Emotional Story: ममता का आंगन- मां के लिए कैसे बदली निशा की सोच

Emotional Story: विदाई की बेला… हर विवाह समारोह का सब से भावुक कर देने वाला पल. सुंदर से लहंगे में आभूषणों से लदी निशा धीरेधीरे आगे कदम बढ़ा रही थी. आंसुओं से उस का चेहरा भीगा जा रहा था. सहेलियां और भाभियां उलाहना दे रहीं थीं, “अरे इतना रोओगी तो मेकअप धुल जाएगा.” इसी तरह की चुहलबाजी हो रही थी.

मगर वह चाह कर भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही थी. खुद को दोराहे पर खड़ा महसूस कर रही थी आज वह.

सजीधजी सुंदर सी कार उसे पिया के घर ले जाने के लिए तैयार खड़ी थी. अजय कार में बैठ चुका था. निशा ने कनखियों से देखा तो लगा कि अजय बेसब्री से उस का इंतजार कर रहा था, मानो कह रहा हो, “अब बस भी करो निशा… नए घर में भी लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.”

वह एक कदम आगे बढ़ती तो दो कदम पीछे वाली स्थिति थी. पापाभैया पास में ही खड़े थे. निशा पलट कर पापा के गले लग कर रोने लगी. भाई उसे प्यार से सहला रहा था, मानो पापा से छुड़ाना चाह रहा हो और कह रहा हो,” दीदी, एक नई सुंदर सी दुनिया तुम्हारी प्रतीक्षा में है. उस का स्वागत करो.”

तभी उस ने देखा कि मां किसी अपराधिनी सी दूर खड़ी अपने ढुलकते आंसुओं को छिपाने का असफल प्रयास कर रही थी. दोनों तरफ से स्थिति कमोबेश एक सी ही थी.

मां आगे बढ़ कर उसे गले लगाने का साहस नहीं कर पा रही थी क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं निशा नाराज ना हो जाए. ये अधिकार निशा ने उन्हें आज तक दिया ही नहीं था.

इधर, निशा भी चाहते हुए ममत्व की प्यास को सहलाने में नाकाम साबित हो रही थी. बड़ी ही मुश्किल से मां धीरेधीरे आगे आ कर खड़ी हो गई. मौसी, बुआ सभी से निशा प्रेम से गले मिल रही थी, तभी अचानक मां के दिल में गहरा दर्द का सैलाब उमड़ पड़ा और उसे जोर की रुलाई आ गई.

यह देख कर निशा से रहा नहीं गया. वह मां की तरफ बढ़ी. दोनों मांबेटी इस तरह गले मिलीं जैसे दोनों को एकदूसरे से कोई शिकवाशिकायत ही ना हो. शब्द साथ नहीं दे रहे थे. बस कुछ देर एकदूसरे से लिपट कर दोनों पूर्ण हो गई थी. अब निशा को जाना ही था, क्योंकि कार काफी देर से स्टार्ट हो कर खड़ी थी.

नए घर में पहुंच कर निशा को बहुत प्यारसम्मान मिला. शुरू के कुछ दिनों में उसे किसी भी काम में हाथ नहीं लगाने दिया. उस की छोटी प्यारी सी ननद अपनी मां के हर काम में हाथ बंटाती. धीरेधीरे हाथों की मेहंदी का रंग छूटने के साथसाथ नेहा भी घरपरिवार की जिम्मेदारियों में शामिल हो गई. जबकि मां के घर में वह कोई भी काम नहीं करती थी, मगर ससुराल तो ससुराल ही होता है. शुरुआत में कुछ कठिनाई भी आई. कई बार वह रो पड़ती थी कि अपनी समस्या किसे बताए.. क्योंकि अपनी मां को तो उस ने पूर्ण रूप से तिरस्कृत किया हुआ था

मां ने कई बार प्रयास किया था कि निशा घर के थोड़े बहुत काम सीख ले, परंतु ढाक के वही तीन पात. जब कुछ छोटी थी तो पापा के लाड़प्यार की वजह से और फिर बड़ी होने पर मां से एक अनकही रंजिश होने के नाते. यूं निशा को काम करने में कोई परेशानी नहीं थी, परंतु वह मां से कुछ नहीं सीखना चाहती थी. न जाने क्यों उन्हें अपना दुश्मन समझने लगी थी वह.

विवाह को लगभग 20 दिन बीत चुके थे. निशा की सास उसे एक बड़ा सा डब्बा देते हुए बोली, “बेटा, यह बौक्स तुम्हारी मां ने तुम्हें सरप्राइस के तौर पर दिया है. तुम्हीं इसे खोलना और देखना कि इस में क्या है. अपने सारे जेवर डब्बे में रख देना. लौकर में रखवा देंगे. घर में रखना सुरक्षित नहीं होगा.”

शाम को जब निशा अपने जेवर डब्बे में करीने से संभाल रही थी, तो उस ने वह बौक्स भी खोला. वह देख कर अवाक रह गई. डब्बे में सुंदर से सोने और हीरे के जेवरात थे और साथ में एक पत्र भी.

यह पत्र उस की मां रीता ने लिखा था, “प्यारी निशा, तुम्हारे पापा का मुझ से शादी करने का मकसद सिर्फ इतना था कि उन की अनुपस्थिति में मैं तुम्हारी देखभाल कर सकूं. अब तुम्हारा विवाह हो चुका है. समय के साथ धीरेधीरे समझ जाओगी कि एक पिता के लिए अकेले संतान को पालना कितना मुश्किल होता है. मां तो सिर्फ मां होती है. यह सौतेला शब्द तो हमारे समाज ने ही गढ़ा है. पूर्वाग्रह से ग्रसित यह भावना किसी स्त्री को जाने समझे बगैर ही खलनायिका बना देती है. तुम्हारा विदाई के समय मुझ से लिपटना मुझे उम्रभर की खुशी दे गया.

“मेरा बचपन भी कुछ तुम्हारी ही तरह बीता है. सदा सुखी रहना.

“और हां, अपनी मां से मिलने कब आ रही हो?”

वह सोच में पड़ गई. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. उसे इन गहनों में से ममत्व की सुगंध आने लगी. वह काफी देर तक उन्हें देखती रही. इन में से कुछ गहने उस की अपनी मां के थे और अधिकतर नई मां के, जिसे उस ने मां तो कभी माना ही नहीं.

दरअसल, निशा के जीवन में दुखद मोड़ तब आया, जब 12 साल की उम्र में उस की मां की मृत्यु हो गई थी. लाड़प्यार से पली एकलौती संतान कुदरत के इस अन्याय को सहने की समझ भी नहीं रखती थी. पिता राजेश भी परेशान. एक तो पत्नी की असमय मृत्यु का गम, दूसरा 12 साल की बिटिया को पालने की जिम्मेदारी. ऐसी कच्ची उम्र में जब बच्चे कई तरह के शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों से गुजरते हैं, एक पिता के लिए बहुत ही मुश्किल हो जाता है, ऐसे में खासकर बिटिया का लालनपालन करना.

कुछ लोगों ने सलाह दी कि वह निशा की मौसी से विवाह कर ले. क्योंकि अपनी बहन की संतान को जितने प्यार से वह पालेगी, ऐसा कोई दूसरी महिला नहीं कर सकती. परंतु निशा की मौसी उस के पिता से उम्र में बहुत छोटी थी, इसलिए राजेश को यह मंजूर नहीं था. खैर, समय की मांग को देखते हुए रीता के साथ निशा के पिता राजेश का पुनर्विवाह सादे समारोह में हो गया.

मां को गए अभी सिर्फ एक ही साल हुआ था. निशा की यादों में मां की हर बात जिंदा थी. इकलौती संतान होने की वजह से मातापिता का संपूर्ण प्यार उसी पर निछावर था.

राजेश ने रीता के साथ विवाह तो किया, परंतु निशा को किसी भी मनोवैज्ञानिक संकट में वह नहीं डालना चाहते थे. रीता भी खुद बहुत समझदार थी. इधर निशा भावनात्मक मानसिक और शारीरिक तौर पर आने वाले बदलावों से गुजर रही थी.

मां उसे भावनात्मक सहारा देने का भरसक प्रयास करती, परंतु निशा हर बार मां को ठुकरा देती है. अकेलीअकेली उदास सी रहती थी वह. नई मां कभी पिता से हंस कर, खिलखिला कर बात करती, तो निशा परेशान हो उठती. उसे लगता कि इस महिला ने आ कर उस की मां की जगह ले ली है.

निशा की मां की साड़ियां राजेश के कहने पर अगर रीता ने पहन लीं, तो निशा आगबबूला हो उठती. यह सब देख कर रीता ने अपनेआप को बहुत संयमित कर लिया था. वह नहीं चाहती थी कि किशोरावस्था में किसी बच्चे के दिमाग पर कोई गलत असर पड़े. समय के साथसाथ निशा का अकेलापन दूर करने के लिए एक छोटा भाई आ चुका था. आश्चर्य कि छोटे भाई से निशा को कोई शिकायत नहीं थी. वह उस के साथ खेलती और अब थोड़ा खुश रहने लगी थी. लेकिन मां के प्रति अपने व्यवहार को वह नहीं बदल पाई थी.

22 साल की उम्र पूरी होने पर घर वालों से विचारविमर्श के बाद निशा का विवाह तय कर दिया गया. निशा ने भी कोई अरुचि नहीं दिखाई. वह तो मानो नई मां से छुटकारा पाना चाहती थी.

आज इन गहनों को संभालते वक्त वह सोचने लगी कि अपनी मां की साड़ी तक वह नई मां को नहीं पहनने देती थी और इस अनचाही मां ने तो उसे खूब लाड़प्यार से पाला. कभी अपने बेटे और उस में कोई फर्क नहीं किया.

विवाह के समय अपनी सुंदर कीमती साड़ियां और भारी गहने सब उसी को सौंप दिए, जैसा कोई असली मां करती है.

तभी सासू मां ने उसे आवाज दे कर दरवाजे पर अपनी उपस्थिति का एहसास कराया. निशा का उदासीन चेहरा देख कर वह बोली, “अरे बेटा, क्या बात है…? मैं ने लौकर वाली बात कह कर तुम्हारा दिल तो नहीं दुखाया… दरअसल, घर में इतना कीमती सामान रखना असुरक्षित है इसीलिए मैं ने ऐसा कह दिया.”

“अरे नहीं मम्मी, ऐसी बात नहीं है,” कह कर वह रुक गई. आगे और कहती भी क्या..? कैसे कह देती कि जिस मां ने अपना सर्वस्व उस के लालनपालन में लुटा दिया, उस से वह इतनी नफरत करती थी कि पश्चाताप करने की भी कोई राह ही नहीं सूझ रही है.

खैर, सासू मां समझदार थी. सब जानते हुए भी वे अनजान ही बनी रहीं. इधर निशा के अंदर उधेड़बुन चलती रही.

शाम को अजय आ कर बोला,”अगले 2-3 दिन में हम तुम्हारे घर मम्मीपापा से मिलने चल रहे हैं.”

दरअसल, अजय की मां ने ही उसे निशा को मां के घर ले जाने की सलाह दी थी. वह धीरे से बोली, “ठीक है.” मगर मन ही मन बड़ी शर्मिंदा हो रही थी कि कैसे सामना करूंगी मां का.

अगले दिन सुबह मौसी का फोन आया. निशा आत्मग्लानि से भरी हुई थी. उस ने मौसी से मां का जिक्र किया. तब मौसी ने ही उसे बताया कि अजय के साथ उस का विवाह उस की मां रीता ने ही तय किया था. दरअसल, अजय की मां रीता की बचपन की सहेली थी. अजय की मां का विवाह तो समय से हो गया, परंतु यह रीता का दुर्भाग्य था कि बहुत ही छोटी उम्र में उस की मां की मृत्यु हो गई. पिता ने दूसरा विवाह नहीं किया. पारिवारिक सदस्यों के साथ मिल कर खुद ही अपनी बेटी को पालने की जिम्मेदारी ली. परिवार के बीच में रीता की परवरिश तो ठीकठाक हो गई, परंतु उस के विवाह में देरी होती रही, क्योंकि दादादादी की मृत्यु हो चुकी थी. ताऊताई अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गए थे. अब रह गए थे रीता और उस के पिता. वह पिता को छोड़ कर कहीं नहीं जाना चाहती थी.

अधिक उम्र हो जाने पर भी लड़की के लिए लड़का मिलना कभीकभी मुश्किल काम साबित हो जाता है. इसीलिए जब राजेश की पहली पत्नी की मृत्यु हुई, तब रीता का विवाह उन के साथ इस शर्त पर हुआ कि उन की बेटी निशा को अपनी बेटी की तरह मान कर पालेगी. और रीता ने यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई. कुछ साल बाद अपना बेटा होने के बावजूद भी उस ने दोनों बच्चों में कभी कोई फर्क नहीं किया. और आज भी यह रीता ही थी, जिस ने निशा का रिश्ता अपनी सहेली के बेटे अजय से करवाया था, ताकि वह स्वयं अपनी बेटी के भविष्य को ले कर आशान्वित रहे. परंतु यह बात परिवार के किसी भी सदस्य ने निशा को नहीं बताई थी, क्योंकि उसे तो नई मां से अत्यधिक बैर था. फिर वह ये बात कैसे बरदाश्त करती…?

यह जान कर निशा अत्यधिक दुखी और शर्मिंदा थी. उस ने साहस कर के मां को फोन मिलाया.

उधर से मां की प्यारी सी आवाज आई,” बेटा, रिश्तों को सहेजने की कोई उम्र नहीं होती. जब भी अवसर मिले, इन्हें संवार लो.”

शायद मां इस से आगे कुछ नहीं बोल पाई और इधर निशा मायके जाने की तैयारी में जुट गई, क्योंकि उधर ममता का आंगन बांह पसारे उस के इंतजार में था.

Emotional Story

हर भारतीय रसोई के दिल में Glen- जहाँ स्वाद, सुविधा और सुकून एक साथ पकते हैं

Glen: घर की रसोई वह जगह है जहाँ दिन की शुरुआत होती है और अगर रसोई सुविधाजनक, सुकून भरी और स्मार्ट हो तो हर दिन थोड़ा आसान लगने लगता है. यही सोच लेकर ग्लेन  पिछले कई दशकों से भारतीय रसोई को आधुनिक बना रहा है. आज की भारतीय महिला सिर्फ खाना नहीं बनाती – वो अपनी रसोई में अपना स्टाइल, अपना प्यार और अपनी पहचान भी परोसती है. वह चाहती है कि उसकी रसोई उतनी ही खूबसूरत और फ़ंक्शनल हो जितनी उसकी सोच और ग्लेन उसी भावना को साकार करता है. जहाँ हर उपकरण डिज़ाइन, टेक्नॉलॉजी और केयर का मेल है.

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Glen

Family Story in Hindi: शिकायतनामा

Family Story in Hindi: देर शाम अनुष्का का फोन आया. कामधाम से खाली होती तो अपने पिता विश्वनाथ को फोन कर अपना दुखसुख अवश्य साझ करती. शादी के 3 साल हो गए, यह क्रम आज भी बना हुआ था. पिता को बेटियों से ज्यादा लगाव होता है, जबकि मां को बेटों से. इस नाते अनुष्का निसंकोच अपनी बात कह कर जी हलका कर लेती.

