Spiritual Travel : कहीं आप भी तो उन्ही लोगों में से एक नहीं जो एक पंथ और दो काज करना चाहते है? उन्हें लगता है किसी धार्मिक स्थल पर चलते है वहां दरहन भी हो जायेंगे और घूमना भी हो  जायेगा. अगर आप भी यही सोचकर आने वाले दिनों में जगन्नाथ पूरी, सारनाथ, द्वारका, काशी जाने का सोच रहें है तो हम आपको बता दें कि यदि आपका उद्देश्य काम के तनाव से दूर भागकर खुद को रीचार्ज करना, परिवार के साथ सुकून से समय बिताना और आराम करना है, तो प्रसिद्ध तीर्थस्थलों की यात्रा अक्सर आपको और अधिक थका सकती है. आइये जाने कैसे-

भीड़भाड़ और ओवर टूरिस्म  है सबसे बड़ी वजह

बनारस, पुरी या द्वारका जैसे बड़े तीर्थस्थलों पर साल के 365 दिन श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. यहाँ ‘ऑफ-सीजन’ जैसा कुछ बचा नहीं है. इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर कुछ चुनिंदा जगहों की रील्स वायरल होने से लाखों लोग एक साथ उन्हीं जगहों पर पहुँचने लगते हैं. जैसे की पूरी में अगर कोई धार्मिक आयोजन है तो उसकी रील वायरल हो जाती है और सभी लोग वहां जाने को मचल उठते है और जब वहां पहुँचते है तो वहां की बदइंतज़ामी देख पूरा ट्रिप ख़राब हो जाता है.

दर्शन सिर्फ 2-4 सेकंड के और थकन पूरे  दिन की मेट्रो शहरों में काम करने वाले लोग हर लंबे वीकेंड पर वृंदावन, मथुरा जैसे तीर्थस्थलों की ओर भागते हैं. लेकिन वहां पहुंचकर हम तब ठगे से रह जाते है जब घंटों लंबी लाइनों में खड़े रहने के बाद भगवान के दर्शन सिर्फ 2-4 सेकंड के लिए मिलते हैं, तो बच्चों और बुजुर्गों के लिए शारीरिक रूप से यह यात्रा बहुत कष्टदायक हो जाती है. तब लगता है कि इतनी दूर दर्शन करने आये और 2 सेकंड का समय भी नहीं मिला बल्कि वह समय तो खुद को सँभालने में ही लग गया और इतने में भीड़ के धक्के से बाहर भी निकल गएँ. फिर हम यहाँ क्या करने आये थे, जब दर्शन तक ढंग से नहीं कर पाएं? घंटों लाइन में खड़े रहने और कड़ी मेहनत के बाद गर्भगृह में सुरक्षाकर्मियों द्वारा धक्का देकर मात्र कुछ ही सेकंड में बाहर निकाल दिया जाता है, जिससे श्रद्धालु को मानसिक संतोष नहीं मिल पाता.

घंटों की पैदल प्रतीक्षा से शारीरिक समस्याएं मिलती है

प्रसिद्ध मंदिरों में दर्शन के लिए 4 से 10 घंटे तक लंबी-लंबी लाइनों में खड़ा रहना पड़ता है. इससे पैर दर्द, पीठ दर्द और अत्यधिक शारीरिक थकान होती है. गर्मी, दमघोंटू भीड़ और लंबे इंतजार के कारण छोटे बच्चे चिड़चिड़े हो जाते हैं और बुजुर्गों की तबीयत बिगड़ने या बीपी/डिहाइड्रेशन जैसी समस्या होने का खतरा रहता है. अत्यधिक भीड़भाड़ और भीड़ में हवा का सही वेंटिलेशन न होने के कारण मौसमी बीमारियां, वायरल इंफेक्शन और सांस संबंधी समस्याएं फैलने का जोखिम बढ़ जाता है.

मनमाने दाम वसूलते है लोग यहाँ

इन मंदिरों में हमेशा इतनी भीड़ लगी होती है कि वहां हर चीज के दाम आसमान छूते है. भीड़ वाले सीजन में रुकने के लिए होटलों के रेट सामान्य से 3 से 4 गुना बढ़ जाते हैं. खाने-पीने और टैक्सी सेवा के भी मनमाने दाम वसूले जाते हैं. जो चीज आपके शहर में कम दामों में मिलेगी उसके भी वे अपनी मर्जी के दाम वसूलते है. कई बार टैक्सी के दाम इतने होते है कि आप चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते क्यूंकि ये सभी एक हो जाते है. आपकी सुनने वाला या कहीं शिकायत करने का वहां कुछ नहीं होता, कोई सुनवाई नहीं होती है इससे मन बहुत ख़राब हो जाता है.

