शुभारंभ सीरियल के सितारों की परदे के पीछे की एक खास झलक

कलर्स के शो, ‘शुभारंभ’ में इन दिनों राजा और रानी के बीच दूरियों का ट्रैक दिखाया जा रहा है. इस शो में राजा की ताई कीर्तिदा और माँ आशा के बीच दुश्मनी दिखाई गई है. दोनों के बीच अक्सर किसी न किसी वजह से नोक-झोक होती रहती है. शो में रेशमिया परिवार और दवे परिवार में बिल्कुल नहीं बनती. लेकिन क्या आप जानते हैं परदे पर एक-दूसरे को नापसंद करने वाले ये सितारे असल जिंदगी में शूट करते वक्त धूम मचाते हैं और सब के बीच दोस्ती का रिश्ता देखने को मिलता है.

परदे के पीछे पक्की दोस्त हैं कीर्तिदा और आशा

राजा और उसकी माँ, आशा की जिंदगी में जहर घोलने वाली कीर्तिदा परदे के पीछे आशा की बहुत अच्छी दोस्त हैं. असल जिंदगी में, कीर्तिदा यानी छाया वोरा कहती हैं, ” दोनों एक दूसरे के लिए ही बने हैं, ऐसा लगता है”. आशा ने कहा, ”छाया की अच्छाई इससे पता चलती है कि अपनी नेगेटिव लाइन्स बोलने के बाद खुद ही रो पड़ती हैं.” शो में दोनों की दुश्मनी देखकर किसी को भी ये यकीन नहीं होगा कि असल जिंदगी में कीर्तिदा और आशा पक्की दोस्त हैं.

 

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I love Aasa, because she spends more time with me than Pallavi ???

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सेट पर मचती है धूम

शो में राजा के ताऊ, गुणवंत को एक बहुत ही गंभीर व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है, जो राजा को बिल्कुल पसंद नही करता. लेकिन असल जिंदगी में राजा और गुणवंत सेट पर खूब सारी मस्ती करते हुए दिखाई देते हैं.

 

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Bala…Bala…Bala… Akki tune yeh Kya Kar dala…

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एक परिवार की तरह है सेट का माहौल

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सारे एक्टर्स का एक दूसरे के साथ सेट पर गहरा रिश्ता सा बन गया है और सब शूट भी इसी माहौल में करते हैं. चाहे वो साथ में खाना खाने की बात हो या फिर औन सेट मस्ती की, सब कुछ होता है एक साथ, एक परिवार की तरह.

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आप देखेंगे शो में आगे…

rani

बात करें शो कि तो रानी को राजा के झूठ का पता चल जाने पर, वो राजा को समझाती है और अपने रिश्ते को एक और मौका देने की बिनती करती है. इससे राजा का भी मन बदल जाता है और वो रानी के साथ शादी तोड़ने की बजाय, रानी को घर ले आता है. वहीं कीर्तिदा, आशा को रानी के खिलाफ करने के लिए भड़कती है.

अब देखना ये है कि क्या ये साजिशें राजा और रानी की शादी को पूरी तरह तोड़ने में कामयाब हो पाएगी? या फिर रानी अपने प्यार से राजा का दिल जीतकर, एक नई शुरूआत का शुभारंभ करेगी? जानने के लिए देखते रहिए शुभारंभ, सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

Republic Day Special: आर्टिकल 15 से लेकर सेक्शन 377 तक, समानता और गर्व के साथ करें नए दशक का स्वागत

जब भी किसी अलग और दिलचस्प कहानी को सिल्वर स्क्रीन पर उतारने की बात होती हैं तो मेकर्स के दिमाग में सबसे पहले टैलेंटेड अभिनेता आयुष्मान खुराना का नाम आता है.  इस प्रतिभाशाली अभिनेता ने सिल्वर स्क्रीन पर न सिर्फ मनोरंजक किरदार ही किए हैं, बल्कि ये कई ऐसी कहानियों का चेहरा भी बने हैं जिन्होंने समाज पर अपनी एक गहरी और अलग छाप छोड़ी है.

आयुष्मान ने आर्टिकल 15, जिसमें जाति के नाम किए गए अत्याचारों के बारे में बताया गया था जैसी फिल्मों में काम किया और अब वह जल्द ही मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘शुभ मंगल ज़्यादा सावधान’  में दिखेंगे.  इस फिल्म में समलैंगिकता को स्वीकार करने की बात की गई हैं. ये अभिनेता स्पष्ट रूप से नए दशक के मुख्य सिनेमा में एक अलग और मजबूत परिवर्तन लाया है.

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जैसे की हम गणतंत्र दिवस मनाते हैं, यह कहना बिलकुल सुरक्षित होगा कि ये अभिनेता मुख्य सिनेमा में बदलाव का एक एजेंट हैं और उनकी आगामी पिक्चर शुभ मंगल ज़्यादा सावधान भी कुछ इसी प्रकार है.  यह समाज से जुड़े हुए एक महत्वपूर्ण विषय पर आधारित है, जहां परिवारों में समलैंगिकता को स्वीकार करने का एक बड़ा महत्व है.

आयुष्मान ने कहा, “मैं हमेशा उन विषयों पर काम करने की इच्छा रखता हूं जो कही न कही सामाजिक रूप से प्रासंगिक है और जो लोगो में हलचल पैदा कर उसके बारे में किसी तरह की चर्चा की एक शुरुआत करेंगे.  अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए इस प्रतिभाशाली अभिनेता ने कहा, “मैं समाज का एक जागरूक नागरिक हूं, मैंने कई ऐसे स्ट्रीट थिएटर्स में काम किया है, जिसमें हम समाज से जुड़े हुए मुद्दों को संपर्क में लाए हैं.  मैं अब जिस तरह का सिनेमा कर रहा हूं वह मेरे थिएटर के दिनों को विस्तार से बयां करता हैं.”
इस प्रतिभाशाली अभिनता ने हाल ही में एक हाथ में भारत के झंडे के साथ फोटोशूट करवाया तो वही दूसरी तरफ एलजीबीटीक्यू को भी गौरव और सम्मान दिया.  जैसा कि सब जानते हैं कि हम इस साल अपना 71 वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं, ऐसे में इस अभिनेता ने इस तस्वीर के साथ एक बहुत ही प्रभावशाली मैसेज दिया, जो देश और गर्व समुदाय की समानता में विश्वास को दर्शाता है.

