बॉलीवुड स्टार सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड मामले में सीबीआई की जांच लगातार तेज होती जा रही है. वहीं इसके आरोपों का रिया चक्रवर्ती लगातार सामना कर रही हैं, जो कि अब गिरफ्तार हो चुकी हैं. हालांकि ड्रग्स कनेक्शन सामने आने के बाद रिया को एनसीबी ने बीते दिन गिरफ्तार किया था. वहीं रिया के जेल जाने के बाद जहां सुशांत की फैमिली, सेलेब्स और फैंस खुश हैं तो वहीं कुछ सेलेब्स रिया चक्रवर्ती के सपोर्ट में उतर आया है. आइए आपको बताते हैं क्या है मामला…
रिया को इस तरह सपोर्ट कर रहे हैं सितारे
बॉलीवुड सितारे एक अनोखे अंदाज में सोशलमीडिया पर रिया चक्रवर्ती को अपना समर्थन दे रहे हैं. सेलेब्स ने जेल जाने के दिन रिया चक्रवर्ती की पहनी हुई टीशर्ट की लाइन्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं, जिस पर लिखा था कि, ‘रोज ऑर रेड, वॉयलेट्स और ब्लू… चलो हम और तुम मिलकर पितृसत्ता को पूरी तरह से खत्म कर दें.’
True. that’s why this has become synonymous with the Sushant case.TX @deepadoc . I was wondering why are all suddenly supporting patriarchy. I’ve been brought up with equal opportunities, but many in our country aren’t. I’ve always worked for the empowerment of women hence. https://t.co/MpE0qDwGNd
रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी का विरोध जता रहे बौलीवुड सितारे की इस लिस्ट में सोनम कपूर, करीना कपूर, श्वेता बच्चन, विद्या बालन, अनुराग कश्यप, पुल्कित सम्राट, फरहान अख्तर, दिया मिर्जा और नेहा धूपिया जैसे सितारों का नाम शामिल है.
रिया चक्रवर्ती की टीशर्ट की तस्वीर सुशांत सिंह राजपूत की बहन श्वेता सिंह कीर्ति ने भी शेयर की है. हालांकि लाइन में थोड़ा सा बदलाव करते हुए श्वेता सिंह कीर्ति की पोस्ट में लिखा है कि, ‘रोज ऑर रेड, वॉयलेट्स और ब्लू… लेट्स फाइट फॉर द राइट मी एंड यू….’ वहीं इस फोटो को शेयर करते हुए श्वेता सिंह कीर्ति ने लिखा है कि एक दिन सुशांत सिंह राजपूत का इंसाफ जरुर मिलेगा.
बता दें, ड्रग्स मामले में रिया चक्रवर्ती ने कुछ बौलीवुड के दिग्गजों के नाम भी लिए हैं, जिनमें अभी पूछताछ होगी. हालांकि सुशांत मामले को लेकर रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी को लेकर फैंस काफी इंतजाम कर रहे हैं. वहीं इसी मामले के चलते बौलीवुड दो हिस्सो में बंट चुका है.
स्टार प्लस के पौपुलर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ की करेंट ट्रैक इन दिनों फैंस को खास पसंद नही आ रहा है, जिसका असर शो की टीआरपी पर देखने को मिल रहा है. वहीं इसी के चलते मेकर्स ने नया ट्रैक लाने का फैसला किया है. दरअसल, हाल ही में ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ के मेकर्स ने एक नया प्रोमो रिलीज किया है, जिसमें नए ट्विस्ट का अंदाजा लगाया जा सकता है. आइए आपको बताते हैं क्या है प्रोमों में खास…
नायरा-कार्तिक की जिंदगी में आएगी खुशी
शिवांगी जोशी और मोहसिन खान स्टारर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ (Yeh Rishta Kya Kehlata Hai) का नया प्रोमो सामने आ चुका है. नए प्रोमो के हिसाब से आने वाले दिनों गोयनका हाउस में एक बार फिर से किलकारियां गूंजने वाली है. वहीं नायरा और कार्तिक के चेहरे पर इसकी खुशी देखने को मिल रही है. जहां दोनों अभी से होने वाले बच्चे के नाम भी सोचने लगे है. कार्तिक और नायरा के आसपास ढेर सारे गुब्बारे भी दिख रहे है, जिसके मुताबिक अगर लड़का हुआ तो दोनों मिलकर उसका नाम कार्निक रखेंगे और अगर लड़की हुई तो दोनों उसका नाम कायरा रखेंगे.
प्रोमो में कार्तिक और नायरा की खुशियों के बीच फैंस को झटका भी लग गया है. दरअसल, आने वाले बच्चे की तैयारियों के बीच कार्तिक के पास एक फोन आता है और नायरा परेशान होकर उसका हाथ थाम लेती है. नायरा की बैचेनी देखकर कार्तिक उसके पास जल्द से जल्द आने का वादा भी कर रहा है, लेकिन वो अचानक से लापता हो जाता है. प्रेग्नेंट नायरा का रो-रोकर बुरा हाल गया है.
‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ के करेंट ट्रैक की बात करें तो इन दिनों कीर्ति और उसके एक्स हस्बैंड आदित्य का ट्रैक चल रहा है, जिसमें नायरा, कीर्ति और आदित्य के मिलने के बारे में जान जाएगी. और वह दोनों को मिलने से मना करेगी. अब देखना ये होगा कि कार्तिक के गायब होने के पीछे क्या आदित्य का हाथ होगा.
दुनिया और देश घातक कोरोना वायरस महामारी से लड़ रहा हैं. कुछ मशहूर व सामथ्र्यवान लोग कोरोना वायरस व लौक डाउन के वक्त परेशान गरीबों व जरूरतमंदों की मदद के लिए स्वेच्छा से आगे आए हैं. इन्ही में से एक हैं अभिनेत्री रिशिना कंधारी, जो कि इन दिनों ‘‘ दंगल’’ टीवी चैनल पर प्रसारित हो रहे सीरियल ‘‘ऐ मेरे हमसफर’’में इमरती कोठारी के किरदार को निभाते हुए नजर आ रही हैं.