‘‘पापा, आज फिर ये जोरजोर से चिल्लाने लगे,’’ अनुष्का ने अपने पति कृष्णा का जिक्र किया.

‘‘क्यों?’’ विश्वनाथ निर्विकार भाव से बोले.

‘‘इसी का जवाब मैं खोज रही हूं.’’ कह कर वह भावुक हो गई.

विश्वनाथ का जी पसीज गया. विश्वनाथ उन पिताओं जैसे नहीं थे जो बेटी का विवाह कर के गंगा नहा लेते थे. वे उन पिताओं सरीखे थे जिन्हें अपनी बेटी का दुख भारी लगता. तनिक सोच कर बोले, ‘‘उन की बातों को ज्यादा तवज्जुह मत दिया करो. अपने काम से काम रखो.’’

जब भी अनुष्का का फोन आता वे उसे धैर्य और बरदाश्त करने की सलाह देते. विश्वनाथ की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने अपनी तरफ से कभी बेटियों को निराश नहीं किया. उन की बात पूरी लगन से सुनते. वे चाहते तो कह सकते थे कि यह तुम दोनों का आपसी मामला है. बारबार फोन कर के मु?ो परेशान मत किया करो. ज्यादातर पिताओं की यही भूमिका होती है. बेटियों की शादी कर दी तो अपने बेटाबहू में रम गए.

विश्वनाथ की 3 बेटियां थीं और एक बेटा. उन्होंने बेटेबेटियों में कोई फर्क नहीं किया. अमूमन लोग बेटियों को बोझ समझते हैं. इस के विपरीत विश्वनाथ को लगता, उन की बेटियां ही उन की ताकत हैं. उन की पत्नी कौशल्या की सोच उन से इतर थी. उन्हें अपना बेटा ही हीरा लगता. वे बेटियों को जबतब कोसती रहतीं. विश्वनाथ को बुरा लगता. इसी बात पर तूतूमैंमैं शुरू हो जाती.

विश्वनाथ का जीवन अभावपूर्ण था. बड़े संघर्षों से गुजर कर उन्होंने अपनी औलादों को पढ़ालिखा कर इस लायक बनाया कि वे अपने पैरों पर खडे़ हो गए. बड़ी बेटी की शादी से वे खुश नहीं थे क्योंकि दामाद का कामधाम कोई खास नहीं था. वे अच्छी तरह जानते थे कि उन की कामाऊ बेटी की बदौलत ही गृहस्थी की गाड़ी चलेगी. उन की मजबूरी थी. कहां से अच्छे वर के लिए दहेज ले आते? बेटी की शक्लसूरत कोई खास नहीं थी. हां, पढ़ने में तेज जरूर थी. पहली से निबटे तो दूसरी अनुष्का आ गई. सब बेटियों में 2 से 3 साल का फर्क था. अनुष्का देखनेसुनने के साथ पढ़ने में भी होशियार थी. उस ने साफसाफ कह दिया कि वह किसी भी सूरत में प्राइवेट नौकरी वाले लड़के से शादी नहीं करेगी. सब चिंता में पड़ गए. कहां से लड़का ढूंढे़ं.

ऐसे में उन के बड़े दामाद ने कृष्णा का जिक्र किया. वह सरकारी नौकरी में था. देखने में ठीकठाक था. रही पढ़ाई तो वह अनुष्का की तुलना में औसत दर्जे का था तो भी क्या? सरकारी नौकरी थी. जिस आर्थिक अनिश्चितता के दौर से विश्वनाथ का परिवार गुजरा, उस से तो मुक्ति मिलेगी. यही सब सोच कर विश्वनाथ इस रिश्ते के लिए अपने दामाद की मनुहार करने लगे. साथसाथ, उन्होंने अपनी तीसरी बेटी के लिए भी सरकारी नौकरी वाले वर से करने का मन बना लिया.

लड़के को अनुष्का पसंद आ गई. दहेज पर मामला रुका तो विश्वनाथ ने साफसाफ कह दिया कि उन की औकात ज्यादा कुछ देने की नहीं है. सांवले रंग के कृष्णा को जब गोरीचिट्टी अनुष्का मिली तो वह न न कर सका. इस के पहले उस ने काफी लड़कियां देखीं. किसी की पढ़ाई पसंद आती तो रूपरंग मनमाफिक न मिलता. रूपरंग होता तो पढ़ाई साधारण रहती. यहां सब था. नहीं था तो दहेज की रकम. कृष्णा को लगा अब अगर और छानबीन में लगा रहेगा तो उम्र निकल जाएगी, ढंग की लड़की न मिलेगी. लिहाजा, उसे भी गरज थी. शादी संपन्न हो गई.

अनुष्का फूले नहीं समा रही थी. उस ने जो चाहा वह मिल गया. बिना आर्थिक किचकिच के जिंदगी आसानी से कटेगी. शादी होते ही वह जयपुर घूमने निकल गई. बड़ी बहन लतिका को तकलीफ हुई. वह सोचने लगी, आज उस का भी पति ऐसी ही नौकरी में होता तो वह भी वैवाहिक जीवन की इस प्रथम पायदान पर चढ़ कर जिंदगी का लुत्फ उठाती.

दोनों के विवाह का शुरुआती दौर बिना किसी शिकवाशिकायत के कटा. अनुष्का इस रिश्ते से निहाल थी. वहीं कृष्णा को लगा, उस ने जैसा चाहा उसे मिल गया. इस बीच, वह एक बेटे की मां बनी.

कृष्णा में एक खामी थी. उसे रुपए से बहुत मोह था. घरगृहस्थी के लिए खर्च करने में कोई कोताही नहीं बरतता तो भी बिना मेहनत के धन ही मिल जाए तो हर्ज ही क्या है. इसी लालच में उस ने अपना काफी रुपया शेयर में लगा दिया. अनुष्का ने एकाध बार टोका. मगर कृष्णा ने नजरअंदाज कर दिया.

एक दिन तो हद हो गई, कहने लगा, ‘मेरा रुपया है, जहां भी खर्च करूं.’

कृष्णा को ऐसे तेवर में देख कर अनुष्का सहम गई. एकाएक उस के व्यवहार में आए परिवर्तन ने उसे असहज कर दिया. उस का मन खिन्न हो गया. मारे खुन्नस कृष्णा से बोली नहीं. कृष्णा की आदत थी, जल्द ही सामान्य हो जाता. वहीं अनुष्का के लिए आसान न था. चूंकि यह पहला अवसर था, इसलिए अनुष्का ने भी अपनी तरफ से भूलना मुनासिब सम?ा. मगर कब तक. जल्द ही उसे लगा कि कृष्णा अपने मन के हैं, उन्हें सम?ाना आसान नहीं. इस बीच, शेयर के भाव बुरी तरह से नीचे आ गए और उस के लाखों रुपए डूब गए. सो, अनुष्का को कहने का मौका मिल गया.

कृष्णा बुरी तरह टूट गया. परिणामस्वरूप, उस के स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ गया. हालांकि उस की तनख्वाह कम न थी. तो भी, 10 साल की कमाई पानी में बह जाए तो क्या उसे भूल पाना आसान होगा? वह भी ऐसे आदमी के लिए जो बिना मेहनत अमीर बनने की ख्वाहिश रखता हो. कृष्णा अनमना सा रहने लगा. उस का किसी काम में मन न लगता. कब क्या बोल दे, कुछ कहा न जा सकता था. कभीकभी तो बिना बात के चिल्लाने लगता. आहिस्ताआहिस्ता यह उस की आदत में शामिल होता गया.

अनुष्का पहले तो लिहाज करती रही, बाद में वह भी पलट कर जवाब देने लगी. बस, यहीं से आपसी टकराव बढ़ने लगे. अनुष्का का यह हाल हो गया कि अपनी जरूरतों के लिए कृष्णा से रुपए मांगने में भी भय लगता. इसलिए अनुष्का ने अपनी जरूरतों के लिए एक स्कूल में नौकरी कर ली. स्कूल से पढ़ा कर आती तो बच्चों को टयूशन पढ़ाती. इस तरह उस के पास खासा रुपया आने लगा. अब वह आत्मनिर्भर थी.

अनुष्का जब से नौकरी करने लगी तो घर के संभालने की जिम्मेदारी कृष्णा के ऊपर भी आ गई. अनुष्का को कमाऊ पत्नी के रूप में देख कर कृष्णा अंदर ही अंदर खुश था, मगर जाहिर होने न देता. अनुष्का जहां सुबह जाती, वहीं कृष्णा 10 बजे के आसपास. इस बीच उसे इतना समय मिल जाता था कि चाहे तो अस्तव्यस्त घर को ठीक कर सकता था मगर करता नहीं. वजह वही कि वह मर्द है. एक दिन अनुष्का से रहा न गया, गुस्से में कृष्णा का उपन्यास उसी के ऊपर फेंक दिया.

‘यह क्या बदतमीजी है?’ कृष्णा की त्योरियां चढ़ गईं.

‘घर को सलीके से रखने का ठेका क्या मैं ने ही ले रखा है. आप की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती,’ अनुष्का ने तेवर कड़े किए.

‘8 घंटे डयूटी दूं कि घर संभालूं,’ कृष्णा का स्वर तल्ख था.

‘नौकरी तो मैं भी करती हूं. क्या आप अपना काम भी नहीं कर सकते? बड़े जीजाजी को देखिए. कितना सहयोग दीदी का करते हैं.’

‘उन के पास काम ही क्या है. बेकार आदमी, घर नहीं संभालेगा तो क्या करेगा?’

‘आप से तो अच्छे ही हैं. कम से कम अपने परिवार के प्रति समर्पित हैं.’

‘मैं कौन सा कोठे पर जाता हूं?’ कृष्णा चिढ़ गया.

‘औफिस से आते ही टीवी खोल कर बैठ जाते है. न बच्चे को पढ़ाना, न ही घर की दूसरी जरूरतों को पूरा करना. मैं स्कूल भी जाऊं, टयूशनें भी करूं, खाना भी बनाऊं,’ अनुष्का रोंआसी हो गई.

‘मत करो नौकरी, क्या जरूरत है नौकरी करने की,’ कृष्णा ने कह तो दिया पर अंदर ही अंदर डरा भी था कि कहीं नौकरी छोड़ दी तो आमदनी का एक जरिया बंद हो जाएगा.

‘जब से शेयर में रुपया डूबा है, आप रुपए के मामले में कुछ ज्यादा ही कंजूस हो गए हैं. अपनी जरूरतों के लिए मांगती हूं तो तुरंत आप का मुंह बन जाता है. ऐसे में मैं नौकरी न करूं तो क्या करूं,’ अनुष्का ने सफाई दी.

‘तो मुझ से शिकायत मत करो कि मैं घर की चादर ठीक करता फिरूं.’

कृष्णा के कथन पर अनुष्का को न रोते बन रहा था न हंसते. कैसे निष्ठुर पति से शादी हो गई. उसे अपनी पत्नी से जरा भी सहानुभूति नहीं, सोच कर उस का दिल भर आया.

कृष्णा की मां अकसर बीमार रहती थी. अवस्था भी लगभग 75 वर्ष से ऊपर हो चली थी. अब न वह ठीक से चल पाती, न अपनी जरूरतों के लिए पहल कर पाती. उस का ज्यादा समय बिस्तर पर ही गुजरता. कृष्णा को मां से कुछ ज्यादा लगाव था. उसे अपने पास ले आया.

अनुष्का को यह नागवार लगा. उन के 3 और बेटे थे. तीनों अच्छी नौकरी में थे. अपनीअपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो आराम की जिंदगी गुजार रहे थे. अनुष्का चाहती थी कि वह उन्हीं के पास रहे. वह घर देखे कि बच्चे या नौकरी. वहीं उन के तीनों बेटों के बहुओं के पास अतिरिक्त कोई जिम्मेदारी न थी. वे दिनभर या तो टीवी देखतीं या फिर रिश्तेदारी का लुत्फ उठातीं.

अनुष्का ने कुछ दिन अपनी सास की परेशानियों को झेला, मगर यह लंबे समय तक संभव न था. एक दिन वह मुखर हो गई, ‘आप माताजी को उन के अन्य बेटों के पास छोड़ क्यों नहीं देते?’

‘वे वहां नहीं रहेंगी?’ कृष्णा ने दोटूक कहा.

‘क्यों नहीं रहेंगी? क्या उन का फर्ज नहीं बनता?’ अुनष्का का स्वर तल्ख था.

‘मैं तुम्हारी बकवास नहीं सुनना चाहता. तुम्हें उन की सेवा करनी हो तो करो वरना मैं सक्षम हूं’

‘खाक सक्षम हैं. कल आप नहीं थे, बिस्तर गंदा कर दिया. मुझे ही साफ करना पडा.’

‘कौन सा गुनाह कर दिया. वे तुम्हारी सास हैं.’

‘यह रोजरोज का किस्सा है. आप उन की देखभाल के लिए एक आया क्यों नहीं रख लेते?’ आया के नाम पर कृष्णा कन्नी काट लेता. एक तरफ खुद जिम्मेदारी लेने की बात करता, दूसरी तरफ सब अनुष्का पर छोड़ कर निश्ंिचत रहता. जाहिर है, वह आया पर रुपए खर्च करने के पक्ष में नहीं था. शेयर में लाखों रुपए डुबाना उसे मंजूर था मगर मां के लिए आया रखने में उसे तकलीफ होती.

कंजूसी की भी हद होती है. रात अनुष्का, पिता विश्वनाथ को फोन कर के सुबकने लगी, ‘‘पापा, आप ने कैसे आदमी से मेरी शादी कर दी. एकदम जड़बुद्वि के हैं. मेरी सुनते ही नहीं.’’ फिर एक के बाद एक उस ने सारा किस्सा बयां कर दिया. सब सुन कर विश्वनाथ को भी तीव्र क्रोध आया. मगर चुप रहे यह सोच कर कि बेटी है.

‘‘तुम से जितना बन पड़ता है, करो,’’ पिता विश्वनाथ का स्वर तिक्त था.

‘‘सास को यहां लाने की क्या जरूरत थी? 3 बेटे अच्छी नौकरियों में हैं. सब अपनेअपने बेटेबेटियों की शादी कर के मुक्त हैं. क्या अपनी मां को नहीं रख सकते थे? यहां कितनी दिक्कत हो रही है. किराए का मकान. वह भी जरूरत के हिसाब से लिए गए कमरे जबकि उन तीनों बेटों के निजी मकान हैं. आराम से रह सकती थीं वहां.’’

‘‘अब मैं उन की बुद्वि के लिए क्या कहूं’’ विश्वनाथ ने उसांस ली.

