जानिए 5 बजट फ्रेंडली ब्रांडेड लिपस्टिक, देंगी परफेक्ट मेकअप लुक

अगर आपको मेकअप करना बेहद पसंद है और आप हमेशा से मेकअप के नए-नए प्रोडक्ट ट्राई करते रहते हैं तो ये लेख आप के लिए है. आमतौर पर महिलाओं को मेकअप करना खूब पसंद होता है, ऐसे में वे  अक्सर मेकअप प्रोडक्ट खरीदती रहती हैं. महिलाओं की रोजमर्रा लाइफ में लिपस्टिक की खास अहमियत है. लिपस्टिक के बिना मेकअप अधूरा है, लिपस्टिक ही मेकअप की जान है.

चलिए आज हम आपको इस लेख के जरिए 5 बजट फ्रेंडली ब्रांडेड लिपस्टिक के बारे में बताएंगे, जो ई-कॉमर्स साइट और स्टोर पर आसानी से मिल जाएंगी.

  1. Lakeme कुशन मैट लिपस्टिक

Lakme इंडिया का जाना-माना मेकअप ब्रांड है. इसकी खासियत यह है कि ये लॉन्ग लास्टिंग लिपस्टिक है. Lakeme कुशन मैट लिपस्टिक में कई सारे शेड में उपलब्ध जिसे आप ऑफिस से लेकर पार्टी, हर अवसर पर इस्तेमाल कर सकते है. Lakme ब्रांड की लिपस्टिक हर इंडियन स्किन स्टोन के लिए उपलब्ध है और यह लंबे समय तक होंठों पर टिकी रहती है. साथ ही यह लाइटवेट फॉर्मूला के साथ आती है.

2. Sugar Mini Lipstick

सुगर कॉस्मेटिक की यह लिपस्टिक विटामिन्स से भरपूर है और यह 12 घंटे तक टिकी रहती है. यह वाटरप्रूफ, ट्रांसफर प्रूफ है. यह लिक्विड फॉर्म में आती है. सुगर मिनी लिपस्टिक के कई सारे शेड उपलब्ध है. इसे आप कई अवसर पर इस्तेमाल कर सकते है. ऑनलाइन शॉपिंग एप पर इसके कई सारे शेड मौजूद है जिसे आप खरीद सकते है.

3. Maybelline मैट लिपस्टिक

Maybelline लिपस्टिक मखमली, हाइड्रेटिंग मैट लिपस्टिक है जो हर रोज इस्तेमाल के लिए सबसे बेस्ट है. ये लिपस्टिक चिकनी, मलाईदार बनावट प्रदान करती है जो बिल्कुल भी सूखती नहीं है. अमेजन पर इसके कई सारे शेड मौजूद है जिसे आप खरीद सकते है. Maybelline मैट लिपस्टिक एक बोल्ड, इंटेंस रंग देता है जो लंबे समय तक टिकता है और स्मूद मैट फ़िनिश देता है. ये लिपस्टिक हर इंडियन स्किन टोन पर सूट करती है.

4. MARS क्रिमी मैट लिपस्टिक

MARS क्रिमी मैट लिपस्टिक जो होंठों को मैट फिनिश स्मूद लुक देता है और ये  लिपस्टिक आपके लिए डेली बेसिस पर अप्लाई करना आसान बनाता है  ये  बेहद मलाईदार लिपस्टिक है इसी वजह से यह लिपस्टिक मक्खन की तरह चमकती है. इसमें एक स्वाइप पिग्मेंटेशन है. ये खासतौर पर इंडियन स्किन टोन के लिए बनीं है.

5. Insight नॉन ट्रांसफर लिपस्टिक

यह लिपस्टिक स्मूद मैट फिनिश देती है और लंबे समय तक रहती है. यह इंटेंस कलर देती है और यह नॉन-ट्रांसफरेबल और वाटर प्रूफ है. केवल एक बार लगाने पर पिगमेंट से भरपूर रंग प्रदान करती है. यह लिपस्टिक पैराबेन्स से मुक्त है. पार्टी से लेकर दफ्तर तक आप इस लिपस्टिक का इस्तेमाल कर सकते है. ये लिपस्टिक इंडियन स्किन टोन के लिए बनीं है.

Father’s day 2023: कृष्णिमा- बाबूजी को किस बात का शक था

‘‘आखिर इस में बुराई क्या है बाबूजी?’’ केदार ने विनीत भाव से बात को आगे बढ़ाया.

‘‘पूछते हो बुराई क्या है? अरे, तुम्हारा तो यह फैसला ही बेहूदा है. अस्पतालों के दरवाजे क्या बंद हो गए हैं जो तुम ने अनाथालय का रुख कर लिया? और मैं तो कहता हूं कि यदि इलाज करने से डाक्टर हार जाएं तब भी अनाथालय से बच्चा गोद लेना किसी भी नजरिए से जायज नहीं है. न जाने किसकिस के पापों के नतीजे पलते हैं वहां पर जिन की न जाति का पता न कुल का…’’

‘‘बाबूजी, यह आप कह रहे हैं. आप ने तो हमेशा मुझे दया का पाठ पढ़ाया, परोपकार की सीख दी और फिर बच्चे किसी के पाप में भागीदार भी तो नहीं होते…इस संसार में जन्म लेना किसी जीव के हाथों में है? आप ही तो कहते हैं कि जीवनमरण सब विधि के हाथों होता है, यह इनसान के वश की बात नहीं तो फिर वह मासूम किस दशा में पापी हुए? इस संसार में आना तो उन का दोष नहीं?’’

‘‘अब नीति की बातें तुम मुझे सिखाओगे?’’ सोमेश्वर ने माथे पर बल डाल कर प्रश्न किया, ‘‘माना वे बच्चे निष्पाप हैं पर उन के वंश और कुल के बारे में तुम क्या जानते हो? जवानी में जब बच्चे के खून का रंग सिर चढ़ कर बोलेगा तब क्या करोगे? रक्त में बसे गुणसूत्र क्या अपना असर नहीं दिखाएंगे? बच्चे का अनाथालय में पहुंचना ही उन के मांबाप की अनैतिक करतूतों का सुबूत है. ऐसी संतान से तुम किस भविष्य की कामना कर रहे हो?’’

‘‘बाबूजी, आप का भय व संदेह जायज है पर बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में केवल खून के गुण ही नहीं बल्कि पारिवारिक संस्कार ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं,’’ केदार बाबूजी को समझाने का भरसक प्रयास कर रहा था और बगल में खामोश बैठी केतकी निराशा के गर्त में डूबती जा रही थी.

केतकी को संतान होने के बारे में डाक्टरों को उम्मीद थी कि वह आधुनिक तकनीक से बच्चा प्राप्त कर सकती है और केदार काफी सोचविचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि लाखों रुपए क्या केवल इसलिए खर्च किए जाएं कि हम अपने जने बच्चे के मांबाप कहला सकें. यह तो केवल आत्मसंतुष्टि तक सोचने वाली बात होगी. इस से बेहतर है कि किसी अनाथ बच्चे को अपना कर यह पैसा उस के भविष्य पर लगा दें. इस से मांबाप बनने का गौरव भी प्राप्त होगा व रुपए का सार्थक प्रयोग भी होगा.

‘केतकी, बस जरूरत केवल बच्चे को पूरे मन से अपनाने की है. फर्क वास्तव में खून का नहीं बल्कि अपनी नजरों का होता है,’ केदार ने जिस दिन यह कह कर केतकी को अपने मन के भावों से परिचित कराया था वह बेहद खुश हुई थी और खुशी के मारे उस की आंखों से आंसू बह निकले थे पर अगले ही क्षण मां और बाबूजी का खयाल आते ही वह चुप हो गई थी.

केदार का अनाथालय से बच्चा गोद लेने का फैसला उसे बारबार आशंकित कर रहा था क्योंकि मांबाबूजी की सहमति की उसे उम्मीद नहीं थी और उन्हें नाराज कर के वह कोई कार्य करना नहीं चाहती थी. केतकी ने केदार से कहा था, ‘बाबूजी से पहले सलाह कर लो उस के बाद ही हम इस कार्य को करेंगे.’

लेकिन केदार नहीं माना और कहने लगा, ‘अभी तो अनाथालय की कई औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, अभी से बात क्यों छेड़ी जाए. उचित समय आने पर मांबाबूजी को बता देंगे.’

केदार और केतकी ने आखिर अनाथालय जा कर बच्चे के लिए आवेदनपत्र भर दिया था.

लगभग 2 माह के बाद आज केदार ने शाम को आफिस से लौट कर केतकी को यह खुशखबरी दी कि अनाथालय से बच्चे के मिलने की पूर्ण सहमति प्राप्त हो चुकी है. अब कभी भी जा कर हम अपना बच्चा अपने साथ घर ला सकते हैं.

भावविभोर केतकी की आंखें मारे खुशी के बारबार डबडबाती और वह आंचल से उन्हें पोंछ लेती. उसे लगा कि लंबी प्रतीक्षा के बाद उस के ममत्व की धारा में एक नन्ही जान की नौका प्रवाहित हुई है जिसे तूफान के हर थपेडे़ से बचा कर पार लगाएगी. उस नन्ही जान को अपने स्नेह और वात्सल्य की छांव में सहेजेगी….संवारेगी.

केदार की धड़कनें भी तो यही कह रही हैं कि इस सुकोमल कोंपल को फूलनेफलने में वह तनिक भी कमी नहीं आने देगा. आने वाली सुखद घड़ी की कल्पना में खोए केतकी व केदार ने सुनहरे सपनों के अनेक तानेबाने बुन लिए थे.

आज बाबूजी के हाथ से एक तार खिंचते ही सपनों का वह तानाबाना कितना उलझ गया.

केतकी अनिश्चितता के भंवर में उलझी यही सोच रही थी कि मांजी को मुझ से कितना स्नेह है. क्या वह नहीं समझ सकतीं मेरे हृदय की पीड़ा? आज बाबूजी की बातों पर मां का इस तरह से चुप्पी साधे रहना केतकी के दिल को तीर की तरह बेध रहा था.