रिशिना का मानना है कि वह ‘‘कृतज्ञता के रवैए’’ पर विश्वास करती है. रिशिना का मानना है कि वह जीवन में मूलभूत आवश्यकताओं के लिए ईश्वर की षुक्रगुजार हैं. पर कोरोना काल में जो लोग सुविधाएं पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वह उन तक पहुंच कर उन्हें सुविधाएं पहुंचाना चाहती हैं. उन्होंने वंचितों के लिए भोजन वितरण की पहल के साथ खुद को जोड़ा और तालाबंदी के दौरान भोजन तैयार करने और वितरित करने में उनकी मदद करने का प्रयास किया.
इस संबंध में जब हमने रिशिना कंधारी से बात की, तो उन्होे कहा-‘‘मेरा झुकाव हमेशा दूसरों की मदद करने की ओर रहा है. महामारी के दौरान हम अपने क्षेत्र के दैनिक मजदूरी श्रमिकों की स्थितियों को देख निराश हो गए थे. इसलिए मैंने अपने पति के साथ भोजन की आपूर्ति और किराने के सामान में उनकी मदद करने का फैसला किया. लोगों ने घबड़ाहट में चीजों को खरीदना शुरू कर दिया और किराने का सामान समाप्त हो गया.
यही कारण है कि हमने अपने स्टूडियो को वंचितों के लिए रसोई में बदलने का फैसला किया. हमारे पास एक छोटा रसोईघर था, जहाँ हम एक दिन में लगभग 800 लोगों के लिए खाना बनाते थे. पूरे तालाबंदी के दौरान हमने लगभग 2 लाख लोगों की सेवा की. मेरे लिए लॉकडाउन बहुत व्यस्त रहा. क्योंकि, दूसरों की तरह मैं घर पर बैठकर शिकायत नहीं कर रही थी, बल्कि दूसरों की मदद करने की पूरी कोशिश कर रही थी. दिन के अंत में जब मैं घर वापस आती, तब मुझे संतोष, आशीर्वाद और गर्व महसूस हुआ करता था. ”
वह मानती है कि हर किसी को इस दौरान अपना योगदान देना चाहिए.
बचपन से ही रचनात्मकता में रूचि होने के बावजूद आरती कदव ने आईआईटी, कानपुर से इंजीनियरिंगं की डिग्री हासिल करते हुए अमरीका की माइक्रोसाफ्ट कंपनी में काम करना शुरू किया. पर कुछ दिन बाद ही वह लघु फिल्में बनाने लगी. फिर नौकरी छोड़कर वह मुंबई पहुंच गयी. आठ वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद वह अपनी पहली साइंस फिक्शन फिल्म‘‘कार्गो’’का लेखन, निर्माण व निर्देशन कर सकी, इसी बीच उन्होने कुछ बेहतरीन लघु फिल्में बनाकर शोहरत बटोरी.
फिल्म ‘‘कार्गो’’ कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही जा चुकी है. आरती कदव अपनी इस फिल्म को सीधे सिनेमाघर में ही प्रदर्शित करने की इच्छा रखती थी. लेकिन कोरोना महामारी व लौक डाउन के चलते अब उन्होने अपनी फिल्म‘‘कार्गो’’ ओटीटी’प्लेटफार्म ‘‘नेटफ्लिक्स’को दे दी है, जो कि 9 सितंबर को ‘नेटफिलक्स’ पर प्रदर्शित होगी.
प्रस्तुत है आरती कदव से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश. .
सवाल- आपकी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?
-मेरा बचपन नागपुर में रहने वाले मध्यम वर्गीय परिवार में बीता. मेरे पिता इंजीनियर और मॉं शिक्षक है. हमारे परिवार में शिक्षा को लेकर काफी दबाव था. एक तो मां शिक्षक,उपर से नागपुर में हर बच्चा पढ़लिखकर इंजीनियर या डाक्टर बनने की ही सोचता है. वैसे मेरी रूचि कला की तरफ थी. मंै चारकोल स्केचिंग बहुत किया करती थी. एक स्केच बनाने में मुझे पंद्रह दिन लगते थे. फिर मैं उनकी एक्जबीशन प्रदर्शनी भी लगाती थी. स्कूल के दिनो में मैं कहानी लेखन में पुरस्कार भी जीतती थी. उन दिनों में राक्षस की ही कहानियां लिखती थी. मगर मां का दबाव था और मैं पढ़ने में तेज थी,तो मैंने कानपुर आई आई टी से इंजीनिरिंग की डिग्री ली,फिर पोस्ट ग्रेज्यूएशन भी किया. उन्ही दिनों अमरीका की माईक्रो साफ्ट कंपनी पहली बार भारत आयी थी और यहां के होनहार बच्चों की तलाश कर रही थी. तो मुझे भी चुना गया. भारत से दो लोग चुने गए थे. जिसमें से एक मैं थी. तो पढ़ाई पूरी होते ही मैं अमरीका चली गयी. यह मेरे लिए सभ्यता व संस्कृति के स्तर पर बहुत बड़ा बदलाव था. क्योंकि अब तक भारतीय सभ्यता व संस्कृति में मेरी परवरिश बहुत प्रोटेक्टिब रूप में हुई थी. वहां पर मुझे काफी एक्सपोजर मिला. पूरी स्वतंत्रता थी. मैं अमरीका जैसे शहर में अकेले नौकरी कर रही थी. तो काफी स्वतंत्रता थी. एक दिन मैंने एक कैमरा खरीदा. वहां से मैने धीरे धीरे कुछ फिल्माना शुरू किया. उस वक्त कैमरा महंगा था और मैं उस वक्त पैसे वसूल करने के लिए ज्यादा से ज्यादा शूट करने लगी. फिर कुछ भारतीयो से मिलकर कुछ लघु शॉर्ट फिल्में बनायीं. बहुत प्यारी प्यारी लघु फिल्में थीं.
