलिए अपने लूफा को भी 2-3 महीने में बदल लेना चाहिए. इस के अलावा लूफा को धो कर अच्छी तरह धूप में सुखाना चाहिए. आप हफ्ते में 1 बार उसे गरम पानी में धो कर सुखा लें और फिर इस्तेमाल करें. अगर आप लूफा न बदलने की गलती करती हैं, जो उस के कीटाणुओं से आप को स्किन इन्फैक्शन हो सकता है. वैसे ही अगर आप चेहरे को साफ करने के लिए वौश क्लौथ का इस्तेमाल करती हैं, तो उसे भी रोजाना बदलना चाहिए.

वर्कआउट के बाद जरूर नहाएं 

अगर आप को भी लगता है कि दिन में एक बार ही नहाना काफी होता है तो आप गलत नहीं हैं. लेकिन अगर आप शाम को जिम जाते हैं या कोई एरोबिक्स क्लास में जाते हैं, तो आ कर दोबारा नहाना बहुत जरूरी है. वर्कआउट के बाद शरीर से पसीना निकलता है, जिस से गंदगी चिपकी रहती है. अगर आप वर्कआउट के बाद नहाएंगी नहीं, तो पसीना सूख जाने पर सारी गंदगी शरीर पर ही रह जाएगी. इस से फंगल इन्फैक्शन सहित अन्य बीमारियां हो सकती हैं. आप जब भी वर्कआउट करें, उस के बाद नहाएं जरूर और तमाम बीमारियों को खुद से दूर रखें और स्वस्थ रहें.

टौयलेट में फोन ले कर जाना आप की आदत तो नहीं

अगर आप को भी अपने फोन के बिना एक पल चैन नहीं आता, तो यह आप की हैल्थ के लिए खतरे की घंटी है. आप टौयलेट जा कर सिर्फ हाथ धो सकते हैं फोन नहीं. इसलिए फोन के साथ बहुत से जर्म्स आप के फोन के जरीर शरीर में आ जाते हैं और बीमारियां फैलते हैं इसलिए फोन को टौयलेट में कभी यूज न करें.

वेजाइनल हाइजीन

वेजाइना को साफ रखने के लिए रोजाना शावर लें. साबुन को अच्छे से साफ करें. सुनिश्चित करें कि इंटिमेट कपड़े ज्यादा टाइट न हों. कौटन मैटीरियल को प्राथमिकता दें. मोशन के बाद अपने प्राइवेट पार्ट्स को अच्छे से साफ करें. इस से कीटाणु वेजाइना में नहीं जाएंगे.

नाखूनों की सफाई

हाथों की और पैरों की उंगलियों के नाखूनों को ट्रिम करते रहें और इन्हें अच्छी शेप में रखें. इस से आप को नाखूनों में होने वाले किसी भी इन्फैक्शन से बचने में मदद मिलेगी. साथ ही नाखनों को साबुन और हलके ब्रश से डेली साफ करें.

साफ अंडरगारमैंट्स पहनें

साफ और सूखे अंडरगारमैंट्स पहनना बहुत जरूरी है. गंदे या गीले अंडरगारमैंट्स पहनने से इन्फैक्शन का खतरा होता है. रोजाना अंडरगारमेंट्स बदलें और धो कर अच्छी तरह सुखाएं.

Film Maa: अंधविश्वास का ढकोसला, दर्शकों ने सिरे से नकारा

Film Maa: काला जादू और तंत्रमंत्र पर आधारित अजय देवगन की पिछली फिल्म ‘शैतान’ के बाद अजय अपने प्रोडक्शन तले एक बार फिर अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली फिल्म ‘मां’ ले कर प्रस्तुत हुए हैं, जिन्हें दर्शकों ने पूरी तरह नकार दिया. इस की खास वजह यह है कि आज के दर्शक कहानी के नाम पर अंधविश्वास पर आधारित बेकार की कहानी जिस में डर के बजाय ऐसी बातों का प्रचार हो जिस पर कोई विश्वास नहीं करता, को बिलकुल भी पसंद नहीं करते.

काजोल अभिनीत ‘मां’ फिल्म की चर्चा काफी समय से हो रही थी कि यह एक भूतिया फिल्म है, जिस में पौराणिक विषय का भी समावेश है. लिहाजा, कई लोगों ने सोचा था कि काजोल की यह फिल्म डराने वाली होगी जिस में पौराणिक विषय को भी घुसेड़ा गया होगा, लेकिन इस के विपरीत ‘मां’ फिल्म में न तो कुछ हौरर या डराने वाला था और न ही कहानी का कोई सिरपैर.

आदम जमाने की कहानी

फिल्म की कहानी एक मांबेटी की कहानी है, जो अपनी बेटी को बचाने के लिए हर मुसीबत से टकरा जाती है। कहानी की शुरुआत बाबा आदम के जमाने की तरह पुरानी कहानी से शुरू होती है. फिल्म ‘मां’ की कहानी भी 4 दशक पहले से शुरू होती है, जो बंगाल के एक काल्पनिक गांव चंद्रपुर से शुरू होती है, जहां पर लड़कियों की उस वक्त बलि दे दी जाती थी.

