मृगमरीचिका एक अंतहीन लालसा: भाग 1-मीनू ने कैसे चुकाई कीमत

‘‘मम्मा आज मैं अपनी नई वाली बोतल में पानी ले जाऊंगी,’’ नन्ही खुशी चहकते हुए मुझ से बोली. ‘‘ओके,’’ कहते हुए मैं ने उसे स्कूल के लिए तैयार किया.

‘‘मीनू पार्लर की लिस्ट मैं सतीश को दे आया था. 11-12 बजे तक सामान पहुंचा देगा. तुम चैक कर लेना,’’ ऋ षभ ने नाश्ता करते हुए कहा. ठीक है आप चिंता न करें, ‘‘मैं ने कहा, फिर खुशी और ऋ षभ के चले जाने के बाद मैं आरामकुरसी पर निढाल हो गई. यह तो अच्छा था कि ऋ षभ के औफिस के रास्ते में ही खुशी का स्कूल पड़ता था और वे उसे स्कूल ड्रौप करते हुए अपने औफिस निकल जाते थे वरना तो उसे स्कूल छोड़ने भी मुझे ही जाना पड़ता. दोपहर 1 बजे तक उस का स्कूल होता था. तब तक मैं अपने सभी काम निबटा कर उसे ले आती थी. तभी अचानक किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया. मैं ने दरवाजा खोला, तो सामने पड़ोसिन ममता हांफती हुई दिखाई दी.

‘‘क्या हुआ? कहां से भागतीदौड़ती चली आ रही है?’’ मैं ने पूछा, क्योंकि मैं उसे अच्छी तरह जानती थी कि उसे तिल का ताड़ बनाना बहुत अच्छी तरह आता है. ‘‘यार बुरी खबर है. मयंक की बीवी ने आत्महत्या कर ली.’’

‘‘क्या? क्या कह रही है तू?’’ ‘‘हां यार सभी सकते मैं हैं,’’ वह बोली और फिर पूरी बात बताने लगी.

उस के जाने के बाद मेरे दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया. उफ पूजा ने यह क्या कर लिया. अपने 2 साल के बच्चे को यों छोड़ कर… लेकिन वह तो प्रैगनैंट भी थी. मतलब उस ने नन्ही सी जान को भी अपनी कोख में ही दफन कर लिया. आखिर ऐसा उस ने क्यों किया… मैं जानती थी, फिर भी हैरान थी. दिमाग में बहुत से प्रश्न हथौड़े की तरह चलते जा रहे थे… मयंक को तो मैं अच्छी तरह जानती थी. उस की शादी में नहीं गई थी, लेकिन लोगों से सुना अवश्य था कि बहुत खूबसूरत व समझदार है उस की पत्नी. बाद में तो यह तक सुनने में आया था कि बातबात पर वह पत्नी को मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना देता है. उसे उस के मायके नहीं जाने देता. यहां तक कि उस के मातापिता के लिए अपशब्द भी कहता है.

एक बार एक आयोजन में उस की पत्नी से मुलाकात हुई थी, तो आंखों में आंसू भर कर उस ने मुझ से यही 2 शब्द कहे थे कि दीदी, काश हम भी आप की तरह खुशहाल होते. हां खुशहाल ही तो थी मैं कि मयंक के चंगुल से बच निकली थी. वाकई अगर ऋ षभ ने न संभाला होता, तो मैं कतराकतरा हो कर कब की टूट कर बिखर गई होती. सोचतेसोचते मेरा मन अतीत की गहराइयों में विचरने लगा…

‘‘भाभी यह रंग आप पर बहुत खिल रहा है,’’ कुछ गहरे गुलाबी रंग की साड़ी पहन कर घर के बाहर सब्जी खरीदते समय किसी ने मुझे पीछे से आवाज दी. हम नएनए ही शिफ्ट हुए थे. मयंक हमारे पड़ोसी का लड़का था. 23-24 की उम्र में उस का शारीरिक सौष्ठव कमाल का था.

जी थैंक्स, कह कर मैं अपनी ओर एकटक निहारते मयंक को देख थोड़ी असहज हो गई. मयंक ने कहना जारी रखा, ‘‘सच कुछ लोगों को कुदरत ने फुरसत में बनाया होता है और आप उन में से एक हो?’’

‘‘यह कुछ ज्यादा नहीं हो गया क्या?’’ मैं कहते हुए हंस दी. अंदर आ कर खुद को शीशे में निहारते हुए मैं खुद भी बुदबुदा उठी कि सच में कुदरत ने मुझे फुरसत में बनाया है. दूध सी मेरी काया और उस पर तीखे नैननक्श मेरी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं. उस पर कपड़ों का मेरा चुनाव लोगों के बीच मुझे चर्चा का विषय बना देता था.

वैसे तो ऐसी तारीफें सुनने की मुझे आदत सी पड़ गई थी, लेकिन मयंक द्वारा की गई तारीफ से मुझ में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई. उस का मेरी आंखों में गहरे झांक कर देखना फिर अर्थपूर्ण तरीके से मुसकराना मुझे अच्छा लगा. सच कहूं तो उस के शब्दों से ज्यादा उस की मोहक मुसकान ने मुझे लुभाया. पड़ोसी होने के नाते गाहेबगाहे उस से मेरी मुलाकात होती रहती थी. उस वक्त खुशी बहुत छोटी थी और मेरे पार्लर के भी ढेर सारे काम होते थे. ऐसे में कभीकभी मैं झुंझला उठती थी. एक दिन मैं ऋषभ से अपनी परेशानी का रोना ले कर बैठी ही थी कि मयंक आ गया. बातों ही बातों में उस ने मुझे मदद की पेशकश की, जिसे मुझ से पहले ऋ षभ ने स्वीकार कर लिया.

अब मयंक तकरीबन रोज मेरे छोटेमोटे कामों में हाथ बंटाने के लिए आने लगा. उस की गाड़ी पर बैठतेउतरते समय जब कभी मेरा हाथ उस से टच होता तो वह बड़ी ही शरारत से मुसकरा उठता. मन ही मन उस की यह शरारत मुझे अच्छी लगती, पर ऊपर से मैं उसे बनावटी गुस्से से देखती तो झट से सौरी बोल कर अपना मुंह घुमा लेता. धीरेधीरे मुझे उस के साथ की आदत पड़ गई.

उधर ऋ षभ की प्राइवेट जौब थी. वे देर रात घर आते थे. कई बार तो उन्हें औफिस के काम से शहर के बाहर भी रहना होता था. वैसे भी ऋ षभ मेरे लिए एक बोरिंग इंसान थे, जिन्हें मेरी खूबसूरती से ज्यादा औफिस की फाइलों से प्यार था. हां, मेरी और खुशी की जरूरतों का वे पूरा ध्यान रखते थे.

पर उम्र का जोश कहें या वक्त की कमजोरी, मेरा चंचल मन इतने भर से संतुष्ट नहीं था या यों कह लें कि मयंक ने किसी शांत झील की तरह पड़ी मेरी सोई हुई कामनाओं को अपने आकर्षण के जादू का पत्थर फेंक जगा दिया था. मयंक की छेड़छाड़, जानेअनजाने उस का छू जाना, उस का जोशीला साथ अब मुझे रोमांचित करने लगा था. मयंक तो पहले से ही बेपरवाह और दुस्साहसी किस्म का इंसान था,

मेरे मौन में उस ने मेरी रंजामंदी शायद महसूस कर ली थी. अब अधिकतर वह मेरे साथ ही रहने लगा.