फिर मैंने इनमें कुछ प्रयोग करने शुरू किए. मैने बतौर लेखक, निर्देशक, निर्माता व संगीतकार तीन से पांच मिनट की ढेर सारी लघु फिल्में बना डाली. मैने खुद ही साफ्टवेअर लोड करके इन लघु फिल्मों की एडीटिंग भी करती थी. यह सब देखकर मेरे छोटे भाई ने मुझसे कहा कि,‘आप जो कर रही हंै,उसे देखकर लगता है कि यह सब किसी नौसीखिए ने किया है. अगर आपको शौक है,तो प्रशिक्षण ले लो. ’मुझे भाई की सलाह पसंद आयी और मैं अमरीका छोड़कर मंुबई आ गयी. उन्ही दिनों सुभाष घई का ‘व्हिशलिंग वुड इंस्टीट्यूट’नया नया खुला था. मुझे पता चला कि इसमें पुणे फिल्म संस्थान से जुड़े रहे व अन्य अच्छे शिक्षक हैं और दो वर्ष का कोर्स है. तो मैंने ‘व्हिशलिंग वूड’में प्रवेश ले लिया. मुझे बहुत मजा आया. उस वक्त मेरी उम्र 28 वर्ष थी. जबकि बाकी सभी विद्यार्थी बच्चे 18 से बीस वर्ष के थे. पर मैं सबसे अधिक मस्ती कर रही थी. क्योंकि मुझे वहां मिलने वाली शिक्षा की महत्ता का अहसास हो चुका था. मैं इंजीनियरिंग छोड़कर फिल्म स्कूल में आयी थी. वहां से पढ़ाई पूरी करके जब हमने मंुबई फिल्म नगरी में काम करना चाहा,तो आटे दाल का भाव पता चला. बहुत संघर्ष करना पड़ा. पूरे आठ वर्ष के संघर्ष के बाद में अपनी पहली साइंस फिक्शन फिल्म ‘‘कार्गो’’ बना सकी.
सवाल- पर आई आई टी कानपुर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करतेवक्त भी आप अकेले व स्वतंत्र रही होगी?
-जी हॉ! स्वतंत्रता पूर्वक रहने का माइंड सेट तो आई आर्ई टी कानपुर में पढ़ाई के दौरान ही बन गया था. वहां हम रात रात भर जागकर पढ़ाई करते थे. मैने उस दौरान एक भी फिल्म नहीं देखी थी. मगर हम स्वावलंबी बन जाते हैं. सच तो यह है कि आई आई टी की पढ़ाई से मुझे एक ताकत मिली. दिमागी रूप से मैने जो कुछ सीखा,वह वहीं से मिला.
सवाल- क्या आज आपको लगता है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना समय की बर्बादी या गलत था?
-मैं ऐसा नहीं कह सकती. क्योंकि मैने उससे बहुत कुछ सीखा. आई आई टी में जो सिस्टम डेवलपमेंट था,वह पूरा कम्प्यूटर साइंस था. तो रोबोट जिनकी मैं कहानी सुनती हूं, उसको पहले मैने इंजीनिंयरिंग की पढ़ाई के नजरिए से जाना. लोग साइंस फिक्शन किताबों से पढ़ते हैं,पर मैं तकनीक टेक्नोलॉजी से पढ़ा. यह सब मुझे मेरे कथा कथन कहानी कहने में मदद करता है. जब मैंने फिल्म‘‘कार्गो’’ बनायी,तो मुझे लोग इज्जत दे रहे थे,क्योंकि उन्हे अहसास हुआ कि इसने कुछ डिजाइन किया है. इस बात ने मेरी कहानी को विकसित करने में मदद की. दूसरी बात इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हुए निजी स्तर पर मैंने बहुत कुछ सीखा. यह हमेशा कमा आएगा. जिम्मेदारी का अहसास भी उसी दौरान हुआ.
सवाल- आप अपने सात आठ वर्ष के संघर्ष को लेकर क्या कहना चाहेंगी?
-जब मैं ‘‘व्हिशलिंग वूड’’से फिल्म विधा की पढ़ाई कर रही थी,तभी मैने समझ लिया था कि मुझे साइंस फिक्शन फिल्में ही बनानी है. या कुछ जादुई काम करना है. उस वक्त नेटफ्लिक्स या अमॉजान जैसे ओटीटी प्लेटफार्म नहीं थे और सिनेमाघरांे में फिल्म प्रदर्शित करना टेढ़ी खीर था. उस वक्त मैं बहुत युवा नजर आती थी. मैं फिल्म निर्माताओं से मिलती थी और उन्हे बताती थी कि मुझे इस तरह की साइंस फिक्शन फिल्म बनानी है,तो संभवतः लोगों को मुझ पर यकीन नही होता था. जबकि सभी मिलते अच्छे थे. इसलिए मैने ‘इंडियन नोशन का बहुत अच्छा म्यूजिक वीडियो बनाया. कुछ लघु फिल्में बनायी. म्यूजिक वीडियो कई बनाएं. कुछ विज्ञापन फिल्में बनायी. मैने एक फिल्म की पटकथा लिखी, जिसे‘फैंटम फिल्म’ बनाने वाला था. हमने काफी तैयारी कर ली थी. मगर तभी फैंटम के अंदर कुछ विखराव हो गया और फिल्म बन न सकी. लेकिन इस फिल्म के चक्कर में मेरे पूरे दो वर्ष चले गए थे. तब मैने प्रण कर लिया था कि मै 2017 में अपनी फिल्म बनाउंगी,भले ही मुझे किसी परदे के सामने दो इंसानों को खड़ा करके ही क्यों न बनाना पड़े.
सवाल- अपनी लघु फिल्मों के बारे में बताएंगी?
-एक लघु फिल्म ‘उस पार’थी,जिसमें जैकी श्राफ ने अभिनय किया था. इसे कई फिल्म फेस्टिवल में काफी सराहा गया. दूसरी फिल्म ‘गुलमोहर’है. इसके बाद मैने एक फिल्म बनायी, जिसे कई फेस्टिवल में पुरस्कृत किया गया. यह फिल्म मूवी डॉट कॉम पर आयी थी. मैने एक लघु फिल्म‘‘रावण’’ बनायी, इसे मस्ती में एक दिन में बनाया था. इसमें एक संघर्षरत अभिनेता की कहानी है,जिससे लोग कह रहे हैं कि शादी करके बच्चे पैदा करो अन्यथा तुम मर जाओगे तो कई रावण पैदा हो जाएंगे. यह पहली लघु फिल्म थी, जिसके लिए मैने मैथोलॉजी के किरदार को उठाकर आधुनिकता के साथ जोड़ा था.
