Holi Special: जब उड़े रंग और गुलाल 

होली का त्यौहार आते ही मन में मौज-मस्‍ती, रंग-गुलाल, उमंग आदि की तस्वीर उभरती है. हालाँकि इस बार होली में बाहर निकलकर रंग खेलने का मौका नहीं, क्योंकि कोरोना महामारी एक बार फिर बढ़ रही है. असल में कोरोना संक्रमण की वजह से पिछले साल और इस साल भी त्योहारों के मौज-मस्ती कम होती दिखाई पड़ रही है, लेकिन घर पर रंग और गुलाल खेलने से कोई मनाही नहीं है. इसलिए रंगों से त्वचा ख़राब होने का डर रहता है.

इस बारें में मुंबई की कोकिलाबेन धीरूभाई अम्बानी हॉस्पिटल की डर्मेटोलोजिस्ट और केश विशेषज्ञ डॉ. रेशमा टी. विश्नानी कहती है कि होली खेलने के बाद ज़्यादातर हमारी त्‍वचा और बालों की हालत ख़राब हो जाती है, ऐसे में कुछ जरुरी सावधानियां बरतने पर इस समस्या से निजात पाया जा सकता है. कुछ टिप्स निम्न है,

होली के हफ़्ते भर बाद, वैक्सिंग, थ्रेडिंग, ब्‍लीचिंग, केमिकल पील्‍स और लेज़र नहीं करने चाहिए. इसके अलावा रेटिनॉयड्स, सैलिसाय‍लिक और ग्‍लाइकॉलिक एसिड्स वाली क्रीम्‍स का उपयोग न करें, ये क्रीम्‍स त्‍वचा को ड्राई बना देती है.

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होली के दिन, भरपूर मात्रा में अच्‍छी क्‍वालिटी का मॉइश्‍चराइजर या ऑयल लगाएं, इसे 20 मिनट तक त्‍वचा में बैठ जाने दें. परिवार और दोस्तों के साथ रंग खेलने के 30 मिनट पहले वाटरप्रूफ सनस्‍क्रीन भी लगा लें. ऑयल, त्‍वचा द्वारा रंगों को सोखने से रोकेगा और बाद में त्‍वचा को ड्राई होने से भी बचायेगा. बालों में, कान के पीछे वाले हिस्‍सों में, कान पर, उंगली के पोरों के बीच में और नाखूनों के चारों ओर भी तेल लगा लेना सही होता है.

गाढ़े रंग के सूती कपड़े पहनें, जिससे त्‍वचा का अधिकांश हिस्‍सा ढका रहे, जिससे बाद में रंगों को निकालने में आसानी होगी. सिर पर रंगबिरंगे कपड़े बांधे या हैट्स पहन लें और आंखों पर सनग्‍लासेज लगा लें.

नाखूनों को काट कर छोटा कर लें और कम से कम दो लेयर्स अच्‍छा टॉपकोट लगा लें’ प्राइम एसपीएफ वाला गाढ़ा लिप बाम लगाकर होंठों को सुरक्षित रखें.

रंग खेलने के लिए, पानी में घुलनशील और ब्रांडेड कंपनी के ऑर्गेनिक या हर्बल रंगों का प्रयोग करें, गोल्‍ड और सिल्‍वर रंग, मसलन इंडस्ट्रियल और मेटालिक कॅलर्स से दूर रहें, क्‍योंकि इनमें सस्‍ती डाई होती है, जिससे त्वचा में एलर्जी और ब्रेक-आउट्स की संभावना होती है.

रंग खेलने के बाद, सीधे न‍हाने न जाएँ, किसी साफ-सुथरे कपड़े से सूखे रंगों को धीरे-धीरे झाड़कर निकाल दें, फिर हल्‍का-सा तेल लगाकर 10 मिनट तक इंतज़ार करें, कॉटन या सॉफ्ट टिश्‍यू लेकर, तेल को पोंछ दें और नहा लें. रंगों को हटाने के लिए किसी प्रकार के केमिकल जैसे केरोसिन, सख्‍त ब्रश, नींबू, टमाटर आदि का प्रयोग कभी भी न करें. इससे स्किन ड्राई हो जाती है, जिससे त्वचा पर रैशेज की संभावना बढ़ जाती है.

केशों को किसी माइल्ड शैम्पू से धोने के बाद कंडीशनर लगा लें, इससे केश बेजान होने से बचेंगे.

नहाने के बाद पूरे शरीर पर कोई अच्छा मॉइश्‍चराइजर लगा लें. कुछ घंटों के बाद फिर से मोयस्चराइजर लगायें, इससे त्वचा रुखी और बेजान होने से बचेगी. एक सप्ताह तक स्किन पर मोयस्चराइजर और सनस्‍क्रीन का लगातार प्रयोग करते रहने से त्वचा फिर पहले जैसे हो जायेगी.

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चेहरे या शरीर पर किसी प्रकार की खुजली, लाल रंग के चकत्ते, फोड़े आदि दिखने पर त्वचा विशेषज्ञ से तुरंत संपर्क करें, ताकि इसे बढ़ने से रोका जा सकें.

अबौर्शन का नया कानून

मां बनना किसी भी महिला के लिए बहुत खास और खूबसूरत अहसास होता है. वह अपने आने वाले बच्चे को ले कर कितने ही सपने संजोती है. मगर कभीकभी परिस्थितियां ऐसी हो सकती हैं जब मां बनना उसकी अपनी जिंदगी के लिए ही घातक या अंधकारमय हो सकता है. ऐसे में क्या उसे यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि वह अपने बच्चे को जन्म न देने का फैसला ले और अपना अबौर्शन कराए. एक बच्चा जिस ने अपनी आँखें नहीं खोलीं हैं, जिस का शरीर अभी बना भी नहीं है क्या उस के लिए एक जीतीजागती महिला के प्राण दांव पर लगा देना न्यायसंगत है?

महिलाओं की जंदगी से जुड़ा यह अहम मसला अक्सर उठता रहा है. इस से जुड़े क़ानून भी बनाए गए हैं और ऐसा ही एक क़ानून है मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी बिल, 1971 ( MTP बिल ) यानी चिकित्सा अबौर्शन अधिनियम, 1971. इस क़ानून के अनुसार यदि कोई महिला किसी कारण से अबौर्शन कराना चाहती है तो वह 5 महीने या 20 हफ्ते तक ही अबौर्शन करवा सकती है . इस समय के बीत जाने पर कानूनी रूप से अबौर्शन नहीं कराया जा सकता.

इस कानून की वजह से बहुत सी महिलाओं को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती थी क्योंकि 20 सप्ताह का समय प्रैग्नैंसी के कॉम्प्लीकेशन्स समझने के लिए पर्याप्त नहीं थे. कितनी ही महिलाओं को अबौर्शन की अनुमति हेतु यह समय सीमा बढ़ाए जाने के लिए याचिकाएं डालनी पड़ती थीं.

इन्ही सब जटिलताओं के मद्देनजर भारत की केंद्रीय कैबिनेट ने आखिर चिकित्सा अबौर्शन अधिनियम, 1971 में संशोधन करने को मंजूरी दे दी है. इस के मुताबिक़ अब महिलाएं या लड़कियां 20 के बजाए 24 हफ्ते तक अबौर्शन करा सकने का कानूनी हक़ पाएंगी.

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इस कानून के तहत स्पेशल कैटेगरी में आने वाली औरतों को कानूनी तरीके से अबौर्शन की इजाज़त दी गई है. औरतों की स्पेशल कैटेगरी की अगर बात करें तो इन में रेप विक्टिम्स, इनसेस्ट यानी परिवार के अंदर ही गैरकानूनी शारीरिक संबंध की वजह से प्रेगनेंट हुई औरतें, गंभीर बीमारी से जूझ रहीं गर्भवती महिलाएं शामिल होंगी. साथ ही वे औरतें भी इस कैटेगरी में आएंगी जिन के लिए बच्चे को जन्म देना उन की जान पर बन आया हो.

संशोधित कानून के अनुसार गर्भावस्था के 20 हफ्ते तक अबौर्शन कराने के लिए एक डॉक्टर की रेकमेंडेशन लेने की जरूरत और गर्भावस्था के 20 से 24 हफ्ते तक अबौर्शन कराने के लिए दो डॉक्टरों की रेकमेंडेशन लेनी जरूरी होगी. ये डॉक्टर रेकमेंडेशन तभी देंगे जब उन्हें लगेगा कि बच्चे के पैदा होने से महिला को मानसिक या शारीरिक नुकसान पहुंच सकता है या फिर खुद बच्चे को कोई गंभीर शारीरिक या मानसिक दिक्कत से जूझना पड़ सकता है.

नया बिल यह भी कहता है कि जिस महिला का अबौर्शन कराया जाना है उस का नाम और अन्य जानकारियां उस वक्त कानून के तहत तय किसी खास व्यक्ति के अलावा किसी और के सामने नहीं लाया जाएगा ताकि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके. जो कोई भी महिला की प्राइवेसी का उल्लंघन करेगा तो उसे एक साल तक की कैद की सजा हो सकती है.

