जिनके टूटे दिल के तार, कैसे जोड़ेगा उन्हें भाग्य?

कुछ लोग प्यार के नाम पर जिंदगी गुजार देते हैं, कुछ के लिए प्यार सिर्फ एक खेल होता है, जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें ना कभी प्यार मिलता है और ना ही उन्हें प्यार की तलाश होती है. जब ऐसी तीन जिंदगियों की डोर एक-दूसरे से जुड़ी हो और भाग्य उन्हें एक मोड़ पर ले आए तो उठने वाले तूफान को कोई नहीं रोक सकता. ऐसी ही जिंदगियों से जुड़ी कहानी लेकर आया है कलर्स, अपने नए शो ‘पवित्र भाग्य’ में.

तीन जिंदगियों को जोड़ती एक कहानी

एक तरफ है प्रनति, जो मुंबई में रहने वाले एक मिडिल क्लास परिवार की लड़की है, जिसे 8 साल पहले रेयांश नाम के एक लड़के से प्यार हो जाता है और वो उसके साथ जिंदगी जीना चाहती है. दूसरी तरफ है रेयांश, जिसके लिए प्यार का रिश्ता सिर्फ एक बोझ है और वो ऐसी जिम्मेदारी से भागता है. यही कारण था कि जब रेयांश को पता चला कि प्रनति की कोख में उसका प्यार पल रहा है तो वो उसे अकेला छोड़कर चला गया.  ऐसी मुश्किल घड़ी में किस्मत ने भी प्रनति का साथ नहीं दिया और वो अपना बच्चा खो बैठी.

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नई जिंदगी की शुरूआत कर रही है प्रनति

आज जब सालों बाद प्रनति अपने दोस्त के साथ नए जीवन की शुरूआत करने का फैसला ले रही है, उसी समय भाग्य का एक नया खेल शुरू होने जा रहा है. जिस बच्ची को उसने खो दिया था, वो अब तक अनाथालय में पल बढ़ रही थी, जिसका नाम है जुगनू. मां-बाप के प्यार से महरूम जुगनू, स्वाभाव से एक तेज-तर्रार बच्ची है, जो बड़े-बड़े लोगों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दे. वो किसी बंधन में नहीं, बल्कि खुलकर जीना चाहती है.

क्या होगा जब इन तीनों को भाग्य एक मोड़ पर ले आएगा? क्या अपनी बेटी की सच्चाई जानकर प्रनति, अपने अतीत से फिर नज़र मिलाएगी? क्या रेयांश को कभी अपनी गलती का एहसास होगा? क्या जुगनू परिवार के मायने समझ पाएगी? जुदा दिलों को, कैसे जोड़ेगा उनका भाग्य? जानने के लिए देखिए, पवित्र भाग्य, सोमवार से शुक्रवार, रात 10 बजे सिर्फ कलर्स पर.

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जानलेवा हमले भी सुनीता कृष्णन को डिगा न सके

बचपन से ही समाजसेवा के कार्यों से जुड़ने वाली सुनीता कृष्णन ने बलात्कार पीड़ित, ट्रैफिकिंग की शिकार महिलाओं, बच्चियों और तस्करों के शिकंजे में फंसे बच्चों को बचाने में अपना जीवन झोंक दिया है. उन पर सत्रह बार जानलेवा हमले हुए, मगर यह हमले सुनीता कृष्णन को उनके मजबूत इरादों से डिगा नहीं पाये. उनके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, लाठी-डंडों से हमले हुए, उन पर एसिड फेंकने की कोशिश हुई, जहर देकर मार डालने की कोशिश हुई, लेकिन इन तमाम हादसों ने सुनीता को पीड़ित नहीं, बल्कि योद्धा बना दिया. दर्द और दहशत के कठिन दौर ने उनके जज्बे को और मजबूत कर दिया. सुनीता बीते तीस सालों से समाजसेवा के क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं. पंद्रह साल की छोटी सी उम्र में दलित समुदाय को साक्षर बनाने की एक मुहिम के दौरान सुनीता के साथ गांव के आठ दबंगों ने सामूहिक बलात्कार किया था. तब उनको बुरी तरह मारा-पीटा गया था. इस हादसे ने उनको और उनके परिवार को बुरी तरह डरा दिया था, मगर डर के आगे जीत है. सुनीता इस हादसे के बाद औरतों पर जुल्म ढाने वाले अपराधियों के खिलाफ और तन कर खड़ी हो गयीं.

सुनीता कृष्णन का जन्म बेंगलुरु के पालक्कड़ में मलयाली माता पिता – राजा कृष्णन और नलिनी कृष्णन के घर हुआ था. उनके पिता सर्वेक्षण विभाग में काम करते थे, जो पूरे देश के लिए नक़्शे बनाते हैं. इस तरह उनके साथ एक जगह से दूसरी जगह यात्रा के दौरान कृष्णन भारत का अधिकांश क्षेत्र देख चुकी हैं. सुनीता कृष्णन बचपन से ही सामाजिक गतिविधियों में संलग्न हो गयी थीं. आठ साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को इकट्ठा करके उन्हें नृत्य सिखाना शुरू किया. बारह वर्ष की आयु में वह वंचित बच्चों के लिए झुग्गियों में स्कूल चलाने लगीं. पंद्रह वर्ष की आयु में जब वह दलित वर्ग के लोगों के लिए कम्युनिटी नव साक्षरता अभियान से जुड़ कर काम कर रही थीं, तब गांव के आठ दबंगों ने उनका सामूहिक बलात्कार किया, उनकी इतनी बुरी तरह पिटायी की गयी कि उनका एक कान खराब हो गया. इस भयानक घटना के बाद सुनीता की जिन्दगी दहशत और दर्द से भर गयी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी बल्कि एक संस्था बनायी – प्रज्जवला, जो कमजोर वर्ग के प्रति होने वाले अपराधों, महिलाओं और छोटी-छोटी बच्चियों की तस्करी और वेश्यावृत्ति के खिलाफ आवाज बुलन्द करती है.

सुनीता कहती हैं, ‘जब मेरे साथ सामूहिक बलात्कार हुआ तो समाज का जो रवैय्या मैंने अपने प्रति देखा, कि जैसे लोग मुझे देखते थे, सवाल करते थे, मुझे बहुत दुख होता था. किसी ने नहीं पूछा कि उन दबंगों ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? लोग मुझसे ही सवाल करते थे कि मैं वहां क्यों गयी? मेरे माता-पिता ने मुझे आजादी क्यों दी? मुझे एहसास हुआ कि मेरे साथ ऐसा एक बार हुआ, लेकिन कितनी महिलाएं हैं, जो बेची जाती हैं, वेश्यावृत्ति में ढकेली जाती हैं, उनके साथ तो यह हर रोज हो रहा है. वह कैसे सहती होंगी ये दर्द, उन्हें बचाना है.’

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अब तक सैकड़ों बच्चियों और स्त्रियों को सेक्स ट्रैफिकिंग से बचाने वाली सुनीता कृष्णन की कहानी सुनकर बॉलिवुड एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा ने ट्वीट किया था – ‘सुनीता कृष्णन ने एक भयावह सच्चाई को, जो एक धर्मयुद्ध की तरह है, समाज के सामने रखा है. यह न सिर्फ चौंकाने वाला, बल्कि बेहद दर्दनाक भी है. वह महिलाओं और छोटी बच्चियों को सेक्स ट्रैफिकिंग से बचाने का अद्भुत कार्य कर रही हैं.’
वर्ष 2016 में देश का चौथा सर्वोच्च सम्मान पदमश्री और मदर टेरेसा अवॉर्ड से सम्मानित सुनीता कृष्णन के साहसिक कार्यों पर उनसे हुई बातचीत के संक्षिप्त अंश –

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आप बचपन से ही समाजसेवा में जुट गयी थीं, जिस में अनेक खतरे और हादसे आपने झेले, क्या कभी आपके परिजनों ने आपके काम पर आपत्ति नहीं की या इस काम को छोड़कर अन्य दिशा में करियर बनाने पर जोर नहीं दिया?

मैं बहुत छोटी उम्र से समाजसेवा के कार्य से जुड़ी हूं. 15 बरस की उम्र में गांव के दलित और पीड़ित लोगों की शिक्षा के एक कार्यक्रम के चलते जब विरोधियों द्वारा मेरा सामूहिक बलात्कार हुआ तो इस घटना ने मेरे जीवन में बहुत कुछ बदल दिया. उन घटना के बाद जहां मेरे अन्दर एक विरक्ति सी आ गयी, वहीं परिवार भी चुप सा हो गया. सबने मेरी तरफ से चुप्पी ओढ़ ली. वह बड़ा अजीब तरह का व्यवहार था. मुझे समझ में नहीं आता था कि वह मुझे दुत्कार रहे हैं, या मुझे आगे बढ़ने के लिए खामोशी से रास्ता दे रहे हैं. उस समय तो यही लगता था कि वह मुझे दुत्कार रहे हैं, लेकिन अब पच्चीस-तीस साल गुजरने के बाद जब मैं पीछे मुड़ कर बचपन के उन दिनों को याद करती हूं तो लगता है उनकी चुप्पी ने मेरा आगे बढ़ने का रास्ता ही प्रशस्त किया. अगर वह बोलते, रोक-टोक करते तो शायद आज मैं इतना काम नहीं कर पाती.

अपनी संस्था ‘प्रज्जवला’ की स्थापना के विषय में कुछ बताएं. कब और किन उद्देश्यों के तहत आपने इस संस्था का गठन किया?