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इस अभिनेता ने कहा, “जब समलैंगितकता और एलजीबीटीक्यू समुदाय के बारे बात होती हैं तो यह भारत को एक प्रगतिशील रूप को दर्शाता हैं. हमें भारतीय होने पर गर्व है.  इसने धारा 377 के खिलाफ कानून पास किया और इससे अत्यधिक गर्व की नहीं हो सकता. ”

इस फिल्म के लेखक और निर्देशक हितेश केवल्य है.  फिल्म को आनंद एल राय का कलर्स येलो प्रोडक्शन और भूषण कुमार का टी-सीरीज़ साथ में मिलकर प्रोड्यूस कर रहे हैं.  यह फिल्म 21 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ हो रही हैं.

सांसद और एक्ट्रेस नुसरत जहां ने शेयर की ये बैकलेस फोटो, फैंस के उड़े होश

सांसद और एक्ट्रेस नुसरत जहां सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और अपनी कई फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं. अब हाल ही में उन्होंने अपनी कुछ ग्लैमरस फोटोज शेयर की हैं. नुसरत की ओपन फोटोज को देखकर फैन्स भी उनकी खूबसूरती की तारीफ कर रहे हैं. नुसरत ने सिल्वर शाइनिंग आउटफिट पहना है और इसके साथ उनके आंखों का मेकअप काफी अट्रैक्टिव लग रहा है.

जरूरतमंदों की करती हैं मदद

नुसरत ने क्रिसमस पर गरीब और सेक्स वर्कर्स को कंबल बांटे थे. नुसरत ने दरअसल अपना एक वीडियो शेयर किया था जिसमें वो पति निखिल जैन के साथ गरीबों और सेक्स वर्कर्स को कंबल बांट रही थीं. नुसरत ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा था,’हर त्योहार अपने साथ खुशियां लेकर आता है. सभी को अपने प्यार से बांधे रखें. गरीबों से लेकर सेक्स वर्कर्स तक के लिए, हर कोई इस खुशी का पात्र है इसलिए इसे हर जगह फैलाएं .’

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मंगलसूत्र और सिंदूर लगाने पर दिया था ये जवाब…

नुसरत ने जब शादी के बाद सिंदूर लगाया था तो कई लोगों ने इस पर विवाद खड़ा किया. लेकिन नुसरत ने उन लोगों को करारा जवाब दिया था. नुसरत ने कहा था,‘मैं पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती हूं,जो जाति, धर्म और पंथ की सीमाओं से परे है. जहां तक मेरी बात है तो मैं सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करती हूं. मैं अब भी मुस्लिम हूं. लोगों को इस बारे में कुछ नहीं कहना चाहिए कि मैं क्या पहनूं और क्या नहीं. आपका विश्वास पहनावे से परे होता है.’

 

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I loved u yesterday, I love u still, I always have, I always will… Happy Valentines Hubbilicious @nikhiljainoffcl

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बता दें कि शादी के बाद नुसरत सभी हिन्दू त्यौहारों को सेलिब्रेट करती हैं. उनके पति निखिल भी उन्हें पर्सनली और प्रोफेशनली सपोर्ट करते हैं. दोनों एक दूसरे के लिए सोशल मीडिया पर प्यार भी जाहिर करते रहते हैं.

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पंगा फिल्म रिव्यू: बेहतरीन कहानी के साथ कंगना की दमदार एक्टिंग

रेटिंगः साढ़े तीन स्टार

निर्माताः फौक्स स्टार स्टूडियो

निर्देशकः अश्विनी अय्यर तिवारी

कलाकारः कंगना रनौत, जस्सी गिल, यज्ञ भसीन,रिचा चड्डा, नीना गुप्ता

अवधिः दो घंटे ग्यारह मिनट

‘निल बटे सन्नाटा’ और ‘बरेली की बर्फी’ के बाद फिल्मकार अश्विनी अय्यर तिवारी अपनी तीसरी फिल्म‘‘पंगा’’में परिवार और स्पोटर्स का बेहतरीन समन्वय दिखाया है. हमसे बातचीत के दौरान अश्विनी अय्र तिवारी ने कहा था कि उनकी फिल्म में ‘ओमन इम्पॉवरमेट’का कोई मसला नही है. यह एक नारी की कहानी है. मगर इसमें ओमन इम्पावरमेंट भी है. फिल्म‘‘पंगा’’में कहीं न कहीं स्त्री के अस्तित्व की लड़ाई भी है. यह कहानी है उन महिलाओं की जो शादी के बाद अपने परिवार, पति और बच्चे के लिए अपना कैरियर, अपने सपनों को तिलांजली दे देती हैं, मगर एक चिंगारी उनके मन में रहती है और जब पति स्वयं उस चिंगारी को हवा दे, तो फिर वह महिला किस तरह अपने सपनों को पूरा करने के लिए जद्दो जेहाद करती है.

कहानीः

यह कहानी है मशहूर और भारतीय कबड्डी टीम की कैप्टन रह चुकी जया निगम (कंगना रनौत) की. कबड्डी प्लेअर होने के ही चलते उन्हे रेलवे में नौकरी मिली हुई है. पर एक दिन जया अपने प्रेमी और रेलवे में इंजीनियर के रूप में कार्यरत प्रशांत (जस्सी गिल) से शादी कर ली. वह एशिया कप में भारतीय कबड्डी टीम की कैप्टन के रूप में हिस्सा लेने वाली थी. पर अचानक एक बेटे की मां बनने के चलते वह खुद को कबड्डी के खेल से हमेशा के लिए अलग कर लेती हैं.

