#lockdown: कोरोनावायरस महामारी का दूसरा चक्र जल्द

वर्ल्ड हेल्थ और्गेनाइजेशन की यह बात कि, नोवल कोरोना वायरस से लड़ाई लंबी चलेगी, सही प्रतीत होती है क्योंकि अब भारतीय वैज्ञानिकों ने कह दिया है कि जुलाई के अंत या अगस्त में भारत में कोरोना वायरस का दूसरा दौर सामने आ सकता है. वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि मौनसून के दौरान संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़ सकती है.

इसी बीच, अमेरिकी वैज्ञानिकों का कहना है कि वायरस पर सूर्य की सीधी किरणों का शक्तिशाली प्रभाव पड़ता है, जिससे उम्मीद है कि दुनियाभर में क़हर बरपा करने वाली कोविड-19 महामारी का प्रसार तेज गरमी में कम हो जाएगा.

भारत के शिव नादर विश्वविद्यालय के गणित विभाग के सह प्राध्यापक समित भट्टाचार्य कहते हैं कि कोरोना वायरस से उभरी महामारी का दूसरा दौर जुलाई अंत या अगस्त में मौनसून के दौरान देखने को मिल सकता है. हालांकि, उनका यह भी कहना है कि शीर्ष पर पहुंचने का समय इस बात पर निर्भर करेगा कि हम उस समय सामाजिक दूरी को किस तरह नियंत्रित करते हैं. बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के प्राध्यापक राजेश सुंदरेसन भी समित भट्टाचार्य की बात से सहमत हैं.

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वैज्ञानिक राजेश सुंदरेसन कहते हैं कि जब हम सामान्य गतिविधि के दौर में लौटेंगे, उस वक्त ऐसी आंशका रहेगी कि संक्रमण के मामले एक बार फिर बढ़ने लगें. भट्टाचार्य कहते हैं कि जब तक बाजार में कोरोना की वैक्सीन आती है उस समय तक हमें चौकस रहना होगा. वे कहते हैं कि ध्यान रखिए कि मानसून के महीने हमारे देश में अधिकतर स्थानों पर फ्लू के मौसम के महीने भी होते हैं, इसलिए हमें फ्लू के शुरुआती लक्षणों को बिलकुल भी अनदेखा नहीं करना है.

बेंगलुरु और मुंबई को प्रतिरूप मानकर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर भारत में देखने को मिलेगा और जन स्वास्थ्य का खतरा इसी प्रकार उस समय तक बना रहेगा जब तक कि मामलों का आक्रामक तरीके से पता लगाने, स्थानीय स्तर पर उन्हें रोकने और पृथक करने के लिए कदम न उठाए जाएं और साथ ही, नए संक्रमण को आने से रोका न जाए.

उधर, अमेरिकी वैज्ञानिकों का कहना है कि सूधे सूरज की धूप पड़ने से कोरोना वायरस बहुत तेज़ी से मर जाता है. हालांकि, अभी तक इस अध्ययन को सार्वजनिक नहीं किया गया है, इसलिए कि अभी इसके और अधिक नतीजों के मूल्यांकन का इंतज़ार है.

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अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग के विज्ञान और प्रौद्योगिकी सलाहकार विलियम ब्रायन का कहना है कि अमरीकी वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया है कि वायरस पर सूर्य की सीधी किरणों का शक्तिशाली प्रभाव पड़ता है, जिससे उम्मीद है कि दुनियाभर में क़हर बरपा करने वाली इस महामारी का प्रसार गरमी में कम हो जाएगा.

वे कहते हैं कि अब तक का हमारा सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन यह है कि सूरज की किरणें कोविड-19 को मार देती हैं, वायरस सतह पर हो या हवा में. हमने तापमान और आर्द्रता दोनों के साथ समान प्रभाव देखा है. तापमान और आर्द्रता दोनों आमतौर पर वायरस के लिए घातक हैं.

 

#lockdown: कोरोना के खौफ के बीच जब अमिताभ बच्चन के घर में घुसा चमगादड़

पूरा विश्व कोरोना के कहर से जूझ रहा है. शुरू से ही यह खबर आ रही थी कि यह वायरस चमगादड़ से फैला है. ऐसे में अब अगर किसी के घर चमगादड़ आ जाए और भगाए न भागे तो समझिए डर के मारे कितना बुरा हाल होगा.

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) ने दुनियाभर में फैले कोरोना वायरस के खौफ के बीच एक ‘ब्रेकिंग न्यूज’ ट्विटर पर शेयर की. उन्होंने सोशल मीडिया अकाउंट के जरीए बताया कि एक चमगादड़ उन के घर में घुस गया.

सोशल मीडिया पर दी जानकारी

अमिताभ बच्चन ने ट्वीट किया,”ब्रेकिंग न्यूज… इस घंटे की खबर, एक बैट, हां एक चमगादड़ अभी मेरे कमरे जोकि जलसा के तीसरे फ्लोर पर है, आ गया. इस जगह हम सभी बैठते हैं.” बिग बी ने आगे लिखा कि उसे पहले कभी नहीं देखा गया. हमारा ही घर मिला उसे. कोरोना तो पीछा छोड़ ही नहीं रहा. उड़उड़ के आ रहा है, कमबख्त… बौलीवुड स्टार के इस पोस्ट को शेयर करने के बाद उन के फैंस ने कमैंट्स करने शुरू कर दिए. फैंस ने उन्हें सुरक्षित रहने के लिए कहा.

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बिग बी ने अभी हाल ही में कोरोना वायरस की जागरूकता फैलाने के लिए एक शौर्ट फिल्म में भी काम किया है. फिल्म में उन के साथ प्रियंका चोपड़ा, रणबीर कपूर, रजनीकांत, आलिया भट्ट जैसे सुपरस्टार्स भी थे. यह शौर्ट फिल्म एक घर में फिल्माई गई थी. वैसे बिग बी, विशेषज्ञों ने कहा है कि चमगादड़ एक आम प्राणी की तरह ही हैं और इन से डरने की जरूरत नहीं है. कोरोना वायरस इंसानों से इंसान में फैलने वाला वायरस है. बाकी तो आप खुद ही समझदार हैं.

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ऐसा लगा है कि मुझे थोडा ग्लैमर अडॉप्ट करना चाहिए– पायल घोष

बीबीसी टेलीफिल्म शार्प्स पेरिल से अभिनय क्षेत्र में उतरने वाली अभिनेत्री पायल घोष (Payal Ghosh) ने 17 साल की उम्र में अपने माता-पिता को बताये बिना कोलकाता से मुंबई आ गयी और अपने रिश्तेदार के यहाँ रहने लगी. प्रदीप घोष और अजंता घोष के घर में जन्मी पायल को बचपन से ही अलग-अलग तरह के एक्टिंग आईने के सामने खड़ी होकर करना पसंद था, इसमें साथ दिया उसके दोस्तों और कजिन्स ने, जिन्होंने हमेशा उसे अभिनय के क्षेत्र में कोशिश करने की सलाह दी. मुंबई आने के बाद पायल ने एक्टिंग का कोर्स किया और वही से काम मिलने लगा. फिल्म पटेल की पंजाबी शादी पायल घोष (Payal Ghosh) की हिंदी फिल्म है, जिसमें उसके काम की काफी सराहना मिली. हिंदी के अलावा पायल ने तमिल, तेलगू और कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया है. हंसमुख और शांत स्वभाव की पायल लॉक डाउन में कई फिल्मों को देखना और वेब सीरीज के स्क्रिप्ट पढ़ रही है, उनसे बात करना रोचक था, पेश है अंश.