प्रज्जवला की स्थापना सन् 1996 में वेश्यावृत्ति उन्मूलन के उद्देश्यों के तहत की थी. लेकिन जैसे-जैसे हमारा काम बढ़ता गया, मैंने पाया कि यह तो संगठित अपराध है, जिसे संगठित गिरोहों के जरिए चलाया जाता है. इसमें बच्चियों का अपहरण, उनकी सौदेबाजी, देश के एक कोने से दूसरे कोने में उनको भेजना, देह-व्यापार के लिए मजबूर करना, बड़े चकलाघरों तक पहुंचाना और कई बार यह सब पुलिस की जानकारी में होना या उनकी संलग्नता भी दिखायी दी. फिर तो यह बड़ा आन्दोलन बन गया. हम कई मोर्चों पर लड़ने लगे. वेश्यावृत्ति के चुंगल से न सिर्फ बच्चियों को बचाना हमारा काम रह गया, बल्कि उनके परिजनों को ढूंढना, उन्हें उन तक पहुंचाना, अगर वह उन्हें वापस नहीं लेते तो उनका पुनर्वास कैसे हो, इसको लेकर जूझना, उनकी कानूनी लड़ाइयां ऐसी तमाम बातों को भी देखना पड़ा. कई बार महिलाओं के साथ उनके मासूम बच्चे भी होते हैं. उन्हें भी निकालना पड़ता है. आपको यकीन नहीं होगा ऐसे ही एक अभियान के दौरान हमने तीन साल की मासूम बच्ची को एक चकलाघर से निकाला, जिसे वेश्यावृत्ति के लिए बेचा गया था.

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आप तीन दशकों से ट्रैफिकिंग की शिकार महिलाओं-बच्चियों को बचाने में जुटी हैं. क्या उन तमाम महिलाओं-बच्चियों को उनके घरवाले आसानी से स्वीकार कर लेते हैं?

नहीं, ज्यादातर मामले में ऐसा नहीं होता है. यह बहुत बड़ी विडम्बना है महिलाओं की. कई बार तो परिवार वाले उनको पहचानने से ही इन्कार कर देते हैं. बहुतेरी महिलाओं या बच्चियों को तो खुद उनके परिवार वालों ने ही दलालों के हाथों बेचा होता है, ऐसी हालत में वह उनको हमसे वापस तो ले लेते हैं, मगर कुछ दिन बाद उन्हें किसी दूसरे दलाल को बेच देते हैं. ऐसे में हमें बड़ी सतर्कता बरतनी पड़ती है. नजर रखनी पड़ती है. महिलाओं को भी लगता है कि उनका जीवन खत्म हो चुका है, उन्हें कौन अपनाएगा, तो वह भी इसी दलदल में बनी रहना चाहती हैं. हम अपनी संस्था के जरिए मानव तस्करी और वेश्यावृत्ति की रोकथाम, बचाव, पुनर्वास, पुनर्मिलन और उनके कानूनी पक्ष को लेकर काम करते हैं. इसके अलावा हमारी कोशिश होती है कि अपराधी को सजा तक पहुंचाया जाए. इस सम्बन्ध में जो भी कानूनी प्रक्रिया होती है, हम उस पर लगातार नजर रखते हैं.

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बलात्कार पीड़ित महिला के प्रति समाज के रवैय्ये में बदलाव कैसे आए? वह कैसे डर, दर्द और बदनामी से बाहर निकले?

देखिए, जब तक हम औरत की सुरक्षा के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहराते रहेंगे, औरत कभी सुरक्षित नहीं हो सकती. हमें अपने बेटों को, अपने भाइयों को समझाना होगा, अपने बेटे की परवरिश इस तरह से करनी होगी कि वह समझे कि औरत की रक्षा करना उसका पहला कर्तव्य है. उसके दिल में बचपन से ही औरत के प्रति इज्जत हो, उसको सुरक्षा देने की भावना हो. जब ऐसी सीख के तहत हमारे बेटे, हमारे भाई बड़े होंगे तब समाज बदलेगा और तब औरत सुरक्षित होगी. बेटों को बताना होगा कि अगर कोई औरत किसी घटना की शिकार हुई है तो उसकी जिम्मेदार वह नहीं है, बल्कि वह पुरुष है जिसने उसके साथ ऐसा अपराध किया है. इसके लिए औरत को शर्मिन्दा होने की जरूरत नहीं है, इसके लिए पुरुष को शर्मिन्दा होने और सजा भुगतने की जरूरत है.

आपके इस काम में आपके परिवार, ससुराल और पति का क्या सहयोग और योगदान रहा है? क्या उन्होंने कभी आपके इन दुस्साहसिक कार्यों पर आपत्ति दर्ज की या इसे छोड़ने के लिए कहा?

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मैंने जिस रास्ते पर कदम बढ़ाया, उस रास्ते को कभी छोड़ा नहीं. मेरे काम के बारे में कौन क्या सोचता है, कौन क्या बोलता है, इस तरफ मैंने कभी ध्यान नहीं दिया. बहुत सारे लोग बहुत सारी बातें करते होंगे, लेकिन मैंने बहुत सालों से किसी भी ऑब्जेक्शन की ओर देखना बंद कर दिया है. मैं बहुत भाग्यवान हूं कि मेरे पति राजेश टोचरीवर ने मेरा हर कदम पर साथ दिया. उनका जो सपोर्ट है वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. वे मेरे रीढ़ की हड्डी हैं. मैं उतनी दूर-दृष्टि वाली महिला नहीं हूं, मगर राजेश में बहुत दूर तक देख लेने की क्षमता है और वह मेरा मार्गदर्शन करते हैं, मुझे देखने-समझने की शक्ति देते हैं. मेरे हर कदम पर वह मेरे साथ हैं, मुझे इस बात से बहुत प्राउड फील होता है. आपको यकीन नहीं होगा कि मेरे ऊपर अब तक 17 बार जानलेवा हमले हो चुके हैं. मुझ पर ऑटोरिक्शा में जाते वक्त एसिड फेंका गया, जहर खिलाने की कोशिश हुई, यहां तक कि तलवार से भी हमला हुआ, मगर मैं हर बार बच निकली. मैं मरने से नहीं डरती, जब तक मेरी सांस है मैं पीड़ित लड़कियों को वेश्यालयों से निकालती रहूंगी और मेरे इस काम में मेरे पति का पूरा सहयोग मुझे है.

समाज और परिवार दोनों मोर्चों को कैसे संभालती हैं?

मेरे लिए दोनों एक ही हैं. कोई ड्यूएल लाइफ नहीं है मेरी. मेरा काम ही मेरा घर-परिवार और समाज है. आपको यकीन नहीं होगा कि बीते बीस सालों में तो मैंने अपने काम से एक दिन भी छुट्टी नहीं ली है. संडे क्या होता है मुझे नहीं मालूम. मेरे पति ने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि इतवार की छुट्टी है तो आज घर पर रहो या खाना बनाओ. जब वह जल्दी लौट आते हैं तो वह खाना बना लेते हैं, जब मैं जल्दी लौट आती हूं तो मैं बना लेती हूं.

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अपनी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों और किताबों के विषय में बताएं?

मैंने एचआईवी, वेश्यावृत्ति, मानव तस्करी समेत अन्य सामाजिक विषयों पर करीब 14 डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनायी हैं. यह फिल्में हिन्दी और तेलुगू भाषा में हैं, जिनमें से कई को अवॉर्ड भी हासिल हुए हैं. इसके अलावा मैंने ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर कुछ किताबें भी लिखी हैं.

3 सखियां: भाग-2

पिछला भाग- 3 सखियां: भाग-1

‘‘अरे रितिका तू?’’ आभा चीखी, ‘‘कहां से बोल रही है?’’

‘‘न्यूयार्क से.’’

‘‘इधर अमेरिका कब आई, कैसे आई?’’

‘‘बस जहां चाह वहां राह. एक मालदार आंख का अंधा गांठ का पूरा मिल गया. मैं ने उस पर धावा बोल दिया और 3 ही महीने में वह चित्त हो गया. हम ने फौरन शादी की और चूंकि वह न्यूयार्क में काम करता है, हम यहां आ गए.’’

‘‘अरे वाह, यह तो कमाल हो गया. लेकिन शादी में बुलाना तो था न यार.’’

‘‘यह सब कुछ इतनी जल्दबाजी में हुआ कि कुछ न पूछो. मुझे खुद नहीं विश्वास होता कि मेरी शादी हो गई है.’’

‘‘चल ये तो बड़ा अच्छा हुआ. देख हम तीनों सखियां बचपन से साथ हैं और अब भी साथ रहने का मौका मिल गया. रितिका, तू मुझ से वादा कर कि चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए हम तीनों हमेशा मिलती रहेंगी. ज्यादा नहीं तो कम से कम साल में 1-2 बार, बारीबारी से एकदूसरे के घर में.’’

‘‘जरूर. लेकिन तू पहले यह बता कि अपनी सखी शालिनी के क्या हाल हैं?’’

‘‘वह भी मजे में है. पर उस से ज्यादा बात नहीं हो पाती. तू यहां आएगी तो उसे भी बुला लेंगे.’’

‘‘जरूर. तू कुछ खानावाना बना लेती है या नहीं?’’

‘‘क्यों नहीं. शादी तय होते ही मेरी मां ने मुझे एक कुकरी क्लास जौइन करवा दी. वही पाक कला आज काम आ रही है. थोड़ाबहुत तो बना ही लेती हूं.’’