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वह कहती हैं-‘मैं एक मां हूं और मां के कोई सपने नहीं ह¨ते’तो अब जया निगम 7 साल के बेटे आदित्य उर्फ आदि (यज्ञ भसीन) की मां और प्रशांत (जस्सी गिल)की पत्नी हैं. जया अपनी छोटी-सी दुनिया में खुश है. उसकी जिंदगी घर, बच्चे और नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच गुजर रही है. फिर एक दिन घर में एक ऐसी घटना घटती है कि जया का बेटा आदि उसे 32 साल की उम्र में कबड्डी में वापसी करने के लिए प्रेरित करता है. बेटे की खुशी के लिए पहले जया अपने पति प्रशांत के साथ मिलकर कबड्डी के खेल में वापसी के लिए प्रैक्टिस का झूठा नाटक करती है, मगर इस प्रक्रिया में उसके दबे हुए सपने फिर सिर उठाने लगते हैं.अब वह वाकई भारत की राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनकर स्वर्णिमदर को दोबारा जीना चाहती है. इसमें उसके साथ कबड्डी खेलती रही और इन दिनों कबड्डी की खिलाड़ी के साथ कोच के रूप में कार्यरत उसकी दोस्त मीनू (रिचा चड्ढा), उसके पति और बेटे आदित्य के साथ उसकी मां (नीना गुप्ता) उसका हौसला बढ़ाती है. मीनू उसकी काफी मदद करती है.

निर्देशनः

मनोरंजक फिल्म ‘‘पंगा’’ में जिस तरह से निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी ने परिवार,कबड्डी के खेल और स्त्री के सपनों का समन्वय बैठाकर कहानी गढ़ी और उसे परदे पर उकेरा है, उसके लिए वह बधाई की पात्र हैं. फिल्म की पटकथा व संवाद अश्विनी अय्यर तिवारी ने निखिल मेहरोत्रा के साथ लिखे हैं. फिल्म में उत्तर भारतीय परिवारों में जिस तरह की नोकझोक होती रहती है, उसका अहसास दिलाने वाले संवादों में नितीश तिवारी का भी योगदान है, क्योंकि उन्होंने फिल्म की एडीशनल पटकथा व संवाद लिखे हैं.

छोटे शहरों के मध्यम वर्गीय परिवारों को उनकी जीवन शैली ,आव भाव आदि के साथ परदे पर पेश करने में अश्विनी अय्यर तिवारी को महारत हासिल है,यह बात वह अपनी पिछली फिल्मों मंे साबित कर चुकी हैं. इस फिल्म में उन्होने इसी बात को भोपाल शहर की कामकाजी औरत और मध्यमवर्गीय परिवार को बारीकी से पेश कर पुख्ता किया है.इससे फिल्म न सिर्फ जीवंत होकर उभरती है,बल्कि हर इंसान फिल्म की कहानी व किरदारों के साथ खुद को रिलेट करता है. फिल्म निर्देशक ने मानवीय रिश्ते के साथ कबड्डी जैसे खेल के रोमांच का बेहतरीन चित्रण किया है.

तमाम खूबियों के बावजूद  फिल्मकार कहीं न कहीं द्विविधा में नजर आती है.वह इस बात को रेखांकित नही कर पायी कि कौन हीरोइन है? शादी करके परिवार के लिए कबड्डी को बाय बाय कर देने वाली जया निगम या कबड्डी के खेल के प्रति समर्पण के चलते शादी के लए वक्त न निकाल पाने वाली जया निगम की सहेली मीनू?

अश्विनी ने हमसे बातचीत करते हुए भले ही कहा था कि उनकी फिल्म में ओमन इंम्पावरमेंट की बात नही है, मगर यह फिल्म जया,मीनू और जया की मां (नीना गुप्ता) के किरदारों के माध्यम से ‘ओमन इम्पावरमेट’की बात करती है. मगर उनकी खूबी है है कि यह बात उपदेशात्मक नही है. इंटरवल से पहले फिल्म कुछ ज्यादा ही लंबी और ढीली है,मगर इंटरवल के बाद फिल्म सरपट दौड़ती है. इसे एडीटिंग टेबल पर कसे जाने की जरुरत थी.

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संवादः

फिल्म के संवाद काफी बेहतर बन पड़े हैं.मासूम सात वर्षीय बालक आदी के संवाद तो कुछ ज्यादा ही बेहतर बने हैं और कुछ संवादों पर दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाता.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है तो कंगना रनौत और रिचा चड्डा दोनों बेहतरीन अदाकारा हैं, इसमें कोई दो राय नही हैं.इस बात को दोनों ने इस फिल्म में भी साबित किया है.एक गृहिणी व कामकाजी औरत के साथ कबड्डी खिलाड़ी, इन दोनों पहलुओं को कंगना रनौत ने अपने अभिनय से जीवंतता प्रदान की है. जज्बाती दृश्यों को भी उन्होने मैलोड्रामैटिक नहीं होने दिया.मीनू के किरदार में रिचा चड्डा ने कमाल का अभिनय किया है. रिचा ने अपने अभिनय से साबित किया है कि मीनू के किरदार के लिए उनसे ज्यादा उपयुक्त कलाकार कोई नहीं हो सकता था. फिल्म देखकर अहसास होता है कि मीनू के बिना जया की कहानी संभव नहीं थी. प्रशांत के किरदार में जस्सी गिल का अभिनय ठीक ठाक है. बाल कलाकार यज्ञ भसीन की यह पहली फिल्म है, पर उसके अभिनय से इस बात का अहसास नही होता. मां के छोटे किरदार में भी नीना गुप्ता अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं.

मैं पैसों के लिए काम नहीं करता – रजत कपूर

थिएटर से फिल्मों में उतरे अभिनेता और निर्देशक रजत कपूर को बचपन से अभिनय का शौक था. उन्होंने अभिनय की दिशा में पढाई दिल्ली में की और आज एक अनुभवी कलाकार के रूप में जाने जाते है. उन्होंने अभिनय को एक नयी दिशा दी है और बहुत ही स्वाभाविक ढंग से अभिनय कर दर्शकों का दिल जीता है. फिल्म मानसून वेडिंग, भेजा फ्राई, दृश्यम आदि कुछ ऐसी फिल्में है, जिसे आलोचकों ने पसंद किया. वे स्पष्टभाषी है और आज के यूथ की प्रतिभा से बहुत प्रभावित है. वे फिल्मों से जुड़े हर काम को पसंद करते है. उनकी वेब सीरीज कोड एम् रिलीज हो चुकी है. जिसमें उन्होंने कर्नल सूर्यवीर चौहान की भूमिका निभाई है, पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश.

सवाल-शो में खास क्या है? आपको कितनी तैयारी करनी पड़ी?

