Hindi Story: भटकाव के बाद- परिवार को चुनने की क्या थी मुकेश की वजह

Hindi Story: संजीव का फोन आया था कि वह दिल्ली आया हुआ है और उस से मिलना चाहता है. मुकेश तब औफिस में था और उस ने कहा था कि वह औफिस ही आ जाए. साथसाथ चाय पीते हुए गप मारेंगे और पुरानी यादें ताजा करेंगे. संजीव और मुकेश बचपन के दोस्त थे, साथसाथ पढ़े थे. विश्वविद्यालय से निकलने के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए थे. मुकेश ने प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से केंद्र सरकार की नौकरी जौइन कर ली थी. प्रथम पदस्थापना दिल्ली में हुई थी और तब से वह दिल्ली के पथरीले जंगल में एक भटके हुए जानवर की तरह अपने परिवार के साथ जीवनयापन और 2 छोटे बच्चों को उचित शिक्षा दिलाने की जद्दोजहद से जूझ रहा था. संजीव के पिता मुंबई में रहते थे.

शिक्षा पूरी कर के वह वहीं चला गया था और उन के कारोबार को संभाल लिया. आज वह करोड़ों में नहीं तो लाखों में अवश्य खेल रहा था. शादी संजीव ने भी कर ली थी, परंतु उस के जीवन में स्वच्छंदता थी, उच्छृंखलता थी और अब तो पता चला कि वह शराब का सेवन भी करने लगा था. इधरउधर मुंह मारने की आदत पहले से थी.

अब तो खुलेआम वह लड़कियों के साथ होटलों में जाता था. कारोबार के सिलसिले में वह अकसर दिल्ली आया करता था. जब भी आता, मुकेश को फोन अवश्य करता था और कभीकभार मौका निकाल कर उस से मिल भी लेता था, परंतु आज तक दोनों की मुलाकात मुकेश के औफिस में ही हुई थी. मुकेश की जिंदगी कोल्हू के बैल की तरह थी, बस एक चक्कर में घूमते रहना था, सुबह से शाम तक, दिन से ले कर सप्ताह तक और इसी तरह सप्ताह-दर-सप्ताह, महीने और फिर साल निकलते जाते, परंतु उस के जीवन में कोई विशेष परिवर्तन होता दिखाई नहीं पड़ रहा था.

नौकरी के बाद उस के जीवन में बस इतना परिवर्तन हुआ था कि दिल्ली में पहले अकेला रहता था, शादी के बाद घर में पत्नी आ गई थी और उस के बाद 2 बच्चे हो गए थे परंतु जीवन जैसे एक ही धुरी पर अटका हुआ था. निम्नमध्यवर्गीय जीवन की वही रेलमपेल, वही समस्याएं, वही कठिनाइयां और रातदिन उन से जूझते रहने की बेचैनी, कशमकश और निष्प्राण सक्रियता, क्योंकि कहीं न कहीं उसे यह लगता था कि उस के पारिवारिक जीवन में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं होने वाला है, सो जीवन के प्रति ललक, जोश और उत्तेजना दिनोंदिन क्षीण होती जा रही थी.

उधर से संजीव ने कहा था, ‘‘अरे यार, इस बार मैं तेरे औफिस नहीं आने वाला हूं. आज 31 दिसंबर है और तू मेरे यहां आएगा, मेरे होटल में. आज हम दोनों मिल कर नए साल का जश्न मनाएंगे. मेरे साथ मेरे 2 दोस्त भी हैं, तुझे मिला कर 4 हो जाएंगे. सारी रात मजा करेंगे. बस, तू तो इतना बता कि मैं तेरे लिए गाड़ी भेजूं या तू खुद आ जाएगा?’’ मुकेश सोच में पड़ गया. सुबह घर से निकलते समय उस के बच्चों ने शाम को जल्दी घर आने के लिए कहा था. वह दोनों शाम को बाहर घूमने जाना चाहते थे. घूमफिर कर किसी रेस्तरां में उन सब का खाना खाने का प्रोग्राम था. वह जल्दी से कोई जवाब नहीं दे पाया, तो उधर से संजीव ने अधीरता से कहा, ‘‘क्या सोच रहा है यार. मैं इतनी दूर से आया हूं और तू होटल आने में घबरा रहा है.’’

उस ने बहाना बनाया, ‘‘यार, आज बच्चों से कुछ कमिटमैंट कर रखा है और तू तो जानता है, मैं कुछ खातापीता नहीं हूं. तुम लोगों के रंग में भंग हो जाएगा.’’ ‘‘कुछ नहीं होगा, तू भाभी और बच्चों को फोन कर दे. बता दे कि मैं आया हुआ हूं. और सुन, एक बार आ, तू भी क्या याद करेगा. तेरे लिए स्पैशल इंतजाम कर रखा है.’’ उस की समझ में नहीं आया कि संजीव ने उस के लिए क्या स्पैशल इंतजाम कर रखा है. स्पैशल इंतजाम के रहस्य ने उस की निम्नमध्यवर्गीय मानसिकता की सोच के ऊपर परदा डाल दिया और वह ‘स्पैशल इंतजाम’ के रहस्य को जानने के लिए बेताब हो उठा.

उस ने संजीव से कहा कि वह आ रहा है परंतु उस से वादा ले लिया कि उसे 10 बजे तक फ्री कर देगा. फिर पूछा, ‘‘कहां आना है?’’ संजीव ने हंसते हुए कहा, ‘‘तू एक बार आ तो सही, फिर देखते हैं. पहाड़गंज में होटल न्यू…में आना है. मेन रोड पर ही है.’’ मुकेश ने कहा कि वह मैट्रो से आ जाएगा और फिर फोन कर के पत्नी से कहा कि घर आने में उसे थोड़ी देर हो जाएगी. वह घर में ही खाना बना कर बच्चों को खिलापिला दे. आते समय वह उन के लिए चौकलेट और मिठाई लेता आएगा. उस की बात पर पत्नी ने कोई एतराज नहीं किया. वह जानती थी कि उस का पति एक सीधासादा इंसान है और बेवजह कभी घर से बाहर नहीं रहता. उसे अपनी पत्नी और बच्चों की बड़ी परवा रहती है.

मुकेश होटल पहुंचा तो संजीव उसे लौबी में ही मिल गया. बड़ी गर्मजोशी से मिला. हालचाल पूछे और कमरे की तरफ जाते हुए होटल के मैनेजर से परिचय कराया. मैनेजर बड़ी गर्मजोशी से मिला जैसे मुकेश बहुत बड़ा आदमी था. कमरे में उस के 2 दोस्त बैठे बातें कर रहे थे. संजीव ने उन से मुकेश का परिचय कराया. वे दोनों दिल्ली के ही रहने वाले थे. मुकेश से बड़ी खुशदिली से मिले, परंतु मुकेश शर्म और संकोच के जाल में फंसा हुआ था. होटल के बंद माहौल में वह अपने को सहज नहीं महसूस कर पा रहा था. इस तरह के होटलों में आना उस के लिए बिलकुल नया था. ऐसा कभी कोई संयोग उस के जीवन में नहीं आया था. कभीकभार पत्नी और बच्चों के साथ छोटेमोटे रेस्तराओं में जा कर हलकाफुलका खानापीना अलग बात थी. संजीव अपने दोस्तों की तरफ मुखातिब होते हुए बोला, ‘‘चलो, कुछ इंतजाम करो, मेरा बचपन का दोस्त आया है. आज इस की तमन्नाएं पूरी कर दो. बेचारा, कुएं का मेढक है. इस को पता तो चले कि दुनिया में परिवार के अतिरिक्त भी बहुतकुछ है, जिन से खुशियों के रंगबिरंगे महल खड़े किए जा सकते हैं.’’ फिर उस ने मुकेश की पीठ में धौल जमाते हुए कहा, ‘‘चल यार बता, तेरी क्याक्या इच्छाएं हैं, तमन्नाएं और कामनाएं हैं, आज सब पूरी करवा देंगे. यह मेरे मित्र का होटल है और फिर आज तो साल का अंतिम दिन है. कुछ घंटों के बाद नया साल आने वाला है. आज सारे बंधन तोड़ कर खुशियों को गले लगा ले.’’

संजीव कहता जा रहा था. ‘पहले तो कभी इतना अधिक नहीं बोलता था,’ मुकेश मन ही मन सोच रहा था. पहले वह भी मुकेश की तरह शर्मीला और संकोची हुआ करता था. दोनों एक कसबेनुमां गांव के रहने वाले थे. उन के संस्कारों में नैतिकता और मर्यादा का अंश अत्यधिक था. मुकेश दिल्ली आ कर भी अपने पंख नहीं फैला सका था. पिंजरे में कैद पंछी की तरह परिवार के साथ बंध कर रह गया था, जबकि संजीव ने मुंबई जा कर जीवन को खुल कर जीने के सभी दांवपेंच सीख लिए थे. सच कहा गया है, संपन्नता मनुष्य में बहुत सारे गुणअवगुण भर देती है, परंतु उस के अवगुण भी दूसरों को सद्गुण लगते हैं. जबकि गरीबी मनुष्य से उस के सद्गुणों को भी छीन लेती है. उस के सद्गुण भी दूसरों को अवगुण की तरह दिखाई पड़ते हैं. संजीव के एक दोस्त अमरजीत ने कहा, ‘‘आप के मित्र तो बड़े संकोची लगते हैं, लगता है, कभी घर से बाहर नहीं निकले.’’

मुकेश वाकई संकोच में डूबा जा रहा था. जिस तरह की बातें संजीव कर रहा था, उस तरह के माहौल से आज तक वह रूबरू नहीं हुआ था. वह किसी तरह के झमेले में पड़ने के लिए यहां नहीं आया था. वह तो केवल संजीव के जोर देने पर उस से मिलने के लिए आ गया था. उस ने सोचा था, कुछ देर बैठेगा, चायवाय पिएगा, गपशप मारेगा, और फिर घर लौट आएगा. रास्ते में बच्चों के लिए केक खरीद लेगा, वह भी खुश हो जाएंगे. दिसंबर की बेहद सर्द रात में भी मौसम इतना गरम था कि उसे अपना कोट उतारने की इच्छा हो रही थी. पर मन मार कर रह गया. सभी सोचते कि वह भी मौजमस्ती के मूड में है. उस ने संजीव के मुंह की तरफ देखा. वह उसे देख कर मुसकरा रहा था, जैसे उस के मन की बात समझ गया था. बोला, ‘‘सोच क्या रहा है? कपड़े वगैरह उतार कर रिलैक्स हो जा. अभी तो मजमस्ती के लिए पूरी रात बाकी है.’’ संजीव का एक दोस्त मोबाइल पर किसी से बात कर रहा था और दूसरा दोस्त इंटरकौम पर खानेपीने का और्डर कर रहा था. संजीव स्वयं मुकेश से बात करने के अतिरिक्त मोबाइल पर बीचबीच में बातें करता जा रहा था. गोया, उस कमरे में मुकेश को छोड़ कर सभी व्यस्त थे. उन की व्यस्तता में कोई चिंता, परेशानी या उलझन नहीं दिखाई दे रही थी. मुकेश व्यस्त न होते हुए भी व्यस्त था, उस के दिमाग में चिंता, उलझन और परेशानियों का लंबा जाल फैला हुआ था, जिस में वह फंस कर रह गया था. उस के जाल में उस की पत्नी फंसी हुई थी, उस के मासूम बच्चे फंसे हुए थे. उस के बच्चों की आंखों में एक कातर भाव था, जैसे मूकदृष्टि से पूछ रहे हों, ‘पापा, हम ने आप से कोई बहुत कीमती और महंगी चीज तो नहीं मांगी थी. बस, एक छोटा सा केक लाने के लिए ही तो कहा था. वह भी आप ले कर नहीं आए. पापा, आप घर कब तक आएंगे? हम आप का इंतजार कर रहे हैं.’

मुकेश के मन में एक तरह की अजीब सी बेचैनी और दिल में ऐसी घबराहट छा गई. जैसे वह अपने ही हाथों अपने बच्चों का गला घोंट रहा था, उन के अरमानों को चकनाचूर कर रहा था. पत्नी के साथ छल कर रहा था. वह उठ कर खड़ा हो गया और संजीव से बोला, ‘‘यार, मुझे घर जाना है, आप लोग एंजौय करो. वैसे भी मैं आप लोगों का साथ नहीं दे पाऊंगा.’’ ‘‘तो क्या हो गया? जूस तो ले सकता है, चिकन, मटन, फिश तो ले सकता है.’’

‘‘क्या 10 बजे तक फ्री हो जाऊंगा?’’ मुकेश ने जैसे हथियार डालते हुए कहा. ‘‘क्या यार, तुम भी बड़े घोंचू हो. बच्चों की तरह घर जाने की रट लगा रखी है. पत्नी और बच्चे तो रोज के हैं, परंतु यारदोस्त कभीकभार मिलते हैं. नए साल का जश्न मनाने का मौका फिर पता नहीं कब मिले,’’ संजीव थोड़ा चिढ़ते हुए बोला. थोड़ी देर में चिकनमटन की तमाम सारी तलीभुनी सामग्री मेज पर लग गई. मुकेश मन मार कर बैठा था, मजबूरी थी. अजीब स्थिति में फंस गया था. न आगे जाने का रास्ता उस के सामने था, न पीछे हट सकता था. संजीव उस की मनोस्थिति नहीं समझ सकता था. अपनी समझ में वह अपने दोस्त को जीवन की खुशियों से रूबरू होने का मौका भी प्रदान कर रहा था. परंतु मुकेश की स्थिति गले में फंसी हड्डी की तरह थी, जो उसे तकलीफ दे रही थी.

मुकेश के हाथ में जूस का गिलास था, परंतु जब भी वह गिलास को होंठों से लगाता, जूस का पीला रंग बिलकुल लाल हो जाता. खून जैसा लाल और गाढ़ा रंग देख कर उसे उबकाई आने लगती और बड़ी मुश्किल से वह घूंट को गले से नीचे उतार पाता. संजीव और उस के दोस्त बारबार उसे कुछ न कुछ खाने के लिए कहते और वह ‘हां, खाता हूं’ कह कर रह जाता, चिकनमटन के लजीज व्यंजनों की तरफ वह हाथ न बढ़ाता. उस के कानों में सिसकियों की आवाज गूंजने लगती, अपने बच्चों के सिसकने की आवाज… कितने छोटे और मासूम बच्चे हैं, अभी 7 और 5 वर्ष के ही तो हैं. इस उम्र में बच्चे मांबाप से बहुत ज्यादा लगाव रखते हैं. उन की उम्मीदें बहुत छोटी होती हैं, परंतु उन के पूरा होने पर मिलने वाली खुशी उन के लिए हजार नियामतों से बढ़ कर होती है.