‘‘अरे वाह, मैं तो अपने घर का खाना खाने के लिए तरस जाती हूं. जब से शादी हुई रोज डिनर पार्टी होती रहती है. कभी चाइनीज, कभी जापानी, कभी थाई तो कभी वियतनामीज. मैं तो खाखा कर बोर हो गई.’’

‘‘तू मेरे यहां आ. मैं तुझे पक्का इंडियन खाना बना कर खिलाऊंगी, दालचावल, खिचड़ी, कढ़ी.’’

‘‘जल्दी ही प्रोग्राम बनाती हूं.’’

‘‘अपने मियां को भी साथ लाना.’’

‘‘उन को छोड़ो. उन के जैसा बिजी आदमी इस दुनिया में न होगा. जरा सोच, जब हमारे सोने का समय होता है तो वे महाशय जागते रहते हैं. रात के 3 बजे तक काम कर के सोते हैं और दिन में 2 बजे सो कर उठते हैं.’’

‘‘अरे ऐसा क्यों?’’

‘‘उन का काम ही कुछ इस तरह का है. इनवैस्टमैंट बैंकर का नाम सुना है न, वही काम करते हैं. जब अमेरिका में रात होती है तो बाकी दुनिया जागती है और बिजनैस की खातिर उस समय उन्हें भी जागना पड़ता है.’’

‘‘तब तू सारा दिन क्या करती रहती है?’’

‘‘मेरी कुछ न पूछो. घर के कामकाज और खाना बनाने के लिए एक नौकरानी है, इसलिए मैं तो ऐश करती हूं, खूब घूमती हूं. दिन भर शौपिंग मौल के चक्कर काटती हूं और कुछ न कुछ खरीदती भी रहती हूं. इसीलिए मेरा घर दुनिया भर की अलाबला से अटा पड़ा है. इस बात को ले कर मेरे मियां और मुझ में तनातनी रहती है पर क्या करूं मेरी यह आदत नहीं छूटती.’’

‘‘तू कोई नौकरी क्यों नहीं कर लेती?’’

‘‘वाह, नौकरी क्यों करूं? शादी किसलिए की है? मेरा मियां मुझे कमा कर खिलाएगा और मैं हाथ पर हाथ धरे ऐश करूंगी.’’

‘‘यहां तो सभी स्त्रीपुरुष नौकरी करते हैं. कोई घर में निठल्ला बैठा नहीं रहता. हम इंडियन लोग तो बेहद लगन से काम करते हैं.’’

‘‘उंह, मैं उन लोगों में से नहीं हूं. मैं रानी बन कर रहना चाहती हूं, नौकरानी बन कर नहीं.’’

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जब आभा ने शालिनी से ये बातें दोहराईं तो वह खूब हंसी फिर बोली, ‘‘इस रितिका का भी जवाब नहीं. लेकिन पट्ठी ने जो कुछ चाहा था वह सब उसे मिल गया. अपनी पसंद का लड़का, पैसे वाला. उसे अपनी मनमानी करने की पूरी आजादी भी मिली है. मुझे देखो इतने दिन यहां आए हो गए पर अभी तक मैं ने घर की चौखट तक नहीं लांघी है.’’

‘‘अरे क्या कहती है तू?’’ आभा ने आश्चर्य किया, ‘‘भला ऐसा क्यों?’’

‘‘मेरे पतिदेव को मेरा घर से बाहर स्वच्छंद घूमना पसंद नहीं. वे चाहते हैं कि मैं हिंदुस्तानी परदाशीन औरतों की तरह घर में ही रहूं. घर का काम करूं और इसी में खुश रहूं.’’

‘‘क्या बकवास कर रही है तू? ये तेरे पति की कैसी सोच है भला? क्या वे 18वीं सदी के रहने वाले हैं?’’

‘‘मैं ने भी उन से इस बारे में बहुत बहस की पर वे टस से मस नहीं हुए. उन्होंने कार ले कर देना तो दूर मुझे कार चलाना तक नहीं सिखाया है. शौपिंग मौल भी गई हूं तो एकाध बार उन के साथ. अकेले घर से बाहर निकलने का सवाल ही नहीं. वे मेरे हाथ पर एक डौलर भी नहीं रखते कि कभी अपनी जरूरत की चीज खरीद सकूं. अच्छा उन के आने का समय हो गया है, फोन रखती हूं.’’

‘‘अरे ठहर…’’

‘‘नहीं उन्हें मेरा किसी से फोन पर बात करना अच्छा नहीं लगता. अपने घर वालों से भी महीने में एक बार फोन करने की इजाजत है. वे कहते हैं कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते. और मैं फोन भी करती हूं तो अपने मन की बात मातापिता से नहीं कह पाती, क्योंकि पार्थ दूसरे रूम के फोन से मेरी बातें सुनते रहते हैं और 5 मिनट बाद फोन काट देते हैं. वे कहते हैं कि ऐसी कौन सी जरूरी बात है जो चिट्ठी लिख कर कही नहीं जा सकती?’’

‘‘कमाल है. क्या हमारा मन अपनों की आवाज सुनने को नहीं करता?’’

‘‘अब इन मर्दों को कौन समझाए. रोज बहस करकर के मैं तो थक गई. अच्छा फोन रखती हूं.’’

‘‘अगली बार तू मुझे फोन करना.’’

‘‘मैं फोन नहीं कर सकती भाई.’’

‘‘भला क्यों?’’

‘‘तुझे बताया न कि पति महाशय ने उस पर भी बंदिश लगा रखी है. कहते हैं 1-1 पैसा जोड़ कर एक बड़ी रकम जमा कर के जल्द से जल्द वापस इंडिया लौटना है, इसलिए यथासंभव हर तरह से किफायत करना जरूरी है.’’

‘‘तो क्या इस के लिए जीना छोड़ देंगे? भई बुरा न मानना, तेरे मियां कुछ खब्ती से लगते हैं या परले सिरे के कंजूस हैं. खैर जब मिलेंगे तो इस के बारे में विस्तार से बात करेंगे.’’

आगे पढ़ें- कुछदिन बाद आभा ने शालिनी को फिर फोन लगाया.

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Holi Special 2020 : रंगों के त्योहार पर रखें इन बातों का खास ख्याल

होली खुशियों का त्योहार है. लोग इसके उमंग उल्लास में इस कदर डूब जाते हैं कि अपनी सेहत का नुकसान कर बैठते हैं. ज्यादा तेल का खाना, अधिक मिठाई खाना, अनहाइजीन व्यंजनों का सेवन और भी ना जाने कितनी लापरवाहियां इस त्योहार की रौनक को कम कर देती हैं. ऐसे में हम आपको कुछ खास टिप्स बताने वाले हैं जिनकी मदद से आप इस होली को और भी बेहतर ढंग से एंजौय कर पाएंगी.

ओवर ईटिंग से बचें

होली में तरह तरह के पकवान और मिठाइयां बनते हैं. इस चक्कर में आप कुछ ना कुछ खाती रहती हैं. ये सेहत के लिए काफी नुकसानदायक होता है. त्योहारों में बनने वाले व्यंजन काफी तेल वाले होते हैं, ये तले और भुने होते हैं, ये आसानी से नहीं पचते. इससे फूड प्वाइजनिंग की समस्या हो सकती है.

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पानी खूब पिएं

होली में हम खाते अधिक हैं पर पानी पीना भूल जाते हैं. खाने और होली की हुड़दंग से शरीर में पानी की कमी होती जाती है. इसका असर पाचन पर भी होता है. इस भागा दौड़ी में पानी पीना ना भूलें. दिन भर में कम से कम 8 गिलास पानी जरूर पिएं.

इसके अलावा इन बातों का भी रखें ख्याल:

  • ज्यादा मसालेदार और तले-भुने मसालों से दूर रहें.
  • भांग, ठंडई और किसी भी तरह के नशे से दूर रहें.
  • गुजिया का अधिक सेवन ना करें, ये मैदा और खोए से बने होते हैं. इनका अधिक सेवन सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है.
  • ड्राई फ्रूट्स का सेवन करें. ये सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं.
  • बाजार की मिठाइयों से दूर रहें. ये मिलावट वाली हो सकती है, इनके सेवन से आपके स्वास्थ पर नकारात्मक प्रभाव हो सकता है.

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Holi Special 2020 : ट्रेंड में है बंजारा ज्वैलरी

आभूषण पहनना सभी लड़कियों व महिलाओं को पसंद है खासकर कानों के झुमके. पहले के समय में लड़कियां हर त्योहार और फंक्शन में भारी जेवर पहना करती थीं, लेकिन आज की लड़कियां सिंपल ज्वैलरी पहनना ज्यादा पसंद करती हैं. फैशन तो हमेशा बदलता रहता है, कभी गोल्ड ज्वैलरी, सिल्वर ज्वैलरी तो कभी पर्ल ज्वैलरी. लेकिन, अभी जो ट्रैंडी है वह है बंजारा ज्वैलरी. आज के फैशन ट्रैंड में बंजारा लुक छाया हुआ है. बंजारा लुक आप को देश के हर कोने में देखने को मिलेगा जो आज सभी का फैशन बन गया है. टीवी सीरियल्स में भी अभिनेत्रियां बंजारा लुक में नजर आ रही हैं. अब ‘कसौटी जिंदगी की’ में हिना खान को ही देख लीजिए. उन के फर्स्ट लुक को कोई कैसे भूल सकता है. बंजारा लुक में हिना बेहद खूबसूरत नजर आ रही थीं और उन की बंजारा ज्वैलरी को लोगों ने खूब पसंद किया था. मार्केट में अलगअलग स्टाइल की बंजारा ज्वैलरी फैशन में हैं. आइए जानते हैं इन को आप कब और कैसे ड्रैसेज के साथ मैच कर सकती हैं.

