घर पर बनाएं टेस्टी और हेल्दी साबूदाना पुलाव

साबूदाना एक हेल्दी फूड है, जिसे अक्सर लोग खीर बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन क्या आपने साबूदाना पुलाव ट्राय किया है. साबूदाना पुलाव बनाना बहुत आसान है. ये हेल्दी के साथ-साथ टेस्टी भी होता है. आज हम आपको साबूदाना पुलाव की रेसिपी के बारे में बताएंगे, जिसे आप ब्रेकफास्ट या डिनर कभी भी बनाकर खा सकते हैं.

हमें चाहिए

  1. साबूदाना 150 ग्राम
  2. घी 2 चम्मच
  3. काजू 40 ग्राम
  4. धनिया पत्ती 50 ग्राम
  5. आलू 2 मध्यम आकार के
  6. हरी मिर्च 7
  7. मूंगफली 20 ग्राम
  8. नींबू का रस 2 चम्मच
  9. काली मिर्च पाउडर आधा चम्मच
  10. सरसों के दाने 1 चम्मच
  11. तेल 1 चम्मच
  12. नमक स्वादानुसार

बनाने का तरीका

सबसे पहले एक गहरे पैन को मध्यम आंच पर रखें और उसमें पानी डालें. इसमें आलू डालें और उबलने दें. जब आलू अच्छी तरह से उबल जाए और सॉफ्ट हो जाए तो उसका छिलका छील लें और उसे छोटे-छोटे आकार में काट लें.

अब हरी मिर्च और धनिया की पत्तियों को भी बारीक बारीक काटकर अलग रख लें. अब साबूदाने को पानी से अच्छी तरह से धोएं और करीब 4-5 घंटे के लिए पानी में भिगोकर रख दें.

अब एक कढ़ाई में मूंगफली को बिना तेल के ड्राई रोस्ट कर लें. अब इसी कढ़ाई में थोड़ा तेल डालें और काजू फ्राई करें. अब इसी कढ़ाई में तेल की जगह घी गर्म करें. जब घी गर्म हो जाए तो उसमें सरसों के दाने डालें और जब सरसों फूटने लगे तो उसमें हरी मिर्च डालें.

अब कढ़ाई में कटे आलू डालें और जब तक आलू हल्के भूरे रंग के न हो जाएं उसे फ्राई करें. अब कढ़ाई में भीगे हुए साबूदाना के साथ नींबू का रस, काली मिर्च पाउडर और नमक डालकर अच्छी तरह से मिक्स करें. साबूदाना को ढककर 2 से 3 मिनट के लिए अच्छी तरह से पकाएं. अब इस पुलाव को ड्राय फ्रूट्स के साथ अपनी फैमिली और फ्रेंड्स को गरमागरम परोसें.

दो कदम तन्हा: भाग-3

डा. घोषाल ने रवींद्र भवन में प्रोग्राम करवाया था. उस समय रवींद्र भवन पूरा नहीं बना था. उसी को पूरा करने के लिए फंड एकत्र करने के लिए चैरिटी शो करवाया गया था. बड़ी भीड़ थी. ज्यादातर लोग खड़े हो कर सुन रहे थे. तलत ने गजलों का ऐसा समा बांधा था कि समय का पता ही नहीं चला.

डा. दास और अंजलि को भी वक्त का पता नहीं चला. रात काफी बीत गई. दोनों रिकशा पकड़ कर घबराए हुए वापस लौटे थे. डा. दास अंजलि को उस के आवास तक छोड़ने गए थे. अंजलि के मातापिता बाहर गेट के पास चिंतित हो कर इंतजार कर रहे थे. डा. दास ने देर होने के कारण माफी मांगी थी. लेकिन उस रात को पहली बार अंजलि को देर से आने के लिए डांट सुननी पड़ी थी और उस के मांबाप को यह भी पता लग गया कि वह डा. दास के साथ अकेली गई थी. मृणालिनी या उस की सहेलियां साथ में नहीं थीं.

हालांकि दूसरे दिन मृणालिनी ने उन्हें समझाया था और डा. दास के चरित्र की गवाही दी थी तब जा कर अंजलि के मांबाप का गुस्सा थोड़ा कम हुआ था किंतु अनुशासन का बंधन थोड़ा कड़ा हो गया था. मृणालिनी ने यह भी कहा था कि

डा. दास से अच्छा लड़का आप लोगों को कहीं नहीं मिलेगा. जाति एक नहीं है तो क्या हुआ, अंजलि के लिए उपयुक्त मैच है. लेकिन आजाद खयाल वाले अभिभावकों ने सख्ती कम नहीं की.

बालक ने अंजलि का हाथ पकड़ कर जल्दी चलने का आग्रह किया तो उस ने डा. दास से कहा, ‘‘ठीक है, चलती हूं, फिर आऊंगी. कल तो नहीं आ सकती, शादी है, परसों आऊंगी.’’

‘‘परसों रविवार है.’’

‘‘ठीक तो है, घर पर आ जाऊंगी. दोपहर का खाना तुम्हारे साथ खाऊंगी. बहुत बातें करनी हैं. अकेली आऊंगी,’’ उस ने बेटे की ओर इशारा किया, ‘‘यह तो बोर हो जाएगा. वैसे भी वहां बच्चों में इस का खूब मन लगता है. पूरी छुट्टी है, डांटने के लिए कोई नहीं है.’’

डा. दास ने केवल सिर हिलाया. अंजलि कुछ आगे बढ़ कर रुक गई और तेजी से वापस आई. डा. दास वहीं खड़े थे. अंजलि ने कहा, ‘‘कहां रहते हो? तुम्हारे घर का पता पूछना तो भूल ही गई?’’

‘‘ओ, हां, राजेंद्र नगर में.’’

‘‘राजेंद्र नगर में कहां?’’

‘‘रोड नंबर 3, हाउस नंबर 7.’’

‘‘ओके, बाय.’’

अंजलि चली गई. डा. दास बुत बने बहुत देर तक उसे जाते देखते रहे. ऐसे ही एक दिन वह चली गई थी…बिना किसी आहट, बिना दस्तक दिए.

डा. दास गरीब परिवार से थे. इसलिए एम.बी.बी.एस. पास कर के हाउसजाब खत्म होते ही उन्हें तुरंत नौकरी की जरूरत थी. वह डा. दामोदर के अधीन काम कर रहे थे और टर्म समाप्त होने को था कि उसी समय उन के सीनियर की कोशिश से उन्हें इंगलैंड जाने का मौका मिला.

पटना कालिज के टेनिस लान की बगल में दोनों घास पर बैठे थे. डा. दास ने अंजलि को बताया कि अगले हफ्ते इंगलैंड जा रहा हूं. सभी कागजी काररवाई पूरी हो चुकी है. एम.आर.सी.पी. करते ही तुरंत वापस लौटेंगे. उम्मीद है वापस लौटने पर मेडिकल कालिज में नौकरी मिल जाएगी और नौकरी मिलते ही…’’

अंजलि ने केवल इतना ही कहा था कि जल्दी लौटना. डा. दास ने वादा किया था कि जिस दिन एम.आर.सी.पी. की डिगरी मिलेगी उस के दूसरे ही दिन जहाज पकड़ कर वापस लौटेंगे.

लेकिन इंगलैंड से लौटने में डा. दास को 1 साल लग गया. वहां उन्हें नौकरी करनी पड़ी. रहने, खाने और पढ़ने के लिए पैसे की जरूरत थी. फीस के लिए भी धन जमा करना था. नौकरी करते हुए उन्होंने परीक्षा दी और 1 वर्ष बाद एम.आर.सी.पी. कर के पटना लौटे.

होस्टल में दोस्त के यहां सामान रख कर वह सीधे अंजलि के घर पहुंचे. लेकिन घर में नए लोग थे. डा. दास दुविधा में गेट के बाहर खड़े रहे. उन्हें वहां का पुराना चौकीदार दिखाई दिया तो उन्होंने उसे बुला कर पूछा, ‘‘प्रोफेसर साहब कहां हैं?’’

चौकीदार डा. दास को पहचानता था, प्रोफेसर साहब का मतलब समझ गया और बोला, ‘‘अंजलि दीदी के पिताजी? वह तो चले गए?’’

