Medela Flex Breast Pump: इजी टू हैंडल, इजी टू यूज

हर मां चाहती है कि उसके बच्चे को भरपूर पोषण मिले, इसके लिए वह बच्चे के जन्म लेते ही उसे अपना दूध पिलाती है, चाहे उसे इसके लिए कितनी भी पीड़ा क्यों सहनी पड़े. आखिर ये रिश्ता होता ही ऐसा है. मां से अपने बच्चे की पीड़ा देखी नहीं जाती. वह जानती है कि अगर बच्चे को हैल्थी रखना है, उसकी इम्युनिटी को बढ़ाना है तो उसे मां का दूध पिलाना ही होगा

लेकिन कई बार ऐसी स्थिति  जाती है जब मां चाहा कर भी अपने बच्चे को दूध नहीं पिला पाती. जैसे कई बार स्तनों में दूध नहीं आता या फिर अधिक दूध आने के कारण स्तनों में अत्यधिक पीड़ा होती है या जौब के कारण मजबूरन उसे अपने बच्चे का पेट भरने के लिए  फार्मूला मिल्क का सहारा लेना ही पड़ता है. जो भले ही बच्चे की भूख को शांत कर दे लेकिन इससे बच्चे को सभी जरूरी न्यूट्रिएंट्स नहीं मिल पाते हैं, जो आगे चलकर उसमें कई कमियों का कारण भी बन सकते हैं

लेकिन अब नई टेक्नोलॉजी के आने के कारण हमारा जीवन आसान हो गया है. हमारे सामने आज ढेरों विकल्प होते हैं. इसी में एक है ब्रैस्ट पंपअब ऐसे ब्रैस्ट पंप्स  गए हैं जिसने मां की परेशानी को दूर करने का काम किया है

क्या है ब्रैस्ट पंप 

ब्रैस्ट पंप एक ऐसा यंत्र है, जिसकी मदद से मां अपने दूध को संग्रहित करके रख सकती है और जब बच्चे को इसकी जरूरत हो आसानी से पिलाया जा सकता है. एक बार दूध संग्रहित होने के बाद मां दूसरे काम भी आसानी से टेंशन फ्री हो कर कर सकती है. हर मां के मन में ये सवाल जरूर आता है कि कहीं ब्रैस्ट पंप के इस्तेमाल से हमें दर्द तो नहीं होगा या फिर बच्चे को इस दूध से कोई नुकसान तो नहीं पहुंचेगा. तो आपको बता दें कि ये पूरी तरह से सेफ है. बस आप पंप की साफ़ सफाई का खास ध्यान रखें

आपको बता दें कि ब्रैस्ट पंप वैक्यूम के कारण काम करते हैं. जब इन पंप्स को दोनों स्तनों पर अच्छे से लगाया जाता है तो वैक्यूम के कारण स्तनों से दूध निकल कर पंप से जुड़ी हुई बोतल में भरने लगता है. जिन्हें आप आसानी से फ्रिज में स्टोर करके रख सकती हैं. बस इस बात का ध्यान रखें कि बच्चे को दूध तभी पिलाएं जब दूध नोर्मल टेम्परेचर पर जाए. इससे जहां आपको सुविधा होगी वहीं आपके बच्चे को सभी जरूरी न्यूट्रिएंट्स भी मिल जाएंगे

वैसे को मार्केट में आपको ढेरों ब्रैस्ट पंप मिल जाएंगे. लेकिन सवाल है बच्चे की हैल्थ का जिससे कोई समझौता नहीं हो सकता. ऐसे में मेडेला फ्लेक्स ब्रैस्ट पंप का जवाब नहीं. क्योंकि उन्होंने एक मां की जरूरतों को ध्यान में रखकर ब्रेस्ट पंप बनाए हैं. जिसमें  हैल्थ भी और कम्फर्ट भी. चाहे बच्चा जन्म से पहले जन्मा  हो, स्तनों से दूध बाहर पा रहा हो, ऐसे में उच्च क्षमता वाले मेडेला फ्लेक्स ब्रैस्ट पंप मां के दूध को स्तनों से आसानी से बाहर निकाल के  बच्चे तक मां के दूध को पहुंचाने का काम करते हैं. इसके अधिकांश पम्प में 2 फेज एक्सप्रेशन टेक्नोलोजी है, जो काफी यूनिक है

तो फिर मेडेला फ्लेक्स ब्रैस्ट पंप से आप भी रहें रिलैक्स और बच्चे को भी दें पूरा पोषण. साथ ही में अपनी पर्सनल और प्रौफेशनल लाइफ का भी रखें ख्याल.

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Monsoon Special: इन 6 टिप्स से अपने लुक को बनाएं परफेक्ट

मानसून का सीजन आते ही जहां ब्यूटी से जुड़ी प्रौबल्म्स देखने को मिलती हैं वहीं फैशन से जुड़ी प्रौब्लम भी लोगों के सामने आती हैं. फैशन हर वक्त बदलता है और कोरोनावायरस लॉकडाउन में बाहर जाकर कपड़े खरीदने की बजाय आप खुद ही अपने फैशन को अपडेट करके अपने लुक पर ध्यान दे सकती हैं. आज हम आपको कुछ मानसून टिप्स बताएंगे, जिसका इस्तेमाल करके आप मानसून में अपने लुक को चमका सकती हैं.

1. बॉयज के लिए जरूरी है  फैशनेबल टी शर्ट

रफ एंड टफ लुक के लिए चैक पैटर्न वाली टी शर्ट के साथ कैपरी या जींस परफेक्ट कौम्बिनेशन है. इसके साथ ही मानसून के बदलते मौसम के बीच ब्लू या ऑरेंज सनग्लास आपको फंकी लुक देने के लिए बेस्ट औप्शन है. वहीं मल्टी कलर वॉच का इस्तेमाल आपके लुक को और भी स्टाइलिश बनाएगा.

2. ब्रेसलेट से दें नया लुक

रेनबो ब्रेसलेट का फैशन बॉयज के बीच हमेशा बना रहता है. प्लेन से लेकर प्रिंटेड कपड़ों के साथ इस तरह के ब्रेसलेट अच्छे लगते हैं. लेकिन इन दिनों गर्ल्स के लिए भी बेहद खूबसूरत पैटर्न वाले ब्रेसलेट मार्केट में आए हैं, जिसे आप आप ट्रेडिशनल से लेकर वेस्टर्न हर लुक के साथ पेयर कर सकते हैं.

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3. गर्ल्स के लिए परफेक्ट हैं ये टॉप्स

मानसून में रेनबो से इंस्पायर्ड होकर आप कलरफुल लेगिंग्स या टॉप ट्राय कर सकती हैं. अगर आप रेनबो कलर का टॉप पहन रही हैं, तो उसके साथ ब्लैक कलर की जींस पहनें. रेनबो लेगिंग्स के साथ प्लेन टॉप भी अच्छे लगते हैं. अपनी प्लेन ड्रेस के साथ रेनबो कलर का मफलर या दुपट्टा ओढ़ें. या सिंपल रेनबो या मल्टी कलर ड्रैस आपके लिए परफेक्ट औप्शन हैं.

4. हुप ईयररिंग्स  करें ट्राय

कलरफुल मल्टी लेयर्ड हुप ईयरिंग्स बॉलीवुड दीवा से लेकर टीवी एक्ट्रेस के बीच ट्रेंडिंग हैं. आप इन्हें एथनिक वियर के अलावा जींस-टॉप के साथ कैरी कर सकती हैं. इससे आपको ग्लैमरस लुक मिलेगा.

5. बच्चों के लिए बाल गाउन ड्रेस

 

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बारिश में बच्चों का कलरफुल लुक बाल गाउन ड्रेस में और निखरता है. इसके साथ फ्लोरल हेयर बैंड और रंग-बिरंगे फुटवियर्स पहनें. फ्रॉक से लेकर गाउन के साथ ब्राइट कलर एसेसरीज भी अच्छी लगती हैं.