1. कौड़ी से बनी ज्वैलरी में दिखेंगी खूबसूरत

बंजारा ज्वैलरी में सब से ज्यादा ट्रैंडी है कौड़ी से बनी डिजाइन की हुई ज्वैलरी. इस से बनी हुई ज्वैलरी जब आप पहनेंगी तो आप बहुत आकर्षक नजर आएंगी. कौड़ी से बनी हुई नैकलैस, इयररिंग और एंक्लेट को आप हर ड्रैस के साथ मैच कर सकती हैं, चाहे वह एथनिक हो या वैस्टर्न, दोनों पर ये खूब जंचेगी.

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नैकलैस को आप लौंग स्कर्ट, कुरती और इंडोवैस्टर्न ड्रैस के साथ ट्राई कर सकती हैं. कौड़ी से बनी इयररिंग्स बेहद स्टाइलिश होती हैं. आप इसे जींसटौप के साथ पहन सकती हैं. लड़कियों को सब से ज्यादा आकर्षित करती है कौड़ी से बनी हुई एंक्लेट. सच में इसे पहनने के बाद पांव की खूबसूरती बढ़ जाती है. आप एंक्लेट को एंकल लैंथ जींस, शौर्ट कुरती या लौंग ड्रैस के साथ पहन सकती हैं. जब भी आप कौड़ी से बनी हुई ज्वैलरी पहनें, तो लाइट शेड की लिपस्टिक का इस्तेमाल करें.

2. मिरर ज्वैलरी

मिरर ज्वैलरी शुरुआत से ही फैशन में है, लेकिन पिछले कुछ महीने से यह ट्रैंडी होती नजर आ रही है. मिरर ज्वैलरी दिखने में जितनी खूबसूरत होती है, पहनने के बाद वह पहनने वाली की भी खूबसूरती को उतना ही बढ़ा देती है. आप इस ज्वैलरी को साड़ी, कुरती, लहंगा, सूट यानी किसी भी इंडियन ड्रैस के साथ पहन सकती हैं.

मिरर ज्वैलरी आप जब भी पहनें ध्यान रहे, आप का मेकअप ज्यादा हैवी न हो. मिरर ज्वैलरी में ज्यादा चमक होती है. अगर आप मेकअप हैवी करेंगी तो आप का चेहरा थोड़ा ओवर दिख सकता है.

3. कौइन डिजाइन ज्वैलरी

कौइन ज्वैलरी सब से यूनीक डिजाइन की होती हैं. कौइन नैकलैस में छोटेछोटे कौइन बने होते हैं, जिन में कुछ न कुछ लिखा या बना होता है. ये अलगअलग डिजाइन से बनाई जाती हैं. किसी में धागों को जोड़ा जाता है, तो किसी में अलग से घुंघरू लगाए जाते हैं.

आप इस ज्वैलरी को सूती साड़ी या प्रिंटेड कुरती के साथ पहन सकती हैं. इस पूरे लुक को आकर्षक बनाने के लिए बड़ी बिंदी और डार्क लिपस्टिक का इस्तेमाल जरूर करें.

4. थ्रेड ज्वैलरी

 

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धागों से बनी हुई यह ज्वैलरी पहनने में बहुत हलकी और आरामदायक होती है. इसे बनाने के लिए कई प्रकार के सिल्क थ्रेड का इस्तेमाल किया जाता है. थ्रेड से बनी हुई सभी ज्वैलरी बहुत खूबसूरत लगती हैं, लेकिन इयररिंग्स और चूडि़यां लड़कियों को खूब पसंद आती हैं. इस ज्वैलरी की खास बात यह है कि आप इसे किसी भी फंक्शन व किसी भी ड्रैस के साथ पहन सकती हैं. खुद को और बेहतर दिखाने के लिए आप ज्वैलरी के अनुसार मेकअप कर सकती हैं.

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5. सिल्वर बंजारा ज्वैलरी

सिल्वर बंजारा ज्वैलरी जितनी खूबसूरत होती है उतनी ही महंगी भी होती है. इस का डिजाइन बहुत अलग होता है. अगर हम इस के डिजाइन की बात करें तो यह काफी हद तक पुराने समय की ज्वैलरी जैसी होती है. इस के ऊपर ज्यादातर जानवरों, फूलों, और सिक्कों का डिजाइन होता है. इस पर मीनाकारी का काम भी किया जाता है, जिस से इस की खूबसूरती और बढ़ जाती है. नैकलैस, इयररिंग, रिंग, बैंगल्स सभी आप को इस डिजाइन में आसानी से मिल जाएंगी. वैसे तो आप इस ज्वैलरी को किसी भी ड्रैस के साथ पहन सकती हैं लेकिन अगर आप ब्लैक या व्हाइट ड्रैस के साथ इसे पहनेंगी तो आप और भी ज्यादा खूबसूरत नजर आएंगी. इस लुक को पूरा करने के लिए आंखों में ऊपरनीचे काजल जरूर लगाएं. आप चाहें तो आंखों को स्मोकी लुक भी दे सकती हैं.

वार्निंग साइन बोर्ड: भाग-4

डा. सुभाष के ट्रीटमैंट तथा शुचि के साथ के कारण निधि में काफी परिवर्तन आ रहा था. कक्षा में भी वह अच्छा प्रदर्शन कर रही थी. देखते ही देखते 4 वर्ष बीत गए. निधि को खुश देख कर हम भी बेहद प्रसन्न थे. आखिर हमारी बच्ची उस दु:स्वप्न को भूल कर जीवन में आगे बढ़ रही थी.

एक दिन शाम के समय हम सब बैठे टीवी देख रहे थे कि एकाएक निधि ने पूछा, ‘‘ममा, रेप क्या होता है?’’

उस का प्रश्न सुन कर निशा और दीपक चौंके. ध्यान दिया तो पाया कि न्यूज चैनल में एक गैंगरेप की घटना को पूरे जोरशोर से दिखाया जा रहा था. दीपक ने तुरंत चैनल चेंज कर दिया.

‘‘ममा रेप क्या होता है?’’ उस ने पुन: अपना प्रश्न दोहराया.

‘‘निशा खाना लगा दो… कल मुझे औफिस जल्दी जाना है,’’ दीपक ने निधि का ध्यान हटाने के लिए कहा.

‘‘ओके,’’ कह कर वह उठ गई.

निधि का बारबार प्रश्न पूछना उसे आतंकित करने लगा था, पर उत्तर तो देना ही था. अंतत: उस ने कहा, ‘‘जब कोई किसी को परेशान करता है, तो उसे रेप कहते हैं.’’

‘‘जैसे उन अंकल ने मुझे किया था?’’

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‘‘नहीं बेटा,’’ कहते हुए उसे सीने से लगा लिया. वह समझ गई थी कि निधि के मन का घाव अभी भरा नहीं है. उन्हें बहुत सावधानी बरतनी होगी पर इन टीवी वालों का क्या करें. इन की तो कोई न्यूज इस तरह की घटनाओं के बिना समाप्त ही नहीं होती. नित्य ऐसी घटनाओं को देख कर उसे न जाने ऐसा क्यों महसूस होने लगा था जैसे कि हमारे समाज में चारों ओर अमानुष ही अमानुष अपना डेरा जमाए हैं, जिन्होंने न केवल हमारा जीना हराम कर रखा है वरन अराजकता भी फैला रखी है. अकसर लड़कों के जन्म पर उत्सव मनाया जाता है, क्योंकि उन से वंश चलता है, उन्हें समाज का रक्षक माना जाता है पर संस्कार देने में कहां चूक हो जाती है जो वे नर से राक्षस बन जाते हैं?

अपनी मांबहन समान नारियों पर दरिंदगी करते समय उन का मन उन्हें नहीं कचोटता? हम अपनी लड़कियों को तो ‘यह न करो वह न करो के बंधन में बांधते हैं पर लड़कों को क्यों नहीं? हमें अपने लड़कों को नैतिकता की शिक्षा देने का प्रयास करना होगा, क्योंकि जब तक व्यक्ति की मानसिकता नहीं बदलेगी तब तक अपराध कम नहीं होंगे. इस के साथ ही अपनी लड़कियों को ऐसे शातिर अपराधियों से बचाने के उपाय भी बताने होंगे.

निशा के मन के दर्द ने उस के मन में ऐसी ऊहापोह मचा रखी थी कि उस के तनमन की शांति भंग हो गई थी. कहते हैं कड़वे अतीत को भूल कर आगे बढ़ने में ही भलाई है पर अगर अतीत बारबार दिल पर दस्तक दे तो इनसान क्या करे? घरबाहर का काम करने के बावजूद कुछ ऐसा था जो उस के मन की ज्वाला को शांत नहीं होने दे रहा था.

उस दिन निशा को अपनी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी. अत: औफिस से छुट्टी ले ली. दीपक के औफिस और निधि के स्कूल जाने के बाद वह पेपर ले कर बैठी ही थी कि एक समाचार पर उस की नजर ठहर गई. दिव्या खन्ना की मौत. पुलिस छानबीन में लगी है. इनसैट में फोटो देख कर चौंक गई कि अरे, यह तो उस की ननद विभा की जेठानी रमा की लड़की है. पिछले वर्ष ही इस का विवाह तय हुआ था पर दहेज की मांग सुन कर इस ने स्वयं ही उस लड़के के साथ विवाह करने से इनकार कर दिया था.