कितना जरुरी था यह कानून

माना जा रहा है कि 24 हफ्ते तक अबौर्शन की अनुमति से रेप पीड़ितों की काफी मदद होगी. हाल के दिनों में अदालतों में ऐसी कई याचिकाएं दी गई थीं जिन में भ्रूण संबंधी विकारों या महिलाओं के साथ यौन हिंसा की वजह से गर्भधारण की स्थिति में 20 सप्ताह के बाद अबौर्शन कराने की इजाजत मांगी गई थी .

एक लीगल रिपोर्ट के मुताबिक मई 2019 से लेकर अगस्त 2020 के बीच विभिन्न हाई कोर्ट में अबॉर्शन के लिए कुल 243 याचिकाएं डाली गई थीं. इन में से 74 फीसदी याचिकाएं ऐसी थीं जिन में 20 हफ्ते से ज्यादा के गर्भ का अबॉर्शन कराने की परमिशन मांगी गई थी. 84 फीसद मामलों में अबॉर्शन को मंजूरी दे दी गई.

इस आदेश से कहीं न कहीं उन महिलाओं को भी राहत मिलेगी जिन्हें न चाहते हुए भी बच्चे को जन्म देने को विवश होना पड़ता है. खासकर ऐसी बच्चियां जो रेप की शिकार हैं. बच्चियों को अहसास ही नहीं होता कि वे मां बनने वाली हैं. बाद में जब पता चलता है तो उन के साथ डॉक्टर्स भी सोच में पड़ जाते हैं क्योंकि बच्चा पैदा करने की उन की उम्र नहीं होती और उन के नाजुक शरीर के लिए प्रैग्नैंसी का बोझ उठाना घातक साबित हो सकता है. प्रेगनेंसी टर्मिनेट कराने के फैसले में जरा सी देर की वजह से उन का पूरा भविष्य अंधकार में जा सकता है.

भारत में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब बच्चियों को पांच महीने तक पता नहीं चला कि वे गर्भवती हैं और उन्हें अबौर्शन कराने के लिए हाईकोर्ट का सहारा लेना पड़ा. ऐसा ही एक मामला पिछले साल सूरत में देखने को मिला जब की एक बच्ची को गुजरात हाईकोर्ट ने 24 हफ्ते का अबौर्शन कराने की मंजूरी दी थी. जज ने डॉक्टरों के पैनल की रिपोर्ट के आधार पर यह मंजूरी दी थी क्योंकि इस गर्भ से नाबालिग की जान को खतरा था.

मानवीय दृष्टि से देखा जाए तो काफी समय से ऐसे फैसले की जरुरत थी. बच्चे को जन्म देना है या नहीं इस का अधिकार मां को मिलना चाहिए. मां जब तक जान सके कि वह प्रेग्नेंट है तब तक टर्मिनेट कराने का समय ख़त्म हो जाना दुखद स्थिति थी.

चिकित्सकीय दृष्टि से देखा जाए तो भ्रूण संबंधी खास विकारों की पहचान 20 हफ्ते के पहले मुमकिन नहीं है. कई बार गर्भ में भ्रूण के रूप में पल रहा बच्चा विकलांग या विकृत कदकाठी का निकल सकता है. ऐसे में मां और बच्चे को ताउम्र की तकलीफ मिले उस से बेहतर है कि मां कोई फैसला ले सके. 22 से 24 हफ्ते तक भ्रूण का आकार बढ़ जाता है और उस संदर्भ में फैसला लेना आसान हो पाता है.

तार्किक दृष्टि से भी देखा जाए तो 1971 का यह कानून बहुत पुराना हो चुका था. आज चिकित्सा के क्षेत्र में काफी प्रगति हो चुकी है. इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि चिकित्सा क्षेत्र में ऐसी तकनीकें आ चुकी हैं जो अबौर्शन से जुड़ी जटिलताओं का सहजता से समाधान निकल सकती हैं और उन्हें सुरक्षित अबौर्शन सेवाएं दे सकती हैं.

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अबौर्शन के मामले में दुनिया

विश्व परिदृश्य पर एक नजर डालें तो ग्रीस, फिनलैंड और ताइवान में अबौर्शन की समय सीमा 24 हफ्ते तय है. जब कि अमेरिका के कई राज्यों में अबौर्शन पर प्रतिबंध है. हालांकि विश्व भर में अबौर्शन को ले कर अब पहले से उदार सोच अपनाई जा रही है.

हाल ही में अर्जेंटीना की औरतों ने लंबी लड़ाई के बाद अबॉर्शन का अधिकार पाया. एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में अभी 25 ऐसे देश हैं जहां अबॉर्शन को गैरकानूनी माना गया है. इन में पश्चिमी एशिया, दक्षिणी और पूर्वी अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कुछ देश शामिल हैं. करीब 39 देशों में महिलाओं की जान बचाने के लिए अबॉर्शन को मंजूरी दी जाती है. करीब 56 देशों में थेरेपी और हेल्थ के आधार पर अबॉर्शन को मंजूरी मिली हुई है. सामाजिक और आर्थिक हालत को ध्यान में रखते हुए अबॉर्शन की इजाजत देने वाले करीब 14 देश हैं. जब कि करीब 67 देशों में महिला की रिक्वेस्ट पर अबौर्शन की इजाजत है.

कुछ सवाल

इस कानून के मुताबिक हर राज्य की सरकार को एक मेडिकल बोर्ड बनाना होगा. इस बोर्ड में अलगअलग फील्ड के डॉक्टर होंगे जो यह देखेंगे कि अबौर्शन नए नियमों के तहत हो रहा है या नहीं. दूसरी तरफ हम जानते हैं कि एक महिला के लिए अबौर्शन का फैसला करना बहुत ही मुश्किल भरा होता है. वैसे भी यह काफी इमोशनल मुद्दा है. यह फैसला पूरी तरह से एक महिला का होना चाहिए न कि किसी मेडिकल बोर्ड और डॉक्टरों का.

बिल में सेक्स वर्कर्स के लिए कोई बात नहीं की गई है. जब कि उन्हें ऐसी परिस्थितियों से अक्सर गुजरना पड़ता है. बिल में यह समय सीमा नहीं बताई गई है कि मेडिकल बोर्ड कितने समय में फैसला लेगा. नया बिल उन महिलाओं को भी कोई अधिकार नहीं देता जो अविवाहित हैं.

अबॉर्शन एक मानवाधिकार है

देखा जाए तो अबॉर्शन महिलाओं का मानवाधिकार है. एक महिला जिस के गर्भ में बच्चा पलता है, उसे पैदा करने या न करने का अधिकार उसे ही होना चाहिए. अक्सर कहा जाता है कि अबौर्शन करने का अर्थ है किसी बच्चे की जान लेना. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जीवन का अधिकार तो जन्म लेने के बाद ही मिलता है न . गर्भ में उस वक्त तक बच्चे का शरीर भी ठीक से विकसित नहीं हुआ होता है. ऐसे में क्या हमें उस महिला के जीवन की परवाह पहले नहीं करनी चाहिए जो जिन्दा है, पूरे परिवार का हौसला है. हम भला उस की जिंदगी के साथ खिलवाड़ होते या उस की भावनाओं का क़त्ल होते कैसे देख सकते हैं? दुनिया के हर एक नागरिक को अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने का अधिकार है. महिलाओं को भी अपने शरीर और जिंदगी से जुड़े फैसले लेने का अधिकार मिलना चाहिए. हम किसी को जबरन बच्चा पैदा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.

वहीं इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश में रूढ़िवादी और पुरानी सोच वाले लोगों द्वारा गैरकानूनी तरीके से गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग पता किया जाता है. अगर आने वाला बच्चा लड़की होती है तो अक्सर या तो उसे गर्भ में ही उन तथाकथित अपनों के द्वारा मार दिया जाता है या फिर जन्म के बाद सड़क पर या कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है. अस्पतालों और प्राइवेट नर्सिंग होम्स में चाँद रुपयों की खातिर बहुत आसानी से ऐसे अपराधों को अंजाम दिया जाता है. जब कि हर जगह हमें यह बोर्ड लिखा हुआ जरूर दिख जाता है कि जन्म से पहले लिंग पता करवाना गैरकानूनी है. जाहिर है सख्त क़ानून की आवश्यकता इस तरह के अबौर्शन के लिए जरुरी है न कि मजबूर मां के लिए.

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किचन की सफाई करें ऐसे

किचन को रोज पूरी तरह से साफ करना हर किसी के लिए मुश्किल होता है. ऐसे में किचन फ्लोर और किचन वाले टाइल्स पर गंदगी जमा होने लगती है और जब सफाई करने की बारी आती है तो समझ में नहीं आता कि इसे कैसे साफ करें. जानिए, कुछ आसान उपाय जो टाइलों पर जमा गंदगी साफ करने में आप की सहायता करेंगे:

किचन फ्लोर की सफाई

1. किचन फ्लोर पर रोज पोंछा लगाएं. पोंछे के पानी में डिटर्जैंट या कीटाणुनाशक का प्रयोग जरूर करें. यह ध्यान रखें कि जिस कपड़े से पोंछा लगा रही हैं, वह साफ हो और इस्तेमाल के बाद भी उसे अच्छी तरह धो लें.

2. यदि आप के घर में चींटियां हों, तो पोंछे के पानी में 1 बड़ा चम्मच नमक डाल लें.

3. यदि आप कुछ दिनों के बाद फर्श साफ कर रही हैं, तो पोंछा गरम पानी से लगाएं.