ये एक आर्मी बेस्ड शो है, जिसमें आर्मी के उपर घटित एक घटना के इर्द गिर्द ये शो घूम रही है. ये एक एक्शन थ्रिलर शो है. इसमें मुझे स्क्रिप्ट और आर्मी की भूमिका मेरे लिए अच्छी थी, क्योंकि मैंने आर्मी की भूमिका कभी निभायी नहीं थी. यूनिफ़ॉर्म पहनने का जो एक जुनून होता है. वह मुझे इस शो के दौरान मिली है. मैं कभी होमवर्क नहीं करता और मैंने कभी नहीं किया. मेरे लिए स्क्रिप्ट को सही तरीके से पढना ही बहुत बड़ी बात होती है.

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सवाल-सेना की यूनिफ़ॉर्म पहनने के बाद आपको किस तरह की दायित्व का आभास हुआ?

मुझे अच्छा लगा. सेना में काम करने वालों के त्याग को समझना आसान नहीं होता. वे किस परिस्थिति से गुजरते है इसे समझना भी आम इंसान के लिए बहुत मुश्किल होता है और इसी को इस सीरीज में दिखाने की कोशिश की गयी है. ये सही है कि इनकी वजह से हम सुरक्षित है, लेकिन एक इंसान के इर्दगिर्द इतनी सारी चीजें होती है, जिसे हम कभी नहीं समझ सकते, मसलन एक डॉक्टर, फायर फाइटर्स, सड़के साफ़ करने वाला, किसान आदि सभी जो अपनी जिंदगी को जोखिम में डालकर हमें अच्छी जिंदगी देने की कोशिश करते है. सभी एक दूसरे पर आधारित है और दुनिया ऐसे चलती है. अकेले कोई नहीं रह सकता. हमारी जिंदगी लाखों लोगों के साथ जुडी हुई है. एक दूसरे के साथ जुडकर ही हर कोई अपना जीवन निर्वाह कर रहा है, लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि हर चीज को आजकल पैसों के द्वारा आंकी जाती है. जो सही नहीं है. लक्जरी चीजो की कीमत इतनी है कि उसे समझ पाना मुश्किल होता है और लोग उसे खरीदकर ख़ुशी जाहिर करते है, बनाने वाले को भी वाहवाही मिलती है, लेकिन पसीने और कड़ी मेहनत करने वालों की कीमत आज कुछ भी नहीं है. उन्हें बेसिक अधिकार और शाबासी तक नहीं मिलती.

सवाल-आपने कई सारी फिल्मों में अलग-अलग भूमिकाएं निभाई है, किस किरदार को करने में अच्छा लगा?

मुझे हर किरदार चाहे वह निगेटिव हो या पॉजिटिव मुझे पसंद आया. मैं किरदार में मुझे क्या करने को मिलेगा उसपर अधिक विचार करता हूं. मैं पैसे के लिए नहीं बल्कि भूमिका को देखकर काम करता हूं.

सवाल-अभी रीयलिस्टिक फिल्मों का दौर शुरू हुआ है, ऐसे में फिल्मों से मनोरंजन गायब होता जा रहा है, इस बात से आप कितने सहमत है?

मुझे ऐसा नहीं लगता और मैं इस बात से सहमत भी नहीं हूं. अभी भी मनोरंजन फिल्मों में है. बायोपिक अधिक बन रही है. ये एक ट्रेंड होता है, जो हर 4 साल के बाद बदलता रहता है. जिसमें कभी एक्शन, तो कभी देश प्रेम या थ्रिलर फिल्में बनती है और ये दर्शकों की पसंद के अनुसार ही बनायीं जाती है.

सवाल-क्या ऐसी फिल्मों को आप बेहतर फिल्म कह सकते है?

नहीं क्योंकि 1970 की दशक में बासु चटर्जी, ऋषिकेश मुखर्जी ने कई फिल्में बनायीं. जो आज भी पसंद किये जाते है. मल्टीस्टारर फिल्में भी थी जो बहुत अच्छी हुआ करती थी. आज की फिल्मों को लोग बार-बार नहीं देख सकते.

सवाल-परफोर्मेंसवाइज आप अपनी किस फिल्म को अधिक पसंद करते है?

मंत्र एक फिल्म थी, जो किसी ने नहीं देखी पर बहुत अच्छी थी. इसके अलावा ‘दिल चाहता है’, भेजा फ्राई, कपूर एंड संस आदि ऐसी कई फिल्में है, जो मुझे पहुत पसंद आई थी.

सवाल-आपकी फिटनेस का राज क्या है?

ये मेरे जींस में है. इसके अलावा मैं अपनी खान-पान और व्यायाम पर ध्यान देता हूं.

सवाल-अभी लोगों में मोबाइल पर किसी भी शो को देखने की बहुत अधिक लत है, ये कितना सही है, आपकी सोच क्या है?

कोई भी नयी चीज आने पर लोग अधिक देखते है ये पहले रेडियों, फिर टीवी और अब मोबाइल के साथ हो चुका है. धीरे-धीरे इसकी लत भी निकल जायेगी. हर युग का एक एडिक्शन होता है. इसके अलावा हर दिन नया कुछ बन रहा है, जिसे देखने का समय लोगों के पास नहीं है. कंज्यूम से अधिक निर्माण हो रहा है.

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सवाल-गणतंत्र दिवस आपके लिए क्या माइने रखती है?

मुझे याद आता है जब मैं दिल्ली में 8 साल का और मेरा भाई 7 साल का था. मेरे माता-पिता और दोनों भाई एक टू व्हीलर में बैठकर इस दिवस को देखने जाया करते थे. साढ़े 5 बजे दिल्ली की ठण्ड में भी इसका असर कुछ नहीं पड़ता था. इसके बाद चांदनी चौक में दादाजी के घर के छत पर बैठकर परेड देखा करता था.  बहुत जुनून होता था. मेरे हिसाब से हर दिन इसे मनाया जाना चाहिए. देश प्रेम को मन में रखनी पड़ती है और ये सोचना पड़ता है कि हमारे आगे आने वाली पीढ़ी भी इसका आनंद उठा सकें. इसकी कोशिश सभी को करने की जरुरत है.

