बच्चों के लिए बनाएं छुहारा सेंवई

अधिकतम लोग सेवई खाना पसंद करते हैं पर अगर हम सिंपल सेवई को नए तरीके से बनाकर अपनी फैमिली को खिलाएं तो ये हेल्दी के साथ-साथ टेस्टी भी होगी. छुहारा सेंवई एक हेल्दी के साथ-साथ टेस्टी डिश है, जिसे आप आसानी से अपनी फैमिली और फ्रेंड्स के साथ बच्चों को खिला सकते हैं.

हमें चाहिए-

-1/2 कप सेंवई

-3/4 लिटर दूध

-1 बड़ा चम्मच किशमिश

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-2 छोटे चम्मच बादामपिस्ता बारीक कटा

-1/2 छोटा चम्मच इलायची चूर्ण

-2 बड़े चम्मच छुहारों का पाउडर

-2 छोटे चम्मच देशी घी.

बनाने का तरीका

एक नौनस्टिक बरतन में घी गरम कर के सेंवई भूनें. फिर दूध डाल कर गलने तक पकाएं. किशमिश और छुहारा पाउडर डाल कर धीमी आंच पर 5 मिनट और पकाएं. ठंडा होने पर इलायची चूर्ण व बादामपिस्ता बुरक कर सर्व करें.

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हॉट ब्रश से लाएं बालों में स्टाइल

किसी भी खास अवसर के लिये तैयार होने और स्टाइलिश लुक पाने के लिए अच्छी पसंद और फैशन की समझ के अलावा भी काफी सारी स्किल्स, इक्विपमेंट्स और प्रोडक्ट्स की जरूरत होती है. एसेसरीज की सही जुगलबंदी, मेकअप, हेयरस्टाइल और आप का अंदाज मिल कर आप के लुक को स्टाइलिश बनाते हैं.

आप के लुक में जान डालने का काम करता है आप का हेयरस्टाइल. और जब बात आकर्षक हेयरस्टाइल की हो तो आप को चाहिए हॉट ब्रश. आइये जानते हैं एसएसआईजे़ड इंटरनेशनल के रायड मर्चेंट से कि कैसे हॉट ब्रश की सहायता से आप अपने लुक को दे सकती हैं एक हॉट अंदाज;

अगर आप के बाल उलझे हुए और मैनेज न होने वाले हों तो उन्हें ब्लो-ड्राइ लुक देने के लिये हॉट ब्रश का इस्तेमाल करें. बस कंघी की तरह पूरे बालों में इस के हॉट ब्रिसल्स चलायें. बालों को साइड की तरफ करें और हो गयीं आप तैयार.

जब कोई शख्स बालों पर हॉट ब्रश का इस्तेमाल करता है तो उस के बाल वॉर्म, नरम और आसानी से मैनेज किये जा सकने वाले बन जाते हैं. स्टाइल करने के लिये अलगअलग तरीकों के साथ प्रयोग करने से यह ट्रिक तुरंत ही काम करेगा.

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हॉट ब्रश का इस्तेमाल बालों को स्ट्रेट करने के लिये भी किया जा सकता है.  बालों के आखिरी छोर पर एक ट्विस्ट दे कर और भी मैजिकल लुक दिया जा सकता है. बस अपने बालों के निचले हिस्से को ब्लेंड करें और उन्हें नैचुरली स्ट्रेट बनायें.

बालों के निचले हिस्से को हॉट ब्रश के साथ फोल्ड करते हुए कर्ली हेयर लुक दें. ब्रिसल्स के एक पूरे राउंड के साथ यह बालों को विंटेंज टच देगा.

अगर आप के पास समय की कमी है तो हॉट ब्रश से फ्रेश, लंबे समय तक टिकने वाले और नीट लुक के लिये बालों को स्लीक, स्ट्रेट लुक में छोड़ दें.

 

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अगर आप स्ट्रेट हेयर लुक से ऊब गयी हैं या फिर कुछ नये ट्रिक्स आजमाने का आप के पास समय है तो फिर अपने बालों की हॉट ब्रशिंग करने से पहले सही प्रोडक्ट और एसेसरीज का इंतजाम कर लें. बालों को उस समय सेट करने की कोशिश करें जब वे वॉर्म हों और कोई भी शेप लेने के लिये तैयार हों.

आप वॉर्म बालों की चोटी बना सकती हैं और 15-20 मिनट के बाद उन्हें खोल सकती हैं. इस से आप को मिलेगा शानदार, वेवी हेयर लुक. आप जितनी भी चोटियां बनायेंगी उतने ही अच्छे और छोटे वेव्स तैयार होंगे.

अगर आप अपने बालों को बन की तरह बांधना चाहती हैं तो बस अपने सिर के क्राउन वाले हिस्से को सामने की तरफ हॉट ब्रश करें और अपने चेहरे के शेप के अनुसार अपने बालों को शेप दें. इजी लुक के लिये उन्हें ट्विस्ट और टर्न भी दे सकती हैं.

अपने स्ट्रेट और ट्विस्टेड बालों को खुला छोड़ सकती हैं जब कि एलिगेंट या मैसी हेयर बन के लिये बाकी बालों को बांध दें.

केवल एक चोटी भी बालों को ट्रेंडी तथा कैजुअल लुक दे सकती है.

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हॉट ब्रश इस्तेमाल करने से पहले बालों को हल्का सूखने दें. अब अपने बालों की उलझन सुलझायें. इस के बाद बालों पर एक सुरक्षा कवच चढ़ाने के लिये सीरम का इस्तेमाल करें ताकि हीट बालों को कोई नुकसान न पहुंचा सके.

एक बार जब आप अपने बालों को स्ट्रेट कर लें तो ट्रेंडी हेयर स्टाइल के लिये अलगअलग तरह की एसेसरीज का प्रयोग करें. हेयर सेट स्प्रे की मदद से इस लुक को सेट करें ताकि बाल संवरे हुए नज़र आयें.

अविवाहित ननद डेढ़ सास

लेखक- भारत भूषण श्रीवास्तव

इस में कोई शक नहीं कि बेटी का रिश्ता तय करते वक्त मां-बाप इस बात पर ज्यादा गौर करते हैं कि कहीं लड़के की बड़ी बहन अविवाहित तो नहीं. इस की वजह भी बेहद साफ है कि घर में चलती उसी की है. सास अब पहले की तरह ललिता पवार जैसी क्रूर नहीं रह गई है, लेकिन बड़ी अविवाहित ननद बिंदु, अरुणा ईरानी और जयश्री टी जैसी है, जिस के हाथ में घर की न केवल चाबियां, बल्कि सत्ता भी रहती है.