तभी एक सुंदर, छरहरे बदन की युवती ने वहां कदम रखा. उस ने हंसते हुए संजीव के बाकी दोनों दोस्तों से हाथ मिलाया, फिर प्रश्नात्मक दृष्टि से मुकेश की तरफ देखने लगी. संजीव ने कहा, ‘‘मेरा यार है, बचपन का, थोड़ा संकोची है.’’ बीना ने अपना हाथ मुकेश की तरफ बढ़ाया. उस ने भी हौले से बीना की हथेली को अपनी दाईं हथेली से पकड़ा. बीना का हाथ बेहद ठंडा था. उस ने बीना की आंखों में देखा, वह मुसकरा रही थी. उस का चेहरा ही नहीं आंखें भी बेहद खूबसूरत थीं. चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था, होंठों पर लिपस्टिक नहीं थी, बावजूद इस के वह बहुत सुंदर लग रही थी. मुकेश अपनी भावनाओं को छिपाते हुए बोला, ‘‘संजीव, अगर बुरा न मानो तो मुझे जाने दो. तुम लोग एंजौय करो. मैं कल तुम से मिलूंगा,’’ कह कर उठने का उपक्रम करने लगा. हालांकि यह एक दिखावा था, अंदर से उस का मन रुकने के लिए कर रहा था, परंतु मध्यवर्गीय व्यक्ति मानमर्यादा का आवरण ओढ़ कर मौजमस्ती करना पसंद करता है. बदनामी का भय उसे सब से अधिक सताता है, इसीलिए वह जीवन की बहुत सारी खुशियों से वंचित रहता है.

संजीव ने उस की बांह पकड़ कर फिर से कुरसी पर बिठा दिया, ‘‘बेकार की बातें मत करो.’’ संजीव की बात सुन कर मुकेश का हृदय धाड़धाड़ बजने लगा, जैसे किसी कमजोर पुल के ऊपर से रेलगाड़ी तेज गति से गुजर रही हो. वह समझ नहीं पाया कि यह खुशी के आवेग की धड़कन है या अनजाने, आशंकित घटनाक्रम की वजह से उस का हृदय तीव्रता के साथ धड़क रहा है? बीना ने मुकेश की तरफ देख कर आंख मार दी. वह झेंप कर रह गया.

संजीव बाहर निकलते हुए बोला, ‘‘चलो, जल्दी करो. मुकेश को घर जाना है.’’ संजीव बगल वाले कमरे में चला गया. मुकेश कमरे में अकेला रह गया, विचारों से गुत्थमगुत्था. उस ने अपने दिमाग को बीना के सुंदर चेहरे, पुष्ट अंगों और गदराए बदन पर केंद्रित करना चाहा, परंतु बीचबीच में उस की पत्नी का सौम्य चेहरा बीना के चंचल चेहरे के ऊपर आ कर बैठ जाता. उस के मन को बेचैनी घेरने लगती, परंतु यह बेचैनी अधिक देर तक नहीं रही. मुकेश चाहता था, वह बीना के शरीर की ढेर सारी खुशबू अपने नथुनों में भर ले, ताकि फिर जीवन में किसी दूसरी स्त्री के बदन की खुशबू की उसे जरूरत न पड़े. परंतु यहां खुशबू थी कहां? कमरे में एक अजीब सी घुटन थी. उस घुटन में मुकेश तेजतेज सांसें लेता हुआ अपने फेफड़ों को फुला रहा था और एकटक बीना के शरीर को ताक रहा था, जैसे बाज गौरैया को ताकता है. परंतु यहां बाज कौन था और गौरैया कौन, यह न मुकेश को पता था, न बीना को.

बीना तंदरुस्त लड़की थी और उस के हावभाव से लग रहा था कि वह किसी भले घर की नहीं थी. उस ने हाथ पकड़ कर मुकेश को खड़ा किया और बोली, ‘‘क्या खूंटे की तरह गड़े बैठे हो? कुछ डांसवांस नहीं करोगे? जल्दी करो. आज सारी रात जश्न मनेगा,’’ उस ने मुकेश के सामने खड़े हो कर अपने बाल संवारते हुए कुछ तल्खी से कहा. वह चुप बैठा रहा तो बीना ने बेताब हो कर अपने हाथों से उसे उठाते हुए कहा,  ‘‘आओ, अब डांस करो.’’ वह अचानक उठ खड़ा हुआ, जैसे उस के शरीर में कोई करंट लगा हो.

बीना बोली, ‘‘यह क्या? तुम्हें तो कुछ आता ही नहीं, वैसे के वैसे खड़े हो, खंभे की तरह…’’ परंतु मुकेश ने उस की तरफ दोबारा नहीं देखा. लपक कर वह बाहर आ गया. संजीव से भी मिलने की उस ने आवश्यकता नहीं समझी. गैलरी में आ कर उस ने इधरउधर देखा. इक्कादुक्का वेटर कमरों में आजा रहे थे. बाहर का वातावरण शांत था और हवा में हलकीहलकी सर्दी का एहसास था. वह होटल के बाहर आ गया. होटल के बाहर आ कर उसे चहलपहल का एहसास हुआ. उस ने समय देखा, 10 बजने में कुछ ही मिनट शेष थे. गोल मार्केट की दुकानें खुली होंगी, यह सोच कर वह गोल मार्केट की ओर चल दिया. साढ़े 10 बजे के लगभग जब हाथ में केक और मिठाई का डब्बा ले कर वह घर पहुंचा तो उस के मन में अपराधबोध था. आत्मग्लानि के गहरे समुद्र में वह डुबकी लगा रहा था. पत्नी ने जब दरवाजा खोला तो वह उस से नजरें चुरा रहा था. पत्नी को सामान पकड़ा कर वह अंदर आया. दोनों बच्चे उसे जगते हुए मिले. वे टीवी पर नए साल का कार्यक्रम देख रहे थे. उसे देख कर एकदम से चिल्लाए, ‘‘पापा आ गए, पापा आ गए. क्या लाए पापा हमारे लिए?’’

उस ने पत्नी की तरफ इशारा कर दिया. बच्चे मम्मी की तरफ देखने लगे तो उस ने लपक कर बारीबारी से दोनों बच्चों को चूम लिया. तब तक उस की पत्नी ने सामान ला कर मेज पर रख दिया, ‘‘वाउ, मिठाई और केक…अब मजा आएगा.’’ मुकेश के मन में एक बहुत बड़ी शंका घर कर गई थी. और वह शंका धीरेधीरे बढ़ती जा रही थी. उसे तत्काल दूर करना आवश्यक था. वह इंतजार नहीं कर सकता था. मुकेश दोनों बच्चों को नाचतागाता छोड़ कर पत्नी के पीछेपीछे किचन में आ गया. पत्नी ने उसे ऐसे आते देख कर कहा, ‘‘आप जूतेकपड़े उतार कर फ्रैश हो लीजिए. मैं पानी ले कर आती हूं.’’ ‘‘वह बाद मे कर लेंगे,’’ कह कर उस ने पत्नी को पीछे से पकड़ कर अपनी बांहों में भर लिया. पत्नी के हाथ से गिलास छूट गया. फुसफुसा कर बोली, ‘यह क्या कर रहे हैं आप?  ऐसा तो पहले कभी नहीं किया, बिना जूतेकपड़े उतारे और वह भी किचन में…’

‘‘पहले कभी नहीं किया, इसीलिए तो कर रहा हूं,’’ उस ने पूरी ताकत के साथ पत्नी के शरीर को भींच लिया. उस के शरीर में जैसे बिजली प्रवाहित होने लगी थी.

‘बच्चे देख लेंगे?’ पत्नी फिर फुसफुसाई. मुकेश के मन में हजार रंगों के फूल खिल कर मुसकराने लगे. उस के मन का भटकाव खत्म हो चुका था. अब उस के मन में कोई शंका नहीं थी, परंतु मुकेश को एक बात समझ में नहीं आ रही थी. कहते हैं कि आदमी को पराई औरत और पराया धन बहुत आकर्षित करता है. इन दोनों को प्राप्त करने के लिए वह कुछ भी कर सकता है. मुकेश को पराई नारी वह भी इतनी सुंदर, बिना किसी प्रयत्न के सहजता से उपलब्ध हुई थी, फिर वह उसे क्यों नहीं भोग पाया? यह रहस्य कोई मनोवैज्ञानिक ही सुलझा सकता था. मुकेश के लिए यह रहस्य एक बड़ा आश्चर्य था.

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Hindi Drama Story: टकराती जिंदगी- क्या कसूरवार थी शकीला

लेखक- एच. भीष्मपाल

Hindi Drama Story: जिंदगी कई बार ऐसे दौर से गुजर जाती है कि अपने को संभालना भी मुश्किल हो जाता है. रहरह कर शकीला की आंखों से आंसू बह रहे थे. वह सोच भी नहीं पा रही थी कि अब उस को क्या करना चाहिए. सोफे पर निढाल सी पड़ी थी. अपने गम को भुलाने के लिए सिगरेट के धुएं को उड़ाती हुई भविष्य की कल्पनाओं में खो जाती. आज वह जिस स्थिति में थी, इस के लिए वह 2 व्यक्तियों पर दोष डाल रही थी. एक थी उस की छोटी बहन बानो और दूसरा था उस का पति याकूब.

‘मैं क्या करती? मुझे उन्होंने पागल बना दिया था. यह वही व्यक्ति था जो शादी से पहले मुझ से कहा करता था कि अगर मैं ने उस से शादी नहीं की तो वह खुदकुशी कर लेगा. आज उस ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि मैं अपना शौहर, घर और छोटी बच्ची को छोड़ने को मजबूर हो गई हूं. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा कि मैं अब क्या करूं,’ शकीला मन ही मन बोली.

‘मैं ने याकूब को क्या नहीं दिया. वह आज भूल गया कि शादी से पहले वह तपेदिक से पीडि़त था. मैं ने उस की हर खुशी को पूरा करने की कोशिश की. मैं ने उस के लिए हर चीज निछावर कर दी. अपना धन, अपनी भावनाएं, हर चीज मैं ने उस को अर्पण कर दी. सड़कों पर घूमने वाले बेरोजगार याकूब को मैं ने सब सुख दिए. उस ने गाड़ी की इच्छा व्यक्त की और मैं ने कहीं से भी धन जुटा कर उस की इच्छा पूरी कर दी. मुझे अफसोस इस बात का है कि उस ने मेरे साथ यह क्यों किया. मुझे इस तरह जलील करने की उसे क्या जरूरत थी? अगर वह एक बार भी कह देता कि वह मेरे से ऊब गया है तो मैं खुद ही उस के रास्ते से हट जाती. जब मेरे पास अच्छी नौकरी और घर है ही तो मैं उस के बिना भी तो जिंदगी काट सकती हूं.

‘बानो मेरी छोटी बहन है. मैं ने उसे अपनी बेटी की तरह पाला है, पर उसे मैं कभी माफ नहीं कर सकती. उस ने सांप की तरह मुझे डंस लिया. पता नहीं मेरा घर उजाड़ कर उसे क्या मिला? मुझे उस के कुकर्मों का ध्यान आते ही उस पर क्रोध आता है.’ बुदबुदाते हुए शकीला सोफे से उठी और बाहर अपने बंगले के बाग में घूमने लगी.

20 साल पहले की बात है. शकीला एक सरकारी कार्यालय में अधिकारी थी. गोरा रंग, गोल चेहरा, मोटीमोटी आंखें और छरहरा बदन. खूबसूरती उस के अंगअंग से टपकती थी. कार्यालय के साथी अधिकारी उस के संपर्क को तरसते थे. गाने और शायरी का उसे बेहद शौक था. महफिलों में उस की तारीफ के पुल बांधे जाते थे.

याकूब उत्तर प्रदेश की एक छोटी सी रियासत के नवाब का बिगड़ा शहजादा था. नवाब साहब अपने समय के माने हुए विद्वान और खिलाड़ी थे. याकूब को पहले फिल्म में हीरो बनने का शौक हुआ. वह मुंबई गया पर वहां सफल न हो सका. फिर पेंटिंग का शौक हुआ परंतु इस में भी सफलता नहीं मिली. उस के पिता ने काफी समझाया पर वह कुछ समझ न सका. गुस्से में उस ने घर छोड़ दिया. दिल्ली में रेडियो स्टेशन पर छोटी सी नौकरी कर ली. कुछ दिन के बाद वह भी छोड़ दी. फिर शायरी और पत्रकारिता के चक्कर में पड़ गया. न कोई खाने का ठिकाना न कोई रहने का बंदोबस्त. यारदोस्तों के सहारे किसी तरह से अपना जीवन निर्वाह कर रहा था. शरीर, डीलडौल अवश्य आकर्षक था. खानदानी तहजीब और बोलने का लहजा हर किसी को मोह लेता था.

और फिर एक दिन इत्तेफाक से उसे शकीला से मिलने का मौका मिला. एक इंटरव्यू लेने के सिलसिले में वह शकीला के कार्यालय में गया. उस के कमरे में घुसते ही उस ने ज्यों ही शकीला को देखा, उस के तनबदन में सनसनी सी फैल गई. कुछ देर के लिए वह उसे खड़ाखड़ा देखता रहा. इस से पहले कि वह कुछ कहे, शकीला ने उस से सामने वाली कुरसी पर बैठने का अनुरोध किया. बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. शकीला भी उस की तहजीब और बोलने के अंदाज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी. इंटरव्यू का कार्य खत्म हुआ और उस से फिर मिलने की इजाजत ले कर याकूब वहां से चला गया.

याकूब के वहां से चले जाने के बाद शकीला काफी देर तक कुछ सोच में पड़ गई. यह पहला मौका था

जब किसी के व्यक्तित्व ने उसे

प्रभावित किया था. कल्पनाओं के समुद्र में वह थोड़ी देर के लिए डूब गई. और फिर उस ने अपनेआप को झटक दिया और अपने काम में लग गई. ज्यादा देर तक उस का काम में मन नहीं लगा. आधे दिन की छुट्टी ले कर वह घर चली गई.

शकीला उत्तर प्रदेश के जौनपुर कसबे के मध्य-वर्गीय मुसलिम परिवार की कन्या थी. उस की 3 बहनें और 2 भाई थे. पिता का साया उस पर से उठ गया था. 2 भाइयों और 2 बहनों का विवाह हो चुका था और वे अपने परिवार में मस्त थे. विधवा मां और 7 वर्षीय छोटी बहन बानो के जीवननिर्वाह की जिम्मेदारी उस ने अपने ऊपर ले रखी थी. उस की मां को अपने घर से विशेष लगाव था. वह किसी भी शर्त पर जौनपुर छोड़ना नहीं चाहती थी. उस की गुजर के लिए उस का पिता काफी रुपयापैसा छोड़ गया था. घरों का किराया आता था व थोड़ी सी कृषि भूमि की आय भी थी.