सवाल- इसके बाद की क्या योजना है?
-अभी एक साइंस फिक्श लघु फिल्म की शूटिंग रिचा चड्डा के संग की है. कुछ दूसरी योजनाएं भी हैं.
सवाल- फिल्म ‘‘कार्गो’’ की प्रेरणा कहां से मिली?
-मैने पंचतंत्र का महाभारत वर्जन भी पढने के बाद जब साइंस फिक्शन वाली कहानियां पढ़ना शुरू की,तो मेरी समझ में आया कि साइंस फिक्शन अभी का नहीं है और न ही अमरीका से आया है. बल्कि यह तो हमारे देश में कई सदियों से रहा है. मेरी नजर में ‘महाभारत’ भी एक तरह से साइंस फिक्शन ही है. शोध में मैने पाया कि सभी ने सबसे पहले साइंस फिक्शन कहानी के तौर पर यह बनाया कि हम पैदा कहां से हुए और मर कर कहां जाएंगे. क्योकि हर धर्म में इंसान की मृत्यू होने पर सांत्वना देते समय यह कहानी बतानी पड़ती है. इसे आप क्रिएशन मिथ आफ्ट्र लाइफ एंड डेथ’कह सकते हैं. तो मैने सोचा कि हमने पढ़ा है कि मृत्यू होने पर यमराज आकर इंसान को लेकर जाते हैं. तो हमने इसी पर एक नई कहानी पेश करने की कोशिश की है. हमारी फिल्म ‘कार्गो’ की मूल कहानी‘प्रे शिप’’की है,मगर बीच बीच में कई छोटी छोटी कहानियां हैं. साहित्य में एक खास चीज है-‘‘अनरिलायबल नरेटर. ’’एक स्पेनिश लेखक इसे बहुत आगे ले गए हैं.
सवाल- कहानी के बारे में कुछ बताना चाहेंगी?
-फिल्म‘‘कार्गो’’की कहानी पृथ्वी परहर सुबह आने वाले पुष्कर नामक ‘प्रे शिप’’की है. यह कहानी प्रहस्त (विक्रांत मैसे) नामक इंसान की है,जो कि पचास साठ साल से ‘पुष्कर 634 ए’’पर कार्यरत है. तो वह बहुत ही मेकेनिकल हो गया है. कार्गो से मृत लोग आते हैं और प्रहस्त के पास वह एक प्रोसेेस के साथ जाते हैं और प्रहस्त भी सारा काम मेकेनिकल तरीके से करता रहता है. अचानक प्रहस्त को एक सहायक युविश्का (श्वेता त्रिपाठी) मिलती है,जो कि इस नौकरी को लेकर बहुत उत्साहित है. उसे यह पहली नौकरी मिली है. यह लड़की अहसास करती है कि यह मस्ती वाला नहीं,बल्कि लार्जर आॅस्पेक्ट वाला काम है. वह यह जानने का प्रयास करती है कि आखिर जिंदगी का मतलब क्या है,यदि हर इंसान आकर सब कुछ देेने लगेे. उसके इस संसार में रहने का क्या मतलब है. इंटरवल के बाद फिल्म पूरी तरह से फिलॉसाफिकल हो जाती है. कहने का अर्थ यह कि जिंदगी में कुछ भी न रहे,तो भी कुछ न कुछ रह जाता है.
-दर्शन शास्त्र यही है कि हम सोचते है कि हम मर जाते हैं,तो सब कुछ खत्म हो जाता है,तो ऐसा नहीं है,हम कहीं न कहीं कुछ छोड़ जाते हैं. और वही काफी है. मेरा कहना यह है कि हम जो ‘फार एवर’बोलते हैं,तो ‘फार एवर’ हमेशा रहने में नहीं होता, बल्कि वह जिंदगी का कोई भी पल हो सकता है.
सवाल- दर्शक अपने साथ ले जाएगा?
-फिल्म में ह्यूमर भी है,इसलिए लोगों को फिल्म देखते हुए मजा आएगा. इसके अलावा हर दर्शक अपनी जिंदगी के प्रति प्यार लेकर जाएगा. हम अपनी जिंदगी में इतना फंसे रहते हैं कि हम कभी भी अपने बारे में सोच ही नहीं पाते. लोग खुद को भाग्यशाली समझेंगे कि वह जिंदा हैं.
सवाल-इसके बाद की क्या येाजना है?
-एक फिल्म की पटकथा तैयार है. यह भी साइंस फिक्शन ही है. मै कम से चार पांच साइंस फिक्शन फिल्में ही बनाना चाहती हूं. वैसे मेरे पास कहानियों का भंडार है. अभी एक साइंस फिक्शन लघु फिल्म रिचा चड्डा के साथ शूट की है.
मैं 26 वर्षीय कालेज स्टुडैंट हूं. मेरा वजन बहुत अधिक है, इसे कम करने के लिए मैं डाइटिंग कर रही हूं. लेकिन इस के कारण मुझे कब्ज रहने लगा है, क्या करूं?
जवाब
सब से पहले तो डाइटिंग की अवधारणा ही गलत है. आप को वजन कम करने के लिए कभी डाइटिंग नहीं बल्कि डाइट प्लानिंग करनी चाहिए. आप के शरीर को सामान्य रूप से काम करने के लिए एक निश्चित मात्रा में कैलोरी की आवश्यक है. अगर आप प्रतिदिन 1200 कैलोरी से कम का सेवन करेंगी तो आप का मैटाबोलिज्म धीमा पड़ जाएगा, जिस का सीधा प्रभाव आप के मल त्यागने की आदतों पर होगा. आप का पाचनतंत्र ठीक प्रकार से काम करेगा.
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अपने खानपान और लाइफस्टाइल के कारण आजकल अधिकतर लोगों में मोटापे की समस्या देखी जा रही है. इससे निजात पाने के लिए लोग घंटों जिम करते हैं, पर कुछ खास असर नहीं होता. हाल ही में एक रिपोर्ट आई है जिसमें सामने आया है कि वजन कम करने के लिए एक्सरसाइज से ज्यादा डाइट महत्वपूर्ण होती है. अगर आपको वजन कम करना है तो इक्सरसाइज से ज्यादा डाइट पर ध्यान देना होगा.