इसीलिए उसे डेढ़ सास के खिताब से नवाजा जाता है. छोटे भाई को वह बेटा भी कहती है और दोस्त भी मानती है. ऐसे में बेटी शादी के बाद उस से तालमेल बैठा पाएगी, इस में हर मांबाप को शक रहता है. बेटी भले ही रानी बन कर राज न करे चिंता की बात नहीं, लेकिन ससुराल जा कर ननद के इशारों पर नाचने को मजबूर हो यह कोई नहीं चाहता, क्योंकि भाई का स्वाभाविक झुकाव कुंआरी बड़ी बहन की तरफ रहता ही है. हालांकि इस के पीछे उस की मंशा यह रहती है कि दीदी को एक अच्छी सहेली और छोटी बहन मिल जाएगी, लेकिन अधिकतर मामलों में ऐसा होता नहीं है, क्योंकि पत्नी और बहन दोनों उस पर बराबरी से हक जमाते हुए कुछ दिनों बाद बिल्लियों की तरह लड़ती नजर आती हैं

. भावनाओं को समझना मुश्किल भोपाल के 32 वर्षीय बैंक अधिकारी विवेक की बड़ी बहन 36 वर्षीय प्रेरणा की किन्हीं वजहों के चलते शादी नहीं हो पाई थी. मां की इच्छा के चलते तीनों ने फैसला लिया कि विवेक ही शादी कर ले. पिता थे नहीं, इसलिए विवेक की तरफ से शादी के सारे फैसले प्रेरणा ने लिए. शुचि के मांबाप ने भी मन में खटका लिए ही सही शादी कर दी. शुरू में प्रेरणा का रवैया बेहद गंभीर और परिपक्व था. उस ने पूरे उत्साह और जिम्मेदारी से शादी संपन्न कराई और शुचि को भाभी के बजाय छोटी बहन ही कहा.

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2-4 महीने ठीकठाक गुजरे. शुचि भी बैंककर्मी थी, लिहाजा हनीमून से लौटने के बाद उस ने अपनी नौकरी पर जाना शुरू कर दिया. एक बात उस ने न चाहते हुए भी नोटिस की कि पूरे हनीमून के दौरान विवेक दीदी की बातें ज्यादा करता था कि पापा के असामयिक निधन के बाद मम्मी बिलकुल टूट गई थीं और बिस्तर पर पड़ गई थीं तो उन की देखभाल के लिए दीदी ने शादी नहीं की, क्योंकि उस वक्त वह पढ़ रहा था. विवेक की नजर में दीदी का यह त्याग अतुलनीय था. शुचि उस की भावनाओं को समझ रही थी, लेकिन यह बात उसे खटक रही थी कि नैनीताल वे दीदी के त्याग का पुराण बांचने आए हैं या फिर रोमांस करते हुए एकदूसरे को समझने. भोपाल लौटते ही बात आईगई हो गई और चारों अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए. बहूबेटा और बेटी साथ खाने बैठते थे तो मां खुश हो जाती थीं.

हर समय शुचि की तारीफ करती रहती थीं कि उस के आने से घर में रौनक आ गई है. उलट इस के विवेक का पूरा ध्यान प्रेरणा पर रहता था कि ऐसी कोईर् बात न हो जो दीदी को बुरी बुरी लगे. हर बात में दीदी उस की प्राथमिकता में रहती थीं. वह जो भी शुचि के लिए खरीदता था वही प्रेरणा के लिए भी खरीदता था ताकि उसे बुरा न लगे. शुचि को इस पर कोई एतराज नहीं था. हालांकि कभीकभी उसे ये सब बुरा लगता था, लेकिन मम्मी की दी यह सीख उसे याद थी कि ऐसा शुरूशुरू में हो सकता है, इसलिए उसे इन बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, बल्कि पति का सहयोग करना चाहिए.

धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा और मुमकिन है फिर प्रेरणा की भी शादी हो जाए. कहां होती है चूक मगर ऐसा हुआ नहीं. उलटे दिक्कत उस वक्त शुरू हो गई जब दिनभर घर में खाली बैठी रहने वाली प्रेरणा शुचि के कामों में मीनमेख निकालने लगी और विवेक दीदी के लिहाज में चुप रहा. यहां तक भी शुचि कुछ नहीं बोली. लेकिन ननद का व्यवहार और घर में एकछत्र दबदबा उसे अखरने लगा. घर में क्या आना है, रिश्तेदारी कैसे निभानी है जैसी बातें प्रेरणा ही तय करती थी. और तो और आज सब्जी कौन सी बनेगी यह फैसला भी वही लेती थी. शुरू में जब शुचि बैंक से आती थी तो प्रेरणा उसे चाय बना कर दे देती थी. इस परिहास के साथ कि मेरी भाभी कम बहन ज्यादा थक गई होगी. लेकिन वक्त के साथ घर में पैदा हुआ यह सौहार्द खत्म हो रहा था.

थकीहारी शुचि या तो खुद चाय बना कर पीती या फिर बिना पीए ही रहती. ऐसे कई बदलावों पर प्रेरणा पहले तो खामोश रही पर जल्द ही उस ने शुचि को महारानी के खिताब से नवाजते हुए एक दिन विवेक से कह दिया कि बेहतर होगा कि वह अलग रहने लगे. इस धमाके से सभी हैरान रह गए खासतौर से विवेक जिस ने कभी ऐसी स्थिति की उम्मीद ही नहीं की थी. अब घर में स्थायी रूप से कलह पसर गई थी और शुचि का मुंह भी खुल गया था. यह सच्चा वाकेआ हर उस घर का है जहां डेढ़ सास है. रिश्तों को समझने और निभाने में कहां किस से कितनी चूक हुई है, इसे हर किरदार के लिहाज से देखा जाना जरूरी है ताकि यह समझ आए कि इस अप्रिय और अप्रत्याशित स्थिति की वजह क्या है.

विवेक: विवेक की गलती यह है कि उस ने पत्नी के मुकाबले बहन को ज्यादा तरजीह दी, जबकि उसे शुचि की भावनाओं का भी खयाल बराबर रखते हुए दोनों के बीच तालमेल बैठाना चाहिए था. शादी के बाद उसे बहन पर निर्भरता कम करनी चाहिए थी और शुचि को भी हर छोटेबड़े फैसले में शामिल करना चाहिए था. दीदी अकेली है, बड़ी है और अब हमें ही उस का ध्यान रखना है जैसी बातों से साफ है कि वह शुचि को प्रेरणा का प्रतिस्पर्धी मानने की गलती कर रहा था. उस की मंशा गलत नहीं थी, लेकिन हालात को औपरेट करने का तरीका गलत था. शुचि: ससुराल आते ही शुचि के मन में यह बात बैठ गई थी कि घर में उस की भूमिका एक सदस्य की नहीं, बल्कि मेहमान की है. लिहाजा, उस ने अपने अधिकार न तो हासिल किए और न ही इस्तेमाल. उस ने यह भी मान लिया कि जब सबकुछ प्रेरणा ने ही करना है तो वह क्यों किसी मामले में टांग अड़ाए. एक तरह से विवादों और जिम्मेदारियों से बचने के लिए वह बचाव की मुद्रा में रही.