कमर्शियलाइजेशन और कुप्रबंधन

अत्यधिक भीड़ के कारण साफ-सफाई बनाए रखना बड़ी चुनौती बन जाता है. साथ ही, मनमाने दाम वसूलना, मिलावटी प्रसाद और जेबतराशी जैसी समस्याएँ भी श्रद्धालुओं का अनुभव खराब कर देती हैं.

चढ़ावा और वीआईपी कल्चर

कई जगहों पर ‘शीघ्र दर्शन’ या वीआईपी पास के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है. सामान्य श्रद्धालुओं को घंटों इंतजार करना पड़ता है, जिससे समय और पैसे दोनों का दुरुपयोग महसूस होता है. ऐसा माहौल देखकर लगता है कि काश हम भी इनकी तरह vip होते और हम तो ज़िंदगी में कुछ कर ही नहीं पाएं. आप गए तो रिलैक्स करने थे उल्टा डिप्रेस होकर आते हो.

पर्यटकों का खराब अनुभव

जिस सुकून और आनंद की तलाश में लोग जाते हैं, वहाँ उन्हें अत्यधिक भीड़, धक्का-मुक्की, गंदगी और थकावट ही मिलती है. व्यक्ति जिस शांति और ध्यान की खोज में मंदिर जाता है, अत्यधिक शोर-शराबे, धक्का-मुक्की और चिल्लाहट के कारण वह मानसिक शांति पूरी तरह भंग हो जाती है.

चोरी और जेब काटने की घटनाएं भी खूब होती है

भारी भीड़ का फायदा उठाकर जेब काटने, पर्स या मोबाइल चोरी होने और गहने झपटने जैसी घटनाएं अक्सर होती हैं. कितना भी बच कर चल लो लेकिन आसपास जब इस तरह के लोग हों तो यहाँ यह कहावत ही सटीक बैठती है कि “बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी”. जब कोई चीज चोरी हो जाती है तो उसके चलते जो मानसिक तनाव होता है वह सालों तक नहीं भूलता.

धार्मिक स्थलों पर भगदड़ मचने का पुराना इतिहास है

कई पुराने धार्मिक स्थलों के रास्ते बेहद सकरे होते हैं, जहाँ से एक साथ हज़ारों लोगों का निकलना असंभव होता है. साथ ही मंदिरों या घाटों पर एक ही समय में क्षमता से अधिक लोगों का प्रवेश होना भी भगदड़ का कारण बनता है. वीआईपी गाड़ियों या वीआईपी दर्शन के चक्कर में आम रास्तों को अचानक रोक दिया जाता है, जिससे पीछे से आ रही भीड़ का दबाव बढ़ता चला जाता है. एक बार कोई व्यक्ति नीचे गिर जाता है, तो पीछे से आ रही बेकाबू भीड़ के लिए उसे देखना और संभालना नामुमकिन हो जाता है. आएं दिन इस तरह की घटनाएं होती रहती है और इनमे मरने वालों की संख्यां भी कई बार हज़ारों में होती है. इसलिए किसी धार्मिक स्थल में जाने से पहले कई बार सोचे.

धार्मिक स्थल पर ना जाएँ तो कहाँ जाएँइसके विपरीत अगर कहीं रिलैक्स करने जाना भी है तो किसी हिल स्टेशन पर जाये वहां भी भीड़ लगें तो किसी रेजॉर्ट या होटल में ही कुछ दिन बिता कर आ जाएँ इससे आप पूरी तरह रिलैक्स हआज के समय में अच्छे रेजॉर्ट्स में इन-हाउस कई गतिविधियाँ होती हैं—जैसे स्विमिंग पूल, स्पा, नेचर वॉक, इनडोर गेम्स, बॉनफायर और स्वादिष्ट खाना. इनका लुत्फ उठाकर आप शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में रिलैक्स महसूस करते हैं. रेजॉर्ट के शांत माहौल में आप बिना किसी हड़बड़ी के एक-दूसरे के साथ Quality Time बिता पाते हैं.

ऑफ-सीजन में बुकिंग करने से बेहतरीन और महंगे रेजॉर्ट्स भी काफी कम दाम में मिल जाते हैं और भीड़ भी नाममात्र की होती है. ट्रेवल हमेशा किसी जगह को “कवर” या “एक्सप्लोर” करने के लिए ही नहीं होती. कभी-कभी कुछ न करना और बस एक जगह शांत होकर बैठना ही सबसे बेहतरीन थेरेपी साबित होता है.

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