हमारा विवाह कानून कितना अन्यायी है यह सुप्रीम कोर्ट के नए ताजे फैसले से स्पष्ट है. तीन तलाक पर 3 करोड़ आंसू बहाने वाली सरकार को क्या यह मालूम नहीं कि लाखों हिंदू औरतें हिंदू विवाह कानून के कारण वर्षों कारणअकारण अदालत के बरामदों में सैंडिल घिसतेघिसते जवान से बूढ़ी हो जाती हैं और न तो दूसरा विवाह कर पाती हैं और न ही विवाह बंधक से छुटकारा पा पाती हैं?
सुप्रीम कोर्ट की संजय किशन कौल और एम आर शाह की बैंच ने 2012 में दायर उच्च न्यायालय के फैसले पर की गई अपील को विशेष अधिकारों के ही तहत फैसला दिया और विवाह को अंतत: तोड़ दिया.
1993 में हुए विवाह के बाद पत्नी ज्यादातर समय पति के साथ न रह कर मायके रही. 1999 में पति ने तलाक का आवेदन हैदराबाद की फैमिली कोर्ट में दिया. तलाक
6 साल से अलग से रहने पर 10-20 दिनों में मिल जाना चाहिए था पर नहीं मिला. मामला उच्च न्यायालय से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट की बैंच के पास 2019 के पास पहुंचा, जिस ने पति से ₹20 लाख दिलवा कर पतिपत्नी को अलग कर दिया.
केवल कुछ दिनों साथ रही पत्नी से 1999 में से छुटकारे की कोशिश करता पति 20-25 साल बाद राहत की सांस ले पाया और इस दौरान पत्नी भी बंधी रहे यह कैसा समाज, कैसा कानून, कैसी औरतों की हमदर्द सरकार? यह 3 तलाक वाला नाटक कर के औरतों के हितों की तालियां पिटवाना नहीं कहा जाएगा तो क्या कहा जाएगा?
भारत की अदालतें, विधायक, मंत्री, प्रधानमंत्री आज भी पौराणिक विवाहों में विश्वास करते हैं जिस में सीता जैसी का पूरा जीवन जंगलों में बीते पर उसे बारबार 21वीं सदी में समाज में पूजा जाए. सीता सामाजिक, व्यक्तिगत नियमों का उदाहरण है कि यहां औरतों के साथ क्या हुआ और आज क्या हो रहा है.
सुप्रीम कोर्ट को तो सारी निचली अदालतों को फटकार लगानी चाहिए थी कि जब दोनों में से एक पक्ष तलाक का आवेदन करे तो तलाक क्यों नहीं दिया जाए? तलाक कोई जुल्म नहीं अगर पतिपत्नी अलग रह रहे हों. पति को अगर पत्नी पर जुल्म ढाने का हक नहीं है तो पत्नी को अलग रह कर पति को बांधे रखना, एटीएम मशीन समझना, उतना ही गलत है.
आभा और अमित जब शाम 5 बजे कालिज से लौटे तो अपने दरवाजे पर भीड़ देख कर घबरा गए. दोनों दौड़ कर गए तो देखा कि उन के पापा, लहूलुहान मम्मी को बांहों में भरे बिलखबिलख कर रो रहे हैं. दोनों बच्चे यह सब देख कर चकरा कर गिर पड़े. उन के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. तब पत्नी को धरती पर लिटा कर अपने दोनों बच्चों को छाती से लगा कर वह भी आर्तनाद कर उठे. पड़ोसियों ने उन्हें संभाला, तब दोनों को ज्ञात हुआ कि घटना कैसे हुई.
पड़ोस की कुछ महिलाएं नित्य मिल कर सब्जी-भाजी लेने जाती थीं. गृहस्थी का सब सामान लाद कर ले आतीं. उस दिन भी 4 महिलाएं सामान खरीद कर आटो से लौट रही थीं तभी पीछे से सिटी बस ने टक्कर मार दी. सामान का थैला पकड़े माया किनारे बैठी थीं. वह झटके से नीचे गिर पड़ीं. उधर सिटी बस माया को रौंदती हुई आगे निकल गई. बीच सड़क पर कोहराम मच गया. माया ने क्षण भर में प्राण त्याग दिए. पुलिस आई, केस बना, महेंद्र को फोन किया और वह दौड़े आए. उन की दुनिया उजाड़ कर समय अपनी गति पर चल रहा था परंतु गृहस्थी की गाड़ी का एक पहिया टूट कर सब अस्तव्यस्त कर गया.
मां तो बेटी से अब तक कुछ भी काम नहीं कराती थीं परंतु अब उस के कंधों पर पूरी गृहस्थी का भार आ पड़ा. कुछ भी काम करे तो चार आंसू पहले रो लेती. न पढ़ाई में चित्त लगता था न अन्य किसी काम में. न ढंग का खाना बना पाती, न खा पाती. शरीर कमजोर हो चला था. तब उन्होंने अपने आफिस के साथियों से कह कर एक साफसुथरी, खाना बनाने में सुघड़ महिला मालती को काम पर रख लिया था. चौकाबर्तन, झाड़ूपोंछा और कपड़े धोने के लिए पहले से ही पारोबाई रखी हुई थी. महेंद्र कुमार उच्चपदाधिकारी थे. अभी आयु के 45 वसंत ही पार कर पाए थे कि यह दारुण पत्नी बिछोह ले बैठे. सब पूर्ति हो गई थी, नहीं हुई थी तो पत्नी की. घर आते तो मुख पर हर क्षण उदासी छाई रहती. हंसी तो जैसे सब के अधरों से विदा ही हो चुकी थी. जीवन जैसेतैसे चल रहा था.