 

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6. प्रिंटेड पैटर्न कपड़े हैं मानसून परफेक्ट

हेयर क्लिप का बोज स्टाइल आपको डिफरेंट लुक देगा. साटन से बने कलरफुल क्लिप्स प्रिंटेड पैटर्न में भी अच्छे लगते हैं. अपनी पसंद के अनुसार इसी कलर का फ्लोरल टियारा भी आपकी खूबसूरती बढ़ाने में मदद करेगा.

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मानसून में आप अगर अपने लुक और दिमाग को फ्रेश रखना चाहती हैं तो कलरफुल और प्रिंटेड पैटर्न आपके लुक के लिए परफेक्ट औप्शन है.

Covid 19 और स्ट्रोक का संबंध: स्ट्रोक की समस्या के बीच फसीं युवा आबादी

डॉक्टर Vipul गुप्ता, निदेशक, न्यूरोइंटरवेंशन, अग्रिम इंस्टीट्यूट फॉर न्यूरो साइंसेस, आर्टमिस हॉस्पिटल

कोविड19 के बारे में किए गए कई अध्ध्यनों के अनुसार, यह बीमारी व्यक्ति के फेफड़ों और सांस की नली को बुरी तरह प्रभावित करती है, जिसके कारण मरीज को सांस लेने में परेशानी होने लगती है. लेकिन एक तथ्य से लोग अभी भी वाकिफ नहीं हैं और वह यह है कि यह बीमारी कई मरीजों के मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम को भी गहरा नुकसान पहुंचाती है.

कुछ हालिया अध्ध्यन बताते हैं कि कोविड के 30-40% मरीजों में न्यूरोलॉजिकल यानी कि मस्तिष्क संबंधी समस्या होने का खतरा है. जिन मरीजों को कोरोना के साथ-साथ मस्तिष्क संबंधी समस्या है उनमें से अधिकतर मरीजों को स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्या से गुज़रना पड़ा है. वहीं कुछ मरीजों को बेहोशी की समस्या हुई तो कई मरीजों ने मसल इंजरी की शिकायत भी की. ये सभी समस्याएं सीधा-सीधा नर्वस सिस्टम से जुड़ी हुई हैं. इसके अलावा कोविड के कई मरीजों ने यह भी कहा कि उन्हें सूंघने में समस्या आ रही है, जो एक मस्तिष्क संबंधी समस्या है.

कोरोना के मरीजों को क्यों हो रहा स्ट्रोक?

कोरोना के कई मरीजों को स्ट्रोक की समस्या क्यों हो रही है और इसका मूल कारण क्या है, अबतक इसपर कई अध्ध्यन किए जा चुके हैं. इसका एक कारण यह है कि मरीजों के शरीर में डी-डाइमर नाम के केमिकल की मात्रा ज्यादा हो जाती है, जो खून के थक्कों के लिए जिम्मेदार माना जाता है.

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कोविड स्ट्रोक के लक्षण सामान्य स्ट्रोक से बिल्कुल अलग

विश्वस्तर पर, डॉक्टरों ने कोविड के मरीजों में स्ट्रोक की समस्या पाई, जिसमें इंग्लैंड, अमेरिका और चाइना जैसे देश भी शामिल हैं. हालांकि, कोविड स्ट्रोक के मरीजों में जो लक्षण पाए गए वे सामान्य स्ट्रोक के मरीजों से बहुत अलग थे. स्ट्रोक की समस्या सबसे ज्यादा युवा आबादी, 50-55 की उम्र वाले लोग और सामान्य तौर पर 65-70 की उम्र वाले लोगों में देखने को मिलती है.

कोविड के संक्रमण को हटाकर बात की जाए तो स्ट्रोक के मरीजों में कोई अन्य गंभीर बीमारी होने की संभावना नहीं पाई गई है. स्ट्रोक की समस्या आमतौर पर बुज़ुर्गों में ज्यादा देखने को मिलती है, जो हाइपरटेंशन, डायबिटीज या कोलेस्ट्रॉल आदि जैसी समस्याओं से पहले से ग्रस्त हैं. इसके अलावा यह समस्या उन बुजुर्गों को भी होती है जो धूम्रपान के आदी होते हैं. लेकिन कोविड के कारण युवा आबादी बेवजह स्ट्रोक का शिकार बनी हुई है.

हालांकि, कुछ मरीजों में स्ट्रोक के लक्षण कोविड के लक्षणों से पहले नज़र आ सकते हैं तो वहीं कुछ मरीजों में स्ट्रोक के लक्षण कोविड के निदान के 7-10 दिनों के बाद नज़र आते हैं.

निदान में देर करना  

जबसे लॉकडाउन लगा है, तबसे अस्पतालों में आपातकालीन मामलों में कमी आई है. निदान के लिए सही समय पर पहुंचने वाले मरीजों की संख्या बेहद कम हो गई. यह हाल सिर्फ भारत का ही नहीं बल्कि पूरी विश्व का है.

सोशल डिस्टेंसिंग के कारण बहुत से बुजुर्ग अकेले रह रहे हैं, जिसके कारण उनकी स्ट्रोक की समस्या पर किसी का ध्यान ही नहीं गया. दरअसल, आजकल यदि किसी परिवार में किसी सदस्य में स्ट्रोक के लक्षण नज़र आते हैं तो वे कोरोना के डर से मरीज को अस्पताल ले ही नहीं जाते हैं. अब ऐसे में यदि मरीज सही समय पर निदान नहीं कराएगा तो बाद में किए गए इलाज के परिणाम कुछ खास नहीं होते हैं.

समय पर इलाज ही इसका उचित समाधान है

डॉक्टरों के लिए भी आपातकालीन वाले मरीजों का इलाज करना एक बड़ी चुनौती बन गई है. कुछ मरीज कोरोना से संक्रमित होते हैं लेकिन डॉक्टर इमरजेंसी वाले मरीजों के इलाज में देर नहीं करते हैं.

डॉक्टर विपुल गुप्ता ने इसके बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इस वायरस के निदान के लिए उनकी टीम मरीजों का तत्काल सीटी स्कैन कर रही है. हमारी अनेस्थीलिया की टीम ने एक ऐसी तकनीक बनाई है जो इस वायरस को फैलने से रोकती है.  हम हर तरह से एहतिहात बरत रहे हैं, जहां हम न्यूरोइंटरवेंशन की प्रक्रिया के दौरान सिर्फ मास्क की बजाय रेस्पीरेटर्स और स्क्रीन का इस्तेमाल भी करते हैं. इस प्रकार हम टेस्ट के लिए बिना देर किए इलाज समय पर शुरू कर पाते हैं.

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प्राइवेट सेक्टर में अपनी स्ट्रोक की टीम के लिए चर्तित अग्रिम इंस्टीट्यूट में, इस प्रकार का प्रोटोकॉल अपनाया जाता है, जिसकी मदद से हम आज भी स्ट्रोक के मरीजों का आसानी से इलाज कर पा रहे हैं. हमारी टीम में जाने-माने अनुभवी डॉक्टर शामिल हैं, जिनके द्वारा लिखे गए दिशा-निर्देशों को अंतरराष्ट्रीय जरनल में छापा जा चुका है. ये दिशा-निर्देश कोविड स्ट्रोक के मरीजों के उचित इलाज के बारे में बताते हैं.

Monsoon Special: ठंडाई रखे आपको हैल्दी

बच्चे हो या फिर बड़े सभी ठंडे पेय पदार्थ पीना पसंद करते हैं, क्योंकि ये न सिर्फ प्यास बुझाने का काम करते हैं बल्कि शरीर को ठंडक भी पहुंचाते हैं. ऐसे में अगर घर में हर समय कोल्ड ड्रिंक्स ही चलती रहेंगी तो ये शरीर को नुकसान पहुंचाने का ही काम करेंगी. और साथ ही इससे धीरे धीरे भूख भी खत्म होने लगती है. क्योंकि ये शरीर को भीतर से खोखला बनाने का काम जो करती हैं . ऐसे में आप को परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम आपको एक ऐसी रेसिपी के बारे में बता रहे हैं , जो आपके परिवार की प्यास को भी बुझाने का काम करेगी और साथ ही उन्हें हैल्थी भी रखेगी. और वो है ठंडाई . जिसे हर कोई पसंद करता है और इसे बनाना भी काफी आसान होता है. तो चलो शुरू करते हैं ठंडाई बनाना.