4. पोंछा लगाने के बाद फर्श को दूसरे सूखे पोंछे से साफ करें. इस से फर्श चमक उठेगा और फर्श पर धूल भी नहीं जमेगी.

5. यदि फर्श पर कुछ गिर जाए तो उसे तुरंत साफ करें. वहां दाग न बनने दें.

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सफाई किचन की टाइलों की

किचन की टाइल्स को आप निम्न घरेलू चीजों से भी साफ कर सकती हैं:

सिरका

2 कप सिरका और 2 कप पानी को मिला कर स्प्रे बोतल में भर लें. फिर इसे टाइल्स पर स्प्रे कर माइक्रो फाइबर कपड़े से साफ करें. यह कपड़ा दूसरे किसी भी कपड़े की तुलना में गंदगी को ज्यादा अच्छी तरह अवशोषित कर लेता है और इस से सतह पर खरोंचें भी नहीं पड़तीं.

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  1. बेकिंग सोडा

बेकिंग सोडे का इस्तेमाल कर आप टाइल्स पर लगे दागों से आसानी से छुटकारा पा सकती हैं. बेकिंग सोडा और पानी का पेस्ट बना लें और फिर उसे दागों पर लगाएं. 10-15 मिनट तक सूखने दें. फिर गीले कपड़े से साफ करें. यदि दाग फिर भी साफ न हों तो किसी पुराने टूथब्रश से रगड़ कर साफ करें.

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  1. ब्लीच या अमोनिया

यदि आप को टाइल्स पर कीटाणु दिखाई दें, तो ब्लीच और पानी को समान मात्रा में मिला लें. इस मिश्रण को कीटाणु वाली सतह पर गोलाकार मुद्रा में लगाएं. अब टाइल्स को गरम पानी से साफ करें. इस के बाद सूखे कपड़े से साफ कर लें. याद रखें ब्लीच का इस्तेमाल करने से पहले हाथों में दस्ताने जरूर पहन लें.

ध्यान रखें

1. टाइल्स को साफ करने के लिए कभी तेजाब या अन्य हार्ड लिक्विड क्लीनर का प्रयोग न करें.

2. यदि रोज किचन वाल टाइल्स साफ करती हैं तो पानी में थोड़ा सा डिटर्जैंट मिला कर साफ करें.

3. टाइल्स को लोहे की जाली से रगड़ कर साफ करने की कोशिश न करें.

बेबी को हेल्दी रखता है मां का दूध, जानें ये 4 फायदे

हर मां बच्चे को हर हालत में स्तनपान ही कराना चाहती है और इस में खास बात यह है कि मां का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम होता है. एक रिसर्च के अनुसार मां के दूध में 100 ऐसे पदार्थ पाए जाते हैं, जो गाय या भैंस के दूध में नहीं होते और न ही किसी प्रयोगशाला में बनाए जा सकते हैं.

मां के दूध में बच्चे की जरूरत के अनुसार अपनेआप ही परिवर्तन होते रहते हैं. जैसे सुबह का दूध दोपहर के दूध से फर्क होता है ताकि बच्चे को दूध पचाने में आसानी हो. ऐसे ही मां के दूध में गाय के दूध के मुकाबले सोडियम कम मात्रा में होता है, जिस से बच्चे के गुरदे आसानी से कार्य कर सकते हैं.

मां के दूध को बढ़ाता है सातावरी जड़ी बूटी वाला लैक्टेशन सप्लीमेंट

आइए जानते हैं कैसे बच्चे की सेहत के लिए फायदेमंद है मां का दूध…

1. पाचनक्रिया के अनुकूल

दरअसल, मां का दूध बच्चे की पाचनक्रिया और उस की संवेदनशीलता के अनुकूल होता है. इसीलिए इस में मौजूद प्रोटीन बच्चा सुगमता से पचा लेता है. जबकि गाय के दूध में होने वाला प्रोटीन और फैट जल्दी हजम नहीं होता. स्तनपान करने वाले शिशुओं में गैस कम बनती है और वे उलटी वगैरह से ज्यादा दूध भी नहीं निकालते. मां का दूध बच्चे के लिए सुरक्षित है. यह पहले से तैयार नहीं होता, इसलिए इस में संक्रमण नहीं होता और यह खराब नहीं होता.

2. पेट को देता आराम

मां का दूध खुद ही पाचन योग्य है, इसलिए जल्दी हजम हो जाता है. बच्चे को कब्ज की शिकायत और डायरिया की आशंका भी नहीं होती. मां का दूध भोजन हजम न करने वाले हानिकारक माइक्रो और्गनिज्म को निष्क्रिय कर शारीरिक वृद्धि वाले तत्त्वों को पैदा करने में सहायक होता है.

3. रोकता संक्रमण

स्तनपान से शिशुओं को ऐंटीबौडीज की बहुत हैवी डोज मिलती रहती है, जिस से उन के शरीर में प्रतिरोधात्मक शक्ति अधिक होती है. अकसर पाया गया है कि मां का दूध पीने वाले बच्चों को नजला, जुकाम, कान, श्वासनली और मूत्राशय में संक्रमण की शिकायत बहुत कम होती है. यदि कुछ हो भी तो वह बहुत जल्दी ठीक हो जाता है, जबकि बोतल का दूध पीने वाले बच्चे को अकसर ऐसे छोटेमोटे संक्रमण हो जाते हैं. टिटनैस, डिप्थीरिया, पोलियो जैसे रोगों से लड़ने के लिए मां का दूध प्रतिरोधक के रूप में कार्य करता है.

4. मोटापे से बचाए

कई बार देखा गया है कि मां का दूध पीने वाले बच्चे, बोतल का दूध पीने वाले बच्चों के मुकाबले अधिक स्वस्थ होते हैं पर वजनी नहीं. वे मोटापे का शिकार नहीं होते. मां का दूध बच्चे को संतुष्टि देता है, भूख मिटाता है. यह बात बच्चे के शारीरिक विकास में किशोरावस्था में भी देखी जा सकती है. अनुमान है कि मां का दूध पीने वाले बच्चों में कोलैस्ट्रौल लेवल भी नियंत्रित रहता है.

Summer Tips: कंगना के ये सूट फैशन टिप्स करें ट्राय

गरमी में हर किसी को कम्फरटेबल पर स्टाइलिश कपड़े पहनना पसंद है. बौलीवुड भी अपने स्टाइलिश और कम्फरटेबल लुक के लिए जाना जाता हैं, इन्हीं सेलेब्स में से एक है कंगना रनौत. कंगना बौलीवुड की क्वीन कहलाती हैं, लेकिन अगर उनके ड्रैसिंग सेंस की बात की जाए तो वह कम्फरटेबल और स्टाइलिश इंडियन सूट को कैरी करना पसंद करती हैं. एक्ट्रेस कंगना को कईं बार एयरपोर्ट से लेकर फिल्म के सेट पर कौटन सूट में देखा गया है, जो स्टाइलिश के साथ-साथ कम्फरटेबल होते हैं. इसीलिए हम आज उनके कुछ ऐसे ही सूट फैशन के बारे में आपको बताएंगे…

1. कंगना का फ्लावर प्रिंट और नेट का कौम्बिनेशन है कमाल

 

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कंगना की फ्लावर प्रिंट और नेट के सूट का कौम्बिनेशन आप किसी गैदरिंग में या किसी छोटी पूजा या पार्टी में पहन सकते हैं. ये आउटफिट कम्फरटेबल के साथ आपको स्टाइलिश लुक भी देगा.

2. सिंपल वाइट सूट के साथ डार्क ब्राउन दुपट्टा करें ट्राईं

 

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अगर आप कही मार्केट या डेली औफिस लुक के लिए सूट ट्राई करना चाहते हैं, तो यह कौम्बिनेशन आपके लिए एकदम परफेक्ट है.

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3. मंदिर या पूजा के लिए ये फैशन है बेस्ट

 

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अगर आप किसी मंदिर या पूजा में जाने की सोच रहीं हैं. और आपको क्या पहनना है यह समझ नही आ रहा तो ज्यादा सोचिये मत. यह कौम्बिनेशन आपके लिए बेस्ट लुक है.

4. फ्लावर प्रिंट दुपट्टे के साथ वाइट कौम्बिनेशन ट्राई करना न भूलें

 

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अगर आप घर पर या दोस्तों के साथ किसी सिंपल किटी पार्टी में अपने आप को सिंपल और एलीगेंट दिखाना चाहती हैं तो यह आउटफिट आपके लिए परफेक्ट होगा.

5. ब्लैक कुर्ते के साथ ट्राउजर कौम्बिनेशन करें ट्राई

 

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अगर आप कहीं अकेले बिना सामान कहीं घूमना चाहते हैं. तो यह लुक आपके लिए कम्फरटेबल और स्टाइलिश दोनों होगा.

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सोचिये ! कि आप अनमोल हैं

कुछ दिनों पहले अपनी कॉलेज की मित्र से अचानक मिलना हुआ. उसके हालचाल पूछती लेकिन उसके रहन-सहन और चेहरे के भाव पढ़ कर हाल-चाल स्वतः ही समझ आ गए.

फिर भी मन नहीं माना सो पूछ लिया “कैसी हो स्नेहलता” ?