जब उन की पहली माहवारी होती है, काजोल यहां पर उस बेटी की मां बनी है जिस से उस की बुआ की बली के तार जुड़े हैं. काजोल किसी कारणवश चंद्रपुर जाने के लिए अपनी बेटी के साथ कार से निकलती है, तो रास्ते में उन की बेटी को पहले माहवारी की वजह से पेट में दर्द शुरू हो जाता है, जिस वजह से काजोल एक भूतिया होटल में पहुंच जाती है जबकि उन को पता है कि यह होटल भूतिया है इसलिए वह अपनी बेटी से उन से बिना पूछे कहीं भी बाहर निकलने के लिए मना करती हैं, लेकिन जैसा कि भूतिया फिल्मों में होता है, जो चीज के लिए मना किया जाता है भूतिया फिल्मों के कलाकार वही चीज बारबार करते हैं और मर भी जाते हैं.

न कहानी अच्छी न ऐक्टिंग

ऐसा ही कुछ इस फिल्म में भी दिखाया गया है। काजोल के मना करने के बावजूद भी बेटी होटल में तफरी करने निकल जाती है और बलि देने वाले राक्षस नुमा इंसान के कब्जे में आ जाती है। उस के बाद काजोल पौराणिक कथाओं का सहारा ले कर देवी शक्तियों के जरीए अपनी बेटी को बचाने का काम करती हैं और इस के साथ कई रहस्य के परदे भी खोल देती हैं.

विशाल फूरियां के निर्देशन में बनी इस फिल्म को देख कर दर्शकों ने सिर पीट लिया, क्योंकि उन की फिल्म की कहानी चूल्हे में चढ़ी दाल जैसी थी जो धीरेधीरे पक रही थी। ओटीटी के जमाने में 2 घंटे से ज्यादा समय के लिए बनी थकी हुई कहानी पर आधारित यह फिल्म डराने के बजाय बोरियत फैला रही थी.

ऐक्टिंग या टाइमपास

काजोल के अभिनय की अगर बात करें तो वह मां के रोल में फिट नहीं बैठती क्योंकि उन का खुद का चेहरा नटखट बच्चों जैसा है, इसलिए स्पैशली मांबेटी के सीन के दौरान उन के ऐक्सप्रेशन जबरदस्ती वाले लग रहे थे। इस फिल्म में काजोल को देख कर ऐसा लगता है कि वह अपनी कजिन रानी मुखर्जी के साथ कंपीटिशन की वजह से इक्कादुक्का फिल्मों में रानी मुखर्जी की तरह ही टाइमपास के लिए अभिनय कर रही हैं, ताकि इंडस्ट्री में अपनी पहचान बरकरार रख पाएं, वरना उन के अभिनय को देख कर ऐसा बिलकुल नहीं लग रहा कि वह अपने इस फिल्म में निभाए किरदार को ले कर वे जरा भी उत्साहित हैं.

इस फिल्म के जरीए हौरर फिल्म का प्रोपेगेंडा कर के दर्शकों को थिएटर तक खींचने की कोशिश की गई है. लेकिन फिल्म के किसी भी पहलू में दमखम न होने की वजह से और अंधविश्वास का ढकोसला दर्शकों को परोसने की वजह से फिल्म दर्शकों और आलोचकों द्वारा ज्यादा पसंद नहीं की जा रही है और बौक्स औफिस पर फ्लौप है. Film Maa

Ayushmann Khurana: औस्कर एकेडमी का इनविटेशन, क्या है यह उपलब्धि

Ayushmann Khurana: बौलीवुड स्टार आयुष्मान खुराना, जिन्होंने भारत में अपने विघटनकारी, प्रगतिशील सिनेमा के ब्रैंड के माध्यम से अपनी एक अलग पहचान बनाई है, को इस वर्ष औस्कर देने वाली संस्था द एकेडमी औफ मोशन पिक्चर आर्ट्स ऐंड साइंसेज में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है.

“हम इन प्रतिष्ठित कलाकारों, प्रौद्योगिकीविदों और पेशेवरों को अकादमी में शामिल करने के लिए रोमांचित हैं,” अकादमी के सीईओ बिल क्रेमर और अध्यक्ष जैनेट यांग ने कहा, “फिल्म निर्माण और व्यापक फिल्म उद्योग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के माध्यम से इन असाधारण प्रतिभाशाली व्यक्तियों ने हमारे वैश्विक फिल्म निर्माण समुदाय में अमिट योगदान दिया है.”

नामचीन हस्तियों में शामिल

मोशन पिक्चर्स और सिनेमा में अपने योगदान के लिए दुनियाभर के प्रतिष्ठित कलाकारों को आमंत्रित किया गया है. आयुष्मान उन पावर हाउस ऐक्टर्स और कलाकारों की सूची में शामिल हो गए हैं जिन में गिलियन ऐंडरसन, एरियाना ग्रांडे, कमल हासन, मिके मैडिसन, जेरेमी स्ट्रौंग, कीरन कल्किन जैसे नाम शामिल हैं.

आयुष्मान को हमेशा उन के पथप्रदर्शक सिनेमा के लिए वैश्विक स्तर पर सराहा गया है।=. एक ऐसा माध्यम जिस का उन्होंने चुपचाप राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के लिए उपयोग किया है.

10 प्रभावशाली लोगों में शुमार

उन्हें टाइम मैग्जीन द्वारा 2 बार सम्मानित किया जा चुका है– टाइम 100 इंपैक्ट 2023 के लिए और प्रतिष्ठित टाइम 100 सूची में, जिस में उन्हें दुनिया के 100 सब से प्रभावशाली लोगों में शामिल किया गया था.