हमें चाहिए

– 5 बड़े चम्मच खसखस
– 5 बड़े चम्मच मगज
– 3 बड़े चम्मच काली मिर्च
– 20 – 25 काजू
– थोड़ा सा केसर

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– 3 बड़े चम्मच सौंफ
– 2 बड़े चम्मच इलाइची
– 20 – 25 बादाम
– थोड़े से पिस्ता
– थोड़ी सी सूखे गुलाब की पत्तियां

बनाने का तरीका

– सबसे पहले एक मिक्सर जार लेकर उसमें सारी चीजों को मिलाकर उस का स्मूद पेस्ट तैयार करें. और फिर इसे ठंडा कर एयर टाईड डिब्बे में रखकर इसे फ्रिज में स्टोर करके रखें. तैयार है आपका ठंडाई मसाला. और फिर जब भी आपको किसी के लिए भी ठंडाई बनानी हो तो आप जितने लोगों के लिए ठंडाई बनानी हो , उस हिसाब से जार में दूध , आइस क्युबेस और ब्राउन शुगर या फिर वाइट शुगर लेकर उसे 1 – 2 बार चलाएं. और फिर एक गिलास दूध में 1 बड़ा चम्मच ठंडाई मसाला डालकर अच्छे से चलाते हुए ऊपर से ड्राई फ्रूट्स से गार्निश करके सर्व करें. ये न सिर्फ पीने में स्वादिष्ट लगता है बल्कि काफी हैल्थी भी होता है.

क्यों है फायदेमंद

– दूध में कैल्शियम , विटामिन डी और जिंक जैसे पौष्टिक तत्व होते हैं , साथ ही ठंडा दूध एंटासिड के तौर पर कार्य करता है, जिससे पेट को ठंडक पहुँचती है, और काफी हद तक एसिडिटी की समस्या से निजात मिलता है.

– सौंफ में एन्टिओक्सीडैंट्स और एंटी इंफ्लैमटोरी गुण होते हैं , जो पेट को ठंडक पहुंचाने के साथ साथ पाचन क्रिया में सुधार लाने का काम करते हैं.

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– खसखस प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम और मिनरल्स से भरपूर होने के कारण जहां शरीर की जरूरतों को पूरा करना का काम करता है, वहीं गैस की समस्या से भी राहत मिलती है.

– ठंडाई में मिले ड्राई फ्रूट्स से शरीर की कमजोरी दूर होने के साथ साथ शरीर को एनर्जी मिलती है. तभी तो कहा जाता है कि रोजाना एक मुठी ड्राई फ्रूट्स से आप रहेंगे हमेशा फिट.

– काली मिर्च एंटी ओक्सीडैंट्स गुणों से भरपूर होने के कारण हमारे इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने का काम करती है. वहीं इससे ब्लड शुगर, कोलोस्ट्रोल कंट्रोल होने के साथ साथ ये कैंसर से भी लड़ने में मददगार होता है.

– केसर में एन्टिओक्सीडेंट प्रोपर्टीज होने के कारण ये हमारे मूड को ठीक करने के साथ साथ हमारे वजन को भी मैंटेन रखता है.

– मगज में प्रोटीन, विटामिन, फैटी एसिड्स, मिनरल्स होने के कारण ये हमारी मैंटल और फिजिकल हैल्थ को इम्प्रूव करने का काम करता है.

– इलाइची में एंटीबैक्टीरियल और एंटी ओक्सीडैंट्स प्रोपर्टीज होती हैं , जिसके कारण ये क्रोनिक डिजीज, कैविटी, इंफेक्शन से बचाता है.

– ड्राई रोज पेटल्स एंटीऑक्सीडैंट्स गुणों से भरपूर होने के कारण ये स्किन क्लींज़र का काम करती है. तो हुई न ठंडाई फायदेमंद.

आखिर तुम दिनभर करती क्या हो

मुझे आज से अधिक सुंदर वह कभी न लगी. उस की कुछ भारी काया जो पहले मुझे स्थूल नजर आती थी आज बेहद सुडौल दिखाई दे रही है. बालों का वह बेतरतीब जूड़ा जिस की उलझी लटें अकसर उस के गालों पर ढुलक कर मेरे झल्लाने की वजह बनती थीं आज उन्हें हौले से सुलझाने को जी चाह रहा था. उस का वह सादा लिबास जिस को मैं कभी फूहड़, गंवार की संज्ञा दिया करता था आज सलीकेदार लग रहा था.

मैं अचंभित था अपनी ही सोच पर क्योंकि मेरे दो बच्चों की मां, मेरी वह पत्नी आज मुझे बेहद हसीन लग रही थी. भले ही आप को यह अतिश्योक्ति लगे पर मुझे कहने से गुरेज नहीं कि वह मुझे किसी कवि की कल्पना की खूबसूरत नायिका सी आकर्षक प्रतीत हो रही थी जिस का रूपसौंदर्य बड़ेबड़े ऋषिमुनियों की तपस्या को भंग करने की ताकत रखता था. आज उसे प्रेम करने की अभिलाषा ने मेरे अंतरमन को हुलसा दिया था.

ऐसा नहीं था कि पत्नी के प्रति विचारों ने पहली बार मेरे दिल पर दस्तक दी थी. 12 वर्ष पूर्व जब छरहरी सुंदर देहयष्टि वाली नंदिनी मेरी संगिनी बनी थी तो मैं अपनी किस्मत पर फूला न समाया था. कजिन की शादी में होने वाली भाभी की सांवलीसलोनी बहन के कमर तक लहराते केशों को देखते ही मैं अपनी सुधबुध खो बैठा था और स्वयं ही मां के हाथों उस के घर विवाह प्रस्ताव भिजवा दिया था.

जिंदगी की गाड़ी बड़ी खुशीखुशी चल रही थी कि दोनों बच्चों के जन्म के बाद उस की प्राथमिकताएं जैसे बदलने लगीं. मेरी बजाय अब वह बच्चों को काफी वक्त देने लगी. अपनी ओर से बेपरवाह हो कर अकसर वह घर के कामों में लगी रहती. धीरेधीरे उस के शरीर में आते परिवर्तन ने भी उस के प्रति मेरी विरक्ति को बढ़ा दिया.

मेरे सारे कार्य वह अब भी सुचारु रूप से किया करती. लेकिन मुझे अब उस में वह कशिश दिखाई न देती और मैं उस से चिढ़ाचिढ़ा सा रहता. घरगृहस्थी के कामों से फुर्सत हो जब रात को बिस्तर पर वह मेरा सानिध्य चाहती तो उस के अस्तव्यस्त कपड़ों से आती तेलमसालों की गंध मुझे बेचैन कर देती और मैं उसे बुरी तरह झिड़क देता.

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अब किसी फंक्शन या पार्टी में भी उसे अपने साथ ले जाने से मुझे कोफ्त होती, क्योंकि अपने दोस्तों की फैशनेबल, स्लिमट्रिम व स्मार्ट बीवियों की तुलना में वह मुझे गंवार दिखाई देती जिसे न कपडे़ पहनने की तमीज थी और न ही सजने का सलीका. कभीकभी मैं उस पर झल्ला पड़ता कि दूसरों की बीवियों को देखो कैसे सजसंवर कर कायदे से रहती हैं और एक तुम हो कि तरीके से कभी बाल भी नहीं बनातीं. आखिर घर पर बैठेबैठे दिनभर तुम करती क्या हो?