सवाल-फिल्मों में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

एक्टिंग का ख्याल मुझे कभी आया नहीं था, क्योंकि मेरा परिवार बहुत कंजरवेटिव है. हिंदी फिल्में देखना बहुत पसंद था. मैं माधुरी दीक्षित की फिल्में देखना पसंद करती थी. उनकी हर बात मुझे अच्छी लगती है. 17 साल की होने पर कुछ अलग करने की इच्छा हुई, क्योंकि हमारे परिवार में लड़कियां थोड़ी बड़ी हो जाने पर शादी कर दी जाती है. मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी और 12 वीं कक्षा की परीक्षा देने के बाद मैं मुंबई अपनी कजिन के पास आ गयी. मैंने किसी को बताये बिना ही मुंबई आ गयी थी, क्योंकि मैं दिखने में सुंदर थी और मेरी शादी हो जाएगी, ऐसा सोचकर मैंने कोलकाता से भागने का प्लान कजिन के साथ मिलकर किया. मैं दिखने में अच्छी हूं, इसका पता मुझे स्कूल के दिनों से ही लग गया था. मुझे स्कूल में 700 से 800 कार्ड्स वेलेंटाइन डे पर मिलते थे. कजिन्स पैसे लेकर मैंने फ्लाइट की टिकट ली और रात को जब सब सो रहे थे मैं दबे पाँव घर से निकल गयी और मुंबई अपने रिश्तेदार के पास आ गयी. किसी को भी पता नहीं चला था. सब मुझे कोलकाता में ढूंढ रहे थे, मुंबई पहुंचकर मैंने घरवालों को बताया. सभी के लिए ये न्यूज़ शाकिंग थी. पिता ने 6 महीने तक मुझसे बात भी नहीं की थी. असल में मेरी माँ बचपन में गुजर चुकी है, पिता ने ही हम दो बहनों को बड़ा किया है. वे कोलकाता कंस्ट्रक्शन से जुड़े हुए है.

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इसके बाद मैंने किशोर नमित की एक्टिंग क्लासेज ज्वाइन किया और उसके तुरंत बाद मुझे बीबीसी की टेलीफीचर फिल्म मिल गयी थी. छोटी भूमिका थी, पर सबने पसंद किया. इसके बाद मुझे तेलगू फिल्म मिली, इस तरह से मेरा कैरियर शुरू हो गया.

सवाल-आपका संघर्ष कितना रहा?

मुझे अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा, क्योंकि आते ही मैंने एक्टिंग क्लास ज्वाइन कर लिया था, इससे मुझे 8 दिनों के अंदर पहला प्रोजेक्ट मिल गया था, इसके बाद साउथ की फिल्म ‘प्रायानम’ मिली. मैं इस विषय पर अपने आप को लकी मानती हूं. मैं अपने दोस्त के साथ ऑडिशन देखने गयी थी और निर्देशक को मैं पसंद आ गयी और मुझे काम मिल गया. उसके बाद काम मिलता गया. अभी पिता भी मेरे काम से बहुत खुश है.

सवाल-ग्लैमर इंडस्ट्री के बारें में आपकी सोच पहले से कितनी बदली है?

पहले मैंने सुना था कि इंडस्ट्री में लोग अच्छे नहीं होते, लकिन जब मैंने साउथ में काम करना शुरू किया मुझे किसी भी प्रकार की समस्या नहीं आई. पहली फिल्म हिट होने के बाद काम मिलना शुरू हो गया. साउथ में एक्टर्स को बहुत अधिक मान दिया जाता है. मैंने काम के साथ-साथ अपनी पढाई भी पूरी की है. पढाई पूरी करने के बाद मैं मुंबई पूरी तरह से शिफ्ट हो गयी हूं.

सवाल-फिल्मों में इंटिमेट सीन्स करने में आप कितनी सहज है?

मेरा परिवार अभी भी मुझे शोर्ट ड्रेस में देखना पसंद नहीं करता. छोटे हो या बड़े सभी सदस्यों को ऐतराज होता है, पर मैं सबकुछ पहनती हूं. मैंने अभी तक कोई ग्लैमर एक्टिंग नहीं की है. अभी मैंने कुछ बोल्ड शूट एक मैगज़ीन के कवर के लिए किया है और ये मेरा पहला असाइनमेंट है. मैंने पहले ऐसी किसी भी फिल्म में ऐसे रिविलिंग शूट नहीं किया, इसके बाद से मुझे ऐसा लगा है कि थोडा ग्लैमर मुझे अडॉप्ट करना है. हमेशा घरेलू अभिनय करना ठीक नहीं, थोडा बोल्ड होना पड़ेगा, क्योंकि इससे अलग-अलग भूमिका करने का मौका मिलेगा. वेब सीरीज मैंने अभी तक नहीं किये है, क्योंकि पहले वेब सीरीज में इंटिमेट सीन्स और स्किन शो अधिक था, लेकिन अब उसमें भी काफी परिवर्तन आया है. आजकल कांसेप्ट पर अधिक जोर दिया जा रहा है. सब लोग इसे देख सकते है. आगे कई वेब सीरीज करने वाली हूं.

सवाल-कोई प्रोजेक्ट मिलने पर उसकी तैयारी कैसे करती है?

मैं सबसे पहले स्क्रिप्ट अच्छी तरह से पढती हूं. उर्दू के मेरे गुरु है, जो मुझे एक्सेंट सिखाते है. मेरे संवाद की प्रैक्टिस करती हूं. मैं मैथड एक्टर नहीं हूं, इसलिए मुझे अधिक प्रैक्टिस करनी पड़ती है. बंगाली होने की वजह से मुझमें बंगाली एक्सेंट है, इसलिए उसे अच्छी तरह से हटाती हूं, ताकि संवाद ओरिजिनल लगे. एक्टिंग मैं अधिक प्रैक्टिस नहीं करती.

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सवाल-बांग्ला फिल्म नहीं किया, इसकी वजह क्या रही?

मैंने बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री से काम नहीं किया है, इसलिए वहां के लोगों को जानती नहीं  और किसी ने आजतक कोई ऑफर भी नहीं दिया अगर मौका मिला तो अवश्य बांग्ला फिल्म करुँगी. मेरे पिता भी चाहते है कि मैं बंगाल के लिए कोई फिल्म करूँ.

सवाल-बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री की रौनक कम हो गयी है, अभी वहां पर स्टार फैक्टर भी नहीं है, इसकी वजह क्या मानती है?

बचपन में मैंने सुचित्रा सेन और उत्तमकुमार की फिल्में देखी है. पहले बांग्ला फिल्म बनती थी और लोग उसकी कॉपी हिंदी में करते थे. अब वे हिंदी कि कॉपी करने लगे है. असल में बांग्लादेश के मार्केट को पकड़ने के लिए वे अपनी सोच में फर्क करने लगे है, इससे ओरिजिनल कहानियां अब नहीं रही और इसे इंडस्ट्री भुगत रही है. सत्यजीत रे की फिल्म आज भी मैं देख सकती हूं.