गरमी की छुट्टियां हुईं. अनुष्का अपने बेटे को ले कर मायके आई. कृष्णा उसे मायके पहुंचा कर अपने भाईयों से मिलने चला गया. ससुराल में रुकने को वह अपनी तौहीन सम?ाता. भाईयों का यह हाल था कि वे सिर्फ कहने के भाई थे, कभी दुख में झंकने तक नहीं आते. इतनी ही संवेदनशीलता होती तो जरूर अपनी मां की खोजखबर लेते. वे सब इसी में खुश थे कि अच्छा हुआ, कृष्णा ने मां को अपने पास रख लिया. अब आराम से अपनीअपनी बीवियों के साथ सैरसपाटे कर सकेंगे.

दो दिनों बाद कृष्णा अनुष्का को छोड़ कर इंदौर अपनी नौकरी पर चला गया. मां को दूसरे के भरोसे छोड़ कर आया था, इसलिए उस का वापस जाना जरूरी था. बातचीत का दौर चलता तो जब भी समय मिलता अनुष्का अपना दुखड़ा ले कर विश्वनाथ के पास बैठ जाती.

एक दिन विश्वनाथ से रहा न गया, बोले, ‘‘तुम यहीं रह जाओ. कोई जरूरत नहीं है उस के पास जाने की.’’

अनुष्का ने कोई जवाब नहीं दिया. बगल में खड़ी अनुष्का की मां कौशल्या से रहा न गया, ‘‘आप भी बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देते हैं.’’ अनुष्का की चुप्पी बता रही थी कि यह न तो संभव था न ही व्यावहारिक. भावावेश में आ कर भले ही पिता विश्वनाथ ने कह दिया हो मगर वे भी अच्छी तरह जानते थे कि बेटी का मायके में रहना आसान नहीं है. फिर पतिपत्नी के रिश्ते का क्या होगा? अगर ऐसा हुआ तो दोनों के बीच दूरियां बढ़ेंगी जिसे बाद में पाट पाना आसान न होगा.

अनुष्का की आंखें भर आईं. उसे लग रहा था वह ऐसे दलदल में फंस गई है जहां से निकल पाना आसान न होगा. आज उसे लग रहा था कि रुपयापैसा ही महत्त्वपूर्ण नहीं, बल्कि आदमी का व्यावहारिक व सुलझा हुआ होना भी जरूरी है. पिता विश्वनाथ को आदर्श मानने वाली अनुष्का को लगा, पापा का सुलझपन ही था जो तमाम आर्थिक परेशानियों के बाद भी उन्होंने हम सब भाईबहनों को पढ़ालिखा कर इस लायक बनाया कि समाज में सम्मान के साथ जी सकें. वहीं, कृष्णा के पास रुपयों के आगमन की कोई कमी नहीं तिस पर उन की सोच हकीकत से कोसों दूर है.

पिता विश्वनाथ की जिंदगी आसान न थी. सीमित आमदनी, उस पर 3 बेटियों ओैर एक बेटे की परवरिश. वे अपने परिवार को ले कर हमेशा चिंतित रहते. मगर जाहिर होने न देते. उन के लिए औलाद ही सबकुछ थी. पत्नी कौशल्या जबतब अपनी बेटियों को डांटतीफटकारती रहती जिस को ले कर पतिपत्नी में अकसर विवाद होता. बेटियों का कभी भी उन्होंने तिरस्कार नहीं किया. उन का लाड़प्यार उन पर हमेशा बरसता रहता. इसलिए बेटियां उन के ज्यादा करीब थीं. यही वजह थी कि बेटियां आज भी अपने पिता को अपना आदर्श मानतीं. जब बेटा हुआ तो मां कौशल्या का सारा प्यार उसी पर उमड़ने लगा. यह अलग बात थी कि जब उन की तीनों बेटियां अपने पैरों पर खड़ी हो गईं तो उन की नजर उन के प्रति सीधी हो गई.

एक महीना रहने के बाद अनुष्का कृष्णा के पास वापस इंदौर जाने की तैयारी करने लगी तो अचानक एक शाम विश्वनाथ को क्या सूझ, कहने लगे, ‘‘क्या तुम्हारी मां मुझ से खुश थीं?’’ सुन कर क्षणांश वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई. अनुष्का ने मां की तरफ देखा. उन की आंखें सजल थीं. मानो अतीत का सारा दृश्य उन के सामने तैर गया हो. वे आगे बोले, ‘‘जब वह मुझ से खुश नहीं थी तो तुम कैसे अपने पति से अपेक्षा कर सकती हो वह हमेशा तुम्हें खुश रखेगा?’’

पिता की बेबाक टिप्पणी पर अनुष्का को कुछ कहते नहीं बन पड़ा. वह तो अपने पिता को आदर्श मानती थी. वह तो यही मान कर चलती थी कि उस के पिता समान कोई हो ही नहीं सकता. बेशक पिता के रूप में वे सफल थे मगर क्या पति के रूप में भी वे उतने ही सफल थे? क्या उन्होंने हमेशा वही किया जो कौशल्या को पसंद था? शायद नहीं.

वे आगे बोलते रहे, ‘‘यह लगभग सभी के साथ होता है. पत्नी अपने पति से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा करती है पर खुशी का पैमाना क्या है? क्या कृष्णा शराबी या जुआरी है? कामधाम नहीं करता या मारतापीटता है? सिर्फ विचारों और आदतों की भिन्नता के कारण हम किसी को नापंसद नहीं कर सकते? जब एक गर्भ से पैदा भाईयों में मतभेद हो सकते हैं तो पतिपत्नी में क्यों नहीं.’’

अनुष्का को अपने पिता से यह उम्मीद न थी. उन के व्यवहार में आए परिवर्तन ने उसे असहज बना दिया. अभी तक उसे यही लग रहा था कि कृष्णा जो कुछ कर रहा है वह एक तरह से उस पर मनोवैज्ञानिक अत्याचार था. उन के कथन ने एक तरह से उसे भी कुसूरवार बना दिया. आहत मन से बोली, ‘‘पापा, जब ऐसी बात थी तो फिर आप ने मुझ क्यों मायके में ही रहने की सलाह दी?’’

वे किंचिंत भावुक स्वर में बोले, ‘‘एक पिता के नाते तुम्हारा दुख मेरा था. पुत्रीमोह के चलते मैं ने तुम्हें यहां रहने की सलाह दी. मगर यह व्यावहारिक न था. काफी सोचविचार कर मुझे लगा कि शायद मैं तुम्हें गलत रास्ते पर चलने की नसीहत दे रहा हूं. बड़ेबुजर्ग का कर्तव्य है कि पतिपत्नी के बीच की गलतफहमियां अपने अनुभव से दूर करें, न कि आवेश में आ कर दूरियां बढ़ा दें, जो बाद में आत्मघाती सिद्ध्र हो.’’

अनुष्का पर पिता विश्वनाथ की बातों का असर पड़ा. उस ने मन बना लिया कि अब से वह कृष्णा को भी समझने की कोशिश करेगी.

Family Story in Hindi

हेयर स्ट्रैटनिंग और स्मूदिंग में क्या अंतर है

Hair straightening and Smoothening: लंबे, सीधे व खूबसूरत बाल हर किसी को पसंद होते हैं, लेकिन आज की बिजी लाइफ में इतना समय नहीं होता है कि आप बालों की अच्छे से केयर कर सकें. सब से ज्यादा मुश्किल तब होती है जब आप के बाल कर्ली या फ्रिजी हों.

कर्ली बालों को सीधा करने के लिए हम हेयर स्मूदनिंग या स्ट्रैटनिंग की मदद ले रहे हैं. इन सब तकनीक के साथ हम बालों का ट्रीटमैंट तो करवा लेते हैं लेकिन इस के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती है. कई बार आप तीनों ट्रीटमैंट को एक ही समझ लेते हैं लेकिन इन में काफी अंतर होता है. इसलिए बालों के लिए यह ट्रीटमैंट लेने से पहले जानें कि हेयर स्ट्रैटनिंग और स्मूदिंग क्या है.

हेयर स्ट्रैटनिंग और स्मूदिंग में क्या अंतर है

क्या है हेयर स्मूदनिंग : हेयर स्मूदनिंग यानि बालों को स्ट्रैट करना है. यह कर्ली, वेवी या फ्रिजी बालों की परमानैंट हेयर स्ट्रैटनिंग के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला सैलून ट्रीटमैंट है. अगर आप के बाल स्ट्रैट हैं और थोड़े फ्रिजी हो गए हैं तो यह ट्रीटमैंट आप के लिए ही है. इस से आप के बाल और भी ज्यादा सीधे और शाइनी हो जाते हैं. स्मूदनिंग के अंदर बालों पर कई तरह की क्रीम का इस्तेमाल किया जाता है और बालों को स्मूद बनाया जाता है. स्मूदनिंग करवाने से आप के बाल और भी अधिक स्मूद और सिल्की हो जाते हैं.

इसे करने का क्या तरीका है

इस में बालों को फौर्मेल्डिहाइड सोल्यूशन में सैचुरेट किया जाता है. सैचुरेशन के बाद इन्हें हीटिंग आयरन से स्ट्रैट कर के सुखाया जाता है. आसान भाषा में कहें तो इस में केरेटिन ट्रीटमैंट का इस्तेमाल किया जाता है, जिस में बालों की बाहरी सतह पर एक प्रोटीन कोटिंग दी जाती है. इस प्रक्रिया में बालों को हलकी हीट और कैमिकल्स के जरीए सौफ्ट और फ्रिज-फ्री बनाया जाता है. इस के बाद बाल स्वाभाविक रूप से सिल्की लगते हैं. यह बालों का प्राकृतिक लुक बनाए रखता है. लेकिन ध्यान रखें कि फौर्मेल्डिहाइड को किसी ऐक्सपर्ट के सुपरविजन में ही इस्तेमाल करना चाहिए.

यह हेयर रिबौंडिंग से ज्यादा बेहतर औप्शन है. हेयर स्मूदनिंग 6 से आठ महीनों तक बनी रहती है. मार्केट में हेयर स्मूदनिंग प्राइस ₹8 हजार से शुरू है. यह कास्ट बालों की लंबाई पर निर्भर करता है. इस प्रक्रिया में कई तरह के कैमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन यह बालों को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

क्या है स्ट्रैटनिंग

अगर आप के बाल घुंघराले या फिर काफी फ्रिजी हैं तो आप इसे ट्राई कर सकते हैं. यह एक तरीके से परमानैंट हेयर फिक्सिंग है, क्योंकि एक बार रिबौंडिंग कराने के बाद आप के बाल लगभग 1 साल तक स्ट्रैट रहते हैं.

इस का एक नुकसान भी है. इस प्रक्रिया में कैमिकल से आप के बालों के अंदर तक जा कर हेयर स्ट्रक्चर को तोड़ देते हैं, जिस से बाल काफी कमजोर हो जाते हैं. इस पूरे प्रोसेस में लगभग 4 से 5 घंटे का समय लगता है.

इसे करने का क्या तरीका है

हेयर स्ट्रैटनिनंग में हेयर रीबिल्डिंग होती है. इस में जो कैमिकल्स इस्तेमाल किए जाते हैं वे बालों के शैफ्ट के बौंड को हमेशा के लिए तोड़ देते हैं. इन्हें हीट कर के फिर से बनाया जाता है. इस के बाद जो नए बौंड बनते हैं उन्हें जोड़ने के लिए कैमिकल न्यूट्रलाइजर लगाया जाता है. इसे थर्मल रिकंडिशनिंग भी कहते हैं. यह नए बौंड को सैट करता है. इस के बाद बाल एकदम सिल्की और पिन-स्ट्रेट दिखते हैं.

स्ट्रैटनिंग और स्मूदनिंग में क्या है अंतर

स्मूदनिंग और रिबौंडिंग में बस इतना फर्क है कि स्मूदनिंग ट्रीटमैंट आप के बालों के स्ट्रक्चर को नहीं बदलते हैं यानि कि ये आप के बालों को पूरी तरह स्ट्रैट नहीं बनाते हैं. अगर आप के बाल वेवी हैं तो वो वैसे ही रहेंगे बस पहले के मुकाबले ज्यादा स्मूद और सिल्की हो जाएंगे.

हेयर स्ट्रेटनिंग और स्मूदिंग में से क्या करना ठीक रहता है

स्ट्रेट या वेवी बालाें के लिए स्मूदिंग बेहतरीन ट्रीटमैंट है लेकिन अगर आप के बाल ज्यादा कर्ली, माेटे या घने हैं ताे आप रिबौंडिंग करवा सकते हैं. अगर आप एकदम स्ट्रैट बाल चाहती हैं, तो स्ट्रैटनिंग सही विकल्प है. अगर आप नैचुरल और फ्रिज-फ्री बाल चाहते हैं, तो स्मूदनिंग का चयन करें.

अब अपनी बालों की स्थिति और जरूरत के अनुसार फैसला लें. इस का असर कम से कम 6-7 महीने तक दिख सकता है.

इन्हें करवाने से पहले किन बातों का ध्यान रखें

-बालों को कौंब करने के लिए चौड़े कौंब का यूज करें. इस से बाल उलझेगें नहीं.

-हेयर स्मूदनिंग के बाद पार्लर वाले खुद ही शैंपू बताते हैं कि कौन सा यूज करना है. इस के शैंपू और कंडीशनर आते हैं. हो सके तो अपने हेयर ऐक्सपर्ट से अच्छे हेयर प्रोडक्ट के बारे में सलाह लें. शैंपू के बाद कंडीशनर और सीरम लगाना न भूलें.

-यदि दोमुंहे बाल आना शुरू हो जाएं तो उन्हें कट करवा दें.

-4 महीने तक बालों में मेहंदी या हेयर कलर का उपयोग न करें.

-ये ट्रीटमैट करवाने के बाद बालों को बहुत कस कर न बांधें.

-बालों को धूल, गंदगी, बारिश और धूप से बचने की कोशिश करें.

इन ट्रीटमैंट्स को करवाने के बाद आप अपने बालों का खास ध्यान रखें. साथ ही, ट्रीटमैंट के बाद आप को बालों पर केराटिन हेयर स्पा करवाना चाहिए.

केराटिन में बालों पर कम समय तक रहती है और स्मूदनिंग बालों पर अधिक समय तक की जाती है.

स्मूदनिंग केराटिन से ज्यादा महंगी होती है लेकिन बालों के लिए केराटिन ज्यादा अच्छी मानी जाती है.

Hair straightening and Smoothening

Lin Laishram: दिलचस्प रहा आर्चरी से फिल्मों तक का सफर

Lin Laishram: लिनथोइंगम्बी लैशराम यानि लिन लैशराम मणिपुर के इंफाल की रहने वाली हैं. वे एक पौपुलर मौडल, ऐक्ट्रैस और बिजनैस वूमन हैं. लिन ने ‘मैरी कौम’, ‘रंगून’, ‘उमरिका’, ‘ओम शांति ओम’ आदि कई फिल्मों में छोटी, मगर प्रभावशाली भूमिका निभाई है. लिन एक मौडल, अभिनेत्री और क्लाउड किचन की ओनर भी हैं.