अगर मुझे मालूम होता कि तुम इतनी आलसी होगी तो तुम से शादी कर मैं अपनी जिंदगी कभी बर्बाद नहीं करता. मेरी झल्लाहट पर उस की आंखों के कटोरे छलकने को हो आते और उस के होंठों पर चुप्पी की मुहर लग जाती. तब मैं गुस्से से पैर पटकता बाहर निकल जाता और यहां वहां बेवजह भटकता देर रात ही घर में दाखिल होता और वह चेहरे पर बगैर कोई शिकन लाए मेरा खाना गरम कर मुझे परोस देती.

ऐसा नहीं कि उस ने मेरे मुताबिक अपने आप को कभी ढालने की कोशिश नहीं की. लेकिन जब भी वह ऐसा कुछ करती मुझे वह और भी गईगुजरी नजर आती. धीरेधीरे मेरे रवैए से दुखी हो कर उस ने अपने आप को बच्चों की परवरिश व घर की जिम्मेदारियों में समेट लिया और उस के साथ ही शादी को मैं अपनी फूटी किस्मत मान अपने भाग्य को कोसता रह गया.

इसी बीच आया कोरोना

इस बीच कोरोना के कहर से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा उठी. आमजन की सुरक्षा के मध्यनजर सरकार द्वारा लौकडाउन की घोषणा कर दी गई. इसे भी नियति का एक कुठाराघात समझ मैं ने दुखी मन से स्वीकार किया, क्योंकि अब 24 घंटे अपनी फूहड़ पत्नी के साथ उस का चेहरा देखते हुए बिताना था. कुछ दिन यों ही गुजर गए. कुछ देर टीवी देख कर और कुछ देर बच्चों के साथ मस्तीमजाक में मैं अपना वक्त बिताता. यारदोस्तों के साथ मोबाइल पर बात कर के भी मेरा थोड़ा समय बीत जाता.

शाम का वक्त मुझे अपनी मां के साथ बिताना अच्छा लगता. पर उन के ऊपर नंदिनी

ने न जाने क्या जादू कर रखा था कि वे हमेशा उस की तारीफों के पुल बांधा करतीं और मैं अनमना हो कर वहां से उठ कर अपने कमरे में आ जाता जहां रात से पहले नंदिनी का प्रवेश न के बराबर होता.

2 दिन से मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही थी. हलकी हरारत के साथ शरीर में टूटन थी. हालांकि रात को क्रोसिन लेने से बुखार तो फिलहाल ठीक था पर सिर दर्द से जैसे फटा जा रहा था. रात में अच्छे से नींद न आने के कारण भी शरीर निस्तेज जान पड़ता था.

जैसेतैसे फै्रश हो कर मैं ने चाय पी और थोड़ा सा नाश्ता किया. मेरी तबियत खराब जान नंदिनी मेरे सिरहाने बैठ कर मेरा सिर दबाने लगी. न जाने क्यों अरसे बाद उस के हाथों का स्पर्श मुझे बहुत अच्छा लग रहा था या इतने दिनों से घर पर रहने के कारण शायद उस के प्रति मेरा नजरिया बदल रहा था. कारण कोई भी हो, उस की इस जादुई छुवन ने मेरा सिरदर्द काफी हद तक कम कर दिया और कुछ ही देर में मुझे गहरी नींद आ गई. इस वक्त नंदिनी ने मेरा बहुत ध्यान रखा. इस बीच उस के स्नेहसिक्त सामीप्य ने मुझ में जैसे एक नई शक्ति का संचार कर दिया था. उसे सहज रूप से तल्लीनतापूर्वक घर के काम करते देख मुझे अच्छा लगने लगा था.

खुद से हुआ शर्मिंदा

आज शाम कुछ देर पहले अपने दोस्तों से फोन पर मेरी बात हुई थी. आश्चर्य की बात थी उन में से ज्यादातर अपनी पत्नियों से दुखी थे और जल्द से जल्द लौकडाउन के खत्म होने का इंतजार कर रहे थे. वे बता रहे थे कि किस तरह बाईयों के न आने से उन की पत्नियों ने उन का जीना दूभर कर दिया है. घर के ज्यादातर काम उन्हें थमा कर वे स्वयं टीवी या मोबाइल पर अपना पूरा समय बिताती हैं. न समय पर खाना बनता है और न ही बच्चों पर ध्यान दिया जाता है.

उन से बात करतेकरते अचानक मेरी नजर नंदिनी पर जा टिकी जो मेरी मां और बच्चों के साथ हौल में बैठी राजा, मंत्री, चोर, सिपाही खेल रही थी. कभी राजा बन कर वह सब पर हुकुम चलाती तो कभी चतुर मंत्री बन चोर को झट से पकड़ लेती. कभी सिपाही की पर्ची मिलते ही मुसकरा उठती तो कभी चोर बन कर मंत्री को बरगलाने की पूरी कोशिश करती. उस वक्त सभी के खिलखिलाते चेहरे देख कर मेरे मन को कैसा सुकून मिला, मैं बता नहीं सकता.

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थोड़ी देर बाद बच्चे अपनी दादी से कहानी सुनने में व्यस्त हो गए और मेरी नजर चौके में चाय बनाती अपनी पत्नी पर फिर जा टिकी. आखिर उस की गलती ही क्या थी. अपने आप को भूल कर उस मासूम ने मेरे घरपरिवार और बच्चों को संभाला था. मेरी बीमार मां की तनमन से सेवा की थी. अगर उस वक्त मैं ने थोड़ा भी उस का हौसला बढ़ाया होता तो शायद वह आज अपने प्रति भी जागरूक रहती.

हलके पीले रंग के सलवारकुरते में उसे देख मुझे बचपन के अपने घर के बगीचे का ध्यान हो आया. जिस में बने लौन के चारों किनारों पर मांपापा ने सूरजमुखी के पेड़ लगा रखे थे जिन पर लगे बड़े पीले फूल मुझे खासा आकर्षित करते थे. जिन्हें मैं दिनभर इस उत्सुकता से निहारा कराता था कि वे सूरज के जाने की दिशा में ही अपना मुंह कैसे घुमाए जाते हैं. आज मेरे बावरे नयन भी पत्नी का अनुसरण करते उसे निहारने की कोशिश में लगे थे. सोचते हुए अनायास ही मेरे मुख पर मुसकान आ गई.

सब के साथ चाय पीने की लालसा में मैं बालकनी से उठ कर हौल में चला आया. मेरी चोर नजरें अभी भी उस का पीछा कर रही थीं. आडंबर विहीन उस के सादगी भरे सौंदर्य ने मुझे अभिभूत कर दिया था. मुझे अपने ऊपर तरस आ रहा था कि सालों तक उस की इस अंदरूनी खूबसूरती को मैं कैसे न देख पाया, कैसे अपनी सुलक्षणा पत्नी के गुणों को न पहचाना और जानेअनजाने उस के निश्छल हृदय को अपने व्यंग्यबाणों से पलपल बेधता रहा.

आज उन सभी गलतियों के लिए मन ही मन शर्मिंदा हो उस से क्षमायाचना हेतु मैं उठ खड़ा हुआ आने वाले सभी लम्हों को उस के साथ जीने के लिए. लौकडाउन में मिले फुर्सत के क्षणों ने मुझे मेरी जीवनसंगिनी लौटा दी थी और मैं लौटा देना चाहता था उसे उस के चेहरे की वह मुसकान जो मेरी सच्ची खुशी की परिचायक थी.

अब अपना काम खुद करें

टीवी पर चलते, जलते और मिटते मजदूरों को देख कर कंधे न उचकाएं कि हमें क्या. ये एक ऐसी समस्या पैदा कर रहे हैं, जिस का नुकसान देश के पूरे मध्यवर्ग और उस की औरतों को होगा. जब भी गांवों से दलितों और पिछड़ों को भगाया गया और उन्हें शहरों में नौकरियां मिलनी शुरू हुईं उस का सब से बड़ा फायदा शहरी ऊंची जातियों की औरतों को मिला.