औफिस में रखें इन बातों का ध्यान

घर के बाद औफिस मतलब आपको वर्क प्लेस एक ऐसा स्थान होता है जहां आप सबसे ज्यादा समय व्यतीत करती हैं. वहां पर आपके रिश्ते अपने कलिग्स से पौजिटिव होने चाहिए, लेकिन अक्सर ऐसा होता है जब आप किसी औफिस में काम करती हैं और आपकी कुछ लोगों से अच्छी बनने लगती है….आप कोई भी औफिस की प्रौबलम हो उस व्यक्ति  से शेयर करती हैं. उसके साथ लंच पर जाती हैं,अक्सर चाय पीने भी चली जाती हैं,आपको उससे बात करना अच्छा लगता है. वो आपके औफिस का सबसे अच्छा दोस्त बन जाता है. आप हंसी-खुशी के पल उसके साथ शेयर करते हैं. लेकिन कभी-कभी ऐसे रिश्ते लोगों की आंखों में खटकने लगते हैं.

लोग तुरन्त ये सोचने लगते हैं कि जरूर इसका उसके साथ कोई चक्कर चल रहा है.आपस में बात करते हैं कि कुछ तो गड़बड़ है…देखो तो जब देखो उसी के साथ दिखती  है हमेशा.ऐसी बहुत सी बातें हैं जो लोग कहते हैं. अगर आपकी बौस के साथ अच्छी बनती है और आपका उसी बीच प्रमोशन होता है तो लोग ये कहने से बिल्कुस पीछे नहीं हटते की इसने सोर्स लगाया है और क्योंकि हम महिलाओं की बात कर रहे हैं तो उनके लिए तो ये तक बोल दिया जाता कि जरूर इसका बौस के साथ कुछ चक्कर है तभी तो देखो कैसे इसका प्रमोशन हो गया.

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लोग ये नहीं देखते की आप काम अच्छा कर रहे हैं बस आपके खिलाफ औरों को भड़काने का काम करते हैं, लेकिन आप बिल्कुल भी इन बातों पर ध्यान मत दीजिए क्योंकि ये औफिस है औफिस में ये सब लगा रहता है दूसरों के लिए कभी भी अपने रिश्तों को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है. अगर आप सही हैं तो कोई कुछ भी कहे आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. आप अपने काम पर फोकस करें ,अगर किसी से अच्छी बनती है तो उसको बना कर रखें.

आपके औफिस के लोग भी उस समाज की तरह ही होते हैं…उनका काम ही है कड़वा बोलना. वो सुना तो होगा ही आपने कि लोगों का काम है कुछ कहना….कुछ तो लोग कहेंगे.ये सब कहने का मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि आप अपने रिश्तों को बाकी कलिग्स से बिगाड़ लें…आप उनको समझे और कोशिश करें कि उनको समझाये और इतनी शालीनता से कि उनको बुरा भी न लगे. बेवजह की बातें मत करिए अपने काम से काम रखिए साथ ही उनको और उनकी बातों को सम्मान दें.

अगर आपको कोई परेशानी है तो उनकी मदद भी लें इससे आपके रिश्ते अच्छे बनेंगे.कभी-कभी कुछ लोगों को ज्यादा सम्मान देने पर वो आपकी हरकतों को गलत वे में ले लेता है इसलिए कोशिश करें कि आप उसको वैसा मौका ही न दें. साथ ही दूसरों की सहायता के लिए हमेशा तैयार रहें.बस इन सारे तरीकों से आप अपने वर्क प्लेस पर अपनी अच्छी छवि बनेगी.

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घर के काम से कैसी शर्म

दूसरी तरफ खुद को फिट रखने के लिए कई तरह के उपाय करती नजर आती हैं और यदि फिटनेस के लिए वक्त नहीं निकाल पाईं तो सौ बीमारियों से घिर जाती हैं.लेकिन क्या आप जानती हैं कि आप हाउसवर्क खुद को फिट रखने का एक बेहतर जरिया है. जी हां अपने हाथों से हाउसवर्क करके  खुद को फिट रखा जा सकता है.  यदि आप समय की कमी की वजह से अगर फिटनेस के लिए वक्त नहीं निकाल पा रही तो चिंता करने की जरूरत नहीं है. हाउसवर्क करिए और खुद को फिट रखिए. गौर कीजिए कि घऱ के किन कामों से आप खुद को रख सकती हैं फिट

1. बैड ठीक करना

यदि सुबह उठकर आप बिस्तर को ठीक करने से बचती हैं ,तो सुनकर चौंक जाएंगी कि बेड व्यवस्थित करना आपकी सेहत के लिए फायदेमंद है . बेड सही करने में जो शारीरिक श्रम  होता है वह आपकी दिनचर्या को ऊर्जा वान करेगा.

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2. बर्तनों को साफ करना

बरतनो को साफ करना अधिकांश महिलाओं  को पसंद नहीं. लेकिन शोध के मुताबिक बर्तन साफ करने पर एक बार में लगभग 200 कैलोरी कम होती है. फिर क्यों ना हंसी खुशी बर्तन साफ किए जाए?

3. बाथरूम साफ करना

बाथरूम साफ करना अच्छी एक्सरसाइज है क्योंकि बाथरूम साफ करते समय आपके शरीर की लगभग हर मसल काम करती है. जिससे शरीर को फायदा मिलता है . एक बार अपने हाथों से बाथरूम चमका कर तो देखिए.  बाथरुम रहेगा साफ सुथरा और जर्म फ्री.

4. रसोई में करें काम

रसोई से क्या घबराना जब हो खाना पकाना. घर का बना खाना  सेहत की दृष्टि से  फायदेमंद है. जिससे कहती है कि यदि  रोज रसोई में केवल  एक घंटा काम किया जाए तो 200 -215 कैलोरी बर्न होती हैं.

5. आयरन करना

यदि रोज कुछ कपड़े खुद हो जाए या जरूरत के कपड़ों पर घर पर ही पेश की जाए तो 300 -325 कैलोरी कम करने में मदद मिलती है साथ ही बागवानी का अगर शौक रखते हैं तो वह भी कैलोरी कम करने में सहायक है .

