साइंस फिक्शन फिल्म ‘कार्गो’ में दर्शन शास्त्र भी है-आरती कदव

-आरती कदव, लेखक व निर्देशक फिल्म‘‘कार्गो’’

बचपन से ही रचनात्मकता में रूचि होने के बावजूद आरती कदव ने आईआईटी, कानपुर से इंजीनियरिंगं की डिग्री हासिल करते हुए अमरीका की माइक्रोसाफ्ट कंपनी में काम करना शुरू किया. पर कुछ दिन बाद ही वह लघु फिल्में बनाने लगी. फिर नौकरी छोड़कर वह मुंबई पहुंच गयी. आठ वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद वह अपनी पहली साइंस फिक्शन फिल्म‘‘कार्गो’’का लेखन, निर्माण व निर्देशन कर सकी, इसी बीच उन्होने कुछ बेहतरीन लघु फिल्में बनाकर शोहरत बटोरी.

फिल्म ‘‘कार्गो’’ कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराही जा चुकी है. आरती कदव अपनी इस फिल्म को सीधे सिनेमाघर में ही प्रदर्शित करने की इच्छा रखती थी. लेकिन कोरोना महामारी व लौक डाउन के चलते अब उन्होने अपनी फिल्म‘‘कार्गो’’ ओटीटी’प्लेटफार्म ‘‘नेटफ्लिक्स’को दे दी है, जो कि 9 सितंबर को ‘नेटफिलक्स’ पर प्रदर्शित होगी.

प्रस्तुत है आरती कदव से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश. .

सवाल- आपकी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?

-मेरा बचपन नागपुर में रहने वाले मध्यम वर्गीय परिवार में बीता. मेरे पिता इंजीनियर और मॉं शिक्षक है. हमारे परिवार में शिक्षा को लेकर काफी दबाव था. एक तो मां शिक्षक,उपर से नागपुर में हर बच्चा पढ़लिखकर इंजीनियर या डाक्टर बनने की ही सोचता है. वैसे मेरी रूचि कला की तरफ थी. मंै चारकोल स्केचिंग बहुत किया करती थी. एक स्केच बनाने में मुझे पंद्रह दिन लगते थे. फिर मैं उनकी एक्जबीशन प्रदर्शनी भी लगाती थी. स्कूल के दिनो में मैं कहानी लेखन में पुरस्कार भी जीतती थी. उन दिनों में राक्षस की ही कहानियां लिखती थी. मगर मां का दबाव था और मैं पढ़ने में तेज थी,तो मैंने कानपुर आई आई टी से इंजीनिरिंग की डिग्री ली,फिर पोस्ट ग्रेज्यूएशन भी किया. उन्ही दिनों अमरीका की माईक्रो साफ्ट कंपनी पहली बार भारत आयी थी और यहां के होनहार बच्चों की तलाश कर रही थी. तो मुझे भी चुना गया. भारत से दो लोग चुने गए थे. जिसमें से एक मैं थी. तो पढ़ाई पूरी होते ही मैं अमरीका चली गयी. यह मेरे लिए सभ्यता व संस्कृति के स्तर पर बहुत बड़ा बदलाव था. क्योंकि अब तक भारतीय सभ्यता व संस्कृति में मेरी परवरिश बहुत प्रोटेक्टिब रूप में हुई थी. वहां पर मुझे काफी एक्सपोजर मिला. पूरी स्वतंत्रता थी. मैं अमरीका जैसे शहर में अकेले नौकरी कर रही थी. तो काफी स्वतंत्रता थी. एक दिन मैंने एक कैमरा खरीदा. वहां से मैने धीरे धीरे कुछ फिल्माना शुरू किया. उस वक्त कैमरा महंगा था और मैं उस वक्त पैसे वसूल करने के लिए ज्यादा से ज्यादा शूट करने लगी. फिर कुछ भारतीयो से मिलकर कुछ लघु शॉर्ट फिल्में बनायीं. बहुत प्यारी प्यारी लघु फिल्में थीं.