खुशी को स्कूल छोड़ना व लाना, जब मैं पार्लर में व्यस्त रहूं तो उसे पार्क घुमाना, मेरे पार्लर का सामान लाना, शौपिंग में मेरी मदद करना आदि काम वह खुशीखुशी करता था. ऋ षभ के शहर से बाहर रहने पर भी वह हमारा बहुत खयाल रखता था. मैं उस जगह नई थी और ऋषभ किसी से सीधे मुंह बात भी नहीं करते थे, इसलिए लोगों की निगाहें हमें देख कर भी अनदेखा करती थीं. हालांकि पार्लर में कई महिलाएं हमारे बीच क्या चल रहा है, इस खबर को जानने के लिए उत्सुक नजर आती थीं, लेकिन मैं मस्त हो कर अपना काम करती थी. लेकिन इतना तय था कि मैं और खुशी दोनों ही मयंक के मोहपाश में बंधी जा रही थीं. खुशी तो बच्ची थी पर मैं बड़ी हो कर भी बहुत नादान.

ऐसी ही एक शाम ऋ षभ चेन्नई में थे. मैं और मयंक पार्लर का कुछ सामान लेने गए थे. खुशी को मैं ने ऋ षभ की रिश्ते में लगने वाली एक मौसी (जो हमारे घर के पास ही रहती थीं) के यहां छोड़ दिया था. बाजार से लौटते हुए हमें देर हो चुकी थी. बारिश और हलकी फुहारों ने हमें कुछ भिगो भी दिया था. उस की गाड़ी से उतरते समय तेज ब्रेक लगने के कारण मैं उस से जा चिपकी और मेरे दोनों हाथ उस के कंधों पर जा टिके. वाकई यह बहुत खूबसूरत सुखानुभूति थी, जिस ने मुझे रोमांचित कर दिया. बहरहाल ताला खोल कर हम अंदर आ गए. ‘‘मयंक अब तुम जाओ. काफी देर हो चुकी है. मैं खुशी को ले कर आती हूं,’’ मेरे कहने पर भी वह सोफे पर बैठा रहा.

‘‘अगर रात यहीं रुक जाऊं तो?’’ उस की आंखों में फिर वही शरारत थी. चाह कर भी उसे इनकार न कर सकी. मौसम की खुमारी कहें या गीले तन की खुशबू, हम दोनों ही बहकने लगे. मयंक ने मेरा हाथ खींच कर मुझे सोफे पर बैठा लिया. पूरी रात न मुझे खुशी की याद रही न अपने पत्नीधर्म की.

रात के उस व्यभिचार के बाद भी मैं सुबह बड़े ही सहज भाव से उठी और खुद को तरोताजा महसूस किया. मयंक के साथ ने जैसे जीवन में एक उमंग भर दी थी. उस वक्त मेरे मन में कोई अपराधबोध या आत्मग्लानि नहीं थी. मैं बहुत खुश थी और खुशी को मौसी के घर से यह बहाना कर के ले आई कि रात बहुत हो चुकी थी तो मैं ने आप को डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा. मौसी ने फौरन मेरी बात पर विश्वास भी कर लिया. अपने सभी काम समय पर निबटा कर पार्लर खोलते वक्त मैं यही सोचने लगी कि ऋ षभ तो कल आने वाले हैं यानी आज रात भी… और मैं सुर्ख होने लगी. जल्दी से सारे काम निबटाने के बाद उम्मीद के मुताबिक अंधेरा होते ही मयंक आ गया. खुशी को सुला कर हम दोनों एक बार फिर प्यार में डूब गए. मुझे पता नहीं था कि मेरी यह खुमारी आगे क्या गुल खिलाने वाली है.

‘मिस टीन इंटरनेशनल प्रिंसेस’ स्वीजल मारिया फुर्टार्डो ने ब्यूटी के बारें में क्या कहा, पढ़े इंटरव्यू

ब्यूटी आउटर नहीं होती, अंदर से आती है, जो रंग रूप नहीं, बल्कि स्वभाव, बातचीत का तरीका, जो सबका दिल जीत सके, काइंड हार्टेड हो, सबको सम्मान दे सकें आदि जरुरी है, कहती है 18 वर्ष की सुंदरी स्वीज़ल मारिया फुर्टार्डो ने साउथ अमेरिका के पेरू में हुए मिस टीन यूनिवर्सल 2023 ‘मिस टीन इंटरनेशनल प्रिंसेस’ का ख़िताब जीतकर इंडिया को गर्वान्वित किया है.

इसमें 14 देशों की सुंदरियों ने भाग लिया था, जिसमे जीत हासिल करना आसान नहीं था. इसके अलावा उन्होंने ‘मिस टीन यूनिवर्सल’ और ‘बेस्ट कॉस्टयूम अवार्ड’ के टाइटल को भी जीता है. स्वीज़ल को डांस, पेंटिंग, आर्ट एंड क्राफ्ट पसंद करती है. उसे फैशन मेनिया है और हर तरह के नए सुंदर कपड़ों को पहनना पसंद करती है. वह फूडी है, उसे दाल, चावल और फिश फ्राई पसंद है, लेकिन मुंबई की पांव भाजी उसे बहुत पसंद है.

अपने अनुभव को शेयर करती हुई स्वीज़ल कहती है कि मैं इस कॉम्पिटिशन के लिए पेरू गयी थी, वहां मैं कोलंबिया की एक प्रतियोगी से मिली, जहाँ उन्होंने कोलंबिया की कल्चर के बारें में बात की. वहां से लाई कॉफ़ी बीन्स का सेवन किया, ये मेरे लिए बहुत ही सुंदर अवसर था, जहाँ मुझे अलग-अलग देशों से आये सभी से मिलने और उनके खान-पान रहन-सहन के बारें में जानकारी मिली, जिसे मैंने एन्जॉय किया है.

खूबसूरत और हंसमुख स्वीज़ल कर्नाटक के बेंगलुरु की रहने वाली है. ब्यूटी पीजेंट की दुनिया में आने से पहले उन्होंने फैशन इंडस्ट्री में कदम रखा और वर्ष 2021 में बेंगलुरु में हुए इग्नाइट इंडिया मेराकी फैशन कम्पटीशन की विनर बनी. वहां उन्हें रियल खूबसूरती के लिए फ्रेश फेस ऑफ़ इग्नाइट इंडिया 2021 का ख़िताब मिला. इसके बाद दिल्ली में हुए स्टार एंटरटेनमेंट प्रोडक्शन में भाग लिया, जहाँ वह मिस सुपर मॉडल इंडिया की सेकेण्ड रनर अप चुनी गई.

इसी जीत से उन्हें मिस टीन यूनिवर्सल में इंडिया 2023 में जाने की प्रेरणा मिली. स्वीज़ल ने इंटरनेशनल पेजेंट के लिए काफी मेहनत की है. आगे वह मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स में जाने की तैयारी कर रही है. साथ ही सेकेण्ड इयर कॉमर्स में ग्रेजुएशन कर रही है.

इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा के बारें में स्वीज़ल कहती है कि मैंने बचपन से ही ब्यूटी के क्षेत्र में जाने का सपना देखा है, जिसमे पेजेंट क्वीन बनने की मेरी इच्छा भी सालों से है. मैं जब तीसरी कक्षा में थी और फैशन कॉम्पिटिशन हुआ था, उस समय मुझे सुंदर पोशाक पहनकर रैंप पर चलना बहुत अच्छा लगा था. जब मैं 7वीं कक्षा में थी तो भी मैंने एक किड शो में भाग लिया और जीत गई, इससे मेरे अंदर प्रेरणा जगी और मुझे ये सब करना अच्छा लगने लगा था, लेकिन थोड़ी बड़ी होने पर मेरी पढाई अधिक हो गई और मैं कुछ समय तक पढ़ाई की ओर मन लगाई.

बोर्ड की परीक्षा के बाद मैंने मिस टीन इंडिया के लिए तैयारी की और मिस टीन इंडिया का ख़िताब मिला. मुझे पता चल गया कि मुझे रैंप पर चलना, अच्छे पोशाक पहनना, कैमरे के आगे आना, प्रश्न उत्तर का सेशंस फेस करना आदि सब पसंद है और मुझे इसी क्षेत्र में ही जाना चाहिए. इसके बाद से मैंने इस फील्ड को सीरियसली लेना शुरू किया और एक के बाद एक प्रतोयोगिताओं में भाग लेना शुरू कर दिया. इंटरनेशनल लेवल पर इस ख़िताब को जीतना मेरे लिए एक प्राउड मोमेंट है, बहुत अच्छा महसूस हो रहा है.

इसके आगे स्वीज़ल कहती है कि पहले के किसी भी प्रतियोगिता के लिए मैंने कभी ट्रेनिंग नहीं ली, पर इस इंटरनेशनल पेजेंट के लिए मैंने मुंबई जाकर ट्रेनिंग लिया. इसमें इतने लोगों के सामने बात करना यानि कम्युनिकेशन स्किल्स को बढ़ाना जरुरी था, जिसे मैंने रोज घंटों आईने के आगे खड़ी होकर प्रैक्टिस किया. इसके अलावा रैंप पर चलने का तरीका, कैमरा फेस करना, सुबह 6 बजे उठकर जिम जाकर फिटनेस ट्रेनिंग लेना, आदि कई किये है.

इस ट्रेनिंग के बाद मेरी जिंदगी काफी बदली है, पहले मैं एक नार्मल लड़की थी. अब मैं ग्रूम हो चुकी हूँ और इस अवार्ड के बाद लोग मुझे पहचानने लगे है, अधिक से अधिक लोग मुझे सोशल मीडिया पर फोलो कर रहे है, ये मुझे प्रसिद्धि देने के साथ-साथ, मेरी सोशल हेल्प को भी समझते है, जो मैं मानसिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए करती हूँ.

स्वीज़ल का कहना है कि मैं आगे किसी बड़ी टाइटल को जीतना चाहती हूँ, मसलन मिस यूनिवर्स या मिस वर्ल्ड, जिसके लिए मेरी तैयारी जारी है. अगर मुझे कोई भी ख़िताब मिलता है, तो मैं अनाथ, मानसिक रूप से बीमार और गरीब बच्चों के लिए कुछ अच्छा करना चाहती हूँ, क्योंकि मुझे बच्चों से बहुत प्यार है. मैं ऐसे कई एनजीओज के साथ जुडी भी हुई हूँ, जो इन जरूरतमंद बच्चों के लिए काम करती है. इन छोटे बच्चों के लिए कुछ करना बहुत जरुरी है, क्योंकि उनकी ख़ुशी मेरी ख़ुशी है. मैं सभी से अपील करती हूँ कि जिसे भी समय मिले, इन बच्चों से मिलकर, उनके साथ समय बिताएं, ये समाज के लिए एक बड़ी सहयोग है.

मिस टीन स्वीज़ल को पारिवारिक सहयोग हमेशा मिला है, वह कहती है कि जब मैं छोटी थी, मैंने माँ से अपनी इच्छा बताई, तो उन्होंने बहुत सपोर्ट किया. मैं इसके लिए खुद को बहुत लकी मानती हूँ, क्योंकि उन्होंने हर समय मेरा साथ दिया है. वे अब मेरी कामयाबी से बहुत खुश है. मैं अपने पेरेंट्स की अकेली संतान हूँ.

फिल्मों में काम करने की इच्छा स्वीज़ल रखती है और हंसती हुई कहती है कि अगर मुझे किसी मीनिंग फुल स्क्रिप्ट में काम करने का मौका मिले तो मैं अवश्य हिंदी फिल्म में काम करना चाहती हूँ. मेरे हिसाब से फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं, कोई भी क्षेत्र आसान नहीं होता, कही भी काम आसानी से नहीं मिलता, संघर्ष हमेशा चलता रहता है. सही मंच कहीं भी मिले, मुझे काम करने में ऐतराज नहीं. मेरा सभी टीनएज से मेसेज है कि जीवन में कोई भी काम आसान नहीं होता, कुछ भी जल्दी नहीं मिलता, हर क्षेत्र में कामयाबी के लिए मेहनत, लगन और धीरज की जरुरत होती है, कभी आलसी न बनें, क्योंकि अभी समय है, जब आप मेहनत से अपनी मंजिल पा सकते है.

अनुपमा की जिंदगी में तूफान बनेंगी डिंपल, अनु की तस्वीर देख भड़की मालती देवी

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ को टीआरपी में नंबर वन बनाने के लिए मेकर्स खूब प्रयास कर रहे है. ‘अनुपमा’ के नए-नए ट्विस्ट और टर्न्स को देखकर दर्शकों का सिर चकरा गया है. जहां एक तरफ अनुपमा ने अपनी ममता के चक्कर में अमेरिका का सपना तोड़ दिया, वहीं दूसरी ओर मालती देवी ने उसकी जिंदगी बर्बाद करने का फैसला किया है. बीते एपिसोड में देखने को मिला कि मालती देवी अनुपमा की जिंदगी बर्बाद करने की चेतावनी देती है.

डिंपल को मिले ताने

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि डिंपल सभी के बीच आएगी और उसको हर कोई सुनाने लग जाएगा. लेकिन डिंपी खुद को साबित करने में लगी रहेगी. इसी बीच डिंपल, बापूजी से कहेगी- ‘ये सब ज्ञान अनुपमा को दो उसी की वजह से ये सब हो रहा है’. वहीं कपाड़िया हाउस में अनु को स्पेशल फील कराने के लिए की पूरी तैयारी होती है.

 

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जब अनुपमा ने अखबार पढ़ा

सीरियल में छोटी अनु डांस के बाद भावुक हो जाती है. अनुपमा उसे खुश करती है. ये सब देखकर अनुज और किंजल खुश हो जाते है. वहीं दूसरी ओर गुरु मां, अनुपमा के सामान के बीच उसकी फोटो देख लेती है, जिससे उन्हें गुस्सा आ जाता है और वह कहती है अनुपमा की सारी खुशियां छीन लेगी. दूसरी तरफ पार्टी के बीच अनुपमा की नजर अखबार पर जाती है वह उस पर अपनी खबर पढ़ लेती है. वह न्यूज आर्टिकल देखकर हैरान हो जाती है.