सवाल-इस समय क्या-क्या कर रही है?

मैं फिल्में देखती हूं, जो मुझे बहुत पसंद है. कुछ नयी कांसेप्ट देखना पसंद करती हूं. खाना बनाना पड़ता है. यही सब चल रहा है.

सवाल-क्या कोई ड्रीम प्रोजेक्ट है?

रविन्द्रनाथ टैगोर की कहानी ‘चारुलता’ जिसे सत्यजीत रे ने बांग्ला में बनायीं थी. उसे कोई हिंदी में बनाये और मैं उसमें अभिनय करने की इच्छा रखती हूं.

सवाल-आपके सपनो का राजकुमार कैसा हो?

मुझे समझने वाले, अच्छी बातचीत करने वाले, सम्मान देने वाले, शिक्षित, प्रेजेंटेबल आदि होने चाहिए.

सवाल-लॉक डाउन में मेसेज क्या देना चाहती है?

मैं सभी नागरिकों से कहना चाहती हूं कि सभी लोग जो हमारी हिफाजत के लिए बाहर इस समय काम कर रहे है, जिसमें हेल्थ वर्कर्स, पुलिस और सफाई कर्मी सभी शामिल है. उनकी मेहनत को समझे और घर पर रहकर उनकी समस्या को न बढायें. उनको मारे पीटे नहीं, उनका सम्मान करें.

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#coronavirus: क्या होगा जब उठेगा लॉकडाउन का पर्दा ?

परेशानियां अब धुंधली हो गयी हैं और दिल की धड़कनें तेज.जी,हां लॉकडाउन के खत्म होने का इंतजार हर गुजरते दिन के साथ बढ़ते हुए रोमांच का पर्याय बन गया है.करोड़ों भारतीयों के दिलो-दिमाग में 4 मई 2020 एक नई मंजिल, एक नई उपलब्धि,एक नई सुबह बनकर आने जा रही है.क्योंकि कम से कम अभी तक तो बहुत से लोगों के दिल में यही विश्वास है कि 4 मई या उसके बाद का हिंदुस्तान वैसा नहीं होगा,जैसा 24 मार्च 2020 के पहले था.लेकिन ये बदलाव कैसे अपनी शक्ल इख्तियार करेगा,रोजमर्रा की जिंदगी में यह कैसे व्योहारिकता का  जामा पहनेगा.इस सबको लेकर लोगों के मन में सैकड़ों सवाल हैं.अनगिनत हां और न हैं , मसलन-

-क्या मई और जून की आग बरसाती गर्मी के दिनों में भी स्कूल कॉलेज खुलेंगे ?

– क्या 4 मई के बाद मास्क व सोशल डिस्टेंसिंग हमारी जिंदगी का परमानेंट हिस्सा हो जायेंगी ?

-क्या वर्चुअल क्लासरूम का प्रयोग सिर्फ लॉकडाउन के दिनों भर के लिए था या अब पढ़ाई का नियमित हिस्सा बन जाएगा ?

-वर्क फ्रॉम होम का क्या होगा ?

-क्या लॉकडाउन के बाद फिर से लोग पहले की तरह दफ्तर जा सकेंगे ?

-क्या मुंबई लोकल की ठसाठस भीड़ वाले दिन फिर से लौटेंगे या अब यह इतिहास बन  जायेगी ?

-मेट्रोज की नाईट लाइफ का क्या होगा, क्या लॉकडाउन के बाद ये फिर से पहले की तरह हो पायेगी ?

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न जाने ऐसे कितने सवाल हैं जो करीब सवा महीने की तालाबंदी के खुलने से आ जुड़े हैं.ऐसा नहीं है कि ये सवाल महज हिंदुस्तानियों की कल्पना का हिस्सा हैं. दुनिया के कई देशों में लॉकडाउन खुल गया है और वहां लॉकडाउन के बाद की जिंदगी में जो तमाम अप्रत्याशित बदलाव् हुए हैं ,उनकी बिना पर भी ये तमाम अटकलबाजियां हो रही हैं. लॉकडाउन को लेकर हिंदुस्तानियों की इस ऊहापोह में इनका भी बहुत योगदान है.मसलन डेनमार्क में अप्रैल के दूसरे पखवाड़े में खुल चुके लॉकडाउन के बाद स्कूलों में बच्चों को क्लासरूम में एक दूसरे से कम से कम छह फुट की दूरी पर अलग अलग डेस्क में बिठाया जा रहा है.भारतीय माँ-बाप को यह देखकर चिंता हो रही है कि क्या भारत में भी यह व्यवस्था लागू होगी,जहां आम स्कूलों के एक क्लास रूम में औसतन 50-60 बच्चे बैठते हैं ?

पब्लिक स्कूलों में पढने वाले बच्चों के मां-बाप यह देख और पढ़कर सोचते हैं कि अगर उनके बच्चों के स्कूलों में भी यही सब लागू होता है तो कहीं उनसे इसकी कीमत तो नहीं वसूली जायेगी ?  क्योंकि भारत के अधिकांश पब्लिक स्कूलों में भी बुनियादी किस्म के ही क्लासरूम होते हैं.यहां भी कुछ ख़ास स्कूलों को छोड़कर बस काम चलाऊ बैठने की ही व्यवस्था होती है.विदेशों में जहां लॉक डाउन खुला है,वहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट में काफी हद तक सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर सवारियों को बैठाया जा रहा है .लेकिन हिन्दुस्तान में सार्वजनिक वाहनों में तो हर सवारी के लिए सीट तक उपलब्ध नहीं होती.बसें हों या ट्रेन हिन्दुस्तान में आम चीजें हमेशा भीड़ का शिकार रहती हैं.

ऐसे में आम भारतीयों की यह स्वाभाविक चिंता है कि सार्वजनिक वाहनों में सोशल डिस्टेंसिंग कैसे पूरी होगी. हालांकि भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर किसी फैक्ट्री में किसी को कोरोना संक्रमण होता है तो इसके लिए फैक्ट्री मालिक के विरुद्ध एफआईआर नहीं दर्ज की जायेगी. मगर स्कूलों के संबंध में अभी तक कुछ स्पष्ट नहीं कहा गया है.ऐसे में यह डर और आशंका स्वाभाविक है कि अगर कोई बच्चा किसी स्कूल में संक्रमित हो जाता है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? साथ ही क्या किसी बच्चे के संक्रमित होने के बाद भी स्कूल खुला रह पायेगा? या इस तरह की घटना के बाद एक बार फिर से स्थाई रूप से बंद हो जाएगा ? ये तमाम ऐसे सवाल हैं जो बच्चों के मां-बाप को जितना परेशान कर रहे हैं,उससे कहीं ज्यादा स्कूल प्रबंधकों को परेशान किये हैं .