फिर मैंने इनमें कुछ प्रयोग करने शुरू किए. मैने बतौर लेखक, निर्देशक, निर्माता व संगीतकार तीन से पांच मिनट की ढेर सारी लघु फिल्में बना डाली. मैने खुद ही साफ्टवेअर लोड करके इन लघु फिल्मों की एडीटिंग भी करती थी. यह सब देखकर मेरे छोटे भाई ने मुझसे कहा कि,‘आप जो कर रही हंै,उसे देखकर लगता है कि यह सब किसी नौसीखिए ने किया है. अगर आपको शौक है,तो प्रशिक्षण ले लो. ’मुझे भाई की सलाह पसंद आयी और मैं अमरीका छोड़कर मंुबई आ गयी. उन्ही दिनों सुभाष घई का ‘व्हिशलिंग वुड इंस्टीट्यूट’नया नया खुला था. मुझे पता चला कि इसमें पुणे फिल्म संस्थान से जुड़े रहे व अन्य अच्छे शिक्षक हैं और दो वर्ष का कोर्स है. तो मैंने ‘व्हिशलिंग वूड’में प्रवेश ले लिया. मुझे बहुत मजा आया. उस वक्त मेरी उम्र 28 वर्ष थी. जबकि बाकी सभी विद्यार्थी बच्चे 18 से बीस वर्ष के थे. पर मैं सबसे अधिक मस्ती कर रही थी. क्योंकि मुझे वहां मिलने वाली शिक्षा की महत्ता का अहसास हो चुका था. मैं इंजीनियरिंग छोड़कर फिल्म स्कूल में आयी थी. वहां से पढ़ाई पूरी करके जब हमने मंुबई फिल्म नगरी में काम करना चाहा,तो आटे दाल का भाव पता चला. बहुत संघर्ष करना पड़ा. पूरे आठ वर्ष के संघर्ष के बाद में अपनी पहली साइंस फिक्शन फिल्म ‘‘कार्गो’’ बना सकी.

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सवाल- पर आई आई टी कानपुर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करतेवक्त भी आप अकेले व स्वतंत्र रही होगी?

-जी हॉ! स्वतंत्रता पूर्वक रहने का माइंड सेट तो आई आर्ई टी कानपुर में पढ़ाई के दौरान ही बन गया था. वहां हम रात रात भर जागकर पढ़ाई करते थे. मैने उस दौरान एक भी फिल्म नहीं देखी थी. मगर हम स्वावलंबी बन जाते हैं. सच तो यह है कि आई आई टी की पढ़ाई से मुझे एक ताकत मिली. दिमागी रूप से मैने जो कुछ सीखा,वह वहीं से मिला.

सवाल- क्या आज आपको लगता है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना समय की बर्बादी या गलत था?

-मैं ऐसा नहीं कह सकती. क्योंकि मैने उससे बहुत कुछ सीखा. आई आई टी में जो सिस्टम डेवलपमेंट था,वह पूरा कम्प्यूटर साइंस था. तो रोबोट जिनकी मैं कहानी सुनती हूं, उसको पहले मैने इंजीनिंयरिंग की पढ़ाई के नजरिए से जाना. लोग साइंस फिक्शन किताबों से पढ़ते हैं,पर मैं तकनीक टेक्नोलॉजी से पढ़ा. यह सब मुझे मेरे कथा कथन कहानी कहने में मदद करता है. जब मैंने फिल्म‘‘कार्गो’’ बनायी,तो मुझे लोग इज्जत दे रहे थे,क्योंकि उन्हे अहसास हुआ कि इसने कुछ डिजाइन किया है. इस बात ने मेरी कहानी को विकसित करने में मदद की. दूसरी बात इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हुए निजी स्तर पर मैंने बहुत कुछ सीखा. यह हमेशा कमा आएगा. जिम्मेदारी का अहसास भी उसी दौरान हुआ.

सवाल- आप अपने सात आठ वर्ष के संघर्ष को लेकर क्या कहना चाहेंगी?