अनुपमा की जिंदगी में तूफान बनेंगी डिंपल

अनुपमा में देखने को मिलेगा कि डिंपल मीडिया के सामने अनुपमा के खिलाफ बयान दे देगी. वह मीडिया वालों को बताएगी कि अनुपमा ने मालती देवी का कॉन्ट्रैक्ट तोड़ा है, जिससे मालती देवी का अच्छा-खासा नुकसान हुआ है. ऐसे में मालती देवी उसपर मुकदमा भी कर सकती हैं. इस बात के लिए बा और तोषू सहित घर के बाकी सदस्य डिंपल को जमकर खरी-खोटी सुनाते हैं.

‘Drishyam 2’ एक्ट्रेस इशिता दत्ता बनीं मां, 8 साल पहले हुई थी शादी

टीवी से शुरुआत करके बॉलीवुड में अपनी जगह बनाने वाली ‘दृश्यम 2’ एक्ट्रेस इशिता दत्ता और एक्टर वत्सल सेठ के घर में किलकारियां गूंजी है. दरअसल एक्ट्रेस इशिता दत्ता और वत्सल सेठ के घर में नन्हा मेहमान आया है. इशिता दत्ता ने कुछ दिनों पहले ही इंस्टाग्राम स्टोरी शेयर की थी, जिसमें उन्होंने प्रेग्नेंसी से जुड़ा अपडेट दिया था. इशिता दत्ता का कहना था कि प्रेग्नेंसी का आखिरी महीना बिल्कुल भी आसान नहीं होता है. बेटे के जन्म के लिए इशिता दत्ता और वत्सल सेठ को फैंस की तरफ से कई सारी बधाइयां मिल रही हैं.

इशिता ने बेटे को दिया जन्म

‘दृश्यम 2’ एक्ट्रेस इशिता दत्ता ने बहुत ही प्यारे बेटे को जन्म दिया है. वहीं सूत्रों के हवाले से पता चला है कि बेबी और मां दोनों ही स्वस्थ है. कहा जा रहा है इशिता को शुक्रवार तक अस्पताल से डिस्चार्ज हो जाएंगी. घर में नन्हा मेहमान आने से परिवार में खुशी का ठिकाना नहीं.

प्रेग्नेंसी की घोषणा 31 मार्च की

एक्ट्रेस इशिता दत्ता और वत्सल सेठ ने 31 मार्च को इस बात की घोषणा की थी कि उनके घर नन्हा मेहमान आने वाला है. इशिता दत्ता की बेबी शावर से जुड़ी तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुई थीं, जिसमें काजोल ने भी शिरकत की थी. इसके साथ ही कुछ दिन पहले ही बांग्ली अंदाज में बेबी शावर हुआ था जिसकी वीडियो एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया पर शेयर की थी.

 

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एक्ट्रेस नें कहा पहला 3 महीना काफी मुश्किल था लेकिन इस हालत में मैंने काम करना नहीं छोड़ा था. इशिता ने अपनी अपकमिंग मूवी की शूटिंग प्रेग्नेंसी तक पूरी की थी.

 

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इशिता दत्ता ने प्रेग्नेंसी को लेकर कहा था कि, “पहला तीन महीना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन उस दौरान ही मुझे 16 से 17 फ्लाइट्स लेनी पड़ी. लेकिन मेरे डॉक्टर ने बहुत ख्याल रखा और इस बात की भी पुष्टि की कि सबकुछ ठीक रहे.”

फंदों की सतरंगी दुनिया

फदों की दुनिया भी बड़ी अजीब होती है. अगर हम गौर से देखें तो इस संसार का हर प्राणी किसी न किसी फंदे के शिकंजे में फंसा हुआ नजर आएगा. कोई अपनी बीवी के फंदों से दुखी है, तो कोई प्रेमिका के प्यार में गरदन फंसा कर कसमसा रहा है, जो न छोड़ती है न ही शादी कर रही है. इतना ही नहीं, कोई पैसे की मारामारी में फंसा है, तो कोई दोस्त की गद्दारी में. कोई बौस की चमचागीरी में, तो कोई नेता या पुलिस की दादागीरी में.

फंदों का एक बहुत बड़ा अखाड़ा हमारी राजनीति को भी कहा जा सकता है. गरदन तक जुल्म की दुनिया में डूबे लोगों को सालों के इंतजार के बाद कानून गले में फंदा पहनाने का हुक्म सुना पाता है. पर वोट की शतरंज बिछाए नेताओं को ऐसे लोगों से सहानुभूति हो जाती है. वे फांसी के फंदे में भी फंदा फंसा अपनी वोट की राजनीति कर जाते हैं यानी उन्हें छुड़ा लेते हैं.

इस प्रसंग में एक और किस्म के प्राणियों का यदि जिक्र न किया तो यह चर्चा बेजान नजर आएगी. वे हैं हमारी हाउस मेकर बहनें, जिन्हें सर्दियों के आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है. सितंबर में जरा सर्द हवाएं चलीं नहीं कि उन का ऊन, सलाइयों और फंदों का सफर शुरू हो जाता है.

इस में पहले पिछले साल के आधेअधूरे छोड़े स्वैटरों पर काम शुरू होता है, फिर नए ऊनों के लिए बाजार का रुख किया जाता है. जल्दीजल्दी रसोई और घर का काम निबटाया जाता है और वे ले कर बैठ जाती हैं ऊन और सलाइयां. कभी घरों की छतों पर महफिल जमती है, तो कभी किसी की धूप वाली बालकनी में.

बुनाई के साथ ये गृहिणियां एकदूसरे से बहुत से टिप्स भी बांट लेती हैं. जैसे, मटर के छिलकों की रैसिपी, कई चीजों के दाम, कहां मिलेंगी महंगाई के जमाने में कौन सी चीजें सस्ती. सारी जानकारियां बिलकुल सच्ची और फ्री में. साथ में सुखदुख और महल्ले की अपडेट खबरें, जो किसी अखबार या न्यूज चैनल पर किसी को नहीं मिल सकतीं और सब से कमाल की बात यह कि यह सब चलता रहता है और हाथ की सलाइयां बिना रुके फंदों पर फंदे पिरोती जाती हैं. शायद इसे ही कहते हैं एक पंथ दो काज.

बुनाई का फंदा जिस को भा गया, उस की मनोदशा ही कुछ अजीबोगरीब हो जाती है. उस का रातदिन ऐसी कल्पनाओं के संसार में खोया रहता है कि कौन से रंग में कौन सा कौंबिनेशन खूब जमेगा, रजनी की बहू को सर्दियों में बच्चा होगा, उस के लिए अभी से 1-2 बेबी सैट तैयार करने हैं. वहां रजनी की ननद भी जरूर आएगी. बुनाई और स्वैटर बनाने में तो वह ऐक्सपर्ट है.