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लेकिन बाद में प्रेरणा के ताने सुन कर आपा खो बैठी. प्रेरणा: शुरू में प्रेरणा की भूमिका अभिभावक की थी, लेकिन असुरक्षा के चलते वह खुद की तुलना शुचि से करने की गलती कर बैठी. खासी पढ़ीलिखी प्रेरणा यह नहीं समझ पाई कि विवेक और शुचि को एकदूसरे को समझने के लिए नजदीकियां और एकांत चाहिए और इस में उसे आड़े नहीं आना चाहिए. उस ने शुचि को न भाभी समझा और न ही बहन मान पाई. मां: मां की तटस्थ भूमिका का खमियाजा सभी भुगत रहे हैं जिन्होंने हालात को भांपने के बाद भी दखल नहीं दिया जो देना जरूरी था. बेटी की परेशानी के सामने उन्हें बहू की परेशानी समझ नहीं आई और वे चुप रहीं. जरूरी तो यह था कि वे तीनों को अलगअलग और इकट्ठा बैठा कर भी समझातीं, खासतौर से विवेक को कि उसे कैसे बहन और पत्नी के बीच संतुलन बैठाना है.

अब शुचि प्रैगनैंट है और मायके में रह रही है. उस के मम्मीपापा को भी समझ नहीं आ रहा है कि ऐसी हालत में क्या किया जाए. अगर विवेक को ज्यादा समझाएंगे तो वह भड़क भी सकता है, हालांकि वह हर सप्ताह शुचि से मिलने आता है और उसे समझाता है कि कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा. दीदी ने तो गुस्से में अलग होने की बात कह दी है. लेकिन शुचि को लगता है कि अब कुछ ठीक नहीं होगा और होगा तो तभी जब डेढ़ सास की शादी हो जाएगी.

Film Review: यहां जानें कैसी है तापसी की फिल्म Thappad

रेटिंगः साढ़े तीन स्टार

निर्माताः अनुभव सिन्हा और भूषण कुमार

निर्देशकः अनुभव सिन्हा

कलाकारः तापसी पन्नू, पावेल गुलाटी, रत्ना पाठक शाह,कुमुद मिश्रा, तनवी आजमी.

अवधिः दो घंटे 21 मिनट

‘‘बस एक थप्पड़ ही तो था.क्या करूं? हो गया ना..इससे ज्यादा जरूरी सवाल है यह है कि ऐसा हुआ क्यों? बस इसी ‘क्यों’ का जवाब तलाशती फिल्म‘‘थप्पड़’’लेकर आए हैं फिल्मकार अनुभव सिन्हा. पति द्वारा पत्नी को थप्पड़ मारना यानी कि घरेलू हिंसा.घरेलू हिंसा को लेकर कई फिल्में बन चुकी हैं.घरेलू हिंसा पर ही हिंसा प्रधान दृश्यों की भरमार वाली फिल्म ‘प्रोवोक्ड’में ऐश्वर्या राय बच्चन ने भी अभिनय किया था,मगर अनुभव सिन्हा की फिल्म में हिंसात्मक दृश्य नही है.यह फिल्म घरेलू ूहिंसा की बजाय पुरूष के उस अहम की चर्चा करती हैै,जिसके बारे मंे समाज में चर्चा नहीं होती.बिना भाषणबाजी के अनुभव सिन्हा ने कहानी का अंत पति पत्नी के बीच आपसी सहमति से तलाक के साथ किया है,जिसे सोच पाने की क्षमता अभी तक हमारे भारतीय पुरषसत्तात्मक समाज में तो बिल्कुल न के बराबर है.फिल्म में एक जगह अमृता की वकील नेत्रा का संवाद है-‘‘अगर एक थप्पड़ पर अलग होने की बात हो जाए,तो 50 परसेंट से ज्यादा औरतें मायके में हों.’’

आप भले ही अपनी पत्नी को हर सुख सुविधा देने के साथ साथ उससे भरपूर प्यार करते हों,फिर भी आपको अपनी पत्नी को एक थप्पड़ भी मारने का हक नही है.इसी मूल मुद्दे के इर्द गिर्द बुनी गयी कहानी वाली फिल्म ‘‘थप्पड़’’में पितृसत्तात्तमक सोच के खिलाफ बात करने के साथ साथ सभ्यता,मर्यादा,आदर्श बहू, परिवार और घर सहित कई मुद्दों पर बात की गयी है.मगर नारी स्वतंत्रता व समानता की बात करने वाली इस फिल्म के तमाम घटनाक्रम यथार्थ से परे और अस्वाभाविक हैं.

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कहानीः

फिल्म ‘‘थप्पड़’’ की मूल कहानी अमृता (तापसी पन्नू )और उसके पति विक्रम (पावेल गुलाटी)के इर्द गिर्द घूमती है.इस मूल कहानी के साथ ही तो दूसरी तरफ अमृता के घर की नौकरानी सुनीता(गीतिका विद्या ओवलियान) को उसके पति द्वारा हर दिन पीटने की कहानी चलती रहती है. अमृता की मां संध्या(रत्ना पाठक शाह) और उसके पिता (कुमुद मिश्रा) उसे एक मशहूर नृत्यांगना बनाना चाहते थे.अमृता भी नृत्यांगना बनना चाहती थी, मगर विक्रम से शादी करते ही वह एक कुशल गृहिणी बन जाती है,जबकि उसे खाना बनाना नही आता. जब पति आफिस चले जाते है, तब वह सिंगल मदर शिवानी(दिया मिर्जा) की लड़की को नृत्य सिखाने उसके घर जाती है. वह हर दिन अपनी सास (तनवी आजमी) के ब्लड शुगर की जांच करती है, उन्हे दवाएं देती हैं. अमृता की सास अपने पति की बजाय बेटे विक्रम के साथ रहती है. अमृता सुबह उठकर अपने पति विक्रम को बेड टी देने से लेकर उनका टिफिन लगाकर घर से बाहर पति के कार में बैठते समय उन्हें उनकी पर्स, उनके आफिस की फाइल्स सहित सब कुछ देकर विदा करती है.अमृता अपने पति विक्रम के प्रति समर्पित है. उसके ख्वाबों को पूरा करने के लिए जी जान लगाए हुए है. विक्रम के साथ अमृता भी लंदन जाने के सपने बुन रही है.

 

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मगर जब लंदन जाने की खुशी में घर पर आयोजित पार्टी में फोन पर विक्रम को पता चलता है कि लंदन में उसे एक नए शख्स के नेतृत्व में काम करना पड़ेगा, तो वह आपा खोकर अपनी कंपनी के सहकर्मी हंसराज से भिड़ जाता है. विक्रम की पत्नी अमृता अपने पति को वहां से ले जाने के लिए खींचती है. इसी बीच सबके सामने अचानक विक्रम, अमृता को एक थप्पड़ जड़ देता है और अमृता के सारे सपने चकनाचूर हो जाते हैं. फिर एक औरत की रूप में आत्मसम्मान की उसकी जंग शुरू होती है. अमृता की जंग ऐसे पति के साथ शुरू होती है, जो कहता है कि पति पत्नी में यह सब तो हो जाता है. इतना बड़ा तो कुछ नहीं हुआ ना. लोग क्या सोचेंगे मेरे बारे में कि बीवी क्यों भाग गई? अमृता की सास का मानना है कि घर समेट कर रखने के लिए औरत को ही मन मारना पड़ता है. मगर अमृता के पिता व अमृता के भाई की प्रेमिका स्वाती (नैला ग्रेवाल) अमृता के साथ खड़े नजर आते हैं. तो वहीं अमृता की मां संध्या भी महज एक थप्पड़ के लिए तलाक लेने का फैसला सुनकर कहती है कि अब यही सुनना रह गया था कि बेटी तलाक लेगी? क्या गलती हो गई थी हमसे? पर अमृता शहर की मशहूर वकील नेत्रा जयसिंह (माया सरावो)से मिलती है.नेत्रा मशहूर जज के बेटे व टीवी चैनल के न्यूज एंकर रोहित (मानव कौल) की पत्नी हैं, पर नेत्रा व उसके पति के बीच संबंध अच्छे नहीं है. वह सकून पाने के लिए अक्सर अपने एक मित्र से मिलती रहती है.फिर भी पहले नेत्रा एक औरत के रूप में अमृता को समझाने का प्रयास करती है, पर फिर उसके लिए मुकदमा लड़ने को तैयार हो जाती है. फिर पता चलता है कि अमृता को दो माह का गर्भ है. फिर भी अमृता अपने पति विक्रम से तलाक ले लेती है.