धीरेधीरे 6 माह बीत गए. शीत लहर चल रही थी, ठंड अपने पूरे शबाब पर थी. उस दिन आकाश पर घनघोर बादल छाए हुए थे. दोनों एक ही कालिज में पढ़ते थे. अमित एम.ए. फाइनल और आभा बी.ए. फाइनल में थी. कालिज घर से दूर था, तभी बारिश शुरू हो गई. डेढ़ घंटे के बाद वर्षा थमी तो ये दोनों घर आए. कुछकुछ भीग गए थे. पापा घर आ चुके थे और शायद चायनाश्ता ले कर अपने कमरे में आराम कर रहे थे. कपडे़ बदल कर दोनों ने कहा, ‘‘मालती, चायनाश्ता दो, क्या बनाया है आज?’’
‘‘आज साहब ने पकौड़े बनवाए थे. आप लोगों के लिए भी ला रही हूं,’’ कहती हुई वह 2 प्लेटों में पकौड़े रख कर चाय बनाने चली गई परंतु आभा के मन में गहरी चोट कर गई. जब वह दोबारा आ कर चाय की केटलीकप टेबिल पर रख रही थी तब वह मालती को देख कर चिल्लाई, ‘‘यह…यह क्या? यह तो मम्मी की साड़ी है, यह तुम ने कहां से उठाई है?’’ मालती घबरा गई, ‘‘मैं ने खुद नहीं उठाई बेबी, घर से आते हुए बारिश में भीग गई थी. ठंड से कांप रही थी तो साहब ने खुद निकाल कर दी है. ये 4 कपड़े स्वेटर, पेटीकोट, साड़ी और ब्लाउज…आप पूछ सकती हैं.’’
तभी उस की आवाज सुन कर महेंद्र दौड़े आए, ‘‘आभा, ये मैंने ही दिए हैं. यह भीग गई थी, फिर अब इन का क्या काम? वह तो चली गई. किसी के काम आएं इस से बढ़ कर दान क्या है. गरीब हैं ये लोग.’’ ‘‘नहीं पापा, मैं मम्मी के कपड़ों में इसे नहीं देख सकती. इस से कह दें कि अपने कपड़े पहन ले,’’ वह सिसक- सिसक कर रो पड़ी. अमित के भी आंसू छलक आए. ‘‘यह तो पागलपन है, ऐसी नादानी ठीक नहीं है.’’ ‘‘तो आप मम्मी के सब कपड़े अनाथालय में दान कर आएं. यह हमें इस तरह पलपल न मारे, मैं सह नहीं पाऊंगी.’’
‘‘आभा, जब इतना बड़ा गम हम उठा चुके हैं तो इतनी सी बात का क्यों बतंगड़ बना रही हो? इस के कपड़े अभी सूखे होंगे क्या? बीमार पड़ गई तो सारा काम तुम पर आ पडे़गा. इंसानियत भी तो कोई चीज है,’’ फिर वह मालती से मुखातिब हुए, ‘‘नहीं मालती, गीले कपडे़ मत पहनना. अभी इस ने पहली बार ऐसा देखा है न, इस से सह नहीं पाई. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. तुम जा कर खाना बनाओ और तुम दोनों अपने कमरे में जाओ,’’ कह कर वह अपने कमरे में घुस गए. उधर वे दोनों भी भारी मन से उठ कर अपने कमरे में चले गए.
एक दिन बहुत सुबह आभा ने देखा कि मालती पापा के कमरे से कुछ बर्तन लिए निकल रही है. मालती 5 बजे सुबह आ जाती थी, क्योंकि पानी 5 बजे सुबह ही आता था. ‘‘मालती, पापा के कमरे से क्या ले कर आई है?’’ ‘‘रात को दूध लेते हैं. साहब, इस से ये बर्तन उठाने पड़ते हैं.’’ ‘‘परंतु पापा तो कभी दूध पीते ही नहीं हैं?’’ आभा अचरज से बोली. ‘‘वह कई दिन से दूधबादाम ले रहे हैं, मैं रात में भिगो देती हूं. वह सोते समय रोज ले लेते हैं.’’ ‘‘बादाम कौन लाया?’’ आभा शंका में डूबती चली गई.
‘‘वह आप की मम्मी के समय के रखे थे. एक दिन डब्बा खोला तो देखा वे घुन रहे थे, सो उन से पूछा कि क्या करूं इन का, तो बोले कि रोज 5-6 भिगो दिया कर, दूध के साथ ले लिया करूंगा. तभी से दे रही हूं.’’ सुन कर आभा सोच में डूब गई.
मेरी यह योजना सुधा को बेहद पसंद आई. उस की आंखों में खुशी के आंसू भर आए. वह बोली, ‘‘अब मैं पूरी तरह से आप को समर्पित हूं. आप जो भी मुझे प्यार से देंगे उसे मैं अपना हक समझ कर खुशी से स्वीकार करूंगी,’’ और फिर एकाएक आगे बढ़ कर उस ने
मेरा माथा चूमलिया. कहने लगी, ‘‘प्रोफेसर, आप से मिलने के बाद मेरी कई मुश्किलें हल होती दिखाई देती हैं.’’