खूबसूरत, हंसमुख, विनम्र लिन ने वर्ष 2008 में ‘मिस नौर्थ ईस्ट’ में अपने राज्य का प्रतिनिधित्व किया है और शिलांग में आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम उपविजेता रहीं. लिन लैशराम पहली मणिपुरी मौडल हैं, जिन्होंने नैशनल टैलीविजन पर स्विमसूट पहना था. इस के लिए उन के होम टाउन में कई विवाद हुए, लेकिन उन्होंने वही किया, जो उन्हें पसंद है.

ग्लैमर की इस दुनिया के अलावा लिन का टैलंट तीरंदाजी में भी है. लिन ने 10 साल की उम्र में अपने पिता चंद्रसेन लैशराम, जो मणिपुर आर्चरी एसोसिएशन के अध्यक्ष थे, उन से प्रेरित हो कर तीरंदाजी के क्षेत्र में कदम रखा। वे तीरंदाजी में जूनियर नैशनल चैंपियन भी रह चुकी हैं. चोट के कारण उन्होंने खेल से दूरी बना ली, लेकिन तीरंदाजी के प्रति उन का प्यार कभी खत्म नहीं हुआ. आज वे मणिपुर आर्चरी एसोसिएशन की प्रेसिडैंट हैं और अपने पति और अभिनेता रणदीप हुड्डा के साथ मिल कर दिल्ली आर्चरी टीम पृथ्वीराज योद्धास की को ओनर भी हैं, ताकि इस खेल को दिशा मिले और खेलप्रेमी इस ओर रुख करें.

उन्होंने खास गृहशोभा के साथ बात की। पेश हैं, कुछ खास अंश :

आर्चरी से है प्यार 

आर्चरी लीग की पहली बार को-पार्टनर और कपल के रूप में औनरशिप लेने की वजह से लिन बहुत खुश हैं। वे कहती हैं कि आर्चरी मेरे जीवन में काफी समय से महत्त्व रखता आया है। यह विधा मेरे लिए बहुत खास है, क्योंकि मैं ने इस खेल को करीब से देखा है और इस के ग्रोथ को देखना मुझे अच्छा लगता है। हालांकि इस की पौपुलैरिटी उतनी नहीं हुई है, जितनी होनी चाहिए थी, पर मैं इस दिशा में कुछ अच्छा करने की कोशिश कर सकती हूं.

जागरूकता की कमी

हालांकि तीरंदाजी हमारे देश में प्राचीनकाल से प्रचलित रहा है, लेकिन यह खेल के रूप में उतना फलाफूला नहीं। इस बारे में लिन का कहना है कि मैं इस बात से कुछ हद तक सहमत हूं कि आर्चरी हमारे रूट से जुड़ी हुई है, लेकिन इसे जो अटैंशन मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली है. फिर भी इंडिया ने लिंबा राम, डोला बनर्जी, रीना कुमारी, दीपिका कुमारी, लालरामथांगा, पूर्णिमा महातो, शीतल देवी, ऋषभ यादव आदि जैसे कई खिलाड़ियों ने देश के लिए मैडल्स जीते. बिना कुछ अच्छी व्यवस्था के इन सभी ने खुद के बलबूते पर अच्छा परफौर्मेंस दिया है. इस खेल में संघर्ष बहुत है, लेकिन उन का प्रदर्शन अच्छा रहता है.

महंगी है स्पोर्ट

इस के अलावा तीरंदाजी एक महंगी स्पोर्ट है और इस के लिए अच्छी मेंटरशिप और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है, जो भारत सरकार नहीं दे पा रही है. खासकर मणिपुर में, जहां बच्चे के जन्म के 5वें दिन, स्त्री के भाई को चारों दिशाओं में तीर मारना एक परंपरा है।

आर्चरी हमारे संस्कृति में है, जिसे महत्त्व देना जरूरी है, जिस में लीग, टीम को दूसरे देशों में जा कर खेलने पर खिलाड़ियों को मानसिक, शारीरिक और तकनीकी सपोर्ट मिलता है और मैं इसी पर काम कर रही हूं. क्रिकेट का खेल जो ब्रिटिश लोग यहां लाए थे, आज उसे ही अधिक प्रमुखता दी जाती है, जबकि यहां बहुत सारे ऐसे खेल हैं, जिसे नजरंदाज कर दिया जाता है.

बचपन मणिपुर में 

वे कहती हैं कि मैं मणिपुर से हूं और वहां हर गलीनुक्कड़ पर लोग कुछ न कुछ स्पोर्ट्स की प्रैक्टिस करते रहते हैं, जिसे लोग जानते भी नहीं हैं. सरकार की तरफ से इन खेलों में थोड़ा सहयोग और खेलों के प्रति लोगों की जागरूकता होना बहुत आवश्यक है. कई लोग आर्चरी की गेम को करते हुए घबरा जाते हैं और उन्हें लगता है कि उन्हें चोट लग जाएगी, जबकि ऐसा नहीं होता.

लड़कियां करती हैं अच्छा प्रदर्शन

लिन का कहना है कि तीरंदाजी के इस खेल में लड़कियां काफी हैं और वे वर्ल्ड चैंपियनशिप में अच्छा परफौर्म करती हैं। लड़के भी हैं और इस क्षेत्र में काफी स्ट्रौंग होते हैं. उन की इक्विपमैंट, तकनीक, प्रैक्टिस आदि सब स्ट्रौंग होता है. मेरे समय में भी अमेरिका और साउथ कोरिया के कोचेस आते रहे हैं, लेकिन ग्रासरूट लेवल पर काम होना अभी बाकी है, क्योंकि किसी भी गेम में आगे आने के लिए तकनीक मुख्य होता है.

इसलिए मेरा यंग एथलीट को अच्छी ट्रैनिंग और इक्विपमैंट देने की कोशिश करते रहना है, ताकि वे वर्ल्ड लेवल पर खुद को स्टैब्लिश कर सकें. जब मैं टाटा आर्चरी अकादमी में तीरंदाजी की ट्रैनिंग ले रही थी, मैं ने देखा है कि बिहार के आदिवासी बच्चे बहुत अच्छा तीरंदाजी करते थे, लेकिन उन्हें इक्वल औपरच्युनिटी नहीं मिलता, जिस से वे आगे नहीं बढ़ पाते, क्योंकि वे इस स्पोर्ट को अफोर्ड नहीं कर सकते.

आर्चरी से फिल्मों का सफर 

आर्चरी से फिल्मों में आने के बारे में पूछने पर लिन हंसती हुई बताती हैं कि फिल्मों में आने की मेरी कोई प्लानिंग नहीं थी. मेरे पिता स्पोर्ट पर्सन रहे हैं। वे आर्चरी एसोसिएशन की प्रेसिडेंट थे। बहुत सारे स्पोर्ट्स वे करते थे। बौलीवुड इंडस्ट्री, मौडलिंग, ऐक्टिंग से दूरदूर तक कोई नाता नहीं था. मेरे पेरैंट्स ने पढ़ाई के लिए मुंबई भेजा। मैं ने हाई स्कूल और कालेज की पढ़ाई मुंबई से की है। उसी समय मुझे ऐक्सपोजर मिला, क्योंकि मैं लंबी और इग्जौटिक दिखती थी। केश और स्किन अच्छे होने की वजह से मुझे काम मिलने लगा. मैं मध्यवर्गीय परिवार से हूं, इस क्षेत्र में आने के बारे में कोई प्लानिंग नहीं थी.

मैं ने अभी भी काम करना छोड़ा नहीं है, ब्रेक लिया है. शादी के बीच में मैं ने एक फिल्म ‘बन टिक्की’ की शूटिंग की है, जो अगले साल रिलीज होगी. इस में मेरे साथ अभिनेत्री शबाना आजमी, जीनत आमन और अभय देओल हैं। इस में मैं ने एक अलग भूमिका निभाई है. मैं ने अभी प्रोजैक्ट लेना बंद कर दिया है और शादी के बाद लाइफ को प्रायोरिटी दे रही हूं. रणदीप के साथ समय बिताने की कोशिश करती हूं, साथ ही एक प्रभावशाली भूमिका की तलाश में हूं. इस के लिए मैं ने एक व्यवसाय मुंबई में मणिपुरी क्लाउड किचन का शुरू किया है. इस में मेरा अधिक समय निकल जाता है.

रणदीप हुड्डा से मिलने के बारे में पूछने पर लिन कहती हैं कि मैं रणदीप से 14 साल पहले मोटली थिएटर ग्रुप में मिली थी। वहां वे सीनियर ऐक्टर थे और मैं ने उन के साथ कई नाटकों में काम किया है. धीरेधीरे हम दोस्त बने, एकदूसरे से अपनी बातें शेयर करने लगे. मुझे उन की फिल्में बहुत अच्छी लगती थीं. उन का काम करने का तरीका मुझे बहुत पसंद था. फ्रैंडशिप अच्छी थी। मैं अभिनय की बारीकियों के बारे में उन से चर्चा करती थी.

मुझे सीखने का बहुत जनून है और वे एक सच्चे इंसान हैं। इस से दोस्ती आगे बढ़ी और प्यार में बदल गई, फिर शादी हो गई.

वर्कलाइफ बैलेंस नहीं मुश्किल

वर्कलाइफ बैलेंस के बारे में लिन कहती हैं कि रणदीप बहुत व्यस्त रहते हैं। शूटिंग नहीं तो कुछ दूसरे इवेंट में जाते रहते हैं. ऐसे में मेरा बिजी रहना जरूरी है, ताकि मैं खुद खुश रह सकूं. फ्री हो कर जब हम मिलते हैं, तो एक अच्छा समय बिताते हैं, क्योंकि सिंगल होना और शादी के बाद लड़की के लिए चीजें काफी बदल जाती हैं, क्योंकि आप को एकदम से एक नए परिवार में जाना पड़ता है। ऐसे में अगर पतिपत्नी में अच्छा प्यार हो तो सब हो जाता है. मैं ने 30 साल में शादी की और अभी तो सालभर ही हुए हैं, लेकिन रिश्ता अच्छा बना रहे इस के लिए हम दोनों का ही सम्मिलित प्रयास रहता है। रणदीप एक डेडिकेटेड ऐक्टर हैं।

स्पेस देना जरूरी

मुझे याद है कि शादी के बाद रणदीप की फिल्म ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ की शूट हो रही थी, जिस में वे मुख्य भूमिका में थे. उन्होंने एक दिन मुझ से कहा था कि इस फिल्म में मेरी भूमिका काफी सीरियस है, लेकिन मुझ से शूटिंग नहीं हो पा रहा है, क्योंकि घर आ कर तुम्हें देखते ही मेरा चरित्र हिल जाता है. पहले तो मुझे समझ में नहीं आया कि वे कह क्या रहे हैं, क्योंकि तब उन्हें ‘जेल’ की शूटिंग करनी थी. फिर मैं समझी कि उन्हें इमोशन को पकड़ कर रखने में मुश्किल हो रही है. उन्होंने मुझ से पूछा कि क्या मैं होटल में रह कर इसे करूं, मैं तुरंत हां कर दी.

जब वे राइटिंग मोड में होते हैं, तो मैं उन्हें जरा भी डिस्टर्ब नहीं करती. यही स्पेस एकदूसरे को शादी के बाद ग्रो करने के लिए देना बहुत जरूरी है, ताकि रिश्ते में घुटन न हो. यहां एक आइडिया या एक ट्रिक कभी नहीं चलता. समझदारी, रिस्पैक्ट और प्यार ही इस रिश्ते को बनाए रखता है. मेरी इच्छा है कि दोनों साथ मिल कर किसी फिल्म में अभिनय करें.

आर्चरी में आगे आने के लिए लिन का संदेश है कि आजकल कई सारे एकेडमी है, जहां जा कर कोई भी इस खेल को सीख सकता है और आगे बढ़ सकता है. वहां जाएं, प्रशिक्षण लें और लीग में शामिल हों. इस के अलावा लाइफ में हर किसी को खुश रहने की आजादी है, उसे करें, हालांकि पूरा विश्व अभी अनरेस्ट है, लेकिन खुद कैसे जीना है, उसे हर व्यक्ति को समझना है, तभी सुखशांति विश्व में आएगी और इस की जिम्मेदारी हरेक इंसान के पास है.

Lin Laishram

Celebrity Divorce: टीवी का प्रसिद्ध शादीशुदा जोड़ा नील और ऐश्वर्या हुए अलग

Celebrity Divorce: प्रसिद्ध टीवी कपल शादी के 4 साल बाद तलाक लेकर हो रहे हैं अलग, वह टीवी कपल कोई और नहीं बल्कि प्रसिद्ध एक्टर नील भट्ट और उनकी एक्ट्रेस पत्नी ऐश्वर्या राय शर्मा है. काफी समय से इनकी तलाक और अलग होने की खबरें चर्चा में थी, लेकिन इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं था.

सिर्फ खबरें ही चल रही थी कि यह दोनों एक दूसरे से काफी समय से अलग रह रहे हैं दोनों में काफी खटपट चल रही है. लिहाजा हाल ही में जब नील और ऐश्वर्या की तलाक हो जाने की खबरें सामने आई तो सारी टीवी इंडस्ट्री आश्चर्यचकित रह गई, क्योंकि यह टीवी जोड़ा एक ऐसी जोड़ी थी जिन में बेइंतेहा प्यार था, और ये एक दूसरे के लिए मर मिटने को तैयार थे, अब दोनों ने तलाक की अर्जी कोर्ट में दाखिल कर दी है.

इन दोनों की तलाक के पीछे वजह क्या है यह अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन औफिशियली दोनों ने तलाक लेने का फैसला ले लिया है ये जग जाहिर हो गया है.

नील और ऐश्वर्या की मुलाकात सीरियल गुम है किसी के प्यार में के सेट पर हुई थी, वहीं से दोनों का प्यार परवान चढ़ा, और बाद में दोनों ने जल्द ही शादी भी कर ली. उनकी शादी में बौलीवुड की कई महान हस्तियां भी शामिल हुई थी. लेकिन लगता है कि दोनों के प्यार को किसी की नजर लग गई, सोशल मीडिया पर यह खबर सामने आने के बाद लोग यही कह रहे हैं कि इस प्यारी जोड़ी ने आखिरकार ऐसा फैसला क्यों लिया.

नील और ऐश्वर्या की जोड़ी ने 2023 में बिग बौस 17 में बतौर प्रतियोगी हिस्सा लिया था, उस दौरान भी यह जोड़ी अपनी प्यार और तकरार को लेकर चर्चा का विषय बनी हुई थी, इसके अलावा इस जोड़ी ने स्मार्ट जोड़ी में भी साथ काम किया था.

खबरों के अनुसार नील भट्ट को एक मिस्ट्री वूमेन के साथ भी देखा गया, जिसको उनके तलाक का कारण बताया गया, जबकि हाल ही में नील की मां ने एक इंटरव्यू में बताया कि तलाक की वजह ऐश्वर्या का गुस्सैल स्वभाव है, वे बहुत शॉर्ट टेंपर है, इसके के चलते दोनों में झगड़े शुरू हुए जो बहुत ज्यादा बढ़ गए.