एक जमाना था जब शहरों या गांवों की ऊंची ठाकुरों, बनियों और ब्राह्मणों की औरतों को भी दिन में 16-17 घंटे काम करना पड़ता था. उन का काम कभी खत्म नहीं होने वाला था. उन दिनों पिछड़ों को घरों में ही नहीं आने दिया जाता था, तो फिर दलितोंअछूतों की तो बात क्या? पर जैसेजैसे गांवों से पिछड़े और दलित शहर आते गए औरतों के काम कम होते गए. इन्होंने चैन की सांस ली. मर्दों को चाहे खास फर्क नहीं पड़ा पर घरेलू नौकरों और बाइयों की वजह से औरतों की जिंदगी सुधरने लगी. उन के हाथों में कोमलता आने लगी, चेहरों पर लाली फैलने लगी.

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जो धन्नासेठ हैं उन्हें तो छोडि़ए, साधारण 3 कमरों के मकानों में रहने वालों को भी इन शहरों में आए पिछड़ों और दलितों की वजह से फायदा होने लगा. मकानों की उपलब्धता बढ़ गई, क्योंकि मजदूरमजदूरनियां मिलने लगे, बस्तियां बसने लगीं. इन बस्तियों तक सामान पहुंचने लगा, जो इन पिछड़ों द्वारा चलाए ठेलों से पहुंचा और फिर इन की जगह टैंपों ने ले ली. भरपूर दुकानें खुलने लगीं.

घरों में तरहतरह की सुविधाएं मिलने लगीं. आटा पिसापिसाया और पैक किया मिलने लगा, क्योंकि कारखानों में पिछड़े काम करते थे. मशीनें थीं फिर भी इन दलित मजदूरों ने उठाई धरी, ट्रक चलाने का काम ले लिया. मसाले मिलने लगे. कपड़ा मिलें बढ़ने लगीं. तकनीक तो सुधरी पर बाजार इन्हीं की वजह से चलते थे ही, थोक मंडियों में, बाजारों में और मौलों में भी छा गए.

इन पिछड़ों और दलितों की बीवियोंबेटियों ने भी घरों में काम करना शुरू कर दिया. औरतों को झाड़ू लगाने, खाना पकाने और बच्चे पालने से फुरसत मिली. घरों में बढि़या सामान भरने लगा. तरहतरह के बैड आ गए, हर कमरे में सोफा लग गया, एसी, कूलर आ गए, बत्तियां जगमगाने लगीं. हरेक को लगाने वाले तो पिछड़े दलित हैं ही, रखरखाव वाले भी यही लोग हैं.

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शहरों में आनाजाना आसान हो गया. पैदल चलने की जगह पहले रिकशा, फिर औटो, फिर टैक्सी, फिर उबेर, ओला या खुद की ड्राइवर वाली गाड़ी आ गई. औरतों को समय मिला तो उन्होंने पति के साथ काम करना शुरू कर दिया, क्योंकि घर पर कोई और सहायक है. कामकाजी औरतें सासों और मांओं पर ही निर्भर नहीं रह गईं. उन्हें लगातार काम करने वाले मिलते रहे. यही वे लोग थे जो टीवी स्क्रीनों पर, बसों, ट्रेनों, ट्रकों और तपती धूप में सड़कों पर दिखे.

हमारे मध्य व उच्चवर्ग ने इन का खयाल न के बराबर रखा. देशभर में स्लम बन गए, जिन में बिना रनिंग वाटर, बिना फ्लश वाले शौचालयों के 1-1 कमरे के मकान में 10-10,

20-20 को रखा गया. इन का सपना था कि एक दिन ये कमा कर शहरी बाबुओं और मेमसाहबों जैसे बन जाएंगे. इन्हें गुमान था कि ये गांवों की गंदगी, घुटन, गरीबी, भुखमरी से बच कर आ गए हैं. इन को पट्टी पढ़ा रखी थी कि सेवा करो, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में जरूर कुछ लाभ होगा.

न जाने क्यों कोरोना ने इन्हें झकझोर दिया. 24 मार्च से ही लाखों की गिनती में लोग गांवों में लौटने लगे. यह सिलसिला जून तक चल रहा है. लोग पैदल भी चल रहे हैं और ट्रेनों में भरभर कर भी जा रहे हैं. उद्योगों को चलाने वालों के तो हाथपैर फूल रहे हैं कि कारखानों में काम कौन करेगा पर असल मार औरतों पर पड़ सकती है.

अब औरतों को सहायक मिलने कम हो सकते हैं. हो सकता है घरों में बाइयां न मिलें, औटो व टैक्सियां न मिलें. सामान घरों तक आना कम हो जाए या बंद हो जाए अथवा महंगा हो जाए. लौकडाउन के दौरान करोड़ों घरवालियों ने देख लिया है कि बिना बाहरी सहायता के जिंदगी कितनी दुश्वार है. काम के घंटे बढ़ गए. घरों में फुरसत कम हो गई. अर्थव्यवस्था चरमराने लगी है इसलिए आय कम होने लगी और ऊपर से इन हैल्पों की कमी का डर.

अभी तो सभी को लग रहा है कि ये लोग वापस आएंगे पर जिस ढंग से रिवर्स माइग्रेशन हुआ है उस से लगता है इन्हें ठेलठाल कर फिर शहरों में लाना अब मुश्किल होगा. 30-40 साल पहले ये लोग शहरों की ओर भागे थे, क्योंकि खेतों पर काम नहीं था. गांवों में उपज कम थी. अब तकनीक, बिजली, ट्रैक्टरों, पंपों की वजह से गांव भी बेहतर हैं, चाहे 2-3 करोड़ लोग वापस गए हों और लगता है कि वे गांवों में भीड़ पैदा कर देंगे पर देखा जाए तो लाखों गांवों में बिखर जाने वाले ये लोग हर गांव में 100-200 होंगे जो आसानी से खप सकते हैं. इस का मतलब यही है कि हो सकता है कि अगले सालों में शहरी औरतों को छठी का दूध याद आने लगे. हैल्प मिले ही नहीं या बहुत महंगी हो.

औरतों को बहुत सा काम उसी तरह खुद करना पड़ेगा जैसे अमेरिका व यूरोप में करना पड़ रहा है. केवल बहुत अमीर ही बाइयों या मेड्स को रख पाएंगे.

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फिलहाल यह समस्या दिख नहीं रही, क्योंकि शहरियों की खुद की आय कम हो गई है. करोड़ों की नौकरियां चली गई हैं. मध्य व उच्चवर्ग भी पैसे की तंगी की मार झेल रहा है. अभी सारे मकान और सामान खराब नहीं हुआ है पर धीरेधीरे एसी, फ्रिज, कूलर, मोबाइल, लैपटौप खराब होने शुरू होंगे. बिजली के तार सड़ेंगे, बाथरूम फिटिंग खराब होगी, मकानों का रंग काला पड़ेगा, प्लास्टर में क्रैक्स आएंगे.

तब मजदूर मिलेंगे, टैक्नीशियन मिलेंगे, सामान मिलेगा आज गारंटी नहीं. इस सब का खमियाजा औरतों को भुगतना होगा. उन के घरों में कोई नहीं जाएगा. उन की मौजमस्ती पर रोक लगेगी. धर्म ने इस देश की औरतों को पहले से कमजोर कर रखा है, कोरोना का साइड इफैक्ट इन की सांसों को और मुश्किल कर दे तो बड़ी बात नहीं. यह आने वाले कल की तसवीर हो सकती है. ऐसा न हो तो अच्छा है पर होगा तो बड़ी बात न होगी.

पत्नी की सलाह मानना दब्बूपन की निशानी नहीं

मिस्टर कपिल एक इंजीनयर हैं. लोक सेवा आयोग से चयनित राकेश उच्च पद पर हैं. विभागीय परिचितों, साथियों में दोनों की इमेज पत्नियों से डरने, उन के आगे न बोलने वाले भीरु या डरपोक पतियों की है. पत्नियों का आलम यह है कि नौकरी संबंधी समस्याओं की बाबत मशवरे के लिए पतियों के उच्च अधिकारियों के पास जाते समय भी वे उन के साथ जाती हैं.