उस ने बात काटते हुए कहा “तुम बताओ कैसी हो, मेरा तो क्या है यहीं मायका, यही ससुराल कुछ बदला नहीं. सुना है तुम्हारे पति नेवी में अफसर हैं, बड़ी मौज-मस्ती की ज़िन्दगी होती है इस फील्ड के लोगों की”

हम्म होती तो है पर तुम मुझ से कुछ छिपाने की कोशिश कर रही हो, मुझे ऐसा महसूस हो रहा है.  देखो मैं जैसी कल थी वैसी ही आज हूँ नेवी का अफसर मिला तो क्या मैं बदल जाऊंगी ?

वह अपने मन के उदगार खोल देना चाहती थी पर शायद डरती थी कि जग हंसाई न हो इसलिए टाल भी रही थी.  जैसे ही मैं ने अपने न बदलने की बात कही तो बोली आज व्यस्त हूँ कल पार्क में मिलते हैं और उसने मुझे अपना फोन नंबर दे दिया.

एक खूंटे से खोला दूसरे पर बाँधा 

अगले दिन हम पार्क में मिले तो थोड़ी देर औपचारिक बातें की. उसके बाद उसने जो बताया वह सुनकर मैं आश्चर्यचकित थी.  कहने लगी “क्या बताऊँ शादी के समय बताया  गया कि पति इंजीनियर हैं, कहने को तो हैं भी सही लेकिन विवाह के समय से ही कहीं टिक कर काम नहीं करते थे. सो हर एक- दो माह में बेरोजगार हो जाते. कुल मिला कर यह हुआ कि फिर इनके स्वभाव के कारण काम मिलना ही बंद हो गया.  अब इतने बरसों से बेरोजगार हैं. न तो कोई आमदनी ऊपर से सारा दिन घर बैठ कर हुकुम चलाना. मैं नौकरी करती हूँ तो कहते हैं पत्नी कमाए और पति घर में रहे तो पत्नी ही घर खर्च चलायेगी न. अब तू मेरे खर्चे उठा.

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बाहर का कोई काम कहूं तो पचास रुपये के काम के लिए  पांच सौ माँगते हैं. मैं जो कमा कर लाती हूँ उसे भी बाहर खा-पीकर उड़ा देते हैं.  कभी-कभी तो घर में इतना तमाशा कर देते हैं कि पड़ौसियों को भी खबर हो जाती है और झगड़ा छुड़ाने आना पड़ता है .

पर दुखों का अंत यहाँ नहीं होता. मैं नौकरी करती हूँ तो सास घर संभाल लेती थी. अचानक से हार्ट-अटैक से उनकी भी मृत्यु हो गयी. अब ससुर और पति को हाथों में देने वाला तो कोई रहा नहीं. तो ससुर मुझ से कुढ़े-चिढ़े से रहते हैं. घर में नन्द आ कर हुकूमत करती है सो अलग. ससुर ने घर में रखे गहनों और प्रॉपर्टी का बड़ा हिस्सा नन्द को दे भी दिया है और रिश्तेदारों में मेरी बुराई भी खूब करते हैं. सिर्फ इतना ही नहीं अब घर खर्च के लिए सारी जिम्मेदारी भी मेरी है और उस पर भी दिन-रात ताने और तिरस्कार ही मिलता है. बदकिस्मती की पराकाष्ठा यह है कि मेरी कोई  संतान भी नहीं पैदा हुई जिसके सहारे मैं बुढापा काट सकूं.  कुल मिला कर ज़िंदगी  नर्क हो गयी है.

जब तुम्हारा इस उम्र में भी निखरा चेहरा देखा तो अपने आप पर शर्म आयी और मैं ने तुम्हें  टालने की कोशिश की. क्या करूं मेरे माता-पिता ने जांच-परख कर मेरा विवाह नहीं किया. बस  बिना सोचे-समझे मुझे एक खूटे से खोला और दूसरे पर बाँध दिया.

मेरे पति कहने को इंजीनियर लेकिन असलियत में बिगड़ा-बेरोजगार. यदि कुछ कहूं तो मुझे व मेरे माता-पिता को गलियां देते हैं. यदि अपनी किसी मित्र या रिश्तेदार को अपनी कमाई से कुछ उपहार देना चाहूं तो झगड़ा करते हैं. बस मैं सब से लिए जाऊं वह उन्हें अच्छा लगता है. दरअसल मेरे पति के माता-पिता ने  उन्हें सर चढ़ा कर रखा . बचपन से उनकी हर जिद पूरी की क्यूंकि इकलौता बेटा है. अब मेरे पति तो कुछ करते नहीं सो ससुराल वाले   सारी उम्मीद मुझ ही से रखते हैं.  उनका बेटा तो किसी  योग्य है नहीं, बस मैं ही घर और बाहर दोनों सम्भालूँ.

सही बात तो यह है इसमें कहीं न कहीं मेरे माता-पिता की भी गलती है. क्यूंकि मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ, बचपन से हमें घर में काम करवाया और बार-बार कहा जाता कि लड़कियों को घर का कम सीखना जरूरी है. मैं ने पढाई भी की लेकिन माँ ने कभी मौज-मस्ती करने की छूट नहीं दी. लड़कियों को ऐसे रहना चाहिए उन्हें ब्याह पूर्व श्रृंगार नहीं करना चाहिए, लोग क्या कहेंगे आदि. मेरी अपनी तो कोई पर्सनैलिटी ही नहीं रही.

वहां भी ज़रा सा कुछ करूँ तो मां झिड़कती थी और मुझे दे भी ऐसे परिवार में दिया कि यहाँ हर वक़्त ताने और तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं मिलता.

पति का स्वयं के माता-पिता से ही सामंजस्य नहीं 

ऐसा ही एक केस मुझे अपनी एक पूर्व पड़ौसन का मालूम हुआ. गीता एक संयुक्त परिवार में रहती थी. उसका पति पढ़ा-लिखा एक मल्टी-नेशनल कंपनी में सोफ्टवेयर इंजीनियर था. लेकिन उसका परिवार  गरीबी से उठा हुआ बहुत ही दकियानूसी विचारधारा वाला था. उसका एक भाई, माँ, पिताजी और एक विवाहित बड़ी बहिन अपनी नयी बहु के साथ विवाह होते ही ऐसा व्यवहार करते थे जैसे जब मोहल्ले में नया कुत्ता आते ही पहले से रह रहे कुत्ते एकजुट होकर भोंकते लगते  हैं.  वह महिला सभ्य, सुशिक्षित, सुन्दर थी. लेकिन गरीब परिवार में ब्याह कर जैसे उसकी ज़िंदगी नर्क हो गयी थी.  ससुराल वाले निहायत ही बदतमीज़ किस्म के थे. उसके हर काम में कमी निकालना, उसके मायके से कुछ भी आये  उसे दुत्कार कर फेंक देना, बड़ी नन्द का हर वक़्त कुछ न कुछ लेने के लिए मुंह खुला ही रहता. इस पर भी पति-पत्नी को अलग करने की हर कोशिश की जाती. तमाम बंदिशें उस पडौसन पर थी. यहाँ तक कि जब सारा परिवार एक साथ बैठे तो वह अपने कमरे में ही अकेले  बैठी रहती. उसे घर के ड्राइंग रूम तक आने की भी अनुमति नहीं थी.

उसके पति अपने परिवार वालों को बहुत समझाते थे किन्तु उसके सामने तो सब ठीक रहते उसके ऑफिस जाते ही सब उसे बंदिश दे देते. उसे चार वर्ष में हमने घर से बाहर निकलते हुए नहीं देखा था.

काम वाली बाइयां बताया करती थी कि बहु को तंग करने में पढ़े-लिखे देवर समेत परिवार वाले  कोई कसर नहीं छोड़ते थे.

एक बार एक डॉक्टर के यहाँ  मेरी उस से मुलाक़ात हो गयी. वहां जब मैं ने उस से पूछा कि वह कभी किसी से मिलती-जुलती क्यूँ नहीं ? तब उसने इन सारी बंदिशों के बारे में बताया.  यहाँ तक कि उसके सास-ससुर अपने बेटे से कहते “तेरी शादी करके हमें क्या फ़ायदा हुआ, इस बहु को निकाल दे हम तेरी दूसरी शादी कर देंगे”

जब मैं ने उस से पूछा “तुम्हारे सास-ससुर का रहन-सहन तो देखने से ही ऐसा लगता है कि पहले किसी छोटी बस्ती में रहते रहे हो जबकि तुम्हारे परिवार का तो अच्छा लिविंग स्टैण्डर्ड है, फिर यह रिश्ता हो कैसे गया”

वह बहुत दुखी होकर बोली “सब किस्मत का खेल है, देखने में तो हमारे परिवार का लिविंग स्टैण्डर्ड अच्छा दिखाई देता है क्यूंकि मेरे माँ का परिवार सचमुच पैसे वाला और पढ़ा-लिखा है. लेकिन मेरे पापा इकलौते बेटे हैं और देखने में बहुत सुन्दर. मेरी माँ पांच बहनें हैं उसमें सबसे  बड़ी मेरी  माँ.  नानी को पांच बेटियाँ होने की फ़िक्र खाए जाती थी. इसलिए दसवीं  कक्षा में ही मेरी माँ का विवाह पिताजी को सुन्दर एवं इकलौता देख कर कर दिया. पापा के परिवार में न तो पहले की जमा-पूंजी थी और न ही पापा की बढ़िया नौकरी. पापा ने सदा ही बिजनेस करने की चाहत रखी लेकिन कामयाब न हुए.  पापा इकलौता बेटा होने के कारण जिद्दी स्वाभाव उस पर पापा का मेरी मां से उम्र में दस वर्ष बड़ा होना. ज़रा-ज़रा सी बात पर माँ पर हाथ उठाते, खूब गाली-गलौज करते. घर में तो जैसे हर दिन कोहराम ही मचा रहता. माँ, पापा से तो लड़ नहीं  पाती थी. उनका गुस्सा हम भाई-बहनों पर निकालतीं. मुझे खूब मारती और बंदिश में भी रखती. हाँ हमारा घर हमेशा साफ़-सुथरा रहता, कपड़े हमने हमेशा सुन्दर पहने क्यूंकि माँ गृहकार्य में दक्ष हैं, सो हाथ से बना कर अच्छे कपड़े हमें पहनाती.