जिसके बाद ऐश्वर्या शर्मा नील से झगड़ा होने के बाद हमेशा अपनी अकेले की फोटोज डालती है, दिवाली और करवा चौथ पर भी ऐश्वर्या ने अपनी फोटोज सोशल मीडिया में अकेले की ही डाली थी. उसके बाद से ही ऐश्वर्या और नील की तलाक की खबरें जोर पकड़ रही थी, लेकिन अब करीबी सूत्रों के अनुसार दोनों ने कोर्ट में तलाक की अर्जी देकर अलग होने का फैसला कर लिया है.

Celebrity Divorce

Wrinkles: सही देखभाल और रिंकल्स बायबाय 

Wrinkles: आजकल बहुत कम उम्र में चेहरे पर झुर्रियां आने लगती हैं. इस की वजह स्ट्रैस, धूप, प्रदूषण, धूम्रपान और खराब लाइफस्टाइल शामिल हैं. इस के अलावा कुछ लोगों में झुर्रियां आने की प्रवृत्ति आनुवंशिक भी हो सकती है. पहले 50 की उम्र के बाद चेहरे पर झुर्रियों के संकेत नजर आते थे, लेकिन अब 30 की उम्र से ही त्वचा बूढ़ी दिखने लगती है.

ब्यूटी ऐक्सपर्ट का मानना है कि बढ़ता प्रदूषण, तनाव, खानपान में गलतियां, सोनेउठने का गलत समय, ऐसी कई वजहें हैं जो हमें वक्त से पहले किसी व्यक्ति को वयस्क बना देती है. अगर समय रहते स्किन का सही ध्यान रखा जाए और लाइफस्टाइल में सुधार किया जाए, तो बढ़ती उम्र के संकेतों को रोका जा सकता है.

हालांकि उम्र का बढ़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन आप चाहें तो इसे कुछ सालों के लिए रोक सकते हैं, जिस में खास रिंकल्स को रोकना होता है. इस में पौष्टिक आहार, भरपूर पानी, हैल्दी लाइफस्टाइल, पर्याप्त नींद और नियमित योग व ऐक्सरसाइज इसे रोकने में काफी हद तक मददगार होते हैं.

उम्र बढ़ने की वजह से त्वचा का पतला होना और कोलेजन और इलास्टिन की कमी होना स्वाभाविक है. इस के अलावा, धूप में ज्यादा रहना, धूम्रपान, प्रदूषण, बारबार चेहरे के भाव (जैसे मुसकराना या आंखें सिकोड़ना) और आनुवंशिकी भी झुर्रियों के लिए जिम्मेदार हैं.

इस बारे में इंदौर के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी अस्पताल की डर्मेटोलौजिस्ट, डा. शीना कपूर कहती हैं कि उम्र के साथ त्वचा में कई प्रकार के बदलाव आने लगते हैं, जिन में सब से प्रमुख होता है रिंकल्स (झुर्रियों) का बनना. यह एक अनिवार्य जैविक प्रक्रिया है, जो हर महिला की त्वचा में समय के साथ दिखाई देती है, लेकिन कम उम्र में किसी को रिंकल्स आने पर वह दुखी हो जाता है.

आइए, जानते है रिंकल्स है क्या और इस का इलाज क्या है :

रिकल्स का कौमन नाम है झुर्रियां. रिंकल्स पतली या गहरी रेखाएं होती हैं, जो त्वचा की सतह पर बन जाती हैं. ये 2 प्रकार के होते हैं :

-फाइन रिंकल्स : छोटी और कम गहराई वाली रेखाएं होती हैं.

-कोर्स रिंकल्स : इन की चौड़ाई और गहराई अधिक होती है, सामान्यतया 1 मिमी से अधिक होती है.

रिंकल्स होने के प्रमुख कारण

-फिजिकल कारक

-उम्र के साथ कोलेजन और इलास्टिन प्रोटीन की मात्रा घटती है, जिस से त्वचा की इलास्टिसिटी कम होती जाती है.

-मेनोपौज के बाद ऐस्ट्रोजन स्तर में गिरावट से त्वचा रुखी और ढीली हो जाती है.

बाहरी कारक

-यूवी रेडिएशन की वजह से धूप में अधिक समय बिताने से त्वचा को फोटो डैमेज होता है.

-लाइफस्टाइल भी इस के लिए कम जिम्मेदार नहीं. धूम्रपान, शराब, तनाव और असंतुलित आहार रिंकल्स को तेजी से बढ़ाते हैं.

-इस के अलावा विटामिन, प्रोटीन और मिनरल्स की कमी भी त्वचा की सेहत को प्रभावित करती है.

जैनेटिक्स का होता है खास प्रभाव

जैनिटिकली विदेशी वूमन से भारतीय स्त्रियों में रिंकल्स का देर से दिखने की खास वजह यहां त्वचा में मेलानिन की मात्रा अधिक होना है, जो प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती है. यह उन्हें सूर्य की हानिकारक किरणों से फोटो डैमेज और स्किन कैंसर से बचाती है. इसी कारण भारतीय महिलाओं में रिंकल्स अपेक्षाकृत देर से और कम दिखाई देते हैं.

ऐंटी एजिंग थेरैपी और स्किन केयर

आज के समय में झुर्रियों को रोकने या कम करने के लिए कई प्रकार की ऐंटी एजिंग थेरैपीज उपलब्ध हैं, जो निम्न हैं :

-डेली स्किन केयर रूटीन : इस में सनस्क्रीन का काफी सहयोग होता है, एसपीएफ 30 या उस से अधिक सनस्क्रीन रोजाना लगाएं, भले ही आप घर के अंदर हों.

-माइल्ड क्लींजर और मोइस्चराइजर को अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार चुनें, ताकि स्किन बैरियर सुरक्षित रहे.

-टौपिकल ऐंटी औक्सीडैंट्स का प्रयोग कर सकते हैं, जैसे विटामिन सी, कौपर पेप्टाइड, क्रिएटिनिन और अल्फा हाइड्रौक्सी एसिड्स वाले सीरम त्वचा को पुनर्जीवित करने में मदद करते हैं, लेकिन ध्यान रखें कि किसी भी प्रोडक्ट के प्रयोग से पहले डर्मेटोलौजिस्ट की सलाह अवश्य लें.

ऐडवांस्ड कौस्मेटिक प्रोसीजर्स

डाक्टर कहती हैं कि ऐडवांस्ड कौस्मेटिक प्रोसीजर्स का भी प्रयोग डाक्टर की सलाह से ही करें, मसलन :

  1. बोटोक्स के प्रयोग से एसिटाइलकोलाइन को अवरुद्ध कर के मांसपेशियों को रिलैक्स करता है, जिस से झुर्रियां कम दिखती हैं.
  2. फिलर्स का काम गहरी झुर्रियों में भराव लाने के लिए प्रभावी होता है.
  3. कैमिकल पील्स में त्वचा की ऊपरी परत हटा कर नई, चिकनी त्वचा को उभरने में मदद करते हैं, इसे भी किसी ऐक्सपर्ट की सलाह से ही कराएं.
  4. लेजर थेरैपी (CO₂ Laser) में कोलेजन उत्पादन बढ़ा कर त्वचा को टाइट और स्मूद बनाता है.
  5. रेडियोफ्रीक्वैंसी थेरैपी एक नौन-इनवेंसिव तरीका है, जो फेसलिफ्टिंग और रिंकल रिडक्शन में मदद करता है.
  6. वैंपायर फेसलिफ्ट में रोगी के रक्त से प्लाज्मा निकाल कर चेहरे में इंजैक्ट किया जाता है, जिस से ग्रोथ फैक्टर्स फाइनलाइंस और स्किन टैक्स्चर को सुधारते हैं.

लाइफस्टाइल मौडिफिकेशन

संतुलित आहार लेने से भी रिंकल्स को कुछ हद तक रोका जा सकता है. ग्रीन वैजिटेबल्स, सीजनल फ्रूट्स और ऐंटी औक्सीडेंट से भरपूर भोजन झुर्रियों के लिए फायदेमंद है.

इस के अलावा पर्याप्त पानी पीएं. शरीर को हाइड्रेटेड रखें और त्वचा की चमक बनाए रखें. नियमित वर्कआउट और ऐक्सरसाइज करें, ताकि ब्लड सरकुलेशन बढ़े और स्किन की ग्लो बनी रहे.

मेकअप का सहारा

अगर आप के चेहरे पर थोड़ी झुर्रियां आ गई हों, तो मेकअप का सहारा ले सकती हैं, जो आप को फ्रैश फील करवाएगा. मसलन :

-हमेशा नौन-कौमेडोजैनिक और कैमिकल फ्री प्रोडक्ट्स का चयन करें.

-सोने से पहले चेहरा अच्छी तरह साफ करें.

-मेकअप से पहले मोइस्चराइजर जरूर लगाएं.

-रिंकल्स आजकल हर उम्र की स्त्रियों में दिखने लगा है, जो पहले उम्रदराज के ही होते थे, लेकिन सही स्किनकेयर, संतुलित आहार और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित ऐंटी-एजिंग थेरैपीज से इन्हें काफी हद तक रोका और नियंत्रित किया जा सकता है.

Wrinkles

Fictional Story: चावल पर लिखे अक्षर- क्या हुआ था सीमा के साथ

लेखक- डा. रंजना जायसवाल

Fictional Story: दशहरे की छुट्टियों के कारण पूरे 1 महीने के लिए वर्किंग वूमेन होस्टल खाली हो गया था. सभी लड़कियां हंसतीमुसकराती अपनेअपने घर चली गई थीं. बस सलमा, रुखसाना व नगमा ही बची थीं. मैं उदास थी. बारबार मां की याद आ रही थी. बचपन में सभी त्योहार मुझे अच्छे लगते थे. दशहरे में पिताजी मुझे स्कूटर पर आगे खड़ा कर रामलीला व दुर्गापूजा दिखाने ले जाते. दीवाली के दिन मां नाना प्रकार के पकवान बनातीं, पिताजी घर सजाते. शाम को धूमधाम से गणेशलक्ष्मी पूजन होता. फिर पापा ढेर सारे पटाखे चलाते. मैं पटाखों से डरती थी. बस, फुलझडि़यां ही घुमाती रहती. उस रात जगमगाता हुआ शहर कितना अच्छा लगता था. दीवाली के दिन यह शहर भी जगमगाएगा पर मेरे मन में तब भी अंधेरा होगा. 10 वर्ष की थी मैं जब मां का देहांत हो गया. तब से कोई भी त्योहार, त्योहार नहीं लगा. सलमा वगैरह पूछती हैं कि मैं अपने घर क्यों नहीं जाती? अब मैं उन्हें कैसे कहूं कि मेरा कोई घर ही नहीं.

मन उलझने लगा तो सोचा, कमरे की सफाई कर के ही मन बहलाऊं. सफाई के क्रम में एक पुराने संदूक को खोला तो सुनहरे डब्बे में बंद एक शीशी मिली. छोटी और पतली शीशी, जिस के अंदर एक सींक और रुई के बीच चावल का एक दाना चमक रहा था, जिस पर लिखा था, ‘नोरा, आई लव यू.’ मैं ने उस शीशी को चूम लिया और अतीत में डूबती चली गई. यह उपहार मुझे अनवर ने दिया था. दिल्ली के प्रगति मैदान में एक छोटी सी दुकान है, जहां एक लड़की छोटी से छोटी चीजों पर कलाकृतियां बनाती है. अनवर ने उसी से इस चावल पर अपने प्रेम का प्रथम संदेश लिखवाया था.

अनवर मेरे सौतेले बडे़ भाई के मित्र थे, अकसर घर आया करते थे. पिताजी की लंबी बीमारी, फिर मृत्यु के समय उन्होंने हमारी बहुत मदद की थी. भाई उन पर बहुत विश्वास करता था. वह उस के मित्र, भाई, राजदार सब थे पर भाई का व्यवहार मुझ से ठीक न था. कारण यह था कि पिताजी ने अपनी आधी संपत्ति मेरे नाम लिख दी थी. वह चाहता था कि जल्दी से जल्दी मेरी शादी कर के बाकी संपत्ति पर अधिकार कर ले. पर मैं आगे पढ़ना चाहती थी.

एक दिन इसी बात को ले कर उस ने मुझे काफी बुराभला कहा. मैं ने गुस्से में सल्फास की गोलियां खा लीं पर संयोग से अनवर आ गए. वह तत्काल मुझे अस्पताल ले गए. भाई तो पुलिस केस के डर से मेरे साथ आया तक नहीं. जहर के प्रभाव से मेरा बुरा हाल था. लगता था जैसे पूरे शरीर में आग लग गई हो. कलेजे को जैसे कोई निचोड़ रहा हो. उफ , इतनी तड़प, इतनी पीड़ा. मौत जैसे सामने खड़ी थी और जब डाक्टर ने जहर निकालने  के लिए नलियों का प्रयोग किया तो मैं लगभग बेहोश हो गई.

जब होश आया तो देखा अनवर मेरे सिरहाने उदास बैठे हुए हैं. मुझे होश में देख कर उन्होंने अपना ठंडा हाथ मेरे तपते माथे पर रख दिया. आह, ऐसा लगा किसी ने मेरी सारी पीड़ा खींच ली हो. मेरी आंखों से आंसू बहने लगे तो उन की भी आंखें नम हो आईं. बोले, ‘पगली, रोती क्यों है? उस जालिम की बात पर जान दे रही थी? इतनी सस्ती है तेरी जान? इतनी बहादुर लड़की और यह हरकत…?’

मैं ने रोतेरोेते कहा, ‘मैं अकेली पड़ गई हूं, कोई मेरे साथ नहीं है. मैं क्या करूं?’

वह बोले, ‘आज से यह बात मत कहना, मैं हूं न, तुम्हारा साथ दूंगा. बस, आज से इन प्यारी आंखों में आंसू न आने पाएं. समझीं, वरना मारूंगा.’

मैं रोतेरोते हंस पड़ी थी.

अनवर ने भाई को राजी कर मेरा एम.ए. में दाखिला करा दिया. फिर तो मेरी दुनिया  ही बदल गई. अनवर घर में मुझ से कम बातें करते पर जब बाहर मिलते तो खूब चुटकुले सुना कर हंसाते. धीरेधीरे वह मेरी जिंदगी की एक ऐसी जरूरत बनते जा रहे थे कि जिस दिन वह नहीं मिलते मुझे सूनासूना सा लगता था.

एक दिन मैं अपने घर में पड़ोसी के बच्चे के साथ खेल रही थी. जब वह बेईमानी करता तो मैं उसे चूम लेती. तभी अनवर आ गए और हमारे खेल में शामिल हो गए. जब मैं ने बच्चे को चूमा तो उन्होंने भी अपना दायां गाल मेरी तरफ बढ़ा दिया. मैं ने शरारत से उन्हें भी चूम लिया. जब उन्होंने अपने होंठ मेरी तरफ बढ़ाए तो मैं शरमा गई पर उन की आंखों का चुंबकीय आकर्षण मुझे खींचने लगा और अगले ही पल हमारे अधर एक हो चुके थे. एक अजीब सा थरथराता, कोमल, स्निग्ध, मीठा, नया एहसास, अनोखा सुख, होंठों की शिराओं से उतर कर विद्युत तरंगें बन रक्त के साथ प्रवाहित होने लगा. देह एक मद्धिम आंच में तपने लगी और सितार के कसे तारों से मानो संगीत बजने लगा. तभी भाई की चीखती आवाज से हमारा सम्मोहन टूट गया. अनवर भौचक्के से खड़े हो गए थे. भाई की लाललाल आंखों ने बता दिया कि हम कुछ गलत कर रहे थे.