जहाँ तक भारत के कारपोरेट सेक्टर की बात है तो वह भी इस लॉकडाउन  के खुलने के सवाल से कई तरह की उलझन से घिरा है.भारत में आमतौर कारपोरेट सेक्टर जब कर्मचारियों के बारे में सोचता है तो उसके जेहन में वेतन, प्रमोशन कार्यस्थल पर विवाद और यौन उत्पीड़न संबंधी गाइडलाइन जैसी बातें ही आती रही हैं.लॉकडाउन जैसी समस्याओं से निपटने का भारतीय कार्पोरेट सेक्टर का अभी तक कोई अनुभव नहीं रहा.लेकिन 4 मई के बाद उसके सामने सोचने के लिए कई सवाल और उनके जवाब ढूँढने की गंभीर जिम्मेदारी होगी.मसलन अब हिंदुस्तान का कार्पोरेट सेक्टर अपने कर्मचारियों को परिवहन सुविधा उपलब्ध कराये जाने के सवाल से बचा नहीं सकता न ही इसे वैकल्पिक मानकर चल सकता है.

क्योंकि कोरोना को लेकर जिस तरह के हालात फिलहाल पूरी दुनिया में हैं,उससे एक बात तो तय है कि यह इतनी जल्दी नहीं जाने वाला.वैसे भी दुनिअभर के विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अगर अगले कुछ महीनों में वैक्सीन बन जाती है उस स्थिति में भी कम से कम से दुनिया को इससे छुटकारा पाने में 2 साल लगेंगे. ऐसे में कम्पनियों को अपने कर्मचारियों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करने के लिए वाहन उपलब्ध कराना ही पड़ेगा.इससे कंपनियों की जहां लागत बढ़ेगी वहीँ एक अतिरिक्त जिम्मेदारी भी बढ़ेगी.हालांकि इसका एक फायदा भी होगा,वह यह कि कर्मचारियों की उपस्थिति ज्यादा और समय पर हो जायेगी.लेकिन बड़ी बात यह है कि देश के कार्पोरेट सेक्टर के लिए और वहां काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह एक अनिवार्य रूपसे से हासिल किया जाने वाला नया अनुभव होगा इसलिए कुछ दिन दोनों को असहज करेगा.

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एक और समस्या जो आगामी 4 मई के बाद आने वाली है,वह है हमारे कार्यस्थलों की बनावट.अभी तक फंडा यह होता रहा है कि कम से कम जगह को ज्यादा से ज्यादा उपयोग के लायक बनाया जाय.पुरानी दिल्ली के कई इलाकों में तो चमत्कारिक तरीके से 10×10 फिट के ऑफिस में भी 10 लोगों के बैठने के लिए लोग चमत्कारिक आर्किटेक्ट का सहारा लेते रहे हैं.मुंबई में तो खोली में सोने के लिए तक इस तरह के ज्यामितीय कौशल का सहारा लिया जाता रहा है.लेकिन कोरोना संकट या कोरोना अनुभव के बाद सोशल डिस्टेंसिंग इतना वजनदार शब्द बन गया है कि इस तरह के तमाम कौशल अब अपराध की श्रेणी में गिने जायेंगे. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि 4 मई के बाद हमारे कार्यस्थलों की रूपरेखा किस करवट बैठेगी,यह बात भी मायने रखेगी.इन तमाम मसलों में सबसे ज्यादा कम्पनियों के उन एचआर विभागों को दो चार होना पड़ेगा जिनका अब तक कौशल कर्मचारियों को हर तरह की सुविधाओं से वंचित करना रहा है.लेकिन भविष्य में यानी 4 मई के बाद उनका यह कौशल संस्थान के लिए बहुत बड़ी समस्या बन सकता है.

4 मई के बाद सिर्फ सेवा पाने और देने के मामले में ही जबर्दस्त बदलाव की अपेक्षा नहीं है बल्कि हमारे स्वैच्छिक क्रिया-कलापों,आस्थाओं और विश्वासों पर भी गजब का बदलाव देखा जाना संभव होगा.मसलन समाजशास्त्रियों से लेकर मनोविदों तक का यह अनुमान है कि आने वाले दिनों में धार्मिकस्थलों में लोगों की मौजूदगी घट जायेगी.धर्म का बड़े पैमाने पर वर्चुअलाइजेशन होगा.लोग घरों से ही बड़े बड़े मशहूर मंदिरों की सैर करना चाहेंगे.आस्था का यह एक नया रूप और विश्वास की यह एक बिलकुल नई जमीन होगी.इसलिए भविष्य के धार्मिक साहित्य में कई चमत्कार वर्चुअल घटनाओं के खाते में जायेंगे.कुल मिलाकर 4 मई को लॉकडाउन खुलने के बाद हमारी दुनिया हमें ठीक वैसी ही नहीं मिलेगी, जैसी कि हमने 24 मार्च 2020 को छोड़ी थी.

#lockdown: चटनी के साथ सर्व करें मूंग दाल परांठा

अगर आप भी पराठों की शौकीन हैं और अपने घर पर अलग-अलग पराठों की रेसिपी ट्राई करती हैं तो ये रेसिपी आपके बहुत काम की है. मूंग दाल परांठे का नाम तो आपने सुना होगा और क्या पता खाया भी होगा, लेकिन क्या आपने कभी इसकी रेसिपी घर पर ट्राय की है. अगर नहीं तो आप ये रेसिपी के जरिए आसानी से मूंग दाल परांठा बना पाएंगी.

हमें चाहिए

गेंहू का आटा- 2 कप

मूंग दाल- ½ कप

नमक- ½ टी स्पून

तेल- 4 टेबल स्पून

हरा धनिया- 3 टेबल स्पून

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अदरक- ½ इंच

हरी मिर्च- 2 बारीक कटी हुई

हींग- ½ चुटकी

जीरा- ¼ टी स्पून

लाल मिर्च पाउडर- ¼ टी स्पून

हल्दी पाउडर- ¼ टी स्पून

धनिया पाउडर- ¾ टी स्पूप

गरम मसाला- ¼ टी स्पून

बनाने का तरीका

– मूंग दाल स्टफ्ड परांठा बनाने के लिए सबसे पहले आटा तैयार कर लीजिए. आटा तैयार करने के लिए एक प्याले में 2 कप गेहूं का आटा, ½ छोटी चम्मच नमक,1 छोटी चम्मच तेल डाल कर सभी चीजो को मिला कर थोड़े-थोड़े पानी से आटा गूंथ लीजिए. इतने आटे को गूंथने के लिए हमने एक कप पानी लिया था जिसमें से 1 बड़ी चम्मच पानी बच गया. आटा गूंथ जाने के बाद आटे को 20 मिनट के लिए सेट करने रख दीजिए.

मूंग दाल स्टफिंग के लिए

– स्टफिंग बनाने के लिए ½ कप मूंग दाल को 2 घन्टे पानी में भिगो कर रख दीजिए. 2 घन्टें बाद दाल को मिक्सर में पीस लीजिए(दाल को पीसते समय उसमें पानी बिल्कुल नही डालना है और दाल को दरदरा पीसना है).

– दाल के पिस जाने के बाद एक पैन ले लीजिए और उसे 2 बड़े चम्मच तेल डाल कर तेज आंच पर गर्म कर लीजिए. तेल गर्म हो जाने के बाद इसमें ¼ छोटी चम्मच जीरा, ½ चुटकी हींग, 2 हरी मिर्च, ½ इंच अदरक, ¼ हल्दी पाउडर, ¾ छोटी चम्मच धनिया पाउडर डाल कर मिडियम आंच पर भून लीजिए.