उच्चाधिकारियों से मशवरे के दौरान कपिल से ज्यादा उन की पत्नी बात करती है. सोसाइटी में कपिल की दयनीय स्थिति को ले कर खूब चर्चाएं होती हैं. वहीं, राकेश ने अपनी स्थिति को जैसे स्वीकार ही कर लिया है और उन्हें इस से कोई दिक्कत नहीं है. असल में, उन्हें पत्नी की सलाह से बहुत बार लाभ हुए. बहुत जगह वह खुद ही काम करा आती. वे सब के सामने स्वीकार करते हैं कि शादी के बाद उन की काबिल पत्नी ने बहुत बड़ा त्याग किया है. वे घर व बाहर के सभी काम ख़ुशी ख़ुशी करते हैं, पत्नी की डांट भी खाते हैं और कभी ऐसा नहीं लगता कि वे खुद को अपमानित महसूस करते हों.

वास्तव में जो पतिपत्नी आपस में अच्छी समझ रखते हैं और मिलजुल कर निर्णय लेते हैं उन के घर में आपसी सामंजस्य और हंसीखुशी का माहौल रहता है. जरूरत इस बात की है कि पति हो या पत्नी, दोनों एकदूसरे की राय को बराबर महत्त्व व सम्मान दें और कोई भी निर्णय किसी एक का थोपा हुआ न हो. यदि पत्नी ज़्यादा समझदार, भावनात्मक रूप से संतुलित व व्यावहारिक है तो  पति अगर उस की राय को मानता है तो इस में पति को दब्बू न समझ कर, समझदार समझा जाना चाहिए.

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इस के विपरीत, महेश और उन की पत्नी का दांपत्य जीवन इसलिए कभी सामान्य नहीं रह पाया क्योंकि उन्होंने अपनी दबंग पत्नी के सामने खुद को समर्पित नहीं किया. उन का सारा वैवाहिक जीवन लड़तेझगड़ते, एकदूसरे पर अविश्वाश और शक करते हुए बीता. इस के चलते उन के बच्चे भी इस तनाव का शिकार हुए.

कई परिवार ऐसे दिख जाएंगे जिन में पति की कोई अस्मिता या सम्मान नहीं दिखेगा और पत्नियां पूरी तरह से परिवार पर हावी रहती हैं. ये पति अपने इस जीवन को स्वीकार कर चुके होते हैं और परिस्थितियों से समझौता कर चुके होते हैं. ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या ये दब्बू या कायर व्यक्ति हैं जिन का कोई आत्मसम्मान नहीं है? या फिर किन स्थितियों में उन्होंने हालात से समझौता कर लिया है और अपनी स्थिति को स्वीकार कर लिया है ? अगर गहन विश्लेषण करें तो इन स्थितियों के कारण सामाजिक, पारिवारिक ढांचे में निहित दिखते हैं. जिन के कारण कई लोगों को अवांछित परिस्थितियों को भी स्वीकार करना पड़ता है.

समाज में एक बार शादी हो कर उस का टूटना बहुत ही  ख़राब बात मानी जाती है. विवाह जन्मजन्मांतर का बंधन माना जाता है. और फिर बच्चों का भविष्य, परिवार की जगहंसाई, समाज का संकीर्ण रवैया आदि कई बातें हैं जिन के कारण लोग बेमेल शादियों को भी निभाते रहते हैं. कर्कशा और झगड़ालू पत्नियों के साथ  पति सारी जिंदगी बिता देते हैं. ऐसी स्त्रियां बच्चों तक को अपने पिता के इस तरह खिलाफ कर देती हैं कि बच्चे भी बातबात पर पिता का अपमान कर मां को ही सही ठहराते हैं और पुरुष बेचारे खून का घूंट पी कर सब चुपचाप सहन करते रहते हैं. समाज का स्वरूप पुरुषवादी है और यदि वह पत्नी की बात मानता है, उस की सलाह को महत्त्व देता है तो परिवार व समाज द्वारा उस पर दब्बू होने का ठप्पा लगा दिया जाता है.

श्रमिक कल्याण विभाग के एक आफिसर की पत्नी ने पति की सारी कमाई यानी घर, प्रौपर्टी हड़प कर, बच्चों को भी अपने पक्ष में कर के गुंडों की मदद से पति को घर से निकलवा दिया और वह बेचारा दूसरे महल्ले में किराए का कमरा ले कर रहता है, कभीकभार ही घर आता है. आखिर,  इस तरह के एकतरफा सम्बंध चलते कैसे रहते हैं?  इतना अपमान झेल कर भी पुरुष क्यों  ऐसी पत्नियों के साथ निभाते रहते हैं?

वास्तव में सारा खेल डिमांड और सप्लाई का है. भारतीय समाज में शादी होना एक बहुत बड़ा आडंबर होने के साथसाथ एक सामाजिक बंधन ज्यादा है. चाहे उस बंधन में प्रेम व विश्वाश हो, न हो, फिर भी उसे तोड़ना  बहुत ही कठिन है. वैवाहिक संबंध को तोड़ने पर समाज, रिश्तेदारों, आसपास के लोगों के सवालों को झेलना और सामाजिक अवहेलना को सहन करना बहुत ही दुखदाई होता है. और एक नई जिंदगी की शुरुआत करना तो और भी दुष्कर होता है. ऐसे में व्यक्ति अकेला हो जाता है और मानसिक रूप से टूट जाता है. बच्चों का भी जीवन परेशानियों से भर जाता है. उन की पढ़ाई, कैरियर सब प्रभावित होते हैं, साथ ही, बच्चे मानसिक रूप से अस्थिर हो कर कई तरह के तनावों का शिकार हो जाते हैं.

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इन परिस्थितियों में अनेक लोग इसी में समझदारी समझते हैं कि बेमेल रिश्ते को ही झेलते रहा जाए और शांति बनाए रखने के लिए चुप ही रहा जाए. जब पति घर में शांति बनाए रखने के लिए चुप रहते है और पत्नी के साथ जवाबतलब नहीं करते तो इस तरह की अधिकार जताने वाली शासनप्रिय महिलाएं इस का भी फायदा उठाती हैं और पतियों पर और ज्यादा हावी होने की कोशिश करने लगती हैं. ऐसी पत्नी को इस बात का अच्छी तरह भान होता है कि यह व्यक्ति उसे छोड़ कर कहीं नहीं जा सकता. अगर पति कुछ विरोध करने की कोशिश करता भी है तो वह उस पर झूठा इलजाम लगाने लगती है. यहां तक कि उसे चरित्रहीन तक साबित कर देती है. .

ऐसी हालत में पुरुष की स्थिति मरता क्या न करता की हो जाती है. इधर कुआं तो उधर खाई. पति को अपने चंगुल में रखना ऐसी स्त्रियों का प्रमुख उद्देश्य होता है. वे घर तो घर, बाहर व चार लोगों के सम्मुख भी पति पर अपना अधिकार और शासन प्रदर्शित करने से बाज़ नहीं आतीं. और धीरेधीरे यह उन की आदत में आ जाता है. स्थिति को और ज्यादा हास्यास्पद बनने न देने के लिए पतियों के पास चुप रहने के सिवा चारा नहीं होता. इसे उन का दब्बूपन समझ कर  उन पर दब्बू होने का ठप्पा लगा दिया जाता है. यह इमेज बच्चों की नज़रों में भी पिता के सम्मान को कम कर देती है और ये औरतें बच्चों को भी अपने स्वार्थ व अपने अधिकार को पुख्ता बनाने के लिए इस्तेमाल करती हैं. समस्या की जड़ हमारे समाज का दकियानूसी ढांचा है जहां व्यक्ति इस संबंध को तोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाता और अपना सारा जीवन इसी तरह काट देता है.