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लेखन व निर्देशनः

नारी सम्मान व नारी स्वतंत्रता की वकालत करने के साथ ही पितृसत्तात्मक सोच पर कुठारा घाट करने वाली इस फिल्म की कहानी को बेवजह लंबा खींचा गया है. इसे एडीटिंग टेबल पर कसने की जरुरत थी. फिल्म की शुरूआत बहुत धीमी गति से होती है. थिएटर के अंदर फिल्म आलोचकों में खुसर पुसर होती रहती है कि जिस वजह से विक्रम अपनी पत्नी अमृता को थप्पड़ मारता है, वह वैसी हिंसा नहीं है जस पर कोई पत्नी घर छोड़ जाए,वह भी तीन चार दिन बाद. लेकिन फिल्मकार की नजर में यहां थप्पड़ मारने का नहीं है, बल्कि मुद्दा है कि थप्पड़ मारा क्यों? इस बात को अनुभव अलग अलग किरदारों के जरिए अलग अलग दृष्टिकोणों से उभारते हैं.

महज पत्नी की पति के प्रति समर्पण व सेवा भाव के चित्रण के लिए कई दृश्य बार बार दोहराए गए हैं, जिनकी जरुरत नहीं थी. फिल्म हमारे सामाजिक ढांचे और हमारी परवरिश के साथ साथ कानूनी दांव पेच पर कई तरह के सवाल उठाती है.

फिल्मकार ने बिना भाषण बाजी किए अपनी इस फिल्म में जिस तरह इस बात का चित्रण किया है कि किस तरह पितृसत्तात्मक सोच एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंप दी जाती है और महिलाओं को भी उतना ही उलझा दिया जाता है, उसके लिए वह बधाई के पात्र है. तमाम कमियों के बावजूद अनुभव सिन्हा ने एक महत्वपूर्ण फिल्म बनाई है, जिसमें एक नारी सिर्फ आत्म-सम्मान चाहती है. एक ऐसी नारी जो पति का एक थप्पड़ भी बर्दाश्त नही करना चाहती.

 

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“मालूम है आपको सहारे की ज़रूरत नहीं है, मैं बस साथ देने आया हूँ “ that day and now I am the biggest fan of your love affair with words and lines. The proud witness of version 2.0, I really don’t know if I am a bigger fan of the writer/director or the human being he is! He has spoilt his actors for delivering their best and being their best. Not just my filmography but the book of my life (if ever there is one) shall be incomplete without writing about you. (And since it’s WRITING, I shall send it to you only for doctoring ?) Yet another Friday for us and with full faith in the honesty with which we made our career’s best film, we shall soon get back to breaking our own record! ZINDABAD ! ❤️? @anubhavsinhaa

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अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अमृता के किरदार में तापसी पन्नू ने एक बार फिर अपने कैरियर का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया है. उनके अभिनय को सदैव याद रखा जाएगा. विक्रम के किरदार में पावेल गुलाटी ने बहुत स्वाभाविक अभिनय किया है. दिया मिर्जा की खूबसूरत मुस्कान याद रह जाती है. नेत्रा के जटिल किरदार को माया सरावो ने अपने अभिनय से बड़ी खूबसूरती से निभाया है. स्वाती के छोटे किरदार में नैला ग्रेवाल छाप छोड़ जाती हैं. तनवी आजमी, कुमुद मिश्रा और रत्ना पाठक शाह ने एक बार फिर साबित कर दिखाया कि वह ब्रिलिएंट कलाकार हैं. मानव कौल और राम कपूर की प्रतिभा को जाया किया गया है.

समझ में कम होना है बगावत के लक्षण – रितेश देशमुख

अच्छी कौमिक टाइमिंग और ह्यूमर के लिए पौपुलर रितेश देशमुख (Riteish Deshmukh) को हर कोई जानता है. राजनैतिक फैमिली से सम्बन्ध रखने वाले रितेश देशमुख (Riteish Deshmukh) एक्टिंग करियर में अपनी पहचान बना चुके हैं. एक्टिंग की दुनिया में ही उन्हें अपनी लाइफ पार्टनर जेनिलिया डिसूजा (Genelia Deshmukh) मिलीं, जिसके बाद उनकी लाइफ में नया मोड़ आया. हंसमुख और विनम्र रितेश देशमुख (Riteish Deshmukh) फिल्म ‘बागी 3’ (Baaghi 3) में एक अलग लुक में सामने आये हैं. पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश.

सवाल-इस लुक की वजह क्या है? क्या किसी फिल्म की तैयारी है?

नहीं,अभी कुछ सोचकर नहीं किया है. समय मिला इसलिए सिर के बाल मुड़वा लिए है. इस तरह की लुक आज से 12 साल पहले मैंने फिल्म ‘रण’ के लिए किया था और कई बार कुछ अलग करना अच्छा लगता है.

सवाल- फिल्म बागी-3 करने की वजह क्या है?

मैंने भाईयों की कहानी में कभी काम नहीं किया है, जिसमें खासकर भाई का प्यार ऐसा है कि वे किसी भी हद तक जा सकता है. वह मेरे लिए नया है. ऐसा अनुभव मुझे अपने परिवार से मिला है. इसलिए इसे करने में अच्छा भी लगा. इसके अलावा इस चरित्र से मैं अपने आपको जोड़ पाया, क्योंकि मेरे दो भाई है. हम तीनों भाई एक दूसरे के लिए किसी भी हद तक जा सकते है और इस इमोशन को मैं जन्म से जी रहा हूं. फिल्म में भी इसे करना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है.

 

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सवाल- आपने किसी दूसरे के साथ फ्रेंचाइजी नहीं किया है, इसे करने के लिए राजी कैसे हुए?