शकीला के सामने समस्या बानो की पढ़ाई की थी. शकीला की इच्छा थी कि वह अच्छी और उच्च शिक्षा प्राप्त करे. वह उसे पब्लिक स्कूल में डालना चाहती थी जो जौनपुर में नहीं था. आखिरकार बड़ी मुश्किल से उस ने अपनी मां को रजामंद कर लिया और वह बानो को दिल्ली ले आई. शकीला बानो से बेहद प्यार करती थी. बानो को भी अपनी बड़ी बहन से बहुत प्यार था.

याकूब और शकीला के परस्पर मिलने का सिलसिला जारी रहा. कुछ दिन कार्यालय में औपचारिक मिलन के बाद गेलार्ड में कौफी के कार्यक्रम बनने लगे. शकीला ने न चाह कर भी हां कर दी. बानो के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस करते हुए भी वह याकूब से मिलने के लिए और उस से बातचीत करने के लिए लालायित रहने लगी. उन दोनों को इस प्रकार मिलते हुए एक साल हो गया. प्यार की पवित्रता और मनों की भावनाओं पर दोनों का ही नियंत्रण था. परस्पर वे एकदूसरे के व्यवहार, आदतों और इच्छाओं को पहचानने लगे थे.

एक दिन याकूब ने उस के सामने हिचकतेहिचकते विवाह का प्रस्ताव रखा. यह सुन कर शकीला एकदम बौखला उठी. वह परस्पर मिलन से आगे नहीं बढ़ना चाहती थी. यह सुन कर वह उठी और ‘ना’ कह कर गेलार्ड से चली गई. घर जा कर वह अपने लिहाफ में काफी देर तक रोती रही. वह समझ नहीं पा रही थी कि वह जिंदगी के किस दौर से गुजर रही है. वह क्या करे, क्या न करे, कुछ सोच नहीं पा रही थी.

इस घटना का याकूब पर बहुत बुरा असर पड़ा. वह शकीला की ‘ना’ को सुन कर तिलमिला उठा. इस गम को भुलाने के लिए उस ने शराब का सहारा लिया. अब वह रोज शराब पीता और गुमसुम रहने लगा. खाने का उसे कोई होश न रहा. उस ने शकीला से मिलना बिलकुल बंद कर दिया. शकीला के इस व्यवहार ने उस के आत्मसम्मान को बहुत ठेस पहुंचाई.

उधर शकीला की हालत भी ठीक न थी. बानो के प्रति अपने कर्तव्य को ध्यान में रखते हुए वह याकूब को ‘ना’ तो कह बैठी, परंतु वह अपनी जिंदगी में कुछ कमी महसूस करने लगी. याकूब के संपर्क ने थोडे़ समय के लिए जो खुशी ला दी थी वह लगभग खत्म हो गई थी. वह खोईखोई सी रहने लगी. रात को करवटें बदलती और अंगड़ाइयां लेती परंतु नींद न आती. शकीला ने सोने के लिए नींद की गोलियों का सहारा लेना शुरू किया. चेहरे की रौनक और शरीर की स्फूर्ति पर असर पड़ने लगा. वह कुछ समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या करे. वह इसी सोच में डूबी रहती कि बानो की परवरिश कैसे हो. यदि वह शादी कर लेगी तो बानो का क्या होगा?

अत्यधिक शराब पीने से याकूब की सेहत पर असर पड़ने लगा. उस का जिगर ठीक से काम नहीं करता था. खाने की लापरवाही से उस के शरीर में और कई बीमारियां पैदा होने लगीं. याकूब इस मानसिक आघात को चुपचाप सहे जा रहा था. धीरेधीरे शकीला को याकूब की इस हालत का पता चला तो वह घबरा गई. उसे डर था कि कहीं कोई अप्रिय घटना न घट जाए. वह याकूब से मिलने के लिए तड़पने लगी. एक दिन हिम्मत कर के वह उस के घर गई. याकूब की हालत देख कर उस की आंखों से आंसू बहने लगे. याकूब ने फीकी हंसी से उस का स्वागत किया. कुछ शिकवेशिकायतों के बाद फिर से मिलनाजुलना शुरू हो गया. अब जब याकूब ने उस से प्रार्थना की तो शकीला से न रहा गया और उस ने हां कर दी.

शादी हो गई. शकीला और याकूब दोनों ही मजे से रहने लगे. हर दम, हर पल वे साथ रहते, आनंद उठाते. 3 वर्ष देखते ही देखते बीत गए. बानो भी अब जवान हो गई थी. उस ने एम.ए. कर लिया था और एक अच्छी फर्म में नौकरी करने लगी थी.

शकीला ने बानो को हमेशा अपनी बेटी ही समझा था. शादी से पहले शकीला और याकूब ने आपस में फैसला किया था कि जब तक बानो की शादी नहीं हो जाती वह उन के साथ ही रहेगी. याकूब ने उसे बेटी के समान मानने का वचन शकीला को दिया था. शकीला ने कभी अपनी संतान के बारे में सोचा भी नहीं था. वह तो बानो को ही अपनी आशा और अपने जीवन का लक्ष्य समझती थी.

याकूब कुछ दिनों के बाद उदास रहने लगा. यद्यपि बानो से वह बेहद प्यार करता था परंतु उसे अपनी संतान की लालसा होने लगी. वह शकीला से केवल एक बच्चे के लिए प्रार्थना करने लगा. न जाने क्यों शकीला मां बनने से बचना चाहती थी परंतु याकूब के इकरार ने उसे मां बनने पर मजबूर कर दिया. फिर साल भर बाद शकीला की कोख से एक सुंदर बेटी ने जन्म लिया. प्यार से उन्होंने उस का नाम जाहिरा रखा.

शकीला और याकूब अपनी जिंदगी से बेहद खुश थे. जाहिरा ने उन की खुशियों को और भी बढ़ा दिया था. जाहिरा जब 3 वर्ष की हुई तो याकूब के पिता नवाब साहब आए और उसे अपने साथ ले गए. जाहिरा को उन्होंने लखनऊ के प्रसिद्ध कानवेंट में भरती कर दिया. याकूब और शकीला दोनों ही इस व्यवस्था से प्रसन्न थे.

कार्यालय की ओर से शकीला को अमेरिका में अध्ययन के लिए भेजने का प्रस्ताव था. वह बहुत प्रसन्न हुई परंतु बारबार उसे यही चिंता सताती कि बानो के रहने की व्यवस्था क्या की जाए. उस ने याकूब केसामने इस समस्या को रखा. उस ने आश्वासन दिया कि वह बानो की चिंता न करे. वह उस का पूरा ध्यान रखेगा. इन शब्दों से आश्वस्त हो कर शकीला अमेरिका के लिए रवाना हो गई.

शकीला एक साल तक अमेरिका में रही और जब वापस दिल्ली के हवाई अड्डे पर उतरी तो याकूब और बानो ने उस का स्वागत किया. कुछ दिन बाद शकीला ने महसूस किया कि याकूब कुछ बदलाबदला सा नजर आता है. वह अब पहले की तरह खुले दिल से बात नहीं करता था. उस के व्यवहार में उसे रूखापन नजर आने लगा. उधर बानो भी अब शकीला से आंख मिलाने में कतराने लगी थी. शकीला को काफी दिन तक इस का कोई भान नहीं हुआ परंतु इन हरकतों से वह कुछ असमंजस में पड़ गई. याकूब को अब छोटीछोटी बातों पर गुस्सा आ जाता था. अब वह शकीला के साथ बाहर पार्टियों में भी न जाने का कोई न कोई बहाना ढूंढ़ लेता. वह ज्यादा से ज्यादा समय तक बानो के साथ बातें करता.

एक दिन शकीला को कार्यालय में देर तक रुकना पड़ा. जब वह रात को अपने बंगले में पहुंची तो दरवाजा खुला था. वह बिना खटखटाए ही अंदर चली आई. वहां उस ने जो कुछ देखा तो एकदम सकपका गई. बानो का सिर याकूब की गोदी में और याकूब के होंठ बानो के होंठों से सटे हुए थे. शकीला को अचानक अपने सामने देख कर वे एकदम हड़बड़ा कर उठ गए. उन्हें तब ध्यान आया कि वे अपनी प्रेम क्रीड़ाओं में इतने व्यस्त थे कि उन्हें दरवाजा बंद करना भी याद न रहा.

शकीला पर इस हादसे का बहुत बुरा असर पड़ा. वह एकदम गुमसुम और चुप रहने लगी. याकूब और बानो भी शकीला से बात नहीं करते थे. शकीला को बुखार रहने लगा. उस का स्वास्थ्य खराब होना शुरू हो गया. उधर याकूब और बानो खुल कर मिलने लगे. नौबत यहां तक पहुंची कि अब बानो ने शकीला के कमरे में सोना बंद कर दिया. वह अब याकूब के कमरे में सोने लगी. दफ्तर से याकूब और बानो अब देर से साथसाथ आते. कभीकभी इकट्ठे पार्टियों में जाते और रात को बहुत देर से लौटते. शकीला को उन्होंने बिलकुल अलगथलग कर दिया था. शकीला उन की रंगरेलियों को देखती और चुपचाप अंदर ही अंदर घुटती रहती. 1-2 बार उस ने बानो को टोका भी परंतु बानो ने उस की परवा नहीं की.

शकीला की सहनशक्ति खत्म होती जा रही थी. रहरह कर उस को अपनी मां की बातें याद आ रही थीं. उस ने कहा था, ‘बानो अब बड़ी हो गई है. वह उसे अपने पास न रखे. कहीं ऐसा न हो कि वह उस की सौत बन जाए. मर्द जात का कोई भरोसा नहीं. वह कब, कहां फिसल जाए, कोई नहीं कह सकता.’

इस बात पर शकीला ने अपनी मां को भी फटकार दिया था, पर वह स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी कि याकूब इस तरह की हरकत कर सकता है. वह तो उसे बेटी के समान समझता था. शकीला को बड़ा मानसिक कष्ट  था, पर समाज में अपनी इज्जत की खातिर वह चुप रहती और मन मसोस कर सब कुछ सहे जा रही थी.

बानो के विवाह के लिए कई रिश्तों के प्रस्ताव आए. शकीला की दिली इच्छा थी कि बानो के हाथ पीले कर दे परंतु जब भी लड़के वाले आते, याकूब कोई न कोई कमी निकाल देता और बानो उस प्रस्ताव को ठुकरा देती. आखिर शकीला ने एक दिन याकूब से साफसाफ पूछ लिया. यह उन की पहली टकराहट थी. तूतू मैंमैं हुई. याकूब को भी गुस्सा आ गया. गुस्से के आवेश में याकूब ने शकीला को बीते दिनों की याद दिलाते हुए कहा, ‘‘शकीला, मैं यह जानता था कि तुम ने पहले रिजवी से निकाह किया था. जब वह तुम्हारे नाजनखरे और खर्चे बरदाश्त नहीं कर सका तो वह बेचारा बदनामी के डर से कई साल तक इस गम को सहता रहा. तुम ने मुझे कभी यह नहीं बताया कि तुम्हारे एक लड़के को वह पालता रहा. आज वह लड़का जवान हो गया है. तुम ने उस के साथ जैसा क्रूर व्यवहार किया उस को वह बरदाश्त नहीं कर सका. कुछ अरसे बाद सदा के लिए उस ने आंखें मूंद लीं.

‘‘तुम्हें याद है जब मैं ने तुम्हें उस की मौत की खबर सुनाई थी तो तुम केवल मुसकरा दी थीं और कहा था कि यह अच्छा ही हुआ कि वह अपनी मौत खुद ही मर गया, नहीं तो शायद मुझे ही उसे मारना पड़ता.’’

शकीला की आंखों से आंसू बहने लगे. फिर वह तमतमा कर बोली, ‘‘यह झूठ है, बिलकुल झूठ है. उस ने मुझे कभी प्यार नहीं किया. वह निकाह मांबाप द्वारा किया गया एक बंधन मात्र था. वह हैवान था, इनसान नहीं, इसीलिए आज तक मैं ने किसी से इस का जिक्र तक नहीं किया. फिर इस की तुम्हें जरूरत भी क्या थी? तुम ने मुझ से, मेरे शरीर से प्यार किया था न कि मेरे अतीत से.’’

‘‘शकीला, जब से मैं ने तुम्हें देखा, तुम से प्यार किया और इसीलिए विवाह भी किया. तुम्हारे अतीत को जानते हुए भी मैं ने कभी उस की छाया अपने और तुम्हारे बीच नहीं आने दी. आज तुम मेरे ऊपर लांछन लगा रही हो पर यह कहां तक ठीक है? तुम एक दोस्त हो सकती हो परंतु बीवी बनने के बिलकुल काबिल नहीं. मैं तुम्हारे व्यवहार और तानों से तंग आ चुका हूं. तुम्हारे साथ एक पल भी गुजारना अब मेरे बस का नहीं.’’

याकूब और शकीला में यह चखचख हो ही रही थी कि बानो भी वहां आ गई. बानो को देखते ही शकीला बिफर गई और रोतेरोते बोली, ‘‘मुझे क्या मालूम था कि जिसे मैं ने बच्ची के समान पाला, आज वही मेरी सौत की जगह ले लेगी. मां ने ठीक ही कहा था कि मैं जिसे इतनी आजादी दे रही हूं वह कहीं मेरा घर ही न उजाड़ दे. आज वही सबकुछ हो रहा है. अब इस घर में मेरे लिए कोई जगह नहीं.’’

बानो से चुप नहीं रहा गया. वह भी बोल पड़ी, ‘‘आपा, मैं तुम्हारी इज्जत करती हूं. तुम ने मुझे पालापोसा है पर अब मैं अपना भलाबुरा खुद समझ सकती हूं. छोटी बहन होने के नाते मैं तुम्हारे भूत और वर्तमान से अच्छी तरह वाकिफ हूं. तुम्हारे पास समय ही कहां है कि तुम याकूब की जिंदगी को खुशियों से भर सको. तुम ने तो कभी अपनी कोख से जन्मी बच्ची की ओर भी ध्यान नहीं दिया. आराम और ऐयाशी की जिंदगी हर एक गुजारना चाहता है परंतु तुम्हारी तरह खुदगर्जी की जिंदगी नहीं. याकूब परेशान और बीमार रहते हैं. उन्हें मेरे सहारे की जरूरत है.’’

बानो के इस उत्तर को सुन कर शकीला सकपका गई. अब तक वह याकूब को ही दोषी समझती थी परंतु आज तो उस की बेटी समान छोटी बहन भी बेशर्मी से जबान चला रही थी. अगले दिन ही उस ने उन के जीवन से निकल जाने का निर्णय कर लिया.