आयुष्मान यूनिसेफ इंडिया ऐंबेसडर भी हैं, जो बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए लगातार काम कर रहे हैं.

आयुष्मान की पसंदीदा मैग्जीन में सालों से प्रकाशित मैग्जीन *गृहशोभा* भी शामिल है, जिस का नाम उन की कई फिल्मों में लिया गया है. Ayushmann Khurana

Social Story: एक सच यह भी- किस वजह से सुमि डिप्रैशन में चली गई?

Social Story: आदतन सुबह की चाय पीते हुए मैं ने फेसबुक के अपडेट्स देखने के लिए फोन औन किया तो सब से पहले सुमि की पोस्ट दिखी. उस ने सिर्फ इतना लिखा था कि आज मेरा जन्मदिन है. मुझे बड़ा अजीब लगा कि यह बात ऐसे लिख कर खुद कौन बताता है पर मन में कई सवाल उठे जैसे क्या यह किसी की लाइफ में बढ़ता अकेलापन नहीं है कि वह अब आभासी दुनिया के लोगों से अपना हर सुखदुख बांटने के लिए विवश है? इंसान के आसपास उस के मन की बातें सुनने वाले लोग कम होते जा रहे हैं. जो भी हैं आसपास, वे सब अपनेअपने फोन में दूर की दुनिया के लोगों से जुड़े रहने में खुशी तलाश रहे हैं, अपने सामने बैठे व्यक्ति को इग्नोर कर, उस की बातों को अनसुना कर.

सुमि से मिले मुझे भी एक अरसा हो चुका था. कोरोना के समय ने लोगों को जो एकदूसरे  से दूर किया, लोगों को अकेले रहने की आदत ही हो गई है. इस समय लोगों ने अपना खाली समय सोशल मीडिया पर बिताया, पर अब लाइफ नौर्मल होने पर भी हम वहीं सोशल मीडिया पर ही अटके रह गए. सुमि से मिलना आसान नहीं लगता. वह मुंबई के एक कोने में रहती है, मैं दूसरे कोने में. पर आज मैं ने उसे सरप्राइज देने का मन बना लिया था. मैं ने उसे तुरंत फोन मिलाया, बर्थडे सौंग गाते हुए विश किया. वह

हंस पड़ी.

मैं ने कहा, ‘‘अगर आज फैमिली के साथ बिजी है तो कोई बात नहीं पर अगर फ्री है तो चल बीच में किसी अच्छी जगह लंच करते हैं.’’

सुमि ने कहा, ‘‘फैमिली के साथ तो डिनर होगा, दिन में फ्री ही हूं, पलैडियम मिलते हैं.’’

पलैडियम मौल उस के और मेरे घर के

रास्ते में पड़ता है. हम पहले भी वहीं मिलते रहे हैं. दोनों को आनाजाना फिर लंबा नहीं पड़ता. आज मु?ो बारबार सुमि का ध्यान आ रहा था. ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब वह 3-4 पोस्ट्स न डालती हो. कभी कुछ खाया तो खाने की पोस्ट, कभी अपनी, कभी कोई और. मैं जितने लोगों को जानती हूं, सुमि सब से ज्यादा सोशल मीडिया पर ऐक्टिव है. एक बेटा मलय है जो जौब करता है, उस के पति संजय से कई बार मिल चुकी हूं. जब भी मिले, सज्जन, सभ्य लगे.

‘पंजाब ग्रिल’ के बाहर खड़ी एक मौडर्न सी स्टाइलिश वन पीस ड्रैस पहने सुमि बहुत सुंदर तरीके से तैयार थी. मैं ने उसे गले लगाते हुए विश करते हुए उस का गिफ्ट उसे दिया और कहा भी, ‘‘बहुत अच्छी लग रही हो. लग रहा है आज तुम्हारा जन्मदिन है.’’

वह खुश दिखी. हम एक कोने में बैठ गए, और्डर देते रहे, खातेपीते रहे. मैं ने फिर उस से वह सवाल पूछ ही लिया जो आजकल मुझे परेशान करता है, ‘‘सुमि, सोशल मीडिया पर तुम कैसे अचानक बहुत ज्यादा ऐक्टिव हो गई हो पर अच्छा हुआ, आज तुम ने फेसबुक पर अपना बर्थडे लिख कर बता दिया वरना मैं सचमुच भूल गई थी. तुम वैसे भी सबकुछ तो वहां बता ही देती है.’’

‘‘हां, दीया जानती हूं, ऐसे अब कौन याद रखता है. इसीलिए तो लिखा और देखो न, फायदा भी हुआ. आज कितने टाइम बाद हम 2 फ्रैंड्स बैठ कर ऐसे बातें कर रही हैं. तुम्हें याद नहीं था तो अगर मैं पोस्ट न करती तो क्या मैं आज इस खास दिन दोस्त से मिल पाती.’’

सुमि की बात में दम था. वह मेरी 10 साल पुरानी दोस्त है. हम पहले एक ही

सोसाइटी में सालों साथ रहे हैं फिर वह कहीं और शिफ्ट हो गई तो मिलनाजुलना कम होता गया और अब तो फोन भी कभीकभी ही होते. मैं चुप रही.

वह एक ठंडी सांस ले कर बोली, ‘‘यार, लाइफ जैसी हो गई है वैसी तो नहीं सोची थी.’’

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘तुम्हें नहीं लगता कि सब पता नहीं क्यों अपने में सिमटते जा रहे. कोई किसी से मिलता नहीं, बातें नहीं करता, बातें सुनता भी नहीं.’’