केदार लगातार बाबूजी से जिरह कर रहा था, ‘‘बाबूजी, क्या आप भूल गए, जब मैं बचपन में निमोनिया होने से बहुत बीमार पड़ा था और मेरी जान पर बन आई थी, डाक्टरों ने तुरंत खून चढ़ाने के लिए कहा था पर मेरा खून न आप के खून से मेल खा रहा था न मां से, ऐसे में मुझे बचाने के लिए आप को ब्लड बैंक से खून लेना पड़ा था. यह सब आप ने ही तो मुझे बताया था. यदि आप तब भी अपनी इस जातिवंश की जिद पर अड़ जाते तो मुझे खो देते न?

‘‘शायद मेरे प्रति आप के पुत्रवत प्रेम ने आप को तब तर्कवितर्क का मौका ही नहीं दिया होगा. तभी तो आप ने हर शर्त पर मुझे बचा लिया.’’

‘‘केदार, जिरह करना और बात है और हकीकत की कठोर धरा पर कदम जमा कर चलना और बात. ज्यादा दूर की बात नहीं, केवल 4 मकान पार की ही बात है जिसे तुम भी जानते हो. त्रिवेदी साहब का क्या हश्र हुआ? बेटा लिया था न गोद. पालापोसा, बड़ा किया और 20 साल बाद बेटे को अपने असली मांबाप पर प्यार उमड़ आया तो चला गया न. बेचारा, त्रिवेदी. वह तो कहीं का नहीं रहा.’’

केदार बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘बाबूजी, हम सब यही तो गलती करते हैं, गोद ही लेना है तो उन्हें क्यों न लिया जाए जिन के सिर पर मांबाप का साया नहीं है कुलवंश, जातबिरादरी के चक्कर में हम इतने संकुचित हो जाते हैं कि अपने सीमित दायरे में ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. संसार में ऐसे बहुत कम त्यागी हैं जो कुछ दे कर भूल जाएं. अकसर लोग कुछ देने पर कुछ प्रतिदान पा लेने की अपेक्षाएं भी मन में पाल लेते हैं फिर चाहे उपहार की बात हो या दान की और फिर बच्चा तो बहुत बड़ी बात होती है. कोई किसी को अपना जाया बच्चा देदे और भूल जाए, ऐसा संभव ही नहीं है.

‘‘माना अनाथालय में पल रहे बच्चों के कुल व जात का हमें पता नहीं पर सब से पहले तो हम इनसान हैं न बाबूजी. यह बात तो आप ही ने हमें बचपन में सिखाई थी कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. अब आप जैसी सोच के लोग ही अपनी बात भुला बैठेंगे तब इस समाज का क्या होगा?

‘‘आज मैं अमेरिका की आकर्षक नौकरी और वहां की लकदक करती जिंदगी छोड़ कर यहां आप के पास रहना चाहता हूं और आप दोनों की सेवा करना चाहता हूं तो यह क्या केवल मेरे रक्त के गुण हैं? नहीं बाबूजी, यह तो आप की सीख और संस्कार हैं. मैं ने बचपन में आप को व मांजी को जो करते देखा है वही आत्मसात किया है. आप ने दादादादी की अंतिम क्षणों तक सेवा की है. आप के सेवाभाव स्वत: मेरे अंदर रचबस गए, इस में रक्त की कोई भूमिका नहीं है और ऐसे उदाहरणों की क्या कमी है जहां अटूट रक्त संबंधों में पनपी कड़वाहट आखिर में इतनी विषाक्त हो गई कि भाई भाई की जान के दुश्मन बन गए.’’

‘‘देखो, मुझे तुम्हारे तर्कों में कोई दिलचस्पी नहीं है,’’ सोमेश्वर बोले, ‘‘मैं ने एक बार जो कह दिया सो कह दिया, बेवजह बहस से क्या लाभ? और हां, एक बात और कान खोल कर सुन लो, यदि तुम्हें अपनी अमेरिका की नौकरी पर लात मारने का अफसोस है तो आज भी तुम जा सकते हो. मैं ने तुम्हें न तब रोका था न अब रोक रहा हूं, समझे? पर अपने इस त्याग के एहसान को भुनाने की फिराक में हो तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो.’’

इतना कह कर सोमेश्वर अपनी धोती संभालते हुए तेज कदमों से अपने कमरे में चले गए. मांजी भी चुपचाप आदर्श भारतीय पत्नी की तरह मुंह पर ताला लगाए बाबूजी के पीछेपीछे कमरे में चली गईं.

थकेहारे केदार व केतकी अपने कमरे में बिस्तर पर निढाल पड़ गए.

‘‘अब क्या होगा?’’ केतकी ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘होगा क्या, जो तय है वही होगा. सुबह हमें अपने बच्चे को लेने जाना है, और मैं नहीं चाहता कि इस तरह दुखी और उदास मन से हम उसे लेने जाएं,’’ अपने निश्चय पर अटल केदार ने कहा.

‘‘पर मांबाबूजी की इच्छा के खिलाफ हम बच्चे को घर लाएंगे तो क्या उन की उपेक्षा बच्चे को प्रभावित नहीं करेगी? कल को जब वह बड़ा व समझदार होगा तब क्या घर का माहौल सामान्य रह पाएगा?’’

अपने मन में उठ रही इन आशंकाओं को केतकी ने केदार के सामने रखा तो वह बोला, ‘‘सुनो, हमें जो कल करना है फिलहाल तुम केवल उस के बारे में ही सोचो.’’

सुबह केतकी की आंख जल्दी खुल गई और चाय बनाने के बाद ट्रे में रख कर मांबाबूजी को देने के लिए बाहर लौन में गई, मगर दोनों ही वहां रोज की तरह बैठे नहीं मिले. खाली कुरसियां देख केतकी ने सोचा शायद कल रात की बहसबाजी के बाद मां और बाबूजी आज सैर पर न गए हों लेकिन उन का कमरा भी खाली था. हो सकता है आज लंबी सैर पर निकल गए हों तभी देर हो गई. मन में यह सोचते हुए केतकी नहाने चली गई.

घंटे भर में दोनों तैयार हो गए पर अब तक मांबाबूजी का पता नहीं था. केदार और केतकी दोनों चिंतित थे कि आखिर वे बिना बताए गए तो कहां गए?

सहसा केतकी को मांजी की बात याद आई. पिछले ही महीने महल्ले में एक बच्चे के जन्मदिन के समय अपनी हमउम्र महिलाओं के बीच मांजी ने हंसी में ही सही पर कहा जरूर था कि जिस दिन हमारा इस सांसारिक जीवन से जी उचट जाएगा तो उसी दिन हम दोनों ही किसी छोटे शहर में चले जाएंगे और वहीं बुढ़ापा काट देंगे.

सशंकित केतकी ने केदार को यह बात बताई तो वह बोला, ‘‘नहीं, नहीं, केतकी, बाबूजी को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वे मुझ पर क्रोधित हो सकते हैं पर इतने गैरजिम्मेदार कभी नहीं हो सकते कि बिना बताए कहीं चले जाएं. हो सकता है सैर पर कोई परिचित मिल गया हो तो बैठ गए होंगे कहीं. थोड़ी देर में आ जाएंगे. चलो, हम चलते हैं.’’

दोनों कार में बैठ कर नन्हे मेहमान को लेने चल दिए. रास्ते भर केतकी का मन बच्चा और मांबाबूजी के बीच में उलझा रहा. लेकिन केदार के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था. उमंग और उत्साह से भरपूर केदार के होंठों पर सीटी की गुनगुनाहट ही बता रही थी कि उसे अपने निर्णय पर जरा भी दुविधा नहीं है.

केतकी का उतरा हुआ चेहरा देख कर वह बोला, ‘‘यार, क्या मुंह लटकाए बैठी हो? चलो, मुसकराओ, तुम हंसोगी तभी तो तुम्हें देख कर हमारा नन्हा मेहमान भी हंसना सीखेगा.’’

नन्ही जान को आंचल में छिपाए केतकी व केदार दोनों ही कार से उतरे. घर का मुख्य दरवाजा बंद था पर बाहर ताला न देख वे समझ गए कि मां और बाबूजी घर के अंदर हैं. केदार ने ही दरवाजे की घंटी बजाई तो इसी के साथ केतकी की धड़कनें भी तेज हो गई थीं. नन्ही जान को सीने से चिपटाए वह केदार को ढाल बना कर उस के पीछे हो गई.

दरवाजा खुला तो सामने मांजी और बाबूजी खडे़ थे. पूरा घर रंगबिरंगी पताकों, गुब्बारों तथा फूलों से सजा हुआ था. यह सबकुछ देख कर केदार और केतकी दोनों विस्मित रह गए.

‘‘आओ बहू, अंदर आओ, रुक क्यों गईं?’’ कहते हुए मांजी ने बडे़ प्रेम से नन्हे मेहमान को तिलक लगाया. बाबूजी ने आगे बढ़ कर बच्चे को गोद में लिया.

‘‘अब तो दादादादी का बुढ़ापा इस नन्हे सांवलेसलौने बालकृष्ण की बाल लीलाओं को देखदेख कर सुकून से कटेगा, क्यों सौदामिनी?’’ कहते हुए बाबूजी ने बच्चे के माथे पर वात्सल्य चिह्न अंकित कर दिया.

बाबूजी के मुख से ‘बालकृष्ण’ शब्द सुनते ही केदार और केतकी ने एक दूसरे को प्रश्न भरी नजरों से देखा और अगले ही पल केतकी ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘लेकिन बाबूजी, यह बेटा नहीं बेटी है.’’

‘‘तो क्या हुआ? कृष्ण न सही कृष्णिमा ही सही. बच्चे तो प्रसाद की तरह हैं फिर प्रसाद चाहे लड्डू के रूप में मिले चाहे पेडे़ के, होगा तो मीठा ही न,’’ और इसी के साथ एक जोरदार ठहाका सोमेश्वर ने लगाया.

केदार अब भी आश्चर्यचकित सा बाबूजी के इस बदलाव के बारे में सोच रहा था कि तभी वह बोले, ‘‘क्यों बेटा, क्या सोच रहे हो? यही न कि कल राह का रोड़ा बने बाबूजी आज अचानक गाड़ी का पेट्रोल कैसे बन गए?’’

‘‘हां बाबूजी, सोच तो मैं यही रहा हूं,’’ केदार ने हंसते हुए कहा.

‘‘बेटा, सच कहूं तो आज मैं ने बहुत बड़ी जीत हासिल की है. मुझे तुझ पर गर्व है. यदि आज तुम अपने निश्चय से हिल जाते तो मैं टूट जाता. मैं तुम्हारे फैसले की दृढ़ता को परखना चाहता था और ठोकपीट कर उस की अटलता को निश्चित करना चाहता था क्योंकि ऐसे फैसले लेने वालों को सामाजिक जीवन में कई अग्नि परीक्षाएं देनी पड़ती हैं.’’