-जब मैं ‘‘व्हिशलिंग वूड’’से फिल्म विधा की पढ़ाई कर रही थी,तभी मैने समझ लिया था कि मुझे साइंस फिक्शन फिल्में ही बनानी है. या कुछ जादुई काम करना है. उस वक्त नेटफ्लिक्स या अमॉजान जैसे ओटीटी प्लेटफार्म नहीं थे और सिनेमाघरांे में फिल्म प्रदर्शित करना टेढ़ी खीर था. उस वक्त मैं बहुत युवा नजर आती थी. मैं फिल्म निर्माताओं से मिलती थी और उन्हे बताती थी कि मुझे इस तरह की साइंस फिक्शन फिल्म बनानी है,तो संभवतः लोगों को मुझ पर यकीन नही होता था. जबकि सभी मिलते अच्छे थे. इसलिए मैने ‘इंडियन नोशन का बहुत अच्छा म्यूजिक वीडियो बनाया. कुछ लघु फिल्में बनायी. म्यूजिक वीडियो कई बनाएं. कुछ विज्ञापन फिल्में बनायी. मैने एक फिल्म की पटकथा लिखी, जिसे‘फैंटम फिल्म’ बनाने वाला था. हमने काफी तैयारी कर ली थी. मगर तभी फैंटम के अंदर कुछ विखराव हो गया और फिल्म बन न सकी. लेकिन इस फिल्म के चक्कर में मेरे पूरे दो वर्ष चले गए थे. तब मैने प्रण कर लिया था कि मै 2017 में अपनी फिल्म बनाउंगी,भले ही मुझे किसी परदे के सामने दो इंसानों को खड़ा करके ही क्यों न बनाना पड़े.

सवाल- अपनी लघु फिल्मों के बारे में बताएंगी?

-एक लघु फिल्म ‘उस पार’थी,जिसमें जैकी श्राफ ने अभिनय किया था. इसे कई फिल्म फेस्टिवल में काफी सराहा गया. दूसरी फिल्म ‘गुलमोहर’है. इसके बाद मैने एक फिल्म बनायी, जिसे कई फेस्टिवल में पुरस्कृत किया गया. यह फिल्म मूवी डॉट कॉम पर आयी थी. मैने एक लघु फिल्म‘‘रावण’’ बनायी, इसे मस्ती में एक दिन में बनाया था. इसमें एक संघर्षरत अभिनेता की कहानी है,जिससे लोग कह रहे हैं कि शादी करके बच्चे पैदा करो अन्यथा तुम मर जाओगे तो कई रावण पैदा हो जाएंगे. यह पहली लघु फिल्म थी, जिसके लिए मैने मैथोलॉजी के किरदार को उठाकर आधुनिकता के साथ जोड़ा था.

सवाल- इसके बाद की क्या योजना है?

-अभी एक साइंस फिक्श लघु फिल्म की शूटिंग रिचा चड्डा के संग की है. कुछ दूसरी योजनाएं भी हैं.

सवाल- फिल्म ‘‘कार्गो’’ की प्रेरणा कहां से मिली?

-मैने पंचतंत्र का महाभारत वर्जन भी पढने के बाद जब साइंस फिक्शन वाली कहानियां पढ़ना शुरू की,तो मेरी समझ में आया कि साइंस फिक्शन अभी का नहीं है और न ही अमरीका से आया है. बल्कि यह तो हमारे देश में कई सदियों से रहा है. मेरी नजर में ‘महाभारत’ भी एक तरह से साइंस फिक्शन ही है. शोध में मैने पाया कि सभी ने सबसे पहले साइंस फिक्शन कहानी के तौर पर यह बनाया कि हम पैदा कहां से हुए और मर कर कहां जाएंगे. क्योकि हर धर्म में इंसान की मृत्यू होने पर सांत्वना देते समय यह कहानी बतानी पड़ती है. इसे आप क्रिएशन मिथ आफ्ट्र लाइफ एंड डेथ’कह सकते हैं. तो मैने सोचा कि हमने पढ़ा है कि मृत्यू होने पर यमराज आकर इंसान को लेकर जाते हैं. तो हमने इसी पर एक नई कहानी पेश करने की कोशिश की है. हमारी फिल्म ‘कार्गो’ की मूल कहानी‘प्रे शिप’’की है,मगर बीच बीच में कई छोटी छोटी कहानियां हैं. साहित्य में एक खास चीज है-‘‘अनरिलायबल नरेटर. ’’एक स्पेनिश लेखक इसे बहुत आगे ले गए हैं.