‘‘हां, सुमि, आजकल सब बहुत बिजी हैं.’’

‘‘पर किस चीज में? कमाखा तो पहले भी रहे थे. अब कहां इतने बिजी हो गए?’’ कहतेकहते उस की आवाज भर्रा गई.

इस पर मुझे चौंकना ही था. अत: मैं ने पूछा, ‘‘सुमि, क्या हुआ है? सब ठीक तो है?’’

‘‘दीया, मेरा डिप्रैशन, ऐंग्जौइटी का ट्रीटमैंट चल रहा है.’’

‘‘क्या?’’ खाना बीच में रोक कर मैं उस का चेहरा देखने लगी कि यह इतनी हंसमुख है. इसे डिप्रैशन कैसे हो सकता है. मुझे बहुत दुख हुआ. पूछा, ‘‘सुमि, क्या हुआ है?’’

‘‘पता नहीं दीया, अचानक तबीयत खराब रहने लगी, पता नहीं क्यों बहुत अकेलापन लगने लगा. संजय और मलय अपनी दुनिया में मस्त. जब छोटे शहर से मुंबई आई थी, आंखों में एक अलग ही सपने थे. अब तो सब बुझ गए. कभी सोचती हूं कि अगर वर्किंग होती तो क्या मेरी लाइफ में कुछ तो लोग होते, एक सोशल सर्किल होता, कुछ तो होता.’’

‘‘नहीं, सुमि ऐसा नहीं है. तब और बातों का स्ट्रैस होता. तब और जिम्मेदारियां होती.’’

‘‘पर तब यह अकेलापन तो नहीं होता न?’’

‘‘इतने लोग अकेलेपन के शिकार हैं, सब के सब घर ही नहीं बैठे हैं, वर्किंग भी हैं. यह तुम्हारी परेशानी एक तुम्हारी ही नहीं है.’’

‘‘थक कर सोशल मीडिया पर कभी कोई पोस्ट तो कभी कोई पोस्ट डालती रहती हूं. लोग वहां तुरंत जुड़ जाते हैं. थोड़ा हंसीमजाक चलता है तो अच्छा लगता है. कम से कम एक स्माइल तो आती है फनी पोस्ट्स पर वरना तो कभीकभी लगता है कि मुसकराए हुए भी कितना टाइम बीत गया. तू बता, विराज और वंशा कैसे हैं?’’

‘‘विराज का तो वही औफिस, टूर का रूटीन. वंशा आजकल हफ्ते में 3 दिन वर्क फ्रौम होम करती है, पूरा दिन अपने रूम में. उसे भी काम का बहुत स्ट्रैस रहता है. कभीकभी तो सिर्फ वाशरूम और कुछ खाने के लिए अपने रूम से निकलती है. वीकैंड आराम करती है या अपने दोस्तों के साथ थोड़ा बाहर जाती है.’’

‘‘तुम बोर नहीं होती? खाली समय क्या करती हो?’’

‘‘बस तुम्हारी तरह ही ऐसे ही बोर होने

लगी थी तो खुद भी कुछ क्लासेज जौइन कर

ली हैं और घर पर छोटे बच्चों की डांस क्लासेज भी लेने लगी हूं. क्या करें यार कहीं तो दिल लगाना है न.’’

‘‘अरे वाह, कत्थक सिखा रही है? तू तो ऐक्सपर्ट है न डांस में? पर खुद कौनसी क्लास जा रही है?’’

‘‘गिटार बजाना सीख रही हूं. बहुत दिनों से मन था कि गिटार सीखूं. वहां एक अच्छा ग्रुप भी बन गया है. अब यह जमाना हमारी मां, नानी का तो है नहीं कि हमेशा पासपड़ोस में कोई गपशप वाला हाजिर ही हो. अब तो अकेलेपन से निबटने के लिए रास्ते ढूंढ़ने हैं. कई बार सोचती हूं कि मां को तो आज भी सोशल मीडिया की जरूरत नहीं है. कई बार उन्हें कहती हूं कि आओ मां, आप को फोन पर ही सिखा देती हूं तो कहती हैं कि मत सिखाओ, नहीं तो जब आओगी, मैं भी इस में सिर दिए बैठी मिलूंगी. तुम्हारी बातें जो अभी बैठ कर सुनती हूं, फिर किसे सुनाओगी?’’

सुमि यह बात सुन कर बहुत प्यारी हंसी हंसी. मैं ने फिर कहा, ‘‘वैसे यार, एक बात तो है कि जब भी तुम कोई पोस्ट डालती हो, बड़े कमैंट्स आ जाते हैं. मैं सब पढ़ती हूं और हंसती भी हूं. उस दिन तो तुम्हारी रैड ड्रैस पर किसी ने कविता ही लिख दी थी.’’

‘‘हां, नई ड्रैस थी, पहन कर जब संजय को दिखाने गई तो फोन में ही मुंह दिए बैठे रहे. मैं ने कहा कि कैसी है ड्रैसेज तो बोले कि पहले भी तो देखा है, अच्छी ही है.’’

हम दोनों इस बात पर खुल कर हंसीं. फिर उस ने कहा, ‘‘अब हंस रही हूं इस बात पर, उस दिन तो गुस्सा आया था, फिर पोस्ट डाली तो लोगों के हंसीमजाक पर सचमुच हंसने लगी थी. भले ही फेसबुक को हम फेकबुक कह लें, कुछ पलों का अकेलापन तो दूर हो ही जाता है.’’