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– मसाले के भुन जाने के बाद इसमें पीसी हुई दाल, ½ नमक, ¼ लाल मिर्च पाउडर,¼ छोटी चम्मच गरम मसाला डाल  कर मसाले को तब तक भून लीजिए जब तक उसमें से अच्छी महक ना आने लगे. दाल के भुन जाने के बाद उसमें 3 बड़े चम्मच हरा धनिया डाल कर चलाते हुए थोड़ी देर भून लीजिए. दाल के भुन जाने के बाद उसे एक प्लेट में निकाल लीजिए.

– 20 मिनट बाद आटे को थोड़ा-सा तेल ले कर हाथों से मसल-मसल कर सोफ़्ट कर लीजिए. अब आटे में से थोड़ा सा डो ले कर उसे गोल कर के चपटा कर लीजिए और उसे सूखे आटे में लपेट के उगंलियों की मदद से कटोरी की तरह गहराई बनाएगें और उसमें 2-3 चम्मच स्टफिंग भर कर बन्द कर देगें.

– अब इसे उगलियों से दबा कर सूखे आटे में लपेट लीजिए फिर हल्के हाथ से 6-7 इंच की ब्यास से बेल लीजिए. अब तवे पर थोड़ा सा तेल डाल कर चारो ओर फैला दीजिए अब तवे पर परांठा डाल दीजिए. पराठे को धीमी आंच पर सिकने दीजिए.जब तक से परांठा सिक रहा है तब तक दूसरा परांठा तैयार कर लीजिए.

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– पराठे के एक साइड हल्की पकने के बाद उसे दूसरी साइड भी इसी तरह सेक लीजिए. अब परांठे के एक साइड पर हल्का सा तेल लगा दीजिए और उसे पलट कर दूसरी साइड भी तेल लगा दीजिए अब आंच को तेज कर के पराठे को दबाते हुए सेक लीजिए और फिर अब इसे अपनी फैमिली और फ्रेंडस को हरे धनिये या टमाटर की चटनी के साथ गरमागरम सर्व करें.

#lockdown: इन 7 टिप्स से बढ़ाएं बालों की उम्र

क्या बिना तेल बालों को स्वस्थ रखा जा सकता है ?जी हां बिलकुल रखा जा सकता है .कुछ देसी नुस्खे आजमा कर आप अपने बालों को सुंदर और मजबूत बना सकती हैं . दरअसल तेल के प्रयोग से रोम छिद्र भर जाते हैैं और बालों को चिपचिपा भी बना देता है .बालों को पोषित करने के लिए बहुत से तरीके हैं .जिन्हें अपनाकर आप अपने बालों को बिना तेल के भी काले, घने लंबे ,मुलायम और चमकदार बना सकती हैं .

1-यदि आपके बाल रूखे हैं तो शहद में पानी मिलाकर बालों में लगाए .इससे बालों का रूखापन दूर हो जाएगा.

2-अगर आपके बाल ज्यादा उलझते हैं तो नींबू के रस में अंडे की सफेदी मिलाकर बालों में 1 घंटे के लिए लगाएं .इससे बाल मुलायम बनते हैं .

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3-बालों को चमकदार बनाना चाहते हैं ,तो एक कप दूध में एक अंडा फेंटे .इस पैक को बालों में आधे घंटे के लिए लगाएं. इसके बाद बालों को धो लें.

4-दो मुंहे बालों की समस्या मैं अंडे का पैक कारगर है .सबसे पहले अपने दो मुंहे बालों का कटिंग करवाएं. उसके बाद ऐसे बालों को सही रखने के लिए ग्लिसरीन, एलोवेरा जेल और अंडे के पीले वाले भाग को मिलाकर बालों में ऊपर से लेकर नीचे तक लगाएं .और आधे घंटे बाद बालों को धो लें

5-अगर आपके बाल आयली हैं ,तो ऐसे बालों को पोषित करने के लिए दही अच्छा है .इसे बालों में लगाकर आधे घंटे के बाद शैंपू कर ले.

6-पके पपीते भी आपकी बालों को पोषण देते हैं .पपीता स्कैल्प की खुश्की को दूर कर रूसी की समस्या से निजात दिलाता है .पपीते के पेस्ट में बेसन और सेब का सिरका मिलाएं .अब इस पेस्ट को बाल और स्कैल्प पर लगाएं .आधे घंटे बाद बालों को साफ पानी से धो लें .यह ऑयली स्कैल्प और रूसी के लिए काफी असरदार होता है .

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7-प्रोटीन ,आयरन ,मैग्नीशियम से प्रचुर नारियल  बालों को झड़ने से रोकता है .नारियल के दूध में आधा चम्मच करी पत्ते का पाउडर और दो चम्मच संतरे का रस मिलाएं .अब इस पेस्ट को बाल और स्कैल्प  पर लगाएं .1 घंटे बाद इसे धो लें .फिर देखिए आपके बालों में जान आ जाएगी! बालों को पोषण के लिए तेल की जरूरत नहीं है .इसके बिना भी बाल चमकदार और सुंदर बन सकते हैं.

शो के दौरान मुझे हर बात से डर लगा- करिश्मा तन्ना

मॉडलिंग से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री करिश्मा तन्ना टीवी शो क्योंकि सास भी कभी बहू थी से चर्चा में आई. उसे बचपन से कुछ अलग और चुनौतीपूर्ण काम करना पसंद था. टीवी शो के अलावा उसने कन्नड़ फिल्म, रियलिटी शो,वेब सीरीज और हिंदी फिल्मों में भी काम किया है. कलर्स टीवी पर करिश्मा तन्ना (Karishma Tanna) शो खतरों के खिलाडी 10 चल रहा है, जिसमें वह एक कंटेस्टेंट है, ये शो अभी लॉक डाउन के चलते बंद है. स्पष्ट भाषी और हंसमुख करिश्मा इस लॉकडाउन में अपने परिवार, पेट्स, कुकिंग और वर्कआउट कर समय बिता रही है. पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश.

सवाल- इस तरह के एडवेंचरस शो करना आपको कितना पसंद है? ऐसे शो करना कितना मुश्किल है?

निर्देशक रोहित शेट्टी के साथ किसी भी एडवेंचर को करना मुश्किल नहीं, क्योंकि वे मानसिक सपोर्ट बहुत देते है और बहुत अधिक हौसला बढाते रहते है. शारीरिक जो मेहनत है, वह तो मुझे ही करना पड़ा. मैंने पहले इस शो को करने से कई बार मना किया था, पर अब लगा कि इसे कर लेना चाहिए और किया भी. बहुत अधिक समस्या नहीं आई. मुझे लगता है हर एक्टर को ऐसी शो करनी चाहिए, क्योंकि इसका मजा कुछ और ही होता है.

सवाल- किस बात से आपको डर लगता है?

मुझे शो के दौरान हर बात से डर लगा था, पर अब शूट कर लेने के बाद कोई डर नहीं लगता.

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सवाल- टीवी, वेब सीरीज या फिल्मों में क्या अंतर महसूस करती है? ड्रीम क्या है?