‘क्या कर रही थी तू बेशर्म, मैं जान से मार डालूंगा तुम्हें,’ उस ने मुझे मारने के लिए हाथ उठाया तो अनवर ने उस का हाथ थाम लिया.

‘इस की कोई गलती नहीं. जो कुछ दंड देना हो मुझे दो.’

भाई चीखा, ‘कमीने, मैं ने तुझे अपना दोस्त समझा और तू…जा, चला जा…फिर कभी मुंह मत दिखाना. मैं गद्दारों से दोस्ती नहीं रखता.’

अनवर आहत दृष्टि से कुछ क्षण भाई को देखते रहे. कल तक वह उस के लिए आदर्श थे, मित्र थे और आज इस पल इतने बुरे हो गए. उन्होंने लंबी सांस ली और धीरेधीरे बाहर चले गए.

मेरा मन तड़पने लगा. यह क्या हो गया? अनवर अब कभी नहीं आएंगे. मैं ने क्यों चूम लिया उन्हें? वह बच्चे नहीं हैं? अब क्या होगा? उन के बिना मैं कैसे जी सकूंगी? मैं अपनेआप में इस प्रकार गुम थी कि भाई क्या कह रहा है, मुझे सुनाई ही नहीं दे रहा था.

उस घटना के कई दिन बाद अनवर मिले और मुझे बताया कि भाई उन्हें घर से ले कर आफिस तक बदनाम कर रहा है. उन के हिंदू मकान मालिक ने उन से कह दिया कि जल्द मकान खाली करो. आफिस में भी काम करना मुश्किल हो रहा है. सब उन्हें अजीब  निगाहों से घूरते हुए मुसकराते हैं, मानो वह कह रहे हों, ‘बड़ा शरीफ बनता था?’ सब से बड़ा गुनाह तो उन का मुसलमान होना बना दिया गया है. मुझे भाई पर क्रोध आने लगा.

अनवर बेहद सुलझे हुए, शरीफ, समझदार व ईमानदार इनसान के रूप में प्रसिद्ध थे. कहीं अनवर बदनामी के डर से कुछ कर  न बैठें, यही सोच कर मैं ने दुखी स्वर में कहा, ‘यह सब मेरी नासमझी के कारण हुआ, मुझे माफ कर दें.’ वह प्यार से बोले, ‘नहीं पगली, इस में तुम्हारा कोई दोष नहीं, दोष उमर का है. मैं ने ही कब सोचा था कि तुम से’…वाक्य अधूरा था पर मुझे लगा खुशबू का एक झोंका मेरे मन को छू कर गुजर गया है, मन तितली बन कर उस सुगंध की तलाश में उड़ने लगा.

अचानक उन्होंने चुप्पी तोड़ी, ‘सीमा, मुझ से शादी करोगी?’ यह क्या, मैं अपनेआप को आकाश के रंगबिरंगे बादलों के बीच दौड़तेभागते, खिल- खिलाते देख रही हूं. ‘सीमा, बोलो सीमा, क्या दोगी मेरा साथ?’ मैं सम्मोहित व्यक्ति की तरह सिर हिलाने लगी.

वह बोले, ‘मैं दिल्ली जा रहा हूं, वहीं नौकरी ढूंढ़ लूंगा…यहां तो हम चैन से जी नहीं पाएंगे.’

अनवर जब दिल्ली से लौटे थे तो मुझे चावल पर लिखा यह प्रेम संदेश देते हुए बोले थे, ‘आज से तुम नोरा हो…सिर्फ मेरी नोरा’…और सच  उस दिन से मैं नोरा बन कर जीने लगी थी.

अनवर देर कर रहे थे. उधर भाई की ज्यादतियां बढ़ती जा रही थीं. वह सब के सामने मुझे अपमानित करने लगा था. उस का प्रिय विषय ‘मुसलिम बुराई पुराण’ था. इतिहास और वर्तमान से छांटछांट उस ने मुसलमानों की गद्दारियों के किस्से एकत्र कर लिए थे और उन्हें वह रस लेले कर सुनाता. मुझे पता था कि यह सब मुझे जलाने के लिए कर रहा था. भाई जितनी उन की बुराई करता, उतनी ही मैं उन के नजदीक होती जा रही थी. हम अकसर मिलते. कभीकभी तो पूरे दिन हम टैंपो से शहर का चक्कर लगाते ताकि देर तक साथ रह सकें. अजीब दिन थे, दहशत और मोहब्बत से भरे हुए. उन की एक नजर, एक मुसकराहट, एक बोल, एक स्पर्श कितना महत्त्वपूर्ण हो उठा था मेरे लिए.

वह अपने प्रेमपत्र कभी मेरे घर के पिछवाडे़ कूडे़ की टंकी के नीचे तो कभी बिजली के खंभे के पास ईंटों के नीचे दबा जाते.

मैं कूड़ा फेंकने के बहाने जा कर उन्हें निकाल लाती. वे पत्र मेरे लिए दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्रेमपत्र होते थे.

उन्हें मेरा सतरंगी दुपट्टा विशेष प्रिय था, जिसे ओढ़ कर मैं शाम को छत पर टहलती और वह दूर सड़क से गुजरते हुए फोन पर विशेष संकेत दे कर अपनी बेचैनी जाहिर करते. भाई घूरघूर कर मुझे देखता और मैं मन ही मन रोमांचकारी खुशी से भर उठती.

एक दिन जब मैं विश्वविद्यालय से घर पहुंची तो ड्राइंग रूम से भाई के जोरजोर से बोलने की आवाज सुनाई दी. अंदर जा कर देखा तो धक से रह गई. अनवर सिर झुकाए खडे़ थे. अनवर को यह क्या सूझा? आखिर वही पागलपन कर बैठे न, कितना मना किया था मैं ने? पर ये मर्द अपनी ही बात चलाते हैं. इतना आसान तो नहीं है जातिधर्म का भेदभाव मिट जाना? चले आए भाई से मेरा हाथ मांगने, उफ, न जाने क्याक्या कहा होगा भाई ने उन्हें. भाई मुझे देख कर और भी शेर हो गया. उन का हाथ पकड़ कर बाहर की तरफ धकेलते हुए गालियां बकने लगा. मैं किंकर्तव्यविमूढ़ थी. बाहर कालोनी के कुछ लोग भी जमा हो गए थे. मैं तमाशा बनने के डर से कमरे में बंद हो गई. रात भर तड़पती रही.

दूसरे दिन शाम को किसी ने मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया. खोल कर देखा तो अनवर के एक मित्र थे. किसी भावी आशंका से मेरा मन कांप उठा. वह बोले, ‘अनवर ने काफी मात्रा में जहर खा लिया है और मेडिकल कालिज में मौत से लड़ रहा है. बारबार नोरानोरा पुकार रहा है. जल्दी चलिए.’ मैं घबरा गई. मैं ने जल्दी से पैरों में चप्पल डालीं और सीढि़यां उतरने लगी. देखा तो आखिरी सीढ़ी पर भाई खड़ा था. मैं ठिठक गई. फिर साहस कर बोली, ‘मुझे जाने दो, बस, एक बार देखना चाहती हूं उन्हें.’

‘नहीं, तुम नहीं जाओगी, मरता है तो मर जाने दो, साला अपने पाप का प्रायश्चित्त कर रहा है.’

‘प्लीज, भाई, चाहो तो तुम भी साथ चलो, बस, एक बार मिल कर आ जाऊंगी.’

‘कदापि नहीं, उस गद्दार का मुंह भी देखना पाप है.’

‘भाई, एक बार मेरी प्रार्थना सुन लो, फिर तुम जो चाहोगे वही करूंगी. अपने हिस्से की जायदाद भी तुम्हारे नाम कर दूंगी.’

‘सच? तो यह लो कागज, इस पर हस्ताक्षर कर दो.’ उस ने जेब से न जाने कब का तैयार दस्तावेज निकाल कर मेरे सामने लहरा दिया. मेरा मन घृणा से भर उठा. जी तो चाहा कागज के टुकडे़ कर के उस के मुंह पर दे मारूं पर इस समय अनवर की जिंदगी का सवाल था. समय बिलकुल नहीं था और बाहर कालोनी वाले जुटने लगे थे. मैं ने भाई के हाथ से पेन ले कर उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए और तेजी से लोगों के बीच से रास्ता बनाती अनवर के मित्र के स्कूटर पर बैठ गई.

जातेजाते भाई के कुछ शब्द कान में पडे़, ‘देख रहे हैं न आप लोग, यह अपनी मर्जी से जा रही है. कल कोई यह न कहे, सौतेले भाई ने घर से निकाल दिया. विधर्मी की मोहब्बत ने इसे पागल कर दिया है. अब मैं इसे कभी घर में घुसने नहीं दूंगा. मेरे खानदान का नाम और धर्म सब भ्रष्ट कर दिया है इस कुलकलंकिनी ने.’

स्कूटर मेडिकल कालिज की तरफ बढ़ा जा रहा था. मेरी आंखों में आंसू छलछला आए, ‘तो यह…यह है मां के घर से मेरी विदाई.’ अनवर खतरे से बाहर आ चुके थे. उन्हें होश आ गया पर मुझे देखते ही वह थरथरा उठे, ‘तुम…तुम कैसे आ गईं? जाओ, लौट जाओ, कहीं पुलिस…’ मैं ने अनवर का हाथ दबा कर कहा, ‘आप चिंता न करें, कुछ नहीं होगा.’ पर अनवर का भय कम नहीं हो रहा था. वह उसी तरह थरथराते रहे और मुझे वापस जाने को कहते रहे. मैं उन्हें कैसे समझाती कि मैं सबकुछ छोड़ आई हूं, अब मेरी वापसी कभी नहीं होगी.

वह नीमबेहोशी में थे. जहर ने उन के दिमाग पर बुरा असर डाला था. उन को चिंतामुक्त करने के लिए मैं बाहर इमली के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गई. बीचबीच में जा कर उन के पास पडे़ स्टूल पर बैठ जाती और निद्रामग्न उन के चेहरे को देखती रहती और सोचती, ‘किस्मत ने मुझे किस मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया है?’ आगे का रास्ता सुझाई नहीं पड़ रहा था.

पक्षी चहचहाने लगे तो पता चला कि सुबह हो चुकी है. मैं अनवर के सिरहाने बैठ कर उन का सिर सहलाने लगी. उन्होंने आंखें खोल दीं और मुसकराए. उन की मुसकराहट ने मेरे रात भर के तनाव को धो दिया. मारे खुशी के मेरी आंखें नम हो आईं.

‘सच ही सुबह हो गई है क्या?’ मैं ने उन की तरफ शिकायती नजरों से देखा, ‘तुम ने ऐसा क्यों किया अनवर, क्यों…मुझे छोड़ कर पलायन करना चाहते थे. एक बार भी नहीं सोचा कि मेरा क्या होगा?’

उन्होंने शायद मेरी आंखें पढ़ ली थीं. कमजोर स्वर में बोले, ‘मैं ने बहुत सोचा और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये मजहबी लोग हमें कहीं भी साथ जीने नहीं देंगे. इन के दिलों में एकदूसरे के लिए इतनी घृणा है कि हमारा प्रेम कम पड़ जाएगा. नोरा, तुम ने सुना होगा, बाबरी मसजिद गिरा दी गई है. चारों तरफ दंगेफसाद, आगजनी, उफ, इतनी जानें जा रही हैं पर इन की खून की प्यास नहीं बुझ रही है. तब सोचा, तुम्हें पाने का एक ही उपाय है, तुम्हारे भाई से तुम्हारा हाथ मांग लूं. आखिर वह मेरा पुराना मित्र है, शायद इनसानियत की कोई किरण उस में शेष हो, पर नहीं.’ अनवर की आंखों से आंसू टपक पडे़.

मेरे मन में हाहाकार मचा हुआ था. एक पहाड़ को टूटते देख रही थी मैं. मैं बोली, पर हमें हारना नहीं है अनवर. जैसे भी जीने दिया जाएगा हम जीएंगे. यह हमारा अधिकार है. तुम ठीक हो जाओ फिर सोचेंगे कि हमें क्या करना है. मैं यहां से वर्किंग वूमन होस्टल चली जाऊंगी…’ बात अधूरी रह गई. उसी समय कुछ लोग वहां आ कर खडे़ हो गए. उन की वेशभूषा ने बता दिया कि वे अनवर के रिश्तेदार हैं. वे लोग मुझे ऐसी नजरों से देख रहे थे कि मैं कट कर रह गई. अनवर ने मुझे चले जाने का संकेत किया. मैं वहां से सीधे बस अड्डे आ गई.

महीनों गुजर गए. अनवर का कोई समाचार नहीं मिला. न जाने उन के रिश्तेदार उन्हें कहां ले गए थे. मेरे पास सब्र के सिवा कोई रास्ता न था. एक दिन अचानक उन का खत मिला. मैं ने कांपते हाथों से उसे खोला. लिखा था, ‘नोरा, मुझे माफ करना. मैं तुम्हारा साथ न निभा सका. मुझे सब अपनी शर्तों पर जीने को कहते हैं. मैं कमजोर पड़ गया हूं. तुम सबल हो, समर्थ हो, अपना रास्ता खोज लोगी. मैं तुम से बहुत दूर जा रहा हूं, शायद कभी न लौटने के लिए.’

छनाक की आवाज से मेरी तंद्रा टूटी तो देखा वह पतली शीशी हाथ से छूट कर टूट गई पर चावल का वह दाना साबुत था और उस पर लिखे अक्षर उसी ताजगी से चमक रहे थे.

Fictional Story

Short Story: नीलोफर- क्या दोबारा जिंदगी जी पाई नीलू

लेखिका- शर्मिला चौहान

Short Story: खिड़की के सामने अशोक की झांकती टहनी पर छोटा सा आशियाना बना रखा था उस ने. जितनी छोटी वह खुद थी, उस के अनुपात से बित्ते भर का उस का घर. मालती जबजब शुद्ध हवा के लिए खिड़की पर आती, उसे देखे बिना वापस न जाती. वह थी ही इतनी खूबसूरत चिकनीचमकती, पीठ जहां खत्म होती वहीं से पूंछ शुरू. भूरे छोटे परों पर 2-4 नीले परों का आवरण चढ़ा था, यही नीला आवरण उसे दूसरी चिडि़यों से अलग करता था. उस छोटी सी मादा को भी अपनी सब से खूबसूरज चीज पर अभिमान तो जरूर ही था.

खाली समय में चोंच से नीले परों को साफ करती, अपनी हलकी पीलापन लिए भूरी आंखों से चारों ओर का जायजा लेती कि उस के सुंदर रूप को कोई निहार भी रहा है या नहीं. उस छोटी, नन्ही चिडि़या के परों के कारण मालती ने उस का नाम ‘नीलोफर’ रख दिया था.