‘‘रिश्तेदारों से मिलनाजुलना होता रहता है?’’

‘‘नहीं यार, कभी किसी को मुंबई घूमने आना होता है और ठिकाना चाहिए होता है तो घर आ जाता है. हम से मिलने, हमारे साथ रहने के लिए थोड़े ही कोई आता है. जो हम से अच्छी स्थिति में हैं, वे आ कर अपने घमंड में डूबे रहते हैं, जो हम से कम हैं वे ईर्ष्या में जलते रहते हैं. मातापिता, सासससुर से ही मायके ससुराल होते हैं. वे सब तो अब रहे नहीं. सब रिश्तेदारी बस खत्म ही समझ. पिछले महीने एक रिश्तेदार घर आए थे. हमारा घर सी फेसिंग है ही. तुम्हें तो पता ही है, बस सारा दिन मुझ से अपने फोटोज खिंचवाते रहे और पोस्ट करते रहे. बैठ कर बात करने की फुरसत ही नहीं थी उन्हें. बस फोन में लगे रहे.’’

‘‘पर ऐसे बीमार हो कर नहीं चलेगा, सुमि. डिप्रैशन की नौबत आनी नहीं चाहिए. मुझे बहुत दुख हुआ है. कभीकभी के लिए सोशल मीडिया पर टाइम पास करने में कोई बुराई नहीं, पर कुछ और भी करनेसीखने में मन लगा लो तो लाइफ से शिकायतें भी कम हो जाएंगी और जीना थोड़ा आसान हो जाएगा. देख सुमि, अब टाइम ही ऐसा है कि किसी की किसी को जरूरत नहीं. हर इंसान अपने में व्यस्त है, अकेलापन बढ़ता जा रहा है, पर जीवन बीमारियों की भेंट थोड़े ही चढ़ा देना है. थोड़ा हैल्थ पर ध्यान दो और किसी काम में खुद को व्यस्त कर के देखना. अच्छा लगेगा. जमाना और लोग अब बदलने वाले नहीं. यह सब अब ऐसा ही रहेगा.’’

सुमि ने मेरे हाथ पर हाथ रख दिया, थोड़ा भावुक हुई, कहा, ‘‘ऐसे ही जल्दीजल्दी मिलते रहा करें?’’

‘‘क्यों नहीं, जब तेरा मन हो, बताना, मिलेंगे. मैं तो हमेशा ही दोस्तों के साथ बैठ कर बातें करने के लिए तैयार रहती हूं.’’

हम खाना खा चुके थे. मैं बिल देने लगी तो उस ने नहीं देने दिया, कहा, ‘‘यह मेरे जन्मदिन की पार्टी है.’’

हम ने फिर गले मिल कर अपनेअपने रास्ते की कैब पकड़ ली. हम दोनों आज करीब

4 घंटे साथ थीं और मैं इस बात पर हैरान थी कि एक बार व्हाट्सऐप के अपने फैमिली गु्रप पर ‘रीच्ड’ का मैसेज डाल कर हम दोनों ने ही एक बार भी अपने फोन की तरफ आज देखा भी

नहीं था.

मैं ने सुमि को छेड़ने के लिए एक मैसेज किया, ‘‘सुमि, हम फोटो लेना भूल गए, कोई फोटो नहीं लिया.’’

रोने वाली इमोजी के साथ उस ने जवाब दिया, ‘‘मैं सचमुच अपनी लाइफ में कुछ पल ऐसे चाहती हूं कि कुछ देर फोन और सोशल मीडिया भूली रहूं, पर ऐसे पल मिलते ही नहीं.’’

मैं ने उसे बस एक किस की इमोजी भेज. फिर कुछ देर बाद उस का मैसेज आया, ‘‘सिंगिंग क्लास जौइन करूंगी, सोच लिया है, गूगल कर रही हूं, अब कुछ गाया जाए.’’

मुझे खुशी हुई. मैं ने हार्ट की इमोजी भेज दी. Social Story

Hindi Family Story: वर्किंग हसबैंड- दीपा ने सहारा क्यों चुना?

Hindi Family Story: दीपा अपने औफिस की सीढि़यां चढ़ते हुए सोच रही थी, एक दिन मैं भी इस औफिस की बौस बनूंगी. तभी मोबाइल पर आशीष का फोन आ गया, ‘‘तुम कानन की नोटबुक कहां रख कर गई हो?’’

दीपा झंझला कर बोली, ‘‘यार ढूंढ़ लो,

अब औफिस से भी मैं घर के काम मौनिटर करूं?’’ आशीष ने झेंपी हुई हंसी के साथ मोबाइल काट दिया.

दीपा 26 वर्ष की बेहद महत्त्वाकांक्षी और आकर्षक नवयुवती थी. उस की उड़ान बेहद ऊंची थी, पर उस की शादी एक ऐसे इंसान से हो गई थी जो बेहद कमजोर था. मगर इस से दीपा की उड़ान पर कोई फर्क नहीं पड़ा था.

दूसरी बेटी के जन्म के बाद बढ़ते हुए खर्च को मद्दे नजर दीपा ने बड़ी बड़ी कंपनियों में अप्लाई करना शुरू कर दिया था और जल्द ही उसे कामयाबी भी मिल गई थी. आज उसी बड़ी कंपनी में दीपा का पहला दिन था.