उस के इस निर्णय की समाज तथा मीडिया में काफी चर्चा हुई थी. अब वह सिविल सर्विसेज के लिए कोचिंग ले रही थी. ऐसी साहसी और दृढ़निश्चयी युवती के साथ ऐसा हादसा?

निशा से आगे पढ़ा नहीं गया. उस ने गाड़ी निकाली तथा विभा के घर की ओर चल दी. वह पहुंची ही थी कि विभा अपनी जेठानी रमा के घर खाना ले कर जाने की तैयारी कर रही थी. उसे देख कर विभा ने कहा, ‘‘निशा कल से किसी के मुंह में अन्न का एक ग्रास भी नहीं गया है, कुछ ले कर जा रही हूं, शायद कुछ खा लें.’’

‘‘मुझे तो आज पेपर से पता चला, कम से कम सूचना तो दे देती,’’ उस ने कह तो दिया पर तुंरत ही अपने प्रश्न पर यह सोच कर संकुचित हो उठी कि ऐसे समय में उलाहना देना उचित नहीं है.

‘‘निशा परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हो गई थीं कि दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था.’’

‘‘मैं समझ सकती हूं… चलो, मैं गाड़ी ले कर आई हूं.’’

विभा के साथ वह रमा के घर पहुंची. रमा का बुरा हाल था. उन की आंखें रोरो कर सूज गई थीं. बारबार यही कह रही थीं कि मेरी फूल सी बेटी ने उस का क्या बिगाड़ा था जो उस दरिंदे ने उसे ऐसी मौत दी.

समझ में नहीं आ रहा था कि रमा को क्या कह कर सांत्वना दे… विभा ने उन्हें खिलाने का प्रयास किया पर उन के मुंह से निकला कि जिस की बेटी का अभी तक अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ उस के मुंह में अन्न कैसे जा सकता है.

रमा का प्रलाप कठोर से कठोर मन को भी द्रवित कर रहा था. आखिर जवान इकलौती बेटी की दुर्दांत मृत्यु से किस का दिल नहीं उबलेगा पर चाह कर भी कोई कुछ नहीं कर सकता था… इस दर्द को सहने के अतिरिक्त कोई चारा भी तो न था.

इसी बीच इंस्पैक्टर ने हाल में प्रवेश किया. उसे देखते ही रमा ने पूछा, ‘‘इंस्पैक्टर साहब, अपराधी का पता चला?’’

‘‘अभी तो नहीं पर क्या दिव्या से किसी की कोई दुश्मनी थी?’’

‘‘नहीं, मेरी बेटी तो बहुत मृदुभाषी थी. उस का किसी से कोई बैर नहीं था,’’ रमा रुंधे गले से बोली.

‘‘आप याद कीजिए विशाल साहब, बिना दुश्मनी के कोई किसी के साथ बलात्कार कर उसे इतनी बेरहमी से मौत के घाट नहीं उतारता,’’ इंस्पैक्टर ने रमा के पति से पूछा.

‘‘मुझे तो याद नहीं है, सिवा इस के कि उस ने विवाह के लिए संजीव नामक युवक से इसलिए मना कर दिया था कि वे दहेज मांग रहे थे.’’

‘‘आप मुझे उस का पता दीजिए. उस से भी पूछताछ कर के देखते हैं. वैसे हम ने इस काम के लिए खोजी कुत्ते भी लगाए हैं… दिव्या की कौल्स भी खंगाल रहे हैं. उस समय एक नंबर से उसे कौल आई थी. उस नंबर को तलाशने का प्रयास कर रहे हैं… खोजी कुत्ते ने जिस स्पौट की ओर हमारा ध्यान केंद्रित किया वहां पर सीसीटीवी कैमरे भी लगे हैं. उन की फुटेज बाइक के पीछे चेहरा ढके किसी लड़की को बैठा तो दिखा रही हैं पर हैलमेट लगा होने के कारण न तो आदमी को पहचान पा रहे हैं न ही चेहरा ढका होने के कारण लड़की को. आश्चर्य तो इस बात का है कि जिस रूट से वह बाइक गई है, उस रूट पर सीसीटीवी कैमरे लगे होने के बावजूद हमें न बाइक का नंबर दिखा और न ही उस लड़के का पता चल पा रहा है. पर आप चिंता न करें, कानून के हाथ बहुत लंबे हैं… अपराधी पकड़ा अवश्य जाएगा.’’

‘‘सर, बुरा न मानें तो एक बात कहूं?’’ निशा ने पूछा.

‘‘जी, कहिए.’’

‘‘जैसे मूवी में पुलिस सायरन बजाती आती है ताकि अपराधी को भागने का अवसर मिल जाए ठीक वैसे ही जगहजगह लगे आप के सीसीटीवी कैमरे हैं… जहांजहां कैमरे लगे हैं वहांवहां ‘आप कैमरे की नजर में हैं’ लिखी वार्निंग क्या अपराधी को उस की कैद में आने देगी? आशा है मेरे इस प्रश्न पर आप और आप की सरकार अवश्य ध्यान देगी.

‘‘‘आप कैमरे की नजर में हैं’ के बोर्ड जगहजगह मिल जाएंगे. कहीं कैमरे चल रहे होते हैं तो कहीं बंद पड़े होते हैं, उन्हें ठीक कराने की भी किसी को फुरसत नहीं होती है. चाहे हम कितने भी उपाय कर लें, अगर अपराधी को अपराध करना है तो उस का शातिर दिमाग कोई न कोई उपाय खोज ही लेगा,’’ काफी दिनों से मन में उमड़तीघुमड़ती बात कह देने से जहां निशा के मन का बोझ कम हो गया था, वहीं उस की बात सुन कर सन्नाटा भी छा गया था. निधि के स्कूल से आने का समय हो गया था. अत: वह क्षमा मांगते हुए घर लौट आई.

रोज घटती ये घटनाएं उसे चैन नहीं लेने दे रही थीं. 7 वर्षीय बच्ची हो या वयस्क लड़की. क्या लड़की सिर्फ देह भर ही है, जिसे जब चाहा, जैसे चाहा रौंदा और चलते बने? अगर किसी ने विरोध करने का प्रयास किया तो उसे रास्ते से हटाने में भी संकोच नहीं किया… निधि और दिव्या दोनों ही केसों में अपराधी अनजान नहीं थे. अगर जानपहचान वाले ही धोखा करें तो एक स्त्री क्या करे? जीवन को चलना है सो वह तो चलता ही जाता है, चाहे आंधी आए या तूफान…

धीरेधीरे 6 महीने बीत गए. कभी पुलिस की खोज दिव्या के फेसबुक फ्रैंड की ओर घूमती, तो कभी उस के क्लास के लड़कों पर… निशा के मतानुसार, ‘आप कैमरे की नजर में हैं’ के वार्निंग साइन बोर्ड के कारण अपराधी अभी तक पकड़ में नहीं आ पाया था. 6 महीने बाद भी पुलिस अंधेरे में हाथपैर मार रही थी. निशा को लग रहा था कि अगर यही हाल रहा तो शायद एक दिन कोई क्लू न मिलने के कारण केस ही बंद न हो जाए. उस से भी बुरा उसे यह सोच कर लग रहा था कि सारे सुबूत पेश करने के बावजूद भी निधि के आरोपी को सजा नहीं मिल पाई है… तारीख पर तारीख लगती जा रही है… अगर न्याय में ऐसे ही देरी होती रही तो अपराधी को अपराध करने से शायद ही कोई रोक पाए.

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अमानुषों द्वारा दिल में लगाई गई इस आग में उस जैसे लोगों का तिलतिल जलना नियति बनती जा रही है. निशा ने निश्चय कर लिया था कि उसे इन आग की लपटों से अपनी बेटी को बचाना है.. वह निधि को जूडोकराटे की शिक्षा देने के साथसाथ उस की उम्र के अनुसार शारीरिक संरचना में होते परिवर्तनों व सैक्स ऐजुकेशन देने का भी भरपूर प्रयास करेगी ताकि दोबारा ऐसी अनहोनी उस के जीवन में न आए. वह इस हादसे को अपने जीवन पर हावी नहीं होने देगी… उस की इस सोच ने उस के मन में छाए अंधेरे को दूर करने का प्रयास शुरू कर दिया.

वार्निंग साइन बोर्ड: भाग-3

दूसरे दिन निशा निधि को स्कूल के लिए तैयार करने लगी तो उस ने कहा, ‘‘ममा, मुझे स्कूल नहीं जाना है.’’

‘‘बेटा, स्कूल तो हर बच्चे को जाना होता है. अगर आप स्कूल नहीं जाओगे तो डाक्टर कैसे बनोगे?’’

‘‘मुझे डाक्टर नहीं बनना है.’’

‘‘घर में रह कर बोर नहीं हो जाओगी… स्कूल में बहुत सारे फ्रैंड्स मिलेंगे. गेम होंगे और आप को अच्छीअच्छी बुक्स भी पढ़ने को मिलेंगी.’’

निधि के चेहरे पर थोड़ी सहजता देख कर निशा ने पुन: कहा, ‘‘शुचि भी आप के साथ जाएगी.’’

‘‘क्या वह भी मेरे साथ मेरी क्लास में पढ़ेगी?’’