सवाल- कहानी के बारे में कुछ बताना चाहेंगी?

-फिल्म‘‘कार्गो’’की कहानी पृथ्वी परहर सुबह आने वाले पुष्कर नामक ‘प्रे शिप’’की है. यह कहानी प्रहस्त (विक्रांत मैसे) नामक इंसान की है,जो कि पचास साठ साल से ‘पुष्कर 634 ए’’पर कार्यरत है. तो वह बहुत ही मेकेनिकल हो गया है. कार्गो से मृत लोग आते हैं और प्रहस्त के पास वह एक प्रोसेेस के साथ जाते हैं और प्रहस्त भी सारा काम मेकेनिकल तरीके से करता रहता है. अचानक प्रहस्त को एक सहायक युविश्का (श्वेता त्रिपाठी) मिलती है,जो कि इस नौकरी को लेकर बहुत उत्साहित है. उसे यह पहली नौकरी मिली है. यह लड़की अहसास करती है कि यह मस्ती वाला नहीं,बल्कि लार्जर आॅस्पेक्ट वाला काम है. वह यह जानने का प्रयास करती है कि आखिर जिंदगी का मतलब क्या है,यदि हर इंसान आकर सब कुछ देेने लगेे. उसके इस संसार में रहने का क्या मतलब है. इंटरवल के बाद फिल्म पूरी तरह से फिलॉसाफिकल हो जाती है. कहने का अर्थ यह कि जिंदगी में कुछ भी न रहे,तो भी कुछ न कुछ रह जाता है.

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सवाल- इस साइंस फिक्शन फिल्म में दर्शनशास्त्र?

-दर्शन शास्त्र यही है कि हम सोचते है कि हम मर जाते हैं,तो सब कुछ खत्म हो जाता है,तो ऐसा नहीं है,हम कहीं न कहीं कुछ छोड़ जाते हैं. और वही काफी है. मेरा कहना यह है कि हम जो ‘फार एवर’बोलते हैं,तो ‘फार एवर’ हमेशा रहने में नहीं होता, बल्कि वह जिंदगी का कोई भी पल हो सकता है.

सवाल- दर्शक अपने साथ ले जाएगा?

-फिल्म में ह्यूमर भी है,इसलिए लोगों को फिल्म देखते हुए मजा आएगा. इसके अलावा हर दर्शक अपनी जिंदगी के प्रति प्यार लेकर जाएगा. हम अपनी जिंदगी में इतना फंसे रहते हैं कि हम कभी भी अपने बारे में सोच ही नहीं पाते. लोग खुद को भाग्यशाली समझेंगे कि वह जिंदा हैं.

सवाल- इसके बाद की क्या येाजना है?

-एक फिल्म की पटकथा तैयार है. यह भी साइंस फिक्शन ही है. मै कम से चार पांच साइंस फिक्शन फिल्में ही बनाना चाहती हूं. वैसे मेरे पास कहानियों का भंडार है. अभी एक साइंस फिक्शन लघु फिल्म रिचा चड्डा के साथ शूट की है.

मेरा वजन बहुत अधिक है, इसे कम करने के लिए मैं डाइटिंग कर रही हूं?

सवाल-

मैं 26 वर्षीय कालेज स्टुडैंट हूं. मेरा वजन बहुत अधिक है, इसे कम करने के लिए मैं डाइटिंग कर रही हूं. लेकिन इस के कारण मुझे कब्ज रहने लगा है, क्या करूं?

जवाब

सब से पहले तो डाइटिंग की अवधारणा ही गलत है. आप को वजन कम करने के लिए कभी डाइटिंग नहीं बल्कि डाइट प्लानिंग करनी चाहिए. आप के शरीर को सामान्य रूप से काम करने के लिए एक निश्चित मात्रा में कैलोरी की आवश्यक है. अगर आप प्रतिदिन 1200 कैलोरी से कम का सेवन करेंगी तो आप का मैटाबोलिज्म धीमा पड़ जाएगा, जिस का सीधा प्रभाव आप के मल त्यागने की आदतों पर होगा. आप का पाचनतंत्र ठीक प्रकार से काम करेगा.