हमेशा केवल स्त्रियों की त्रासदी का जिक्र किया जाता है. कई पुरुषों का जीवन भी त्रासदीपूर्ण होता है, ऐसा ग़लत स्त्री से जुड़ जाने के कारण हो जाता है. ऐसे पुरुषों के प्रति भी सहानुभूति रखनी चाहिए और वैवाहिक जीवन को डिमांड व सप्लाई का खेल न बना कर प्रेम व एकदूसरे के प्रति सम्मान की भावना से पूर्ण बनाना चाहिए.

इस समस्या को दूसरे पहलू से भी देखा जाना चाहिए. एक धारणा बना रखी गई है कि पुरुष हमेशा स्त्री से ज्यादा समझदार होते हैं. समाज ने पारिवारिक, आर्थिक व सामाजिक सभी तरह के निर्णय लेने के अधिकार पुरुष के लिए रिज़र्व कर दिए हैं. जबकि, यह तथ्य हमेशा सही नहीं हो सकता कि पुरुष ही सही निर्णय ले सकते हैं, स्त्री नहीं. जो स्त्री सारा घर चला सकती है, उच्चशिक्षा ग्रहण कर बड़ेबड़े पद संभाल सकती है वह पति को निर्णय लेने में अपनी सलाह या मशवरा क्यों नहीं दे सकती?  कई बार देखा गया है कि स्त्रियां परिस्थितियों को ज़्यादा सही ढंग से समझ पाती हैं और अधिक व्यावहारिक निर्णय लेती हैं. ऐसे में यदि पति अपनी पत्नी की राय को सम्मान देता है, उस के मशवरे को मानता है  तो उस पर दब्बू होने का ठप्पा लगा देना कैसे उचित है.

परिवार में केवल एक के द्वारा लिए गए फैसले एकतरफ़ा और ज़ल्दबाज़ी में लिए गए भी हो सकते हैं. जब कहते हैं कि, पतिपत्नी एक गाड़ी के 2 पहिए हैं तो भला एक पहिए से गाड़ी कैसे चल सकती है? पत्नी को पति की अर्धांगिनी कहा जाता है लेकिन वही अर्धांगिनी अपनी बात मानने को या उस की राय पर विचार करने को कहे तो उसे शासन करना कहा जाता है. अब  वह समय आ गया है कि  दकियानूसी धारणाओं को छोड़ परिवार के निर्णयों को लेने में स्त्री की राय को भी प्राथमिकता दी जाए और उसे पूरा महत्त्व दिया जाए.

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Hyundai #AllRoundAura: बेहतरीन ब्रेकिंग सिस्टम के साथ

हुंडई Aura में आपको मिला है एक शक्तिशाली इंजन, मगर इस से भी जरूरी यह है कि Aura में आपको उतने ही शक्तिशाली ब्रेक्स भी मिलते है. एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (एबीएस) और इलेक्ट्रॉनिक ब्रेक-फोर्स डिस्ट्रिब्यूशन के साथ Aura अगले पहियों में डिस्क ब्रेक और पिछले पहियों में ड्रम ब्रेक के इस्तेमाल से खुद को सुरक्षित रूप से रोकता है. रुकते समय Aura का एबीएस ड्राईवर को फिसलन भरे हालात में भी नियंत्रण देता है, जिस से ड्राइवर आपातकालीन स्थिती में ब्रेक लगाते समय किसी वस्तु से टकराने से बच सकता है .

वैसे तो Aura में सभी सुरक्षा सुविधाएं दी गई है, लेकिन इसके मजबूत ब्रेक यह पक्का करते हैं कि आपको अन्य सुरक्षा सुविधाओं का उपयोग करने की ज़रूरत पड़े ही ना. #AllRoundAura

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बौलीवुड में फिल्म, टीवी सीरियल व वेब सीरीज की शूटिंग को लेकर अनिश्चितता कायम

कोरोना महामारी की वजह से 17 मार्च से फिल्म,टीवी सीरियल व वेब सीरीज की शूटिंग बंद होने के साथ ही बौलीवुड पूरी तरह से ठप्प है. जिसके चलते लगभग पंाच लगभग दिहाड़ी मजदूर गंभीर आर्थिक संकट व भूखमरी के शिकार हो रहे हैं. बौलीवुड से जुड़े तमाम दिहाड़ी मजदूर तो मुंबई छोड़कर अपने अपने गांव जा चुके हैं. कई कलाकार व तकनीशियन भी आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. पर निर्माताओं या सरकार की इस बात की कोई परवाह नही है.
मई माह के दूसरे सप्ताह से फिल्म निर्माताओं ने महाराष्ट् के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे संग बैठक कर अपनी विपत्ति का रोना रोया और स्टूडियो के किराए में छूट आदि की मांग करने के अलावा शूटिंग शुरू करने की इजाजत मांगी.मगर इन निर्माताओं ने सरकार के सामने तकनीशियन या ज्यूनियर डांसर, या स्पाॅट ब्वाॅय सहित किसी भी दिहाड़ी मजदूर की समस्या का रोना नहीं रोया.बहरहाल, महाराष्ट् सरकार के सांस्कृतिक विभाग ने 31 मई की देर शाम सोलह पन्नों की गाइडलाइन्स के साथ फिल्म, टीवी सीरियल व वेब सीरीज की शूटिंग शुरू करने के आदेश जारी कर दिए थे.सरकार की तरफ से गाइड लाइंस जारी किए जाने के 22 दिन बाद भी शूटिंग शुरू नहीं हो पायी है. इसकी मूल वजह यह है कि ‘सिंटा’और‘एफडब्लू वाय सी ई’’ के अनुसार महाराष्ट्र सरकार की गाइड लाइंस में कलाकारों ,तकनीशियन और दिहाड़ी मजदूरों के हितों को नजरंदाज किया गया है.
उधर फिल्म निर्माता संगठनों ने बीस जून से शूटिंग शुरू करने के कृत संकल्प के साथ सरकार की गाइड लाइंस के अनुसार मुंबई में ‘फिल्मसिटी’स्टूडियो के संचालक के पास श्ूाटिंग की इजाजत के लिए कागजी काररवाही पूरी कर ली.मगर निर्माताओं के संगठन ने कलाकारों व कामगारों के हितांे पर ध्यान दिए बगैर ‘सिंटा’ और ‘एफडब्लू वाय सी ई’के सदस्यांे को फोन कर शूटिंग पर आने के लिए आदेश देने शुरू कर दिए.इसी बीच निर्माताओं के संगठन‘इम्पा’ने एक अलग तरह की प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी.

इन हालातों के बीच 22 जून को मंुबई में ‘‘सिंटा’’और ‘‘एफडब्लू वाय सी ई’’से जुड़े लोगो ने ‘‘वच्र्युअल जूम बैठक’’ कर इस मसले पर विस्तृत बातचीत कर कुछ नई गाइड लाइन्स तैयार की.इस बैठक में ‘‘सिंटा’’की तरफ से मनोज जोशी(वरिष्ठ उपाध्यक्ष),अमित बहल(वरिष्ठ संयुक्त सचिव), राजेश्वरी सचदेव(संयुक्त सचिव), राशिद मेहता (कार्यकारणी सदस्य),संजय भाटिया (कार्यकारणी सदस्य) और अयूब खान (कार्यकारणी सदस्य) तथा ‘एफडब्लू वाय सी ई’की तरफ से बी एन तिवारी (अध्यक्ष) व गंगेश्वर श्रीवास्तव(कोषाध्यक्ष) ने हिस्सा लिया.इस बैठक में शूटिंग के वक्त सेट की दिक्कतें,पारिश्रमिक राशि अदा करने की अवधि,शूटिंग करने की समयावधि सहित कई मुद्दो पर गंभीरता से विचार विमर्श किया गया. इसके बाद ‘सिंटा’’और ‘‘एफडब्लू वाय सी ई’’की तरफ से संयुक्त विज्ञप्ति जारी की गयी, जिसमें कहा गया है कि,‘‘हमारे संगठनों ने कलाकारों, तकनीशियनों,वर्करों व अन्य क्राफ्ट से जुड़े लोगों के हितों के संबंध में कई बार निर्माताओं के संगठन‘‘इंडियन फिल्म एंड टीवी प्रोड्यूसस् कौंसिल’’(आईएफटीपीसी )के संज्ञान में लेकर आए,मगर ‘आईएफटीपीसी’की तरफ से कोई स्पष्ट जवाब न आने से भ्रम व अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है. इतना ही नहीं अब निर्माता एकतरफा काम करते हुए हमारे संगठनों से जुड़े कलाकारों व वर्करों को फोनकर शूटिंग के लिए बुला रहे हैं.यह निर्माता ‘कोविड 19’’के आवश्यक सुरक्षा नियमो पर घ्यान देने की भी बात नही कर रहे हैं.’’