अमेरिका की एक शोध संस्था के मुताबिक, जो लोग धीरे-धीरे यानी हफ्ते में सिर्फ 1 या 2 पाउंड ही वजन कम करते हैं, उनका वजन जल्दी नहीं बढ़ता है. रिपोर्ट में ये बात भी सामने आई कि खाना के पाचन में 10 फीसदी तक कैलोरी बर्न होती हैं. वहीं, 10 से 30 फीसदी कैलोरी फिजिकल एक्टिविटी से कम होती हैं.
पाव भाजी बनाने के लिए गोभी को अच्छी तरह धोकर बारीक काट लीजिए. गोभी और मटर को एक बरतन में 1 कप पानी डालकर नरम होने तक ढक कर पकने दीजिए.
आलू को छील लीजिए, टमाटर को बारीक काट लीजिए और शिमला मिर्च के बीज हटाकर इसे भी बारीक काट कर तैयार कर लीजिए.
पैन गरम किजिए, 2 टेबल स्पून बटर डाल कर मैल्ट कीजिए इसमें अदरक का पेस्ट और हरी मिर्च डाल कर हल्का सा भून लीजिए. अब कटे हुए टमाटर, हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर और शिमला मिर्च डालकर मिक्स कर दीजिए और इसे ढककर 2-3 मिनिट पका लीजिए.
सब्जी को चेक कीजिए, टमाटर शिमला मिर्च नरम होकर तैयार हैं अब इन्हें मैशर की मदद से मैश कर लीजिए, अब गोभी और मटर डाल कर अच्छे से मैश करते हुए पका लीजिए.
सब्जी अच्छे से मैश हो गई है, अब आलू को हाथ से तोड़ कर डाल दीजिए साथ ही नमक, लाल मिर्च और पावभाजी मसाला डालकर भाजी को मैशर की मदद से मैश करते हुए थोडी़ देर पका लीजिए. आधा कप पानी और आवश्यकतानुसार पानी डाल दीजिये, सब्जी हल्की सी पतली बने, और सब्जी को घोटते हुए तब तक पकाएं जब तक की भाजी एक दम से एक जैसी हिली मिली हुई नहीं दिखाई देने लगे.
भाजी में थोडा़ सा हरा धनिया और 1 चम्मच बटर डाल कर मिला दीजिए. भाजी बनकर तैयार है इसे प्याले में निकाल लीजिए, और बटर और हरे धनिये से गार्निश कीजिए.
अब पाव सेकें. गैस पर तवा गरम कीजिये. पाव को बीच से चाकू की सहायता से इस तरह काटे कि वह दूसरे तरफ से जुड़ा रहे. तवे पर थोडा़ सा बटर डालकर इस पर पाव डाल कर, दोंनो ओर हल्का सा सेक लीजिए. सिके पाव को प्लेट में निकाल लीजिए इसी तरह सारे पाव भी सेक कर तैयार कर लीजिए. गरमा गरम स्वादिष्ट पाव भाजी को परोसिये और खाईये.
चांदी जैसे-जैसे पुरानी होती जाती है, धीरे धीरे यह अपनी चमक खोने लगती है. दरअसल, चांदी एक ऐसी धातु है जिस पर दाग-धब्बे व खरोंच आसानी से पड़ जाते है. ऐसे में अगर महिलाएं चांदी के जेवर पहनती है तो कहीं न कहीं उनकी खूबसूरती फीकी पड़ जाती हैं. महिलाएं इन्हें साफ करवाने के लिए सुनार के पास भी जाती हैं. जहां समय तो लगता ही है साथ पैसे भी ज्यादा लगता है. ऐसे में आप घर पर ही कुछ आसान नुस्खों से चांदी चमका सकती हैं. आइए जानते है चांदी के बर्तन व जेवर को घर पर कैसे चमका सकते है-
नमक और एल्युमीनियम फौयल का प्रयोग
चांदी के गहनों को साफ करने के लिए एक बर्तन में पानी और नमक का घोल बना लें. अब इस में एल्युमीनियम फौयल के कुछ टुकडें मिला दें. अब इस घोल में आप चांदी के बर्तन व जेवर डाल दें. करीब 30 मिनट बाद चांदी को इस घोल में रखने के बाद निकाल लें और ब्रश से साफ कर के सूखा ले. आप चाहे तो नमक के जगह बैकिंग सोडा का भी इस्तेमाल कर सकती है. नमक और एल्युमीनियम का यह मेल चांदी के दाग धब्बों के साथ रिएक्शन कर के चांदी को चमकदार बनाने में मदद करता है.
डिटर्जेंट पाउडर के इस्तेमाल से चांदी की खोई चमक वापस आ सकती है. इसके लिए आपको पहले पानी में डिटर्जेंट पाउडर डाल कर उबालना होगा. अब इस में चांदी के जेवर डाल कर थोड़ी देर छोड़ दे. कुछ देर बाद इन्हें निकाल कर ब्रश के सहायता से साफ कर लें. ऐसा करने से चांदी की चमक फिर से पहले जैसी हो जाएगी.
टूथपेस्ट से भी चमकेगी चांदी
टूथपेस्ट से सिर्फ दांत ही नहीं चांदी भी चमकाई जा सकती है. टूथपेस्ट से आप आसानी से चांदी के जेवर व बर्तन को चमका सकती है. इसके लिए आप कोई भी सूती कपड़ा ले. अब इस कपड़े पर टूटपेस्ट लगाएं और जिस जेवर को चमकाना है उसे इस कपड़े के सहायता से हल्के हाथ से रगड़े.
नींबू और नमक का घोल
नींबू और नमक का घोल भी चांदी चमकाने में काफी लाभदायक है. चांदी को चमकने के लिए नींबू और नमक के घोल को मिला ले और उसमे चांदी के बर्तन व जेवर रात भर भिगों के छोड़ दे. सुबह इसे ब्रश से साफ कर ले. आपको काफी फर्क नजर आएगा.