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जब मेरे विवाह की बात चली पापा लड़का तो अच्छा देखना चाहते, लड़का मुझे पसंद भी कर लेता किन्तु जात-समाज में पापा के व्यवहार के कारण हमारी कोई इज्ज़त नहीं  ऊपर से दान-दहेज़ देने की क्षमता भी नहीं. फिर कोई अच्छा परिवार मुझे अपनी बहू कैसे बनाता ?

सो मेरे पापा ने बस पढ़ा-लिखा लड़का देख कर मेरा रिश्ता यहाँ कर दिया. पापा को मेरे पति के माता-पिता पसंद तो नहीं आये थे पर दूसरा कोई विकल्प भी हमारे सामने नहीं था.

किन्तु इनके परिवार में तो माँ-बाप  और बेटे का ही आपसी सामंजस्य नहीं था. बेटा तो पढ़ा-लिखा नए विचारों का, घर में सारी -सुख सुविधाएं रखना चाहता किन्तु माता-पिता की नज़र बेटे की तनख्वाह पर रहती और बहु को नौकरानी की तरह रखना चाहते.

इस चक्कर में संयुक्त परिवार में ज़िंदगी नर्क हो गयी.

असली बात तो यह है कि गरीब की लड़की न यहाँ सुखी न वहाँ.

मां की अनुपस्थिति में पिता ही मॉलेस्ट करे

एक महिला हमारे अपार्टमेंट में रहा करती थी. अक्सर शाम को जब हम अपने-अपने बच्चों को लेकर पार्क में जाते वह भी वहीं वॉक पर आया करती. न तो उसकी कोई सहेली होती और न ही वह किसी से कुछ ख़ास बात करती. मेरी उस से जिम में दोस्ती हो गयी. वह  बात-बात में यह कह देती “मैं तो किसी को दोस्त बनाना पसंद ही नहीं करती’ अपार्टमेंट में होने वाले किसी ईविंट में भी वह शामिल नहीं होती थी. मैं समझ गयी कि कहीं कुछ तो कमी है.

जिम में  वर्क आउट करते समय उस से बातचीत होती और हम सहेलियां बन गयीं. एक-एक कर जब उसने परतें खोली तो मैं सन्न रह गयी. उसके पिता की आय कुछ ख़ास नहीं थी सो मां ने विवाह उपरान्त पढाई की और नौकरी करने लगी. जब उसने आपबीती  बतायी तो आँखें भर आयी. बचपन से ही घर के काम की जिम्मेदारी तो उस पर थी ही. घर में रिश्तेदारों का भी आना-जाना लगा रहता. मां की अनुपस्थिति में कई अपनों ने उस से छेड़-छाड़ की, माँ का स्ट्रिक्ट व्यवहार था ऊपर से वह व्यस्त रहती तो कभी किसी को वह अपने साथ हुई घटनाएँ बता ही नहीं पायी. बड़ी हुई और एक दिन जब माँ काम पर गयी पापा ने ही मॉलेस्ट किया. वह हर वक़्त तनाव में रहने लगी, माँ को बताना चाहती थी पर क्या कहे ? माँ घर से बाहर जाने  की जैसे ही तैयारी करती वैसे ही वह तनाव में आ जाती.  फिर भी एक दिन हिम्मत करके उसने माँ को बताया. घर में खूब कोहराम मचा, और एक दिन उसका भाई उसे होस्टल में रहने के लिए छोड़ आया.

विवाहोपरांत जैसा उसका परिवार था उसी के स्तर का ससुराल मिला.  ससुराल वाले चाहते थे कि वह नौकरी करे किन्तु विवाह के एक वर्ष में ही उसने एक बेटी को जन्म दिया और अपने कटु अनुभव को याद करते हुए उसने नौकरी न करने का फैसला किया. ससुराल वालों को यह बर्दाश्त न हुआ. कल तक तो घर में अच्छी कमाई आ रही थी अब  वह बंद हो गयी थी. बस टोकाटाकी का जो दौर शुरू हुआ तो फिर बंद न हुआ. उसके पति को आते ही उसकी शिकायतें की जातीं. यदि वह अपनी सफाई में कुछ कहना चाहती तो पति सुनते ही नहीं. एक दिन दोनों में खूब बहस हुई और उसके पति ने उस पर हाथ उठा लिया.

आज वह संयुक्त परिवार में तो नहीं, बल्कि पति का ट्रांसफर होने से शहर ही बदल गया है लेकिन दोनों का आपसी रिश्ता सदा के लिए ख़राब हो चुका है. पति की कंजूसी की भी आदत है सो उसके हर खर्च पर पति की नज़र रहती है और इसी के चलते उसमें हीन भावना घर कर गयी है न तो वह बढ़िया , महंगे कपडे पहनती है और न ही किसी से मिलना-जुलना पसंद करती है.   उसे किसी पर भरोसा भी नहीं  होता है और न ही वह किसी को दोस्त बनाती है.

परवरिश व माहौल का असर सिर्फ किताबें पढ़ने से नहीं जाता 

ऊपर से सभी केसेज़ देखने के बाद ऐसा महसूस होता है कि जिसे शुरू से दबा कर रखा जाये उसे वैसे ही रहने की आदत भी पड़ जाती है.  दूसरा वैवाहिक  रिश्ते अक्सर एक ही स्तर के परिवारों में बनते हैं. इसीलिये अक्सर मध्यम वर्गीय लड़कियों को मायके में ताने-तिरस्कार सुन -सुन कर बड़ा होना होता है वहीं विवाह उपरान्त सब की चाकरी करने पर भी लानत ही दी जाती है. ऐसे केसेज़ में अक्सर यह भी देखा गया है कि लड़कियों को पति पढ़े-लिखे तो फिर भी मिल जाते हैं, किन्तु जिस माहौल में वे पले-बढे हैं  अक्सर उसका असर भी उनके व्यवहार में रहता है.  यदि वे अच्छी तनख्वाह ले आयें तो भी घर में कलह-कलेश का माहौल बना ही रहता है.

स्वाभिमान के साथ कोम्प्रोमाइज़ नहीं 

आवश्यकता है कि लड़कियां स्वयं खुद का मोल समझें. मायके में माता-पिता बेटियों की अच्छी परवरिश करें. विवाह उपरान्त लडकियां अपने स्वाभिमान को कायम रखते हुए ही ससुराल में एडजस्ट करें. जहाँ कहीं स्वाभिमान को ठेस लगे और उस पर भी लड़की सहन करती जाये तो उसके पढ़े-लिखे होने का कोई औचित्य ही नहीं.

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पढाई का मतलब यह नहीं कि आप सिर्फ रुपये कमा कर लायें. अपितु अपने मान-सम्मान  की रक्षा करते हुए परिवार में अपनी ख़ास जगह बनायें. यदि किसी भी कारणवश परिवार आपको सम्मान नहीं देता है तो मैं कहूंगी कि परिवार को आपकी कीमत महसूस नहीं हो रही. तो आप स्वयं भी उनके व्यवहार को  नज़र अंदाज करते हुए अपनी राह पर दृढ़ निश्चय के साथ चलें.

क्या मेरे पति को कोई बीमारी तो नही?

सवाल-

मैं 27 वर्षीय विवाहिता और 2 बच्चों की मां हूं. मेरे पति हमेशा सहवास से पूर्व कुछ समय तक मुखमैथुन करते हैं. शुरूशुरू में मैं ने इस का विरोध नहीं किया, क्योंकि मुझे लगता था कि शायद यह सहवासपूर्व की एक जरूरी क्रिया होगी और सभी पति ऐसा करते होंगे. पर पिछले दिनों मैं अपनी एक अंतरंग सहेली से मिली और बातचीत के दौरान मैं ने उसे अपनी समस्या बताई. उस ने बताया कि ऐसा न तो उस ने कभी किया और न ही उस के पति ने कभी इस प्रकार की ओछी इच्छा जाहिर की. उस ने यह भी बताया कि इस से कोई बीमारी भी हो सकती है. मैं क्या करूं, मेरे पति तो मना करने पर नाराज हो जाते हैं.