दीपा ने अपने वर्क स्टेशन पर बैग रखा और इधरउधर जायजा लिया. उस ने देखा 2 बेहद ही मामूली शक्लसूरत की लड़कियां और 3 उजड़ से युवक उस की टीम में थे. दीपा को लगा इन देहातियों और मामूली शक्लसूरतों के बीच उस का काम आसान हो गया है.

अगले दिन पूरी टीम की टीम मैनेजर के साथ मीटिंग थी. दीपा ने घर आ कर शाम की चाय पी और फिर कमरा बंद कर के प्रेजैंटेशन में लग गई थी. दीपा को अच्छे से मालूम था कि कौन सा दांव कब खेलना है.

शाम के 7 बजे जब आशीष आया तो दोनों बच्चियों को नानी के साथ देख कर

बोला, ‘‘अरे, मम्मी कहां है तुम्हारी?’’

दीपा की मम्मी बोली, ‘‘अरे, मेरी लड़की तो दिनरात इस घर के लिए मेहनत कर रही है.

जो काम तुम्हें करने चाहिए थे, मेरे बेटी कर

रही है.’’

आशीष चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाया. वह जिंदगी को ऐसे ही जीने का आदि था.

आशीष को मेहनत करने से, रिस्क लेने से डर लगता था, एक ही लीक पर चलने का नाम

ही आशीष के लिए जिंदगी है. मगर दीपा की सोच बहुत अलग थी. बहरहाल, आशीष ने कभी दीपा को किसी भी फैसले पर सवाल नहीं किया. वह अलग बात है कि आशीष के इस रवैए के कारण दीपा और आशीष के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी.

अगले दिन दफ्तर में हरकोई दीपा को ही देख रहा था. काले रंग के ट्यूब टौप और लाल रंग की मिनी स्कर्ट में वह कहर बरपा रही थी. प्रेजैंटेशन के बाद टीम का प्रोजैक्ट मैनेजर अजय दीपा का मुरीद हो गया.

अजय ने दीपा के अंदर वही कामयाबी की भूख महसूस करी जो उस के अंदर थी. उसे समझ आ गया कि दीपा के साथ वह इस कंपनी को ऊंचाइयों पर ले जा सकता है.

अगले दिन अजय ने दीपा को अपने कैबिन में बुलाया और उस से बातचीत करी. दीपा के परिवार के बारे में जान कर अजय का दिल बुझ सा गया.

अजय ने गला खंखारते हुए कहा, ‘‘दीपा, तुम्हें मैं अपने प्रोजैक्ट में टीम लीड बनाने की सोच रहा था, मगर शायद छोटे बच्चों के साथ तुम्हें दिक्कत होगी.’’

दीपा पलकें झपकाते हुए बोली, ‘‘सर, मेरी प्रोफैशनल और पर्सनल लाइफ अलग हैं. आप एक बार मौका दीजिए. मैं आप को निराश नहीं करूंगी.’’

दीपा की मेहनत, लगन, कामयाबी की भूख और उस का आकर्षक व्यक्तित्व सभी कुछ उस की फेवर में था. धीरेधीरे दीपा अजय के लिए जरूरी हो गई.

1 ही साल के भीतर दीपा की सैलरी दोगुनी हो गई. उस ने एक अच्छी सोसायटी में फ्लैट बुक करा लिया और एक सैकंड हैंड छोटी कार भी अपने आनेजाने के लिए खरीद ली.

दीपा सुबह 10 बजे से रात के

10 बजे तक औफिस में बिताती थी. अजय औफिस में दीपा की छोटीछोटी जरूरतों का बहुत ध्यान रखता था. उसे दीपा के साथ समय गुजारना बेहद पसंद था. वहीं दीपा को भी औफिस में घर जैसा लगने लगा था.

दीपा जब तक घर आती तब तक आशीष बच्चों को खाना खिला कर सुला देता था और खुद भी

आधी नींद में ही रहता था. दीपा का कितना मन करता था कि वह आशीष को दफ्तर की बातें बताए, मगर आशीष सुनीअनसुनी कर देता था.आशीष की दुनिया ही अलग थी. वह

उन मर्दों में से नहीं था जो बीवी की तरक्की से जलता बल्कि आशीष ने पूरी जिम्मेदारी दीपा

के कंधों पर डाल कर बैक सीट ले ली थी.

दफ्तर के बाद आशीष कुछ समय बच्चों के साथ बीतता और बाकी पंडेपुजारियों और भजन मंडली के साथ.

परिवार और रिश्तेदारों में दीपा और

आशीष एक ऐसे जोड़े के रूप में मशहूर थे जो औरों से जुदा थे. पूरी रिश्तेदारी में इस बात का डंका बजता था कि आशीष ने अपनी पत्नी दीपा के कैरियर के कारण खुद अपना कैरियर बलिदान कर दिया है. मगर असलियत क्या है यह बस दीपा ही जानती थी.

ऐसे में धीरेधीरे ही सही दीपा का झुकाव अजय की तरफ बढ़ता जा रहा था. जहां पूजापाठ, व्रत, कीर्तनों और पत्नी की बेरुखी के कारण आशीष पतिपत्नी के रिश्ते से विमुख होता जा रहा था वहीं दीपा अब अपनी शारीरिक जरूरतों के लिए भी अजय के ऊपर आश्रित थी.