उम्र बढ़ने के साथ, कुछ ड्रिंक्स या खा- पदार्थों से दांतों पर पीले व ग्रे धब्बे लग जाते हैं जिस कारण दांत गंदे व पीले दिखने लगते हैं. इस समस्या को जल्द से जल्द दूर करना आवश्यक है.
दांत हमारे चेहरे या कहें पूरी पर्सनैलिटी का एक अभिन्न हिस्सा हैं और मुंह खोलते ही यदि किसी के दांत पीले दिखाई पढ़ते हैं तो उस की इमेज उसी समय हमारे सामने डाउन हो जाती है. बाजार में दांतों को सफेद बनाने के लिए कई तरह की किट्स व टीथ व्हाइटनिंग स्ट्रिप्स, पेस्ट व पाउडर अवेलेबल हैं, लेकिन यदि आप उन पर पैसे खर्चना नहीं चाहते तो कुछ होम रेमेडीज भी हैं जिन्हें अपना सकते हैं.
– एक टेबलस्पून बेकिंग सोडा में 2 टेबलस्पूनहाइड्रोजन पेरोक्साइड मिला कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट से अपने दांतों को ब्रश कीजिए. यह दांतों पर प्लाक और कीटाणु पनपने से रोकता है जिस से पीले दांत की समस्या खत्म हो जाती है. इस का इस्तेमाल आप रोज कर सकते हैं.
– बहुत कम मात्रा में एप्पल साइडर विनेगर का इस्तेमाल किया जा सकता है. आधा गिलास पानी में 2 छोटे चम्मच एप्पल साइडर विनेगर को मिला कर माउथवाश बना लें. इसे 30 सेकंड तक मुंह में रख कर हिलाएं और फिर थूक कर साफ पानी से मुंह धो लें और ब्रश कर लें. इस का इस्तेमाल सावधानी से करें और कम मात्रा व कम समय के लिए करें.
– बाजार से एक्टीवेटेड चारकोल खरीद कर उसे दांतों पर ब्रश में ले कर लगा सकते हैं. एक्टिवेटेड चारकोल न केवल दांतों को सफेद करता है बल्कि बैक्टीरिया को भी हटाता है.
– स्ट्रौबैरी में मौजूद मेलिक एसिड दांतों की सफेदी के लिए कारगर उपाय है. स्ट्रौबैरी को पीस कर बेकिंग सोडा में मिलाएं और इस से दांतों को ब्रश करें. हालांकि यह दांतों पर बहुत ज्यादा असरदार नहीं है लेकिन दांतों से हलका पीलापन हटा सकता है. आप इसे हफ्ते में 2 से 3 बार इस्तेमाल कर सकते हैं.
– दांतों को पीले होने से बचाने के लिए शुगर युक्त खा- पदार्थों का कम सेवन करें. अपने खाने में कैल्शियम की मात्रा बढ़ाएं. गुटका या तंबाकू का सेवन न करें. रोजाना दांतों को सुबह खाना खाने से पहले और रात में खाना खाने के बाद ब्रश कर के सोएं. कौफी, सोडा,
रेड वाइन आदि खा- पदार्थ दांतों पर धब्बे छोड़ जाते हैं, इन से परहेज करें.
खूबसूरत, बेदाग चेहरा हर किसी की ख्वाहिश होती है लेकिन धूल-मिट्टी, प्रदूषण की वजह से बहुत से लोगों को पिंपल की समस्या हो जाती है. इस समस्या से बचने के लिए लोग तरह-तरह के ट्रीटमेट और ब्यूटी प्रॉडक्ट का सहारा लेते है लेकिन पिंपल्स की समस्या वैसे की वैसे ही रहती है. ऐसे में पिंपल्स को ठीक करने के लिए कुछ आसान से टिप्स बात रहें हैं, डॉ. अजय राणा विश्व प्रसिद्ध डर्मेटोलॉजिस्ट और एस्थेटिक फिजिशियन, संस्थापक और निदेशक, आईएलएएमईडी.
1. एप्पल साइडर विनेगर पीपल्स को हटाने के लिए आजमाए जाने वाला सबसे प्रसिद्ध नुस्खा है. एप्पल साइडर विनेगर मे एंटी इंफ्लैमैटरी और एंटी बकटेरियल प्रोपर्टीज होती है. पर इसे सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए. क्योंकि इससे कई तरह के इंफेक्शन होने के भी चांसेस होते है.
इसके लिए एप्पल साइडर विनेगर को दिन में कम से कम दो बार पिंपल पर लगाए और फिर आधे मिनट के लिए छोड़ दें. फिर आधे मिनट बाद इसको धो लें.
2. टी ट्री ऑयल पिंपल्स के लिए अच्छा माना जाता है. यह स्किन को मुलायम बनाता है और एंटी बक्टेरियल प्रोपर्टीज होने के कारण स्किन से रेडनेस निकालने में मदद भी करता है.
इसके लिए कॉटन की सहायता से टी ट्री ऑयल को पिंपल्स पर लगाए. फिर 15-20 मिनट बाद इसको अच्छे से साफ कर लें. इसके अलावा एक टेबल स्पून एलोवेरा जेल में टी ट्री ऑयल की कुछ बूँदे मिला लें. फिर इसको पिंपल्स में लगाए. फिर इसे गर्म पानी की सहायता से धो लें.
3. पिंपल्स के लिए पपीता का उपयोग एक नैचुरल रेमडी की तरह काम करता है. पपीता स्किन से डेड स्किन सेल्स को निकालने में मदद करता है साथ ही साथ स्किन को क्लीयर बनाता है.
इसके लिए अपने चेहरे को पहले अच्छे से धो कर सुखा लें. फिर पपीता को पीस कर एक पेस्ट की तरह बना लें. फिर से चेहरे पर लगा कर 15-20 मिनट के लिए छोड़ दें. फिर इसे गर्म पानी की सहायता से धो लें. फिर अपने स्किन टोन के हिसाब से एक अच्छा सा मोइस्चराईजर इस्तेमाल करें.
4. एलोवेरा पिंपल्स को ठीक करने के लिए अपनाया जाने वाला सबसे अच्छा और घरेलू उपाय है. यह न सिर्फ पिंपल्स को हटाता है बल्कि साथ ही साथ स्किन पर होने वाले सभी प्रकार के स्कार्स को भी ठीक करता है.