मैं ने महसूस किया कि एकदूसरे का सामीप्य तनमन को प्यार के रंग में भिगो देता है. हमारे जीवन मेें वे कुछ अनमोल क्षण होते हैं जिन से हमें जीवन भर ऊर्जा और जीने का मकसद मिलता है.
जवानी की दहलीज पर खड़ी सुधा पूरी उमंग और जोश में थी. उसे प्रेम के प्रथम अनुभव की तलाश थी, उसे चाहिए था जी भर कर प्यार करने वाला एक प्रौढ़ और पुरुषार्थी प्रेमी, जो शायद उस ने मुझ में ढूंढ़ लिया था. नाजुक और व्यावहारिक क्षणों में कभीकभी नैतिकता बहुत पीछे रह जाती है.
घनिष्ठता के अंतरंग क्षणों में, चाय की चुस्कियां लेते हुए साहस कर सुधा ने पूछ ही लिया, ‘‘प्रोफेसर, कौन थी वह भाग्यशाली लड़की जो आप को पसंद आई थी. उस का नाम क्या था. देखने में कैसी लगती थी?’’
उस की रुचि देख कर मैं ने अपनी अलबम के पृष्ठ पलट कर, उसे कृष्णा की फोटो दिखाते हुए कहा, ‘‘उस का नाम कृष्णा था. बहुत सुंदर और अच्छी लड़की थी.’’
फोटो देख कर उसे झटका सा लगा लेकिन स्पष्टतौर पर उस ने जाहिर नहीं होने दिया.
‘‘इस से अधिक मुझ से कुछ मत पूछना, सुधा,’’ मैं ने कहा.
उस दिन मेरा मन हुआ काश, सुधा आज देर तक मेरे घर रुके और हम लोग प्यार भरी बातें करें, पर देर होने के कारण वह जल्दी ही चली गई.
सुधा के निमंत्रण पर एक शाम मैं प्रोग्राम देख रहा था. फिल्मी कलाकार की तरह सुधा नृत्य पेश कर रही थी. हाल खचाखच भरा हुआ था. ‘बीड़ी जलाइ ले’ और ‘कजरारे कजरारे’ जैसे मशहूर गानों पर सुधा अपने हर स्टेप पर दर्शकों की वाहवाही बटोर रही थी. तालियों की गड़गड़ाहट से बारबार हाल गूंज उठता था. प्रोग्राम के अंत में मेरे पास से गुजरते हुए सुधा ने मुझ से धीमे स्वर में पूछा, ‘‘प्रोफेसर, कैसा लगा मेरा डांस?’’ मैं ने धीमे स्वर में सराहना करते हुए कहा, ‘‘तुम वाकई बहुत अच्छा डांस करती हो.’’
दूसरे दिन सुधा शाम को 5 बजे मेरे घर पहुंची. घर में प्रवेश करते ही बोली, ‘‘प्रोफेसर, चाय बना कर लाती हूं, फिर ढेर सारी बातें करेंगे.’’
वह चाय ले कर आई और मेरे पास बैठ गई.
‘‘प्रोफेसर, आप ने ‘निशब्द’ फिल्म देखी है?’’ सुधा ने पूछा.
‘‘हां, देखी है, मुझे अच्छी भी लगी थी,’’ मैं ने बताया.
सुधा मेरे इतने पास बैठी थी कि मन हुआ मैं उस के नरम गालों को स्पर्श कर अपने हाथों से उसे प्यार करूं. कृष्णा की याद आज ताजा हो उठी थी. उसे मैं इसी तरह प्यार किया करता था.
उस दिन ट्यूशन का कोई काम नहीं हो पाया. बस, नजदीकियां बढ़ा कर, हम दोनों एकदूसरे को प्यार करते रहे. जाते समय सुधा ने बडे़ प्यार से मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘‘निशब्द’ में अमिताभ बच्चन ने जिया से कितना जीजान से प्यार किया है. उम्र को भूल जाइए प्रोफेसर, मुझे आप से वैसा ही बेबाक प्यार चाहिए. अपने स्वाभिमान को भी बनाए रखिए और मुझ से प्रेम करते रहिए, मेरा दिल कभी नहीं तोडि़एगा.’’
मेरे भीतर कुछ ऐसा परिवर्तन हो चुका था कि उम्र की सीमा को लांघ कर मैं ने सुधा को अपनी बांहों में कस लिया और प्यार करने लगा, ‘‘नैतिकता की बात मत सोचना सुधा. मेरे साथ आज आनंद में डूब जाओ,’’ मैं बोलता रहा, ‘‘कुदरत ने शायद हम दोनों को इसीलिए मिलाया है कि हम प्रेम की ऐसी मिसाल कायम करें जिस का अनुभव अपनेआप में अद्भुत हो.’’