जवाब-

सहवास के लिए कोई तयशुदा कायदेकानून नहीं हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं. कई दंपती सहवासपूर्व रति क्रीड़ा जैसे आलिंगन, चुंबन आदि करना पसंद करते हैं तो कई सीधेसीधे सहवास में प्रवृत्त हो जाते हैं. मुखमैथुन भी रतिपूर्व की क्रीड़ा है जिसे कुछ युवा करना पसंद करते हैं. यदि आप के पति भी ऐसा करते हैं तो आप को उन्हें सहयोग देना चाहिए. यौनांगों की स्वच्छता पर यदि पूरा ध्यान दिया जाए तो मुखमैथुन में कोई बुराई नहीं है. अत: सुनीसुनाई बातों पर न जाएं और न ही अपनी सैक्स लाइफ की निजी बातों को किसी के साथ शेयर करें. यह सिर्फ और सिर्फ पतिपत्नी का मामला है, जिसे गोपनीय ही रखना चाहिए.

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शादीशुदा जिंदगी में दूरियां बढ़ाने में सैक्स का भी अहम रोल होता है. अगर परिवार कोर्ट में आए विवादों की जड़ में जाएं तो पता चलता है कि ज्यादातर झगड़ों की शुरुआत इसी को ले कर होती है. बच्चों के बड़े होने पर पतिपत्नी को एकांत नहीं मिल पाता. ऐसे में धीरेधीरे पतिपत्नी में मनमुटाव रहने लगता है, जो कई बार बड़े झगड़े का रूप भी ले लेता है. इस से तलाक की नौबत भी आ जाती है. विवाहेतर संबंध भी कई बार इसी वजह से बनते हैं.

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जानें क्या करें जब हो वैजाइनल इन्फैक्शन

अकसर लड़कियां खुजली या जलन को नौर्मल समझ कर इन्हें नजरअंदाज कर देती हैं जिस से इन्फैक्शन का खतरा बढ़ जाता है. सो, वैजाइनल इन्फैक्शंस के बारे में हर लड़की को पता होना चाहिए.  लड़कियों में वैजाइनल इन्फैक्शन आम बात हो गई है. औसतन 70 फीसदी लड़कियों को उन के जीवन में एक न एक बार किसी तरह का वैजाइनल इन्फैक्शन जरूर होता है. वैजाइनल इन्फैक्शंस कम तकलीफदेह भी हो सकते हैं और भयंकर चिंता का कारण भी बन सकते हैं. यह इन्फैक्शंस यूट्रस, सर्वाइकल और अन्य जननांगों के कैंसर का मुख्य कारण होते हैं. यह शरीर का जितना नाजुक हिस्सा है उतनी ही सख्त इस की देखभाल होनी चाहिए. आइए, मूलचंद अस्पताल, दिल्ली की सीनियर गाइनोकोलौजिस्ट डा. मीता वर्मा से वैजाइनल इन्फैक्शंस के बारे में जानते हैं.

किसकिस तरह के वैजाइनल इन्फैक्शंस होते हैं और इन के होने के क्या कारण हैं?

वैजाइनल इन्फैक्शंस बैक्टीरियल हो सकते हैं, फंगल हो सकते हैं और मिक्स्ड हो सकते हैं. वैजाइना यानी योनि में कुछ गुड बैक्टीरियाज होते हैं जिन्हें फ्लोरास कहते हैं. ये हमारे लिए हैल्दी होते हैं और वैजाइनल एरिया को गीला या नम रखते हैं.

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वैजाइनल एरिया गीला होना चाहिए. नौर्मल बैक्टीरिया इंटिमेट, हैल्दी या कहें फ्रैंडली बैक्टीरिया होते हैं, जो वैजाइना का पीएच मेंटेन करते हैं. इन बैक्टीरियाज में किसी भी तरह के डिस्टर्बैंस होने से वैजाइनल इन्फैक्शन हो जाता है. अगर वैजाइना का पीएच चेंज होता है तो बाहरी बैक्टीरियाज फ्रैंडली बैक्टीरियाज पर अटैक कर देते हैं.

पीएच के डिस्टर्ब होने पर वैजाइना में भिन्न लक्षण दिखने लगते हैं जिन से वैजाइनल इन्फैक्शंस का पता चलता है. कभी वैजाइना में इचिंग होती है, जलन होती है, बहुत अधिक वैजाइनल डिस्चार्ज होता है, ड्राईनैस और रैडनैस भी होने लगती है. फ्रैंडली बैक्टीरियाज के आपस में असंतुलन से भी यह हो सकता है.

ये इन्फैक्शंस सब से ज्यादा किस उम्र की लड़कियों को होते हैं?

वैसे तो वैजाइनल इन्फैक्शंस हर उम्र की लड़की या महिला को हो सकते हैं लेकिन जितनी यंग गर्ल्स हैं, टीनएज गर्ल्स और गर्भधारण करने वाली लड़कियां हैं, उन में ये इन्फैक्शंस ज्यादा होते हैं. ओल्डएज में मेनोपोज हो जाने के बाद वैजाइनल इन्फैक्शंस कम होते हैं. एल्डर्ली एज में ये तभी होते हैं जब महिला का इम्यून सिस्टम खराब हो. जैसे किसी को अगर चिकनगुनिया हो जाए, किसी को अगर शुगर है, वह डायबिटिक है तो उस का इम्यून सिस्टम इन्फैक्शंस से लड़ने में अक्षम हो जाता है.

वैजाइनल इन्फैक्शंस से नुकसान क्या हैं?

किसी लड़की को अगर वैजाइनल इन्फैक्शन है तो उस की वैजाइना और आसपास की त्वचा में जलन, खुजली, हैवी डिस्चार्ज और दर्द होगा. उसे हर समय डिसकम्फर्ट महसूस होगा. दूसरा, अगर यूट्रस यानी गर्भाशय के मुख (सर्विक्स) से इन्फैक्शन अंदर चला जाए तो यूट्रस में सूजन हो जाती है, नलें बंद होने का खतरा रहता है जिसे पैल्विक इन्फ्लेमैटरी डिजीज कहते हैं. यानी, पूरा रिप्रोडक्टिव सिस्टम इस से खराब हो सकता है. अगर आप की नलें बंद हो गईं तो गर्भधारण नहीं होगा. यूट्रस में इन्फैक्शन होगा तो सैप्सिस होगा, एपेस्लाइड डिस्चार्ज होगा, आप की अपनी लाइफ और लवलाइफ दोनों पर इफैक्ट पड़ेगा.  अगर यूट्रस के मुख पर कई दिनों तक इन्फैक्शन रहे तो शैडिंग होने लगती है, सेल्स इन्फैक्ट हो जाते हैं, और यह यूट्रस का कैंसर बन जाता है. भारत में सर्वाइकल कैंसर दूसरे नंबर का खतरनाक कैंसर है. साथ ही अगर किसी प्रैग्नैंट लड़की को वैजाइनल इन्फैक्शन होता है तो अबौर्शन की नौबत तक आ जाती है.

लड़कियों को वैजाइनल इन्फैक्शंस से बचने के लिए किस तरह के अंडरगारमैंट्स पहनने चाहिए?

अंडरगारमैंट्स हमेशा ऐसे होने चाहिए जो आप के इंटिमेट एरिया का हाइजीन बना कर रखें. आप के इंटिमेट एरिया का हाइजीन बहुत जरूरी है, उस की साफसफाई बेहद जरूरी है. आप का अंडरवियर कौटन का होना चाहिए. जितनी भी बार आप वाशरूम जाएं, रनिंग वाटर से अपने इंटिमेट एरिया को क्लीन करें. वैजाइना को पैट ड्राई करें, रगड़े नहीं बल्कि थपथपा कर सुखाएं, जिस से फंगल इन्फैक्शन का खतरा न हो.

क्या कम पानी पीना भी वैजाइनल इन्फैक्शन का कारण हो सकता है?

कम पानी पीने से वैजाइनल इन्फैक्शन तो नहीं होता लेकिन यूरिन बर्निंग हो जाती है. यूरिन बर्निंग के कारण पेशाब करने में दिक्कत होती है और दर्द भी होता है.

खानपान का वैजाइनल इन्फैक्शन से कोई संबंध है?

जी हां, बिलकुल है. अगर आप हमेशा इन्फैक्टेड, बासी स्ट्रीट फूड खाएंगे जोकि अधिक एसिटिक होते हैं या आप फंगल फूड खाते हैं तो इस से शरीर पर बुरे प्रभाव पड़ते हैं. इस कारण वैजाइना में जलन होने लगती है. सड़ागला खाना या फर्मेंट किया हुआ खाना बिलकुल भी नहीं खाना चाहिए. खासकर बरसात के दिनों में अंडरकुक्ड, सेमीकुक्ड या पार्शलकुक्ड फूड नहीं खाना चाहिए. इन से वैजाइनल इन्फैक्शन बढ़ भी सकते हैं. डीपफ्राइड या रोस्टेड फूड खाना सही रहता है.

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नवविवाहित लड़कियों को अकसर यूरिन इन्फैक्शन क्यों हो जाता है?

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शादी के तुरंत बाद उन का सैक्स बहुत फ्रीक्वैंट हो जाता है. इस से वैजाइनल एरिया सोअर हो जाता है, सूज जाता है. रैडनैस भी आ जाती है. यूट्रस के पास ही पेशाब की थैली होती है जो नियमित सैक्स के कारण इन्फैक्ट होती है. इसी कारण बारबार पेशाब जाने का मन होने लगता है और जलन होने लगती है. लेकिन अगर यूरिन टैस्ट कराया जाए तो जांच में इन्फैक्शन नहीं आता, बल्कि इसे हनीमून सिस्टाइटिस कहते हैं. मतलब, मूत्राशय की सूजन. सैक्स के दौरान बारबार रगड़ खाने से यह परेशानी हो जाती है.