इसके लिए एलोवेरा जेल में चुटकी भर हल्दी मिला कर स्किन पर रगड़े. इसमें मौजूद इंफ्लैम्माटरी और एंटी मिकरोबियल प्रोपर्टीज न केवल पिंपल्स को कम कर देगी साथ ही साथ स्किन को हाईड्रैट भी कर देगी.
5. हनी का भी इस्तेमाल पिंपल्स को ठीक करने में किया जा सकता है. यह स्किन से सभी प्रकार के रेडनेस जो पिंपल्स के कारण होते है उसको ठीक कर देता है.
इसके लिए हनी को दालचीनी के पाऊडर में मिला लें फिर इस पेस्ट को स्किन में पिंपल्स वाले एरिया में लगाए. फिर कुछ देर बाद इसको धो लें.
6. नारियल का तेल भी पिंपल्स को ठीक करने के लिए इस्तेमाल करा जा सकता है. नारियल के तेल में एंटी बक्टेरियल प्रोपर्टीज होती है जो स्किन इंफ्लैमैशन को ठीक करता है.
इसके लिए नारियल तेल को हल्का गर्म करके पिंपल्स पर लगाए. इससे पिंपल्स सही हो जायेंगे और स्किन के सारे स्कार्स भी ठीक हो जायेंगे.
सुशीला का विवाह 30 साल पहले एक गांव में हुआ था. उन दिनों को याद करते हुए वह अकसर सोचती कि उस ने गांव में कितनी कठिनाइयों का सामना किया. उस की सास उसे हर समय घूंघट निकाले रखने को कहती. पढ़ीलिखी सुशीला के लिए ऐसा करना बहुत मुश्किल था. जब विवाह के कुछ समय बाद उस के पति नौकरी के सिलसिले में शहर आ गए तो उसे राहत की सांस मिली. पहले लंबा घूंघट छूटा और फिर अपने आसपास वालों की देखादेखी साड़ी की जगह सूट पहनना शुरू हो गया. सूट उसे साड़ी के मुकाबले आरामदायक और सुविधाजनक लगता. कुछ समय बाद सूट से दुपट्टा भी गायब हो गया.
अब जब कभी उस की सास गांव से उस के पास रहने आती तो वह उस के कपड़ों को देख कर खूब मुंह बनाती और बारबार ताने मारती. ‘‘क्या जमाना आ गया है. बहुओं ने लाजशरम बिलकुल छोड़ रखी है… नंगे सिर, बिना दुपट्टे परकटी बन घूम रही है. हमारा पल्लू आज भी सिर से नीचे नहीं गया. मेरी सास मुझे यों देखती तो मार ही डालती.’’
ऐसी तानाकशी से दुखी सुशीला मुंह बंद कर के रह जाती और सास के वापस जाने के दिन गिनती. उस वक्त सुशीला सोचा करती कि वह अपनी बहू के साथ कभी ऐसा नहीं करेगी.
धीरेधीरे समय बदला. सुशीला के बच्चे बड़े हुए. उस की बेटी जींस पहनती तो उसे बुरा नहीं लगता. उसे लगता कि वह समय के साथ बदल गई है और अपनी सास की तरह दकियानूसी नहीं है. उस के बेटे की मुंबई में अच्छी नौकरी लगी. वहीं एक सहकर्मी से प्यार हुआ और दोनों ने परिवार की रजामंदी से शादी कर ली.
सुशीला के पति का देहांत हो गया था, इसलिए वह भी बेटेबहू के साथ मुंबई रहने आ गई. शादी के शुरूशुरू में बहू ने एक आदर्श बहू वाले पारंपरिक कपड़े पहने, मगर धीरेधीरे वह उन्हीं पुराने सुविधाजनक कपड़ों में रहने लगी जो शादी से पहले पहना करती थी जैसे कैप्री, शौर्ट्स, विदाउट स्लीव और औफ शोल्डर टौप, मिडीज आदि. मगर सुशीला को बहू का ऐसा रिवीलिंग पहनावा अखरने लगा.
वह बहू को अकसर टोकने लगी, ‘‘शादी के बाद भी कोई ऐसे कपड़े पहनता है भला?’’
एक दिन तो हद हो गई जब बहूबेटे दोनों एक पार्टी में जा रहे थे. बहू ने औफशौल्डर टौप और स्कर्ट पहन लिया. उस दिन सुशीला भड़क उठी, ‘‘तुम लोगों के ज्यादा पर निकल आए हैं… बिलकुल नंगापन मचा रखा है. मैं भी कभी बहू थी, मगर हमारी क्या मजाल थी जो अपने सासससुर के सामने ऐसे कपड़े पहन लेते. मेरी सास मुझे ऐसा देखती तो मार ही डालती.’’
यह सुन कर सुशीला का बेटा बोला, ‘‘अरे मम्मी यह तो सेम वही डायलौग है न जो दादी आप को सुनाया करती थीं. आप ने यह हमें कितनी बार बताया है.’’
यह सुन कर सुशीला को एक झटका लगा कि अरे हां, सही तो है मेरी सास मुझे सूट पहनने पर ऐसे ही तो ताने मारा करती थी. मगर सूट अलग बात थी. उस में शरीर ढका रहता है. मगर बहू के कपड़े… इन्हें कैसे बरदाश्त करूं?
जो सुशीला की स्थिति है, वही आजकल की बहुत सी सासों की है. उन की सोच में बदलाव तो आ रहे हैं, मगर उतनी तेजी से नहीं जितनी तेजी से नई पीढ़ी आगे बढ़ रही है. दोनों पीढि़यों की गति में बहुत अंतर है. सामान्यतया बहू जब भी कुछ ऐसा पहनती है जो सास को अशोभनीय लगता है तो वह तुरंत मुंह बनाते हुए अपने जमाने में पहुंच जाती है और कहती है कि अरे, हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं होता था. उन की इस प्रतिक्रिया के कारण सासबहू का रिश्ता तनावपूर्ण रहता है और बहू सास से अलग रहने के मौके ढूंढ़ती है. ऐसा न हो, इस के लिए कुछ बातों को समझना जरूरी है.
एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है कि परिवर्तन संसार का नियम है. संसार में रोज कुछ न कुछ परिवर्तन हो रहे हैं. जलवायु में, सुविधाओं में, तकनीक में, रहनसहन में, रिश्तों में… हर जगह कुछ भी पहले जैसा नहीं है और न ही हो सकता है. यही बात पहनावे की भी है. पीढ़ीदरपीढ़ी लोगों के खासकर महिलाओं के पहनावे में परिवर्तन होता आ रहा है और आगे भी होता रहेगा. समय के बदलते दौर की नब्ज पकड़ें और उसे स्वीकार कर अपनी सोच को लचीला बनाएं.
रिवीलिंग का यदि शाब्दिक अर्थ पकड़ें तो वह ‘राहत’ या ‘सुविधाजनक’ होता है. सुविधा की परिभाषा सब के लिए अलगअलग है. सुशीला की सास को उस का सूट पहनना पसंद नहीं था जबकि वह उस के लिए सुविधाजनक था. इसी तरह सुशीला को बहू का कैप्री, स्लीवलैस टौप, मिडीज पहनना पसंद नहीं है, जबकि बहू को ये ड्रैस सुविधाजनक लगती हैं. सास यानी सुशीला को समझना चाहिए कि बहू अपनी सुविधानुसार कपड़े पहनेगी उन की सोच के हिसाब से नहीं. और यदि दबाव में पहन भी लिए तो यह ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा. बेहतर है सुशीला अपने दृष्टिकोण में बदलाव करे ताकि दोनों के बीच फालतू का तनाव न पैदा हो.
कोई भी पहनावा अच्छा या बुरा नहीं होता. उसे अच्छा या बुरा हमारी सोच बनाती है. हम उसे जिस नजरिए से देख रहे हैं वह नजरिया उस पहनावे की परिभाषा तय करता है. जैसे तीखा खाने वाले के सामने सादा भोजन रख दिया जाए तो वह बकवास बताएगा और सादा खाने वाले के सामने तीखा भोजन रख दिया जाए तो वह उस की बुराई करेगा. जरा सोचिए, क्या आज आप स्वयं अपनी पुरानी पीढ़ी के पहनावे को पहन रहे हैं? पुरुषों की धोतियां, महिलाओं के घूंघट लगभग गायब हो चुके हैं. इसी तरह आजकल की बहुएं अपने समय के अनुसार कपड़े पहन रही हैं.
न बनें टिपिकल सास
जब कोई मां अपने पढ़ेलिखे बेटे के लिए बहू ढूंढ़ती है तो उस की चाहत होती है उस की बहू भी आधुनिक और पढ़ीलिखी हो जो उस के बेटे के साथ कदम से कदम मिला कर चल सके. मगर जब रहनसहन और पहनावे की बात आती है तो वह वही टिपिकल सास बन जाती है, जो चाहती है उस की बहू उस की सोच के हिसाब से चले. जो उसे अच्छा नहीं लगता वह न पहने. मगर ऐसा नहीं होता. आप को यह समझना जरूरी है कि आप की बहू एक आत्मनिर्भर व्यक्तित्व है. उस की अपनी सोच, अपनी पसंदनापसंद है. वह
आप के आदर की वजह से आप की बात मान सकती है, मगर आप अपनी सोच उस पर थोप नहीं सकतीं.
यदि आप को बहू की रिवीलिंग ड्रैस पर कोई आपत्ति है और आप यह बात उस तक पहुंचाना चाहती हैं तो इस तरह से कहें कि उसे बुरा भी न लगे और आप भी अपनी बात कह पाएं. लेकिन क्या पहनना है क्या नहीं, इस का निर्णय उसी पर छोड़ देना चाहिए.
रमा की बहू एक फैमिली फंक्शन में जाने के लिए औफशौल्डर गाउन पहन कर तैयार हो रही थी. जहां उन्हें जाना था वहां का माहौल रूढि़वादी था. रमा ने जब उसे देखा तो पहले उस की बहुत तारीफ करते हुए बोलीं, ‘‘अरे, वाह बहू, आज तो तुम गजब ढा रही हो. बहुत ही सुंदर लग रही हो, मगर आज जहां यह पार्टी है उन लोगों का नजरिया थोड़ा पुराना है. हो सकता है उन्हें तुम्हारा यह आधुनिक पहनावा अच्छा न लगे, वे तुम पर कुछ कमैंट करें. और मेरी प्यारी बहू के लिए कोई उलटासीधा बोलेगा तो मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए मैं चाहूंगी कि तुम कोई पारंपरिक डै्रस पहन लो. लेकिन
मैं तुम्हें फोर्स नहीं करूंगी, जैसा तुम्हें सही लगे तुम करो.’’
बहू ने सास की प्यार से कही गई बात को सुना और तुरंत चेंज करने के लिए तैयार हो गई.
बहू को बदलने के बजाय सास ही जमाने की नब्ज पकड़ कर अपने पहनावे में बदलाव ले आए. टिपटौप बहू के साथ वह भी आधुनिक बन जाए. वह बहू के साथ जींसशर्ट पहन कर कदम से कदम मिला कर चले और 2 पीढि़यों का भेद ही मिटा दे. लगेगा जैसे उम्र आगे बढ़ने के बजाय पीछे जा रही है और आप स्वयं को आउटडेटेड भी महसूस नहीं करेगी.
आजकल की लड़कियां आजकल चलने वाले कपड़े ही पहनेंगी. सिर्फ इसलिए कि उन की शादी आप के बेटे से हो गई, उन की सोच, उन का व्यक्तित्व और पसंद बदल नहीं जाएगी. बेहतर है, आप उन्हें अपना पहनावा चुनने की और पहनने की आजादी दें. उन पर कोई दबाव न बनाएं. यदि आप को उन का पहनावा पसंद आ रहा है तो खुल कर तारीफ करें और यदि नहीं आ रहा है तो मुंह बनाने या ताने मारने जैसी छोटी हरकतें तो बिलकुल न करें. वह आप की बहू है, उसे उस की पसंदनापसंद के साथ पूरे प्यार से स्वीकार करें. यह कदम आप के रिश्तों में मिठास घोल देगा.