‘‘समाज में तो हर प्रकार के लोग होते हैं न. यदि 4 लोग तुम्हारे कार्य को सराहेंगे तो 8 टांग खींचने वाले भी मिलेंगे. तुम्हारे फैसले की तनिक भी कमजोरी भविष्य में तुम्हें पछतावे के दलदल में पटक सकती थी और तुम्हारे कदमों का डगमगाना केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बल्कि आने वाली नन्ही जान के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता था. बस, केवल इसीलिए मैं तुम्हें जांच रहा था.’’

‘‘देखा केतकी, मैं ने कहा था न तुम से कि बाबूजी ऐसे तो नहीं हैं. मेरा विश्वास गलत नहीं था,’’ केदार ने कहा.

‘‘बेटा, तुम लोगों की खुशी में ही तो हमारी खुशी है. वह तो मैं तुम्हारे बाबूजी के कहने पर चुप्पी साधे बैठी रही, इन्हें परीक्षा जो लेनी थी तुम्हारी. मैं समझ सकती हूं कि कल रात तुम लोगों ने किस तरह काटी होगी,’’ इतना कह कर सौदामिनी ने पास बैठी केतकी को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘वह तो ठीक है मांजी, पर यह तो बताइए कि सुबह आप लोग कहां चले गए थे. मैं तो डर रही थी कि कहीं आप हरिद्वार….’’

‘‘अरे, पगली, हम दोनों तो कृष्णिमा के स्वागत की तैयारी करने गए थे,’’ केतकी की बातों को बीच में काटते हुए सौदामिनी बोली, ‘‘और अब तो हमारे चारों धाम यहीं हैं कृष्णिमा के आसपास.’’

सचमुच कृष्णिमा की किलकारियों में चारों धाम सिमट आए थे, जिस की धुन में पूरा परिवार मगन हो गया था.

कपल्स के बीच ट्रेंड कर रहा ‘स्लीप डिवोर्स’, अच्छी नींद के लिए क्यों जरूरी?

शादी के रिश्ते में सबसे जरूरी बात क्या हैं ये पूछने पर कई तरह के जवाब मिलते है? जैसे एक दूसरे को समझना चाहिए, एक-दूसरे का ख्याल रखना चाहिए और बाकी अलग-अलग तरह की और भी कई चीजें. लेकिन जिंदगी की सबसे महत्वपूर्ण चीज है नींद इसके बारे में कोई बात नहीं करता.

हाल ही नए जेनरेशन के शादी-शुदा कपल के बीच एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है. जो ट्विटर पर  के नाम से ‘स्लीप डिवोर्स’ काफी ट्रेंड हो रहा है. अब आप ये जानना चाहेंगे की आखिर ये ‘स्लीप डिवोर्स’ क्या है? तो चलिए आज हम आपको इसके हर एक पहलू से रूबरू करवाते हैं.

क्या है ‘स्लीप डिवोर्स’?

स्‍लीप डिवोर्स तब होता है, जब अच्छी और बेहतर नींद के लिए कपल अलग-अलग कमरे, अलग बिस्तर या फिर  या अलग-अलग समय पर सोते हैं तो इसे हम स्लीप डिवोर्स कहते हैं. इसके ट्रेंड में आने का कारण है कपल्स का नींद ना पूरा हो पाना. स्‍लीप डिवोर्स ठीक से नींद न ले पाने वाले लोगों के लिए बड़ा समाधान है. स्‍लीप डिवोर्स वो है जिसमें पार्टनर्स रात को साथ में न सोकर अपनी सुविधानुसार अलग-अलग सोते हैं. इसके चलते कपल्स की नींद भी पूरी हो जाती है और वो अगली सुबह पूरी एनर्जी के साथ उठते हैं.

स्लीप डिवोर्स का ट्रेंड

स्लीप डिवोर्स  सुनने में नया लग रहा है. लेकिन इसका चलन बेहद पुराना है. साल 1850 में ये ट्रेंड ट्विन-शेयरिंग बेड के नाम से फेमस हुआ. तब के समय में पति-पत्नी एक कमरे तो होते थे, लेकिन होटलों की तर्ज पर ट्विन-शेयरिंग बेड की तरह एक रूम में ही 2 अलग-अलग बिस्तर पर सोया करते थे. ये इसलिए शुरू हुआ ताकि पति-पत्नी एक रूम में साथ होकर भी बिना एक-दूसरे को डिस्टर्ब किए आराम से नींद पूरी कर सकें. लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर हिलेरी हिंड्स ने इस पर कल्चरल हिस्ट्री ऑफ ट्विन बेड्स के नाम से एक किताब भी लिखी है. बुक के अनुसार उस समय में डॉक्टर नींद ना पूरी होने पर मानसिक नुकसान मानते थे.

नींद ना पूरा होने के कारण

नींद पूरा ना हो पाने के कई कारण हो सकते है. जैसे दिनभर की भागदौड़ के बाद सोने के समय में देरी होना. पार्टनर के सोने की खराब आदतें या खर्राटे, पार्टनर का देर तक काम में लगे रहना. इस तरह की कई चीजें हो सकती है जिसके कारण दूसरे पार्टनर की नींद पूरी नहीं हो पाती.

नींद के कारण रिश्तों में दरार

नींद की कमी का सीधा-सीधा असर रिश्ते पर होता है. नींद की कमी से जूझते जोड़े छोटी-मोटी बातों पर भी उलझ पड़ते हैं. नींद पूरी ना होने का कारण चिड़चिड़ापन होता है और ये कारण  भी झगड़े का मुख्य कारण बन जाता है.

स्लीप डिवोर्स के फायदे

आज के समय पूरे दिन की भागदौड़ के बाद रात में अच्छी नींद ना मिलने के कारण आपका अगला पूरा दिन खराब जा सकता है. इसलिए समय-समय पर स्लीप डिवोर्स से आपकी नींद पूरी होती है और नींद की गुणवत्ता में सुधार होता है. इसके अलावा एक साथ होने के बाद हर किसी का अपना एक पर्सनल स्पेस होता है. जो हर व्यक्ति के लिए बेहद जरूरी है. और इसके कारण आपको एक पर्सनल स्पेश मिलता है. कई लोग सोने से पहले किताबें पढ़ना चाहते है, कई लोगों को मेडिटेशन के बाद सोने की आदत होती है. तो इस समय में आप अपनी चीजों के लिए समय निकाल सकते है.

क्या स्लीप डिवॉर्स रिश्तों में दूरियों के लिए वजह बन सकता है?

कई लोगों का मानना है की स्लीप डिवोर्स के कारण रिश्तों में दूरियां आ सकती है.  अलग सोना आपकी अपनी मर्जी है. आपसी सहमति के साथ कपल्स एक दूसरे की जरूरतों का सम्मान करते हुए एक-दूसरे को समय देते है. गौरतलब है की स्लीप डिवोर्स रिश्तों को बिगाड़ने के लिए नहीं बल्कि रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए किया जाता है. ताकि आपकी नींद पूरी होने के कारण आप चिड़-चिड़ा फील नहीं करोगे तो एक-दूसरे को ज्यादा समय दे पाओगे.

55 प्रतिशत लोग 8 घंटे से कम नींद लेते है

ग्रेट इंडियन स्लीफ ( GISS) 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 55 प्रतिशत लोग रात में 11 बजे के बाद सोते है. जिसके कारण 8 घंटे से कम नींद ले पाते है. साथ ही हेल्थ टेक्नोलॉजी कंपनी फिलिप्स इंडिया के 2019 के रिपोर्ट के अनुसार लगभग 93 प्रतिशत भारतीय पूरी नींद नहीं ले पाते. और इनमें से करीब 58 प्रतिशत लोग 7 घंटे से कम नींद ले पाते है.

Father’s day 2023: माता-पिता के सपनों को पूरा करती बेटियां

कुछ अरसा पहले रिलीज हुई बौलीवुड की सब से ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म ‘दंगल’ महिला पहलवानों गीता फोगट और बबीता फोगट की वास्तविक जिंदगी पर आधारित थी. इस में बड़ी खूबसूरती से चित्रण किया गया कि कैसे बहुत ही कम उम्र में उन के पिता महावीर फोगट ने कुश्ती में गोल्ड मैडल लाने के अपने अधूरे सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी का बोझ नन्ही गीता और बबीता के कंधों पर डाल दिया, क्योंकि उन का कोई बेटा नहीं था.

ऐसे में बहुत ही कम उम्र में नाजुक सी गीता और बबीता पिता की मेहनत से इतनी मजबूत बन गईं कि अपने से बड़ी उम्र के बलिष्ठ पहलवान लड़कों को भी चारों खाने चित्त करने लगीं. 2010 व 2014 के कौमनवैल्थ गेम्स में गोल्ड मैडल जीत कर पिता के साथसाथ पूरे देश का भी नाम रोशन कर दिया. ऐसा नहीं है कि लड़कियां किसी भी नजरिए से लड़कों से कम होती हैं या फिर जिंदगी में लड़कों की तरह किसी भी तरह की जिम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं होतीं. जरूरत पड़े तो वे कुछ भी कर सकती हैं.

आजकल ज्यादातर घरों में संतान के नाम पर 1 या 2 बेटियां ही होती हैं. ऐसे में न चाहते हुए भी उन के नाजुक कंधों पर ही बुजुर्ग मांबाप की देखभाल, उन के सपने पूरे करने या परिवार से जुड़ी दूसरी जिम्मेदारियां आ जाती हैं, जिन्हें वे बखूबी निभाती भी हैं. कितनी ही बेटियां हैं, जिन्होंने एक मुकाम हासिल कर घर वालों को सम्मानित किया है.

उदाहरण के लिए इंदिरा गांधी को ही ले लीजिए. वे एक बेटी ही तो थीं, मगर देश की पहली और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री बन कर परिवार की प्रतिष्ठा को नए आयाम तक पहुंचाया.

बेटियां होती हैं बेटों से अधिक जिम्मेदार

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा था कि 1 बेटी 5 बेटों से बेहतर होती है. वैज्ञानिक रूप से भी यह प्रमाणित हो चुका है कि बेटियां अपने मांबाप से भावनात्मक रूप से अधिक जुड़ी रहती हैं और उन की देखभाल करने में बेटों से अधिक रुचि लेती हैं.