एक झटके में मुझ से अलग होते हुए सुधा बोली, ‘‘प्रोफेसर, हम ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे. ‘निशब्द’ में भी ऐसा कुछ नहीं दिखाया गया है. अमिताभ ने जिया से कोई यौन संपर्क नहीं किया. चलो, वह तो कहानी थी. हम वास्तव में प्यार करते रहेंगे. बस, एक यौन संपर्क को छोड़ कर,’’ एक पल रुक कर वह फिर बोली, ‘‘मैं एक बात और आप को बताना चाहती हूं कि जो फोटो कृष्णा की आप ने दिखाई थी वह मेरी मां की है. मेरी मां का नाम कृष्णा है. प्यार तो किया है आप से मैं ने और जिंदगी भर करती रहूंगी.’’
यह जान कर मेरे पैरों तले जमीन सरक गई. आश्चर्यचकित मैं सुधा के चेहरे की ओर देखता रहा. झील सी गहरी आंखों में अब भी मेरे लिए प्यार उमड़ रहा था. होंठों पर मधुर मुसकान थी. सुधा मेरी निगाहों में इतने ऊंचे
स्तर तक उठ चुकी थी, जिस महानता को मेरा निस्वार्थ प्रेम छू तक नहीं सकता था.
क्षण भर को मुझे लगा था, शायद तकदीर ने सुधा के रूप में मेरा पहला प्यार मुझे लौटा दिया है. दूसरे ही क्षण मैं अपने विचार पर मन ही मन हंस दिया कि अगर कृष्णा से विवाह भी हो गया होता तो सुधा जैसी ही सुंदर लड़की होती…
मैं अपने विचारों में खोया था, इतने में सुधा ने अपना फैसला सुना दिया, ‘‘प्रोफेसर, यह मत सोचना कि मैं आप के पास आना बंद कर दूंगी. मैं एक बोल्ड लड़की हूं. आप को अपने मन की बात बता रही हूं. मां को बता चुकी हूं, अब मैं शादी नहीं करूंगी. आज के माहौल में जहां दहेज के लोभी लोग लड़कियों को तंग करते हैं, जला देते हैं या तलाक जैसे नर्क में ढकेल देते हैं, मैं शादी के चक्कर में नहीं पड़ूंगी. मैं अपनी मर्जी की मालिक हूं. आप चाहोगे तो आप के पास आ कर रहने लगूंगी. नहीं चाहोगे तो भी आप के पास आती रहूंगी.
‘‘प्यार में चिर सुख की चाह होती है. यौन संबंध और विवाह की आवश्यकता से ऊपर उठ चुकी है आप की सुधा. आप के संरक्षण में
बहुत सुरक्षित रहूंगी,’’ मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर शेक हैंड करते हुए उस ने कहा.
मेरी आंखों में आंसू छलक उठे थे. मैं उस को जाते हुए देखता रहा, बोझिल मन लिए और निशब्द. लेकिन वह गई नहीं, वापस लौट आई.
‘‘तुम क्या सोचते थे, मैं तुम्हें आंसुओं के साथ छोड़ जाऊंगी. तुम्हें आश्चर्य हो रहा होगा. आप से तुम संबोधन पर आ गई हूं. ‘तुम’ में अपनापन लगता है. तुम रिटायर तो हो ही नहीं सकते. रिटायर काम से हुए हो जिंदगी से नहीं. हम दोनों आज से नई जिंदगी शुरू कर रहे हैं. कल सुबह सामान के साथ आ रही हूं,’’ हंसते हुए उस ने कहा, ‘‘अब तो मुसकरा दो…अब की सामान ले कर आ रही हूं. अच्छा…जाती हूं वापस आने के लिए.’’
अगर आप भी वेजीटेरियन हैं और कबाब के मजे लेना चाहते हैं तो ये रेसिपी आपके काम की है. आज हम आपको सोया सीक कबाब की रेसिपी बताएंगे, जिसे आप आसानी से घर पर अपनी फैमिली और फ्रेंड्स के लिए बना सकते हैं. ये आसान और वेजिटेरियन लोगों के लिए बेस्ट रेसिपी है.
‘बचपन बचाओ’का संदेश देने के लिए नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी के कार्यों से प्रेरित होकर ब्रम्हानंद एस सिंह और तनवी जैन फिल्म ‘‘झलकी’’ लेकर आए हें. निर्देशकद्वय ने एक बाल मजदूर जैसे अति गंभीर विषय पर अपनी तरफ से गंभीर प्रयास किया है, मगर विषयवस्तु को लेकर सीमित सोच के चलते फिल्म अपना प्रभाव झोड़ने में नाकाम रहती है.
कहानीः
फिल्म की कहानी गौरया नामक चिड़िया की एक पुरानी लोककथा के एनपीमेान मे काध्यम से शुरू होती है. गौरैया ,जिसका एक दाना बांस की खोल में फंस जाता है,जिसे पाने के लिए वह बढ़ई,राजा, उसकी रानी,सांप,एक छड़ी,आग, समुद्र और एक हाथी तक गुहार लगाती है. हाथी तक पहुंचने से पहले सभी उसे भगा देते हैं.मगर जब हाथी उसकी मदद के लिए उसके साथ चलता है, तो सभी मदद के लिए तैयार हो जाते हैं और गौरैया को उसका दाना मिल जाता है.