‘‘कहां?’’

‘‘दिल्ली.’’

‘‘और अंजलि?’’

‘‘वह भी साथ चली गईं. वहीं पीएच.डी. करेंगी.’’

‘‘ओह,’’ डा. दास पत्थर की मूर्ति की भांति खड़े रहे. सबकुछ धुंधला सा नजर आ रहा था. कुछ देर बाद दृष्टि कुछ स्पष्ट हुई तो उन्होंने चौकीदार को अपनी ओर गौर से देखते पाया. वह झट से मुड़ कर वहां से जाने लगे.

चौकीदार ने पुकारा, ‘‘सुनिए.’’

डा. दास ठिठक कर खड़े हो गए तो उस ने पीछे से कहा, ‘‘अंजलि दीदी की शादी हो गई.’’

‘‘शादी?’’ कोई आवाज नहीं निकल पाई.

‘‘हां, 6 महीने हुए. अच्छा लड़का मिल गया. बहुत बड़ा अधिकारी है. यहां सब के नाम कार्ड आया था. शादी में बहुत लोग गए भी थे.’’

रविवार को 12 बजे अंजलि

डा. दास के घर पहुंची. सामने छोटे से लान में हरी दूब पर 2 लड़कियां खेल रही थीं. बरामदे में एक बूढ़ी दाई बैठी थी. अंजलि ने दाई को पुकारा, ‘‘सुनो.’’

दाई गेट के पास आई तो अंजलि ने पूछा, ‘‘डाक्टर साहब से कहो अंजलि आई है.’’

दाई ने दिलचस्पी से अंजलि को देखा फिर गेट खोलते हुए बोली, ‘‘डाक्टर साहब घर पर नहीं हैं. कल रात को ही कोलकाता चले गए.’’

‘‘कल रात को?’’

‘‘हां, परीक्षा लेने. अचानक बुलावा आ गया. फिर वहां से पुरी जाएंगे…एक हफ्ते बाद लौटेंगे.’’

दाई बातूनी थी, शायद अकेले बोर हो जाती होगी. आग्रह से अंजलि को अंदर ले जा कर बरामदे में कुरसी पर बैठाया. जानना चाहती थी उस के बारे में कि यह कौन है?

अंजलि ने अपने हाथों में पकड़े गिफ्ट की ओर देखा फिर अंदर की ओर देखते हुए पूछा, ‘‘मेम साहब तो घर में हैं न?’’

‘‘मेम साहब, कौन मेम साहब?’’

‘‘डा. दास की पत्नी.’’

‘‘उन की शादी कहां हुई?’’

‘‘क्या?’’

‘‘हां, मेम साहब, साहब ने आज तक शादी नहीं की.’’

‘‘शादी नहीं की?’’

‘‘नहीं, मेम साहब, हम पुरानी दाई हैं. शुरू से बहुत समझाया लेकिन कुछ नहीं बोलते हैं…कितने रिश्ते आए, एक से एक…’’

अंजलि ने कुछ नहीं कहा. आई तो सोच कर थी कि बहुत कुछ कहेगी, लेकिन केवल मूक बन दाई की बात सुन रही थी.

दाई ने उत्साहित हो कर कहा, ‘‘अब क्या कहें, मेम साहब, सब तो हम को संभालना पड़ता है. बूढे़ हो गए हम लोग, कब तक जिंदा रहेंगे. इन दोनों बच्चियों की भी परवरिश. अब क्या बोलें, दिन भर तो ठीक रहता है. सांझ को क्लिनिक में बैठते हैं,’’ उस ने परिसर में ही एक ओर इशारा किया फिर आवाज को धीमा कर के गोपनीयता के स्तर पर ले आई, ‘‘बाकी साढ़े 8 बजे क्लब जाते हैं तो 12 के पहले नहीं आते हैं…बहुत तेज गाड़ी चला कर…पूरे नशे में. हम रोज चिंता में डूबे 12 बजे रात तक रास्ता देखते रहते हैं. कहीं कुछ हो गया तो? बड़े डाक्टर हैं, अब हम गंवार क्या समझाएं.’’

अंजलि ने गहरी धुंध से निकल कर पूछा, ‘‘शराब पीते हैं?’’

‘‘दिन में नहीं, रात को क्लब में बहुत पीते हैं.’’

‘‘कब से शराब पीने लगे हैं?’’

‘‘वही इंगलैंड से वापस आने के कुछ दिन बाद से. हम तब से इन के यहां हैं.’’

इंगलैंड से लौटने के बाद. अंजलि ने हाथ में पकड़े गिफ्ट को दाई की ओर बढ़ाते हुए पूछा, ‘‘शादी नहीं हुई तो ये दोनों लड़कियां?’’

दाई ने दोनों लड़कियों की ओर देखा, फिर हंसी, ‘‘ये दोनों बच्चे तो अनाथ हैं, मेम साहब. डाक्टर साहब दोनों को बच्चा वार्ड से लाए हैं. वहां कभीकभार कोई औरत बच्चा पैदा कर के उस को छोड़ कर भाग जाती है. लावारिस बच्चा वहीं अस्पताल में ही पलता है. बहुत से लोग ऐसे बच्चों को गोद ले लेते हैं. अच्छे-अच्छे परिवार के लोग. डाक्टर साहब ने भी.

दो सखियां: भाग 1- क्या बुढ़ापे तक निभ सकती है दोस्ती

माहौल कोई भी हो, मौसम कैसा भी हो, दुनिया जाए भाड़ में, उन्हें कोई मतलब नहीं था. वे दोनों जब तक 3-4 घंटे गप नहीं लड़ातीं, उन्हें चैन नहीं पड़ता. उन्हें ऐसा लगता कि दिन व्यर्थ गया. उन्हें मिलने व एकदूसरे से बतियाने की आदत ऐसी पड़ गई थी जैसे शराबी को शराब की, तंबाकू खाने वाले को तंबाकू की. उन्हें आपस में एकदूसरे से प्रेम था, स्नेह था, विश्वास था. एकदूसरे से बात करने की लत सी हो गई थी उन्हें. कोई काम भी नहीं उन्हें. 65 साल के आसपास की इन दोनों महिलाओं को न तो घर में करने को कोई काम था न करने की जरूरत. घर में बहुएं थीं. कमाऊ बेटे थे. नातीपोते थे.

इसलिए दोपहर से रात तक वे बतियाती रहतीं. कभी तारा के घर सितारा तो कभी सितारा के घर तारा. वे क्या बात करती हैं, उस पर कोई विशेष ध्यान भी नहीं देता. हां, बहुएं, नातीपोते, चायनाश्ता वगैरा उन के पास पहुंचा देते. दोनों बचपन की पक्की सहेलियां थीं. एक ही गांव में एकसाथ उन का बचपन बीता. थोड़े अंतराल में दोनों की शादी हो गई. जवानी के राज भी उन्हें एकदूसरे के मालूम थे. कुछ तो उन्होंने आपस में बांटे. फिर इत्तफाक यह हुआ कि विवाह भी उन का एक ही शहर के एक ही महल्ले में हुआ.

शादी के बाद शुरू में तो घरेलू कामों की व्यस्तता के चलते उन की बातचीत कम हो पाती लेकिन उम्र के इस मोड़ पर वे घरेलू कार्यों से भी फुरसत पा चुकी थीं. पानदान वे अपने साथ रखतीं. थोड़ीथोड़ी देर बाद वे अपने हाथ से पान बना कर खातीं और खिलातीं. सितारा मुसलिम थी, तारा हिंदू ठाकुर. लेकिन धर्म कभी उन के आड़े नहीं आया. सितारा ने नमाज पढ़ी शादी के बाद, वह भी परिवार के नियमों का पालन करने के लिए, अंदर से उस की कोई इच्छा नहीं थी. जब उन्हें बात करतेकरते दोपहर से अंधेरा हो जाता तो परिवार का कोई सदस्य जिन में नातीपोते ही ज्यादातर होते, उन्हें लेने आ जाते. उन की बात कभी पूरी नहीं हो पाती. सो, वे कल बात करने को कह कर महफिल समाप्त कर देतीं.