‘‘मम्मी, नीलोफर ने शायद अंडे दिए हैं… वह उस घोंसले से हट ही नहीं रही,’’ मालती की 24 साल की बेटी नीलू ने उसी खिड़की के पास से मालती को आवाज दी.

‘‘मुझे भी ऐसा ही लगता है, इसलिए इतनी मेहनत कर के घर बनाया उस ने,’’ कहती हुई मालती भी खिड़की के  बाहर झांकने लगी.

नीलू को बाहर टकटकी बांधे देख कर मालती नीलू के बालों पर उंगलियों से कंघी

करने लगी.

‘‘आप ने इस चिडि़या का नाम नीलोफर क्यों रखा मम्मी?’’ नीलू अभी भी उस छोटी चिडि़या में गुम थी.

‘‘उस के नीले पर कितने प्यारे हैं, बस इसीलिए वह नीलोफर हो गई,’’ मालती ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘मेरा नाम नीलू क्यों रखा?’’ नीले ने अगला सवाल किया.

‘‘इसलिए कि तुम्हारी नीली आंखें झील सी पारदर्शी हैं. तुम्हारे मन की बात आंखें कह देती

हैं तो तुम नीलू हो,’’ मालती ने कहा और फिर नीलू की ह्वीलचेयर को धकेल कर बैठक की ओर ले गई.

नीलू ने रिमोट से टैलीविजन चालू किया और कुछ पजांबी डांस वाले गानों का मजा लेने लगी. किसी त्योहार का दृश्य था और रंगबिरंगी पोशाकें पहने लड़कियां ढोल की थाप पर झूमझूम कर नाच रही थीं. मालती ने कनखियों से नीलू को देखा, वह तन्मय हो कर गाना गा रही थी और कमर के ऊपर के शरीर को नाचने की मुद्रा में ढालने में लगी थी.

उसे गाने के बोल और नत्ृय की मुद्राओं

में तल्लीन देख कर मालती उस के बचपन में

खो गई…

‘‘मम्मी, मुझे क्लासिकल डांस नहीं

सीखना है, मुझे तो डांस वाले फिल्मी गाने पसंद हैं,’’ 7 साल की नीलू ने जिद कर के बौलीवुड गानों पर नाचना शुरू किया था.

‘‘क्या है मम्मी, यह दिनभर बंदरिया की तरह उछलकूद मचाती रहती है… आईने के

सामने मटकती रहती है और कोई काम नहीं

है क्या इसे?’’ नीलू से 4 साल बड़ा शुभम झल्लाता रहता.

‘‘आप भी नाचो न, आप को तो आता ही नहीं,’’ कहती नीलू उसे और चिढ़ाती.

समय पंख लगा कर उड़ता गया और नीलू

9 साल की हो गई.

‘‘कल सबुह बस से शुभम की स्कूल पिकनिक जा रही है. हम उसे स्कूल बस तक छोड़ आएंगे,’’ मालती ने अपने पति से कहा.

‘‘मैं भी जाऊंगी भैया को छोड़ने,’’ नीलू ने रात को ही कह दिया था.

सुबह सब कार से शुभम को स्कूल बस

तक छोड़ कर वापस आ रहे थे.

‘‘पापा, रुको न, हम वहां रुक कर कुछ खाते हैं. मेरी फ्रैंड्स कहती हैं कि सुबह यहां वड़ा पाव, इडलीडोसा और सैंडविच बहुत अच्छे मिलते हैं,’’ स्कूल के रास्ते पर एक छोटे से रैस्टोरैंट के आगे नीलू ने कहा.

सब अभी उतर ही रहे थे कि नीलू दौड़ कर सड़क पार करने लगी.

‘‘नीलू… बेटा रुको…’’ मालती की आवाज बाजू से गुजरती कार के ब्रेक मारने में दब गई.

मिनटों में पासा पलट गया था. लहूलुहान नीलू अस्पताल में बेहोश पड़ी थी. तब से आज तक कभी खड़ी नहीं हो पाई. खेलताकूदता, दौड़ता, नाचता बचपन कमर के नीचे से शांत हो गया. ह्वीलचेयर में उस की दुनिया समा गई थी.

‘‘मम्मी, भैया को आज वीडियोकौल करेंगे तो मुझे उन से एक बैग मंगवाना है,’’ नीलू की आवाज से चौंक कर मालती वर्तमान में आ गई.

‘‘हां, आज करते हैं शुभम को कौल,’’ अमेरिका में जौब कर रहे बेटे शुभम के बारे में बात हो रही थी.

दूसरे दिन सुबहसुबह भाई से बात कर के अपने लिए एक मल्टीपर्पज बैग लाने को कह कर नीलू ह्वीलचेयर ले कर खिड़की पर आ गई.

पापा और भाई की सलाह से नीलू ने अपनी पढ़ाई तो चालू रखी ही, साथ ही हस्तकला की सुंदर चीजें भी बनाती रही. कुदरत ने उस के पैरों की सारी शक्ति मानो हाथों को दे दी. बारीक धागों, सीपियों, मोतियों, जूट से खूबसूरत बैग और वाल हैगिंग बनाती थी.

उस के काम में मदद करने के लिए मालती तो थी ही, साथ ही एक और लड़की को रखा था जो सामान उठाने, रखने में मदद करती थी. बड़ेबड़े बुटीक से और्डर आते थे और सब मिल कर उन्हें समय पर पूरा करते. धीरेधीरे जिंदगी अपनी गति फिर पकड़ने लगी थी.

‘‘मम्मी, आप को मेरी बहुत चिंता होती रहती है न?’’ एक चिरपरिचित से अंदाज में नीलू कहा करती थी.

‘‘नहीं तो, मैं क्यों करूंगी चिंता? तू

तो खुद समझदार है, अपने काम कर लेती है. बुटीक के और्डर भी संभालती है और पढ़ाई

भी कर रही है,’’ मालती हमेशा उसे प्रोत्साहित करती.

‘‘चेहरे पर इतनी झुर्रियां आ गई, आंखों के नीचे काले निशान हो गए. अब भी कहोगी कि कोई चिंता नहीं,’’ नीलू की गहरी नीली आंखें अंदर तक भेद जातीं.

नीलू की कमर से निचले अंगों की स्वच्छता, कपड़े पहनाने का काम मालती खुद करती थी. एक जवान लड़की को किसी दूसरे के हाथों से ये सब काम करवाने की स्थिति का सामना रोज ही दोनों करते थे.

अचानक, चींचीं, चींचीं की आवाज के साथ कांवकांव का शोर होने लगा.

‘‘मम्मी देखो. नीलोफर के घोंसले में एकसाथ 3-4 कौए आ गए. उसे परेशान कर रहे हैं. बचाओ मम्मी, नीलोफर को, उस के अंडों को,’’ नीलू की आवाज दर्दनाक थी जैसे कोई उस पर घात कर रहा हो.

मालती रसोई से भाग कर कमरे की खिड़की पर आ गई. नीलू की ओर देखा, वह पसीने से तरबतर हो रही थी.

‘‘मम्मी, प्लीज नीलोफर को बचा लो. ये कौए उसे मार डालेंगे. आप ने जैसे मुझे बचा लिया, इस को भी बचा लो मम्मा…’’ नीलू की आवाज कुएं से बाहर आने का प्रयास कर रही थी. एक अंधकार जिस में वह खुद जी रही थी, एक सन्नाटा जिस को वह झेल रही थी. दूरदूर तक आशाओं का क्षितिज था, जो हमेशा मुट्ठी से फिसलने को लालायित रहता.

‘‘बेटा, हरेक को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है. कोई दूसरा कुछ मदद तो कर सकता है पर जीवनभर साथ नहीं दे सकता,’’ मालती ने नीलू का हाथ थाम लिया, ‘‘नीलोफर की लड़ाई उस की अपनी है. हम सिर्फ कुदरत से प्रार्थना कर सकते हैं कि उसे शक्ति दे.’’

‘‘आप तो उन कौओं को भगा सकती हो न, मैं तो उठ कर उन्हें नहीं मार सकती,’’ नीलू की आवाज कंपकंपा रही थी.

‘‘अपने अंडों की चिंता हम से ज्यादा नीलोफर को खुद है. तुम देखो, वह कैसे अपनी लड़ाई लड़ेगी,’’ मालती ने बेटी को दिलासा तो दे दिया परंतु एक नन्ही सी चिडि़या की शक्ति पर उस को विश्वास नहीं था. अत: अंदर से एक बड़ी लकड़ी ले आई.

‘‘सामने देख कर हत्प्रभ रह गई कि

4 कौओं से अकेली नीलोफर पूरे विश्वास से

जूझ रही थी. अपनी छोटी परंतु नुकीली चोंच से, कौए की आंखों पर वार करकर के 2 कौओं को भगा दिया उस ने. एक नजर अपने अंडों पर डाली, पंख फड़फड़ा शक्ति का संचार किया,

परंतु यह क्या.. उस के नीले चमकीले पंखों में से 2 गिर गए.

एक भरपूर निगाह गिरे पंखों पर डाल कर वह तेजी से चींचीं, चींचीं करती हुई बचे दोनों कौओं पर वार करने लगी.

सांस थाम कर खिड़की से मालती और

नीलू उस नन्ही सी चिडिंया का हौसला

बढ़ा रहे थे. पक्षी मन की बात समझ लेते हैं

जिसे जुबान के रहते मनुष्य नहीं समझ पाते. संबल देती 4 आंखों ने नीलोफर को बिजली सी गति दे दी.

उड़उड़ कर वह अपनी चोंच से लगातार

वार करती रही. कौओं की बड़ी, मोटी चोंच से खुद को बचाना छोड़ दिया उस ने और आक्रामक हो गई.

आखिर एक मां के आगे वे दोनों हार गए और भाग खड़े हुए. लंबी सांस भर कर नीलोफर ने अपने घोंसले में सुरक्षित अंडों को प्रेम से जीभर देखा. उस की नजर खिड़की पर रुक गई, जहां दोनों मादा तालियां बजा कर उस का अभिनंदन कर रही थीं.

नीलोफर अपने क्षतिग्रस्त शरीर का मुआयना करने लगी. जगहजगह कौओं की चोंच से घाव हो गए थे.

उस के चमकीले, नीले पंख अब शरीर छोड़ कर नीचे गिर गए थे. उस की आखों में एक बंदू सी चमकने लगी.

‘‘नीलोफर, तुम दुनिया की सब से

खूबसूरत चिडि़या हो, तुम्हें नीले पंखों की जरूरत ही नहीं है. आज तुम्हारी खूबसूरती को मैं ने महसूस किया है,’’ नीलू की बात, उस छोटे से पंछी ने कितनी समझी पता नहीं पर खुशी से चिचियाने लगी.

नीलू ने घूम कर मालती की ओर देखा. मम्मी के दमकते चेहरे पर आज कोई झर्री आंखों के नीचे कोई कालापन नहीं दिखाई दिया.

Short Story

Moral Story: उजियारी सुबह- क्या था बिन ब्याही मां रीना का फैसला

लेखिका- अमृता पांडे

Moral Story: लौबी की दीवार में बड़े से फ्रेम में लगी मोहित की तसवीर को देख कर रीना उदास हो जाती है. आंसू की कुछ बूंदें उस की आंखों से लुढ़क जाते हैं. 15 अगस्त का दिन था और बाहर काफी धूमधाम थी. आजादी का सूरज धरा के कणकण पर अपनी स्वर्णिम रश्मियां बिखेरता हुआ जलथल से अठखेलियां कर रहा था. आज था रीना की बेटी का पहला जन्मदिन. मोहित की कमी तो हर दिन हर पल उसे खलती थी, फिर आज बिटिया के जन्मदिन पर तो खलनी ही थी.

मोहित के जाने के बाद से उस की हर सुबह स्याह थी, हर शाम उदास थी. रात अकसर आंसुओं का सैलाब ले कर आती, जिस में वह जीभर डूब जाती थी. अगली सुबह सूजन से भरी मोटीमोटी आंखें उस के गम की कहानी कहतीं.

पिछले डेढ़ साल से रीना घर से ही काम कर रही थी. वह मन ही मन कुदरत को धन्यवाद देती कि वर्क फ्रौम होम की वजह से उस की मुश्किल आसान हो गई वरना दुधमुंही बच्ची को किस के पास छोड़ कर औफिस जाती. यों भी और बच्चों की बात अलग होती है. पर वह किसकिस को क्या सफाई देती. आप कितने ही बहादुर क्यों न हों पर कभीकभी समाज की वर्जनाओं को तोड़ना मुश्किल हो जाता है.

कोरोना की वजह से रीना घर से बाहर कम ही निकल रही थी, क्योंकि तीसरी लहर का खतरा बना हुआ था और इसे बच्चों के लिए खतरनाक बताया गया था. वह अपनी बेटी को किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहती थी. आखिर यही तो एक निशानी थी उस के प्यार की. उस ने औनलाइन और्डर कर के ही सजावट की सारी चीजें गुब्बारे, बंटिंग्स आदि ऐडवांस में ही मंगा ली थी. शाम के लिए केक और खानेपीने की दूसरी चीजों का और्डर दे कर वह निश्चिंत हो गई थी.

वह डेढ़ वर्ष पुरानी यादों में खो गई. कितना पागल हो गया था मोहित, जब रीना ने बहुत ही घबराते हुए उसे अपने गर्भवती होने का शक जाहिर किया था. घर में ही टेस्ट कराने पर पता चला कि खबर पक्की है.

प्यार से उसे थामते हुए बोला था वह,”यह तो बहुत अच्छी खबर है. यों मुंह लटका कर क्यों खड़ी हो. कुदरत का शुक्रिया अदा करो और आने वाले मेहमान का स्वागत करो.”

“तुम पागल हो मोहित… बिना शादी के यह आफत… क्या हमारा समाज इसे स्वीकारता है?” वह रोते हुए बोली।

“प्रौब्लम इज ए क्वैश्चन प्रपोज्ड फौर सौल्यूशन. हम शादी कर लेंगे. बस, प्रौब्लम सौल्व,” कहते हुए मोहित ने उस के बालों में हाथ फेरा.

और दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था. एक तो 3 महीने के बाद गर्भपात कराना गैर कानूनी काम और दूसरा, साथ में कोरोना की मार. सारे अस्पताल कोविड-19 के रोगियों से भरे थे. कोरोनाकाल में डाक्टर दूसरे गंभीर रोगियों को ही नहीं देख रहे थे. फिर गर्भवती महिला का वहां जाना खतरे से खाली भी नहीं था. कुछ एक अस्पतालों में डाक्टरों से मिन्नत भी की थी पर बेकार. कोई भी डाक्टर किसी पैशंट की जांच के लिए राजी ही नहीं था.