बेटियां बड़ी हो कर मांबाप की अच्छी दोस्त बन जाती हैं. वे भी अपने दिल की बात बेटियों से ही अधिक शेयर करते हैं. बेटा तभी तक बेटा होता है जब तक उस की शादी नहीं होती. बेटियां हमेशा बेटियां ही रहती हैं. वे मांबाप को भावनात्मक सहारा देती हैं, उन्हें खुश रखती हैं. शादी से पहले तो वे अपने मांबाप की देखभाल करती ही हैं, शादी के बाद भी दोनों परिवारों की देखभाल करती हैं. वे अपने फर्ज से कभी मुंह नहीं मोड़तीं.

क्षेत्र कोई भी हो लड़कियों ने मौका मिलने पर न सिर्फ दायित्व निभाया वरन समाज में अपना अलग मुकाम भी बनाया है.

ट्रैवल एजेंट उज्ज्वला पादुकोण शादी के बाद एक बेटे को जन्म देना चाहती थीं, क्योंकि उन का कोई भाई नहीं था. वे अपने मन में पैदा इस रिक्तता को बेटे के जरीए भरना चाहती थीं. मगर 1986 में उन के घर बिटिया ने जन्म लिया. उन के पति अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त बैडमिंटन खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण व उज्ज्वला पादुकोण ने बड़े प्यार से बच्ची का नाम दीपिका रखा. वही दीपिका आज घरघर में पहचानी जाती हैं. उज्ज्वला स्वीकारती हैं कि उन्हें दुनिया की सब से अच्छी 2 बेटियां मिली हैं. दीपिका की छोटी बहन अनीषा गोल्फ प्लेयर हैं.

दीपिका का फोकस भी शुरू से ही बैडमिंटन में रहा, क्योंकि कहीं न कहीं अपने पापा के सपनों को पूरा करने के लिए वे प्रयासरत थीं. उन्होंने कम उम्र से ही बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया था. जब वे स्कूल में थीं, तो सुबह जल्दी उठ जाती थीं. फिर फिजिकल ट्रेनिंग पूरी कर स्कूल जातीं. लौट कर बैडमिंटन खेलतीं और फिर होमवर्क खत्म कर के ही सोती थीं. वे नैशनल लैवल चैंपियनशिप प्रतियोगिता में भी खेली हैं. कुछ स्टेट लैवल टूरनामैंट्स में बेसबौल भी खेला है. पढ़ाई और खेल में ध्यान देने के साथसाथ वे चाइल्ड मौडल के रूप में भी काम करती रहीं.

10वीं क्लास में दीपिका के मन में फैशन मौडल बनने की चाहत पैदा हुई. इस बाबत उन्होंने अपने पिता से पूछा कि क्या वह बैडमिंटन खेलना छोड़ सकती है? पिता की स्वीकृति के बाद 2014 में उन्होंने फुलटाइम कैरियर के रूप में मौडलिंग को अपना लिया. फिर लगातार सफलता के मुकाम छूती रहीं. इसी दौरान उन्हें फिल्मों के औफर भी मिलने लगे. 2007 में उन की झोली में फिल्म ‘ओम शांति ओम’ आई, जिस के बाद सफलता और दीपिका एकदूसरे के पर्याय बन गए.

म्यूजिकल लीजैंड व सितारवादक रविशंकर को म्यूजिक वर्ल्ड का गौडफादर कहा जाता है. इंडियन क्लासिकल म्यूजिक को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है. बेटा न होने की वजह से उन्होंने अपना म्यूजिकल टेलैंट अपनी बेटी अनुष्का शंकर को सौंपा. पिता से ही अनुष्का ने सितार वादन सिखा. आज पितापुत्री की यह जोड़ी पूरी दुनिया में अपनी जुगलबंदी के लिए जानी जाती है.

20 साल की उम्र में अनुष्का को पहली दफा ग्रैमी अवार्ड के लिए नौमिनेट किया गया था. आज तक वे 6 दफा इस के लिए नौमिनेट की जा चुकी हैं. वे देश की पहली कलाकार हैं, जिन्होंने ग्रैमी अवार्ड प्रोग्राम में परफौर्म किया है.

मूल रूप से मणिपुर की रहने वाली अंतराश पिछले कई वर्षों से अपने घर की एकमात्र कमाऊ सदस्या हैं. वे कहती हैं कि उन के पिता बेरोजगार थे. भाई के पास भी नौकरी नहीं थी. ऐसी स्थिति में परिवार की देखभाल और मांबाप के सपने पूरे करने का जिम्मा उन्हीं पर था.

अंतराश के सामने कई चुनौतियां थीं पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. 2014 में प्रतिनिधि के रूप में अंतराश ने एवौन कंपनी जौइन की और अब वहां सेल्स लीडर एसईएल के पद पर हैं. आज वे इतनी सक्षम हैं कि परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी करने के साथसाथ अपने सपनों को भी साकार कर रही हैं.

आर्थिक स्वंतत्रता ने दिए नए आयाम

सरोज सुपर स्पैश्यलिटी अस्पताल, नई दिल्ली के मनोचिकित्सक डा. संदीप गोविल बताते हैं, ‘‘पहले महिलाएं पुरुषों की परछाईं होती थीं. पर आज उन का स्वतंत्र वजूद है. समाज में उन की हैसियत बढ़ी है. आज वे ऊंची शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरियां करने लगी हैं. आज बहुत सी महिलाएं अपने परिवार का आर्थिक आधार हैं. वे न सिर्फ नौकरी कर रही हैं वरन बड़ेबड़े बिजनैस भी चला रही हैं.’’

एक महिला के लिए घर की चारदीवारी से निकल कर काम करना और समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाना आसान नहीं है. लेकिन जीवन की हर चुनौती का डट कर सामना करना उन्हें मानसिक रूप से मजबूत और दृढ़निश्चयी बना देता है. आर्थिक आत्मनिर्भरता उन के जीवन को एक नई दिशा देती है.

बढ़ता आत्मविश्वास

जो महिलाएं अपने परिवार के लिए रोटी कमाने वाली (ब्रैड अर्नर) होती हैं, वे उन महिलाओं की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी होती हैं, जो अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए पिता, पति या बेटे पर निर्भर रहती हैं. जब अपनी कमाई से वे अपनी ही नहीं, परिवार की भी जरूरतें पूरी करती हैं, तो उन में अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का साहस उत्पन्न होता है. वे अपनी जिंदगी में उन समझौतों को नकार देती हैं, जो दूसरी महिलाओं को पुरुषों पर आर्थिक निर्भरता के कारण करने पड़े थे. आर्थिक स्वतंत्रता से मिला आत्मविश्वास उन्हें अपने जीवन को उस दिशा में  आगे बढ़ाने में सहायता करता है, जिस दिशा में वे बढ़ना चाहती हैं.

आत्मनिर्भर महिलाओं को अपने भविष्य की चिंता नहीं रहती कि कल को अगर मातापिता नहीं रहे, उन की शादी नहीं हुई, तलाक हो गया या पति की मृत्यु हो गई तो वे क्या करेंगी? अगर उन के अपने बच्चे हैं, तो उन के भविष्य का क्या होगा? उन के जीवन में कोई दुर्घटना घटती है, तो भी वे आर्थिक दृष्टि से इतनी सक्षम होती हैं कि अपने जीवन को पटरी पर ला सकती हैं. भविष्य को ले कर सुरक्षा का भाव उन के व्यक्तित्व को मजबूत बनाता है.

चुनौतियों का सामना करने के टिप्स

डा. संदीप गोविल बताते हैं कि किसी महिला के लिए घर से बाहर निकल कर कमाना आज भी किसी चुनौती से कम नहीं है. उसे समाज व कार्यस्थल पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और जब महिला सिंगल हो तब तो ये चुनौतियां और बढ़ जाती हैं.

– अपने दृष्टिकोण को सकारात्मक और आशावादी रखें.

– मानसिक शांति के लिए ध्यान करें.

– अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखना सीखें.

– रोज कम से कम 30 मिनट ऐक्सरसाइज करें. इस से न सिर्फ शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने में सहायता मिलती है, बल्कि मानसिक शांति भी प्राप्त होती है.

– मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए शरीर को आराम देना भी बहुत जरूरी है. अपने शरीर की आवश्यकता के अनुसार 7-8 घंटे की नींद जरूर लें.

– सामाजिक रूप से सक्रिय रहें.

रोजगार में संभावनाएं बढ़ाने की जरूरत

एसोचैम व थौट आर्बिट्रेज की साझा रिसर्च में यह बात सामने आई है कि पिछले 10 सालों में भारत में फीमेल लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट में 10% की गिरावट आई है. 2000 से 2005 के बीच जहां यह दर 34-37% थी. वहीं 2016 में घट कर 27% के आसपास रह गई है. इस के पीछे जो मुख्य वजहें सामने आईं, वे निम्न प्रकार हैं:

– रोजगार के कम अवसर.

– महिलाओं के लिए प्रतिकूल कार्यशैली.

– महिलाओं के प्रति परिवारों व समाज में रूढि़वादी सोच.

पिछले 10 सालों में भारत के पड़ोसी देश चीन में यह दर 64% तक पहुंच गई है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि यदि हमें अपनी जीडीपी दर बढ़ानी है, तो महिलाओं के लिए भी पुरुषों के समान रोजगार की नई संभावनाएं तलाशनी होंगी. भारत की बेटियों के सपने पूरे होंगे तभी तो देश तरक्की करेगा.

Father’s day 2023: त्रिकोण का चौथा कोण

लिव इन रिलेशनशिप में रहने के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

सवाल-

मैं अपने बौयफ्रैंड के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहना चाहती हूं. मैं जानना चाहती हूं कि इस दौरान जब हम शारीरिक संबंध बनाएं तो हमें क्याक्या सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि मैं गर्भवती न होऊं?

जवाब-

शारीरिक संबंध बनाने के उपरांत गर्भधारण से बचने के लिए आप को अपनी सुविधानुसार कोई गर्भनिरोधक प्रयोग करना चाहिए. 

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आज राहुल के दोस्त विनय के बेटे का नामकरण था, इसलिए वह औफिस से सीधे उस के घर चला गया था.