मैंने हमेशा से इंडस्ट्री के हर इन्सान के साथ काम करने की कोशिश की है, क्योंकि हर इंसान का नजरिया अलग-अलग होता है. मैं फिल्मों का फैन हूं. मैंने अमिताभ बच्चन, ऋषिकपूर, मिथुन चक्रवर्ती, जैकी श्रॉफ, अजय देवगन, अक्षय कुमार,सुनील शेट्टी आदि सभी के साथ फिल्में की है. मुझसे अलग जब भी मैं किसी के साथ काम करता हूं, तो उससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

सवाल- अलग-अलग कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

जब मैंने अमिताभ बच्चन के साथ काम किया, तो देखा कि उन्होंने कभी किसी सिंगल लाइन को भी नहीं बदला. जैसा स्क्रिप्ट उन्हें मिलता है उसी के अनुसार वे शांति से अभिनय करते है.ये सब बातें मैंने उनसे सीखी है. इसके अलावा अक्षय कुमार , सिद्धार्थ मल्होत्रा, विवेक ओबेरौय आदि सभी के साथ काम करने का अनुभव बहुत अलग-अलग था. किसी का काम के प्रति अधिक झुकाव तो किसी का शांति से अभिनय करना ये सब मेरे अनुभव है. टाइगर श्रौफ के काम के प्रति समर्पण को मैं बहुत मानता हूं. उसनें माइनस 7 डीग्री तापमान में बिना शर्ट के एक्शन किया है और मैं गरम कपडे पहनकर भी कांप रहा हूं. इससे ये दर्शाता है कि उनलोगों ने अपने माइंड और बौडी को कितनी अच्छी तरह से कंट्रोल किया हुआ है.

सवाल- आपने कॉमेडी, एक्शन, निगेटिव आदि हर तरह की फिल्में की है, किसमें काम करने में अधिक अच्छा लगा?

हर फिल्म में कुछ चीजे आसान तो कुछ मुश्किल होती है. कॉमेडी मैंने अधिक की है, इसलिए उसमें काम करना थोडा आसान होता है,लेकिन कुछ बदलाव होने पर उसे प्रैक्टिस करने की जरुरत होती है और ये हर तरह की फिल्मों के लिए होता है.

सवाल-आजकल बगावत की भावना यूथ में बहुत अधिक बढ़ चुकी है, हर जगह कुछ न कुछ लेकर बगावत चलती रहती है, इस बारें में आपकी सोच क्या है?

ये जानना बहुत मुश्किल है कि आज के यूथ को किस बात का प्रेशर है और वे ऐसा क्यों कर रहे है. टीवी पर जो दिखाई जाती है उसे हम सब देखते है, लेकिन पत्थर फेकने की वजह क्या है इसे समझना भी बहुत कठिन है. मेरे हिसाब से किसी भी तरह की हिंसा और तोड़-फोड़ करना गलत है. जो भी बगावत होती है वह किसी बात में सहमत न होने की वजह से होती है. मैंने अपने जीवन में कभी किसी बात के लिए बगावत इसलिए नहीं की, क्योंकि मैंने जो कहा उसे मेरे परिवार ने माना अगर नहीं मानते और मैं करता, तो वह बगावत होता. इसमें मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि समझ में कम होने की वजह से आज पूरे देश में बगावत हो रही है. लोग एक दूसरे की बातों को समझ नहीं पा रहे है. इसलिए ये सड़कों पर दिखाई दे रही है.

सवाल- क्या इसके लिए सोशल मीडिया जिम्मेदार है?

पहले भी बगावत होता था. तब मीडिया के द्वारा एक दूसरे तक समाचार देर में पहुंचती थी. आज जो हो रहा है ये लोगों की ओपिनियन है, जिसे वे सोशल मीडिया के ज़रिये व्यक्त कर रहे है. ये सही और गलत दोनों ही हो सकता है. इसे मिल बैठकर सुलझाने की जरुरत है.

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सवाल- क्या जब पहली बार आपने जेनिलिया से शादी की बात कही तो बगावत नहीं हुई?

हुई, पर वह शादी के बाद हुई, जो धीरे-धीरे ख़त्म हो गयी.

 

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Happy Anniversary Baiko @geneliad

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सवाल- क्या आप अपने पिता की बायोपिक पर काम करना चाहते है?

बहुत लोगों ने इसे करने की कोशिश की और मेरे पास कई स्क्रिप्ट भी आई, पर ये आसान नहीं होता. मैं उनका बेटा हूं, इसलिए मेरे बनाने पर लोगों का कहना होगा कि मैंने सब अच्छा उनके बारें में दिखाया है, जबकि कोई और बनाए तो मुझे लगेगा कि उसने ठीक नहीं किया. किताब लिखना आसान है, पर सिनेमा बनाना मुश्किल होता है. कभी अगर सही स्क्रिप्ट आये तो सोच सकता हूं.

सवाल- पिता की कौन सी सीख को आप अपने और बच्चों के जीवन में उतारना चाहते है?

परिवार की एकता, संस्कृति और मूल्यों को उन्हें समझाना चाहता हूं और इसे मैंने भी फोलो किया है.

सवाल- आप निर्माता और एक्टर है, किसमें मेहनत अधिक लगती है?

सबसे अधिक मेहनत स्क्रिप्ट पर लगती है, वह सही नहीं होता तो फिल्म अच्छी नहीं बनती. इसके बाद फिल्म का निर्माण और अंत में पब्लिसिटी आती है. इसमें प्रोमो खास होता है. अच्छी फिल्म की प्रोमो सही नहीं होने पर फिल्म नहीं चलती.

सवाल- आगे की योजनाये क्या है?

मैं छत्रपति शिवाजी महाराज पर फिल्म बनाने की कोशिश कर रहा हूं. मैं इसे मराठी और हिंदी में बनाने की सोच रहा हूं.

बेटी पलक संग ग्लैमरस अंदाज में दिखीं श्वेता तिवारी, भाई की शादी में कर रही हैं जमकर मस्ती

स्टार प्लस के शो कसौटी जिंदगी के में प्रेरणा के रोल से फैंस के बीच अपनी पहचान बनाने वाली श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) इन दिनों भाई की शादी में जमकर मस्ती करती नजर आ रही हैं. वहीं उनकी फोटोज सोशल मीडिया पर काफी पौपुलर हो रही हैं, जिनमें वह बेटी पलक तिवारी (Palak Tiwari) संग नजर आ रही हैं. आइए आपको दिखाते हैं वायरल फोटोज….

शादी की फोटोज कर रही हैं शेयर

श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) के भाई निधान तिवारी की शादी धूमधाम से संपन्न हो गई है, जिसकी हर रस्मों की फोटोज श्वेता अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर फैंस के लिए शेयर कर रही हैं. वहीं फैंस को भी श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) की ये फोटोज काफी पसंद आ रही हैं.

 

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My #etherealgirl @palaktiwarii #nidwedsyas #bhaikishaadi ? @sachin113photographer

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बेटी के साथ श्वेता का दिखा ग्लैमरस लुक

सोशल मीडिया पर वायरल हुई फोटोज में श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) और उनकी बेटी पलक चौधरी साथ में मस्ती करते हुए नजर आ रही हैं, जिसमें दोनों की बौंडिंग साफ दिख रही है. भाई की शादी में शामिल होने के लिए श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) और उनकी बेटी पलक तिवारी ने खूबसूरत गाउन पहना था, जिसमें उनका लुक काफी ग्लैमरस लग रहा था.