अभी सितारा के घर रिश्तेदार आए हुए थे तो महफिल तारा के घर में उस के कमरे में जमी हुई थी. बहू अभीअभी चाय रख कर गई थी. दोनों ने चाय की चुस्कियों से अपनी वार्त्ता प्रारंभ की. सितारा ने शुरुआत की.

‘‘सब ठीक है घर में, मेरे आने से कोई समस्या तो नहीं?’’

‘‘कोई समस्या नहीं. घर मेरा है. मेरे आदमी ने बना कर मेरे नाम किया है. आदमी की पैंशन मिलती है. किसी पर बोझ नहीं हूं. फिर मेरे बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता घर का. तुम कहो, तुम्हारे बहूबेटी को तो एतराज नहीं है हमारे मिलने पर?’’ ‘‘एतराज कैसा? मिल कर चार बातें ही तो करते हैं. अब जा कर बुढ़ापे में फुरसत मिली है. जवानी में तो शादी के बाद बहू बन कर पूरे घर की जिम्मेदारी निभाई. बच्चे पैदा किए, बेटेबेटियों की शादियां कीं. अब जिम्मेदारियों से मुक्त हुए हैं.’’

दोनों के पति गुजर चुके थे. विधवा थीं दोनों. उन के घर मात्र 20 कदम की दूरी पर थे. सितारा ने कहा, ‘‘सुना है कि वर्मा की बेटी का किसी लड़के के साथ चक्कर है.’’

‘‘क्या बताएं बहन, जमाना ही खराब आ गया है. बच्चे मांबाप की सुनते कहां हैं. परिवार का कोई डर ही नहीं रहा बच्चों को.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘बुढ़ापे में कान कम सुनते हैं. बेटेबहू आपस में बतिया रहे थे.’’

‘‘मैं तो यह तमाशा काफी समय से देख रही हूं. छत पर दोनों एकसाथ आते, एकदूसरे को इशारे करते. उन्हें लगता कि हम लोग बुढि़या हैं, दिखाई तो कुछ देता नहीं होगा. लेकिन खुलेआम आशिकी चले और हमारी नजर न पड़े. आंखें थोड़ी कमजोर जरूर हुई हैं लेकिन अंधी तो नहीं हूं न.’’

‘‘हां, मैं ने भी देखा, ट्यूशनकालेज के बहाने पहले लड़की निकलती है अपनी गाड़ी से, फिर लड़का. हमारे बच्चे अच्छे निकले, जहां शादी के लिए कह दिया वहीं कर ली.’’

‘‘हां बहन, ऐसे ही मेरे बच्चे हैं. मां की बात को फर्ज मान कर अपना लिया.’’ अपनेअपने परिवार की तारीफ करतीं और खो जातीं दोनों. न तो दोनों को कंप्यूटर, टीवी से मतलब था, न जमाने की प्रगति से. वे तो जो देखतीसुनतीं उसे नमकमिर्च लगा कर एकदूसरे को बतातीं. इस मामले में दोनों ने स्वयं को खुशनसीब घोषित कर दिया. तारा ने कहा, ‘‘जब घर में यह हाल है तो बाहर न जाने क्या गुल खिलाते होंगे?’’ सितारा ने कहा, ‘‘मांबाप को नजर रखनी चाहिए, लड़की 24-25 साल की तो होगी. अब इस उम्र में मांबाप शादी नहीं करेंगे तो बच्चे तो ये सब करेंगे ही. कुदरत भी कोई चीज है.’’ तारा ने कहा, ‘‘देखा नहीं, कैसे छोटेछोटे कपड़े पहन कर निकलती है. न शर्म न लिहाज. एक दिन मैं ने पूछा भी लड़की से, ‘क्यों बिटिया, दिनभर तो बाहर रहती हो, घर के कामकाज सीख लो. शादी के बाद तो यही सब करना है.’ तो पता है क्या जवाब दिया?’’

‘‘क्या?’’ सितारा ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘कहने लगी, ‘अरे दादी, मुझे रसोइया थोड़े बनना है. मैं तो आईएएस की तैयारी कर रही हूं. एक बार अफसर बन गई तो खाना नौकर बना कर देंगे.’ फिर मैं ने पूछा कि लड़की जात हो. कल को शादी होगी तो घर में कामकाज तो करने ही पड़ेंगे. वह हंस पड़ी जोर से. कहने लगी, ‘दादी, आप लोगों को तो शादी की ही पड़ी रहती है. कैरियर भी कोई चीज है.’ शादी की बात करते हुए न लजाई, न शरमाई. बेशर्मी से कह कर अपने स्कूटर पर फुर्र से निकल गई.’’

सितारा ने कहा, ‘‘वर्माजी पछताएंगे. लड़कियों को इतनी छूट देनी ठीक नहीं. जब देखो मोबाइल से चिपकी रहती है बेशर्म कहीं की.’’

‘‘अरे, मैं ने तो यह भी सुना है कि लड़का कोई गैरजात का है. लड़की कायस्थ और लड़का छोटी जात का.’’

‘‘हमें क्या बहना, जो जैसा करेगा वह वैसा भरेगा.’’

‘‘प्यार की उम्र है. प्यार भी कोई चीज है.’’

‘‘यह प्यारमोहब्बत तो जमानों से है. तुम ने भी तो…’’

सितारा ने कहा, ‘‘तुम भी गड़े मुर्दे उखाड़ने लगीं. अरे, हमारा प्यार सच्चा प्यार था. सच्चे प्यार कभी परवान नहीं चढ़ते. सो, जिस से प्यार किया, शादी न हो सकी. यही सच्चे प्यार की निशानी है.’’

‘‘वैसे कुछ भी कहो सितारा बहन, न हो सके जीजाजी थे स्मार्ट, खूबसूरत.’’

अफसोस करते हुए सितारा ने कहा, ‘‘जान छिड़कता था मुझ पर. धर्म आड़े न आया होता तो… फिर हम में इतनी हिम्मत भी कहां थी. संस्कार, परिवार भी कोई चीज होती है. अब्बू ने डांट लगाई और प्यार का भूत उतर गया. काश, उस से शादी हो जाती तो आज जीवन में कुछ और रंग होते. मनचाहा जीवनसाथी. लेकिन घर की इज्जत की बात आई तो हम ने कुर्बानी दे दी प्यार की.’’

‘‘वैसे कहां तक पहुंचा था तुम्हारा प्यार?’’

‘‘बस, हाथ पकड़ने से ले कर चूमने तक.’’

सितारा ने फिर वर्मा की लड़की का जिक्र छोड़ कर अपनी करतूत पर परदा डालते हुए कहा, ‘‘वर्मा की लड़की के तो मजे हैं. देखना भागेगी एक न एक दिन.’’

‘‘हां, लेकिन हमें क्या लेनादेना. भाड़ में जाए. एक बात जरूर है, है बहुत सुंदर. जब लड़की इतनी सुंदर है तो कोई न कोई तो पीछे पड़ेगा ही. अब बाकी दारोमदार लड़की के ऊपर है.’’

‘‘क्या खाक लड़की के ऊपर है. देखा नहीं, उस का शरीर कैसा भर गया है. ये परिवर्तन तो शादी के बाद ही आते हैं.’’

‘‘हां, लगता तो है कि प्यार की बरसात हो चुकी है. एक हम हैं कि तरसते रहे जीवनभर लेकिन जिस पर दिल आया था वह न मिला. कमीने के कारण पूरे गांव में बदनाम हो गई और शादी की बात आई तो मांबाप का आज्ञाकारी बन गया. श्रवण कुमार की औलाद कहीं का.’’

‘‘वह जमाना और था. आज जमाना और है. आज तो लड़केलड़की कोर्ट जा कर शादी कर लेते हैं. कानून भी मदद करता है. हमारे जमाने में ये सब कहां था?’’

‘‘होगा भी तो हमें क्या पता? हम ठहरे गांव के गंवार. आजकल के लड़केलड़कियां कानून की जानकारी रखते हैं और समाज को ठेंगा दिखाते हैं. काश, हम ने हिम्मत की होती, हमें ये सब पता होता तो आज तेरा जीजा कोई और होता.’’

‘‘मैं तो मांबाप के सामने स्वीकार भी न कर सकी. उस के बाद भी भाइयों को पता नहीं क्या हुआ कि बेचारे के साथ खूब मारपीट की. अस्पताल में रहा महीनों. इस बीच मेरी शादी कर दी. मैं क्या विरोध करती, औरत जात हो कर.’’