मैगजीन वगैरह में भी उस के बनाए स्वैटरों के डिजाइन निकलते हैं और जिस महफिल में वह जाती है, बुनाई पूछने और प्रशंसा करने वालों से घिरी रहती है. उस के स्वैटर से मेरे स्वैटर किसी तरह से कम नहीं होने चाहिए. इसी सोच और उधेड़बुन में काफी समय निकल जाता है. यह स्पर्धा और ईर्ष्या भी अजीब चीज होती है. कभी आगे बढ़ाती है तो कभीकभी दिल को जला कर भी रख देती है.

उर्मिलाजी अपनी बालकनी से पड़ोस में नई बसी फैमिली में एक छोटे बच्चे को रोजाना देखती थीं. वह नएनए डिजाइन के स्वैटर पहने चहक रहा होता. अब कैसे एकदम अनजान लोगों से मित्रता बढ़ाई जाए और उस पर भी एकदम से स्वैटर का डिजाइन पूछना काफी ‘भद्दा’ लगता है. पर अपने पर कंट्रोल भी तो नहीं होता. खैर, किसी तरह नए पड़ोसी से बच्चे के बहाने मेलजोल बढ़ा लिया और अवसर मिलते ही छेड़ दी सलाई और फंदों की बातें.

पड़ोसिन भी एक नंबर की बुनक्कड़ निकलीं. दोनों के विचार मिले तो ऊन और सलाइयां तो जैसे हाथों में भागने लगीं. बस जल्दी से रसोई और जरूरी दैनिक कार्य निबटाए और बुनाई का काम शुरू. कभीकभी तो यह काम कंपीटिशन जैसा हो जाता और हाथ की हड्डियां दर्द होने लगतीं. घर वालों से दर्द की बात कहने पर डांट और सहनी पड़ती. फिर भी बुनाई का सफर मुश्किलों से जू?ाते हुए अनवरत जारी रहता. सचमुच बुनाई को जिन्होंने हौबी बना लिया, उन्हें तो हर हालत में इस से जुड़ा कुछ न कुछ करते रहना होता है.

रंजना को एक इंटरव्यू देने जाना था. वह अपने हाथ का बुना लेटैस्ट बुनाई वाला स्वैटर पहन कर वहां गई. वहां इंटरव्यू टीम की एक महिला की नजर उस पर गई तो रंजना की काफी तारीफ हुई. साइंस स्टूडैंट हो कर भी उस की बुनाई में ऐसी सफाई और निपुणता देख सभी वाहवाह कर उठे. पता नहीं रंजना को वह जौब मिलेगी या नहीं पर यह जान कर उसे बहुत अच्छा लगा कि हाथ की बुनाई के कद्रदान सभी जगह बैठे हैं.

छोटे बच्चों के लिए हाथ से बुने प्यारे व आकर्षक रंगबिरंगे स्वैटर का रिवाज सदियों से हमारी हाउस मेकर बहनों के कारण आज भी कायम है. जो लोग बुनाई नहीं कर सकते, वे ईर्ष्यावश ये कमैंट्स करते देखे गए हैं कि हमारे बच्चे तो हाथ के बुने स्वैटर पहनते ही नहीं, इसलिए हमें इतनी मेहनत करने और आंखें लगाने की क्या जरूरत है? फिर बाजार में एक से बढ़ कर एक सुंदर डिजाइन वाले स्वैटर मिल जाते हैं, तो क्यों न हम उन्हें खरीदें.

पर आज भी जिन के घरों में मम्मी, दादी, नानी, मौसी, ताई या कोई और हाथ की बुनाई की कला में सिद्धहस्त है, उन घरों के किशोर बच्चे बड़े शौक से उन के हाथ के बुने स्वैटर पहन कालेज, जौब और कई बार तो फंक्शन में भी जाते हैं और बड़े गर्व से सब को बताते भी हैं कि यह उन की मां, बूआ, दादी या किसी और ने उन्हें जन्मदिन पर बना कर दिया है.

ऐसे उपहार में 1-1 फंदे में गुंथीबुनी होती हैं देने वाले की सच्ची, कोमल, लगाव भरी भावनाएं और लेने वाला जब भी उस स्वैटर को सर्द हवाओं में पहनता है तो देने वाले की नेह भरी गरमाहट के फंदों की गिरफ्त में आए बिना नहीं रह पाता.

आप भी इन सर्दियों में ऐसे मधुर, रंगीन धागों के फंदों में अपना दिल जरूर फंसाएं और बुनतेबुनते प्यार बढ़ाएं.

जिंदगी की उजली भोर: भाग 3- रूना को जब पता चला समीर का राज?

इस से आगे रूना से सुना नहीं गया. वह लौटी और बिस्तर पर औंधेमुंह जा पड़ी. तकिए में मुंह छिपा कर वह बेआवाज घंटों रोती रही. आखिरी वाक्य ने तो उस का विश्वास ही हिला दिया. समीर ने कहा था, ‘परसों मैं होटल पैरामाउंट में आप से मिलता हूं. वहीं हम आगे की सारी बातें तय कर लेंगे.’

यह जिंदगी का कैसा मोड़ था? हर तरफ अंधेरा और बरबादी. अब क्या होगा? वह लौट कर चाचा के पास भी नहीं जा सकती. न ही इतनी पढ़ीलिखी थी कि वह नौकरी कर लेती और न ही इतनी बहादुर कि अकेले जिंदगी गुजार लेती. उस का हर रास्ता एक अंधी गली की तरह बंद था.

एक दिन पापा की तबीयत खराब होने का फोन आया. दोनों आननफानन गांव पहुंचे. पापा बहुत कमजोर हो गए थे. गांव का डाक्टर उन का इलाज कर रहा था. उन्हें दिल की बीमारी थी. समीर ने तय किया कि दूसरे दिन उन्हें अहमदाबाद ले जाएंगे. अहमदाबाद के डाक्टर से टाइम भी ले लिया. दिनभर दोनों पापा के साथ रहे, हलकीफुलकी बातें करते रहे.

उन की तबीयत काफी अच्छी रही. रूना ने मजेदार परहेजी खाना बनाया. रात को समीर सोने चला गया. रूना पापा के पास बैठी उन से बातें कर रही थी कि एकाएक उन्हें घबराहट होने लगी. सीने में दर्द भी होने लगा. उस का हाथ थाम कर उन्होंने कातर स्वर में कहा, ‘बेटी, जो हमारे सामने होता है वही सच नहीं होता और जो छिपा है उस की भी वजह होती है. मैं तुम से…’ फिर उन की आवाज लड़खड़ाने लगी. उस ने जोर से समीर को आवाज दी, वह दौड़ा आया, दवा दी, उन का सीना सहलाने लगा. फिर उस ने डाक्टर को फोन कर दिया. पापा थोड़ा संभले, धीरेधीरे समीर से कहने लगे, ‘बेटा, सारी जिम्मेदारियां अच्छे से निभाना और तुम मुझे…मुझे…’

बस, उस के बाद वे हमेशा के लिए चुप हो गए. डाक्टर ने आ कर मौत की पुष्टि कर दी. समीर ने बड़े धैर्य से यह गम सहा और सुबह उन के आखिरी सफर की तैयारी शुरू कर दी. बूआ, बेटाबहू के साथ आ गईं. कुछ रिश्तेदार भी आ गए. गांव के लोग भी थे. शाम को पापा को दफना दिया गया. 2 दिन बाद बूआ और रिश्तेदार चले गए. गांव के लोग मौकेमौके से आ जाते. 10 दिन बाद वे दोनों लौट आए.