टीवी पर एक शो और चरित्र काफी दिनों तक चलता है, जबकि वेब सीरीज में अलग-अलग भूमिका निभाने का मौका मिलता है. फिल्में भी वैसी ही होती है. किसी भी स्क्रिप्ट को चुनते समय मैं एक्टिंग के स्कोप को अधिक देखती हूं. मुझे अभिनेत्री रेखा की बायोग्राफी में काम करने की इच्छा है.

सवाल- फिटनेस पर आप कितना ध्यान देती है?

मैं हमेशा से ही फिटनेस पर अधिक ध्यान देती हूं. लॉक डाउन में योगा, वर्कआउट डेली कर रही हूं. मैं शारीरिक से अधिक मानसिक फिटनेस पर हमेशा से काम करती आई हूं. जब मैं खतरों के खिलाड़ी की शूटिंग कर रही थी तो मेरी मानसिक फिटनेस शारीरिक से बहुत कम थी. कीडेमकोडे के बीच में जब जाना, ऊँचाई से कूदना, पानी के अंदर जाना आदि करने के लिए मानसिक रूप से मजबूत होने की बहुत जरुरत थी और ये मुझे मेडिटेशन और ब्रीदिंग तकनीक से ही मिला. पूरी शो के दौरान बहुत सारा एंग्जायटी था. हर दिन लगता था कि क्या होगा? कैसे कर पाऊँगी, पर कर लिया. हर दिन मन को स्ट्रोंग करना पड़ता था.

सवाल-फिटनेस पर हमारे देश में जागरूकता की कमी है, महिलाएं इस पर बहुत कम ध्यान देती है, आपकी राय क्या है?

हर आयु के व्यक्ति चाहे पुरुष हो या महिला फिटनेस पर काम करने की जरुरत है, ब्रीदिंग, योगा, वाकिंग आदि जो भी संभव हो, उसे करते रहना चाहिए.  बॉडी को हिलाना बहुत जरुरी है. मैं गुजराती हूं और कोई डाइट फोलो नहीं करती, पर गेहूं, शुगर और डेयरी प्रोडक्ट्स नहीं खाती. इससे फिट रहती हूं.

सवाल-आपके यहां तक पहुंचने में परिवार का कितना योगदान रहा?

परिवार मेरे लिए बहुत महत्व रखता है. मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूं, जहां पैसों की अहमियत हमेशा समझाई जाती है. मेरी परवरिश बहुत ही साधारण तरीके से हुई है. यही वजह है कि एक एक्ट्रेस होकर मुझे अपने माइंड को शांत और स्थिर रखने में भी कोई समस्या नहीं आती. ये सब मुझे मेरे परिवार से मिला है. मेरी मां बहुत ही शांत प्रकृति की है, जबकि मेरा स्वभाव पिता की तरह थोड़ी हाइपर है. मेरे सभी शो को वे देखते और सराहते है.

सवाल-आप अपनी जर्नी से कितनी खुश है?

मैं हमेशा से ही एक महत्वाकांक्षी लड़की रही हूं और वह मुझे कैरियर में मिला भी. मेरी कैरियर को मैं एक सीढ़ी समझती हूं, जिसपर समय के साथ-साथ चढ़ती गयी, आगे जो भी होगा अच्छा ही होगा, ऐसा सोच मैं रखती हूं.

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सवाल-लॉक डाउन में आपकी दिनचर्या क्या है?

मैं परिवार के साथ समय बिताने, डॉग के साथ खेलने , वर्कआउट करने और हमारे आसपास के लोगों की कुछ सेवा करने में लगी हूं.

 

आर-बाम्बिंग’ रिलेशनशिप सही नहीं

कहीं आप भी तो आर-बोम्बिंग रिलेशनशिप का शिकार तो नहीं? आप जानते हैं इस रिलेशनशिप के बारे में?आपको उत्सुकता होगी जानने की, कि आखिर आर-बोम्बिंग रिलेशनशिप क्या बला है?

दरअसल आज के समय में रिलेशनशिप को एक अलग ही तरीके से और बिल्कुल अलग नजरिए से देखा जा रहा है .आप ने शायद सोचा भी नहीं होगा कि इस कदर रिश्तो की परिभाषाएं बदल जाएगी.

क्या आपको जानकर विश्वास होगा कि रिलेशनशिप में भी ट्रेंड का दौर चल चुका है? कभी ब्रेकअप पार्टी ,कभी डबल डेटिंग ,कभी ऑनलाइन चैटिंग, कभी डाइवोर्स पार्टी ,तो कभी वन नाइट स्टैंड. लेकिन अब आप इसमें एक ट्रेंड और जोड़ लीजिए वह है आर-बोम्बिंग.

काफी लोगों के लिए यह रिलेशनशिप ट्रेंड किसी पहेली से कम नहीं. आइए जानते हैं क्या है ये आर-बोम्बिंग रिलेशनशिप ? वास्तव में यह टर्म जुड़ी हुई है मोबाइल रिलेशनशिप के साथ.

इसके अनुसार जब डेटिंग कपल के बीच प्यार भरे संदेशों का आदान-प्रदान चलता है तो, इसी दौरान कुछ ऐसा घटित होता है. जो इस नई संभावना यानी आर-बोम्बिंग रिलेशनशिप को जन्म देता है.

कैसे जाने

वैसे आप भी किसी रिलेशनशिप में है? तो जरूर ध्यान कीजिए. कहीं आपके साथ भी तो ऐसा कुछ नहीं हो रहा है? इस रिलेशनशिप में जब आप अपने पार्टनर को कोई मैसेज भेजते हैं और आपको यह पता चल जाए कि मैसेज पढ़ लिया गया है.

लेकिन रिप्लाई नहीं आया तो इसमें आशंकाओं ,दुविधा और असमंजस की संभावना बढ़ती चली जाती है.

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क्या मैसेज पढ़ने के बाद भी यदि आपको उसका रिप्लाई नहीं मिलता.चलिये माना एक बार ऐसा हो सकता है .दोबारा ऐसा हो सकता है. लेकिन बार-बार तो यह नहीं हो सकता .

तो समझ जाएं कि आप आर बोम्बिंग रिलेशनशिप में हैं. जब आपकी पार्टनर आपको इस तरह से बार-बार इग्नोर करें. तो आप मान लीजिए कि आर-बोम्बर बन चुके हैं.

कारण आर-बोम्बिंग रिलेशनशिप के

आर-बोम्बिंग बहुत कुछ घोस्टिंग ट्रेंड से मिलती जुलती हैं. जानते हैं ना घोस्टिंग क्या है ? घोस्टिंग रिलेशनशिप के अंतर्गत सोशल मीडिया पर आपको अनफॉलो या ब्लॉक कर दिया जाता है.

यह बात भी हालांकि दिल तोड़ने वाली है लेकिन आर-बोम्बिंग के मुकाबले कम .आर-बोम्बिंग का मतलब है कि आपकी पार्टनर या फ्रेंड आपसे दूर होना चाहती है .लेकिन आपको हर्ट भी नहीं करना चाहती.

असमंजस भरा रिश्ता

यानी बता भी नहीं पा रही और छिपा भी नहीं पा रही. इसका सबसे पहला कारण तो यह है कि आपकी दोस्त आपसे उकता गयी है और वह इस रिश्ते से बोर होकर आपसे दूर जाना चाहती हैं.