6. पैदल चलना है जरूरी

कम दूरी वाली जगहों पर, अगर संभव हो तो रिक्शे की मदद लेने की जगह पैदल जाए. अगर ऑफिस जाते समय आपको समय नहीं मिलता है तो सुबह थोड़ा़ा जल्दी उठ मॉर्निंग वॉक  पर जाएं या खाने के बाद भी 20 से 30 मिनट तक की वॉक कर सकती हैं. इससे आपकी शारीरिक गतिविधि बढ़ेगी और आप फिट रहेंगी. इसके अलावा ऑफिस में लिफ्ट की जगह  सीढि़यों का इस्‍तेमाल आपकी सेहत के लिए अच्छा रहेगा.

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7. थोड़ा-थोड़ा खाएं सेहत बनाएं

एक ही बार भरपेट खाने से अच्‍छा है कि थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुछ न कुछ खाती रहें. लेकिन खाते समय इस बात का जरूर ध्‍यान रखें कि वह पौष्टिक हो. तला-भुना खाना आपके लिए नुकसानदेह हो सकता है. दफ्तर में शाम को अगर भूख लगे तो हेल्‍थी स्‍नैक्‍स का ही सहारा लें जैसे स्प्राउट्स, फल, सूखे चने, नट्स आदि.

इस तरह से बिना जिम जाए घर के कुछ जरूरी काम कर, और छोटी छोटी बातों का ध्यान रखकर आप रोजाना ढाई सौ से 400 कैलोरी आसानी से कम कर सकती है. जो कामकाजी महिलाएं हैं वह यह काम हफ्ते में एक बार छुट्टी होने पर भी कर अपने को फिट रख सकती हैं.

ब्लैक आउटफिट में दिखा ‘मस्तानी’ दीपिका का मस्त और स्टाइलिश अंदाज

बौलीवुड की टेलेंटेड और स्टाइलिश एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण का जवाब नहीं आये दिन वो  सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं. कभी अपनी फिल्मों को लेकर तो कभी अपने लुक को लेकर.  दीपिका एक बार फिर अपने लुक से सुर्खियां  बटोर रही हैं. दीपिका पादुकोण का नया ब्लैक लुक वायरल हो रहा है.

क्रिस्टल अवौर्ड से हुई सम्मानित

दीपिका इन दिनों स्विटज़रलैंड में हैं. हाल ही में वर्ल्ड इकनोमिक फोरम की तरफ से दीपिका पादुकोण को 26 वें सालाना क्रिस्टल अवार्ड से सम्मानित किया गया. दीपिका पादुकोण को ये सम्मान मेंटल हेल्थ सेक्टर में उनके सराहनीय काम के लिए दिया गया.

 

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अवौर्ड सेरेमनी में छाया दीपिका का जलवा

दीपिका ने अवॉर्ड सेरेमनी से लेकर मीटिंग में गोशेर पैरिस की डबल-ब्रेस्टेड ब्लेज़र के साथ फॉर्मल पैन्ट्स पहनी थीं. इस ब्लेज़र में बड़ा लेपल कॉलर और फ्लैप पॉकेट डिज़ाइन था. ब्लेज़र के ऊपर एक और डबल ब्रेस्टेड कोट को स्टाइल किया था. दीपिका का ये लॉन्ग कोट पराडा का था. दीपिका को शालीना नैथानी ने स्टाइल किया था. ऑल ब्लैक लुक के साथ क्रिश्चियन लूबोटिन की डिज़ाइन की हुई ब्लैक स्टीलेटोज़ हील्स पहनी थीं और  बॉक्स शेप वाला बैग लिया था.

 

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ज्वैलरी भी है स्टाइलिश

दीपिका ने अपने लुक  को स्टाइलिश बनाने के लिए डायमंड चोकर और डैंगलर्स पहने थे. बालों का स्लीक बन बनाया था. मेकअप में ब्लैक आइ-लाइनर के साथ न्यूड लिप्स रखे थे. फिल्म छपाक के प्रमोशन पर  भी दीपिका काले रंग की ड्रेस में कमाल की  लग रही हैं. लेदर ब्लैक मॉम जींस और टर्टल नेक टॉप के साथ मेसी पोनीटेल और बड़े हूप ईयरिंग्स पहने और लाइट मेकअप न्यूड लिपस्टिक में वो गजब ढा रही थी. इससे पहले दीपिका ने ब्लैक गाउन में अपनी तस्वीरें इंस्टाग्राम पर भी शेयर कीं जिसे  लोगों ने काफी पसंद किया था.

दीपिका का लुक था खास

दीपिका ने ब्लैक कलर का बॉडी हगिंग वन-शोल्डर फुल स्लीव्स फिश-कट लॉन्ग गाउन पहन रखा था इसकी वन शोल्डर वाली ड्रमैटिक फुल स्लीव्स जो ट्रेल की तरह जमीन को छू रही थी. ये ब्लैक गाउन फेमस ऑस्ट्रेलियन फैशन डिजाइनर ऐलेक्स पेरी द्वारा डिजाइन किया गया था  जिसकी कीमत 2 हजार 250 डॉलर्स यानी करीब 1 लाख 60 हजार रुपये थी. इस गाउन के साथ दीपिका ने डायमंड के बड़े इयररिंग्स पहने थे. इस लुक में दीपिका बेहद खूबसूरत नजर आ रही थीं.

हेयर कट भी है खूबसूरत

 

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GORGEOUS ?? Deepika Padukone visits a Cineplex today in Mumbai #deepikapadukone

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दीपिका का स्टाइल ही खास है कुछ समय पहले दीपिका ने अपने नई हेयर कट की फोटो अपने इंस्टाग्राम पर शेयर की थी शार्ट हेयर कट में दीपिका बहुत सूंदर लग रहीं थी उनका ये नया लुक उनके फैंस को बहुत पसंद आया था और उन्होंने खूब कमैंट्स भी किये थे फैंस के कमैंट्स के साथ दीपिका पादुकोण के पति रणवीर सिंह ने भी दीपिका के लुक पर कमेंट किया और लिखा, मार दो मुझे और फैंस को भी. रणवीर का ये कमैंट्स लोगों को खूब पसंद आया.

 

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वर्क फ्रंट की बात करें तो दीपिका पादुकोण जल्दी ही फिल्म ’83’ में नजर आएंगी इस फिल्म में वो अपने पति रणवीर सिंह के साथ नजर आएंगी रणवीर इस फिल्म में कपिल देव का रोल निभा रहे है दीपिका फिल्म में उनकी पत्नी का रोल कर रही हैं फिल्म ’83’ अप्रैल में रिलीज होगी.