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इतना ही नही इस प्रेस विज्ञप्ति में निर्माताओ पर आरोप लगाते हुए कहा गया है-‘‘यह बताते हुए हमें बड़ा अफसोस है कि‘कोविड 19’’महामारी के बीच सरकार द्वारा लाॅक डाउन की घोषणा से पहले अभिनेताओं, कामगारों और तकनीशियनों के हक के कमाए हुए पारिश्रमिक राशि का काफी समय से बकाया राशि,जिसका भुगतान तुरंत करने के लिए सभी निर्माताओं को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए सख्त निर्देशों के बाद भी,निर्माताओं ने अभी भी हमारे सदस्यों की बकाया देय राशि,उनके हक के पैसे नहीं दिए हैं.इसलिए हमारे सभी सदस्यों की पूरी बकाया राशि पुनः शूटिंग शुरू होने से पहले दे देना चाहिए.’’

इसके अलावा ‘‘सिंटा’’और ‘‘एफडब्लू वाय सी ई’’ दोनो ने संयुक्त रूप से निम्न मुद्दों पर हर पक्ष से संज्ञान लेेकर उचित समाधन की मांग भी की है.

‘‘सिंटा’’और ‘‘एफडब्लू वाय सी ई’’की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार यह मुद्दे इस प्रकार हैंः

1-हर दिन सिर्फ आठ घंटे श्ूाटिंग ंके नियम का सख्ती से पालन हो.

2-दैनिक भुगतानः दैनिक रूप से सहभागी अभिनेताओं,तकनीशियनों व श्रमिको को भुगतान दिन के अंत में किया जाए.

3-मासिक भुगतानः कॉट्रेक्ट पर काम कर रहे सभी कर्मचारियों, अभिनेताओं और तकनीशियनों को 30 दिन में भुगतान किया जाए.

3-कंवेयंसः सभी को हर दिन का कंवेयंस (आने-जाने का किराया)दिया जाए.

4-साप्ताहिक छुट्टीः हर हफ्ते एक दिन का साप्ताहिक अवकाश दिया जाए.

5-सरकार के निर्देशों के अनुसार कड़े स्वास्थ्य व सुरक्षा प्रोेटोकॉल का पालन किया जाए.

6-बीमाः ‘‘कोविड -19’’विशेष  कवरेज के साथ स्वास्थ्य और जीवन बीमा.‘कोविड -19’’संक्रमित होकर यदि किसी अभिनेता, श्रमिकां या  तकनीशियनों की मृत्यू हो जाए तो उनके लिए पचास लाख रूपए के  बीमा कवर की मांग.

7-तय पारिश्रमिक राशि में कोई कटौती नहींःकिसी भी अभिनेता,श्रमिक या तकनीशियन के मद से कोई पारिश्रमिक राशि कटौती / छूट नहीं की जाएगी.

8-किसी को भी काम से निकाला न जाएःकिसी भी अभिनेता/ तकनीशियन/ श्रमिक को धनराशि में कटौती न मानने पर न तो उसे परेशान किया जाए और न ही सीरियल से निकाला जाए.

9-इमरजेंसी मेडिकल सुिवधाएँः स्टूडियो और लोकेशन पर एक डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ (नर्स आदि) के साथ सभी उपकरणों से युक्त एक एंबुलेस सेट के बाहर तैनात रहे.

‘‘सिंटा’’और ‘‘एफडब्लू वाय सी ई’’ ने मांग की है शूटिंग शुरू करने से पहले उपर्युक्त मुद्दों पर पूरी स्पष् टता हो जानी चाहिए,जिससे अभिनेता,तकनीशियन,श्रमिक किसी के भी जीवन के साथ किसी भी तरह का जोखिम न हो.‘‘सिंटा’’और ‘‘एफडब्लू वाय सी ई’’अपनी तरफ से किसी के भी जीवन का जोखिम नहीं उठा सकता.

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‘‘सिंटा’’और ‘‘एफडब्लू वाय सी ई’’अपनी तरफ से पिछले डेढ़ माह से इन मुद्दों को उठाते आ रहे हैं,मगर फिल्म निर्माता संगठन और सरकार के कानों पर जूूं नहीं रेंग रही है.सभी अपनी अपनी ठपली अपना अपना राग अलापने में लगे हुए हैं.

मोहसिन खान के एक्टिंग करियर के 6 साल पूरे, ‘नायरा’ के ‘कार्तिक’ ने ऐसे मनाया जश्न

टीवी के पौपुलर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ (Ye Rishta Kya Kehlata Hai) की शूटिंग दोबारा शुरू होने का इंतजार फैंस बेसब्री से कर रहे हैं. इसी बीच फैंस का दिल जीतने वाले कार्तिक यानी मोहसिन खान (Mohsin Khan) को इंडस्ट्री में 6 साल पूरे हो गए हैं. हाल ही में टीवी की दुनिया में पौपुलर एक्टर्स में से एक मोहसिन खान नें 6 साल के अपने करियर का जश्न  अपने फैंस के साथ मनाया, जिसकी फोटोज सोशलमीडिया पर शेयर की. आइए आपको दिखाते हैं मोहसिन (Mohsin Khan) के फैंस के साथ औनलाइन सेलिब्रेशन की खास फोटोज…

फैंस के साथ मिलकर मोहसिन खान ने मनाया जश्न

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इंडस्ट्री में 6 साल पूरे होने की खुशी का जश्न मोहसिन खान (Mohsin Khan) ने अपने खास फैंस के साथ मनाते हुए लाइव चैट के जरिए अपने फैंस से बात की. वहीं सोशल मीडिया पर पूरे दिन फैंस मोहसिन खान (Mohsin Khan) की फोटोज का कोलाज बनाकर शेयर करते रहे.

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मोहसिन खान के खास दोस्त ने भेजा ये तोहफा

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सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ के कोरियोग्राफर हिमांशु गडानी ने भी मोहसिन खान (Mohsin Khan) के नाम एक खास तोहफा भेजा. इसी बीच अपने फैंस और दोस्तों का प्यार देखकर मोहसिन खान (Mohsin Khan) खुशी से फूले नहीं समा रहे थे.

फैंस ने मोहसिन खान को भेजे कई कार्ड

 

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6 साल पूरे होते ही मोहसिन खान (Mohsin Khan) के फैंस ने उन्हें ढेर सारे खूबसूरत कार्ड्स भी भेजे. इसी के साथ मोहसिन खान ने अपनी मम्मी पापा की एनिवर्सरी भी मनाते हुए नजर आए.

सोशलमीडिया पर फैंस करते हैं वीडियो शेयर

‘लव बाय चांस’ से एक्टिंग की दुनिया में कदम रखने वाले मोहसिन खान (Mohsin Khan) की शिवांगी जोशी (Shivangi Joshi) संग वीडियो अक्सर सोशलमीडिया पर वायरल होती रहती हैं, जिसे फैंस काफी पसंद करते हैं.

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बता दें, सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ की शूटिंग जल्द शुरू होने वाली है, जिसके चलते स्टार्स का अपने लुक और स्टोरी पर काम करना शुरू कर दिया है. वहीं अब देखना है कि लौकडाउन के बाद शो के ट्रैक में क्या क्या बदलाव आएंगे.

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