वैसे, राहुल को ऐसे उत्सव पसंद नहीं आते थे, पर विनय के आग्रह पर उसे वहां जाना ही पड़ा, क्योंकि विनय उस का जिगरी दोस्त जो था.

‘‘यार, अब तू भी सैटल हो ही जा, आखिर कब तक यों ही भटकता रहेगा,’’ फंक्शन खत्म होने के बाद नुक्कड़ वाली पान की दुकान पर पान खाते हुए विनय ने राहुल से कहा. ‘‘नहीं यार,’’ राहुल पान चबाता हुआ बोला, ‘‘तुझे तो पता है न कि मुझे इन सब झमेलों से कितनी कोफ्त होती है?

‘‘भई, मैं तो अपनी पूरी जिंदगी पति नाम का पालतू जीव बन कर नहीं गुजार सकता. मैं सच कहूं तो मुझे शादी के नाम से ही चिढ़ है और बच्चा… न भई न.’’

‘‘अच्छा यार, जैसी तेरी मरजी,’’ इतना कह कर विनय खड़ा हुआ, ‘‘पर हां, एक बात तेरी जानकारी के लिए बता दूं कि मेरी पत्नी राशि की मुंहबोली बहन करिश्मा फिदा है तुझ पर. उस बेचारी ने जब से तुझे मेरी शादी में देखा है तब से वह तेरे नाम की रट लगाए बैठी है. उस ने जो मुझ से कहा वह मैं ने तुझे बता दिया, अब आगे तेरी मरजी.’’

उस के बाद काफी समय तक दोनों की मुलाकात नहीं हो पाई, क्योंकि अपने घर वालों के तानों से तंग आ कर अब राहुल ज्यादातर टूर पर ही रहता था.

‘‘न जाने क्या है हमारे बेटे के मन में, लगता है पोते का मुंह देखे बिना ही मैं इस दुनिया से चली जाऊंगी,’’ जबजब राहुल की मां उस से यह कहतीं, तबतब राहुल की बेचैनी बहुत बढ़ जाती.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

अपने जैसे लोग: भाग 2- नीरज के मन में कैसी शंका थी

एक दिन शाम को नीरज जब काम से लौटा तो पंकज का कान पकड़े हुए उसे घसीटते हुए लाया और बरामदे में पटक दिया. मैं दोपहर का काम निबटा कर लेटी हुई एक पत्रिका पढ़तेपढ़ते शायद सो गई थी.

अचानक ही पंकज की चिल्लाहट से हड़बड़ा कर उठ बैठी. ‘‘देखा नहीं तुम ने, वहां बड़े मजे से उन लड़कों की साइकिल में धक्का लगा रहा था, जैसे गुलाम हो उन का. शर्म नहीं आती. मारमार कर खाल उतार दूंगा अगर आगे से उन के पास गया या कोई ऐसी हरकत की तो…’’ उस की गाल पर एक थप्पड़ और मारते हुए नीरज पंकज को मेरी ओर धकेलते हुए अंदर चला गया.

नीरज के इतने क्रोधित होने पर आश्चर्य हो रहा था मुझे. आखिर इस में पंकज का क्या दोष? उसे साइकिल नहीं मिली तो वह बच्चों के साथ साइकिल को धक्का लगा कर ही अपनी अतृप्त भावना की तृप्ति करने पहुंच गया. वह क्या जाने गुलाम या बादशाह को? बच्चे का दिल तो निर्दोष होता है. मुझे दुख था तो नीरज के सोचने के ढंग पर. ऊंचनीच की भावना उसे परेशान कर रही थी.

मैं समझ गई कि कोई ऐसा भाव उस के हृदय में घर कर गया था जो हर समय उन लोगों की नजरों में उसे हीन बना रहा था और दूसरों के धनदौलत का महत्त्व उस के मस्तिष्क में बढ़ता ही जा रहा था. यद्यपि हीन हम लोग किसी भी प्रकार से नहीं थे. जब तक यह गलत भावना नीरज के मन से दूर न होगी, हमारा इस कालोनी में रहना दूभर हो जाएगा. ऐसा मुझे दिखाई देने लगा था. मैं ने भी सोच लिया कि मुझे उसी बदहाली में जाने की अपेक्षा नीरज के मन में बैठी उस भावना से लड़ाई करनी है.

बड़े सोचविचार के बाद मैं ने एक कदम उठाया. नीरज के दफ्तर चले जाने के बाद मैं उन बड़े लोगों के संपर्क में आने का प्रयत्न करती रही. उन के घर में प्रवेश करने के साथ ही उन के हृदयों में प्रवेश कर के यह जानने की कोशिश करती रही कि क्या हम अपने साधारण से वेतन व साधारण जीवन स्तर के साथ उन के समाज में आदर पा सकते हैं.

सब से पहले मैं ने अपना परिचय बढ़ाया कोठी नंबर 5 की सौदामिनी से. उन के पति एक बड़ी फर्म के मालिक हैं. अनेक वर्ष विदेश रह कर आए हैं और उन के नीचे कार्य करने वाले अनेक कर्मचारी भी विदेशों से प्रशिक्षित हैं. कई सुंदर नवयुवतियां भी इन के नीचे स्टेनो, टाइपिस्ट व रिसैप्शनिस्ट का कार्य करती हैं. स्वाभाविक है कि गांगुली साहब पार्टियों और क्लबों में अधिक व्यस्त रहते हैं.

एक दिन सौदामिनी ने अपने हृदय की व्यथा व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘क्या करूं, शीलाजी? अपने एक बच्चे को तो इन के इसी व्यसन के पीछे गंवा बैठी हूं. हर समय इन के साथ या तो बाहर रहना पड़ता था या घर में ही डिनर व पार्टियों में व्यस्त रहती थी. बच्चे की देखरेख कर ही नहीं पाई, आया के भरोसे ही रहा. वह न जाने कैसा बासी व गंदा दूध पिलाती रही कि बच्चे का जिगर खराब हो गया और काफी इलाज के बावजूद चल बसा.

‘‘अब प्रदीप 2 वर्ष का हो गया है. उसे छोड़ते मुझे डर लगता है. जब से यह हुआ, इन के और मेरे संबंधों में दरार पड़ती जा रही है. ये बाहर रहते हैं और मैं घर में पड़ी जलती रहती हूं.’’ वे लगभग रो पड़ीं.

‘‘अरे, इस समस्या का हल तो बहुत आसान है. आप प्रदीप को पंकज के साथ हमारे यहां भेज दिया कीजिए. दोनों खेलते रहेंगे. प्रदीप जब पंकज के साथ हिल जाएगा तो आप के पीछे से हमारे घर ठहर भी जाया करेगा. फिर आप शौक से गांगुली साहब के साथ बाहर जाइए.’’

सौदामिनी का मुंह एक ओर तो हर्ष से दमक उठा, दूसरी ओर वे आश्चर्य से मेरे मुंह की ओर देखती रह गईं, ‘‘आप कैसे करेंगी इतना सब मेरे लिए? आप को परेशानी होगी.’’

‘‘नहीं, आप बिलकुल चिंता न कीजिए. मैं प्रदीप को जरा भी कष्ट नहीं होने दूंगी और मुझे भी उस के कारण कोई परेशानी नहीं होगी. फिर हमारे पंकज का दिल भी तो उस के साथ बहल जाएगा. वह भी तो बेचारा अकेला सा रहता है.’’ मैं ने हंसते हुए उन से विदा ली थी और अगली ही शाम को वे स्वयं प्रदीप को ले कर हमारे यहां आ गई थीं. कितनी ही देर बैठीबैठी वे हमारे छोटे से घर की गृहसज्जा की प्रशंसा करती रही थीं.

प्रदीप प्रतिदिन हमारे यहां आने लगा. अपने ढेर सारे खिलौने भी ले आता. दोनों बच्चे खेल में ही मस्त रहते. मैं बीचबीच में दोनों को खानेपीने को देती रहती. कभीकभी कहानियां भी सुनाती और पुस्तकों में से तसवीरें भी दिखाती. अब जब भी सौदामिनी चाहतीं, बड़े शौक से प्रदीप को हमारे यहां छोड़ जातीं.

आरंभ में नीरज ने बहुत आपत्ति उठाई थी, ‘‘देख लेना, भलाई के बदले में बुराई ही मिलेगी. ये बड़े लोग किसी का एहसान थोड़े ही मानते हैं.’’

‘‘मैं कोई भी कार्य बदले की भावना से नहीं करती. बस, इतना ही जानती हूं कि इंसान को इंसानियत के नाते अपने चारों ओर के लोगों के प्रति अपना थोड़ाबहुत फर्ज निभाते रहना चाहिए. फिर, इस से हमारा पंकज भी तो बहल जाता है. मुझे तो फायदा ही है.’’

‘‘खाक बहल जाता है, देखूंगा कितने दिन ऐसे बहलाओगी उसे,’’ नीरज चिढ़ते हुए अंदर चला गया था.

परंतु नीरज को यह अभी तक मालूम नहीं था कि जब से प्रदीप हमारे यहां आने लगा था, तब से पंकज मानसिक रूप से बहुत स्वस्थ रहने लगा था. वह अधिकतर प्रदीप या उस के खिलौनों में व्यस्त रहता. मुझे भी घर का कार्य करने में सहूलियत हो गई. पहले पंकज ही मुझे अधिक व्यस्त रखता था. मैं दिन में कुछ कढ़ाईसिलाई व अपने लेखन का कार्य भी नियमित रूप से करने लगी.

एक दिन शाम को हम घूमने निकले तो गांगुली साहब सुयोगवश बाहर ही खड़े मिल गए. बड़े ही विनम्र हो कर हाथ जोड़ते हुए स्वयं ही आगे बढ़ कर बोले, ‘‘आइए, शीलाजी, आप ने हम पर जो एहसान किया है वह कभी भी उतार नहीं पाऊंगा. सच, अकेले में कितना बुरा लगता था बाहर जाना. आप ने हमारी समस्या हल कर दी.’’

‘‘मुझे शर्मिंदा न कीजिए, गांगुली साहब, पड़ोसी के नाते यह तो मेरा फर्ज था.’’