रीना को मोहित पर पूरा भरोसा था. पिछले दोढाई साल से उस के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी. उस के स्वभाव को काफी हद तक जान लिया था रीना ने. मगर कहते हैं न कि हम सोचते कुछ हैं और होता कुछ और है. इस प्रेमी जोड़े के साथ भी यही हुआ. कोरोनारूपी दानव उन के घर तक पहुंच चुका था. मोहित को बहुत तेज बुखार आया और जब कुछ दिनों तक नहीं उतरा तो जांच कराई गई. वही हुआ जिस का डर था. वह कोरोना पौजिटिव निकला. आननफानन में अस्पताल में भरती कराया गया. संक्रमण का डर था इसलिए रीना को वहां जाने की मनाही थी. 1-2 बार डाक्टर से बहुत जिद कर के आईसीयू के बाहर से मोहित की एक झलक पा ली थी उस ने.

हालत बिगड़ती रही और मोहित ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. पीछे छोड़ गया रोतीबिलखती रीना को और अपने अजन्मे बच्चे को.

दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था रीना पर. बदहवास सी वह घंटों तक घर के फर्श पर ही पड़ी रही. कोरोना संक्रमित होने के कारण मोहित का संस्कार भी पुलिस ने ही करवाया था. खबर मिलने पर मोहित के कुछ दोस्तों ने रीना को संभाला और उस की सहेलियों को इत्तला दी.

मोहित के परिवार वालों को भी यह दुखद खबर दी गई। वे अपने बेटे के गम में इतने डूबे हुए थे कि उन्हें इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि रीना से भी उन के बेटे का कोई रिश्ता था। भला इस तरह के रिश्ते को कौन स्वीकार करता है? विवाह नाम की संस्था हमारे समाज में आज भी उतनी ही संगठित है जितनी वर्षों पहले थी. हम कितना ही कुछ कहना कह लें मगर बिना शादी का रिश्ता रिश्ता नहीं माना जाता. रीना को सामने देखते ही वे बरस पड़े. अपने बेटे की मौत का जिम्मेदार उसी को ठहराने लगे. रीना को याद आया कि मोहित की मां ने उस पर न जाने क्याक्या लांछन लगा दिए थे. कितने गंदेगंदे शब्दों से उसे संबोधित किया था। उन्होंने तो रोहित की मौत का जिम्मेदार पूरी तरह से उसे ठहरा कर पुलिसिया काररवाई करने की भी ठान ली थी, वह तो कोरोना पौजिटिव रिपोर्ट ने उसे बचा लिया वरना कानूनी काररवाई भी झेल रही होती.

“छि: क्या मैं वास्तव में ऐसी ही हूं, जैसा मोहित की मां मुझे कहती हैं?
क्या मैं मोहित की मौत की जिम्मेदार हूं, जैसा उस की बहन रोरो कर कह रही थी?” परेशान होकर वह बारबार अपनेआप से यही सवाल करती.

दुनिया की नजरों में भले ही रीना का प्यार, उस का बच्चा अवैध था पर रीना की नजरों में तो यह एक पवित्र प्रेम की निशानी थी. वे दोनों एकदूसरे से बहुत अधिक प्यार करते थे. बस, फर्क इतना ही था कि बैंडबाजे के साथ दुनिया के सामने वह रीना के घर उसे ब्याहने नहीं गया था और उस की मांग में सिंदूर नहीं भरा था। वह रोरो कर यही बड़बड़ाती, फिर मूर्छित हो कर गिर जाती. उस की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी.

सोसायटी में रहने वाले लोग आज के समय में इतने संवेदनाहीन हो गए हैं कि सामने वाले घर में क्या हो रहा है, इस की खबर भी उन्हें नहीं रहती. पड़ोसी के दुखसुख में शरीक होने की जहमत भी नहीं उठाते. लेकिन यह खबर पूरी सोसाइटी में आग की तरह फैल गई. रीना के बारे में जब पता चला तो सब उस के खिलाफ हो गए. उस पर सोसाइटी का माहौल खराब करने तक का इल्जाम लग गया. ऐसे में ज्यादा दिनों तक वहां रह पाना उस के लिए बहुत मुश्किल हो रहा था. वह अपने परिवार के पास भी नहीं जाना चाहती थी क्योंकि उसे पता था कि वहां से भी कोई सहारा नहीं मिलने वाला है. पर दोस्त लोग भी कब तक उस की देखभाल कर पाते, सब की अपनीअपनी गृहस्थी, अपनेअपने काम थे. भला एक अभागिन प्रेमिका का दर्द कौन समझ पाता है?

सदियों से जमाने में यह होता आया है कि प्रेमियों को जुदा करने में समाज को मजा आया है. रीना की जिन सहेलियों को इस बात का पता था उन्होंने भी उसे यही सलाह दी कि वह अपनी मां के पास घर चली जाए. कहीं कोई बात हो जाए तो कानून की पचङे में फंसने का डर तो हर किसी को रहता ही है. यह सच है कि जब विपदा आती है तो वह इंसान को हर तरफ से घेर लेती है.

मोहित के ही एक दोस्त ने रीना को अपनी कार से उस के शहर छोड़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी. और वह कर भी क्या सकता था.

घर में जब मां को पता चला तो उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. हमारे समाज में अनब्याही मां को न तो समाज स्वीकार करता है और न ही कोई परिवार. मां तो खुद ही असहाय थी. पिता की मौत हुए कई वर्ष हो चुके थे. फिर अविवाहित बेटी इस तरह घर में आ गई. समाज के तानों से कौन बचाएगा?

मां ने तो गुस्से में कह दिया था, “डूब कर मर जाती किसी कुएं में. यहां क्यों आई…. कहां भाग गया वह तेरा प्रेमी यह हाल कर के?”

“मां, मोहित कहीं भागा नहीं. वह कुदरत के पास चला गया है. कोरोना ने उसे अपना शिकार बना लिया वरना वह ऐसा नहीं था. उस के बारे में एक भी शब्द गलत मत कहना,” इतने दिनों में पहली बार मुंह से कुछ बोली थी रीना.

उस की एक बाल विधवा बुआ भी उसी घर में रहती थीं, जिन्होंने सामाजिक तानेबाने को बहुत अच्छे तरीके से पहचाना था.

रीना की ओर देखते हुए बोलीं, “सोचा भी नहीं तूने क्या मुंह दिखाएंगे हम समाज को. लोग थूथू करेंगे.”

“छोटी 2 बहनें शादी के लिए तैयार बैठी हैं. कौन करेगा इन से शादी? लोग तो यही कहेंगे कि जैसी बड़ी बहन है, वैसी ही छोटी भी होंगी चरित्रहीन.”

इन लोगों ने यह सब कह तो दिया पर यह नहीं सोचा कि ऐसी हालत में रीना से यह सब बातें करने से उस की क्या मानसिक स्थिति होगी.

इतना ही नहीं, इस बीच धोखे से रीना के पेट में पल रहे बच्चे को खत्म करने के भी कई घरेलू उपाय किए गए पर वे कारगर साबित नहीं हुए. उलटा रीना के स्वास्थ्य पर असर पड़ा. रक्तस्राव होने लगा और जान पर बन आई.

इस मुश्किल भरी परिस्थितियों में खुद को संभाल पाना मुश्किल हो रहा था. एक रात्रि वह निकल पड़ी किसी अनजान डगर पर. उसे बारबार मां और बुआ के कड़वे शब्द याद आ रहे थे कि डूब कर मर जा किसी कुएं में या फंदे से लटक जा.

रात का समय था. वह रेलवे ट्रैक के किनारेकिनारे चली जा रही थी. विक्षिप्त सी हो गई थी वह. आसपास चल रहे लोग उसे देखते घूरते और आगे बढ़ जाते. यही तो समाज का दस्तूर है. किसी की मजबूरी के बारे में जाने बगैर हम उस के बारे में कितनी सारी धारणाएं बना लेते हैं. पूर्वाग्रह से ग्रसित यही समाज तो नासूर है हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए.

तभी कहीं दूर से रेल की सीटी बजी. धड़धड़ाती हुई ट्रेन आ रही थी और उस की आहट से पूरी धरती में कंपन हो रहा था. रीना का दिल भी एक बारगी कांप उठा. सच कितना मुश्किल होता है मरने के लिए साहस जुटाना . खासकर ऐसे में जब जीने की कोई वजह हो. ट्रेन अब पास आ चुकी थी. इंजन की लाइट दूर से दिखने लगी थी.

उस ने अपने पेट पर हाथ फेरा और आसमान की ओर देख कर जोर से चिल्लाई,”मोहित, मैं आ रही हूं तुम्हारे पास. तुम्हारी परी को भी ला रही हूं. तीनों मिल कर वहीं रहेंगे सुकून से.”

वहीं पर तैनात रेलवे का एक गार्ड जो काफी देर से उस की गतिविधियों को देख रहा था, अब उसे बात समझ में आ गई थी. वह उस के करीब हो लिया. जैसे ही ट्रेन करीब आती, रीना तेजी से ट्रैक के साथसाथ दौड़ने लगी. सिपाही ने तत्परता दिखाते हुए एक झटके से उसे पकड़ लिया.

जब अपने साथ न दें तो कई बार पराए भी अपने लगने लगते हैं. वह पुलिस वाले का हाथ पकड़ कर रोने लगी,”भैया, क्यों बचा लिया आप ने मुझे? क्या करूंगी मैं इस दुनिया में जी कर. यहां मेरा कोई अपना नहीं. जो था वह तो छोड़ कर चला गया.

अब, समाचारपत्र को भी खबर चाहिए होती है और अगले दिन यही बात स्थानीय समाचारपत्र का हिस्सा बन गई कि एक अविवाहित गर्भवती महिला ट्रेन से कटने जा रही थी और रेलवे के गार्ड ने उसे बचा लिया. बात उस की बड़ी विवाहित दीदी तक जा पहुंची थी. वे उसे अपने साथ घर ले आईं पर यहां भी विडंबना देखिए कि रीना तक तो ठीक था पर बच्चे को रखने की सलाह वे भी नहीं दे रही थीं।

दीदी बोलीं,”देख रीना, मोहित तेरा बौयफ्रैंड था. पति तो था नहीं.
जो हुआ वह बुरा हुआ लेकिन मोहित की याद में कहां तक पूरी जिंदगी बिताएगी. यह खयाल अपने मन से निकाल दे. कभी न कभी तुझे जिंदगी में किसी साथी की जरूरत तो महसूस होगी ही और उस वक्त यही बच्चा तेरी जिंदगी में आड़े आएगा. आगे क्या बताऊं तू खुद समझदार है.”

एक बार फिर दुनियादारी ने रीना को निराश किया. जिस दीदी से कुछ उम्मीद की आस लिए यहां आई थी, वह भी बेरहम निकली. रीना अपनेआप में शारीरिक बदलाव महसूस करने लगी थी और यह दूसरों को भी नजर आने लगे थे. लोगों में कानाफूसी होने लगी थी. उस ने दीदी का घर भी छोड़ देने में ही अपनी भलाई समझी. दीदी को डर था कि कहीं दोबारा कोई घातक कदम न उठा ले. उस ने उसे समझा कर कुछ समय के लिए रोक लिया.

“रीना, तू फिक्र मत कर. हम तेरे साथ हैं. लेकिन इस बच्चे के बारे में दुविधा बनी हुई है।”

“दीदी, मां कहती हैं कि मैं ने पाप किया है.”

दीदी कुछ दृढ़ता से बोलीं,” देख रीना, यह पापपुण्य की परिभाषा तो न सब हमारे समाज की बनाई हुई है. इस से बाहर निकलना हमारे लिए मुश्किल है. मेरे आसपास के लोग भी जब तुझे देखेंगे तो यही पूछेंगे न कि इस का पति कहां है? यह समाज है. किसकिस का मुंह बंद करेगी?”

रीना उदास बैठी सोच रही थी कि आएदिन हत्या, लूटपाट की घटनाएं समाचारपत्र पत्रिकाओं में छपती हैं. उन लोगों पर कोई काररवाई नहीं होती. भ्रूण हत्या आज भी चोरीछिपे होती है. किसी की जान लेना यहां पाप नहीं पर किसी को जन्म देना पाप है. वाह रे, कैसा समाज है?

खैर, तय समय पर परी का जन्म हुआ. प्रसव वेदना के साथसाथ और भी कई तरह की वेदनाएं सहीं. दीदी ने भी एक तरह से इशारा सा कर दिया था कि अब वह अपना इंतजाम कहीं देख ले. बेटी को ले कर रीना दीदी का घर छोड़ कर दूसरे शहर में आ गई थी और तब से यहीं रह रही थी.

अचानक दरवाजे की घंटी बजती है और परी उस ओर जाने की कोशिश करती है. रीना ने देखा तो दूध और ग्रौसरी वाला था.

यों तो घर में कोई भीड़भाड़ नहीं फिर भी रौनक थी. 15 अगस्त का पावन दिन था. साथ में बेटी का जन्मदिन भी. रीना कभी देशप्रेम के गाने बजाती और कभी जन्मदिन के. रीना अकेले ही मातापिता दोनों का कर्तव्य निभाते हुए अपनी बेटी के जन्मदिन के अवसर पर कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी। अब तो उस की नन्ही परी थोड़ाथोड़ा चलने लगी थी. 2-4 कदम चलती, फिर गिर जाती. फिर खुद ही संभल जाती. जब से कुछ समझने लगी थी तो उस ने सिर्फ मां को ही तो देखा था. पापा नाम का भी कोई प्राणी होता है, यह बात तो उसे पता भी नहीं थी.

अपने छोटे से घर को रीना ने बहुत ही कलात्मक ढंग से सजाया था और अपने स्टाफ के कुछ खास लोगों को पार्टी में बुलाया था. परी बिटिया को भी मेहरून रंग का सुंदर सा फ्रौक पहनाया था. बड़ी ही सुंदर लग रही थी उस की परी फ्रौक में. यह फ्रौक पिछले डेढ़ साल से रीना ने अपने बौक्स में छिपा कर रखा था जैसे चोरी का कोई सामान हो.

उस की आंखें फिर सजल हो उठीं. उस की आंखें के सामने सुनहरे दिनों की तसवीर घूमने लगी, जब मोहित को उस के गर्भवती होने का पता चला था तो उसी ने यह फ्रौक औनलाइन और्डर करवाया था. इसे देख कर रीना तो लजा ही गई थी. आज उस फ्रौक में उन की बेटी परी बहुत सुंदर लग रही थी. रीना उस के नन्हेनन्हे हाथों को देखती तो सोचती, ‘मोहित होता तो कितना खुश होता. पर आज उसे देखने के लिए वह रहा ही नहीं.’

कहता था, ‘बेटी होगी हमारी. देख लेना. बिलकुल तुम्हारी जैसी चंचल प्यारी सी.’

ये यादें उसे कमजोर करने के लिए काफी थीं पर रीना ने भी ठान लिया था कि वह अकेली अपनी बेटी को पालपोस कर बड़ा बनाएगी. आंखों के कोर में छिपे आंसुओं को पोंछते हुए उस ने परी को गोद में उठाया. एक नजर मोहित की तसवीर पर डाली और मेहमानों का इंतजार करने लगी. सूरज कुछ निस्तेज सा हो कर पश्चिम की ओर लौट रहा था पर रीना की गोद में परी एक नई सुबह का एहसास दे रही थी.

Moral Story

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