छपाक के बाद जंग जिंदगी के लिए

सिनेमा समाज का आईना होता है और आज समाज में महिलाओं को जिन ज्यादतियों और वहशियाना हरकतों का सामना करना पड़ रहा है उसे शब्दों में भी बयां करना कठिन है. ऐसा ही एक दरिंदगी भरा अपराध है ऐसिड अटैक यानी तेजाबी हमला. इस हमले की वजह बहुत छोटी सी होती है. किसी पुरुष द्वारा स्त्री को पाने की चाह और इग्नोर किए जाने पर एक झटके में उस स्त्री की जिंदगी तबाह, बस इतनी सी दास्तान होती है ऐसिड अटैक पीडि़ता बनने की. बिना किसी कुसूर लड़की के वजूद को मिटा देने की जिद विकृत पुरुष मानसिकता का जीताजागता उदाहरण होती है.

10 जनवरी, 2020 को रिलीज हुई तेजाबी हमले पर केंद्रित दीपिका पादुकोण द्वारा अभिनीत फिल्म ‘छपाक’ देखने जाते वक्त मेरी आंखों के आगे बारबार तेजाबी हमले की शिकार उस महिला का चेहरा आ रहा था जो 8 साल पहले गृहशोभा के कार्यालय में आई थी. वह अपनी कहानी लोगों के सामने लाना चाहती थी. उस ने अपनी कहानी सुनाते हुए अपने मन की गांठें खोलीं. फिर अपने तन के ढके कपड़े हटाए और साइड में बिखरे बालों को पीछे किया तो उस के साथ हुए हादसे की भयावहता से हमारी रूह कांप उठी. उस की पीठ का लगभग पूरा हिस्सा झुलसा हुआ था. बाईं तरफ चेहरे और गरदन से ले कर बांहें तक झुलसी हुई थीं. यह दृश्य एक दर्दभरी दास्तान बयां कर रहा था.

पढ़ने वालों की आंखें हुईं नम

अपनी कहानी बताते हुए रहरह कर चंडीगढ़ की उस महिला की आंखों से आंसू बहने लगते. आवाज घुट सी जाती और आंखों में दर्द का सागर उमड़ पड़ता. उस ने अपनी कहानी सुना कर जो हिम्मत और दिलेरी दिखाई थी ऐसा करना किसी के लिए इतना आसान नहीं होता. जाहिर था कि उस में जमाने से लड़ने की कूवत अब भी थी. वह नहीं चाहती थी कि कोई और युवती इस तरह की घटना का शिकार हो.

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हम ने उस की तसवीरों के साथ उस की जिंदगी की कहानी के 1-1 दर्दभरे लमहे को शब्दों में पिरोया था.

2012 में गृहशोभा के जून (द्वितीय) और जुलाई (प्रथम) अंक में ‘तेजाबी हमला: दर्द उम्र भर का’ शीर्षक से प्रकाशित वह एक ऐसी कहानी थी, जिसे पढ़ते वक्त चलचित्र की तरह सारे दृश्य लोगों की आंखों के आगे सजीव हो उठे थे. पलपल उस के द्वारा भुगती जा रही पीड़ा को लोगों ने महसूस किया था. उस पर तेजाब डाला गया था जब वह स्कूटी पर जा रही थी.

इस दर्दभरी कहानी को पढ़ कर लोगों का दिल किस कदर भर आया इस बाबत हमारे पास कितने ही पत्र और फोन आए. बहुत सी पीडि़त महिलाओं ने अपने साथ हुए हादसों का दर्द साझा किया तो हजारों लोगों ने इस कुकर्म की कड़े शब्दों में भर्त्सना की और इस महिला के सहयोग के लिए आगे आने की इच्छा जाहिर की. तभी हम ने गृहशोभा में वोआ (विक्टिम औफ ऐसिड अटैक्स) नाम के कैंपेन की शुरुआत की थी और तेजाबी हमला पीडि़ताओं की समस्याओं को सुलझाने की पहल भी की थी.

दीपिका ने जीवंत किया किरदार

8 साल पहले हम ने महिलाओं की जिंदगी की जिस त्रासदी को शब्दों में उकेरा था उसे ही मेघना गुलजार ने लक्ष्मी अग्रवाल की कहानी के साथ ‘छपाक’ फिल्म के रूप में प्रस्तुत किया है ताकि लोग ऐसी पीडि़ताओं के जीवन का दर्द महसूस करें. इस फिल्म में यकीनन दीपिका का अभिनय काबिलेतारीफ है. तेजाब पीडि़ता के प्रोस्थेटिक मेकअप के साथ जिस तरह दीपिका ने आगे आने की हिम्मत की और एक बदसूरत चेहरे के साथ जिंदगी जी रहे किरदार को जीवंत किया वह सराहनीय है. फिल्म में उन्होंने अपने मन की खूबसूरती और आत्मविश्वास को आकर्षक ढंग से पेश किया है.

अब जब दीपिका का कैरियर ग्राफ बुलंदियों पर है तब इस तरह की भूमिका स्वीकारना और उसे बेहतरीन ढंग से निभाना और फिर जेएनयू के स्टूडैंट्स तक पहुंच जाना व जेएनयू छात्रों की सपोर्ट करते हुए वहां हो रहे प्रोटैस्ट का हिस्सा बनने की हिम्मत करना केवल दीपिका ही कर सकती हैं. यह दीपिका ही थीं, जिन्होंने अपनी मानसिक बीमारी यानी डिप्रैशन के बारे में खुल कर बातें की थीं.

अकसर हम मानसिक बीमारियों का जिक्र भी करने से घबराते हैं, क्योंकि समाज में आज भी डिप्रैशन को लोग पागलपन की श्रेणी में रखते हैं. मगर दीपिका ऐसी बातों से घबराती नहीं हैं.

वे लोगों के आगे सचाई रखना जानती हैं और यही कदम इस फिल्म में ऐक्टिंग कर के उन्होंने उठाया है.