‘‘सच कहती हो. जिस खूंटे से मांबाप ने बांध दिया, बंध गए. आजकल की लड़कियों को देख लो.’’

‘‘अरी बहन, लड़कियां क्या, शादीशुदा औरतों को ही देख लो. एकसाथ दोदो. घर में पति, बाहर प्रेमी. इधर, पति घर से निकला नहीं कि प्रेमी घर के अंदर. क्या जमाना आ गया है.’’ बातचीत हो ही रही थी कि तभी बाहर से आवाज आई, ‘‘दादी ओ दादी.’’

‘‘लो, आ गया बुलावा. अब जाना ही पड़ेगा.’’

‘‘तुम क्या कह रही थीं?’’

‘‘अब, कल बताऊंगी. अभी चलती हूं.’’

अगले दिन वे फिर मिलीं.

पाकिस्तान में ‘तारा सिंह’ ने मचाई गदर! रिलीज हुआ फिल्म का ट्रेलर

बॉलीवुड की बहुप्रतिक्षित फिल्म ‘गदर 2’ का फैंस बेसब्री से इंतजार कर रहे है. बॉलीवुड के स्टार सनी देओल और अमीषा पटेल की ‘गदर 2’ का बुधवार को ट्रेलर रिलीज हो गया. बता दें, ‘गदर 2’ सिनेमाघरों में 11 अगस्त को रिलीज होगी. ऐसे में फिल्म का ट्रेलर को देखने के बाद फैंस को अब बस 11 अगस्त का इंतजार है जब वह सिनेमाघरों में जाकर ‘गदर 2’ देखेंगे.

वैसे तो ‘गदर 2’ का पोस्टर, मोशन पोस्टर, टीजर और गाने देखकर बहुत उत्सुक थे, अब मूवी का ट्रेलर आने के बाद फैंस डबल एक्साइटेड हो गए है.

छा गया ‘गदर 2’ का ट्रेलर

सनी देओल की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘गदर 2’ का ट्रेलर रिलीज हो चुका है. ‘गदर 2’ का ट्रेलर 3.02 मिनट का है, वहीं ट्रेलर में सनी देओल यानी तारा सिंह का रौद्र रूप देखने को मिला है. ट्रेलर में दिखाया गया है तारा सिंह का बेटा जीते पाकिस्तान के कब्जे में होता है तो वह उसे बचाने के लिए पाकिस्तान में तबाही में मचा देता है. तारा सिंह के हमले से दुश्मन धराशायी हो जाते हैं.

फिल्म ‘गदर 2’ में तारा सिंह  और सकीना की रोमांटिक केमिस्ट्री के साथ ही उनके बेटे का रोल कर रहे उत्कर्ष शर्मा भी प्यार में पड़े नजर आएंगे. इस फिल्म के गाने आपके एंटरटेनमेंट को दोगुना करने वाले हैं.

‘गदर 2’ के ये हैं धांसू डायलॉग्स

बॉलीवुड में दमदार आवाज और डायलॉग्स के लिए जाने वाले सनी देओल की ‘गदर 2’ के ये डायलॉग्स बहुत ही जबरदस्त है. ट्रेलर में दिखाया गया है कि जब तारा सिंह पाकिस्तान पहुंच जाते हैं तो उन्हें ललकारा जाता है, उस वक्त हमारे सनी पाजी का दमदार डायलॉग निकल कर आता है- ‘अगर यहां के लोगों को दोबारा मौका मिले ना हिंदुस्तान में बसने का, तो आधा पाकिस्तान खाली हो जाऐगा.’

फिल्म के ट्रेलर में एक और सनी देओल का बेबाक डायलॉग है, जिसमें सनी देओल पाकिस्तानी जनरल को जवाब देते हैं कि- ‘कटोरा लेकर घूमोगे , भीख भी नहीं मिलेगी.’

Anupama: मालती देवी का खुलेगा बड़ा राज, काव्या ने दिया वनराज को धोखा

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ जबसे टेलीकस्ट हुआ तबसे छाया हुआ है. शो के मेकर्स ‘अनुपमा’ को टॉप पर लाने के लिए खूब संघर्ष कर रहे है. शो में आए दिन नए-नए ट्विस्ट आ रहे हैं.  हालांकि रुपाली गांगुली के शो का करंट ट्रैक लोगों के समझ में बिल्कुल भी नहीं आ रहा है.

बीते दिन भी ‘अनुपमा’ में देखने को मिला कि समर को उसके फैसले के लिए पूरा परिवार डांटता है, लेकिन वह भी जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ता है. वह अपने बाप के सामने जुबान चलाते हुए कहता है कि मैं अच्छा बेटा बनकर थक चुका हूं. यहां तक कि समर अपनी मां अनुपमा की अच्छाई पर भी सवाल उठाता है. वहीं अब अनुपमा के अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि मालती देवी का खुलेगा बड़ा राज.

पारितोष बड़े बेटे की जिम्मेदारी संभालेगा

अनुपमा के अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि समर को अपनी गलती का पछतावा होता है. डिंपल समर से कहती है वह मालती देवी के साथ काम जरुर करेंगे लेकिन साथ अपनी फैमिली का ही देंगे. वहीं पारितोष खुद सुधारने का फैसला करेगा और कहेगा कि जब अच्छा बेटा समर गलत रास्ते पर आ सकता है तो मैं भी सही रास्ते पर आ सकता हूं और अपनी मम्मी की मदद कर सकता हूं. तोषू की यह बात सुनकर किंजल उसे गले लगा लेगी.

 

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अनुपमा गुरु मां को तेवर दिखाएगी

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ देखने को मिलेगा कि अनुपमा को बुरे सपने आते है. वहीं दूसरी ओर मालती देवी को बच्चे की रोने की आवाज आती है. जिससे वह डर जाती है. वहीं दूसरी ओर अनुपमा गुरु मां से फिर से माफी मांगने की सोचती है. अनुपमा गुरु मां से कहेगी एक मां कभी आपके सामने नहीं झुकेगी, लेकिन एक शिष्या अपनी गलती के लिए आपसे माफी मांगती रहेगी.

काव्या ने दिया वनराज को धोखा

‘अनुपमा’ शो में आए दिन नए-नए ट्विस्ट आ रहे हैं. शो में परिवार का हर एक सदस्य बेबी शावर खुशी से मनाएगा. वहीं काव्या खुद से कहेगी कि मैं सबसे और झूठ नहीं बोल सकती, मुझे परिवार को सच बताना ही होगा. काव्या की इस बात को लेकर माना जा रहा है कि उसने प्रेग्नेंसी से जुड़ा झूठ बोला है. उसके सच बताने के बाद न केवल शाह हाउस, बल्कि कपाड़िया हाउस में भी तूफान देखने को मिलेगा.

बीहू की शांति: भाग 1- पर्सी दोस्ती की आड़ में लड़की को क्यों फंसता था?

ऐसा बिलकुल नहीं था कि उसे लड़कों से हमेशा से नफरत थी. बचपन से ले कर इंटरमीडिएट तक वह लड़कों के साथ पढ़ी. उस के बाद विश्वविद्यालय तक लड़के ही तो उस के साथी थे. कुछ लड़के बहुत केयरिंग थे सच्चे दोस्तों जैसे पर कुछ लड़के लड़कियों से दोस्ती सिर्फ उन के शरीर तक ही रखते थे.

उस तरह के लड़के, पुरुष हर जगह टकराए, स्कूल, बाजार, रिश्तेदारी, सभी जगह चुभती निगाहें और कुहनियां.

किशोरावस्था में अपनी उम्र से दोगुने अंकल के द्वारा अपने साथ हुए यौन शोषण की भयानक यादों को कितनी मुश्किल से भुला पाई थी बीहू और अगर उस समय मां और पापा की सपोर्ट नहीं मिलती तो वह कब की आत्महत्या कर चुकी होती.

परिवार वालों का साथ पाने से बीहू मजबूत बनी रही और उस ने विश्वास रखा कि अगर उस के साथ गलत हुआ है तो उस की गलती नहीं बल्कि उस व्यक्ति की है जिस ने उस के साथ गलत किया है. सजा तो उस आदमी को मिलनी चाहिए.