अजय दीपा के लिए वर्किंग हसबैंड बन गया था. उस के सपनों का साथी. वे सपने जिन का साथी उस का अपना हसबैंड कभी नहीं बन पाया था. समाज में आशीष दीपा के पति के

रूप में जाना जाता था. रात के जिस भी पहर दीपा घर आती थी आशीष उस का खाना लगा कर देता, दीपा को बच्चों की प्रोग्रैस रिपोर्ट बताता और फिर रात के पूजापाठ में लग जाता. बस दीपा और आशीष का रिश्ता इन्हीं बैसाखियों पर घिसट रहा था.

आशीष एक छोटी सी कंपनी में छोटी सी नौकरी में था. आगे बढ़ने की, तरक्की करने की आशीष को कोई चाह नहीं थी. ऐसा भी कह सकते हैं वह अपनी कमजोरी को पूजापाठ के पाखंड के परदे के पीछे ढक लेता था.

जब भी दीपा आशीष को नौकरी बदलने को कहती वह बात को अपने ग्रहों की बुरी

दशा पर डाल देता था. उस का यह ढुलमुल रवैया दीपा को अजय के और करीब कर देता था.

दीपा जहां दफ्तर में अजय के साथ

जितनी पावरफुल महसूस करती थी वहीं घर आ कर वह आशीष के साथ बेहद लाचार महसूस करती थी.

दीपा की बड़ी बेटी आरना अब  4 साल की हो रही थी. मगर अब तक भी आराना ठीक से न तो चल पा रही थी और न ही बोल पा रही. दीपा जब भी आशीष से इस बारे में बात करती उस का एक ही जवाब होता, ‘‘मैं पंडितजी से बात कर रहा हूं. तुम क्व5 हजार दे दो. मैं आरना के पाठ करवा दूंगा.’’ दीपा अब तक 3 बार पाठ के लिए पैसे खर्च कर चुकी थी.

एक बार ऐसे ही जब दीपा ने औफिस में अजय से इस बात का जिक्र किया तो उस ने दीपा से रुखाई से कहा, ‘‘पढ़लिख कर क्यों जाहिलों जैसी बात कर रही हो.’’

‘‘आज शाम बेटी को आशीर्वाद हौस्पिटल ले कर आ जाना, मैं डाक्टर को दिखा दूंगा.’’

शाम को दीपा व आशीष नियत समय पर आरना को लेकर पहुंच गए. अजय ने पहले से ही डाक्टर से अपौइंटमैंट ले रखा था. डाक्टर से बातचीत में भी अजय ही आगे रहा. दीपा को ऐसा लग रहा था मानो आरना अजय की बेटी हो.

आशीष की पैनी नजरें यह भांप गई थीं कि अजय दीपा का बौस भी से कुछ ज्यादा ही है, मगर उसे लगा जब फ्री में बिना कुछ करे काम हो रहा है तो क्या फर्क पड़ता हैं.

कार में बैठते ही आशीष बड़ी बेशर्मी से बोला, ‘‘दीपा देखा पाठ का कमाल, अजयजी जैसा फरिश्ता भेज दिया भगवान ने हमारी आरना के लिए.’’

अजय मन ही मन सोच रहा था कि दीपा का पति तो उस की सोच से भी अधिक घटिया है.

अगले दिन औफिस में दीपा अजय से डाक्टर की फीस के बारे में पूछ रही थी.

अजय दीपा का हाथ हाथों में लेते हुए बोला, ‘‘आरना मेरी बेटी ही है, मैं यह अपनी खुशी के लिए कर रहा हूं. आरना को पूजा की नहीं डाक्टर की जरूरत हैं. डाक्टर और फिजियोथेरैपी की मदद से देखना आरना जल्द ही ठीक हो जाएगी.’’

आरना की कंडीशन के कारण अब अजय का दीपा के घर में आनाजाना बढ़ गया था. अजय अब अकसर डिनर दीपा के यहां ही करता.

रिश्तेदारों में जब इस बात को ले कर कानाफूसी होने लगी तो आशीष बोला, ‘‘मैं  20वीं शताब्दी का पति नहीं हूं, जब साथ काम करते हैं तो साथ उठनाबैठना भी होगा.’’

आशीष ने अपनी आंखों पर दौलत की पट्टी बांध ली थी. वह मन ही मन जानता था कि अजय और दीपा का रिश्ता दोस्ती से कहीं बढ़ कर है मगर अजय के जीवन में रहने से आशीष के परिवार की जिंदगी में जो सहूलितें बढ़ गई थीं वे आशीष की आंखों से छिपी नहीं थीं.

मगर जब अजय की पत्नी संस्कृति को

दीपा के बारे में पता चला तो अजय ने बड़ी सफाई से दीपा और अपने रिश्ते को प्रोफैशनल करार कर दिया.

उस दिन के बाद से अजय ने दीपा के घर आनाजाना कम कर दिया. दीपा को मालूम था ये सब अजय अपने परिवार के कारण कर रहा है. इसलिए दीपा भी अजय से उखड़ीउखड़ी रहने लगी.

अजय एक दिन दीपा से बोला, ‘‘तुम आजकल आरना को डाक्टर के पास ले कर क्यों नहीं जा रही हो? डाक्टर का फोन आया था.’’

दीपा बोली, ‘‘कब जाऊं मैं, रात के 8 बजे तो यहीं से वापस जाती हूं.’’

अजय बोला, ‘‘तुम्हारे और मेरे बीच क्या बौस इंप्लोई वाला रिश्ता है?’’