‘‘आइए, अंदर आइए.’’ वे हमें अंदर ले गए. सौदामिनी भी आ गईं. काफी देर बैठे बातें करते रहे. बातों के दौरान ही मैं ने गांगुली साहब को जब अपना छोटा सा यह सुझाव दिया कि आधुनिक युग में रहते हुए भी घर से बाहर उन्हें इतना व्यस्त नहीं रहना चाहिए कि पत्नी घर में ऊब जाए. वे कहने लगे, ‘‘हां, मैं स्वयं ही आप के इस सुझाव के बारे में सोच चुका हूं. मैं ने परसों ही आप का लेख पढ़ा था. आप के विचार वास्तव में सराहनीय हैं. मैं तो बहुत खुश हूं कि आप जैसे योग्य, प्रतिभावान और कर्तव्यनिष्ठ हस्ती इस कालोनी में आई.’’ इतना कह कर वे जोर से हंस दिए.

अभिनेत्री रीवा अरोड़ा की शोपिंग मेनिया है क्या, पढ़े इंटरव्यू

रीवा ने अपने करियर की शुरुआत महज डेढ़ साल की उम्र में 2011 में आयी बॉलीवुड की फिल्म ‘रॉकस्टार’ से किया था. इसके बाद उन्होंने फिल्म उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक, सेक्शन 375, मेरे पापा हीरो हीलाल, मोम आदि कई फिल्मों में काम किया है. इसके अलावा उन्होंने कई शोर्ट फिल्में और म्यूजिक एल्बम में भी काम किया है. उनकी सोशल प्लेटफॉर्म पर लोकप्रियता के कारण उन्हें छोटी उम्र से ही बहुत से विज्ञापनों के लिए भी काम मिला. रीवा अरोड़ा का अपना यू ट्यूब  चैनल भी है, जहाँ वह अपने व्लॉग्स और विडिओ अपलोड करती है, इस पर लगभग 1 मिलियन से अधिक सब्सक्राइबर है.

दिल्ली में जन्मी रीवा की प्रारम्भिक शिक्षा और व पालन-पोषण दिल्ली में ही हुआ है. रीवा ने जितनी भी फिल्में की है, हर में उनके किरदार को आलोचकों ने काफी सराहा है. रीवा की मां का नाम निशा अरोड़ा है और वह वकील हैं. रीवा देखने में बेहद ही क्यूट और खूबसूरत है और सोशल मीडिया पर लाखों की संख्या में उनके फैन फोलोवर्स हैं. उनके उम्र को लेकर पिछले दिनों काफी चर्चा हुई, और जब उनसे इस बारें में बात की गई तो उन्होंने इस विषय पर कुछ बोलने से इनकार किया. उनकी भावनात्मक शोर्ट फिल्म ‘मिलेंगे जन्नत में’ रिलीज़ हो चुकी है, जिसमे उन्होंने शाहीन की भूमिका निभाई है.

इस फिल्म में काम करने की खास वजह के बारें में पूछने पर रीवा बताती है, कि ये एक अलग तरीके की फिल्म की कहानी है, जो बहुत अलग है. साथ ही इसमें उन चीजों को दिखाया गया है, जहाँ एक लड़की अपने मन की कुछ भी नहीं कर सकती और वह अगर करने गई भी, तो उन्हें रोक दिया जाता है. फिल्म में शाहीन की गलती यही है कि वह अपनी माँ की कब्र पर प्रार्थना करना चाहती है, लेकिन उसे वहां जाने से रोका जाता है, क्योंकि महिलाओं को कब्रगाह पर जाना मना है. यह एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी है. ये एक कठिन फिल्म है, लेकिन इसे करते हुए रीवा को किसी प्रकार की समस्या नहीं आई.

करीब हूँ माँ की

इससे कितना खुद को जोड़ पाती है? पूछने पर रीवा कहती है कि मैं इस भूमिका से खुद को कुछ हद तक जोड़ पाती हूँ. मैंने जब इस भूमिका को किया तो बहुत इमोशनल हो रही थी और फील कर पा रही थी, क्योंकि मैं अपने माँ के बहुत करीब हूँ और ये एक सामाजिक कारणों को दिखा रही है, जो गलत है. असल में आज भी महिलाओं को अपनी भावनाओं को जाहिर करने की आज़ादी नहीं है. मैं खुद दिल्ली में एक संस्था चलाती हूँ , जहाँ जरुरतमंदों को भोजन खिलाया जाता है.

मिली प्रेरणा  

अभिनय की प्रेरणा के बारें में रीवा कहती है कि मेरे परिवार में सभी की प्रोफेशन अलग-अलग है, मेरी माँ वकील है, मेरी बहन मेकअप आर्टिस्ट है मेरी नानी का खुद का व्यवसाय है, कोई भी एक्ट्रेस नहीं है. एक्टिंग मुझे बचपन से ही पसंद था और मैं इस सपने और पैशन को पूरा कर रही हूँ. मै बहुत कम उम्र में एक्टिंग में आई, बहुत कम उम्र में मैंने रॉकस्टार फिल्म की थी. इसके बाद मैंने एड फिल्म्स की इसके बाद ‘मॉम’ फिल्म की, इसके बाद काम मिलना शुरू हो गया. छोटी उम्र में काम करने में बहुत मज़ा आता था, क्योंकि मुझे सभी ने बहुत पैम्पर किया, जो बहुत अच्छा लगता था. आज भी मैं एक्टिंग के हर पहलू को एन्जॉय करती हूँ.

शिक्षा पर दिया ध्यान  

वह आगे कहती है कि एक्टिंग के साथ-साथ मैंने अपनी पढ़ाई भी पूरी की है. शूट पर जाकर समय मिलने पर कोर्स पूरा करती थी. मुझे पढ़ना है, क्योंकि मैं हर कक्षा में टॉप करती हूँ.  सेट्स पर साथी कलाकारों और निर्देशकों ने भी मेरे कठिन पाठ को हल किया है. काम के साथ मैं आज भी पढ़ाई करती हूँ.

परिवार का सहयोग

रीवा का कहना है कि परिवार का सहयोग मुझे बहुत मिला है, क्योंकि मेरी माँ एंटरटेनमेंट लॉयर है. सारा सबकुछ वही देखती है, वह मुझे कभी अकेला नहीं छोडती. स्क्रिप्ट्स भी वही देखती है. मेरी नानी ज्योति वाधवा सबसे बड़ी सपोर्टर है, मैं जहाँ भी हूँ, मेरी नानी और माँ की वजह से हूँ.

कैमरा फेस करना था एक्साइटमेंट   

रीवा हंसती हुई कहती है कि पहली बार कैमरा फेस करते हुए मैं बहुत अधिक एक्साइटेड थी. मॉम फिल्म में अभिनेत्री श्री देवी के साथ काम करने का बहुत अलग अनुभव था. उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया है. वह एक प्रतिभाशाली महिला थी. मैं खुद को सौभाग्यशाली मानती हूँ कि मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला.

किये संघर्ष

इंडस्ट्री में संघर्ष के बारें में रीवा का कहना है कि 8 साल पहले जब मैं दिल्ली से मुंबई शिफ्ट हुई तो बहुत संघर्ष किया , क्योंकि मैंने तब 160 जगहों पर ऑडिशन दिए, पर मैं कही भी चुनी नहीं गई. कैसे क्या होगा, खर्चा कैसे चलेगा आदि कई समस्याएं खड़ी हो गयी थी, लेकिन धीरे-धीरे जब एक बार काम मिलना शुरू हुआ, तो काम मिलने का सिलसिला चलता ही रहा. मैंने दिल्ली से मॉडलिंग शुरू किया था. अभी इंडस्ट्री में मेरी 16 साल हो चुके है. मुंबई बाद में शिफ्ट हुई, क्योंकि माँ की सोच थी कि मुंबई आने पर मुझे अधिक अच्छा काम मिलेगा, क्योंकि यहाँ पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है. मेरे लिए संघर्ष एक अच्छी स्क्रिप्ट और भूमिका का मिलना होता है. इसमें मेरी माँ ने हमेशा साथ दिया है. मैने माँ की बात हमेशा माना है.

करना नहीं चाहती टीवी सीरियल

रीवा कहती है कि एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में आने के बाद मैं टीवी सीरियल नहीं करना चाहती. बाकी जो अच्छा होगा करुँगी. ‘उरी… द सर्जिकल स्ट्राइक’ मेरी सबसे बेहतरीन फिल्म है, जिसमे मेरी भूमिका बहुत ही इंटेंस थी और अब तक के मेरे काम का सबसे बेस्ट सीन है. बहुत इमोशनल दृश्य था. आगे शोर्ट फिल्म ‘सुंदर वन की सुंदरी’, ‘फ्रेंडशिप एंथम’  वेब सीरीज ‘कांस्टेबल गिर पड़े’, आदि कई है, इंटिमेट सीन्स के लिए मैं सहज नहीं. कंट्रोवर्सी को मैं अधिक महत्व नहीं देती.

फैशन है पसंद

फैशन रीवा को बहुत पसंद है, वह खुद अपने कपडे डिजाईन करती है और खुद को फैशन आइकॉन कहती है. किसी डिज़ाइनर को फोलो नहीं करती. वह कहती है कि पहले एक डिज़ाइनर थे, लेकिन अब मुझे अपना ऑउटफिट खुद डिजाईन करना अच्छा लगता है. मुझे शोपिंग मेनिया है, एक महीने के कपडे एक साथ लाती हूँ, क्योंकि मैं किसी कपडे को रिपीट नहीं करती. फिर उसे अपने हिसाब से डिजाईन करती हूँ. मुझे ब्लू और ब्लैक कलर बहुत पसंद है और इस रंग के कपडे मेरे वारड्राप में अवश्य मिलते है. मुझे गोल्ड और डायमंड के ज्वेलरी बहुत पसंद है. उसे खरीदने से मैं खुद को रोक नहीं सकती. मुझे शूज का बहुत शौक है और जो भी मिल जाए और मुझे पसंद हो, तो मैं अवश्य खरीद लेती हूँ.

ब्यूटी मंत्र

रीवा का कहना है कि स्किन और हेयर केयर मैं हमेशा करती हूँ. मेरी नानी मेरे बालों में आयल मसाज करती है. यही मेरी ब्यूटी सीक्रेट है. मेकअप मेरी बहन या फिर मैं कर लेती हूँ. इसके अलावा मैं बहुत फूडी हूँ, दाल मखनी, पनीर, पानी पूरी आदि मुझे बहुत पसंद है, माँ के हाथ का बनाया हुआ मंचूरियन, पाँव भाजी, हेल्दी पास्ता और नानी के हाथ का बना हुआ कुछ भी बहुत पसंद है. नानी के हाथ का बना हुआ दही की सब्जी यानि दही तड़का मुझे बहुत पसंद है.