लेकिन वह किसी भी लफड़े में पड़ने से बेहतर समझती है चुप रहना. ‘R-bomb’ attitude वाले लोगों में बुनियादी कम्युनिकेशन स्किल की कमी होती है.

वे वास्तव में क्या चल रहा है सांझा करने के बजाय चुप रहना चुनती हैं. वे किसी प्रकार के झगड़े से डरती हैं और धोखा देती रहती है.

दूसरे की तरफ आकर्षण(Attraction to the other side)

किसी और के प्रति आकर्षण का बढ़ना भी हो सकता है. यानी कि आपकी पार्टनर किसी अन्य व्यक्ति के प्रति आकर्षित हो चुकी है .लेकिन आपको बताने में हिचक रही है .शायद आपका प्यार या लगाव इतना गहरा है कि वह आपको हर्ट भी नहीं करना चाहती.

बिजी शेड्यूल(busy schedule)

तीसरा कारण है जो शायद सही भी है आपकी पार्टनर इतनी बिजी या काम में उलझी हुई रहती है कि आपके मैसेज पढ़ने का मौका ही नहीं मिल पाता. या कोई और परेशानी भी हो सकती है.

क्या है इस रिलेशनशिप का ट्रीटमेंट

सबसे आसान तरीका है बातचीत करें

अगर आपको महसूस हो रहा है कि आप आर-बोम्बिंग रिलेशनशिप का टारगेट बन गए हैं .तो आपको इस बारे में अपने पार्टनर से बात करनी चाहिए.

खुद अलग हो जाएं

इसके अलावा आप अपने रास्ते अलग कर लें. ऐसी फ्रेंड के साथ रिलेशनशिप में रहने से कोई फायदा नहीं .हो सके तो एक काउंसलर की भी सलाह ले सकते हैं.

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अपने को धोखे में ना रखें

खुद को टॉर्चर करने से कोई फायदा नहीं. मैसेज के रिप्लाई का इंतजार करना छोड़ दें.जीवन में प्यार जरूरी है लेकिन एक तरफा नहीं. प्रेम की कशिश यदि दोनों और बराबर हो ,तभी इस रिलेशनशिप में रहने का मजा है.

नए मित्र की तलाश

अच्छा है कि आप एक प्यार करने वाले पार्टनर की तलाश शुरू कर दें. अगर आप आर-बांबर बन चुके हैं तो अपनी पार्टनर का पीछा करना छोड़ दें. उससे सारे कांटेक्ट्स खत्म कर दे.

बच्चे मोटापे की ओर कैसे खिच जाते हैं?

हर कोई जानता है कि बच्चे स्कूल से बहुत सी बीमारियां लाते हैं, जैसे: चिकन पॉक्स, फ्लू और वार्षिक रिटर्न-टू-स्कूल ज़ुकाम .

आजकल, इस बात का सबूत है कि वे अपने दोस्तों से कुछ और भी प्राप्त कर सकते हैं, वो है मोटापा I

एक नए अध्ययन में पाया गया कि जब स्केल एक व्यक्ति के लिए “अधिक वजन” की व्याख्या करता है, तो संभावना है कि उनके दोस्त 50 प्रतिशत से अधिक वज़न  वाले हो जाएंगे.

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन के 26वें एडिशन में प्रस्तावित किया गया कि मोटापा “सामाजिक रूप से संक्रामक” है, क्योंकि यह निकट सांप्रदायिक समूहों के व्यक्तियों में फ़ैल सकता है. पहला जर्नल निकोलस क्रिस्टाकिस और जेम्स फाउलर द्वारा 2007 में प्रकाशित किया गया था. उन्होंने पाया कि मोटापा सोशल नेटवर्क के माध्यम से प्रसारित होता है. इस के लिए उपयुक्त उदाहरण है कि एक उचित शरीर के आकार के बारे में किसी व्यक्ति की अवधारणा क्या है ये उनके दोस्तों के आकार से प्रभावित होता है.

अनुसंधान ने संकेत दिया है कि मित्र एक-दूसरे के व्यवहार को प्रभावित करते हैं. एक पिछले अध्ययन में दिखाया गया है कि धूम्रपान और शराब पीने वाले दोस्तों के साथ रहने वाले किशोर स्वयं भी इस के आदी होंगे. न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययनों में 12,067 व्यक्तियों के एक विशाल सामाजिक नेटवर्क की एक विस्तृत परीक्षा शामिल थी, जो 1971 से 2003 तक लंबे समय तक दृढ़ता से की गयी थी. शोधकर्ता जानते थे कि कौन किसका दोस्त,  कौन किसका जीवन साथी या परिजन थे, और प्रत्येक व्यक्ति का तीन दशकों के विभिन्न अवसरों पर कितना वजन था. इससे उन्हें पता चलता है कि इन सालों में क्या  हुआ– कुछ लोग मोटे हो गए. क्या उनके दोस्त भी मोटे हो गए थे? क्या रिश्तेदार या पड़ोसी भी मोटे हो गए?

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इसका उत्तर यह था कि जब किसी व्यक्ति के दोस्त मोटे हो जाते हैं तो वह व्यक्ति भी मोटापे की ओर चल पड़ता है . इससे  किसी व्यक्ति की भारी होने की संभावनाएँ 57 प्रतिशत तक बढ़ जाती हैं. जब किसी पड़ोसी का वज़न बड़ा या घटा तो कोई असर नहीं पड़ा, अर्थात, दोस्तों की तुलना में पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने कम प्रभाव डाला. नज़दीकियों से कोई फर्क नहीं दिखाई दिया. दोस्तों का प्रभाव इस बात पर निर्भर नहीं किया कि साथी कई मील दूर था या नहीं. इसके अलावा, सबसे अच्छा प्रभाव सांझे और प्रिय दोस्तों के बीच था. ऐसी स्तिथि में अगर एक दोस्त मोटा हुआ, दूसरे के मोटे होने की संभावना काफी बढ़ गई.

डॉक्टर निकोलस क्रिस्टाकिस, एक चिकित्सक और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में चिकित्सा समाजशास्त्र के प्रोफेसर और नए अध्ययन में एक प्रमुख अन्वेषक, के अनुसार एक स्पष्टीकरण यह है कि दोस्त एक-दूसरे के शरीर के आकार की छाप को प्रभावित करते हैं. जब एक प्रिय साथी भारी हो जाता है, तो मोटापा शायद इतना भयानक नहीं लगता . डॉ. क्रिस्टाकिस ने कहा, “एक स्वीकार्य शरीर का प्रकार क्या है, इस के बारे में आपके अपने विचार आसपास के लोगों को देखकर बदलते रहते हैं.

फाउलर (यूसी सैन डिएगो के एक राजनीतिक शोधकर्ता) ने वजन बढ़ने का सबसे अच्छा सत्यापन किया. वो कहते हैं कि जिन व्यक्तियों को वे मित्र मानते थे, उनकी गतिविधियों पर उनके आचरण को पैटर्न देने के लिए अधिक संभावना थी. लेकिन ये समीकरण उलटे तरीके से लागु नहीं होता.