बड़ी होती बीहू जानेअनजाने में लड़कों से अपनेआप को दूर ही रखने लगी. लड़कों की मौजूदगी उस के लिए दमघोटू बनने लगी. शादियों, पार्टियों में जाने से भी गुरेज करती थी बीहू और अगर जाए भी तो पापा के साए में ही खानापीना कर के वापस घर आ जाना. यही उस का पार्टी ऐंजौय करने का तरीका था.

पापा भी बीहू के चारों तरफ एक सुरक्षित सा घेरा बनाए रहते थे. धीरेधीरे युवा होती बीहू के मन में लड़कों के प्रति एक रीतापन सा छा गया जबकि लड़कियों की संगत उसे सुहाती थी.

बीहू के पापा की सरिया बनाने की फैक्टरी थी. पैसों की कोई कमी नही थी. अत:

बीहू ने पहले तो कौमर्स से ग्रैजुएशन किया और  फिर अपने अंदर की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए थिएटर में काम करना चाहा जिस के लिए उस ने कोलकाता में जा कर ‘ललित स्कूल औफ ड्रामा’ में थिएटर की बारीकियां सीखने के लिए दाखिला ले लिया. यह डिप्लोमा 2 साल का था. बीहू को वहां रहने के लिए एक अच्छे कमरे की तलाश थी जो ड्रामा स्कूल से बहुत दूर न हो.

‘‘वैल तुम तो यूपी से आई है. हमारे स्कूल में यूपी का एक और लड़की है पर्सी नाम का. हम तुम्हें उस से मिलवा देंगे. तुम्हें उस से काफी मदद मिलेगी,’’ ड्रामा स्कूल के सिक्यूरिटी औफिसर ने बीहू से कहते ही मोबाइल पर एक नंबर डायल कर दिया. उधर से कोई बात करने लगा. बातचीत पर्सी से हो रही थी जिसे यह बताया जा रहा था कि अगर उसे रूमपार्टनर की जरूरत है तो वह आ कर बीहू से मिल सकती है क्योंकि बीहू भी उत्तर प्रदेश की है और पर्सी भी वहीं की है इसलिए कोलकाता में उत्तर प्रदेश वालों की आपस में खूब बनेगी.

वैसे तो बीहू को एकाकी रहना अधिक खलता नहीं था पर यहां परदेश में कोई अपने उधर का मिलना अच्छा लग रहा था उसे और अनजान पर्सी के लिए उस के दिल में पहले से ही एक सौफ्ट कौर्नर सा बन चुका था.

बीहू कुरसी पर बैठी हुई थी कि सामने से एक मौडर्न सी लड़की आती दिखाई दी, जिस ने टीशर्ट के ऊपर एक लूजर सी जैकेट डाल रखी थी. उस के बाल कटे हुए थे जोकि पूरी तरह लापरवाही से बिखरे हुए थे. पर्सी को देख कर ही एक टौमबौय जैसी फीलिंग आ रही थी.

आते ही पर्सी ने बीहू की तरफ हाथ बड़ाया, ‘‘मैं मुरादाबाद से हूं और तुम?’’

‘‘मैं नोएडा से,’’ बीहू ने जवाब दिया.

‘‘थिएटर के शौक ने हम दोनों को बड़ी दूर ला दिया, पर अब तुम मिल गई हो तो थोड़ा अकेलापन कम लगेगा,’’ पर्सी बहुत जल्दी मिक्सअप हो गई जैसे वह बीहू को पहले से जानती हो.

पर्सी एक महत्त्वाकांक्षी लड़की थी. वह एक मध्यवर्गीय परिवार से थी और फिल्मों में काम करना चाहती थी, पर जहां भी ट्राई किया हर आदमी ने उस का शोषण ही करना चाहा. फिर फिल्म इंडस्ट्री में कोई गौडफादर नहीं होने के कारण पर्सी ने पैसे कमाने के लिए थिएटर की ओर रुख किया. जिस दिन पर्सी के पास खूब ढेर सारे पैसे हो जाएंगे उस दिन वह वापस अपने घर लौट जाएगी. जहां जा कर वह अपनी 2 छोटी बहनों की पढ़ाईलिखाई और मांबाप की जिम्मेदारी निभाएगी.

बीहू बहुत अधिक सामान ले कर नहीं आई थी. सिर्फ एक बड़ा सा ब्रीफकेस था जो आसानी से कैब में रख लिया गया और ड्राइवर ने जीपीएस में पहुंचने का स्थान साकेत नगर डाल दिया. बहुत दूर नहीं था साकेत नगर, मात्र 15 मिनट की ड्राइविंग के बाद ही मंजिल आ गई दोनों की.

कैब का बिल देने में खुद पर्सी ने देर नहीं करी और बीहू को ले कर फट से अपने कमरे की ओर बढ़ चली.

बीहू ने फोन पर सब ठीक होने की जानकारी अपने मांबाप को दी और उस दिन थकी होने के कारण जल्दी सो गई. अगले दिन क्लास थी, जहां पर बीहू ने बड़ी सहजता से सारे किरदार निभा लिए, उस की किरदारों में जमने की क्षमता को देख कर पर्सी भी हैरान रह गई थी. आज पहले दिन ही अपने सीनियर्स और साथी कलाकारों की वाहवाही लूटी ली थी बीहू ने. पर बीहू सिर्फ उदासी भरे किरदार ही अच्छे से निभा पाती थी जबकि उसे कई बार सर ने यह बताया कि थिएटर का एक अच्छा कलाकार बनने के लिए यह जरूरी है कि वह हर तरह का किरदार निभाए.

बीहू ने सर की बात का कोई विरोध नहीं किया और पर्सी और बीहू दोनों कौफी पी कर अपने कमरे में चली आईं.

आज मौसम खराब था. रहरह कर बिजली कड़क जाती थी. बीहू खिड़की से बाहर देख रही थी. तभी बारिश के एक झोके ने उसे खिड़की बंद कर देने पर मजबूर कर दिया.

‘‘बिलकुल इसी खिड़की की तरह तुम ने अपने को बंद कर रखा है बीहू, कम औन यार, कुछ तो खुलो कोई बौयफ्रैंड. कोई गर्लफ्रैंड,’’ पर्सी ने बीहू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा तो बीहू के अंदर का दर्द जाग उठा और वह कुछ न कह पाई. शब्द घुट कर रह गए और सिसकी निकल पड़ी.

उस की सिसकी सुन कर पर्सी समझ गई कि बीहू ने बहुत कुछ अपने अंदर छिपा रखा है. उस ने बीहू से कुछ नहीं कहा. उस पूरी रात बीहू पर्सी से लिपट कर सोई.

भले ही बीहू के मन में कुछ नहीं था पर इस तरह से लिपट कर सोने को पर्सी ने एक मौन आमंत्रण माना और अगले दिन जब बीहू सोने चली तो खुद पर्सी उस से लिपट गई और उस की पीठ को सहलाने लगी. पीठ से उस के हाथ बीहू की जांघ के आसपास हरकत करने लगे थे.

बीहू पहले तो थोड़ी असहज लगी पर जल्द ही उसे पर्सी का अपने यौननांगों के इतने निकट आना अच्छा लग रहा था. बीहू पर्सी की गरम सांसों को अपने अंगों में महसूस कर सकती थी और पर्सी के हाथ लगातार बीहू के शरीर पर हरकत करते रहे जब तक बीहू चरम पर नहीं पहुंच गई. उस के बाद पर्सी ने भी चरम सुख प्राप्त कर लिया.

Monsoon Special: बरसात में कीड़ेमकोड़ों की होगी NO ENTRY

बारिश के मौसम में चायपकौड़ और गरमगरम जलेबियों जो का स्वाद आता है वह स्वाद किसी और मौसम में कहां. हर तरफ मानो इस स्वादिष्ठ व्यंजन की खशबू महकने लगती है.