‘‘नहीं बेटा, पर वह आप के स्कूल में ही पढ़ती है.’’

‘‘ओके ममा…’’

‘‘शुचि तुम तैयार हो गईं? चलो मैं तुम दोनों को स्कूल छोड़ आती हूं.’’

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‘‘आंटी, मेरी बस आ रही होगी.’’

‘‘आज मेरे साथ चलो. निधि भी कल से तुम्हारे साथ बस से आएगीजाएगी. आज उस की फीस जमा करा दूंगी.’’

‘‘ओके आंटी.’’

उस दिन निशा ने उन्हें स्कूल छोड़ दिया था. खुशी तो इस बात की थी कि कुछ ही दिनों में निधि ने स्वयं को स्कूल में ऐडजस्ट कर लिया था. अब वह बिना आनाकानी किए स्कूल जाने लगी थी. शुचि के साथ ने उसे पहले जैसी चंचल बना दिया था पर फिर भी वह कभीकभी रात में डरते हुए उठ कर बैठ जाती या नींद में बड़बड़ाती कि प्लीज अंकल, मुझे पनिश मत करो, मैं गंदी लड़की नहीं हूं.

निशा समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे. दीपक वैसे ही परेशान था. औफिस, कोर्टकचहरी… अभी सोच ही रही थी कि मोबाइल बज उठा. उस के फोन उठाते ही दीपक ने कहा, ‘‘निशा, स्कूल प्रशासन ने स्विमिंग इंस्ट्रक्टर को बरखास्त कर दिया है तथा वकील नागेंद्र ने कोर्ट में विशेष अर्जी दे कर कोर्ट से मांग की है कि बच्ची की उम्र को देखते हुए बच्ची को कोर्ट न आने की अनुमति प्रदान की जाए. सिर्फ डा. संगीता तथा उस के द्वारा निधि के रिकौर्ड किए बयान को ही साक्ष्य मान लिया जाए. देखो क्या होता है? इस के साथ ही एक खुशखबरी और है, मेरे स्थानांतरण की अर्जी को मौखिक रूप से स्वीकार कर लिया गया है. लिखित रूप में आदेश महीने भर में मिल जाना चाहिए.’’

सुन कर निशा ने चैन की सांस ली. सजा तो वह भी उस दरिंदे को दिलवाना चाहती थी, पर उस की एक ही शर्त थी कि इस सब में निधि का नाम न आए… वह नहीं चाहती थी कि वह बारबार उन पलों को जीए, जिन्होंने उस के तनमन को घायल कर दिया है.

निधि का निरंतर बड़बड़ाना निशा की रात की नींद तथा दिन का चैन खराब कर रहा था. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे उस के मन का डर समाप्त किया जाए. फिर उस ने सोचा क्यों न किसी चाइल्ड साइकिएट्रिस्ट से संपर्क करे. पर अलका के पास रहते हुए निधि को डाक्टर के पास ले जाना संभव नहीं था. न जाने कितने प्रश्न उठते. इसी सोच के तहत उस ने एक दिन अलका से कहा, ‘‘बहुत दिन हो गए तुम्हारे पास रहतेरहते, अब मैं चाहती हूं अलग घर ले लूं. दीपक भी शायद अगले महीने तक आ जाएं.’’

‘‘तुम्हारे रहने से मुझे अच्छा लग रहा है. शुचि भी निधि के साथ बहुत हिल गई है, पर तुम्हारा कहना भी जायज है. अभी कुछ ही दिनों पूर्व इसी अपार्टमैंट में एक घर खाली हुआ है, तुम देख लो. अगर पसंद आ जाए तो शिफ्ट कर लेना, पास भी रहोगी.’’

निशा को वह घर पसंद आ गया और उस ने वहीं शिफ्ट कर लिया. उस के इस फैसले से अलका के साथ निधि और शुचि भी यह सोच कर बेहद प्रसन्न थीं कि उन का साथ नहीं छूटेगा. अलका ने स्वयं यह कह कर उस के मन के बोझ को हलका कर दिया था कि तुम निधि की चिंता मत करना, तुम्हारे औफिस से आने तक निधि मेरे पास ही रहेगी.

निशा डा. सुभाष से अपौइंटमैंट ले कर पहले स्वयं उस से समस्या के बारे में डिस्कस करने गई. सुन कर डाक्टर ने कहा, ‘‘आप बच्ची को ले कर कल इसी समय आ जाएं. बच्ची कम उम्र की है. अत: हमें बहुत ही सावधानी से उस के डर को समाप्त करना होगा पर मुझे विश्वास है कि हम सफल होंगे.’’

‘‘डाक्टर इसी आशा के साथ आप के पास आई हूं.’’

दूसरे दिन निशा निधि को ले कर डा. सुभाष के पास गई. डा. सुभाष ने उसे देख कहा, ‘‘स्वीट ऐंजिल, वाट इज योर गुड नेम?’’

‘‘निधि.’’

‘‘निधि बेटा, आप की ममा कह रही हैं कि आप ‘पनिश मत करो… पनिश मत करो… गंदी लड़की’ कहते हुए अकसर रात में उठ कर बैठ जाती हैं. कौन आप को पनिश करता है?’’

डाक्टर की बात सुन कर निधि ने निशा की ओर देखा.

‘‘डरो मत, डाक्टर अंकल को सचसच बता दो.’’

‘‘पर आप ने तो बताने के लिए मना किया था?’’

‘‘मना किया था बेटा पर ये डाक्टर अंकल हैं. इन को बताने से ये आप के डर को दूर कर देंगे.’’

‘‘अच्छा छोड़ो, यह बताओ आप को किसी अंकल ने चोट पहुंचाई थी? बाद में उस ने कहा कि आप गंदी लड़की हो, इसलिए आप को पनिश किया गया?’’

‘‘पर डाक्टर अंकल मैं ने कुछ गलत नहीं किया… मैं गंदी लड़की नहीं हूं.’’

‘‘यही बात तो मैं आप से कहना चाह रहा हूं… गंदी आप नहीं वह अंकल है जिस ने आप को चोट पहुंचाई.’’

‘‘फिर सुजाता मैम ने ऐसा क्यों कहा कि तुम गंदी लड़की हो, इसलिए तुम्हें पनिश किया गया?’’

‘‘तुम्हारी मैम ने गलत कहा.’’

‘‘पर क्यों डाक्टर अंकल?’’

‘‘अच्छा यह बताओ, अगर तुम अपनी किसी मित्र को चोट पहुंचाती हो तो गंदा कौन हुआ?’’

‘‘मैं.’’

‘‘बिलकुल ठीक. इसी तरह उस अंकल ने आप को चोट पहुंचाई तो गंदा काम उस ने किया न कि आप ने.’’

‘‘फिर ममा किसी को बताने के लिए मना क्यों करती हैं?’’

‘‘आप की ममा ठीक कहती हैं. बुरी बातें जो हमें चोट पहुंचाती हैं, उन्हें बारबार याद नहीं करना चाहिए.’’

‘‘ओ.के. अंकल.’’

‘‘निशाजी आज के लिए इतना ही काफी है. अगले हफ्ते फिर इसी समय… आई होप जल्द ही सब ठीक हो जाएगा.’’

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इसी बीच दीपक से पता चला कि यलो लाइन इंटरनैशनल स्कूल ने सीसीटीवी लगाने का निर्णय कर लिया है. सुन कर उस ने मन ही मन सोचा अब चाहे जो भी प्रबंध कर लें निधि के साथ हुई घटना तो बदल नहीं जाएगी… वैसे भी सार्वजनिक स्थानों पर लगे सीसीटीवी कैमरे के पास लिखा स्लोगन ‘आप कैमरे की नजर में हैं’ उसे कैमरा कम कैमरा लगे होने का विज्ञापन अधिक नजर आता था.

केस की जिम्मेदारी वकील को सौंप कर महीने भर में ही दीपक भी आ गया था. सब कुछ भुला कर नए सिरे से जिंदगी शुरू करने का प्रयत्न कर रहे थे. अब निशा रोज निधि का होमवर्क कराते हुए उस से उस की पूरे दिन की ऐक्टिविटीज के बारे में पूछने लगी थी ताकि उसे पता रहे कि वह स्कूल में किस से मिलजुल रही है, क्या कर रही है तथा कहां आतीजाती है?

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वार्निंग साइन बोर्ड: भाग-2

‘‘निशा तुम उस राक्षस के खिलाफ केस दायर करो. उस के खिलाफ गवाही मैं दूंगी… मैं ने अपने मोबाइल पर निधि का बयान रिकौर्ड कर लिया है,’’ कहते हुए डा. संगीता के चेहरे पर आक्रोश साफ झलक रहा था.

डा. संगीता के साथ ने निशा को आत्मिक बल प्रदान किया. पर क्या ऐसा करना उचित होगा? कहीं यह बात समाज में फैल गई तो निधि का जीना दूभर न हो जाए… हमारे समाज में लड़कों के हजार खून माफ हैं पर लड़की के दामन पर लगा एक छोटा धब्बा भी उस के पूरे जीवन पर कालिख पोत देता है… निधि पर इस घटना का बुरा असर न पड़े, इसलिए निशा ने निधि के सोने के बाद ही दीपक को इस घटना के बारे में बताने का निश्चय किया.

दीपक यह सुनते ही भड़क गया. मेज पर हाथ मारते हुए बोला, ‘‘मैं उस कमीने को छोड़ूंगा नहीं… सजा दिलवा कर ही रहूंगा.’’