शकीला जब अगले दिन अपने कार्यालय में पहुंची तो उस की मेज पर एक कार्ड पड़ा था. लिखा  था, ‘शकीला, हम साथ नहीं रह सकते.

Hindi Drama Story

Love Story: प्यार- संजय को क्यों हो गया था कस्तूरी से प्यार

Love Story: ‘‘अरे संजय… चल यार, आज मजा करेंगे,’’ बार से बाहर निकलते समय उमेश संजय से बोला. दिनेश भी उन के साथ था.

संजय ने कहा, ‘‘मैं ने पहले ही बहुत ज्यादा शराब पी ली है और अब मैं इस हालत में नहीं हूं कि कहीं जा सकूं.’’

उमेश और दिनेश ने संजय की बात नहीं सुनी और उसे पकड़ कर जबरदस्ती कार में बिठाया और एक होटल में जा पहुंचे.

वहां पहुंच कर उमेश और दिनेश ने एक कमरा ले लिया. उन दोनों ने पहले ही फोन पर इंतजाम कर लिया था, तो होटल का एक मुलाजिम उन के कमरे में एक लड़की को लाया.

उमेश ने उस मुलाजिम को पैसे दिए. वह लड़की को वहीं छोड़ कर चला गया.

वह एक साधारण लड़की थी. लगता था कि वह पहली बार इस तरह का काम कर रही थी, क्योंकि उस के चेहरे पर घबराहट के भाव थे. उस के कपड़े भी साधारण थे और कई जगह से फटे हुए थे.

संजय उस लड़की के चेहरे को एकटक देख रहा था. उसे उस में मासूमियत और घबराहट के मिलेजुले भाव नजर आ रहे थे, जबकि उमेश और दिनेश उस को केवल हवस की नजर से देखे जा रहे थे.

तभी उमेश लड़खड़ाता हुआ उठा और उस ने दिनेश व संजय को बाहर जाने के लिए कहा. वे दोनों बाहर आ गए.

अब कमरे में केवल वह लड़की और उमेश थे. उमेश ने अंदर से कमरा बंद कर लिया. संजय को यह सब बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन उमेश और दिनेश ने इतनी ज्यादा शराब पी ली थी कि उन्हें होश ही न था कि वे क्या कर रहे हैं.

काफी देर हो गई, तो संजय ने दिनेश को कमरे में जा कर देखने को कहा.

दिनेश शराब के नशे में चूर था. लड़खड़ाता हुआ कमरे के दरवाजे पर पहुंच कर उसे खटखटाने लगा. काफी देर बाद लड़की ने दरवाजा खोला.

उस लड़की ने दिनेश से कहा कि उस का दोस्त सो गया है, उसे उठा लो. नशे की हालत में चूर दिनेश उस लड़की की बात सुनने के बजाय पकड़ कर उसे अंदर ले गया और दरवाजा बंद कर लिया.

संजय दूर बरामदे में बैठा यह सब देख रहा था. दिनेश को भी कमरे में गए काफी देर हो गई, तो संजय ने दरवाजा खड़काया.

इस बार भी उसी लड़की ने दरवाजा खोला. वह अब परेशान दिख रही थी. उस ने संजय की तरफ देखा और कहा, ‘‘ बाबू, ये लोग कुछ कर भी नहीं कर रहे और मेरा पैसा भी नहीं दे रहे हैं.

मुझे पैसे की जरूरत है और जल्दी घर भी जाना है,’’ कहते हुए उस लड़की का गला बैठ सा गया.

संजय ने लड़की को अंदर चलने को कहा और थोड़ी देर में उसे उसी होटल के दूसरे कमरे में ले गया. उस ने जाते हुए देखा कि उमेश और दिनेश शराब में चूर बिस्तर पर पड़े थे.

संजय ने दूसरे कमरे में उस लड़की को बैठने को कहा. लड़की घबराते हुए बैठ गई. वह थोड़ा जल्दी में लग रही थी. संजय ने उसे पास रखा पानी पीने को दिया, जिसे वह एक सांस में ही पी गई.

पानी पीने के बाद वह लड़की खड़ी हुई और संजय से बोली, ‘‘बाबू, अब जो करना है जल्दी करो, मुझे पैसे ले कर जल्दी घर पहुंचना है.’’

संजय को उस की मासूम बातों पर हंसी आ रही थी. उस ने उसे पैसे दे दिए तो उस ने पैसे रख लिए और संजय को पकड़ कर बिस्तर पर ले गई और अपने कपड़े उतारने लगी.

संजय ने उस का हाथ पकड़ा और कपड़े खोलने को मना किया. लड़की बोली, ‘‘नहीं बाबू, कस्तूरी ऐसी लड़की नहीं है, जो बिना काम के किसी से भी पैसे ले ले. मैं गरीब जरूर हूं, लेकिन भीख नहीं लूंगी.’’

संजय अब बोल नहीं पा रहा था. तभी कस्तूरी ने संजय का हाथ पकड़ा और उसे बिस्तर पर ले गई, यह सब इतना जल्दी में हुआ कि संजय कुछ कर नहीं पाया.

कस्तूरी ने जल्दी से अपने कपड़े उतारे और संजय के भी कपड़े उतारने लगी. अब कस्तूरी संजय के इतने नजदीक थी कि उस के मासूम चेहरे को वह बड़े प्यार से देख रहा था. वह कस्तूरी की किसी बात का विरोध नहीं कर पा रहा था. उस के मासूम हावभाव व चेहरे से संजय की नजर हटती, तब तक कस्तूरी वह सब कर चुकी थी, जो पतिपत्नी करते हैं.

कस्तूरी ने जल्दी से कपड़े पहने और होटल के कमरे से बाहर निकल गई. संजय अभी भी कस्तूरी के खयालों में खोया हुआ था.

समय बीतता गया, लेकिन संजय के दिमाग से कस्तूरी निकल नहीं पा रही थी.

एक दिन संजय बाजार में सामान खरीद रहा था. उस ने देखा कि कस्तूरी भी उस के पास की ही एक दुकान से सामान खरीद रही थी.

संजय उस को देख कर खुश हुआ. उस ने कस्तूरी को आवाज दी तो कस्तूरी ने मुड़ कर देखा और फिर दुकानदार से सामान लेने में जुट गई.

संजय उस के पास पहुंचा. कस्तूरी ने संजय की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया. कस्तूरी ने सामान खरीदा और दुकान से बाहर निकल गई.

संजय उसे पीछे से आवाज देता रहा, लेकिन उस ने अनसुना कर दिया.

कुछ दिन बाद संजय को कस्तूरी फिर दिखाई दी. उस दिन संजय ने कस्तूरी का हाथ पकड़ा और उसे भीड़ से दूर खींच कर ले गया और उस से उस की पिछली बार की हरकत के बारे में पूछना चाहा, तो संजय के पैरों की जमीन खिसक गई. उस ने देखा, कस्तूरी का चेहरा पीला पड़ चुका था और वह बहुत कमजोर हो गई थी. उस ने अपनी फटी चुनरी से अपना पेट छिपा रखा था, जो कुछ बाहर दिख रहा था.

कस्तूरी वहां से जाने के लिए संजय से जोरआजमाइश कर रही थी. संजय ने किसी तरह उसे शांत किया और भीड़ से दूर एक चाय की दुकान पर बिठाया.

संजय ने गौर से कस्तूरी के चेहरे की तरफ देखा, तो उस का दिल बैठ गया. कस्तूरी सचमुच बहुत कमजोर थी. संजय ने कस्तूरी से उस की इस हालत के बारे में पूछा, तो पहले तो कुछ नहीं बोली, लेकिन संजय ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा तो वह रोने लगी.

संजय कुछ समझ नहीं पा रहा था. कस्तूरी ने अपने आंसू पोंछे और बोली, ‘‘बाबू, मेरी यह हालत उसी दिन से है, जिस दिन आप और आप के दोस्त मुझे होटल में मिले थे.’’

संजय ने उस की तरफ सवालिया नजरों से देखा, तो वह फिर बोली, ‘‘बाबू, मैं कोई धंधेवाली नहीं हूं. मैं उस गंदे नाले के पास वाली कच्ची झोंपड़पट्टी में रहती हूं. उस दिन पुलिस मेरे भाई को पकड़ कर ले गई थी, क्योंकि वह गली में चरसगांजा बेच रहा था. उसे जमानत पर छुड़ाना था और मेरे मांबाप के पास पैसा नहीं था. अब मुझे ही कुछ करना था.

‘‘मैं ने अपने पड़ोस में सब से पैसा मांगा, लेकिन किसी ने नहीं दिया. थकहार कर मैं बैठ गई तो मेरी एक मौसी बोली कि इस बेरहम जमाने में कोई मुफ्त में पैसा नहीं देता.

‘‘मौसी की यह बात मेरी समझ में आई और मैं आप और आप के दोस्तों तक पहुंच गई.’’

कस्तूरी चुप हुई, तो संजय ने अपने चेहरे के दर्द को छिपाते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?’’

कस्तूरी ने कहा, ‘‘बाबू, यह जान कर आप क्या करोगे? यह तो मेरी किस्मत है.’’

संजय ने फिर जोर दिया, तो कस्तूरी बोली, ‘‘बाबू, उस दिन आप के दिए गए पैसे से मैं अपने भाई को हवालात से छुड़ा लाई, तो भाई ने पूछा कि पैसे कहां से आए. मैं ने झूठ बोल दिया कि किसी से उधार लिए हैं.’’

थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह फिर बोली, ‘‘बाबू, सब ने पैसा देखा, लेकिन मैं ने जो जिस्म बेच कर एक जान को अपने शरीर में आने दिया, तो उसे सब नाजायज कहने लगे और जिस भाई को मैं ने बचाया था, वह मुझे धंधेवाली कहने लगा और मुझे मारने लगा. वह मुझे रोज ही मारता है.’’

यह सुन कर संजय के कलेजे का खून सूख गया. इस सब के लिए वह खुद को भी कुसूरवार मानने लगा. उस की आंखों में भी आंसू छलक आए थे.

कस्तूरी ने यह देखा तो वह बोली, ‘‘बाबू, इस में आप का कोई कुसूर नहीं है. अगर मैं उस रात आप को जिस्म नहीं बेचती तो किसी और को बेचती. लेकिन बाबू, उस दिन के बाद से मैं ने अपना जिस्म किसी को नहीं बेचा,’’ यह कहते हुए वह चुप हुई और कुछ सोच कर बोली, ‘‘बाबू, उस रात आप के अच्छे बरताव को देख कर मैं ने फैसला किया था कि मैं आप की इस प्यार की निशानी को दुनिया में लाऊंगी और उसी के सहारे जिंदगी गुजार दूंगी, क्योंकि हम जैसी गरीब लड़कियों को कहां कोई प्यार करने वाला जीवनसाथी मिलता है.’’

इतना कह कर कस्तूरी का गला भर आया. वह आगे बोली, ‘‘बाबू, यह आप की निशानी है और मैं इसे दुनिया में लाऊंगी, चाहे इस के लिए मुझे मरना ही क्यों न पड़े,’’ इतना कह कर वह तेजी से उठी और अपने घर की तरफ चल दी.

यह सुन कर संजय जैसे जम गया था. वह कह कर भी कुछ नहीं कह पाया. उस ने फैसला किया कि कल वह कस्तूरी के घर जा कर उस से शादी की बात करेगा.

वह रात संजय को लंबी लग रही थी. सुबह संजय जल्दी उठा और बदहवास सा कस्तूरी के घर की तरफ चल दिया. वह उस के महल्ले के पास पहुंचा तो एक जगह बहुत भीड़ जमा थी. वह किसी अनहोनी के डर को दिल में लिए भीड़ को चीर कर पहुंचा, तो उस ने जो देखा तो जैसे उस का दिल बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो.

कस्तूरी जमीन पर पड़ी थी. उस की आंखें खुली थीं और चेहरे पर वही मासूम मुसकराहट थी.

संजय ने जल्दी से पूछा कि क्या हुआ है तो किसी ने बताया कि कस्तूरी के भाई ने उसे चाकू से मार दिया है, क्योंकि सब कस्तूरी के पेट में पल रहे बच्चे की वजह से उसे बेइज्जत करते थे.

संजय पीछे हटने लगा, अब उसे लगने लगा था कि वह गिर जाएगा. तभी पुलिस का सायरन बजने लगा तो भीड़ छंटने लगी.

संजय पीछे हटते हुए कस्तूरी को देख रहा था. उस का एक हाथ अपने पेट पर था और शायद वह अपने प्यार को मरते हुए भी बचाना चाहती थी. उस के चेहरे पर मुसकराहट ऐसी थी, जैसे उन खुली आंखों से संजय को कहना चाहती हो, ‘बाबू, यह तुम्हारे प्यार की निशानी है, पर इस में तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है.’

संजय पीछे मुड़ा और अपने घर पहुंच कर रोने लगा. वह अपनेआप को माफ नहीं कर पा रहा था, क्योंकि अगर वह कल ही उस से शादी की बात कर लेता तो शायद कस्तूरी जिंदा होती.

बारिश होने लगी थी. बादल जोर से गरज रहे थे. वे भी कस्तूरी के प्यार के लिए रो रहे थे.

Love Story

मेकअप के मामले में ब्राइड्स अक्सर क्या गलतियां करती हैं और उनसे कैसे बचें

Bridal makeup: शादी का दिन हर लड़की के लिए जिंदगी का सबसे खास दिन होता है. हर ब्राइड चाहती है कि उस दिन वह सबसे सुंदर दिखे लेकिन इसी चाह में कई बार कुछ छोटीछोटी गलतियां पूरे ब्राइडल लुक का चार्म बिगाड़ देती हैं. कभी बेस बहुत हैवी हो जाता है तो कभी लिपस्टिक शेड सूट नहीं करता. कई बार कैमरे की लाइट में मेकअप एकदम अलग दिखता है और चेहरा नेचुरल ग्लो की बजाय नकली चमक से भर जाता है.

आज हम ऐसे मेकअप मिस्टेक्स के बारे में बात करेंगे जो ब्राइड्स को शादी वाले दिन परेशान करती हैं और इनसे कैसे बचा जा सकता है ताकि आप अपने खास दिन को और भी स्पेशल बना सकें.

ऐसा मेकअप लुक चुनना जो आपके फेसकट से मैच न करता हो-

ब्राइड्स अक्सर सोशल मीडिया पर देखे गए ट्रेंड के आधार पर मेकअप चुनती हैं, बिना यह सोचे कि उनके चेहरे के आकार पर क्या जंचेगा. हो सकता है कि किसी सेलिब्रिटी या फोटो में देखी गई ब्राइड पर जो अच्छा लगे, वह आपके चेहरे के आकार के लिए बिल्कुल भी सही न हो.