पीडि़तों की दूश्वारियां

‘छपाक’ फिल्म में दीपिका ने दिखाया है कि कैसे ऐसिड अटैक सरवाइवर्स को अपने चेहरे को देखने लायक बनाने की जद्दोजेहद में अनगिनत सर्जरीज और उन पर होने वाले खर्च के कारण आर्थिक परेशानियों से गुजरना पड़ता है. लोगों की हिकारतभरी नजरों का सामना करते हुए भी जिंदगी की जंग लड़नी पड़ती है. इस के साथ ही न्याय की आस में कोर्टकचहरियों के चक्कर लगातेलगाते अपना सुकून भी खोना पड़ता है. मगर यदि ऐसी लड़कियों को परिवार और समाज की सपोर्ट मिलती है तो वे फिर से दर्द से उबर कर जीना सीख जाती हैं.

दरअसल, अपराधी यही तो चाहता है कि पीडि़ता घर में बंद हो जाए और पलंग पर मुंह फेर कर लेटी रहे. न्याय के लिए लड़ने का जज्बा उसे खुद पैदा करना होगा तभी वह अपराधी के मंसूबों पर पानी फेर सकेगी.

‘छपाक’ फिल्म की कहानी ऐसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर आधारित है.

फिल्म की शुरुआत ऐसिड सर्वाइवर मालती अग्रवाल (दीपिका पादुकोण) की वर्तमान जिंदगी से होती है, जो ऐसिड अटैक के बाद कई सर्जरी करा चुकी है और अब नौकरी की तलाश में है. उसे बारबार तेजाबी हमले से हुए बदसूरत चेहरे की याद दिलाई जाती है. फिर उस की जिंदगी में छाया नाम के एनजीओ का संस्थापक अमोल (विक्रांत मेसी) आता है, जो ऐसिड सर्वाइवर के लिए काम करता है. मालती इस से जुड़ जाती है.

फिल्म अच्छी पर कुछ कमियां भी

फ्लैशबैक में मालती की कहानी दिखाई जाती है. 19 साल की खूबसूरत और हंसमुख मालती (दीपिका पादुकोण) सिंगर बनने के सपने देख रही, मगर बशीर खान द्वारा किए गए बर्बर ऐसिड अटैक के बाद उस की जिंदगी पहले जैसे कभी नहीं रह पाती. घर में टीवी की बीमारी से ग्रस्त भाई, आर्थिक तंगी से जूझती मां, शराबी पिता और उस पर मालती की सर्जरीज के बीच पुलिस इन्वैस्टिगेशन और कोर्टकचहरी के चक्कर. अपनी वकील की प्रेरणा से मालती ऐसिड को बैन किए जाने की याचिका दायर करती है. इस खौफनाक सफर में मालती का चेहरा भले छीन लिया जाता हो, मगर उस की मुसकान कोई नहीं छीन पाता.

इस फिल्म की कहानी और प्रस्तुतीकरण अच्छा है, मगर कुछ कमियां भी महसूस होती हैं. मसलन, कोर्टकचहरी के दृश्य उतने प्रभावशाली नहीं बन पड़े हैं. इसी तरह मालती की सर्जरी और उस के बाद की पीड़ा को और विस्तार से दिखा कर कहानी की गंभीरता और मार्मिकता बढ़ाई जा सकती थी. मालती की कहानी भी जल्दी में निबटा दी गई है.

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गृहशोभा में प्रकाशित की गई रिपोर्ट तेजाब पीडि़ताओं के दर्द का विस्तृत वर्णन करती है और वे पक्ष भी लेती है, जिन्हें फिल्मी परदे पर दिखाना संभव नहीं होता है.

‘‘2012 में गृहशोभा के जून (द्वितीय) और जुलाई (प्रथम) अंक में ‘तेजाबी हमला: दर्द उम्र भर का’ शीर्षक से प्रकाशित वह एक ऐसी कहानी थी, जिसे पढ़ते वक्त चलचित्र की तरह सारे दृश्य लोगों की आंखों के आगे सजीव हो उठे थे…’’

जानें क्या है हड्डियों और जोड़ों में दर्द के कारण

जाड़े का मौसम शुरू होते ही लोग हड्डियों और जोड़ों के  दर्द से परेशान होने लगते हैं. दरअसल, जब हमारी त्वचा सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में आती है तो हमारा शरीर विटामिन डी बनाता है, जिस से हड्डियां मजबूत रहती हैं. लेकिन सर्दियों में धूप कम रहने के कारण शरीर इसे ठीक से नहीं बना पाता. सेहत का पूरा खयाल न रखा जाए तो यह मौसम हड्डियों और जोड़ों से जुड़ी कई तरह की समस्याओं का शिकार बना सकता है. इस संदर्भ में सैंटर फौर नी ऐंड हिप केयर के डा. अखिलेश यादव कहते हैं कि जाड़े के मौसम में आमतौर पर 4 तरह की परेशानियां सिर उठाने लगती हैं:

1. जौइंट पेन

जिन लोगों को रूमैटौइड आर्थ्राइटिस या औस्टियोपोरोसिस जैसी समस्या होती है उन्हें ठंड के मौसम में दर्द ज्यादा होता है. दरअसल, जोड़ों के अंदर एक  झिल्ली होती है, जिसे साइनोवियल मैंब्रेन कहते हैं. इस में ठंड की वजह से इरिटेशन होती है, जिस से इन्फ्लेमेशन हो जाता है और दर्द होने लगता है.

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2. मस्क्युलर पेन

ठंड में मसल्स में भी ठंड लग जाती है, जिस की वजह से ब्लड सर्कुलेशन स्लो हो जाता है. इस से मसल्स सिकुड़ और ऐंठ जाती हैं. हड्डियों के लचीलेपन में भी कमी आ जाती है, जिस से दर्द होने लगता है.

3. न्यूरोलौजिकल पेन

हर्निएटेड डिस्क की प्रौब्लम में ठंड के मौसम में इस तरह की समस्याएं और बढ़ जाती हैं, क्योंकि बैक के आसपास की मसल्स ठंड में सिकुड़ती हैं तो नर्व पर प्रैशर बढ़ा देती हैं. इस से दर्द होने लगता है.

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4. पुरानी चोट

हड्डियों की पुरानी चोट जाड़े में बहुत परेशान करती है. उस खास हिस्से में ब्लड सर्कुलेशन घट जाने से वहां दर्द बढ़ जाता है.

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