अगर आपने किसी और को एक साथी के रूप में चुना और आपके साथी का वज़न बड़ा, उस समय आप वज़न बड़ाने के लिए 50% बाध्य हो सकते हैं . इसके उल्ट, यदि आपके साथी ने आपको एक पारस्परिक मित्र के रूप में नामित नहीं किया है, और आप मोटे हो गए हैं, तो इससे आपके साथी के वजन पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ेगा.

स्पष्ट प्रशन है :  केवल दोस्त ही क्यों? जीवन साथी भोजन और छत सांझा करते हैं; फिर भी  शोधकर्ताओं ने वजन बढ़ने का छोटा खतरा (सिर्फ 37%) पाया, जब एक साथी भारी हो गया.

भाई-बहन के जीन्स भी सांझे होते हैं फिर भी उनका प्रभाव बहुत कम था, एक-दूसरे के जोखिम को 40% तक बढ़ा दिया. फाउलर का मानना है कि जब हम उपयुक्त सामाजिक व्यवहार के बारे में सोचते हैं, तो ये सामाजिक मानकों से ज़्यादा प्रभावित होता है.  ‘मोटे दोस्त बनाओ और मोटे हो जाओ’ अधिक स्वीकार्य लगता है.

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फाउलर का मानना है कि “आप क्या खाएं, कितना खाएं, कितनी कसरत करें, — जब आप ये निर्धारण करते हैं तो शायद आप अपने जीवन साथी कि ओर नहीं देखते हैं.”   ज़रूरी  नहीं कि हम अपने परिजनों के विपरीत भी अनिवार्य रूप से जाएं .

निष्कर्ष ये है कि “हमें दोस्तों को चुनने का मौका मिलता है, लेकिन परिवारों को चुनने का नहीं.”

#lockdown: जानें क्या है औनलाइन मीटिंग के 6 औप्शंस

तकरीबन पूरी दुनिया में लौकडाउन लागू किए जाने के चलते वीडियो कौन्फ्रेंसिंग, वीडियो मीटिंग्स, औनलाइन क्लासेस वगैरह का चलन काफी बढ़ गया है. इनके लिए ज्यादातर लोग ज़ूम ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन, हमारे देश भारत में गृहमंत्रालय ने यह ऐलान कर दिया है कि ज़ूम ऐप का इस्तेमाल सुरक्षित नहीं है. हैकर्स औनलाइन जारी मीटिंग के बीच हमला कर पोर्न क्लिप चला सकते हैं, यही नहीं, वे आपके सीक्रेट डेटा को भी हैक कर सकते हैं.

ऐसी हालत में कम-से-कम हम भारतीयों को ज़ूम ऐप से सतर्क रहने की जरूरत है. सवाल है कि क्या करें? इसका जवाब है कि कई दूसरी ऐप्स हैं जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है. कुछ औप्शंस ये हैं:

1. माइक्रोसौफ्ट टीम्स

आप वीडियो कौल करना चाहते हैं, तो माइक्रोसौफ्ट टीम एक बेहतर औप्शन हो सकता है. नोवल कोरोना वायरस से उभरी कोविड-19 महामारी के चलते अभी यह फ्री में उपलब्ध है. इसके फ्री वर्जन में अनलिमिटेड चैट, सर्च, ग्रुप, वन-औन-वन औडियो-वीडियो कौलिंग के साथ 10 जीबी टीम फाइल स्टोरेज व 2 जीबी पर्सनल फाइल स्टोरेज की सुविधा दी गई है.

अगर आपके पास पहले से ही ‘औफिस 365’ का अकाउंट है, तो फिर इसमें आपको औफिस ऐप्स जैसे कि वैब, वर्ड, एक्सेल, पावर प्वाइंट और वननोट के साथ रियल टाइम कोलैबोरेशन की सुविधा मिलती है.

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2. वैबएक्स मीटिंग्स

यह पौपुलर कौन्फ्रेंसिंग सौफ्टवेयर प्लेटफौर्म है. इसमें एचडी क्वालिटी वीडियो के साथ कोलैबोरेशन टूल्स का सपोर्ट भी मौजूद है. यह सौफ्टवेयर फ्री और पेड दोनों ही वर्जन में उपलब्ध है. फ्री वर्जन में एचडी वीडियो क्वालिटी के साथ 100 सदस्य हिस्सा ले सकते हैं. साथ ही, स्क्रीन शेयरिंग और पर्सनलरूम जैसी सुविधाएं हैं. फ्री पैकेज में 1जीबी क्लाउड स्टोरेज, अनलिमिटेड मीटिंग्स और एमपी 4 में मीटिंग की रिकौर्डिंग जैसे फीचर्स दिए गए हैं. यहां पर मीटिंग्स शेड्यूल के साथ ऐप के जरिए ही प्लेबैक रिकौर्डिंग की सुविधा मिलती है.

साथ ही, गूगल असिस्टेंट और गूगल होम हब के जरिए हैंड फ्री वौयस कमांड जैसे फीचर्स हैं. यह एंड्रौयड, आईओएस, विंडोज और मैक ओएस को सपोर्ट करता है.

3. गूगल मीट

औनलाइन मीटिंग के लिहाज से गूगल हैंगआउट मीट भी एक वीडियो कौन्फ्रेंसिग प्लेटफौर्म है, जिसमें मोबाइल ऐप और लैपटौप के जरिए वर्चुअल मीटिंग्स में हिस्सा ले सकते हैं. गूगल जी सूइट के साथ इसका फ्री सर्विस मिलता है. इस प्लेटफौर्म पर 50 सदस्य मीटिंग्स में हिस्सा ले सकते हैं. वीडियो और औडियो क्वालिटी भी अच्छी मिलती है. इसके साथ गूगल कैलेंडर को सिंक करने की सुविधा भी दी गई है. रिकौर्ड करने के साथ मीटिंग्स को गूगल ड्राइव पर सेव कर सकते हैं.

नोवल कोरोना वायरस की वजह से गूगल खास समय के लिए जी सूइट एडवांस्ड फीचर का एक्सेस फ्री में दे रहा है. इस पीरियड के दौरान 250 सदस्य मीटिंग्स में हिस्सा ले सकते हैं. इसे गूगल प्लेस्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है.

4. स्टारलीफ

स्टारलीफ ऐप से भी आप आसानी से वीडियो मीटिंग कर सकते हैं. इस ऐप पर अधिकतम 20 लोग वीडियो कौलिंग में शामिल हो सकते हैं. इस ऐप के लिए आपको कोई पैसे भी नहीं देने हैं.

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5. जिट्सी मीट

जिट्सी एक ओपन सोर्स प्रोजैक्ट है जिस पर आप अधिकतम 75 लोगों के साथ वीडियो कौन्फ्रेंसिंग कर सकते हैं. खास बात यह है कि इसमें बैकग्राउंड को ब्लर करने की भी सुविधा है. इसमें स्लैक, गूगल कैलेंडर और औफिस 365 का भी सपोर्ट है.

6. ह्वेयरबाई

ह्वेयरबाई के साथ खास बात यह है कि आपको ना ऐप डाउनलोड करना है और ना ही लौगिन करना है. अपने फोन के ब्राउजर में  whereby.com टाइप करके वीडियो कौलिंग कर सकते हैं. इसमें 50 लोग एकसाथ मीटिंग में शामिल हो सकते हैं.

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