फैमिली के साथ नजर आईं श्वेता

 

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Baaraati ???? @arukverma @mattyadav @anuraddhasarin #nidwedsyas #Bhaikishaadi

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एक्ट्रेस श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) भाई निधान तिवारी (Nidhaan Tiwari) की शादी में फैमिली के साथ जमकर मस्ती कर रही हैं, जिसकी फोटोज उन्होंने सोशल मीडिया पर शेयर की हैं.

हल्दी की फोटोज भी हो चुकी हैं वायरल

 

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Khushiyaaann!❤️❤️❤️ @palaktiwarii @yasmin8388 #nidwedsyas #nidyas

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हाल ही में श्वेता (Shweta Tiwari) ने हल्दी की फोटोज शेयर की थीं, जिसमें वह और उनकी बेटी पलक (Palak) येलो कलर के आउटफिट पहने हुए नजर आईं थीं. दोनों बेहद खूबसूरत लग रही थीं. श्वेता ने इस दौरान अपने मम्मीपापा के साथ भी फोटोज शेयर की.

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बता दें, कुछ दिनों पहले ये खबर आई थी कि श्वेता ने अपने दूसरे पति अभिनव कोहली के खिलाफ अनुपयुक्त व्यवहार का आरोप लगाया है. श्वेता तिवारी के साथ उनकी बेटी ने भी मुंबई के समता नगर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई थी.

क्या आपने 18 हजार का पान खाया है?

जी आपने पान तो बहुत खाया होगा और देखा जाए तो बनारसी पान ही फेमस है लेकिन अठारह हजार का पान क्या कभी खाया है? नहीं खाया है न तो जानिए उस पान की खासियत के बारे में, अगर आप पान खाने के शौकीन है तो अब हम बताते हैं कि वो पान आपको कहां मिलेगा और आपके लिए फायदेमंद  भी हो सकता है, आपको अगर महंगे से महंगा और सस्ते से सस्ता और वो भी वैरायटी वाला पाना खाना है तो गुजरात जरूर जाना चाहिए, जहां राजकोट में 18 हजार रुपये का पान आजकल सुर्खियों में छाया हुआ है. दरअसल राजकोट में मिस्टर पानवाला शॉप राजकोट के नाम से एक दुकान है. जिसके मालिक नरेंद्र मालवीय ने वेडिंग स्पेशल पान लॉन्च किया है, जिसकी कीमत 18 हजार रुपये है.

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आप भी हैरान हो गए होंगे इस पान की कीमत जानकर,इसे रेस्तरां की तरह ही ऐक्रेलिक बॉक्स में पैक किया जाता है,इस वेडिंग स्पेशल पान का स्वाद लेने काफी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं और लोगों को काफी पसंद भी आ रहा है. इस शॉप में 130 तरह के पान मिलते है,जिनकी कीमत 15 रुपये से शुरू होकर 18 हजार तक है, जिसमें चेरी,चॉकलेट, ड्राइफ्रूट और मसाला वाले पान मिलते हैं.इन सभी पानों के दाम भी अलग-अलग है.इसे खाने के लिए दूर-दूर से लोग आ रहें हैं. मिस्टर पान वाला सभी को अलग-अलग तरह के पान खिलाकर उनका मन खुश कर रहे हैं और वहीं उनकी दुकान पर पहुंचे एक कपल जो कि पान खा रहे थे उन्होंने भी कहा की उन्हें पान बेहद पसंद आया.

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अब जानिए इस पान की दुकान से जुड़ा एक और बात, दरअसल राजकोट में मिस्टर पान वाला राजकोट जिनका नाम नरेंद्र मालवीय है, उन्होंने  18 हजार का पान लॉन्च तो किया है लेकिन उसे लॉन्च करते ही वो  विवादों में घिर गए है. विवाद की वजह पान की कीमत नहीं बल्कि मिस्टर पान वाला टाइटल है क्योंकि फ़िलिपींस की एक कंपनी ने मिस्टर पान वाले पर  कॉपी राइट का आरोप लगाया है. फ़िलिपींस के एक शख्स ने ये दावा किया है कि मिस्टर पान वाला नाम पर उनका कॉपी राइट है, जिसको नरेंद्र मालवीय राजकोट वाले ने चुराया है, जबकि मिस्टर पान वाला राजकोट के मालिक नरेंद्र मालवीय ने खुद अपने बयान में कहा की ऐसा कुछ भी नहीं है उन्होंने सभी आरोपों को खारिज कर दिया है,उनका कहना है कि नाम के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं किया गया है. उनकी शॉप का नाम मिस्टर पानवाला राजकोट है, ना की मिस्टर पानवाला. नरेंद्र ने साफ कह दिया कि वो अपना नाम नहीं हटाएंगे क्योंकि ये उनका खुद का बनाया हुआ नाम है और उनके नाम के आगे राजकोट जुड़ा हुआ है.

बच्चों के लिए बनाएं टेस्टी फ्रूट क्रीम

अगर आप घर पर कुछ टेस्टी और हेल्दी अपने बच्चों के लिए बनाना चाहते हैं तो फ्रूट क्रीम आपके लिए बेस्ट औप्शन है. फ्रूट क्रीम को आप किसी भी चीज के साथ अपने बच्चों को सर्व कर सकते हैं. आइए आपको बताते हैं फ्रूट क्रीम की आसान रेसिपी के बारे में

हमें चाहिए-

-1 पैकेट क्रीम

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-2 कप केला, सेब, अंगूर, संतरा, चीकू, स्ट्राबेरी आदि फल छोटे टुकड़ों में कटे

-1 बड़ा चम्मच खजूर के गुड़ का पाउडर.

बनाने का तरीका

क्रीम को फेंट लें. खजूर के गुड़ को 1 चम्मच दूध में घोल कर मिला दें. सभी फल डाल अच्छी तरह मिक्स कर के सर्व करें.

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फीनिक्स: भाग-3

पिछला भाग- फीनिक्स: भाग-2

कहानी- मेहा गुप्ता

‘‘जिस समाज में और जिन लोगों के बीच उठनाबैठना है हमारा. हमें यह

स्टेटस मैंटेन करना पड़ता है. अब तुझ से क्या छिपाना है. मानसम्मान, दौलत भी एक नशा ही तो है डियर. एक बार लत लग जाए तो आसानी से छूटती नहीं है. सुनील की यह लत तो बहुत पुरानी है. इस जन्म में तो छूटेगी नहीं’’

‘‘जब से शादी हुई है यह आर्थिक उतारचढ़ाव मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है. शादी में चढ़े मेरे जेवर भी 1-1 कर के सारे बिक गए. कभी तो ऐसा होता है हम लोग बिलकुल रोड पर आ जाते हैं और कभी अरबों में खेलने लगते हैं. यह घर, गाड़ी, मेरा बुटीक सभी कुछ लोन पर है. बच्चे भी अपने पापा की भाषा में बात करते हैं. घूमनाफिरना, लेटैस्ट गैजेट्स, शौपिंग बस यही उन की जिंदगी का ध्येय बन गया है.’’

‘‘बच्चे भी? पर उन्हें सही मार्ग दिखाना तो तेरे हाथ में है न? तू बदलेगी तभी तो तुझे देख कर तेरे बच्चे तेरा अनुसरण करेंगे.’’