फिर मूल कहानी शुरू होती है. कहानी है उत्तर प्रदेश के एक गाँव से रामप्रसाद(गोविंद नामदेव) नियमित रूप से बच्चों को श्रम के लिए शहर में ले जाता है. इसके लिए वह बच्चों के गरीब माता पिता को एलईडी टार्च या एफएम रेडियो अथवा कुछ पैसे देकर उनकी भलाई का नाटक करता है.पर उसी गॉंव की एक नौ साल की लड़की झलकी( बेबी आरती झा)को रामप्रसाद पसंद नहीं.वह हर हाल में अपने छोटे भाई सात साल के बाबू(गोरक्षक सकपाल)को रामप्रसाद से बचाकर रखना चाहती है. पर हालात कुछ इस तरह बदलते हैं कि राम प्रसाद के साथ झलकी और उसका भाई बाबू मिर्जापुर शहर पहुंच जाते है, जहां रामप्रसाद बड़ी चालाकी से उसके भाई बाबू को बाल मजदूरी के लिए दूसरों के हाथ बेच देते हैं और झलकी को किसी अन्य के हाथ वेश्यावृत्ति के लिए बेचते हैं. झलकी अपने भाई बाबू से अलग हो जाती है, पर वह भागकर खुद को बचा लेती है. फिर वह अपने भाई बाबू की तलाश शुरू करती है. कारपेट बनाने वाली फैक्टरी के मालिक चकिया (अखिलेंद्र मिश्रा ) के यहां बाबू कारपेट बनाने के काम में लग जाता है.
अपने भाई बाबू की तलाश के लिए झलकी गौरैया की कहानी को याद कर अपने काम पर लग जाती है. उसे सबसे पहले रिक्शा चालक रहीम चाचा (बचन पचेहरा) का साथ मिलता है.जलेबी बेचने वाले दुकानदार को सच पता है, पर वह कुछ बताने को तैयार नही. तब झलकी राजा यानी कि जिले के कलेक्टर संजय ( संजय सूरी)के पास पहुंचती है,संजय उसे भगा देते हैं. तब वह नाटकीय तरीके से रानी यानी कि कलेक्टर की पत्नी सुनीता (दिव्या दत्ता) से मिलती है.सुनीता उसे अपने घर ले जाकर अपने साथ रहने के लिए कहती है और आश्वस्त करती है कि वह जल्द उसके भाई को ढुंढ़वा देंगी. पर संजय खुद को असमर्थ बताते हैं.रहीम चाचा की मदद से झलकी को यह पता चल जाता है कि उसके भाई बाबू से कारपेट बनाने वाली कंपनी के मालिक चकिया बाल मजदूरी करा रहे हैं. एक दिन जब वह छिपकर कंपनी के अंदर पहुंचती है तो वह कलेक्टर संजय के ज्यूनियर और एसडीएम अखिलेश (जौयसेन गुप्ता) को चकिया से घूस लेते देख लेती है. पर संजय चुप रहते हैं.उसके बाद नाटकीय तरीके से पत्रकार प्रीति व्यास(तनिष्ठा चटर्जी)और बच्चों को छुड़वाने काम कर रहे समाज सेवक(बोमन ईरानी)की मदद से झलकी अपने भाई व गांव के अन्य बच्चों का बाल मजदूरी से मुक्त कराकर अपने गांव पहुचती है.
कहानी खत्म होने के बाद कैलाश सत्यार्थी का लंबा चैड़ा भाषण और उनके द्वारा 86 हजार बच्चों को छुड़ाए जाने के दौरान के उनके कार्यों के वीडियो भी आते हैं.
लेखन व निर्देशनः
मूलतः डाक्यूमेंट्री फिल्मकार ब्रम्हानंद एस सिंह की बतौर निर्देशक यह पहली फीचर फिल्म है, जिसमें उनके साथ निर्देशन में सहयोगी के रूप में तनवी जैन भी जुड़ी हुई हैं. ब्रम्हानंद एस सिंह ने संगीतकार आर डी बर्मन और गजल गायक जगजीत सिंह लंबी डाक्यूमेंट्री बना चुके हैं. जिसका असर फिल्म में इंटरवल से पहले नजर आता है. इंटरवल से पहले जिस तरह से दृश्य व पाश्र्व में गाने पिरोए गए हैं, उससे फीचर फिल्म की बजाय डाक्यमेंट्री का अहसास होता है. इंटरवल के बाद घटनाक्रम घटित होते हैं. पर पटकथा में कुछ झोल के साथ निर्देशन में कुछ कमियां है.फिल्म बेवजह लंबी खींचीं गयी है.
फिल्म में बच्चो के यौन शोषण को भी बहुत हलके फुलके से दिखाया गया है. फिल्मकार के रूप में ब्रम्हानंद ने बाल मजदूरी के साथ जुड़े हर इंसान को बेनकाब करने का प्रयास किया है. फिल्म में भाई कही तलाश में जुटी झलकी के अंदर के गहरे डर का भी बेहतरीन चित्रण है. कालीन बुनाई के लघु उद्योग में किस तरह छोटे छोटे बच्चे काम कर रहे है और उन्हे किस हालात में रखा जाता है, उसका यथार्थ चित्रण है. मिर्जापुर में घरेलू उद्योगों की लंबी श्रृंखला में कालीन की बुनाई उद्योग है.जहां बाल तस्करी का नेक्सस बड़ा और शक्तिशाली है. मगर फिल्मकार ने इसका बहुत सतही चित्रण किया है.