इससे कैसे बचें:

किसी ऐसे प्रोफेशनल मेकअप आर्टिस्ट के साथ काम करें जो आपके चेहरे के आकार को समझता हो. आपका मेकअप आपके फेसकट के हिसाब से होना चाहिए जैसे कि सौफ्ट लुक के लिए वार्म कलर्स का इस्तेमाल करना या आपके चिक बोल्स को हाई करने के लिए बोल्ड टोन का इस्तेमाल करना.

ट्रायल रन न लेना

कई ब्राइड्स मेकअप ट्रायल न कराने की गलती करती हैं, जिससे शादी के दिन आखिरी समय में तनाव या निराशा हो सकती है. ट्रायल रन आपको अपने लुक के साथ प्रयोग करने और अपनी पसंद की चीजें बताने का मौका देता है.

इससे कैसे बचें:

हमेशा अपनी शादी से कम से कम 2 महीने पहले ट्रायल शेड्यूल जरूर करें. इससे आपको जरूरत पड़ने पर अपने लुक में बदलाव करने का पर्याप्त समय मिल जाएगा. अपनी पसंदीदा स्टाइल की तस्वीरें जरूर लाएं, लेकिन अपने मेकअप आर्टिस्ट के सुझावों के लिए भी तैयार रहें.

मौसम पर ध्यान न देना

ब्राइड्स अक्सर अपने मेकअप की प्लानिंग करते समय मौसम का ध्यान रखना भूल जाती हैं. गर्मी, नमी या हवा के कारण मेकअप पिघल सकता है, जिससे आपका लुक फीका पड़ सकता है.

इससे कैसे बचें:

अपनी शादी के मौसम के बारे में हमेशा सोचें. अगर आपकी शादी गर्मियों में या किसी नम जगह पर हो रही है, तो ज्यादा टिकाऊ मेकअप चुनें जैसे मैट फाउंडेशन और वाटरप्रूफ मस्कारा आदि. सभी शादियों में, सब कुछ अपनी जगह पर बनाए रखने के लिए सेटिंग स्प्रे का इस्तेमाल करें.

मेकअप पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देना

कभीकभी सबसे अलग दिखने या अट्रैक्टिक दिखने की चाहत में ब्राइड्स जरूरत से ज्यादा मेकअप अपना लेती हैं. जरूरत से ज़्यादा मेकअप फोटोज में ओवर लग सकता है और किसी प्लास्टिक पुट्टी की तरह लगता है. आप खुद से अलग महसूस कर सकती हैं.

इससे कैसे बचें:

अपने सामान्य लुक का एक पॉलिश्ड, एलिगेंट वर्जन अपनाने का लक्ष्य रखें. बहुत ज्यादा लेयर्स का इस्तेमाल न करें.

टचअप प्रोड्क्ट्स लाना भूल जाना

कुछ ब्राइड्स मानती हैं कि उनके मेकअप बिना किसी रखरखाव के बेदाग रहेंगे. हालांकि, हकीकत यह है कि दिन भर में छोटे मोटे टचअप अक्सर जरूरी होते हैं.

इससे कैसे बचें:

शादी के दिन के लिए एक छोटी सी ब्राइडल ब्यूटी किट तैयार करें जिसमें लिपस्टिक, पाउडर, हेयरपिन और मिनी हेयरस्प्रे जैसी जरूरी चीजें हों. अपने मेकअप आर्टिस्ट या स्टाइलिस्ट से जरूर पूछ लें कि आपको दिन भर में किनकिन टचअप उत्पादों की जरूरत पड़ेगी.

स्किनकेयर न करना

कई ब्राइड्स अपनी शादी के दिन से पहले सही से स्किनकेयर नहीं करती. यह सोचकर कि सिर्फ मेकअप ही उन्हें मनचाहा बेदाग लुक दे सकता है. लेकिन आपकी त्वचा की स्थिति इस बात में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है कि मेकअप कैसा लगेगा.

इससे कैसे बचें:

अपना स्किनकेयर रूटीन शादी से महीनों पहले शुरू कर दें. त्वचा को हाइड्रेट करने, एक्सफोलिएट करने और लाइफस्टाइल पर ध्यान दें. अपनी त्वचा को बेहतरीन बनाए रखने के लिए, अपने खास दिन से एक या दो हफ्ते पहले फेशियल करवाना न भूलें.

फोटोग्राफी लाइटिंग पर ध्यान न देना

जो चीज असल में अच्छी लगती है, जरूरी नहीं कि वो तस्वीरों में भी अच्छी लगे, खासकर कुछ खास मेकअप तकनीकों के साथ. एक आम गलती यह है कि हम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि अलग-अलग लाइट जैसे नेचिरल लाइट या आर्टिफिशियल लाइट.

इससे कैसे बचें:

अपनी शादी के लिए लाइटिंग को समझने के लिए अपने फ़ोटोग्राफर के साथ मिलकर काम करें. तस्वीरों में फ्लैशबैक से बचने के लिए मैट या साटन फाउंडेशन का इस्तेमाल करें, और ऐसे मेकअप शेड्स चुनें जो लेचिरल लाइट में तो उभरकर दिखें, लेकिन फ्लैश या आर्टिफिशियल लाइट में ज्यादा तीखे न दिखें.

इन आम गलतियों से बचकर और पहले से प्लानिंग करके आप यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि आपका लुक सबसे अट्रैक्टिव दिखे.

Bridal makeup

Puffy Eyes का पक्का इलाज, जानें असरदार उपाय

Puffy Eyes: 22 वर्षीय निकिता की आंखें पिछले कुछ दिनों से सूजी हुई दिखती थीं. निकिता ने कई बार मेकअप का सहारा लिया, लेकिन शाम होतेहोते आंखें फिर सूज जाती थीं. उस ने लोगों की सलाह के अनुसार घरेलू उपचार किया, लेकिन ठीक नहीं हुआ. इस के बाद उस ने नौन सर्जिकल थेरैपी का सहारा लिया और अब उसे पूरी तरह से पफी आइज से छुटकारा मिल चुका है.

असल में सूजी हुई आंखें (पेरिऔर्बिटल एडिमा) तब होता है जब आंखों के आसपास तरल पदार्थ जमा हो जाता है, जो बाद में कई बार आंखों के नीचे काले घेरे, खुजली या लालिमा भी दिखाई पड़ सकती है. इस के कई कारण हो सकते हैं :

-अधिक रोने, ऐलर्जी, ज्यादा सोडियम खाने या पर्याप्त नींद न लेने या अन्य कारणों से आंखें सूज सकती हैं.

-सूजन किसी अंतर्निहित स्थिति, जैसेकि गुलाबी आंखें या किडनी की बीमारी के कारण भी हो सकती हैं.

-कई बार ध्रूमपान से ऐलर्जी होने पर भी आंखों में सूजन आ सकती है.

-सूजन आमतौर पर समय के साथ ठीक हो जाती है, लेकिन कई उपचार और जीवनशैली में बदलाव कर के आप इस से जल्दी छुटकारा पा सकते हैं.

प्राथमिक लक्षण

सूजी हुई आंखों का मुख्य लक्षण आप की आंखों के आसपास या नीचे के ऊतकों में अस्थायी सूजन है. अमेरिकन एकेडमी औफ औप्थल्मोलौजी (एएओ) के अनुसार, आंखों के नीचे सूजन आमतौर पर उम्र बढ़ने के कारण त्वचा का ढीला पड़ना है. यह तब होता है, जब आंखों के नीचे की चरबी उम्र के साथ खिसक जाती है, जिस से त्वचा फूली हुई दिखती है.

यह एक अलग प्रकार का सूजन है, जो तरल पदार्थ के जमा होने के कारण होता है. आंखों के नीचे के इस सूजन को ढीली त्वचा, चरबी की थैली, पिगमेंटेशन (त्वचा के रंग में बदलाव) और प्राकृतिक छाया के मिश्रण के रूप में पहचाना जा सकता है. आजकल यह कम उम्र के यूथ में भी देखा जा रहा है, जिस का इलाज जरूरी है.

वजह जानें

आंसू, जमाव या सूजन के कारण

आंखों के आसपास की त्वचा में तरल पदार्थ जमा हो जाता है, क्योंकि आंखों के आसपास की त्वचा का ऊतक आप के शरीर में सब से पतला होता है, इसलिए वहां होने वाली कोई भी सूजन विशेष रूप से ध्यान देने योग्य होती है. हालांकि सूजी हुई आंखें कभी भी चिंता का कारण नहीं होती, लेकिन यह अधिक गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकती है.

कब करें चिंता

सूजी हुई आंखों को ले कर चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन अगर आप की आंखें कई दिनों तक सूजी हुई रहती हैं, तो डाक्टर की सलाह अवश्य लें ताकि समय रहते इस का इलाज हो सके. यदि आप के गुरदे मूत्र में अतिरिक्त प्रोटीन उत्सर्जित करते हैं, तो आप की आंखें सूजी हुई हो सकती हैं, जो कि गुरदे की क्षति का प्रारंभिक संकेत होता है.

और्बिटल सैल्युलाइटिस के संक्रमण की स्थिति में भी आंखों के पास की वसा और मांसपेशियों को प्रभावित कर सकता है.

यदि इस का उपचार न किया जाए तो इस से दृष्टि हानि या सैप्सिस (रक्त विषाक्तता) जैसी जटिलताएं हो सकती हैं.

सूजी हुई आंखों से छुटकारा पाने के तरीके

सूजी हुई आंखों का इलाज सूजन के कारण पर निर्भर करता है, जिसे डाक्टर पूरी जांच के बाद पता कर पाते हैं.

जीवनशैली में परिवर्तन

आप सूजी हुई आंखों की समस्या को कम करने के लिए जीवनशैली में कई बदलाव कर सकते हैं, जो निम्न हैं :

-ऐलर्जी पैदा करने वाले तत्त्वों के संपर्क में आने से बचें.

-अपने आहार में पोटेशियमयुक्त खाद्यपदार्थ शामिल करें.

-अपनी पलकें बहुत अधिक न रगड़ें.

– दिनभर खूब पानी पीएं.

-पर्याप्त नींद लें और सिर ऊंचा कर के सोएं.

-धूम्रपान से बचें.

-शराब के सेवन को सीमित करें.

-सोडियम सेवन को सीमित करें.

-सोने से पहले तरल पदार्थ का सेवन कम करें. लेकिन इस के बावजूद भी आंखों की पफीनेस कम नहीं हुई, तो लोकल या क्लीनिकल सर्जरी की आवश्यकता होती है.

इस बारे में डर्मेटोलौजिस्ट डा. सोमा सरकार कहती हैं कि आजकल के यूथ की लाइफस्टाइल बहुत खराब है. वे नींद पूरी नहीं करते और अधिक समय तक कंप्यूटर के पास बैठे रहते हैं, जिस से उन की आंखें पफी हो जाती हैं, जिस से उन्हें कई बार नौन सर्जिकल प्रोसेस या सर्जिकल प्रोसेस का सहारा लेना पड़ता है.

नौन सर्जिकल प्रोसेस

माइक्रो लिफ्ट थेरैपी : सूजी हुई आंखों के इलाज में प्रभावी होती है, क्योंकि यह सूक्ष्म विद्युत धाराओं का उपयोग कर के मांसपेशियों को टोन किया जाता है, जो लिंफेटिक ड्रैनेज को ऐक्टिव करती है और सूजन को कम करती है. यह एक गैर सर्जिकल तरीका है जो त्वचा को कसता और उठाता है.

अल्थेरैपी : आंखों के नीचे सूजन और पफीनेस को कम करने के लिए अल्थेरैपी और अन्य उपचार कई प्रमुख क्लीनिकों में उपलब्ध हैं. यह एक गैर सर्जिकल तरीका है जो त्वचा को कसने और कोलेजन उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्रित अल्ट्रासाउंड ऊर्जा का उपयोग करता है.

माइक्रोनिडलिंग

माइक्रोनिडलिंग पफी आइज के इलाज में प्रभावी प्रक्रिया है, क्योंकि यह कोलेजन उत्पादन को ऐक्टिव करती है, जिस से त्वचा की बनावट और इलैस्टिसिटी में सुधार होता है. यह सूजन को कम करने और रक्तसंचार को बेहतर बनाने में भी मदद करती है.

ये सभी नौन सर्जिकल प्रोसेस टेंपररी होते हैं, अधिक दिनों तक इस का असर नहीं रहता है, लेकिन कुछ हद तक पफीनेस कम हो सकता है, लेकिन अगर किसी को बहुत अधिक आंखों में पफीनेस होता है, तो उसे सर्जिकल प्रोसेस में जाना पड़ता है.

सर्जिकल इंटरवेनशन

ब्लेफेरोप्लास्टी (पलकों की एक सर्जरी) सूजी हुई आंखों को कम कर सकती है. एक नेत्र सर्जन आप की निचली पलक के अंदर या आप की पलकों के नीचे एक छोटा सा चीरा लगाकर अतिरिक्त त्वचा या फैट को हटा सकते हैं या उस की जगह बदल सकते हैं ताकि तरल पदार्थ जमा होने वाली जगहों को कम किया जा सके. फिर सर्जन चीरों को बंद करने के लिए छोटे टांकें लगाते हैं. इस में डाक्टर तय करते हैं कि ब्लेफेरोप्लास्टी आप के लिए सही है या नहीं.

इस के अलावा आप त्वचा संबंधी कुछ इलाज भी कर सकते हैं, मसलन सूजी हुई आंखों को कम करने के लिए कैमिकल पील्स, फिलर्स या लेजर रीसर्फेसिंग पर विचार कर सकते हैं. ये उपचार त्वचा को कसते हैं, जिस से उन जगहों के पफीनेस से छुटकारा पाने में मदद मिलती है, जहां तरल पदार्थ जमा हो सकता है.

इस प्रकार पफी आइज को हटाना मुश्किल नहीं, लेकिन जब भी इसे करवाना चाहें, तो किसी प्रशिक्षित डाक्टर की सलाह लें, ताकि आप का चेहरा आप के मनमुताबिक खूबसूरत दिखें.

Puffy Eyes

No Wash Days Trend: सर्दियों में बारबार बाल धोने की जरूरत क्यों नहीं है

No Wash Days Trend: सर्दियों का मौसम आते ही ठंडी हवाएं बालों की नमी छीन लेती हैं. ऐसे में रोजाना बाल धोना बालों को और ज्यादा रूखा, बेजान और फ्रिजी बना सकता है. यही वजह है कि आजकल ‘नो वाश डेज ट्रेंड’ बहुत पौपुलर हो रहा है. यानि बालों को रोज न धोना, बल्कि उन्हें स्मार्ट तरीकों से फ्रैश और साफ बनाए रखना.