वक्त गुजरने लगा. अब समीर पहले से ज्यादा उस का खयाल रखता. कभी

चाचाचाची का जिक्र होता तो वह उदास हो जाती. ज्यादा न पढ़ सकने का दुख उसे हमेशा सताता रहता. लेकिन समीर उसे हमेशा समझाता व दिलासा देता. जब कभी वह उस के मांपापा के बारे में जानना चाहती, वह बात बदल देता. बस यह पता चला कि समीर अपने मांबाप की इकलौती औलाद है. 3 साल पहले मां बीमारी से चल बसीं. पढ़ाई अहमदाबाद में और उसे यहीं नौकरी मिल गई. शादी के बाद फ्लैट ले कर यहीं सैट हो गया.

रूना को ज्यादा कुरेदने की आदत न थी. जिंदगी खुशीखुशी बीत रही थी. कभीकभी उसे बच्चे की किलकारी की कमी खलती. वह अकसर सोचती, काश उस के जल्द बच्चा हो जाए तो उस का अकेलापन दूर हो जाएगा. उस की प्यार की तरसी हुई जिंदगी में बच्चा एक खुशी ले कर आएगा. उम्मीद की डोर थामे अपनेआप में मगन, वह इस खुशी का इंतजार कर रही थी.

सीमा ने जो कल बताया कि समीर किसी खूबसूरत औरत के साथ खुशीखुशी शौपिंग कर रहा था, मुंबई के बजाय बड़ौदा में था, उस का सारा सुखचैन एक डर में बदल गया कि कहीं समीर उस खूबसूरत औरत के चक्कर में तो नहीं पड़ गया है. उसे यकीन न था कि समीर जैसा चाहने वाला शौहर ऐसा कर सकता है. सीमा ने उसे समझाया था, अभी कुछ न कहे जब तक परदा रहता है, मर्द घबराता है. बात खुलते ही वह शेर बन जाता है.

समीर दूसरे दिन लौट आया. वही प्यार, वही अपनापन. रूना का उतरा हुआ

चेहरा देख कर वह परेशान हो गया. रूना ने सिरदर्द का बहाना बना कर टाला. रूना बारीकी से समीर की हरकतें देखती पर कहीं कोई बदलाव नहीं. उसे लगता कि समीर की चाहत उजली चांदनी की तरह पाक है, पर ये अंदेशे? बहरहाल, यों ही 1 माह गुजर गया.

एक दिन रात में पता नहीं किस वजह से रूना की आंख खुल गई. समीर बिस्तर पर न था. बालकनी में आहट महसूस हुई. वह चुपचाप परदे के पीछे खड़ी हो गई. वह मोबाइल पर बातें कर रहा था, इधर रूना के कानों में जैसे पिघला सीसा उतर रहा था, ‘आप परेशान न हों, मैं हर हाल में आप के साथ हूं. आप कतई परेशान न हों, यह मेरी जिम्मेदारी है. आप बेहिचक आगे बढ़ें, एक खूबसूरत भविष्य आप की राह देख रहा है. मैं हर अड़चन दूर करूंगा.’

मेरी सास को ब्रेस्ट कैंसर है, ऐसे में इम्यूनो थेरैपी कराना कितना सही होगा?

सवाल

मेरी सास को स्तन कैंसर है. क्या उन के लिए इम्यूनो थेरैपी से उपचार कराना ठीक रहेगा?

जवाब

कैंसर के उपचार के लिए कई थेरैपियां उपलब्ध हैं. इन का चयन इस आधार पर किया जाता है कि कैंसर कौन से चरण में हैमरीज का संपूर्ण स्वास्थ्य कैसा है और उस की उम्र कितनी है. जिन मरीजों की उम्र 75 से 80 वर्ष हैकीमोथेरैपी और रेडिएशन थेरैपी के साइड इफैक्ट्स को देखते हुए टारगेटेड थेरैपी और इम्यून थेरैपी से उपचार करने का प्रयास किया जाता है.

बायोलौजिकल या इम्यूनो थेरैपी कैंसर के एडवांस ट्रीटमैंट में अपना एक अलग ही महत्त्व रखती है. इस में कैंसर से ग्रस्त कोशिकाओं को मारने के लिए इम्यून तंत्र को स्टिम्युलेट किया जाता है. इस उपचार में मोनोक्लोनल ऐंटीबौडीजचैकपौइंट इनहिबिटर्सकैंसर वैक्सीनसाइटोकिन्स ट्रीटमैंट के द्वारा मरीज को ठीक किया जाता है.

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मेरे पति स्मोकिंग करते हैं. उन के फेफड़ों की स्थिति को देखते हुए डाक्टर ने उन्हें स्मोकिंग पूरी तरह बंद करने का सुझाव दिया है. क्या इस कारण मेरे और परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाएगा?

जवाब

विश्वभर में धूम्रपान को फेफड़ों के कैंसर का सब से बड़ा रिस्क फैक्टर माना जाता है. आप धूम्रपान नहीं करतीं लेकिन अपने पति के कारण आप पैसिव स्मोकर तो हैं ही. ऐसे में आप के लिए फेफड़ों के कैंसर का खतरा सामान्य लोगों से अधिक है. आप अपने पति को धूम्रपान पूरी तरह बंद करने के लिए सम?ाएं. यह न केवल उन के लिए बल्कि आप और आप के परिवार के लिए भी अच्छा रहेगा. स्मोकिंग और सैकंड हैंड या पैसिव स्मोकिंग केवल फेफड़ों के कैंसर का ही खतरा नहीं बढ़ाता बल्कि श्वासमार्गमुख गुहाआहार नालअग्नाशयपेटआंतमलाशयमूत्राशयकिडनी जैसे 12 प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ाता है.

-डा. देनी गुप्ता

सीनियर कंसल्टैंटमैडिकल औंकोलौजीधर्मशिला नारायणा सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटलदिल्ली   

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गठबंधन: भाग 1-क्यों छिन गया कावेरी से ससुराल का प्यार

‘‘बसइस घर के सामने ही,’’ कावेरी के निर्देश पर ड्राइवर ने कैब रोक दी. टैक्सी से उतर कर बैग कंधे पर लटकाए लंबेलंबे डग भरती हुई वह गेट खोल कर दरवाजे के सामने जा खड़ी हुई, ‘कुछ दिन पापा के साथ बिता लूं, फिर सब दुखदर्द भूल जाने की नई सी उमंग ले कर ही वापस लौटूंगी,’ सोचते हुए कावेरी ने एक नकली मुसकान चेहरे पर चिपका डोरबैल बजा दी.

‘‘अरे वाह कावेरी, आओआओ,’’ अचानक बेटी को आया देख सुधांशु का चेहरा खिल उठा.

‘‘पापा, कैसा लगा मेरा सरप्राइज?’’ सुधांशु से मिलते ही कावेरी की कृत्रिम मुसकान खनकती हंसी में बदल गई. कमरे में पैर फैला कर सोफे पर पीठ टिका कर वह आराम से बैठ गई.