लेकिन बारिश सिर्फ यह स्वाद ही अपने साथ नहीं लाती बल्कि कुछ मुसीबतें भी साथ लाती हैं जैसे इस मौसम में आने वाले कीड़े.  इन कीड़ों की वजह से खाना बनाते समय बहुत परेशानी होती है क्योंकि ये शाम होते ही हमारे भोजन में गिरने लगते हैं और जिस कारण हमारा भोजन दूषित हो जाता है. हम बीमार भी हो सकते हैं.

अगर आप भी बरसात के मौसम में घर में आने वाले कीड़ेमकौड़ों से  परेशान रहते हैं, तो रोजाना की सफाई की आदत में शामिल करें इन चीजों को:

 कीटनाशक का प्रयोग

घर की साफसफाई तो हम रोज करते ही हैं लेकिन सफाई को बैक्टीरियाफ्री सफाई तभी मान सकते हैं जब हम सफाई के समय उस में फ्लोर क्लीनर का प्रयोग करते हैं क्योंकि ये फ्लोर क्लीनर न सिर्फ हमें चमचमाता फर्श देते हैं, बल्कि हमारे घर को कीटाणु से मुक्त भी रखते हैं.

फर्श की सफाई के लिए आप लाइजौल, नीमली, प्योर कल्ट जैसे फ्लोर क्लीनर का इस्तेमाल कर के घर को खुशबूदार व कीटाणुमुक्त बना सकते हैं. बाजार में ये प्रोडक्ट्स अलगअलग खुशबुओं में मौजूद हैं.

 1.इनसैक्टिसाइड दिखाएं तुरंत असर   

बरसात के मौसम में डेंगू मच्छर, कौकरोच आदि बड़ी परेशानी बन कर आते हैं और लोगों को गंभीर रूप से बीमार कर सकते हैं. डेंगू मच्छर अधिकतर साफ पानी व अधिक आबादी वाली जगह पर ज्यादा पाया जाता है. वहीं कौकरोच का मल ऐलर्जी पैदा करने वाला होता है, जिस की वजह से सांस से जुड़ी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है. ये कीड़े किचन की सतह पर, गैसस्टोव पर, खाने पर ऐसे बेक्टैरिया छोड़ देते हैं, जिन की वजह से पेट से जुड़ी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं.

इन्हें खत्म करने के लिए जरूरी है कि हिट, खटनील, बायगौन, फिनाइल जैसे इनसैक्टिसाइड का प्रयोग करें. ये मच्छर व कौकरोच के लिए अलगअलग आते हैं. इन का 3-4 दिन रोजाना रात में सोने से पहले स्प्रे करें लेकिन सुनश्चित करें कि कोई भी खानेपीने की चीजें खुली हुई न रखी हों. कौकरोच के लिए आप बोरिक ऐसिड का पेस्ट बना कर कौकरोच वाली जगहों पर भी लगा सकते हैं.

 2.औयल का करें प्रयोग

कीड़ेमकौड़ों से छुटकारा पाने के लिए आप औयल का इस्तेमाल कर सकते हैं। बाजार में कई तरह के औयल उपलब्ध हैं जैसे नीम का औयल, टी ट्री औयल, नीलगरी औयल, पेपरमिंट औयल. जब भी आप इन में से किसी भी औयल का प्रयोग करते हैं तो आधा बालटी पानी में 10 एमएल औयल डाल कर आप घर में पोंछा लगा सकते हैं और यदि स्प्रै के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं तो 10 बङे चम्मच तेल को 2 गिलास पानी में मिला कर स्प्रे बौटल में भर लें. फिर समयसमय पर घर में इस का छिड़काव करते रहें। इन में मौजूद ऐंटीफंगल और ऐंटीबैक्टीरियल तत्व कीड़ेमकौड़ों को घर से दूर भगाने में मदद करते हैं।

3.ध्यान रखने योग्य बातें

कोशिश करें कि आप अपने घर के खिड़कीदरवाजों को बंद रखें, खासकर शाम के वक्त जरूर ऐसा करें. हफ्ते में 1 बार घर को अच्छे से झाडें व पानी में कीटनाशक डाल कर धुलाई करें.

घर में गमले या पौधे हैं तो वहां पर सफाई रखें और सीलन न आने दें क्योंकि ज्यादा गीले में बारिश के मौसम में काईयां जम जाती हैं जिस से मच्छर पैदा होने लगते हैं. 1 हफ्ते में कुलर की सफाई अवश्य करें या बारिश के मौसम में बिना पानी के चलाएं तो बेहतर होगा. खानेपीने की चीजों को ढंक कर रखें.अगर ज्यादा परेशानी है तो पेस्ट कंट्रोल जरूर कराएं.

 

सुंदर बीवी से कैसे निभे

दिनेश वर्मा ने कभी नहीं चाहा था कि उस की पत्नी कृति नौकरी करे. वह तो हर वक्त कृति को अपनी नजरों के सामने रखना चाहता था. कृति उस के लिए वह अनमोल हीरा थी जिसे खो देने के डर से वह अपने काम पर भी ध्यान नहीं दे पा रहा था. उस की निगरानी के चक्कर में अंतत: घर के आर्थिक हालात इतने बिगड़ गए कि कृति को ही नौकरी करने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ा.

कृति 24 साल की पढ़ीलिखी, सुलझी हुई, सुंदर और सलीकेदार लड़की है. ग्रैजुएशन पूरा करने के बाद उस ने नर्सिंग की ट्रेनिंग भी की थी. दिनेश से उस की शादी हुई तो उस ने नौकरी करने के बजाय गृहस्थी को प्राथमिकता दी. दिनेश भी यही चाहता था कि कृति घर पर ही रहे. वह सोचता था कि कहीं उस की सुंदर पत्नी को कोई दूसरा न पटा ले. वह तो कृति को घर के दरवाजे पर भी खड़ा होने पर टोक देता था.

कभी वह कहती कि वह थोड़ी देर छत पर टहल आए तो दिनेश भी उस के साथ जाता. कुल जमा यह कि दिनेश एक सुंदर स्त्री को ब्याह कर ले तो आया मगर उस की सुंदरता ने दिनेश के अंदर असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया.

2015 में जब दिनेश की शादी कृति से हुई थी, तब रिश्तेदारों, दोस्तों और महल्ले वालों के मुंह से अपनी पत्नी की खूबसूरती की तारीफ सुन कर उस की छाती फूल जाती थी. हाय कितनी सुंदर दुलहन लाया है. दिनेश तेरे तो आंगन में चांद उतर आया है. ऐसी बातें सुनसुन कर वह फूला नहीं समाता.

असुरक्षा की भावना

दिनेश एक प्राइवेट जौब में था. सैलरी अच्छी थी. काम के सिलसिले में उसे कभीकभी टूर पर भी जाना पड़ता था. घर में उस के और कृति के अलावा मां और छोटा भाई राघव थे. राघव दिनेश से 2 साल ही छोटा है और ग्रैजुएशन कर रहा है. अपनी भाभी के साथ राघव खूब हंसीठिठोली कर लेता है. कृति उम्र में राघव से छोटी है तो कभीकभी उस की बातों से लजा भी जाती है.

इन बातों को दिनेश ने कई बार नोट किया है. कृति के आने के बाद राघव के दोस्तों का भी घर में आनाजाना बढ़ गया था. कृति सब से हंस कर बात करती और एक अच्छी बहू की तरह सब की सेवासत्कार में लगी रहती. लेकिन बाहरी लड़कों का यों घर में जमघट लगना दिनेश को अच्छा नहीं लगता था.

कृति की सुंदरता ने दिनेश के अंदर शक और असुरक्षा की भावना भर दी थी. वह जितनी देर औफिस में होता था, उस की नजर फाइलों पर कम दीवार घड़ी पर ज्यादा रहती थी कि कब 6 बजें और वह घर भागे. दिनेश छुट्टियां भी बहुत लेने लगा था. आएदिन कोई न कोई बहाना बना कर मैनेजर के पास पहुंच जाता. औफिस के काम के संबंध में पहले वह हर महीने टूर पर जाता था, मगर शादी के बाद टूर पर भी नहीं जाना चाहता था. बहाने बना देता था.