अभिनयः
जहां तक अभिनय का सवाल है,तो झलकी के किरदार में बाल कलाकार आरती झा अपने शानदार अभिनय से मन मोह लेती हैं. गोरक्षा सकपाल ने भी बाबू के किरदार के साथ न्याय किया है. यह दोनों भाई-बहन के रूप में एक अद्भुत, वास्तविक बंधन बनाते हैं. फिल्म में बेहतरीन कलाकारों की लंबी चैड़ी फौज है, मगर पटकथा लेखन व निर्देशकीय कमजोरी के चलते यह कलाकार बंधे से नजर आते हैं. कोई भी खुलकर अपनी प्रतिभा को सामने नहीं ला पाया.
दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह बौलीवुड की बेस्ट जोड़ी में से एक हैं. आज यानी कि 14 नवंबर को दोनों की पहली शादी की सालगिरह है. आम तौर पर ज्यादातर सेलेब्स इस स्पेशल डे पर पार्टी करते हैं, कहीं घूमने जाते हैं, लेकिन इस जोड़ी ने ऐसा न करके एक टेंपल में जाना सही समझा. दोनों वेंकटेश्वर पहुंचे थे जहां से उनकी फोटोज और वीडियोज सामने आए हैं. दोनों इस दौरान न्यूली वेड कपल की तरह लग रहे हैं. दीपिका ने इस दौरान रेड कलर की साड़ी के साथ हैवी ज्वैलरी पहनी हुई है. इसके साथ ही दीपिका ने मांग में सिंदूर लगा रखा है. दीपिका काफी खूबसूरत लग रही हैं.
ट्रेडिशनल लुक में नजर आए दोनों…
वहीं रणवीर ने इस दौरान औफ़ व्हाइट कलर का कुर्ता पजामा के साथ रेड कलर की चुन्नी कैरी की हुई है. दोनों की जोड़ी हमेशा की तरह प्यारी और परफेक्ट लग रही है. फैन्स को भी दोनों का ये अंदाज पसंद आ रहा है. सभी उनके इस सिंपल और प्यारे सेलिब्रेशन की तारीफ कर रहे हैं.
रणवीर हर मौक़े पर बहुत एक्साइटेड रहते हैं तो जब बात उनकी शादी की सालगिरह की हो तो सोचिए कितने एक्साइटेड होंगे वो. इतना ही नहीं, रणवीर ने तो सालगिरह के लिए खूब तैयारी भी की. दरअसल, दीपिका ने बुधवार को रणवीर की एक फोटो इंस्टाग्राम पर शेयर की थी जिसमें रणवीर ने फेस मास्क लगाया हुआ था. दीपिका ने इस फोटो को शेयर करके हुए लिखा था, शादी की पहली सालगिरह के लिए रणवीर की तैयारी.
बता दें कि दीपिका और रणवीर ने एक दूसरे को छह साल तक डेट करने के बाद शादी के बंधन में बंधने का फैसला किया. इटली में बेहद ही कॉन्फीडेंशियल करीके से उन्होंने शादी की थी जिसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुए थे.
बौलीवुड के पौपुलर कपल्स में से एक एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण और एक्टर रणवीर सिंह आज यानी 14 नवंबर को अपनी शादी की पहली एनिवर्सरी मना रहे हैं. 6 साल तक रिलेशनशिप में रहकर अपनी फिल्मों से फैंस को एंटरटेन करने वाले इन सितारों की लव स्टोरी जितनी खास है उतनी इनकी वेडिंग फोटोज भी फैंस का दिल जीतने वाले है. आज हम आपको दीपिका-रणवीर की पहली सालगिरह पर दोनों की शादी की कुछ फोटोज दिखाएंगे, जिसे देखकर आप कहेंगे ये मेड फौर इच अदर कपल है.
दो रीति रिवाजों से बंधे शादी के बंधन में
सभी को पता है कि रणवीर सिंधी फैमिली से ताल्लुक रखते हैं और दीपिका साउथ से, जिसके चलते दोनों की शादी दो रीति रिवाजों से हुई थी.
दीपिका का और रणवीर की शादी इटली के लेक कोमो में दोनों ने 14 नवंबर को तमिल रीति रिवाज से और 15 नवंबर को सिंधी रीति रिवाजों से शादी की थी, जिसकी फोटोज सोशल मीडिया पर काफी पौपुलर हुई थी.
दो रीति रिवाजों से शादी होने के चलते दीपिका और रणवीर का अटायर भी खास था. जहां तमिल शादी के लिए दीपिका कांजीवरम साड़ी में और रणवीर धोती कुर्ते में नजर आए. वहीं सिंधी शादी के लिए दीपिका रेड कलर के लहंगे और रणवीर शेरवानी में नजर आए थे.
दीपिका और रणवीर की पहली मुलाकात Zee Cine Awards में हुई थी. यहीं रणवीर ने पहली बार दीपिका पादुकोण को आमने-सामने देखा था और रणवीर का कहना है कि वह उन्हें देखते ही फिदा हो गए थे.
दोनों को साथ में ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने के लिए जरूरी था कि वे साथ में काम करते और उन्हें ये मौका दिया दिग्गज फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली ने. फिल्म का नाम था “गोलियों की रासलीला – रामलीला”, जिसके बाद दिवानी मस्तानी जैसी फिल्मों में काम करके फैंस का दिल जीता.