‘‘शांत दीपक शांत…’’

‘‘सुन कर मेरा भी खून खौला था… तुम्हारी जैसी ही बात मेरे भी दिमाग में आई थी, पर अगर हम इस सचाई को दुनिया के सामने लाते हैं तो क्या समाज की उंगली हमारे ऊपर नहीं उठेगी? हो सकता है लोग बच्ची का जीना भी दूभर कर दें?’’

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‘‘शायद तुम्हारा कहना ठीक हो पर ऐसा कर के क्या हम अपराधी को मनमानी करने की छूट नहीं देंगे? आज हमारी बेटी उस की हवस का शिकार हुई है, कल न जाने कितनों को वह वहशी अपनी हवस का शिकार बनाएगा?’’

इस सोच ने अंतत: हमें अपने अंत:कवच से बाहर आने के लिए प्रेरित किया तथा हम ने एफआईआर दर्ज करवाई एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म की. डा. संगीता की गवाही मजबूत सुबूत बनी.

बच्ची के आरोपी को पहचानने के बावजूद स्कूल प्रशासन इस आरोप को मान ही नहीं रहा था. मानता भी कैसे उस की अपनी साख पर जो बन आई थी. यह खबर आग की तरह फैली. मीडिया के साथ अन्य बच्चों के मातापिता ने उन की आवाज को बल दिया, क्योंकि आज जो एक बच्ची के साथ हुआ है वह कल को किसी और की बच्ची के साथ भी तो हो सकता है. अंतत: पुलिस ने स्विमिंग इंस्ट्रक्टर को गिरफ्तार कर लिया.

दूसरे दिन यह खबर तमाम समाचारपत्रों में प्रमुखता के साथ छपी. यलो लाइन इंटरनैशनल स्कूल में 7 वर्ष की बच्ची के साथ रेप… स्विमिंग करने के बाद स्विमिंग पूल के पास बने चैंबर में बच्ची कपड़े बदलने के लिए गई थी. उस के पीछेपीछे स्विमिंग इंस्ट्रक्टर भी चैंबर में घुस गया तथा उस के मुंह पर कपड़ा बांध कर उसे डराते हुए उस के साथ जबरदस्ती की तथा किसी को न बताने की चेतावनी भी दी. बच्ची की क्लास टीचर ने जब उसे दहशत में देखा तो अनहोनी की आशंका से उस ने उस से प्रश्न किया. उस के प्रश्न के उत्तर में बच्ची को दर्द…दर्द कहते हुए रोते देख कर क्लास टीचर ने प्रिंसिपल को बताया. प्रिंसिपल ने डाक्टर को बुला कर चैकअप करवाने को कहा.

डाक्टर ने उस की ड्रैसिंग कर दवा खाने को दे दी. इस के बाद टीचर ने उसे घर में किसी को कुछ भी न बताने की चेतावनी देने के साथ ही यह भी कहा कि तुम गंदी लड़की हो, इसलिए तुम्हें सजा दी गई. अगर तुम घर में बताओगी तो तुम्हें अपने मम्मीपापा से भी डांट खानी पड़ेगी.

पढ़ कर निशा ने माथा पीट लिया. दनदनाती हुई दीपक के पास गई तथा कहा, ‘‘देखो समाचारपत्र… सब जगह हमारी थूथू हो रही होगी.’’

‘‘थू…थू… किसलिए… हमारी बच्ची की कोई गलती नहीं है.’’

‘‘आप पुरुष हैं शायद आप इसलिए ऐसा सोच रहे हैं… एक लड़की के दामन पर लगा एक छोटा सा दाग भी उसे दुनिया में बदनाम कर देता है.’’

‘‘तो क्या हम उस अपराधी को ऐसे ही छोड़ दें?’’

‘‘मैं ने ऐसा तो नहीं कहा पर मैं नहीं चाहती कि हमारी निधि का नाम दुनिया के सामने आए.’’

‘‘नहीं आएगा… पर मैं अपराधी को सजा दिला कर रहूंगा… मैं ने वकील से बात कर ली है.’’

‘‘वह तो ठीक है पर इस सब में पता नहीं कितना समय लगेगा… मैं अपनी बच्ची को तिलतिल सुलगने नहीं दे सकती… निधि के मनमस्तिष्क से कड़वी यादें मिटाने के लिए हमें यहां से दूर जाना होगा.’’

‘‘दूर?’’

‘‘आप अपना स्थानांतरण करवा लीजिए.’’

‘‘स्थानांतरण इतना आसान है क्या?’’

‘‘निधि के जीवन से अधिक कुछ कठिन नहीं है. अगर आप नहीं करा सकते तो मैं अपने मैनेजमैंट से बात करती हूं. मेरा हैड औफिस दिल्ली में है. वहां की एक लड़की यहां आना चाह रही थी… म्यूचुअल स्थानांतरण होने में कोई परेशानी नहीं होगी.’’

म्यूचुअल ट्रांसफर में ज्यादा परेशानी नहीं हुई. 1 महीने के अंदर निशा का स्थानांतरण दिल्ली हो गया. पहले दिल्ली जाने से मना करने के कारण औफिस वालों की आंखो में प्रश्न झलके थे, पर फैमिली प्रौब्लम का हवाला दे कर उन का उस ने स्थानांतरण कर दिया. दीपक ने भी स्थानांतरण के लिए आवेदन कर दिया था.

दिल्ली में निशा निधि का डीपीएस में दाखिला करवाने के लिए गई, प्रिंसिपल ने उस के ट्रांसफर सर्टिफिकेट को देख कर कहा, ‘‘यलो लाइन इंटरनैशनल स्कूल. वहां कुछ दिन पूर्व स्कूल के स्टाफ के किसी कर्मचारी द्वारा एक बच्ची का रेप हुआ था.’’

‘‘हां, मैम. मेरा यहां स्थानांतरण हो गया है. आप का स्कूल प्रसिद्ध है. इसलिए मैं इस का यहां दाखिला कराना चाहती हूं,’’ उस ने बिना घबराए उत्तर दिया, क्योंकि उसे पता था कि ऐसे प्रश्न शायद आगे भी उठें पर उसे विचलित नहीं होना है. गनीमत है कि निधि उस के साथ नहीं आई थी. उसे वह अपनी मित्र अलका के पास छोड़ आई थी. उस ने सोचा था पहले स्वयं जा कर स्कूल प्रशासन से बात कर ले. पता नहीं दाखिला होगा भी या नहीं.

‘‘संयोग से हफ्ता भर पहले ही स्थानांतरण के कारण फर्स्ट स्टैंडर्ड में एक स्थान रिक्त हुआ है, हम निधि को उस की जगह ले लेंगे… आप फार्म भर दीजिए तथा कल से उसे स्कूल भेज दीजिए.’’

‘‘थैंक्यू मैम,’’ निशा ने उठते हुए उन से हाथ मिलाते हुए कहा.

‘‘मोस्ट वैलकम.’’

अलका उस की बचपन की मित्र थी. अकसर वह उसे बुलाती रहती थी. अत: जैसे ही उसे ट्रांसफर और्डर मिला, उस ने सब से पहले उसे ही फोन किया. उस ने सुनते ही कहा, ‘‘हमारी दिल्ली में तुम्हारा स्वागत है. तुम सीधे मेरे पास ही आओगी.’’ उस की लड़की शुचि डीपीएस में पढ़ती थी. अत: उस ने निधि का दाखिला डीपीसी में कराने का सुझाव दिया था.

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वैसे तो निशा की ननद विभा भी दिल्ली में रहती थी पर एक तो उस का घर उस के औफिस से दूर था वहीं उसे डर था अगर उसे जरा सी भी भनक लग गई तो निधि का जीना हराम हो जाएगा. वह चलताफिरता अखबार है… उस के पेट में एक भी बात नहीं पचती. उस ने कहीं पढ़ा था कि एक अच्छा मित्र अच्छा हमराज हो सकता है जबकि रिश्तेदार बाल की खाल निकालने से बाज नहीं आते. अपने मन के इसी डर के कारण उस ने उन के पास न जा कर अलका के पास ही रुकना मुनासिब समझा.

आगे पढ़ें- दूसरे दिन निशा निधि को स्कूल के लिए तैयार करने लगी तो…

वार्निंग साइन बोर्ड: भाग-1

निशा औफिस के बाद निधि को लेने स्कूल पहुंची. उसे देखते ही दौड़ कर उस के पास आने वाली निधि ठीक से चल भी नहीं पा रही थी.

निशा को देखते ही अटैंडैंट ने दवा देते हुए कहा, ‘‘मैम, आज निधि दर्द की शिकायत कर रही थी. डाक्टर को दिखाया तो उन्होंने यह दवा दी है. आप इस दवा को दिन में 2 बार तो इस दवा को दिन में 3 बार देना.’’

‘‘मुझे फोन कर दिया होता?’’

‘‘हो सकता है न मिला हो, इसलिए डाक्टर को बुला कर दिखाया हो.’’

‘‘ओके, डाक्टर का परचा?’’

‘‘डाक्टर ने परचा नहीं दिया, सिर्फ यह दवा दी है.’’