मैनेजर जोरजबरदस्ती कर के भेज दे तो उलटापुलटा काम निबटा कर अगले दिन वापस आ जाता था. 6 महीने तो मैनेजर ने उसे औब्जर्व किया और फिर काम से निकाल बाहर किया. बीवी की रखवाली के चक्कर में दिनेश ने न सिर्फ अपना कैरियर बरबाद कर लिया बल्कि दोस्तों और घर वालों की नजर में उसे बीवी का पिछलग्गू भी समझ जाने लगा.

घर में कमाने वाला सिर्फ दिनेश ही था. उस की तनख्वाह से घर का खर्च और छोटे भाई की पढ़ाई ठीकठाक चल रही थी. जौब छूटने के बाद दिनेश ने कई जगह इंटरव्यू दिए, मगर नौकरी पाने में सफल नहीं हुआ. इधर बचत के पैसे खत्म होने लगे और उधर कृति की डिलिवरी की तारीख भी नजदीक आ गई. दिनेश की आर्थिक स्थिति इतनी जर्जर हो गई कि उस ने महल्ले वालों को घर में बच्चा होने की खुशी की मिठाई एक दोस्त से उधार पैसे ले कर खिलाई.

शक जब गहराने लगे

दिनेश के सिर पर कर्ज बढ़ रहा था. कृति को इस का एहसास था. खर्चा चलाने के लिए वह अपनी सोने की चेन दिनेश को दे चुकी थी. अम्मां ने भी अपनी चेन गिरवी रखवाई थी क्योंकि छोटे की फीस जमा होनी थी. कुछ दिन बाद कृति ने सोने की चूडि़यां भी दे दीं. दिनेश ने भारी मन से उन्हें बेचा.

धीरेधीरे डेढ़ साल गुजर गया. दिनेश को कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली. कभी ट्यूशन पढ़ा कर तो कभी किसी और तरीके से वह थोड़ाबहुत पैसा कमा रहा था, मगर इस थोड़ी सी पूंजी से घर का खर्च चलाना संभव नहीं हो रहा था.

एक दिन कृति ने दिनेश से कहा कि अगर उसे जौब नहीं मिल रही है तो क्यों न वह कहीं जौब कर ले. आखिर नर्सिंग ट्रेनिंग किस दिन काम आएगी. दिनेश को जब जौब मिल जाएगी तो कृति छोड़ देगी.

दिनेश राजी हो गया तो कृति ने 2-3 प्राइवेट अस्पतालों में अपना आवेदन भेज दिया. जल्द ही एक अस्पताल से इंटरव्यू की कौल आ गई. कृति दिनेश के साथ इंटरव्यू देने गई और पहले ही इंटरव्यू में उस का चयन हो गया. इंटरव्यू लेने वालों पर उस की डिगरियों से ज्यादा उस की सुंदरता और सलीके ने प्रभाव डाला. मां बनने के बाद कृति पहले से ज्यादा निखर गई थी.

कृति नौकरी पर जाने लगी तो दिनेश के मन में असुरक्षा की भावना और ज्यादा बढ़ गई. अस्पताल में तमाम जवान डाक्टर हैं. कहीं किसी के साथ कृति के संबंध न हो जाएं. सुबह जब कृति अस्पताल जाने के लिए तैयार हो कर निकलती तो दिनेश उस के दमकते शरीर को आंखें फाड़ कर देखता रह जाता. इस हीरे को कोई गपक न ले इस चिंता में वह घुला जाता था. कृति को अस्पताल छोड़ने और लेने वह खुद जाता था.

अब हाल यह हो गया कि अपने लिए नौकरी तलाशने के बजाय दिनेश दिन में कईकई चक्कर कृति के अस्पताल के लगाने लगा. 1-2 बार फोन भी कर लेता था. इस पर कृति को झंझलाहट भी होती थी. अगर किसी गंभीर केस की वजह से कृति को अंदर देर होती तो दिनेश की बेचैनी 7वें आसमान पर पहुंच जाती थी.

सुंदरता को ज्यादा महत्त्व

समाज चाहे जितना आधुनिक हो गया हो किंतु कुछ मामलों में सोच अभी भी पुरानी ही है. शादीविवाह के मामलों में आज भी स्त्री की पढ़ाई और योग्यता से ज्यादा उस की सुंदरता को तरजीह दी जाती है. सुंदर लड़कियों की शादी भी चटपट तय हो जाती है. लेकिन यह सुंदरता कभीकभी पति पर बहुत भारी पड़ती है. पति साधारण शक्लसूरत का हो और पत्नी हीरोइन जैसी दिखती हो तो पति चौकीदार बन कर रह जाता है.

आशंकित पति

पत्नी सुंदर हो तो पति उसे कहीं अकेले नहीं जाने देता बल्कि खुद साथ जाता है और कभीकभी तो ऐसा होता है कि जहां पत्नी को जाने की आवश्यकता भी नहीं होती, वहां भी वह यह सोच कर उसे साथ ले जाता है कि कहीं उस के घर में अकेले होने पर कोई अनहोनी न हो जाए, कहीं किसी पड़ोसी या छोटे या बड़े भाई से उस के संबंध न बन जाएं.

खूबसूरत और चिरजवां पत्नी पति के हाथ में एटम बम की तरह होती है जिस के प्रति वह हमेशा आशंकित रहता है कि पता नहीं कब दुर्घटना घट जाए.

सुंदरता और फरमाइशें

सुंदर पत्नी के कारण पति को पैसे भी ज्यादा खर्च करने पड़ते हैं. मसलन, खूबसूरत बीवी की सुंदरता कायम रखने के लिए अच्छे कपड़े, आधुनिक और महंगे कौस्मैटिक्स तथा अन्य सौंदर्य प्रसाधनों इत्यादि पर खर्च करना पड़ता है. खूबसूरत बीवी की सुंदरता में चार चांद लगाने के लिए त्योहारों या सालगिरह के मौके पर हीरे या सोने के आभूषण खरीदने पड़ते हैं. खासतौर पर दीवाली के मौके पर खूबसूरत पत्नी गहनों की डिमांड जरूर करती है.

खुद को फिट रखने की मजबूरी

सुंदर बीवी हो तो पति को अपने जीवन में भी कई बदलाव करने पड़ते हैं. अपनी फिटनैस की तरफ ध्यान देना पड़ता है. मनचाहे भोजन का त्याग कर के ऐसी डाइट लेनी पड़ती है जिस से उस की तोंद न निकले. कुछ पति तो खुद को स्लिमट्रिम रखने के चक्कर में केवल सलाद या बेस्वाद खाने से काम चलाने लगते हैं.

देखा गया है कि सुंदर पत्नी वाले पति के परिवार में शादीब्याह या कोई अन्य फंक्शन हो तो वह 1-2 महीने पहले से ही कसरत या गू्रमिं सैशन में जा कर अपने को फिट करने लगता है ताकि कोई उन की जोड़ी को बेमेल न कह दे.

सार्वजनिक जगह पर असुविधा

खूबसूरत बीवी साथ में होने पर सार्वजनिक जगह पर आप को असुविधाजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है. कई नौजवान और तरसे हुए लोगों को अपनी बीवी की ओर ताकते पाएंगे जो आप को असुरक्षा और हीनता का बोध कराएगा. खूबसूरत बीवी साथ में होने से आप उन लोगों को अपने आसपास ‘भाभीजी’ कहते हुए मंडराते पाएंगे, जिन्हें आप फूटी आंख भी पसंद नहीं करते हैं. पत्नी खूबसूरत मिल जाए तो रिश्तेदार और दोस्त भी आप में हीनभावना भरने का काम करने लगते हैं फिर चाहे आप अपने कार्यक्षेत्र में कितना ही सफल क्यों न हों.

क्या पहनें

खूबसूरत बीवी के साथ आप अपनी शौपिंग करने में भी सहज नहीं होते हैं. कपड़ों की दुकानों में सेल्समैन आप को महंगे कपड़े यह कह कर बेचने की कोशिश करेगा कि सर आप इस में भाभीजी के साथ जंचेंगे. मानों इन के महंगे कपड़े आप ने न पहने तो इन की नजर में आप की जोड़ी ‘हूर के साथ लंगूर वाली’ होगी.