‘‘थक गई शायद? मैं अभी तुम्हारी पसंदीदा दालचीनी वाली चाय बना कर लाता हूं,’’ कह सुधांशु किचन में चले गए.

‘‘आप क्यों? निर्मला नहीं आई क्या आज काम पर?’’ कावेरी सुधांशु के पास जा कर खड़ी हो गई.

‘‘बेटा, एक जरूरी काम के सिलसिले में आज जयपुर के लिए निकलना था मु झे. निर्मला तो इसलिए जल्दी काम निबटा कर चली गई. वैसे मैं सोच रहा हूं कि फ्लाइट की टिकट कैंसिल करवा दूं अब.’’

‘‘पापा, आप चले जाइए. जल्दी वापस आ जाएंगे न? मैं तो अभी कुछ दिन यहीं रहूंगी,’’ कावेरी प्रसन्न दिखने का पूरा प्रयास कर रही थी.

‘‘मैं 2 दिन में लौट आऊंगा. इस बार उदित नाराज नहीं हुआ तुम्हारे कुछ दिन यहां बिताने पर? दिल्ली में हो तो भी बस सुबह आ कर शाम को चली जाती हो वापस. एक दिन भी कहां रहने देता है वह तुम्हें मायके में,’’ सुधांशु के मन में अपने दामाद के प्रति छिपी शिकायत शब्दों में छलक रही थी.

‘‘औफिस के काम से आज ही उदित सिडनी गए हैं, इसलिए आप के साथ कुछ दिन रहने का प्रोग्राम बना लिया मैं ने.’’

‘‘गुड,’’ सुधांशु के चेहरे पर एक लंबी रेखा खिंच गई.

कावेरी भी मुसकरा दी और फिर ड्राइंगरूम में रखे बैग को अपने कमरे में ले जा कर सामान निकाल अलमारी में लगाने लगी.

सुधांशु के साथ बातचीत कर कावेरी का मन हलका हो गया, लेकिन अपने पापा के जाते ही उसे उदासी ने घेर लिया. मस्तिष्क में विचारों की उल झन निराशा को और भी बढ़ा रही थी. शून्य में ताकती वह अपनेआप से ही बातें करने लगी, ‘कितना अपनापन है यहां. दीवारें भी जैसे अनुराग बसाए हैं अपने भीतर. घर के एकमात्र सदस्य पापा तो जैसे स्नेह का पर्याय ही हैं.

‘मम्मी के दुनिया छोड़ कर चले जाने के बाद सालों से मम्मी की भूमिका निभाते हुए अपनी ममता की छांव तले धूप सदृश्य चिंताओं से बचाते आए हैं वे. मैं अकेली संतान हूं तो क्या? सभी नाते मिल कर भी जितना प्रेम नहीं बरसा पाते, जितना पापा ने अकेले ही मु झ पर बरसा दिया. और वहां… कैसे कह दूं कि ससुराल ही अब घर है मेरा? सासूमां के रूप में खोई हुई मां मिल जाएंगी, यही आशा थी मेरी. ससुरजी से पापा जैसा स्नेह चाहा था. लेकिन चाहने मात्र से ही तो सब संभव नहीं होता, फिर और किसी को क्या दोष दूं जब जीवनसाथी ही अनमना सा रहता है मु झ से.

‘विवाह के 3 वर्ष बीत जाने पर भी प्यार और अपनेपन को तरस रही हूं मैं. आशा थी कि कोई नन्ही जान आएगी तो नए रंग भर देगी जीवन में. क्या मैं कम दुखी हूं मां न बन पाने पर कि सभी मु झे किसी अपराधी सा सिद्ध करने में लगे हैं.’

कावेरी एक बार फिर सब याद कर खिन्न हो उठी. विवाह होते ही उसे नौकरी से त्यागपत्र देना पड़ा था. सारा दिन अकेले घर के काम में पिसती हुई वह 2 बोल प्रेम के सुनने को तरस जाती थी. पति उदित अपनी ही दुनिया में खोया रहता. रात में कुछ हसीन लमहों की चाह में वह उदित के करीब जाती तो उस का रवैया ऐसा होता जैसे एहसान कर रहा हो उस पर.

कावेरी को किसी नन्ही आहट की प्रतीक्षा करते हुए 3 वर्ष बीत गए, लेकिन उस की गोद सूनी ही थी. उदित का मनुहार कर एक दिन उसे साथ ले कर वह क्लीनिक चली गईं. वहां डाक्टर ने कावेरी व उदित दोनों के लिए कुछ टैस्ट लिख दिए.

उस रात उदित औनलाइन हुई रिपोर्ट्स देख रहा था और वह बिस्तर पर लेटे हुए उदित की आतुरता से प्रतीक्षा कर रही थी. लैपटौप शटडाउन कर लटका हुआ चेहरा लिए वह आ कर बोला, ‘‘रिपोर्ट्स देख ली हैं. कहा था तुम्हें पहले ही, पर तुम ही जिद पकड़े बैठी थीं कि टैस्ट करवाना है. अब साफ हो चुका है कि तुम्हारे सिस्टम में कुछ कमी है, इसलिए मां नहीं बन पाओगी कभी.’’

कावेरी की रुलाई फूट पड़ी थी. अपने को संयत कर हिम्मत जुटा बोली, ‘‘आप कल प्रिंट निकलवा लेना रिपोर्ट का. ऐसी समस्याओं से कई औरतें 2-4 होती हैं. इलाज तो होता ही होगा कोई न कोई. हम कल ही डाक्टर के पास चलेंगे.’’

‘‘कोई जरूरत नहीं तुम्हें अब अपनी इस कमी का तमाशा बनवाने की. कोई पूछेगा तो कह देंगे कि अभी नहीं चाहते परिवार बढ़ाना. आज के बाद इस बारे में कोई बात नहीं होगी’’ किसी तानाशाह सा आदेश दे उदित मुंह फेर कर लेट गया.

तिरस्कृत हो कावेरी बस आंसू बहा कर रह गई थी. उदित ने अगले दिन अपनी मां को रिपोर्ट के बारे बताया. बस फिर क्या था? आतेजाते ताने कसने देने शुरू कर दिए उन्होंने. ससुरजी उदित को बारबार याद दिलाना नहीं भूलते थे कि उन के रिश्ते के एक भाई ने अपनी बहू के मां न बन पाने की स्थिति में अपने इकलौते बेटे को तलाक दिलवा कर उस का दूसरा विवाह करवा दिया था.

उपेक्षा और प्रताड़ना के अंधेरे से घिरी एक तंग सी गली में स्वयं को पा कर कावेरी बिलकुल अकेली हो गई थी. उदित अकसर डपट देता कि मुंह फुला कर क्यों रहती हो हमेशा? कम से कम मेरे सामने तो मनहूस सा चेहरा लिए न आया करो.

पिछले दिन के अपमान का दंश भी अब तक मर्माहत कर रहा था कावेरी  को. मेरठ से उदित की बूआजी मिलने आई थीं. कावेरी ने हमेशा की तरह अभिवादन कर आदर व्यक्त किया.

उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में कावेरी को गोद भर जाने का आशीर्वाद दिया तो पास खड़ी कावेरी की सासूमां तपाक से बोल उठीं, ‘‘सपने देखने बंद कर दो जीजी अब. यह सुख हमारे हिस्से में कहां? बस अब तो हमारा आंगन बच्चे की किलकारियों के लिए तरसता ही रहेगा सदा.’’

यह सुन बूआजी आंखें फाड़ मुंह बिचकाते हुए बोलीं, ‘‘अरेअरे, यह क्या कह रही हो? कावेरी की सूरत देख कर तो नहीं लगता कि इसे कोई अफसोस है अपने इस अधूरेपन पर. औरत का सारा बनावसिंगार बेकार है अगर एक संतान भी न दे सके परिवार को.’’

‘‘क्या करें अब? यह बां झ लिखी थी लड़के की हिस्से में. जी जलता रहेगा अब तो सदा यों ही हमारा.’’

जहर बु झे तीर से शब्दों का वार असहनीय हो गया और कावेरी चुपचाप वहां से चली गई. अपमान और दुख से विचलित हो रात में उस ने उदित को ये सब बताया तो उदित उलटा उस पर बरसने लगा, ‘‘किसकिस का मुंह बंद करोगी? कुछ गलत तो नहीं कहा मां या बूआजी ने. जानती हो न कि कल 8 बजे की फ्लाइट से मु झे सिडनी जाना है. सोचा था जाने से पहले तुम्हें खुश कर दूंगा, लेकिन सारा मूड औफ कर दिया तुम ने. लाइट बंद कर सो जाओ अब.’’

‘‘मैं भी कल पापा के पास जाना चाहती हूं. उन की तबीयत ठीक नहीं है, आज ही फोन पर बताया था उन्होंने,’’ पहली बार कावेरी ने उदित से  झूठ बोला था.

पापा के फोन का बहाना बना कर आज वह मायके आ गई थी. बचपन में जब कोई बात उसे विचलित करती थी तो पापा के थपकी दे कर सुलाते ही सारा तनाव छूमंतर हो जाता था. उसी थपकी की चाह में कुछ दिन पापा के साथ बिताने आई थी वह.

एअरपोर्ट पहुंच सुधांशु ने मैसेज भेजा तो नोटिफिकेशन टोन सुन  कावेरी की सोच पर विराम लग गया. मैसेज पढ़ने के बाद किचन में जा कर वह अपने लिए नूडल्स बना लाई और वापस कमरे में आ टीवी औन कर बैठ गई. किसी फिल्म में विवाह का दृश्य चल रहा था. गठबंधन की रीत दर्शाए जाने के उपक्रम में वर के कंधे पर लटके पटुका में सिक्का, दूर्वा, चावल, हलदी व फूल रख एक गांठ लगा कर उसे वधू के दुपट्टे से बांधा जा रहा था.

Monsoon Special: मौनसून में ऐसे चुनें सही फुटवियर्स

फुटवियर मौसम के हिसाब से पहनना चाहिए. इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम आप को मौनसून के फैशन फुटवियर के बारे में बता रहे हैं. जी हां, जब सर्दी और गरमी में फुटवियर फैशन में बदलाव होता है, तो भला बरसात में क्यों नहीं? मौनसून सीजन में बाजार में फुटवियर के ढेरों विकल्प मिल जाएंगे, जो बरसात में भी आप के स्टाइल में चार चांद लगा देंगे.

1. रेन बूट्स और प्लास्टिक चप्पलों को करें ट्राई

फुटवियर डिजाइनर रेखा कपूर का कहना है कि बाजार रंगीन फ्लिप फ्लौप, फ्लोटर, रेन बूट्स और प्लास्टिक चप्पलों से भरा पड़ा है. ये लाल, नीले, पीले, हरे सभी रंगों में उपलब्ध हैं. इस के अलावा फ्लौवर प्रिंट्स व अन्य आकर्षक डिजाइनों में भी ये मिल जाएंगे, जो आप को एकदम फंकी और हैपनिंग लुक देंगे और आप मौनसून सीजन में एकदम हट कर दिखेंगी.

2. ऐसे चुनें मौनसून के लिए राइट फुटवियर्स

बरसात के दिनों में फुटवियर का चुनाव बहुत सोच-समझ कर करना चाहिए. इन दिनों जूते बिलकुल नहीं पहनने चाहिए, क्योंकि बरसात के दिनों में जूतों के गीले होने पर फंगल इन्फैक्शन होने का खतरा अधिक रहता है. ऐसे में इस मौसम में प्लास्टिक की चप्पलें आदि पहनना ही पैरों के लिए सुरक्षित रहता है.

3. मौनसून में ट्राई करें बैकलैस शूज

दिल्ली के कनाट प्लेस में फुटवियर की दुकान चला रहे महेंद्र बताते हैं कि आजकल म्यूल्स भी काफी इन हैं, जो एक तरह से बैकलैस शूज होते हैं. ये फ्लिप फ्लौप का स्टाइलिश विकल्प हैं. इन्हें पहनना और उतारना भी बेहद आसान है. इन की कीमत क्व150 से क्व200 के बीच है, जो युवाओं की जेब पर अधिक भारी नहीं पड़ती है.

4. जूतों की देखभाल करना न भूलें

एक्सपर्ट्स का कहना है कि मौनसून में प्लास्टिक के जूतेचप्पलों की सेल अधिक होती है और इस बार गम बूट्स का खास कलैक्शन बाजार में उपलब्ध है. बारिश के मौसम में जूतेचप्पलों को संभाल कर रखने पर भी अधिक ध्यान देने की जरूरत होती है.

5. प्लास्टिक सैंडल भी मौनसून में हैं बेस्ट

प्लास्टिक के जूते या सैंडल गंदे होने पर आसानी से ब्रश से साफ किए जा सकते हैं.

 

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6. मौनसून में रखें रबर शूज का ख्याल

रबड़ के जूते या चप्पलें पहन रही हैं, तो उन्हें इस्तेमाल के बाद तुरंत पंखे के नीचे सूखने के लिए रख दें, क्योंकि गीले रबड़ से बदबू आनी शुरू हो जाती है और फुटवियर जल्दी खराब होने लगता है.

7. स्पोर्ट शूज को सूखाना न भूलें

अगर आपने स्पोर्ट शूज पहने हुए हैं, तो तुरंत लेस खोल कर जूतों को पलट कर सूखने के लिए रख दें. अगर आप इन्हें तुरंत सूखने के लिए रख देंगी तो जूते खराब होने से बच जाएंगे.

8. अलमारी में न रखें मौनसून शूज

जब तक आप के जूते अच्छी तरह से सूख न जाएं तब तक उन्हें बंद अलमारी में न रखें वरना खराब हो जाएंगे. उन पर फंगस भी लग जाएगी.

9. धूप लगाना न भूलें

जूतों को खराब होने से बचाने के लिए उन्हें धूप में सूखने रख दें. इस से अंदर पनप रहे बैक्टीरिया भी खत्म हो जाएंगे.

10. मौनसून में लैदर को कहें न

मौनसून के समय लैदर के जूते और चप्पलें न पहनें. अगर पहनना बहुत ही जरूरी हो तो उन पर वैक्स पौलिश लगाएं. वैक्स लगाने से जूतों को एक पतली सुरक्षा परत मिल जाएगी.

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