क्या हो अगर आप पर हर समय कोई नजर रख रहा हो, आप की हर एक्टिविटी को मौनिटर कर रहा हो, आप के करीबी लोगों को आप से दूर कर आप की जिंदगी पर एक काले साए की तरह छा रहा हो? और अब सोचिए कि क्या हो जब आप किसी इंसान की हकीकत जाने बिना उस से प्यार कर बैठें? कुछ ऐसी ही कहानी है कैरोलिन केपन्स के उपन्यास पर आधारित नैटफ्लिक्स औरिजिनल साइकोलौजिकल थ्रिलर सीरीज ‘यू’ की.
सीरीज की शुरुआत होती है गुइनिवर बेक और जोसफ से. बेक एक खूबसूरत, जवान और स्मार्ट लड़की है जिसे लिखना, पार्टी करना, सोशल मीडिया पर तसवीरें पोस्ट करते रहना पसंद है. वहीं, जोसफ उर्फ जो एक साधारण दिखने वाला लड़का है और एक बुकस्टोर का क्लर्क है. लेकिन, यह साधारण सा लड़का असल में एक स्टाकर है जो बेक को देखते ही उस का कायल हो जाता है और बेक उस के लिए एक मकसद बन जाती है.
सीरीज की दिलचस्प बात यह है कि यह किसी हीरो के नहीं बल्कि असल में एक स्टाकर के पौइंट औफ व्यू से दिखाई गई है जोकि रोमांचक है और सनसनी पैदा करता है. इस में छिपे राज और बेक के लिए जो द्वारा उठाए गए कदम थ्रिलिंग हैं. कुछ ऐसे मौके भी हैं जहां लगता है कि चीजों को ज्यादा ही बढ़ाचढ़ा दिया है लेकिन फिर भी इसे बिंज वाच करने का मन करता है. सीरीज के सीजन वन में 10 एपिसोड्स हैं और जल्द ही इस का दूसरा सीजन आने वाला है. सीजन वन जिस सस्पैंस के साथ खत्म हुआ है उस से सीजन 2 में परदा उठेगा. आगे और कितने राज हैं यह देखना मजेदार होगा.
देशभक्ति पर आधारित सीरीज की ही तरह ‘द फैमिली मैन’ भी है, बस फर्क इतना है कि इस की नरेशन स्लो है और यह श्रीकांत, जिस का किरदार मनोज बाजपेयी निभा रहे हैं, पर आधारित है जो वक्तबेवक्त अपने परिवार और देश के बीच में से किसी एक को चुनने पर मजबूर रहता है. यह सीरीज आतंकवाद और धार्मिक अतिवाद जैसे मुद्दे को उजागर करती है. बावजूद इस के सीरीज का केंद्र श्रीकांत की अपने काम और घरपरिवार के बीच सामंजस्य बैठाने की जद्दोजहद को दिखाना ज्यादा लगता है.
मनोज बाजपेयी एक फिक्श्नल क्राइम एजेंसी ‘टास्क’ का जासूस या कहें औफिसर है, लेकिन अपने परिवार और बाकी दुनिया के लिए वह किसी सरकारी दफ्तर में फाइल लाने ले जाने का काम करता है. सुन कर अटपटा जरूर लगता है कि कैसे उस के अपने परिवार खासकर उस की पत्नी को उस के इस काम के बारे में कोई जानकारी नहीं है.
टास्क नामक यह फोर्स केवल आतंकवादी होने के शक पर 3 लड़कों को गोलियों से दाग देती है और गलती का एहसास होने पर उन्हें आतंकवादी करार दे देती है. अविश्वस?नीय जरूर लगता है पर फिर एहसास होता है कि यह सरकार पर बड़ी चालाकी से किया गया कटाक्ष है.
हर एपिसोड की शुरुआत में न्यूजपेपर कटिंग दिखा कर बताया गया है कि हर एपिसोड सत्य घटना से प्रेरित है जोकि सही भी लगता है क्योंकि असल में इस पूरी सीरीज में ही ऐसे मुद्दों को लिया गया है जिस से देश इस वक्त गुजर रहा है. सीरीज में ह्यूमर भी है और गंभीरता भी. यह सीरीज देखनी तो बनती है.
रीज की पृष्ठभूमि 1958 न्यूयौर्क की है. द मार्वलस मिसेज मेजल असल में मीरियम मिज मेजल है जो न्यूयौर्क में रहने वाली साधारण जूइश महिला थी लेकिन एक रात में ही उस की जिंदगी तब बदल गई जब उस के पति ने उसे यह कह कर छोड़ दिया कि उस का अपनी सैक्रेटरी के साथ अफेयर चल रहा है.
मिज खुद को अचानक ही सब से अकेला पाने लगती है, उसे लगता है जैसे अब यहां उस के लिए कुछ बचा ही नहीं है, लेकिन एपिसोड वन के ऐंड में ही यह सामने आता है कि मिज में स्टैंड अप कौमेडियन बनने की प्रतिभा है जिसे पूरे सीजन में आगे बढ़ाया गया है. प्रोफैशनल और पर्सनल लाइफ के बीच मिज की जद्दोजहद को दिखाया गया है.