औफिस और अन्य जगहों पर असहजता

आप चाहे जितने भी अक्लमंद और खुद्दार क्यों न हों, आप की तमाम खूबियां आप की खूबसूरत बीवी के आगे फीकी पड़ जाएंगी. आप चाहे जितने सफल हों औफिस की सालाना पार्टी में जब अपनी बीवी के साथ जाएंगे तो कई मातहत और वरिष्ठजन अनावश्यक रूप से आप की पत्नी की ओर काफी ध्यान देंगे जो आप को और आप की पत्नी को असहज कर देगा.

धर्मस्थलों पर कई स्वयं घोषित साधुसंन्यासी अथवा ज्योतिषी भी आप की जोड़ी की ओर आकृष्ट होंगे और आप की पत्नी से कहेंगे कि बेटी हाथ दिखाओ हम भविष्य देख कर बताएंगे कि तुम कब मां बनोगी.

यही ज्योतिषी जब आप का हाथ या कुंडली देखेंगे तो कहेंगे कि आप पूर्व जन्म में दुराचारी, दुष्ट पापी रहे हों और इसीलिए आप जिंदगी में कुछ बन नहीं रहे. पिछले जन्म में किए गए केवल एक पुण्य के चलते आप को यह सुंदर व सुशील स्त्री पत्नी रूप में मिली है. इस तरह की बकवास कर के आप से रुपएपैसे ऐंठने की कोशिश करेंगे और आप के तनाव को बढ़ा देंगे.

बावजूद इन सब बातों के लगभग हर आदमी की यही इच्छा होती हैं कि जब भी उस की शादी हो तो किसी सुंदर कन्या से ही हो. सिर्फ शादी करने वाला लड़का ही नहीं, बल्कि उस की मां और पिता भी यही चाहते हैं कि उन के घर में बेहद खूबसूरत बहू कदम रखे.

आजकल के जमाने में घर में खूबसूरत बीवी या बहू रखना एक तरह का शोऔफ सा हो गया है. लोग लड़की की योग्यता, शिक्षा या कैरियर की बजाय उस की सुंदरता के पीछे भागते हैं, जबकि बाहरी खूबसूरती ही सबकुछ नहीं होती हैं, आंतरिक सुंदरता और अच्छा व्यवहार भी माने रखता है.

शादी के 3-4 साल बीत जाने के बाद बहू का अच्छा व्यवहार और समझ ही रिश्तों को दूर तक निभाने में सहायक होती है. अगर अति सुंदर बहू घर के काम न करे, सासससुर से अच्छा व्यवहार न करे, पति की परेशानियों को न समझ पाए तो ऐसी सुंदरता कुछ समय बाद जहर लगने लगती है. समझदार वही पुरुष है जो लड़की के रूप के साथसाथ उस के गुण भी देखे. रूप भले कुछ कम हो मगर गुण और व्यवहार ही शादी को लंबे समय तक चलाते हैं.

कुछ दिनों से मेरी आईब्रो के बाल झड़ रहे हैं, क्या करूं?

सवाल-

मेरी आयु 25 साल है. कुछ दिनों से मेरी आईब्रो के बाल झड़ रहे हैं, जिस कारण मुझे बहुत चिंता हो रही है. कृपया कोई उपाय बताएं जिस से मेरी आईब्रोज के बाल झड़ने बंद हो जाएं?

जवाब-

अगर आप की आईब्रोज के बाल झड़ रहे हैं तो इस का कारण तनाव हो सकता है. दरअसल, ज्यादा टैंशन लेने से बाल झड़ने लगते हैं. इसलिए तनाव लेना बंद करें.

भोजन में पोषण और विटामिन की कमी जैसे जिंक, आयरन, विटामिन डी, विटामिन बी12 की कमी से भी आईब्रोज के बाल झड़ते हैं. अत: भोजन में इन्हें शामिल करें. जरूरत से ज्यादा प्लकिंग न करें. इस से भी आईब्रोज के बाल झड़ने लगते हैं. बालों को झड़ने से रोकने के लिए औलिव औयल से हलके हाथों से आईब्रोज की सर्कुलर मोशन में मसाज करें. 30 मिनट तक तेल को लगा रहने दें. फिर कुनकुने पानी से चेहरा धो लें.

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आजकल घनी और मोटी आकार की आइब्रो काफी ट्रेंड में है. इस तरह की आइब्रो आपके चेहरे को सुंदर व आकर्षक बनाती है. वैसे तो अलग अलग फेसकट के अनुसार, अलग अलग आइब्रो शेप फबती है लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है आइब्रो का घना और मोटा होना. हालांकि कुछ लड़किया जिनकी आइब्रो हल्की होती है वो बाजार में मिलने वाली आइब्रो पेंसिल का इस्तेमाल कर अपने आइब्रो को अस्थायी रूप से मोटा दिखाने का प्रयास करती हैं जो देखने में सुंदर भी लगता है. लेकिन प्राकृतिक रूप से घने आइब्रो की बात ही कुछ अलग है, यह आपको नेचुरल रूप से खूबसूरत दिखाते हैं. अगर आपकी आइब्रो भी हल्की हैं तो आपको परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि नीचे दिए हुए कुछ घरेलू उपाय अपनाकर आप घर बैठे ही इस समस्या से निजात पा सकती हैं.

Monsoon Special: बारिश के मौसम में हेयर कलरिंग से दें नया लुक

अकसर हम हर मौनसून का मजा नईनई डिशेज का लुत्फ उठा कर लेते हैं. क्यों न इस मौनसून का हम अपनी पर्सनैलिटी में कुछ बदलाव कर के मजा लें? अपनी पर्सनैलिटी को नया लुक देने के लिए आप अपने बालों को डिफरैंट स्टाइल में कलर कर सकती हैं. आइए, जानते हैं कैसे :

1. स्लाइसिंग:

बालों की पतलीपतली 1-2 लेयर्स ले कर कलर करें. ऐसा करने से कलर की क्वालिटी तो अच्छी नजर आती ही है, लुक भी पूरी तरह चेंज नजर आता है.

2. चंक्स:

चंक्स को बालों में फैशन ऐक्सैसरीज की तरह प्रयोग किया जाता है. इस में बालों के एक मोटे हिस्से की अंदर की छिपी जगह पर कलर किया जाता है. इस से कलर अंदर से हाईलाइट होता है. अगर आप खुद को बोल्ड ऐंड कौन्फिडैंट लुक में देखना चाहती हैं, तो चंक्स आप के लिए बढि़या औप्शन है.

3. फैदर ब्लौक:

इस में अंदर बालों के एंड्स पर कलर किया जाता है. इसी कारण यह स्टाइल लेयर्स में कटे बालों में ज्यादा सुंदर दिखता है.

4. ओंब्रे:

हेयर कलरिंग की यह तकनीक उन महिलाओं के लिए बैस्ट है, जो नैचुरल लुक के साथसाथ ग्लैमरस भी नजर आना चाहती हैं. इस में ऊपर के बालों में डार्क कलर किया जाता है, जो नीचे तक आतेआते लाइट हो जाता है. कई बार कुछ महिलाएं अपने प्रोफैशन के कारण अपने लिए बोल्ड कलर्स का चयन नहीं कर पाती हैं. कलरिंग की यह तकनीक उन के लिए बैस्ट है.

5. हेयर कलर्स:

इंडियन टोन पर सूट करती मरसाला टोन इन दिनों इन है. इसीलिए इस टोन को हेयर कलरिंग के लिए काफी पसंद किया जा रहा है. मरसाला के अलावा रैड, पिंक, पर्पल टोन भी इन हैं. ब्राउन तो ऐवरग्रीन टोन है ही. इन दिनों इस टोन में डार्क चौकलेट ब्राउन व कैरेमल ब्राउन शेड्स काफी पसंद किए जा रहे हैं. वैसे परमानैंट कलर्स के अलावा आप टैंपरेरी हेयर चौक्स से भी बालों को कलरफुल बना सकती हैं. ये चौक्स मल्टीपल कलर में मिलती हैं और 3-4 वाश तक टिकती हैं.

6. बै्रंड:

हेयर कलरिंग के शौकीनों को हमेशा ब्रैंडेड हेयर कलर का ही इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि बालों को स्टाइलिश लुक देने के साथसाथ उन की मजबूती और प्राकृतिक चमक का ध्यान रखना भी जरूरी होता है.

– इशिका तनेजा ऐल्प्स ब्यूटी क्लिनिक

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