सैक्स के दौरान किन चीजों का ध्यान रखें?

सैक्स करते समय पर्सनल हाइजीन का बहुत ध्यान रखना चाहिए. आप का पार्टनर अपने प्राइवेट एरिया को क्लीन रखे और आप भी. दोनों इंटिमेट हाइजीन रखें. एबनौर्मल पौस्चर्स और एबनौर्मल सैक्स अवौइड करना चाहिए.

क्या करें कि वैजाइनल इन्फैक्शंस न हों?

सब से जरूरी तो यही है कि आप अपने वैजाइनल एरिया का ध्यान रखिए. इंटिमेट हाइजीन रखिए. लूज फिटिंग के कपड़े पहनिए जिस से हवा पास होती रहे, एयर वैंटिलेशन प्रौपर हो. खासकर रात को ढीला पायजामा या नाइटी पहन कर सोएं. रोज नहाएं, बाथटब यूज करने के बजाय शावर बाथ लें. बाथटब से नहाने पर भी वैजाइनल इन्फैक्शन हो सकता है. लोग बाथटब में शावर जैल या बौंब डाल लेते हैं जो वैजाइनल इरिटेंट का काम करते हैं. ऐसा नहीं करना चाहिए. नौर्मल शावर से नहाना ज्यादा हाइजीनिक होता है.

बाजार में जितने भी तरह के वैजाइनल वाश उपलब्ध हैं उन में से कोई भी यूज न करें. यह एक मिथ्या है कि पीएच बनाए रखने के लिए वैजाइनल वाश का इस्तेमाल करना चाहिए. वैजाइना अपना पीएच नैचुरली बनाए रखती है. वैजाइनल वाश एक तरह का कैमिकल है जिस से दूर रहना चाहिए. और अगर इस्तेमाल कर भी रही हैं तो डेली बेसिस पर बिलकुल न करें. कुछ लड़कियां वैजाइनल हाइजीन के लिए हमेशा ही पैंटी लाइनर्स का इस्तेमाल करती हैं. ऐसा नहीं करना चाहिए. पैंटी लाइनर्स नौर्मल वैजाइना की वैटनैस और मौइस्चर को एब्जौर्ब कर लेते हैं.

किस तरह के पैड्स का इस्तेमाल करना चाहिए?

आजकल लड़कियां ड्राई फील सेनेटरी नैपकिंस का बहुत इस्तेमाल करती हैं. आप को इन्हें इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. ड्राई फील वाले पैड्स से स्किन अरोड हो जाती है, बहुत ज्यादा ड्राई हो जाती है. ये स्किन से रगड़ खाते हैं, जिस से इन्फैक्शन का खतरा बढ़ जाता है. वैजाइनल एरिया का मोइस्चर बनाए रखने के लिए कौटन पैड्स का इस्तेमाल करना चाहिए. लड़कियां जो दिनभर व्यस्त रहने के कारण पैड्स चेंज नहीं कर पातीं उन्हें यह अधिक हो सकता है.

व्हाइट डिस्चार्ज का होना क्या इन्फैक्शन का कारण हो सकता है?

नौर्मल वाटरी डिस्चार्ज तो होता रहता है जिसे ओवुलैट्री डिस्चार्ज कहते हैं. यह अंडा गिरने पर होता है, उन लड़कियों में जो प्रैग्नैंट हो सकती हैं और जिन में मेनोपौज नहीं हुआ है. लड़कियों में मिड मैंस्ट्रुअल साइकिल अंडा गिरता है तो यह वेटनैस और डिस्चार्ज नौर्मल होता है. लेकिन कभी आप को फटे दही की तरह डिस्चार्ज हो रहा हो, येल्लोइश, पिंकिश या ब्राउनिश डिस्चार्ज हो, स्मैली डिस्चार्ज हो, डिस्चार्ज में म्यूकस जैसा कुछ दिखे तो तुरंत डाक्टर से कंसल्ट करें. यह वैजाइनल इन्फैक्शन के कारण हो सकता है.

बार-बार वैजाइनल इन्फैक्शंस हों तो क्या करें?

अगर बारबार वैजाइनल इन्फैक्शन हो तो डाक्टर को दिखा कर प्रौपर एग्जामिनेशन कराएं. इस को टालें नहीं. जैसा पहले भी बताया गया है, इस से नलें बंद होने का डर रहता है. आप को पूरे रिप्रौडक्टिव सिस्टम के और्गंस का इन्फैक्शन हो सकता है. बहुत दिनों तक इन्फैक्शन हो तो कैंसर भी हो सकता है.

कुछ लड़कियां इन्फैक्शन को घरेलू नुस्खों से दूर करने की कोशिश करती हैं. क्या यह सही है?

बहुत से लोग कहते हैं कि सिरके के पानी से वाश करने से इन्फैक्शन ठीक होता है या साबुन या लहसुन लगा लेने से, जबकि ये चीजें बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए. मैं इन सब चीजों की सलाह नहीं देती.

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क्या इन्फैक्शन के दौरान सैक्स करने से पार्टनर को भी खतरा हो सकता है?

जी हां, बिलकुल हो सकता है. पार्टनर भी इन्फैक्शन के कैरियर हो सकते हैं. यह एकदूसरे में जा सकता है. और अगर एक बार यह इन्फैक्शन आप के पार्टनर को हो जाए और आप अपना ट्रीटमैंट करा लें तो अगली बार सैक्स करने पर पार्टनर से एक बार फिर आप को इन्फैक्शन हो सकता है. इसलिए अगर आप इन्फैक्शन के दौरान सैक्सुअली ऐक्टिव हैं तो अपना और अपने पार्टनर का ट्रीटमैंट एकसाथ कराएं.

धर्म और कानून के बीच फंसे रिश्ते

आजकल अदालतें ऐसे मामलों से भरी हुई हैं जिन में तलाक के आदेश या गुजारेभत्ते के लिए पतिपत्नी, यानी भूतपूर्व पतिपत्नी, कुत्तेबिल्लियों की तरह लड़ रहे होते हैं और उन की लड़ाई का फायदा वकील उठाते हैं और तमाशा सारा वर्ग देखता है, पतिपत्नी संबंध प्रेम का संबंध है. इसे कानून और धर्म से जोडऩा ही मूलरूप से गलत था. राजाओं और धर्म के दुकानदारों को इस में दखल दे कर दोनों से वसूली करने का रास्ता ढूंढ़ लिया.

धर्म और कानून को सदियों पतिपत्नी विवादों में खूब कमाया है और आज भी काम रहे हैं. शादी के नियम कानून सारे धर्म ने बना दिए. जब से लोकतंत्र आया तब से संसदों ने कानून बनाने शुरू कर दिए पर वे भी धर्म की राह पर. उन्होंने दूसरे बिचोलिए, वकील, बैठा दिए.

राजेश और नेहा जनवरी, 2013 से झगड़ रहे हैं और सिर्फ 15000 मासिक के गुजारेभत्ते को ले कर 2-3 बार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुके हैं. अहम के मारे दोनों लोग कानूनी दांवपेंच अपना रहे हैं. मामला क्या है, यह जाने दें, यह पूछें कि जब शादी प्रेम के बाद मिनटों में हो सकती है तो तोडऩे में फौजदारी क्यों जरूरी है. सीता को निकालना था तो मिनटों में रथ में बैठा कर रवाना कर दिया गया. जब भगवानों को छूट है तो राजेश और नेहा जैसे जोड़े एक नई …..पर काम करने के लिए आजाद क्यों न हों.

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शादी के बाद पतिपत्नी में मनमुटाव हो तो दोनों अपनेआप जिम्मेदार होने चाहिए. कानून सिर्फ बच्चों के लिए आगे आए कि उन की देखभाल का जिम्मा पिता और मां दोनों का है. बच्चे मां के पास रहें तो खर्च पिता को देना हो और पिता के पास रहें तो मां को मिलने की पूरी छूट हो.

न पति किसी गुजारेभत्ते देने को जिम्मेदार हो न पत्नी. यह प्रेम का संबंध था और दोनों की जिम्मेदारी थी कि इसे हराभरा रहने दें. सूखे पेड़ को पानी देने की जबरन ड्यूटी जो कानून ने लगा दी है वह गलत है. अगर पति को दूसरी पसंद आ गई तो पहली को अपना रास्ता वैसे ही खुद तय करना चाहिए जैसा वह शादी से पहले करती.

इस जबरदस्ती का नतीजा ही डोमेस्टिक वायलैंस है. इसी जबरदस्ती के कारण पत्नियां पतियों की संपत्ति बन गई है. पति चाहे 10 जगह मुंह मार ले, पत्नी किसी से हंस भी ल तो उस की पिटाई हो जाती है. पत्नी शादी के बाद आज बेबस हो जाती है. अगर शादी को कानून व धर्म की जंजीरों में नहीं बांधा जाएगा तो दोनों एकदूसरे को वैसे ही खुश रखेंगे जैसे प्रेमी प्रेमिका रखते हैं.