पूरा शो ही लाइट कौमेडी से घिरा हुआ है लेकिन जबतब दिखाए जाने वाले मिज के स्टैंड अप्स और मोनोलोग कमाल के हैं. यह सीरीज एक मस्ट वाच इसलिए भी है कि इस में एक फीमेल करैक्टर को अपनी पहचान बनाते और ख्याति पाते दिखाया गया है जिस के द्वारा रास्ते में आने वाली हर परेशानी को आड़ेहाथों लिया गया. सीरीज का तीसरा सीजन इस दिसंबर एमेजौन प्राइम पर आने वाला है.
यदि आप ने कोरियन ड्रामा के बारे में सुना होगा कि वे अत्यधिक रोमांटिक होते हैं या वे केवल प्यार के इर्दगिर्द ही घूमते हैं. लेकिन यह उन सभी केंड्रामा से बहुत ज्यादा अलग हैं. पिनोकियो कोरियन टैलीविजन ड्रामा सीरीज है. शो की गिनती एशिया के लोकप्रिय शोज में होती है जिस के किरदार कोरियाई ड्रामा जगत के जानेमाने चेहरे पार्क शिन और ली जोंग सुक हैं.
असल में प्यार और दोस्ती तो पिनोकियो में भी है लेकिन शो का मेन फोकस एक लड़के हा म्यूंग की कहानी दिखाना है जिस ने एक हादसे में अपने परिवार को खो दिया और वह भी उन पत्रकारों के कारण जिन्होंने उस के निर्दोष पिता को गुनहगार ठहराया. वह उन सभी पत्रकारों खासकर उस एक पत्रकार को यह साबित करना चाहता है कि असल में सच्ची पत्रकारिता क्या होती है. पर कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब वह उसी महिला की बेटी से प्यार कर बैठता है.
सीरीज हद से ज्यादा फनी है जिस में इमोशंस का तड़का बराबर लगाया गया. यह हिंदी और इंग्लिश सीरीज से बहुत अलग है क्योंकि इस में रिश्तों खासकर प्यार की जो परिभाषा दिखाई गई है वह स्लो पेस पर चलती है. इस सोशल मीडिया के जमाने में ऐसी कहानी पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल जरूर है मगर मन करता है कि इस पर विश्वास किया जाए.
लर्स फोर्समन की इसी नाम की ग्राफिक नौवल पर आधारित ‘द एंड औफ द फ***इंग वर्ल्ड’ ब्रिटिश डार्क कौमेडी ड्रामा टैलीविजन प्रोग्राम है जिसे नैटफ्लिक्स पर 8 एपिसोड के सीजन वन में दिखाया गया और जल्द ही इस का दूसरा सीजन भी आने वाला है. सीजन वन में जेम्स जोकि खुद को साइकोपाथ सम झता है अपनी क्लासमैट अलीसा से मिलता है जो रिबिलीयस है और उस की खुद की कई प्रौब्लम्स हैं. जिन से वह जूझ रही है. दोनों टीनएजर्स हैं और बाकी सभी सामान्य टीनएजर्स से बहुत अलग हैं.
जेम्स को हौबी के तौर पर जानवरों को मारना पसंद है और एक दिन वह इस से ऊब जाता है और फैसला करता है कि वह किसी इंसान को मारेगा. अलीसा को लगता है कि जेम्स के साथ झूठे रोमांस से शायद वह सचाई से दूर जा सकती है. जेम्स और अलीसा घर से भाग निकलते हैं जहां जेम्स का प्लान अलीसा को जान से मारना है. क्या जेम्स अलीसा को मार पाया? उन दोनों के बीच जो कैमिस्ट्रि डैवलप हुई, सच थी या नहीं? क्या दोनों अपनेअपने मकसद में कामयाब हुए? इन सब का जवाब सीरीज में है.
सीरीज मस्ट वाच है जो अपने साथ कई मुद्दे भी उजागर करती है. जेम्स और अलीसा को अपने सफर में कुछ ऐसी चीजों का सामना भी करना पड़ता है जो उन की आने वाली जिंदगी को हमेशा के लिए बदल कर रख देगी. सीरीज में डार्क ह्यूमर है जिस पर ठहाके मारमार कर हंसी तो नहीं आती लेकिन अच्छा लगता है, बोरियत नहीं होती.
एग-फ्राइड राइस न सिर्फ स्वाद के मामले में बल्कि सेहत के लिहाज से भी काफी पसंद की जाने वाली डिश है. अंडों के पोषण से भरपूर यह डिश बनाने में भी काफी आसान है. इस डिश को आप किटी पार्टी या फिर छोटे गेट टू गेदर के दौरान सर्व कर सकती हैं.
एक बड़े बर्तन में दो कप चावल ले लें. चावल को अच्छी तरह धो लें. चावल धोने के बाद इसे उबालकर पका लें और किनारे रख दें.
सारी सब्जियों को धोकर अच्छी तरह काट लें. हर सब्जी को बारीक और एक आकार में काटें.
अब एक पैन लेकर उसमें तेल गर्म करें. अब इसमें बारीक कटी प्याज को डालकर हल्का भूरा होने तक भूनें. जब प्याज का रंग बदल जाए तो इसमें बाकी सब्जियां डालकर अच्छी तरह मिला लें.