‘‘छोड़ न मैं बच्चों का दिल नहीं दुखाना चाहती और सुनील को भी पसंद नहीं है कि

मैं बातबात पर रोकटोक करूं,’’ उस ने बड़ी सहजता से कहा जैसे उस के लिए ये सब बहुत सामान्य है.

‘‘12 बज गए हैं. चल अब हमें सोना चाहिए. गुड नाइट,’’ कहते हुए वह सो गई पर मेरी आंखों से नींद कोसों दूर थी.

दूसरे दिन सुबह जल्दी की फ्लाइट थी. मैं समय से काफी पहले ही उठ गई ताकि सलोनी को कुछ सांत्वना और आर्थिक सलाहकार के रूप में कुछ नेक सलाह दे पाऊं. पर मुझे एहसास हुआ कि उसे मेरी राय की विशेष आवश्यकता नहीं है. चलते हुए उस ने मुझे आकर्षक या यों कहूं महंगी पैकिंग में ढेरों उपहार दिए. उस की कल रात की बातों में और लेनदेन के व्यवहार में कोई सामंजस्य नहीं था. मुझे अपने द्वारा दिए उपहार इन सब के सामने बहुत तुच्छ लग रहे थे. एकदूसरे के संपर्क में रहने का वादा कर मैं मुंबई आ गई. अपने काम की व्यस्तताओं में से भी समय निकाल मैं उस से चैट कर लिया करती थी.

सोशल मीडिया भी एक लत है. एक बार लग जाए तो इंसान उस से दूर नहीं रह सकता. फेसबुक अकाउंट खोलते ही मुझे पता होता था उस में सलोनी का कोई न कोई नई और रोमांचक पोस्ट अवश्य होगी. इस बार उस ने स्विट्जरलैंड के बहुत ही खूबसूरत फोटो अपडेट किए थे पर इस बार मुझे रोमांच नहीं हैरानी हुई थी. हर बार की तरह मैं ने उस की पोस्ट पर लाइक्स या कमैंट्स नहीं किए. मेरी इच्छा हुई कि उसे फोन कर झंझोड़ कर पूछूं कि अचानक तेरे हाथ में क्या कुबेर का खजाना लग गया जो तू फिर घूमनेफिरने पर इतना उड़ाने लगी? मुझे उस पर गुस्सा भी आ रहा था. गलत बात को मैं कभी बरदाश्त नहीं कर पाती हूं.

संयोग कुछ ऐसा हुआ कि मेरे पति का जयपुर में तबादला हो गया. पर मैं ने यह बात सलोनी से छिपा कर रखी. बच्चों का स्कूल में ऐडमिशन, घर ढूंढ़ने जैसी जरूरतों के चलते मेरा कई बार जयपुर जाना हुआ पर मैं ने उस से संपर्क नहीं किया. कुछ समय का भी अभाव था. महीनेभर बाद हम जयपुर रहने आ गए. धीरेधीरे मेरी जिंदगी फिर से पटरी पर आने लगी. मैं ने अपना तबादला भी अपने बैंक की जयपुर शाखा में करवा लिया.

एक दिन मेरे पास सलोनी का फोन आया, ‘‘तू जयपुर आ गई है और तूने मुझे

बताना भी जरूरी नहीं समझा?’’

एक बार तो मैं हक्कीबक्की रह गई कि कहीं उस ने मुझे किसी मौल या रास्ते में देख तो नहीं लिया… मैं उस से झूठ नहीं बोल सकती थी, इसलिए मैं ने धीरे से कहा, ‘‘हम लोग जयपुर ही शिफ्ट हो गए हैं,’’ मेरे स्वर में अपराधभाव था.

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‘‘क्या? तूने मुझे बताना जरूरी नहीं समझा?’’

मैं कोई जवाब न दे पाई.

‘‘तू मुझे अपना पता सैंड कर. मैं घंटेभर में तेरे पास पहुंचती हूं… मिल कर बात करते हैं.’’

करीब घंटेभर बाद सलोनी घर पर थी. हम जब भी मिलते वह हर बार एक नई डिजाइनर ड्रैस में होती थी और वह भी लेटैस्ट और मैचिंग फुटवियर, पर्स और ऐक्सैसरीज के साथ.

‘‘अच्छा यह तो बता तुझे यह कैसे पता चला कि मैं जयपुर आ गई हूं?’’

‘‘पिछले हफ्ते मैं मुंबई आई थी. मेरी स्विट्जरलैंड की फ्लाइट वहीं से थी. मैं अचानक तेरे घर आ कर तुझे सरप्राइज देना चाहती थी पर वाचमैन ने बताया तुम जयपुर शिफ्ट हो गई हो. तू सच बता कि शिफ्ट हो जाने की बात मुझे क्यों नहीं बताई?’’

‘‘अरे तू भी न… जरा भी नहीं बदली है. सच कहूं सलोनी जब से हम दोनों मिले हैं मुझे कुछ सही नहीं लग रहा है,’’ मैं बोलने में थोड़ा हिचक रही थी, ‘‘तुझे नहीं लगता तूने जिंदगी को मजाक बना कर रख दिया है… जिंदगी को जिंदादिली से जीना अच्छी बात है पर इतनी जिंदादिली कि सारे आदर्श, सारी नीतियां ताक पर रख दो… तू थोड़ा दूरदर्शी बन कर देख. इस से तेरे बच्चों पर कितना खराब असर पड़ेगा. तू मां है उन की, उन्हें अच्छेबुरे का फर्क समझाना फर्ज है तेरा. अगर तू उन का पोषण ही सड़ी खाद से करेगी तो उन में स्वस्थ फलों का पल्लवन कैसे होगा?’’

‘‘तू गलत समझ रही है सलोनी. सुनील ने ऐक्सपोर्टइंपोर्ट का नया व्यवसाय शुरू किया है और वह अच्छा चल पड़ा है. क्या पैसा कमाना गुनाह है? सुनील रिस्क लेना जानता है. फिर कौन सा ऐसा बिजनैस है जो शतप्रतिशत ईमानदारी से होता है?’’

मैं उस की नादानी पर मुसकरा भर दी. मैं समझ गई थी सलोनी को कुछ भी समझाना बेकार है. वह पूरी तरह से सुनीलमय हो गई थी. पैसों की चकाचौंध ने उस की नैतिकअनैतिक के बीच के फर्क को समझने की शक्ति खत्म कर दी थी. ऐसा कौन सा बिजनैस है, जिस में आदमी रातोंरात अमीर हो जाता है?

दूसरे दिन अमन औफिस के लिए थोड़ा जल्दी निकल गए. पर घर से निकलते ही लगातार बजते हौर्न की आवाज से मैं समझ गई जनाब आज फिर कुछ भूल रहे हैं. मैं घर से बाहर निकलती उस से पहले मेरे मोबाइल की घंटी बजने लगी.

‘‘हैलो सोना, मेरी स्टडीटेबल पर नीले रंग की फाइल रह गई है. जल्दी दे जाओ.’’

मैं भुनभुनाते हुए फाइल लेने ही जा रही थी कि मेरी नजर फाइल पर लिखे नाम सुनील पर पड़ी. मेरे दिमाग में बिजली का झटका सा लगा.