दीपा रूखी आवाज में बोली, ‘‘हमारे बीच  प्रोफैशनल रिश्ता ही तो है तो फिर मैं कैसे आप से कुछ उम्मीद रख सकती हूं?’’

अजय हंसते हुए बोला, ‘‘अरे मैं आरना को अपनी बेटी ही मानता हूं, तुम एक बार कहो तो सही मैं खुद उसे डाक्टर के पास ले कर जाऊंगा. मुझे मालूम है तुम मु?ा से नाराज हो. मगर दीपा मैं ने तुम से कभी कोई वादा नहीं किया था. मैं संस्कृति को चाह कर भी नहीं छोड़ सकता हूं. उस ने मेरा साथ तब दिया था जब मेरी जिंदगी मैं कोई नहीं था. उस के परिवार ने मुझे हर तरह से सपोर्ट किया है. प्यार जैसा कुछ नहीं है मगर फिर भी मैं उसे छोड़ नहीं सकता हूं. तुम क्या आशीष से अलग हो सकती हो?’’

दीपा थके स्वर में बोली, ‘‘मैं यह दोहरी जिंदगी जीते हुए थक गई हूं. मैं आशीष से अलग होने को तैयार हूं तुम बताओ, तुम तैयार हो हमारे रिश्ते को कानूनी रूप से अपनाने को?’’

अजय ने डूबते स्वर में कहा, ‘‘मैं तुम्हारा वर्किंग हसबैंड तो हो सकता हूं दीपा मगर लीगल हसबैंड नहीं.’’

दीपा ने कुछ नहीं कहा मगर पूरा दिन वह इसी उधेड़बुन में रही कि क्या ऐसी जिंदगी जीना जायज है जैसी वह जी रही है?

पूरे 1 माह तक दीपा ने अजय से दूरी बना कर रखी. अपनी शारीरिक इच्छाओं को उस ने काम की बलि चढ़ा दिया. मगर अजय ने दीपा के इस फैसले का सम्मान किया था. उस ने कभी इस बाबत दीपा से कोई सवाल नहीं किया. दीपा ने इस दौरान आशीष से दूरियां खत्म करने का भी भरसक प्रयास किया. मगर आशीष पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

पहले जो काम दीपा अजय की मदद से कर लेती थी अब उसे अकेले करने पड़ रहे थे. मगर एक रात अचानक दीपा की छोटी बेटी के पेट में बहुत तेज दर्द हुआ. दीपा अकेले ही उसे हौस्पिटल ले कर भागी क्योंकि आशीष अपनी भक्त मंडली के साथ किसी दूरदराज इलाके में गया हुआ था.

हौस्पिटल में जा कर दीपा 1 घंटे तक इधर से उधर डाक्टर के चक्कर लगाती रही मगर जब कोई और राह नहीं सु?ाई दी तो उस ने झिझकते हुए रात के 1 बजे अजय को फोन किया. उसे समझ नहीं आ रहा था कि अजय इतनी रात गए कौल उठाएगा भी या नहीं.

मगर अजय ने न केवल कौल उठाई वह 20 मिनट में दीपा के साथ था. अजय ने डाक्टर से बातचीत करी तो पता लगा कि बच्ची की इमरजैंसी में सर्जरी करनी पड़ेगी क्योंकि उसे इंटेस्टाइनल ओब्सट्रक्शन हो गया है. 1 लाख रुपेय का खर्च था. अजय ने बिना दीपा से पूछे सर्जरी के लिए हां कर दी.

दीपा बस चुपचाप सब सुन रही थी. उस ने अजय से बस इतना कहा, ‘‘मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं.’’

बेटी की सर्जरी हो गई थी. अजय ने आशीष को भी फोन किया था मगर उस ने खीसें निपोरते हुए कहा, ‘‘मैं अपनी बेटी के लिए यहां से प्रार्थना कर रहा हूं, भगवान सब भला करेंगे.’’

जब दीपा की बेटी वापस घर आ गई तो अजय ने दीपा के लिए 1 माह तक वर्क फ्रौम होम की इजाजत भी दे दी.

दीपा को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करती अगर अजय उस की जिंदगी में नहीं होता. दीपा को समझ आ गया था कि उस की जिंदगी में लीगल हसबैंड से अधिक वर्किंग हसबैंड की जरूरत है. दीपा ने सहीगलत की परिभाषा को गृहस्थी के हवनकुंड में स्वाहा कर दिया.

दीपा ने समझता कर लिया कि अपने बच्चों और अपने भविष्य के लिए अजय जैसे वर्किंग हसबैंड का साथ बहुत जरूरी है. अत: धीरेधीरे फिर से अजय और दीपा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

मगर इस बार अजय ने भी दीपा के घर की देहरी नहीं लाघी. और न ही दीपा ने अजय से कोई उम्मीद बांधी. दोनों ने ही शायद अपने इस वर्किंग रिश्ते को स्वीकार कर लिया. 1 माह बाद जब दीपा औफिस पहुंची तो अजय मुसकराते हुए बोला, ‘‘बहुत दिनों बाद  में जिंदगी वापस आई है.’’

दीपा ने अजय को कौफी का मग पकड़ते हुए कहा, ‘‘चलो अब काम पर जुटते हैं वर्किंग हसबैंड.’’

‘‘मुझे तुम्हारे साथ मिल कर इस कंपनी को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है.’’ Hindi Family Story

 

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