नो वाश डेज ट्रेंड क्या है

नो वाश डेज ट्रेंड का मतलब है कि आप अपने बालों को हर रोज शैंपू न करें. इस के बजाय, बालों को 2-3 दिनों तक बिना धोए ही साफ और फ्रैश लुक में बनाए रखें. यह ट्रेंड न सिर्फ बालों को नैचुरल औयल्स से पोषण देता है बल्कि ठंड में स्कैल्प को ड्राई होने से भी बचाता है. कम वाश, ज्यादा केयर, यही है इस ट्रेंड का मंत्र.

क्यों है यह ट्रेंड फायदेमंद

स्कैल्प हैल्थ में सुधार : रोज शैंपू करने से स्कैल्प के नैचुरल औयल निकल जाते हैं.

बालों में नमी बनी रहती है : सर्दियों में बाल जल्दी ड्राई हो जाते हैं, नो वाश डेज उन्हें सौफ्ट बनाए रखते हैं.

हेयर कलर टिकता है : बारबार बाल धोने से कलर्ड बालों का शेड जल्दी फीका पड़ता है.

समय की बचत : ठंड में बाल धोना और सुखाना दोनों मुश्किल होता है, यह ट्रेंड आप का समय बचाता है.

नो वाश डेज में बालों को कैसे रखें फ्रैश

ड्राई शैपू का इस्तेमाल करें : यह स्कैल्प से औयल सोख कर बालों को तुरंत फ्रैश दिखाता है.

स्कैल्प टौनिक लगाएं : यह स्कैल्प को क्लीन और हैल्दी रखता है.

हेयर परफ्यूम या मिस्ट : हलकी खुशबू से बालों में ताजगी बनी रहती है.

सिल्क स्कार्फ या टोपी पहनें : यह बालों को डस्ट से बचाती है और स्टाइलिश भी लगती है.

ब्रशिंग करें : हर दिन बालों को हलके हाथों से ब्रश करें ताकि नैचुरल औयल पूरे बालों में फैल सके.

किन लोगों के लिए यह ट्रेंड बेहतर है

-जिन के बाल ड्राई या वेवी हैं.

-जिन के बालों में कलर या कैमिकल ट्रीटमैंट हुआ है.

-जो सर्दियों में बालों को बारबार धोना पसंद नहीं करते हैं.

ब्यूटी ऐक्सपर्ट की सलाह

नो वाश डेज ट्रेंड सिर्फ एक फैशन नहीं, बल्कि बालों को हैल्दी रखने की समझदारी है.

सही प्रोडक्ट्स और थोड़ी सी देखभाल से आप हर दिन ‘गुड हेयर डे’ पा सकते हैं.

नो वाश डेज ट्रेंड सर्दियों में बालों की हैल्थ और ब्यूटी दोनों को बनाए रखने का स्मार्ट तरीका है. सही प्रोडक्ट्स और थोड़ी देखभाल से आप बिना रोज शैंपू किए भी बालों को चमकदार, फ्रैश और खूबसूरत रख सकते हैं.

No Wash Days Trend

Ectopic Pregnancy: गलत प्रैगनैंसी कहांकहां हो सकती है, जानें ऐक्सपर्ट की राय

Ectopic Pregnancy: नेहा को सेकंड प्रैगनैंसी के समय हमेशा कमजोरी, उलटी, खाने की इच्छा न होना आदि लगातार हो रहा था. पहले तो उसे लगा कि यह सब प्रैगनैंसी की वजह से है, लेकिन जब यह सब लगातार होने लगा, तो उस ने गाइनोकोलौजिस्ट से संपर्क किया, क्योंकि पहली प्रैगनैंसी में उसे कम समय तक ही असहजता महसूस हुआ था, इस बार कुछ अधिक समय तक परेशानी होने की वजह से उस ने डाक्टर की सलाह से सोनोग्राफी करवाई.

पता चला कि उस की प्रैगनैंसी सही जगह पर नहीं है और 2 जुड़वां बच्चे एक ही यूट्रस में है. ऐसे में बच्चे का सही विकास संभव नहीं और नेहा की सेहत के लिए भी यह प्राण घातक था. इसलिए उसे अबौर्शन का रास्ता अपनाना पड़ा. सही समय पर सही निर्णय से नेहा को गलत प्रैगनैंसी से छुटकारा मिला.

न बनें अंधविश्वासी

यह सही है कि अधिकतर स्त्री गलत प्रैगनैंसी को समझ नहीं पाती और किसी प्रकार की शारीरिक असहजता को सहती जाती है. इस बारे में मुंबई खार की पी. डी. हिंदुजा अस्पताल एवं चिकित्सा अनुसंधान केंद्र की स्त्रीरोग एवं प्रसूति विशेषज्ञ, डा. रंजना धानु कहती हैं कि यहां नेहा को अपनी प्रैगनैंसी को ले कर इसलिए शक हुआ, क्योंकि उस की पहली प्रैगनैंसी के समय ऐसा कुछ नहीं हुआ था और समय रहते उस ने इलाज करवा लिया, जबकि अधिकतर लड़कियां पहली गर्भधारण से खुश हो जाती हैं और कुछ तो अंधविश्वासी परिवार की प्रैशर में आ कर छिपाती हैं और 3 महीने तक डाक्टर के पास तक नहीं जातीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि किसी की बुरी नजर उन की प्रैगनैंसी पर पड़ जाएगी और गर्भ ठहरेगा नहीं, जबकि ऐसा कुछ नहीं होता.

गलत गर्भधारण को अधिक देर से अबौर्शन करवाने पर मां की जान को भी खतरा हो सकता है.

असल में गर्भधारण सामान्यरूप से यूट्रस में होता है, जहां अंडाणु और शुक्राणु के मिलने के बाद गर्भवती महिला के शरीर में बच्चे का विकास होता है, लेकिन कभीकभी गर्भ का विकास गर्भाशय के बाहर भी हो सकता है, जो एक रिस्क और खतरनाक स्थिति बन जाती है. इस समय जल्द से जल्द डाक्टर की सलाह बहुत आवश्यक है, ताकि इलाज के बाद फिर से एक अच्छी प्रैगनैंसी हो सके.

आइए, जानते हैं गलत प्रैगनैंसी कहांकहां हो सकती है और कब डाक्टर की तुरंत सलाह जरूरी है:

-फैलोपियन ट्यूब में गर्भवती होना एक खतरनाक स्थिति होती है, जिसे ऐक्टोपिक गर्भावस्था कहा जाता है. जब निषेचित अंडाणु गर्भाशय के बजाय फैलोपियन ट्यूब में इंप्लांट हो जाता है, तो यह गर्भावस्था खतरनाक हो सकती है क्योंकि फैलोपियन ट्यूब गर्भाशय जितनी जगह नहीं दे पाता है और वह फट सकता है. इस स्थिति में महिला को अंदरूनी रक्तस्राव हो सकता है, जो जानलेवा हो सकता है. समय रहते इलाज न किए जाने पर स्त्री की जान भी जा सकती है.

-गर्भाशय के बाहर होने वाली प्रैगनैंसी भी दुर्लभ होती है, लेकिन कभीकभी  गर्भाशय के बाहर अंडाशय, पेट या सर्विक्स में भी गर्भ ठहर सकता है. ऐसे केसेज में गर्भ का सही तरीके से विकास नहीं हो पाता और इस के परिणामस्वरूप गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, मसलन गर्भवस्था से पेट में अत्यधिक रक्तस्राव होना, जो जीवन के लिए खतरे का कारण बन सकता है.

-प्लैसेंटा प्रिविया एक स्थिति है, जिस में प्लैसेंटा गर्भाशय के निचले हिस्से में स्थित होता है, जो जन्म के समय समस्या उत्पन्न कर सकता है. यह आमतौर पर गर्भावस्था के दूसरे और तीसरे त्रैमासिक के दौरान पता चलता है, जब गर्भाशय में रक्तस्राव होने लगता है. यह स्थिति खतरनाक हो सकती है और इस की पहचान के लिए अल्ट्रासाउंड परीक्षण की आवश्यकता होती है.

जल्दी अबौर्शन करवाने वाली प्रैगनैंसी

इस के आगे डाक्टर कहती हैं कि ये सभी प्रैगनैंसी की जांच शुरू में एक बार करवा लेनी चाहिए, ताकि किसी भी समस्या का समाधान जल्दी मिले. मां और बच्चे दोनों की जान को बचाया जा सके. इन गर्भावस्थाओं में समस्या इतनी गंभीर हो सकती है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है. जल्दी अबौर्शन करने वाले प्रैगनैंसी निम्न हैं :

 

  1. ऐक्टोपिक गर्भावस्था तब होती है जब गर्भ का अंडाणु गर्भाशय के बाहर, आमतौर पर फैलोपियन ट्यूब में इंप्लांट हो जाता है. इस स्थिति में गर्भ का विकास गर्भाशय में नहीं हो पाता और फैलोपियन ट्यूब का आकार गर्भ के विकास के लिए पर्याप्त नहीं होता है. यदि इस स्थिति का समय रहते इलाज न किया जाए, तो फैलोपियन ट्यूब फट सकता है, जिस से अंदरूनी रक्तस्राव हो सकता है, जो कई बार जानलेवा होने की वजह से जल्दी एबौर्ट करना पड़ता है. अगर गर्भ का आकार छोटा हो और ट्यूब न फटा हो, तो दवाओं से इस का इलाज किया जा सकता है, ट्यूब के फटने पर सर्जरी करनी पड़ती है.

 

  1. गर्भकालीन मधुमेह की अवस्था में कई बार शुगर स्तर बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो इसे गर्भकालीन मधुमेह कहा जाता है. इस समस्या का इलाज नियमित रूप से किया जा सकता है, लेकिन यदि स्थिति बहुत गंभीर हो और मां के स्वास्थ्य को खतरा हो, जैसेकि प्री-ऐक्लम्प्सिया या अधिक ब्लड शुगर के कारण बच्चे के विकास में समस्या हो, तो कभीकभी गर्भ को समाप्त करने का निर्णय लिया जा सकता है.

 

  1. क्रोमोसोमल ऐबनौर्मेलिटी में बच्चे के क्रोमोजोमल दोष (जैसे डाउन सिंड्रोम, अनसेफली या अन्य गंभीर जन्म दोष) हो सकते हैं. यदि बच्चे के दोष बहुत गंभीर हों और उस का लाइफ थ्रैटनिंग हो, तो डाक्टर गर्भवती महिला की गर्भ को समाप्त करने का विकल्प दे सकते हैं. इस निर्णय में डाक्टर और परिवार की सलाह और काउंसलिंग बहुत महत्त्वपूर्ण होती है. अगर बच्चा मां की जीवन के लिए खतरा है, तो गर्भ को जल्द समाप्त करना एक सुरक्षित विकल्प हो सकता है.

 

  1. कभीकभी गर्भ का प्लैसेंटा गर्भाशय के निचले हिस्से में स्थित होता है, तो बच्चे के जन्म के समय बहुत ब्लीडिंग का कारण बन सकता है. यदि स्थिति बहुत गंभीर हो और अन्य उपायों से स्थिति में सुधार न हो सके, तो कई बार गर्भ को समाप्त करने का निर्णय लिया जाना अच्छा होता है.

 

  1. गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में अगर गर्भवती महिला की स्थिति बहुत गंभीर हो, जैसेकि गंभीर दिल की बीमारी, गुरदे की समस्या या अन्य चिकित्सा जटिलताएं, तो गर्भ को समाप्त करना एक अच्छा विकल्प होता है, क्योंकि इस से मां की जान को खतरे से बचाया जा सकता है, इस स्थिति में डाक्टर पूरी तरह से स्त्री के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेते हैं.

 

  1. बहु गर्भावस्था भी एक जटिल प्रैगनैंसी होती है. यह अधिकांश आईवीएफ गर्भधारण बहुभ्रूणीय गर्भावस्था से जुड़े हुए होते हैं. इस अवस्था में स्त्री को प्रीएक्लेंपसिया, ऐक्लेंपसिया, प्लैसेंटा प्रीविया और मधुमेह भी होने का खतरा रहता है.

गलत प्रैगनैंसी के लक्षण

प्रैगनैंसी अधिकतर सामान्य और स्वस्थ होती हैं, लेकिन कुछ गर्भावस्थाएं उच्च जोखिम वाली होती हैं, जिन में यदि उचित देखभाल और उपचार नहीं किया जाए, तो मां और बच्चे दोनों की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है.

कुछ लक्षण निम्न हैं, जिसे नजरअंदाज कभी न करें :

-गर्भवती होने के बावजूद पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द हो रहा हो, हलका रक्तस्राव हो रहा हो और मासिकधर्म पूरी तरह से बंद न हुआ हो, तो यह ऐक्टोपिक गर्भावस्था के संकेत हो सकते हैं.

-गर्भावस्था के 20 सप्ताह बाद उच्च रक्तचाप के लक्षण दिखने पर डाक्टर से संपर्क करें. प्री-ऐक्लेंपसिया के लक्षणों में हाथों और पैरों में सूजन, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, धुंधली दृष्टि और सिर में भारी दर्द शामिल हो सकते हैं. यह स्थिति गंभीर हो सकती है और इस से मिरगी जैसे संकट उत्पन्न हो सकते हैं.

-प्रैगनैंसी के दौरान अत्यधिक वजन बढ़ने या शारीरिक कमजोरी का सामना होने पर भी डाक्टर की सलाह अवश्य लें. यह स्थिति बच्चे और मां दोनों के लिए खतरनाक हो सकती है, खासकर अगर शुगर लेवल नियंत्रित न किया गया हो.

-गर्भावस्था के दौरान अचानक बिना दर्द के ब्लीडिंग होना प्लैसेंटा प्रिविया का संकेत हो सकता है.

-महिला को अचानक पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द या भारी रक्तस्राव का अनुभव होना भी चिंता का विषय हो सकता है, इस स्थिति में मिसकेरिज होने का खतरा रहता है.

-गर्भवती स्त्री का 1 महीने में 3 किलोग्राम से अधिक वजन बढ़ जाना.

– धुंधली दृष्टि, आंखों में दर्द या अंधेरे में अधिक आराम की आवश्यकता महसूस होना आदि प्री-ऐक्लेंपसिया का लक्षण हो सकता है.

-गर्भावस्था के दौरान सांस लेने में कठिनाई भी गंभीर स्थिति हो सकती है और यह गर्भकालीन मधुमेह या अन्य जटिलताओं का संकेत हो सकता है.

-गर्भ में बच्चे की हलचल में कमी महसूस हो, तो भी यह चिंता का कारण हो सकता है, ऐसे में तुरंत डाक्टर से संपर्क करना चाहिए, ताकि बच्चे की सेहत की जांच की जा सके.

इस प्रकार सही प्रैगनैंसी को आप तभी समझ सकते हैं, जब आप ने शुरू से डाक्टर की सलाह लिया हो, क्योंकि एक स्वस्थ गर्भधारण ही एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे कर आप के जीवन में खुशियां ला सकता है.