घूमने की शौकीन रीवा कहती है कि इंडिया में केरल और विदेशा में मालद्वीप, पेरिस, कोरिया आदि मुझे बहुत पसंद है. मेरी ड्रीम संजय लीला भंसाली और आर आर राजामौली के साथ, उनके प्रोजेक्ट्स पर काम करूँ और हिंदी सिनेमा से हॉलीवुड जाऊं और उसके बाद कोरियन इंडस्ट्री में भी अभिनय करूँ. मैं कोरियन बोल भी सकती हूँ. इसके अलावा मेरा मेसेज सभी यूथ से यह है कि आप हमेशा अपनी ड्रीम को फोलो करें, उससे पीछे नहीं हटें. संभव नहीं होगा, ये कभी न सोचे, अगर आपने हार्ड वर्क किया है, तो संभव अवश्य होगा.

समीक्षा भटनागर के लिए मददगार साबित हुआ सस्पेंस थ्रिलर ‘मौका या धोखा’

फिल्म ‘पोस्टर बॉयस’  ‘कैलेंडर गर्ल’ और टीवी शो ‘बाल वीर’ ‘उतरन’ ‘कुमकुम भाग्य’ जैसे कई सारे टीवी शो में अपने अभिनय का जादू बिखेरने वाली गजब की खूबसूरत अभिनेत्री समीक्षा भटनागर अपने नए अवतार से  दर्शको का दिल जितने के लिए तैयार है. जी हाँ  ‘हंगामा’ पर 22 जून को रिलीज होने वाली सस्पेंस थ्रिलर वेब सीरीज  मौका या धोखा‘ में समीक्षा का एक अलग अवतार दिखाई देगा.
इस सीरीज में  समीक्षा भटनागरहिमांशु मल्होत्राऔर आभास मेहता की भूमिका सस्पेंस की हर हदों को पार कर जाएगा और अंत तक दर्शको को बांधे रखेगा. इन तीनों मल्टीटैलेंटेड सितारों ने “मौका या धोखा” के निर्माण के दौरान अनगिनत चुटकुलेशरारतें और प्रफुल्लित करने वाले क्षण साझा किए हैं. ऑनसेट सभी कलाकारों ने कई सारे ऐसे काम किये जिसे करके उनको अपने आप पर गर्व महसूस हुआ यहाँ तक की अपने अंदर के दर को भी ख़त्म किया. उनका तालमेल इतना प्रभावशाली है कि प्रशंसक उनकी ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री देखने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

 अपने इस सस्पेंस थ्रिलर पर समीक्षा भटनागर का कहना है कि “एक कलाकार के जीवन में बहुत कम ही ऐसा किरदार मिलता है जिससे आप डरे और उत्साहित होते हो. मुझे पानी से बहुत डर लगता हैजिसे अब मैंने दूर कर लिया है. यह डरावना था और मैं उस पल को नहीं भूल सकता जब मुझे पानी से भरे टब में गिरा दिया गया था. 

मेरे हाथ और पैर बंधे हुए थे. सही शॉट पाने के लिए शॉट को कई बार दोहराया जाना था और मुझे एक ब्रेकपॉइंट पर ले जाया गया. बाद में मुझे एहसास हुआ कि यह सबसे यथार्थवादी अभिव्यक्ति पाने की योजना थी. क्या यह इसके लायक था हाँ!  हिमांशुआभासऔर मैंने सेट पर और बाहर दोनों तरह से एक ऐसा बॉन्ड बनाया है जो वास्तव में कमाल का है. गोवा में शूटिंग करना सोने पर सुहागा था. मैं  उत्साहित हु यह जानने के लिए कि दर्शकों को हमारा शो बेहद पसंद आएगा.”

Father’s day 2023: पिता का वादा

कालेज कैंटीन में अपने मित्रों के संग मस्ती के आलम में था.

‘‘चलो मित्रो, सिनेमा देखने का बहुत मन कर रहा है. थोड़ा मौल घूमते हैं, फिर फिल्म भी देख लेंगे,’’ रोहन ने अपनी राय रखी.

‘‘हूं, वैसे मेरा भी क्लास अटैंड करने का मन नहीं,’’ अनिरुद्ध ने रोहन की बात का समर्थन किया.

मुदित ने कुछ सोचा और फिर हामी भर दी, ‘‘चलो मित्रो, लेकिन किधर चलने का इरादा है?’’

तीनों मित्र कालेज से बाहर आए. औटो में बैठ कर 3-4 मिनट में सिटी वौकमौल पहुंच गए.

तीनों मित्रों ने समय व्यतीत करना था. एक बार पूरा मौल घूम लिया और उस के बाद फूड कोर्ट में बैठ कर लंच किया.

मौल में ही पीवीआर था, वहीं मूवी देखने चले गए. मूवी के इंटरवल के दौरान रोहन पौपकौर्न खरीद रहा था. मुदित वौशरूम गया.

यह क्या एकदम सामने उस के पिता शूशू कर रहे थे. बृजेश का मुंह दीवार की ओर था. उन्होंने मुदित को नहीं देखा. लेकिन मुदित पिता को देख कर घबरा गया और चुपचाप बिना शूशू किए अपनी सीट पर बैठ गया.

मुदित का ध्यान अब सिनेमा स्क्रीन के स्थान पर अपने पिता पर था. वे फिल्म देख रहे हैं. उन का औफिस तो नेहरू प्लेस में है. यहां साकेत में क्या कर रहे हैं? माना किसी क्लाइंट से मिलने आए होंगे लेकिन फिल्म देखने में 3 घंटे क्यों खराब करेंगे? वह तो कालेज स्टूडैंट है. कालेज में मौजमस्ती चलती है, लेकिन उस के पिता भी औफिस छोड़ मौजमस्ती करते हैं इस बात का खयाल मुदित को पहले कभी नहीं आया. उस की नजर अंदर आने वाले गेट पर टिकी हुई थी.

यह क्या? उन के साथ एक महिला भी है. महिला की कमर में हाथ डाले बृजेश दूसरी ओर की सीट पर बैठ गए.

अब मुदित का पूरा ध्यान फिल्म से हट गया. हाल के भीतर अंधेरा हो गया. फिल्म इंटरवल के बाद शुरू हो गई. उस के पिता इस महिला के साथ क्या कर रहे हैं? इस प्रश्न ने उस का दिमाग खराब कर दिया.

फिल्म समाप्ति पर बृजेश अपनी महिला मित्र के साथ आगे चल रहा था. बृजेश का हाथ महिला की कमर पर था.

मुदित सोच रहा था. 20 का वह खुद है. बृजेश 50 पार कर गया है. यह उम्र उस के इश्क लड़ाने की है, उस की तो कोई गर्लफ्रैंड है नहीं, उस के पिताश्री इश्क लड़ाते फिर रहे हैं. उस का दिमाग गरम हो गया. उस ने अपने मित्रों रोहन और अनिरुद्ध के साथ बाकी कार्यक्रम रद्द किया और मालवीय नगर मैट्रो स्टेशन से गुरुग्राम की मैट्रो पकड़ी.

मुदित ने अपने पिता को देख कर थोड़ी दूरी बना ली थी, कहीं उसे देख कर नाराज न हो जाएं, क्लास छोड़ कर फिल्म देख रहा है. बृजेश महिला मित्र के साथ इतना डूबा हुआ था कि उसे एहसास ही नहीं हुआ, उस की हरकत उस के बेटे ने देख ली है.

गुरुग्राम अपने घर पहुंच कर मुदित अपने कमरे में कैद हो गया. बिस्तर पर लेटे हुए घूमते पंखे को देखते हुए उस की आंखें के सामने उस के पिता और उस महिला की शक्ल ही घूम रही थी. उस की मां साधारण गृहिणी हैं. उन की तुलना में वह महिला जवान है और खूबसूरत भी है. इस का यह मतलब तो कतई नहीं है, उस की मां और उस की अनदेखी हो.

बृजेश के पिता का ऐक्सपोर्ट का बढि़या काम है और औफिस नेहरू प्लेस में है. मुदित सोचने लगा, क्या वह महिला औफिस में कार्यरत है या कोई और चक्कर है?

रात को बृजेश अकसर 10 बजे के आसपास आते थे. मुदित की मां बृजेश की प्रतीक्षा करती मिलतीं.

आज मुदित भी पिता की प्रतीक्षा करने लगा. उस के पिता रात 11 बजे आए. फोन कर के पहले ही देर से आने का बता दिया, काम अधिक है. क्लाइंट के साथ मीटिंग है. डिनर औफिस में कर लेंगे. मुदित की मां सो गई थीं. उन्हें बृजेश की काली करतूतों का कोई भी इल्म नहीं था.

आज मुदित का कालेज क्लास छोड़ना एक करिश्माई ही रहा. उस की मौजमस्ती ने पिता का दूसरा रूप दिखला दिया. वह जागता रहा.

मुदित की आंखों से नींद गायब थी. वह ड्राइंगरूम में बैठा पिता की प्रतीक्षा कर रहा था. छोटी लाइट जल रही थी. मुदित टीवी पर मूवी देख रहा था. टीवी की आवाज बंद थी.

बृजेश ने फ्लैट का मेन गेट अपनी चाबी से खोला. मुदित को देख कर चौंके. पूछा, ‘‘आज सोया नहीं?’’

‘‘बस नींद नहीं आ रही थी.’’

‘‘और कालेज कैसा चल रहा है?’’

‘‘ठीक चल रहा है.’’

‘‘कालेज के बाद क्या सोचा है?’’

‘‘आप बताइए पापा, एमबीए करूं या आप का औफिस जौइन करूं?’’

‘‘एमबीए जरूर करो. फिर तो मेरा

औफिस तुम्हारा ही है. रात बहुत हो गईर् है. मैं

भी थका हुआ हूं. सुबह फिर औफिस जल्दी

जाना है. एक कन्साइनमैंट कल ही भेजना है. गुड नाइट मुदित.’’

मुदित ड्राइंगरूम में ही बुत बना बैठा रहा. बृजेश चले गए. मुदित की यही सोच थी कि क्या उस के पिता सचमुच औफिस में व्यस्त थे या फिर उस महिला के साथ?