निशा ने सोचा शायद इस से परचा कहीं खो गया होगा. अत: झूठ बोल रही है… फिर उस ने मन ही मन स्कूल प्रशासन को धन्यवाद दिया. नाम के अनुरूप काम भी है, सोच कर संतुष्टि की सांस ली. निधि को किस कर गोद में उठा कर कार तक ले गई. निधि कार में बैठते ही सो गई. कैसी भागदौड़ वाली जिंदगी है उस की… वह अपनी बेटी को भी समय नहीं दे पा रही है. स्कूल तो ढाई बजे ही बंद हो जाता है पर घर में किसी के न होने के कारण उसे निधि को स्कूल के क्रैच में ही छोड़ना पड़ता है. कभीकभी लगता है कि एक छोटी सी बच्ची पर कहीं जरूरत से ज्यादा शारीरिक और मानसिक बोझ तो नहीं पड़ रहा है. पर करे भी तो क्या करे? अपनेअपने कार्यक्षेत्र में व्यस्त होने के कारण न तो उस के और न ही दीपक के मातापिता का लगातार उन के साथ रहना संभव है. बस एक ही उपाय है कि वह नौकरी छोड़ दे, पर उसे लगता है कि अगर नौकरी छोड़ देगी तो फिर पता नहीं ऐसी नौकरी मिले या न मिले.

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घर आ कर निशा ने निधि को जगाने का प्रयास किया. न जागने पर निशा ने उसे यह सोच कर गोद में उठा लिया कि शायद उसे दर्द से अभी आराम मिला हो, इसलिए गहरी नींद में सो रही है. रात को निधि ने खाना भी नहीं खाया. रात में वह बुदबुदाने लगी. उस की बुदबुदाहट सुन कर निशा की नींद खुल गई. उसे थपथपाने लगी तो पाया कि उसे तेज बुखार है. नींद में ही निशा ने उसे दवा दे दी. दवा खाते ही वह पुन: बुदबुदाई, ‘‘मैं गंदी लड़की नहीं हूं. पनिश मत करो अंकल, मुझे पनिश मत करो.’’

निशा समझ नहीं पा रही थी कि निधि ऐसा क्यों कह रही है. क्या उसे किसी ने पनिश किया? पर क्यों? क्या उस का दर्द इसी वजह से है? निधि की दशा देख कर उस ने दूसरे दिन छुट्टी लेने का निर्णय कर लिया वरना पहले कभीकभी ऐसी ही स्थितियों में उस में और दीपक में झगड़ा हो जाता था, बिना यह सोचेसमझे कि उन के इस वादविवाद का उस मासूम पर क्या असर होता होगा?

दूसरे दिन निधि सुबह 10 बजे के लगभग उठी. उठते ही वह निशा से चिपक कर रोने लगी और फिर रोतेरोते ही उस ने कहा, ‘‘ममा, मैं अब कभी स्कूल नहीं जाऊंगी.’’

‘‘क्यों बेटा, क्या आप से स्कूल में किसी ने कुछ कहा?’’ उस ने हैरानी से पूछा.

‘‘बस मैं स्कूल नहीं जाऊंगी.’’

‘‘लेकिन बेटा, स्कूल तो हर बच्चे को जाना पड़ता है.’’

‘‘मैं ने कहा न मैं स्कूल नहीं जाऊंगी,’’ कहते हुए वह फफकफफक कर रो पड़ी.

‘‘ठीक है, रो मत बेटा. जब आप स्कूल जाना चाहो तभी भेजूंगी,’’ निशा ने उसे सांत्वना देते हुए कहा.

‘कल स्कूल जा कर टीचर से बात करूंगी. न जाने ऐसा क्या घटित हुआ है इस लड़की के साथ कि हमेशा स्कूल जाने के लिए लालायित रहने वाली लड़की स्कूल ही नहीं जाना चाह रही है… फिर नींद में ‘पनिश…पनिश… कह रही थी,’ सोच कर मन को सांत्वना दी.

निशा निधि को नाश्ता करा कर उस के कपड़े बदलने लगी तो उस की पैंटी में खून के निशान देख कर चौंक गई कि 7 वर्ष की उम्र में रजस्वला… दर्द की वजह से वह पैर भी जमीन पर ठीक से नहीं रख पा रही थी. निशा की कुछ समझ में नहीं आया तो उसे डा. संगीता के पास ले जाना उचित समझा.

डा. संगीता ने उसे चैक करने के बाद कहा, ‘‘ओह नो…’’

‘‘क्या हुआ डाक्टर?’’

‘‘निशा, इस बच्ची के साथ रेप हुआ है,’’ डा. संगीता ने उसे अलग ले जा कर बताया.

‘‘रेप’’? पर कहां और कैसे? कल तो स्कूल के अतिरिक्त यह कहीं गई ही नहीं है?’’ डा. संगीता की बात सुन कर निशा ने चौंक कर कहा.

‘‘निशा यह मेरा अनुमान नहीं सचाई है.’’

‘‘क्या,’’ कह कर वह अपना सिर पकड़ कर कुरसी पर बैठ गई कि क्या हो गया है इन नरपिशाचों को… एक 7 वर्ष की बच्ची के साथ ऐसी घिनौनी हरकत… एक नन्ही बच्ची में भी उसे सिर्फ स्त्रीदेह नजर आई… मन क्यों नहीं कांपा इस मासूम के साथ बलात्कार करते हुए… इनसानियत को तारतार करने वाले इनसान के रूप में वह हैवान है… तभी उसे याद आया निधि का नींद में बड़बड़ाना कि प्लीज अंकल, मुझे पनिश मत करो…

‘‘निशा संभालो स्वयं को… तुम बिखर गईं तो बच्ची को कौन संभालेगा? हमें वस्तुस्थिति का पता लगाना होगा,’’ डा. संगीता बोलीं.

निशा ने निधि की ओर तड़प कर देखा. उस के चेहरे पर दर्द की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं. वह मासूम चुपचाप डाक्टर की बातों से अनजान उन की ओर देखे जा रही थी. आखिर डा. संगीता ने उस से पूछा, ‘‘बेटा, आप को चोट कैसे लगी?’’

निधि को चुप देख कर निशा ने डा. संगीता का प्रश्न दोहराते हुए पुन: पूछा, ‘‘निधि बेटा, डाक्टर आंटी की बात का उत्तर दो… तुम्हें चोट कैसे लगी?’’

‘‘ममा, मैं नहीं बता सकती वरना मुझे डांट पड़ेगी.’’

‘‘पर क्यों?’’

‘‘मैम ने कहा है कि अगर तुम घर में किसी को बताओगी तो तुम्हें अपने मम्मीपापा की भी डांट सुननी पड़ेगी… आप ने गलती की है, आप एक गंदी लड़की हो इसलिए आप को पनिशमैंट मिला है… ममा मैं ने कुछ नहीं किया… प्रौमिस,’’ कहते हुए उस की आंखें भर आईं.

‘‘बेटा, आप हमें बताओ… हम आप को कुछ नहीं कहेंगे.’’

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डा. संगीता के बारबार पूछे जाने पर निधि ने सचाई उगल दी. सचाई सुन कर निशा और डा.  संगीता अवाक रह गईं. एक स्विमिंग इंस्ट्रक्टर का ऐसा अमानवीय व्यवहार…

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Taarak Mehta Ka Ooltah Chashmah के ‘बापूजी’ के चलते शो के मेकर्स ने सरेआम मांगी माफी, इस बात पर मचा बवाल

शो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ (Taarak Mehta Ka Ooltah Chashmah) हर किसी को पसंद आता है. लोग अपने दिनभर की थकान को भूलकर इस शो को देखना पसंद करते हैं. वहीं दयाबेन के शो में दोबारा ना आने के बावजूद फैंस को ये शो पसंद आ रहा है. लेकिन हाल ही में शो में बापूजी की कुछ ऐसी बात कह दी कि उनके फैंस को पसंद नहीं आई, जिसके कारण शो के मेकर्स को माफी मांगनी पड़ी. आइए आपको बताते हैं क्या है पूरा मामला

भाषा की बात पर मांगी मांफी  

बापूजी का किरदार निभाने वाले टीवी स्टार अमित भट्ट (Amit Bhatt) ने हाल ही में शो के एक एपिसोड में हिंदी को मुंबई की भाषा बता डाला, जिसके बाद एक राजनीतिक पार्टी ने इस शो के खिलाफ हल्ला मचाना शुरू कर दिया.

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शो के मेकर्स ने कही ये बात

राजनीतिक पार्टी के कारण हल्ला मचने के बाद टीवी शो के मेकर्स ने ट्वीट कर कहा, ‘हम सिर्फ प्यार और खुशियां बांटने में यकीन करते है. लेकिन अगर हमारे शो से किसी को भी ठेस पहुंची है तो हम मांफी मांगते है. हम विविधता में एकता में विश्वास करते है और सभी धर्म और मातृभाषा का सम्मान करते है. हंसते रहिए और देखते रहिए तारक मेहता का उल्टा चश्मा.’

शो के इस एपिसोड के लिए हुई थी ये बात

कॉमेडी टीवी शो के एक एपिसोड में ‘बापूजी’ यानि अमित भट्ट कहते है, ‘देखिए हमारी गोकुलधाम मुंबई में है इसीलिए हम आज के दिन का विचार हिंदी में लिखेंगे. अगर गोकुलधाम चेन्नई में होती तो हम तमिल में लिखते और अगर अमेरिका में होती तो हम अंग्रेजी में लिखते.’ बापूजी की इस बात पर बवाल मच गया, जिसके बाद राजनीतिक पार्टी ने जमकर अमित भटट् की आलोचना की.

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बता दें, शो में दयाबेन की एंट्री ना होने के कारण फैंस काफी नाराज हैं, लेकिन फिर भी वह शो को प्यार करना नहीं छोड़ रहे.

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