‘‘मैं इस केस के बारे में आप से कुछ पूछना चाहती थी.’’

‘‘क्यों इस ने तुम्हारे बैंक को भी बेवकूफ बनाया है क्या?’’

‘‘नहीं ऐसी बात नहीं है…’’

मेरी बात पूरी होने से पहले ही उन्होंने गाड़ी बढ़ा दी. पर मेरे दिल को कहां चैन था. मैं ने तुरंत इन्हें फोन लगाया, ‘‘हैलो अमन, मैं तुम्हें बताना चाहती हूं कि सुनील मेरी सब से प्यारी सहेली सलोनी का पति है. क्या आप इन के केस के बारे में कुछ बता सकते हो? ’’

‘‘सोना मैं तुम्हें ज्यादा नहीं बता सकता. यू नो, ये सब बहुत कौन्फिडैंशियल होता है. बस इतना जान लो कि हम सीधे उस के घर रेड डालने जा रहे हैं.’’

फिर थोड़ा रुक कर अमन ने पूछा, ‘‘पर तुम क्यों इतनी चिंता कर रही हो? वह आदमी इन सब बातों का आदी है.’’

मुझे कैसे भी चैन नहीं पड़ रहा था. मुझे सलोनी के लिए बहुत बुरा लग रहा था. यदि उसे पता चल गया अमन मेरे पति हैं तो उसे कितना बुरा लगेगा. मेरी प्यारी सलोनी, उस का एक नंबर भी मुझ से कम आ जाता तो उस से ज्यादा मैं दुखी हो जाती थी. आज इतने बड़े दर्द से कैसे उबर पाएगी. मेरा पूरा दिन पहाड़ सा निकला. रात को अमन के घर आते ही मैं ने प्रश्नों की बौछार कर दी.

‘‘अमन क्या हुआ आज वहां पर?’’

‘‘तुम्हारी सहेली के पति के नाम करोड़ों की बेनाम संपत्ति है. मेरे पहुंचते ही उस ने मुझे क्व1 करोड़ की रिश्वत औफर की. किसी भी तरह से कौपरेट करने को तैयार नहीं था. वह तो मेरे साथ पुलिस थी… हमें उस के साथ सख्ती बरतनी पड़ी. मुझे शर्म आ रही है मेरी बीवी कैसे लोगों से संबंध रखती है.’’

मुझे रोना आ रहा था. इच्छा हुई कि सलोनी को फोन कर उस का हालचाल पूछूं. उस पर क्या बीत रही होगी… उन लोगों ने कुछ खायापीया होगा या नहीं. सलोनी ने तो रोरो कर अपना बुरा हाल बना लिया होगा.

मैं ने खुद को सामान्य करने की कोशिश की. मेरे हाथ में कुछ था भी नहीं. कुछ दिनों बाद मैं इस बारे में भूल गई. एक दिन ऐसे ही फुरसत के क्षणों में फेसबुक अकाउंट खोलने पर सब से ऊपर सलोनी का फोटो था. किसी पांचसितारा होटल में पार्टी की थी, साथ में कैप्शन लिखी थी. ‘नेवर ऐंडिंग फन.’

मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. सलोनी का वही खिलता चेहरा, बेफिक्र आंखें और उन में झलकते नित नए ख्वाब. उसे तो जैसे कुछ फर्क ही नहीं पड़ा था. मैं ही पागल थी जो उस के लिए अपना खून जला रही थी.

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पहले की बात और थी. अगर किसी के यहां रेड पड़ती थी तो यह उस व्यक्ति की इज्जत पर बहुत बड़ा दाग माना जाता था. वह व्यक्ति महीनों तक किसी को मुंह नहीं दिखाता था. इंसान की गांठ में क्व100 होते थे तो वह 75 खर्च करता था पर अब तो लोग आमदनी अट्ठनी खर्चा रुपया की तर्ज पर चलते हैं. आज की पीढ़ी अपने भविष्य की चिंता किए बिना सिर्फ वर्तमान में जीती है और 1-1 पल जीती है. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उस की बेवकूफियों पर उसे एक तमाचा रसीद करूं या जिंदादिली पर उस की पीठ थपथपाऊं .

मुझे आज एक ग्रीक लोककथा में पढ़े फिनिक्स पक्षी की याद आ गई जो मरने के बाद भी अपनी राख से फिर जी उठता था. सलोनी भी तो ऐसी ही है. हालात के थपेड़ों से चोट खाने के बावजूद हर बार जी उठती है. एक नई सैल्फी और स्टेटस के साथ. ‘यह नहीं सुधरेगी. लैट हर लिव लाइफ.’ सोच इस बार मुझे उस की पोस्ट देख कर गुस्सा नहीं आया. मन ही मन मुसकरा उसे किस वाली स्माइली के साथ लाइक दे दिया.

5 टिप्स: ऐसे रखेंगीं कटे फल, तो नहीं होंगे खराब

जब भी हम फल काटते हैं तो हमें सबसे बड़ी दिक्कत यही आती है कि वो जल्दी काले पड़ जाते हैं और इसलिए कई बार लोग फलों को आफिस, दुकानों पर या फिर बच्चों के टिफिन में नहीं डालते. आज हम आपको बताएंगे कि कटे हुए फलों को किस तरह से रखें, जिससे उनका रंग न बदले और ना ही उनका ताजापन खराब हो.

1. नींबू

फलों को तरोताजा रखने के लिए आप उस पर नींबू का रस निचोड़ दें. इससे वे कम से कम 6-7 घण्टे तक ताजेपन का एहसास देते रहेगें. नींबू का रस फलों के कुरकुरेपन को बनाए रखता है. फलों पर नींबू का रस डालने के बाद उन्हें फ्रिज में रखना ना भूलें.

2. सिट्रस एसिड का पाउडर

यदि आपको फलों को 10-12 घण्टों के लिए फ्रैश रखना है तो आप काटे हुए फलों पर सिट्रस एसिड का पाउडर छिड़क दें. इससे फलों का स्वाद वैसा ही रहेगा और वो खराब भी नहीं होंगे. जो लोग ट्रैवल कर रहें है उनके लिए यह एक अच्छा विकल्प है.

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3. प्‍लास्‍टिक रैप

यदि आप फलों को काट कर कटोरे सहित उसे प्‍लास्टिक के पैकेट या फिर एल्यूमिनियम फ्वायल में ऊपर से लपेट कर रख दें और फिर उस में छोटे छोटे छेद कर दें. ऐसा करने से वे फ्रिज के अन्‍य चीजों की खुशबू नहीं लेंगे और ना ही अपनी महक को फ्रिज में फैलाएंगे.

4. ठंडा पानी

कटे हुए फलों को डिब्‍बे में बंद कर के बर्फ मिले ठंडे पानी में रखें. इससे फल 3-4 घंटो तक ताजे बने रहेंगे और बिल्कुल भी बे रंगत नहीं होंगें. इससे आप अपने महमानों के आने से पहले ही फल काटकर रख सकते है.

5. एयर टाइट डिब्बे

यदि आप काटे हुए फलों को एयर टाइट कंटेनरज में रखेंगी तो वो एकदम फ्रैश रहेंगें.

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