मुदित के मन में हलचल शुरू हो गई. अगले दिन कालेज में क्लास अटैंड कर के नेहरू प्लेस पहुंच गया. दोपहर का 1 बज रहा था. बिल्डिंग की पार्किंग में उसे पिता की न तो हौंडा सिटी कार नजर नहीं आई और न ही औडी. तीसरी कार मारुति डिजायर तो मम्मी के लिए घर पर रहती है. वह कालेज मैट्रो में आताजाता है. उस का दिमाग घूम गया. क्या आज फिर उस के पिता महिला मित्र के साथ हैं या फिर औफिस के काम से कहीं गए हैं? इस प्रश्न के जवाब के लिए वह औफिस पहुंच गया.

छोटे साहब को देख कर स्टाफ ने मुदित की आवभगत की. एक सरसरी नजर स्टाफ

पर मारी. वह महिला नजर नहीं आई, जो कल पिता के साथ थी.

मुदित कुछ देर औफिस में बैठा. कन्साइनमैंट का पूछा, जो जाना था. जान कर हैरानी हुई, कन्साइनमैंट तो 2 दिन पहले ही जा चुका है. अगला कन्साइनमैंट 10 दिन बाद जाएगा, इसलिए औफिस में बेफिक्री है.

बुझे मन मुदित घर पहुंच कर बिस्तर पर औंधा लेट गया. पापा शर्तिया उस महिला के संग ही होंगे. यदि ऐसा ही है तब पापा मम्मी और उस के साथ गलत कर रहे हैं. लेकिन इस बात का सत्यापन होना आवश्यक है वरना उस को झूठा घोषित कर दिया जाएगा.

मुदित का दिमाग फिर से घूम गया कि अगर वह महिला पापा की बिजनैस क्लाइंट है

तब उस के साथ कमर में हाथ डाल कर फिल्म नहीं देखी जाती है. बिजनैस क्लाइंट के  संग फाइवस्टार होटल में लंच और डिनर होते हैं. पापा उसे और मम्मी को भी 2-3 बार ऐसे डिनर पर ले गए थे.

मुदित पापा की प्रतीक्षा करता रहा. आज भी पापा रात के 12 बजे आए. मम्मी सो गई थीं. कल की भांति मुदित ड्राइंगरूम में हलकी मध्यम रोशनी में टीवी देख रहा था. टीवी की आवाज बंद थी और दिमाग कहीं और था.

बृजेश रात के 12 बजे आए. अपनी चाबी से फ्लैट का मेन गेट खोला. मुदित को बैठा देख ठिठके. पूछा, ‘‘क्या बात है, बंद आवाज में टीवी देख रहे हो?’’

‘‘बस यों ही पापा. नींद नहीं आ रही थी. शाम को सो गया था.’’

‘‘गुड नाइट,’’ कह कर बृजेश अपने कमरे में चले गए. उन्हें इस बात का इल्म नहीं था, मुदित औफिस गया था.

मुदित का दिमाग खराब होता जा रहा था. हालांकि मुदित कालेज मैट्रो से जाता था. बाइक को मैट्रो पार्किंग में खड़ी करता था. लेकिन अगले दिन उस ने बाइक स्टार्ट की लेकिन कालेज नहीं गया.

मुदित नेहरू प्लेस पहुंच गया. उस ने बाइक को पार्किंग में खड़ा किया और अपने पिता की प्रतीक्षा करने लगा.

बृजेश 12 बजे औफिस पहुंचे. 2 घंटे औफिस में रहे.

मुदित पार्किंग में खड़ा हौंडा सिटी कार

पर नजरें गड़ाए था. एक महिला

कार के पास आई और उस ने फोन किया.

मुदित ने उस महिला के आगे से गुजरते हुए उस की शक्ल देखी. फिर मन ही मन बड़ाया कि

अरे यह तो वही है, जो पापा के साथ फिल्म

देख रही थी. मुदित कुछ दूर खड़ा था. बृजेश आए, उस महिला के गले मिले और फिर कार में बैठ गए.

मुदित के देखतेदेखते कार उस के आगे से निकल गई. कुछ देर वह सोचता रहा फिर औफिस चला गया.

‘‘पापा हैं?’’

‘‘पापा तो बाहर मीटिंग में गए हैं,’’ सैक्रेटरी ने बताया.

‘‘ओह नो, मैं ने अपने मित्रों के साथ लंच करना है, फिर फिल्म देखनी है. मेरी पौकेट मनी खत्म हो गई. पापा से 2 हजार रुपए लेने के लिए औफिस आया हूं.’’

सेक्रेटरी ने बृजेश को फोन पर अनुमति

ले कर कैशियर से 2 हजार रुपए मुदित को दिलवा दिए.

मुदित के पास पैसे थे लेकिन वह जासूसी करने औफिस आया था. 2 हजार रुपए जेब में रख कर कुछ देर तक नेहरू प्लेस की कंप्यूटर मार्केट घूमता रहा, फिर घर चला गया.

रात को मुदित ने अपने पिता की प्रतीक्षा नहीं की. रात का डिनर 8 बजे कर लिया और अपने कमरे में टीवी पर फिल्म देखने लगा.

बृजेश भी 10 बजे आ गए. पत्नी संग डिनर किया. फिर मुदित के कमरे में जा कर पूछा, ‘‘औफिस गए थे?’’

‘‘वह क्या है पापा, फ्रैंड्स के साथ फिल्म देखनी थी और लंच भी करना था.’’

‘‘प्रोग्राम था तो मम्मी से सुबह रुपए ले लेते?’’

‘‘बस अचानक प्रोग्राम बना.’’

‘‘गुड नाइट,’’ बृजेश को अभी भी कोई खटका नहीं लगा.

मुदित ने उस महिला का फोटो पार्किंग में दूर से खींचा था. वह फोटो देख रहा था, दूरी के कारण फोटो अस्पष्ट सा था.

जहां लड़के को गर्लफ्रैंड के साथ घूमना चाहिए था, वहां पिताश्री घूम रहे हैं. मुदित ने भी ठान लिया. फसाद की जड़ तक पहुंच कर ही सांस लेगा.

मुदित ने कालेज जाना छोड़ दिया. अपने मित्रों को बोल दिया कि कुछ दिनों के लिए परिवार के साथ बाहर जा रहा है.

मुदित बाइक ले कर पार्किंग में खड़ा हो जाता. वह महिला दोपहर को आती और बृजेश

के साथ कार में चली जाती. मुदित ने उन के मोबाइल से फोटो खींच लिए. मुदित ने उन का पीछा कर के उन के क्रियाकलापों को 1 सप्ताह तक देखा. एक दिन वह महिला नहीं आई. बृजेश कार से कालकाजी एक फ्लैट में गए और शाम को बाहर आए.

बृजेश के जाने के बाद मुदित ने उस फ्लैट की डोरबैल बजाई. 2-3 बार डोरबैल बजाने के बाद फ्लैट गेट खुला. उस महिला ने गेट खोला. उस के वस्त्र अस्तव्यस्त थे.

‘‘तुम कौन?’’

‘‘यही प्रश्न मैं पूछता हं?’’

महिला ने दरवाजा बंद करने की कोशिश की तो मुदित फुरती से फ्लैट के भीतर हो गया.

‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई भीतर आने की?’’ वह महिला बिगड़ गई.

मुदित ने फ्लैट का गेट बंद कर दिया,

‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो… बृजेश से मिलना बंद कर दो.’’

‘‘फौरन निकल जाओ, तुम हो कौन?’’ महिला मुदित का हाथ पकड़ कर फ्लैट का गेट खोलने लगी.

‘‘बृजेश मेरे पिताश्री हैं, इसलिए कह रहा हूं. तुम्हारे इरादे पूरे नहीं होने दूंगा. सारे संबंध तोड़ दो वरना वैसे भी टूटे समझो. आज नहीं तो कल टूटे ही समझ. हमारे पिताश्री जो काम चोरीछिपे कर रहे हैं. मैं शर्त लगा कर कहता हूं कल से मिलना छोड़ देंगे.’’

मुदित ने फ्लैट का गेट खोला और दनदनाता सीढि़यां उतर गया.

बृजेश शाम के 7 बजे ही घर पहुंच गए.

इस समय पिता को घर पर देख कर

मुदित को हैरानी हुई. उस महिला ने बृजेश को फोन पर बता दिया था.

बृजेश ने मुदित को तोलना चाहा, ‘‘आजकल कालेज नहीं जा रहे हो क्या बात है?’’

‘‘रोज जाता हूं.’’

‘‘लगता नहीं है. आजकल बड़ी फिल्में देखी जा रही हैं. औफिस भी गए थे.’’

‘‘वह क्या है, आजकल 2 प्रोफैसर छुट्टी

पर हैं, इस कारण कुछ फिल्म देखने चले जाते. इस चक्कर में पौकेट मनी जल्दी खत्म हो गई,

तो आप से पैसे लेने आया था. फ्रैंड्स को पार्टी देनी थी.’’

‘‘फिल्म और पार्टी में थोड़ा ध्यान कम करो. पढ़ने में ध्यान लगाओ.’’

मुदित ने इस महिला के साथ उन के फोटो व्हाट्सऐप कर दिए, ‘‘पापा, आप इसे छोड़ दो. मैं पीछा करना छोड़ दूंगा.’’

मुदित की मां पितापुत्र के वार्त्तालाप को सम?ाने में असमर्थ थीं.

बृजेश स्तब्ध हो गया. अपने हावभाव को काबू करते हुए कहा, ‘‘मैं सोचता हूं, तुम्हारी ट्रेनिंग अभी से स्टार्ट कर दूं. आखिर मेरा व्यापार तुम ने ही संभालना है. औफिस पैसे मांगने नहीं, काम सीखने आया करो.’’

‘‘कालेज की क्लास अटैंड करने के बाद आ सकता हूं.’’

‘‘कल से आना शुरू करो.’’

‘‘जी पापा.’’

कमरे में जाते ही मुदित ने एक और व्हाट्सऐप और भेजा, ‘‘मैं उम्मीद करता हूं, अब से आप मम्मी के साथ रहेंगे. उस महिला को छोड़ देंगे साथ में अन्य के साथ भी ऐसा किसी प्रकार का संबंध नहीं रखेंगे. आप को पक्के वाला वादा करना होगा.’’

‘‘मेरा वादा है,’’ बृजेश ने उत्तर भेजा.

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