Ectopic Pregnancy

Shabana Azmi के घर पहुंचीं महिलाएं- लेने लगीं रिश्तों की सलाह

Shabana Azmi: अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री शबाना आजमी उन दिनों अपने किरदार में इतनी जान डाल देती थीं कि उन के किरदार से प्रभावित लोग उन से मिलने उन के घर तक पहुंच जाते थे.

ऐसा ही एक वाकेआ उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि कैसे महेश भट्ट निर्देशित और शबाना आजमी, कुलभूषण खरबंदा, स्मिता पाटिल अभिनित फिल्म ‘अर्थ’ ने कई शादीशुदा महिलाओं को प्रभावित कर दिया था.

किरदार में जान

75 वर्षीय शबाना आजमी ने बताया कि जब उन की महेश भट्ट निर्देशित फिल्म ‘अर्थ’ रिलीज होने वाली थी तब फिल्म देखने आए डिस्ट्रीब्यूटर्स ने ‘अर्थ’ फिल्म का क्लाइमैक्स चेंज करने के लिए कहा, क्योंकि फिल्म के आखिर में पति बने कुलभूषण खरबंदा जब अपनी गलतियों का एहसास कर के अपनी प्रेमिका को छोड़ कर वापस घर लौटना चाहते हैं तो मैं उन को स्वीकार करने से इनकार कर देती हूं.

उन्होंने बताया कि इतना ही नहीं, मुझ से प्यार करने वाले दूसरे हीरो राज किरण से भी मैं किसी बंधन में बंधने से इनकार कर देती हूं और अकेले रहना ही पसंद करती हूं.

शबाना ने बताया,”डिस्ट्रीब्यूटर्स को फिल्म का क्लाइमैक्स बिलकुल पसंद नहीं आया और उन्होंने कहा कि यह फिल्म एक दिन भी नहीं चलेगी, जिस में पति के माफी मांगने के बावजूद पत्नी उस के पास वापस नहीं लौटती, क्योंकि महेश भट्ट और मुझे फिल्म का क्लाइमैक्स ही पावरफुल लगा था. इसलिए हम ने क्लाइमैक्स बदलने से इनकार कर दिया था.

खास बात क्या थी

आखिरकार फिल्म ‘अर्थ’ रिलीज हुई और लोगों द्वारा काफी पसंद भी की गई. इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, लेकिन खास बात यह हुई कि इस फिल्म ने शादीशुदा औरतों को काफी प्रभावित किया, जिस के बाद ये औरतें मुझ से मिलने मेरे घर आने लगीं. वे मेरी प्रशंसक नहीं थीं बल्कि उन को सिर्फ ‘अर्थ’ में मेरे किरदार ने इतना ज्यादा प्रभावित किया कि मुझ से अपनी शादीशुदा जिंदगी की समस्याओं का हल और सुझाव मांगने मेरे घर पर आने लगीं.

मैं ने तो सिर्फ अपना रोल प्ले किया था, इसलिए मैं उन औरतों की झुंड को देख कर डर गई थी. मैं कोई सलाहकार तो थी नहीं. एक नौर्मल ऐक्ट्रैस थी. लेकिन उन दिनों मुझे इस बात का एहसास जरूर हुआ कि किसी फिल्म में कोई किरदार निभाना एक ऐक्टर या ऐक्ट्रैस के लिए कितनी जिम्मेदारी भरा काम है.

दरअसल, कई बार हमारे द्वारा निभाए गए किरदार दर्शकों को नई राह दिखाने में भी काम आते हैं.

Shabana Azmi

Moisturizing Tips: सर्दियों में मोइस्चराइजर और उस से जुड़ी कुछ जरूरी बातें

Moisturizing Tips: सर्दियां आते ही ठंडी शुष्क हवाएं चारों ओर बहने लगती हैं, ऐसे में त्वचा रूखी और बेजान होने लगती है. कभी ऐसा समय था, जब लोग त्वचा की नमी को बनाए रखने के लिए औयल का प्रयोग किया करते थे, लेकिन आज बदलते समय में कई प्रकार के मोइस्चराइजर बाजार में स्किन टाइप के अनुसार उपलब्ध हैं, जिन के प्रयोग से त्वचा में निखार लाना मुश्किल नहीं होता.

असल में सर्दियों का मौसम सभी को अच्छा लगता है, लेकिन शुष्क ठंडी हवा की वजह से इन दिनों स्किन काफी ज्यादा खुरदुरी, बेजान और रूखी हो जाती है. इस दौरान अगर स्किन की सही केयर न की जाए, तो रूखी त्वचा में क्रैक्स पड़ सकते हैं, इचिंग हो सकती है और खुजली करने की वजह से घाव भी हो सकता है. इस से निबटने के लिए बौडी को मोइस्चर करना जरूरी हो जाता है.

स्किन से जुड़ी परेशानियां कम हों और आप हमेशा स्वस्थ और खिलीखिली महसूस करें, इस के लिए कुछ बातों का ध्यान हमेशा रखना आवश्यक है :

स्किन को रखें नमीयुक्त

ऐक्सपर्ट मानते हैं कि ठंड के दिनों में स्किन बेजान और रूखी हो जाती है.  ऐसे में अगर स्किन को सही तरह से और रोजाना मोइस्चर किया जाए, तो स्किन की नमी बनी रहती है. स्किन का रूखापन कम होता है और त्वचा के फटने या क्रैक पड़ने का रिस्क भी कम हो जाता है. त्वचा रूखी होने की एक वजह यह भी है कि सर्दी के दिनों में हवा में नमी नहीं रहती है, जिस से स्किन जल्दी डिहाइड्रेट हो जाती है. इस के अलावा सर्दियों में ड्राई स्किन होने की वजह से त्वचा की लेयर भी निकलने लगती है.

विशेषज्ञों की मानें, तो सर्दियों के दिनों में हमारे स्किन पोर्स सिकुड़ने लगती हैं, जिन से स्किन अनहैल्दी नजर आती है. इस सिचुएशन में अकसर स्किन में लाललाल दाने हो जाते हैं, पिंपल्स निकल आते हैं और रैडनेस भी बढ़ जाती है.

इस तरह की सभी समस्याओं को दूर करने के लिए नियमित रूप से सर्दियों के दिनों में मोइस्चराइजर का यूज किया जाना चाहिए, क्योंकि मोइस्चराइजर इन दिनों के लिए ज्यादा प्रभावशाली होता है.

स्किन डिजीज में होती है कमी

डर्मेटोलौजिस्ट डा. सोमा सरकार का कहना है कि मोइस्चराइजर किसी भी स्किन केयर रूटीन में सब से पहला और महत्त्वपूर्ण स्टेप होता है. यह आप की स्किन की नमी को बनाए रखता है और ड्राइनैस से छुटकारा दिलाता है.

नैशनल सैंटर फौर बायोटैक्नोलोजी इनफौर्मेशन की एक स्टडी के अनुसार मोइस्चराइजर का इस्तेमाल आमतौर पर स्किन पर फाइनलाइंस को कम करने, स्किन को मुलायम और हाइड्रेटेड रखने के लिए किया जाता है, जिस से व्यक्ति के सोशल लाइफ, मानसिक संतुष्टि और लाइफ क्वालिटी में सुधार होता है. इस के अलावा सामान्य त्वचा या ड्राई स्किन के लक्षणों वाले स्किन डिजीज के दोनों ही स्थितियों में मोइस्चराइजर का इस्तेमाल फायदेमंद हो सकता है.

मोइस्चराइजर के प्रकार

हर व्यक्ति को अपनी स्किन टाइप के अनुसार मोइस्चराइजर का चुनाव करना चाहिए। इस के प्रकार निम्न हैं :

ओक्लूसिव मोइस्चराइजर

यह मोइस्चराइजर स्किन पर पानी की कमी को रोकने के लिए एक पतली सुरक्षित परत बनाते हैं. इस में आमतौर पर पैट्रोलियम जैली, मिनरल औयल और डाइमेथिकोन जैसे इंग्रीडिऐंट्स का इस्तेमाल किया जाता है. ओक्लूसिव मोइस्चराइजर बहुत ड्राई या रूखी त्वचा के लिए सब से ज्यादा उपयोगी माना जाता है और सर्दियों के दौरान या एक्जिमा से पीड़ित लोगों के लिए इस का इस्तेमाल ज्यादा फायदेमंद होता है.

ऐमोलिऐंट्स मोइस्चराइजर

यह मोइस्चराइजर स्किन पर छोटीछोटी दरारों को भरने में मदद करता है, जिस से स्किन मुलायम बनती है. इस मोइस्चराइजर में आमतौर पर सैरामाइड्स, फैटी एसिड या नैचुरल औयल जैसे शिया बटर मौजूद होते हैं. ऐमोलिऐंट मोइस्चराइजर का इस्तेमाल सामान्य स्किन टाइप और ड्राई स्किन वाले लोग कर सकते हैं. इस मोइस्चराइजर का उपयोग करने से स्किन की टैक्स्चर और इलास्टिसिटी में सुधार होता है.

ह्यूमेक्टैंट मोइस्चराइजर

इस मोइस्चराइजर का इस्तेमाल हवा और त्वचा की गहरी परतों से पानी को आकर्षित कर के स्किन को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं. इस मोइस्चराइजर में ग्लिसरीन, ह्यलूरोनिक एसिड और यूरिया जैसे तत्त्व पाए जाते हैं, जो हलके होते हैं और औयली या मिश्रित त्वचा के लिए काफी उपयोगी माने जाते हैं.

बैरियर रिपेयर मोइस्चराइजर

बैरियर रिपेयर मोइस्चराइजर स्किन की नैचुरल सुरक्षात्मक परत को बनाए रखने के लिए बनाया गया है. इस मोइस्चराइजर में सेरामाइड्स, कोलेस्ट्राल और फैटी एसिड जैसी सामग्रियां होती हैं, जो सैंसिटिव और डैमेज स्किन के लिए काफी उपयोगी होते हैं.

कब लगाएं मोइस्चराइजर

स्किन पर मोइस्चराइजर नहाने या चेहरा धोने के तुरंत बाद हलकी नमी वाली स्किन पर लगाना चाहिए. इस के अलावा रात को सोने से पहले भी अपनी स्किन पर मोइस्चराइजर लगा सकते हैं, जो आप की स्किन को रिपेयर करने में मदद करता है.

बौडी मोइस्चराइजर और चेहरे पर लगाने वाले मोइस्चराइजर में अंतर

कुछ लोग बौडी मोइस्चराइजर को फेस पर लगा लेते हैं, जबकि बौडी मोइस्चराइजर, फेस मोइस्चराइजर की तुलना में भारी और चिकना होता है और शरीर के बड़े हिस्से पर आसानी से फैल जाता है. इस कारण बॉडी मोइस्चराइजर का इस्तेमाल चेहरे पर करने से खासकर, आप की स्किन पर ऐक्ने हो सकता है, क्योंकि फेस मोइस्चराइजर हलके वजन वाले होते हैं, जो आप की त्वचा को चिकना और औयली लुक नहीं देते हैं. साथ ही स्किन के नमी को बनाए रखने में मदद भी करते हैं. फेस मोइस्चराइजर ज्यादातर नौन-कौमेडोजेनिक होते हैं और ब्रेकआउट का कारण नहीं बनते हैं.

कुछ बौडी लोशन में खुशबू के लिए फ्रैग्नेंस डाला जाता है, जो स्किन पर ऐलर्जी का कारण बन सकता है, इसलिए अगर आप चेहरे पर बौडी लोशन का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो खुशबू वाले लोशन का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए.

इस प्रकार सर्दी के मौसम में मोइस्चराइजर का सही प्रयोग करने से केवल त्वचा की नमी ही बरकरार नहीं रहती, बल्कि यह आप के स्किन पर एक पतली लेयर बनाती है, जो आप की त्वचा को धूल, मिट्टी, प्रदूषण से रक्षा करती है, जिस से आप हमेशा फ्रैश और तरोताजा महसूस कर सकते हैं, लेकिन ध्यान रखें, हमेशा ब्रैंडेड क्वालिटी की मोइस्चराइजर डाक्टर की सलाह से अपनी स्किन टाइप के अनुसार ही खरीदें, ताकि किसी प्रकार की ऐलर्जी का सामना आप को न करना पड़े.

Moisturizing Tips

Romantic Story: तुम प्रेमी क्यों नहीं- प्रेमी और पति में क्या फर्क होता है

Romantic Story: शेखर के लिए मन लगा कर चाय बनाई थी, पर बाहर जाने की हड़बड़ी दिखाते हुए एकदम झपट कर उस ने प्याला उठा लिया और एक ही घूंट में पी गया. घर से बाहर जाते वक्त लड़ा भी तो नहीं जाता. वह तो दिनभर बाहर रहेगा और मैं पछताती रहूंगी. ऐसे समय में उसे घूरने के सिवा कुछ कर ही नहीं पाती.

मैं सोचती, ‘कितना अजीब है यह शेखर भी. किसी मशीन की तरह नीरस और बेजान. उस के होंठों पर कहकहे देखने के लिए तो आदमी तरस ही जाए. उस का हर काम बटन दबाने की तरह होता है.’ कई बार तो मारे गुस्से के आंखें भर आतीं. कभीकभी तो सिसक भी पड़ती, पर कहती उस से कुछ भी नहीं.

शादी को अभी 3 साल ही तो गुजरे थे. एक गुड्डी हो गई थी. सुंदर तो मैं पहले ही थी. हां, कुछ दुबली सी थी. मां बनने के बाद वह कसर भी पूरी सी हो गई. आईने में जब भी अपने को देखती हूं तो सोचती हूं कि शेखर अंदर से अवश्य मुरदा है, वरना मुझे देख कर जरा सी भी प्रशंसा न करे, असंभव है. कालिज में तो मेरे लिए नारा ही था, ‘एक अनार सौ बीमार.’

दूसरी ओर पड़ोस में ही किशोर बाबू की लड़की थी नीरू. बस, सामान्य सी कदकाठी की थी. सुंदरता के किसी भी मापदंड पर खरी नहीं उतरती थी. परंतु वह जिस से प्यार करती थी वह उस की एकएक अदा पर ऐसी तारीफों के पुल बांधता कि वह आत्मविभोर हो जाती. दिनरात नीरू के होंठों पर मुसकान थिरकती रहती. कभीकभी उस की बहनें ही उस से जल उठतीं.

नीरू मुझ से कहती, ‘‘क्या करूं, दीदी. वह मुझ से खूब प्यार भरी बातें करता है. हर समय मेरी प्रशंसा करता रहता है. मैं मुसकराऊं कैसे नहीं. कल मैं उस के लिए गाजर का हलवा बना कर ले गई तो उस ने इतनी तारीफ की कि मेरी सारी मेहनत सफल हो गई.’’