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जहां तक संबंध टूटने के सवाल हैं तो बापबेटे के संबंध टूटते हैं, भाईबहनों के टूटते हैं पर उन में किसी धाॢमक दुकानदारी की जरूरत नहीं होती. विरासत के समय भाईयोंबहनों में विवाद हो सकता है पर वह पार्टनरों जैसा व्यापारिक होता है. धर्म जब भाईभाई, भाईबहन और बहनबहन के संबंधों को पक्की मोहर नहीं लगा पाता तो शादी में क्यों लगाता. आज कोई कानून नहीं है कि किसी भाई को बहन के साथ रहना ही होगा या भाई के साथ जबरन काम करना ही होगा.
यह भेदभाव असल में पत्नियों को कमजोर करने के लिए. आजाद औरतें पत्नी बन कर भी अपने पैरों पर खड़ी रहतीं की न जाने कब पति उन्हें छोड़ जाए. यह पतिपत्नी के प्यार को बल देता, कमजोर नहीं करता.

जब बिगड़ने लगे बच्चे का व्यवहार

चंडीगढ़ के एक स्कूल में नशा कर के आए छात्र को डांटने पर उस ने स्कूल टीचर को पीट-पीट कर लहूलुहान कर दिया. परीक्षा में फेल होने पर डांटने के बाद छात्र ने प्रिंसिपल पर 4 गोलियां दाग दीं.

प्ले स्कूल की प्रिंसिपल स्वाति गुप्ता का कहना है, ‘‘आजकल एकल परिवारों और महिलाओं के कामकाजी होने से स्थितियां बदल गई हैं. दो-ढाई साल के बच्चे सुबह-सुबह सजधज कर बैग और बोतल के बोझ के साथ स्कूल आ जाते हैं. कई बच्चे ट्यूशन भी पढ़ते हैं. कई बार महिलाओं को बात करते सुनती हूं कि क्या करें घर पर बहुत परेशान करता है. स्कूल भेज कर 4-5 घंटों के लिए चैन मिल जाता है.’’

गुरुग्राम के रेयान स्कूल का प्रद्युम्न हत्याकांड हो या इसी तरह की अन्य घटनाएं, जनमानस को क्षणभर के लिए आंदोलित करती हैं. लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात.

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के साइकोलौजी विभाग की हैड दीपा पुनेठा का कहना है, ‘‘पेरैंट्स अपने बच्चे के भविष्य के लिए जरूरत से ज्यादा सचेत रहने लगे हैं. बच्चे के पैदा होते ही वे यह तय कर लेते हैं कि उन का बच्चा डाक्टर बनेगा या फिर इंजीनियर. वे अपने बच्चे के खिलाफ एक भी शब्द सुनना पसंद नहीं करते हैं.’’

चेन्नई में एक छात्रा ने शिक्षक की पिटाई से नाराज हो कर आत्महत्या कर ली. दिल्ली में एक शिक्षक द्वारा छात्र पर डस्टर फेंकने के कारण छात्र ने अपनी आंखें खो दीं. इस तरह की घटनाएं आएदिन अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं.

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जितनी सुविधाएं उतनी फीस

आजकल शिक्षण संस्थाएं पैसा कमाने का स्रोत बन गई हैं. एक तरह से बिजनैस सैंटर हैं. जितनी ज्यादा सुविधाएं उतनी ज्यादा फीस. सभी पेरैंट्स चाहते हैं कि वे अपने बच्चों को बेहतरीन परवरिश दें. इस के लिए वे हर मुमकिन प्रयास भी करते हैं. फिर भी ज्यादातर पेरैंट्स न बच्चों की परफौर्मैंस से संतुष्ट होते हैं और न ही उन के बिहेवियर से. इस के लिए काफी हद तक वे स्वयं जिम्मेदार होते हैं, क्योंकि वे स्वयं ही नहीं समझ पाते कि उन्हें बच्चे के साथ किस समय कैसा व्यवहार करना है.

बच्चा पढ़ने से जी चुराता है तो मां कभी थप्पड़ लगा देती है, कभी डांटती है तो कभी डरातीधमकाती है. लेकिन कभी यह पता लगाने की कोशिश नहीं करती कि बच्चा आखिर क्यों नहीं पढ़ना चाह रहा है. हो सकता है उसे टीचर पसंद नहीं आ रहा हो, उस का आई क्यू लैवल कम हो अथवा उस समय पढ़ना नहीं चाह रहा हो.

मुंबई के एक इंटरनैशनल स्कूल की अध्यापिका ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि अब शिक्षिका पर मैनेजमैंट का प्रैशर, बच्चों का प्रैशर और अभिभावकों का प्रैशर बहुत ज्यादा रहता है. यदि किसी बच्चे से उस का होमवर्क पूरा न करने पर 2-3 बार कह दिया या सही ढंग से बोलने को कह दिया तो बच्चे घर पर छोटी सी बात को बढ़ा-चढ़ा कहते हैं. इसीलिए अब हम लोग ज्यादातर पढ़ा कर अपना काम पूरा करते हैं.

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पेरैंट्स का दबाव

अब स्कूल हों या पेरैंट्स सब को बच्चों की पर्सैंटेज से मतलब रह गया है. स्कूल को अपने रिजल्ट की चिंता है तो पेरैंट्स को अपने बच्चे को सब से आगे रखने की फिक्र है. बच्चों पर आवश्यकता से अधिक दबाव बनाया जा रहा है. पेरैंट्स और स्कूल दोनों ही बच्चों से उन की क्षमता से कहीं अधिक प्रदर्शन की चाह रखते हैं. बच्चों पर इतना अधिक दबाव और बोझ बढ़ जाता है कि या तो वे चुपचाप उस के नीचे दब कर सब की अपेक्षाएं पूरी करने की कोशिश करते हैं या फिर विद्रोही बन कर अपने मन की करने लगते हैं.

इलाहाबाद के एक मशहूर स्कूल की रुचि गुप्ता ने बताया कि पेरैंट्स के अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण आजकल बच्चों को पढ़ाना बहुत मुश्किल हो गया है. बच्चे पढ़ना नहीं चाहते और यदि उन पर जरा भी सख्ती करो तो बात का बतंगड़ बना देते हैं. सारा दोष टीचर पर आ जाता है. जब मैनेजमैंट नाराज हो, तो इस समय टीचर तो बलि का बकरा बन जाता है.

आजकल स्कूलों में वैल्यू एजुकेशन एक दिखावा है. सब को केवल बच्चों के नंबरों से मतलब है, क्योंकि आज का नारा है, कामयाब इंसान ही तारा है.

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पैसे का रोब

आजकल बच्चे पेरैंट्स की शह पर ही जिद्दी बन कर स्कूल में टीचर को कुछ नहीं समझते हैं. क्लास में टीचर का मजाक बनाना और ऊटपटांग प्रश्न पूछना आम बात हो गई है. आजकल पेरैंट्स बच्चों के सामने ही स्कूल और टीचर की कमियां निकालते रहते हैं. कई बार पेरैंट्स बच्चों के सामने ही कहने लगते हैं कि इस टीचर की शिकायत मैनेजमैंट से कर देंगे. तुरंत स्कूल से निकलवा देंगे. भला इन बातों को सुनने के बाद टीचर के प्रति बच्चों के मन में

आदर-सम्मान कहां से आ सकता है?

सुविधा-संपन्न परिवारों के बच्चे ज्यादातर किसी की कदर नहीं करते. न स्कूल में अपने टीचर्स की न ही घर में अपने पेरैंट्स की. वे मेहनत करने का माद्दा नहीं रखते. मां-बाप की शाहखर्ची देख कर स्कूल में भी अपने पैसे का रोब दिखाते हैं.

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टीचर का फर्ज

अभिभावक मंजू जायसवाल: अपना दर्द साझा करती हुई कहती हैं कि कोई भी टीचर अपनी गलती मानने को तैयार नहीं होती. यदि बात बढ़ कर ऊपर तक पहुंच जाती है तो बच्चे को बारबार अपमानित करती हैं, इसलिए बच्चे घर में कुछ बताना ही नहीं चाहते. इस तरह की शिकायत कई अभिभावकों ने की कि पेरैंट्स मीटिंग में टीचर केवल अपनी बात कहना चाहती हैं और वह भी बच्चों की शिकायतें.

अपनी व्यस्त जिंदगी के कारण मातापिता बच्चों को समय नहीं दे पाते. वे पैसे के बल पर नौकर या क्रेच में पलते हैं, इसलिए संस्कार की जगह आक्रोश से भरे रहते हैं.

अभिभावक यह कहने में शान समझते हैं कि उन की तो सुनता ही नहीं है. मोबाइल और टीवी में लगा रहता है जबकि वे स्कूल की टीचर से यह अपेक्षा करते हैं कि वे उन की यह आदत छुड़ा दें. जब बच्चा अधिक समय आप के पास रहता है, तो आप की जिम्मेदारी बनती है कि बच्चे को संस्कार दें, उस के साथ समय गुजारें, उस की जरूरतों को समझें.

प्राय: जो छात्र कमजोर होते हैं, उन की इस कदर उपेक्षा की जाती है कि वे कुंठित हो जाते हैं और पढ़ाई से जी चुराने लगते हैं. ऐसे में अच्छे टीचर का फर्ज है कि वह सभी बच्चों पर ध्यान दे, उन की प्रतिभा को निखारे, उन की जरूरतों को पहचान कर उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दे.

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