वास्तव में नीरू की बात गलत न थी. अब कोई मेहनत कर के आग की आंच में पसीनेपसीने हो कर खाना बनाए और खाने वाला ऐसे खाए जैसे कोई गुनाह कर रहा हो तब बनाने वाले पर क्या गुजरती है, यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है.

जाने शेखर ही ऐसा क्यों है. कभीकभी सोचती हूं, उस की अपनी परेशानियां होंगी, जिन में वह उलझा रहता होगा. दफ्तर की ही क्या कम भागदौड़ है. बिक्री अधिकारी है. आज यहां है तो कल वहां है. आज इस समस्या से उलझ रहा है तो कल किसी दूसरी परेशानी में फंसा है. परंतु फिर यह तर्क भी बेकार लगता है. सोचती हूं, ‘एक शेखर ही तो बिक्री अधिकारी नहीं है, हजारों होंगे. क्या सभी अपनी पत्नियों से ऐसा ही व्यवहार करते होंगे?’

वैसे आर्थिक रूप से शेखर बहुत सुरक्षित है. उस का वेतन हमारी गृहस्थी के लिए बहुत अधिक ही है. वह एक भरेपूरे घर का ऐसा मालिक भी नहीं है कि रोज नईनई उलझनों से पाला पड़े. परिवार में पतिपत्नी के अलावा एक गुड्डी ही तो है. सबकुछ तो है शेखर के पास. बस, केवल नहीं हैं तो उस के होंठों में शब्द और एक प्रेमी अथवा पति का उदार मन. इस के साथ नीरू तो दो पल भी न रहे.

मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी शेखर ने मुंह पर मेरे व्यवहार या सुंदरता की तारीफ की हो. मुझ पर कभी मुग्ध हो कर स्वयं को सराहा हो.

अब उस दिन की ही बात लो. नीरू ने गहरे पीले रंग की साड़ी पहन ली थी, जोकि उस के काले रंग पर बिलकुल ही बेमेल लग रही थी. परंतु रवि जाने किस मिट्टी का बना था कि वह नीरू की प्रशंसा में शेर पर शेर सुनाता रहा.

नीरू को तो जैसे खुशी के पंख लग गए थे. वह आते ही मेरी गोद में गिर पड़ी थी. मैं ने घबरा कर पूछा, ‘‘क्या हुआ नीरू, कोई बात हुई?’’

‘‘बात क्या होगी,’’ नीरू ने मेरी बांह में चिकोटी काट कर कहा, ‘‘आज क्या मैं सच में पीली साड़ी में कहर बरपा रही थी. कहो तो.’’

मैं क्या उत्तर देती. पीली साड़ी में वह कुछ खास अच्छी न लग रही थी, पर उसे खुश करने की गरज से कहा, ‘‘हां, सचमुच तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो.’’

‘‘बिलकुल ठीक,’’ नीरू चहक उठी, ‘‘रवि भी ऐसा ही कहता था. बस, वह मुझे देखते ही कवि बन जाता है.’’

मुझे याद है, एक बार पायल पहनने का फैशन चल पड़ा था. ऐसे में मुझे भी शौक चढ़ा कि मैं भी पायल पहन लूं. मेरे पैर पायलों में बंध कर निहायत सुंदर हो उठे थे. जिस ने भी उन दिनों मेरे पैर देखे, बहुत तारीफ की. पर चाहे मैं पैर पटक कर चलूं या साड़ी उठा कर चलूं, पायलों का सुंदर जोड़ा चमकचमक कर भी शेखर को अपनी ओर न खींच पाया था. एक दिन तो मैं ने खीझ कर कहा, ‘‘कमाल है, पूरी कालोनी में मेरी पायलों की चर्चा हो रही है, पर तुम्हें ये अभी तक दिखाई ही नहीं दीं.’’?

‘‘ऐं,’’ शेखर ने चौंक कर कहा, ‘‘यह वही पायलों का सेट है न, जो पिछले महीने खरीदा था. बिलकुल चांदी की लग रही हैं.’’

अब कैसे कहती कि चांदी या पायलों को नहीं, शेखर साहब, मेरे पैरों के बारे में कुछ कहिए. असल बात तो पैरों की तारीफ की है, पर कह न पाई थी.

यह भी तो तभी की बात है. नीरू ने भी मेरी पसंद की पायलें खरीदी थीं. उन्हें पहन कर वह रवि के पास गई थी. बस, जरा सी ही तो उन की झंकार होती थी, मगर बड़ी दूर से ही वे रवि के कानों में बजने लगी थीं. रवि ने मुग्ध भाव से उस के पैरों की ओर देखते हुए कहा था, ‘‘तुम्हारे पैर कितने सुंदर हैं, नीरू.’’

कितनी छोटीछोटी बातों की समझ थी रवि में. सुनसुन कर अचरज होता था. अगर नीरू ने उस से शादी कर ली तो दोनों की जिंदगी कितनी प्रेममय हो जाएगी.

मैं नीरू को सलाह देती, ‘‘नीरू, रवि से शादी क्यों नहीं कर लेती?’’

पर नीरू को मेरी यह सलाह नहीं भाती. मुसकरा कर कहती, ‘‘रवि अभी प्रेमी ही बना रहना चाहता है, जब तक कि उस के मन की कविता खत्म न हो जाए.’’

‘‘कविता?’’ मैं चौंक कर रह जाती. रवि का मन कविता से भरा है, तभी उस से इतनी तारीफ हो पाती है. कितना आकुल रहता है वह नीरू के लिए. शेखर के मन में कविता ही नहीं बची है, वह तो पत्थर है, एकदम पत्थर. सामान्य दिनों को अगर मैं नजरअंदाज भी कर दूं तो भी बीमारी आदि होने पर तो उसे मेरा खयाल करना ही चाहिए. इधर बीमार पड़ी, उधर डाक्टर को फोन कर दिया. फिर दवाइयां आईं और मैं दूसरे दिन से ही फिर रसोई के कामों में जुट गई.

मुझे याद है, एक बार मैं फ्लू की चपेट में आ गई थी. शेखर ने बिना देर किए दवा मंगा दी थी, पर मैं जानबूझ कर अपने को बीमार दिखा कर बिस्तर पर ही पड़ी रही थी. शेखर ने तुरंत मायके से मेरी छोटी बहन सुलू को बुला लिया था. मैं चाहती थी कि शेखर नीरू के रवि की तरह ही मेरी तीमारदारी करे, मेरे स्वास्थ्य के बारे में बारबार पूछे, मनाए, हंसाए, मगर ऐसा कुछ न हुआ. बीमारी आई और भाग गई.

इतना ही नहीं, शेखर स्वयं बीमार पड़ता तो इस बात की मुझ से कभी अपेक्षा नहीं करता कि मैं उस की सेवाटहल में लगी रहूं. मैं जानबूझ कर उस के पास बैठ भी जाऊं तो मुझे जबरन उठा कर किसी काम में लगवा देता या अपने दफ्तरी हिसाब के जोड़तोड़ में लग जाता. ऐसी स्थिति में मैं गुस्से से उबल पड़ती. अगर कभी रवि बीमार होता तो उस की डाक्टर सिर्फ नीरू होती.

‘‘मैं रवि को पा कर कभी निराश नहीं होऊंगी, दीदी,’’ नीरू अकसर कहती, ‘‘उसे हमेशा मेरी चिंता सताती रहती है. मैं अगर चाहूं तो भी लापरवाह नहीं हो सकती. पहले ही वह टोक देगा. कभीकभी उस की याददाश्त पर मैं दंग हो जाती हूं. लगता है, जैसे वह डायरी या कैलेंडर हो.’’

याददाश्त के मामले में भी शेखर बिलकुल कोरा है. अगर कहीं जाने का कार्यक्रम बने तो वह अधिकतर भूल ही जाता है. सोचती हूं कि किसी दिन वह कहीं मुझे ही न भूल जाए.

एक दिन मैं ने शादी वाली साड़ी पहनी थी. शेखर ने देखा और एक हलकी सी मिठास से वह घुल भी गया, पर वह बात नहीं आई जो नीरू के रवि में पैदा होती. मुझे इतना गुस्सा आया कि मुंह फुला कर बैठ गई. घंटों उस से कुछ न बोली. शेखर को किसी भी चीज की जरूरत पड़ी तो गुड्डी के हाथों भिजवा दी. शेखर ने रूठ कर कहा, ‘‘अगर गुड्डी न होती तो आप हमें ये चीजें किस तरह से देतीं?’’

‘‘डाक से भेज देती,’’ मैं ने ताव खा कर कहा. शेखर हंसने लगा, ‘‘इतनी सी बात पर इतना गुस्सा. हमें पता होता कि बीवियों की हर बात की प्रशंसा करनी पड़ती है तो शादी से पहले हम कुछ ऐसीवैसी किताबें जरूर पढ़ लेते.’’

मैं ने भन्ना कर शेखर को देखा और बिलकुल रोनेरोने को हो आई, ‘‘प्रेमी होना हर किसी के बस की बात नहीं होती. तुम कभी प्रेमी न बन पाओगे. रवि को तो तुम ने देखा होगा?’’

‘‘कौन रवि?’’ शेखर चौंका, ‘‘कहीं वह नीरू का प्रेमी तो नहीं?’’

‘‘जी हां, वही,’’ मैं ने नमकमिर्च लगाते हुए कहा, ‘‘नीरू की एकएक बात की तारीफ हजार शब्दों में करता है. तुम्हारी तरह हर समय चुप्पी साधे नहीं रहता. बातचीत में भी इतनी कंजूसी अच्छी नहीं होती.’’

‘‘अरे, तो मैं क्या करूं. बिना प्रेम का पाठ पढ़े ही ब्याह के खूंटे से बांध दिए गए. वैसे एक बात है, प्रेमी बनना बड़ा आसान काम है समझीं, मगर पति बनना बहुत मुश्किल है.

‘‘जाने कितनी योग्यताएं चाहिए पति बनने के लिए. पहले तो उत्तम वेतन वाली नौकरी जिस से लड़की का गुजारा भलीभांति हो सके. सिर पर अपनी छत है या नहीं, घर कैसा है, उस के घर के लोग कैसे हैं, घर में कितने लोग हैं. लड़के में कोई बुराई तो नहीं, उस के अच्छे चालचलन के लिए पासपड़ोसियों का प्रमाणपत्र आदि चाहिए और जब पूरी तरह पति बन जाओ तो अपनी सुंदर पत्नी की बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न करो. अपनेआप को ही लो. तुम्हें सोना, सजनासंवरना, गपें मारना, फिल्में देखना आदि यही सब तो आता था. नकचढ़ी भी कितनी थीं तुम. हमारे घर की सीमित सुविधाओं में तुम्हारा दम घुटता था.’’

अब शेखर बिलकुल गंभीर हो गया था, ‘‘तुम जानती ही हो कैसे मैं ने धीरेधीरे तुम्हें बिलकुल बदल दिया. व्यर्थ गपें मारना, फिल्में देखना सब तुम ने बंद कर दिया. फिर तुम ने मुझे भी तो बदला है,’’ शेखर ने रुक कर पूछा, ‘‘अब कहो, तुम्हें शेखर की भूमिका पसंद है या रवि की?’’

‘‘रवि की,’’ मैं दृढ़ता से बोली, ‘‘प्रेम ही जिंदगी है, यह तुम क्यों भूल जाते हो?’’

‘‘क्यों, मैं क्या तुम से प्रेम नहीं करता. हर तरह से तुम्हारा खयाल रखता हूं. जो बना कर देती हो, खा लेता हूं. दफ्तर से छुट्टी मिलते ही फालतू गपशप में उलझने के बजाय सीधा घर आता हूं. तुम्हें जरा सी छींक भी आए तो फौरन डाक्टर हाजिर कर देता हूं. क्या यह प्रेम नहीं है?’’

‘‘यह प्रेम है या कद्दू की सब्जी?’’ मैं बिलकुल झल्ला गई, ‘‘तुम्हें प्रेम करना रवि से सीखना पड़ेगा. दिनरात नीरू से जाने क्याक्या बातें करता रहता है. उस की तो बातें ही खत्म नहीं होतीं. नीरू कुछ भी ओढ़ेपहने, खाएपकाए रवि उस की प्रशंसा करते नहीं थकता. नीरू तो उसे पा कर किसी और चीज की तमन्ना ही नहीं रखती.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है. तब तुम ने नीरू से कभी यह क्यों नहीं कहा कि वह रवि से शादी कर ले.’’

‘‘कहा तो है…’’

‘‘फिर वह विवाह उस से क्यों नहीं करता?’’

‘‘रवि का कहना है कि जब तक उस के अंदर की कविता शेष न हो जाए तब तक वह विवाह नहीं करना चाहता. विवाह से प्रेम खत्म हो जाता है.’’

‘‘सब बकवास है,’’ शेखर उत्तेजित हो कर बोला, ‘‘आदमी की कविता भी कभी मरती है? जिस व्यक्ति ने सभ्यता को विनाशकारी अणुबम दिया, उस के अंदर की भी कविता खत्म नहीं हुई थी. ऐसा होता तो वह कभी अपने अपराधबोध के कारण आत्महत्या नहीं करता, समझीं. असल में रवि कभी भी नीरू से शादी नहीं करेगा. यह सब उस का एक खेल है, धोखा है.’’

‘‘क्यों?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

‘‘असल में बात तो प्रेमी और पति बनने के अंतर की है, यह रवि का चौथा प्रेम है. इस से पहले भी उस ने 3 लड़कियों से प्रेम किया था.

‘‘जब पति बनने का अवसर आया, वह भाग निकला. प्रेमी बनना बड़ा आसान है. कुछ हुस्नइश्क के शेर रट लो. कुछ विशेष आदतें पाल लो…और सब से बड़ी बात अपने सामने बैठी महिला की जी भर कर तारीफ करो. बस, आप सफल प्रेमी बन गए.

‘‘जब भी शादी की बात आएगी, देखना कैसे दुम दबा कर भाग निकलेगा.

‘‘तुम देखती चलो, आगेआगे होता है क्या? अब भी तुम्हें शिकायत है कि मैं रवि जैसा प्रेमी क्यों नहीं हूं? और अगर है तो ठीक है, कल से मैं भी कवितागजल की पुस्तकें ला कर तैयारी करूंगा. कल से मेरी नौकरी बंद. गुड्डी की देखभाल बंद, तुम्हारे शिकवेशिकायतें सुनना बंद, बाजारघर का काम बंद. बस, दिनरात तुम्हारे हुस्न की तारीफ करता रहूंगा.’’

शेखर के भोलेपन पर मेरी हंसी छूट गई. अब मैं कहती भी क्या क्योंकि यथार्थ की जमीन पर आ कर मेरे पैर जो टिक गए थे.

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