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अपने खानपान और लाइफस्टाइल के कारण आजकल अधिकतर लोगों में मोटापे की समस्या देखी जा रही है. इससे निजात पाने के लिए लोग घंटों जिम करते हैं, पर कुछ खास असर नहीं होता. हाल ही में एक रिपोर्ट आई है जिसमें सामने आया है कि वजन कम करने के लिए एक्सरसाइज से ज्यादा डाइट महत्वपूर्ण होती है. अगर आपको वजन कम करना है तो इक्सरसाइज से ज्यादा डाइट पर ध्यान देना होगा.

अमेरिका की एक शोध संस्था के मुताबिक, जो लोग धीरे-धीरे यानी हफ्ते में सिर्फ 1 या 2 पाउंड ही वजन कम करते हैं, उनका वजन जल्दी नहीं बढ़ता है. रिपोर्ट में ये बात भी सामने आई कि खाना के पाचन में 10 फीसदी तक कैलोरी बर्न होती हैं. वहीं, 10 से 30 फीसदी कैलोरी फिजिकल एक्टिविटी से कम होती हैं.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- एक्सरसाइज या डाइटिंग: वजन कम करने के लिए क्या करें?

ब्रेकफास्ट में बनाएं टेस्टी पाव भाजी

पाव भाजी को घर पर आसानी से बहुत जल्दी बनाया जा सकता हैं. नाशते में पाव भाजी बनाकर परोसें, आपको और आपके परिवार को यह बहुत पसन्द आयेगा.

सामग्री

उबले आलू – 3 (300 ग्राम)

टमाटर – 6 (400 ग्राम)

शिमला मिर्च – 1 (100 ग्राम)

फूल गोभी – 1 कप छोटा छोटा कटा (200 ग्राम)

मटर के दाने – 1/2 कप

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हरा धनिया – 3-4 टेबल स्पून (बारीक कटा हुआ)

मक्खन – 1/2 कप (100 ग्राम)

अदरक पेस्ट – 1 छोटी चम्मच

हरी मिर्च – 2 (बारीक कटी हुई)

हल्दी पाउडर – 1/2 छोटी चम्मच

धनिया पाउडर – 1 छोटी चम्मच

पाव भाजी मसाला – 2 छोटी चम्मच

लाल मिर्च – 1 छोटी चम्मच

नमक – स्वादानुसार

विधि

पाव भाजी बनाने के लिए गोभी को अच्छी तरह धोकर बारीक काट लीजिए. गोभी और मटर को एक बरतन में 1 कप पानी डालकर नरम होने तक ढक कर पकने दीजिए.

आलू को छील लीजिए, टमाटर को बारीक काट लीजिए और शिमला मिर्च के बीज हटाकर इसे भी बारीक काट कर तैयार कर लीजिए.

पैन गरम किजिए, 2 टेबल स्पून बटर डाल कर मैल्ट कीजिए इसमें अदरक का पेस्ट और हरी मिर्च डाल कर हल्का सा भून लीजिए. अब कटे हुए टमाटर, हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर और शिमला मिर्च डालकर मिक्स कर दीजिए और इसे ढककर 2-3 मिनिट पका लीजिए.

सब्जी को चेक कीजिए, टमाटर शिमला मिर्च नरम होकर तैयार हैं अब इन्हें मैशर की मदद से मैश कर लीजिए, अब गोभी और मटर डाल कर अच्छे से मैश करते हुए पका लीजिए.

सब्जी अच्छे से मैश हो गई है, अब आलू को हाथ से तोड़ कर डाल दीजिए साथ ही नमक, लाल मिर्च और पावभाजी मसाला डालकर भाजी को मैशर की मदद से मैश करते हुए थोडी़ देर पका लीजिए. आधा कप पानी और आवश्यकतानुसार पानी डाल दीजिये, सब्जी हल्की सी पतली बने, और सब्जी को घोटते हुए तब तक पकाएं जब तक की भाजी एक दम से एक जैसी हिली मिली हुई नहीं दिखाई देने लगे.

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भाजी में थोडा़ सा हरा धनिया और 1 चम्मच बटर डाल कर मिला दीजिए. भाजी बनकर तैयार है इसे प्याले में निकाल लीजिए, और बटर और हरे धनिये से गार्निश कीजिए.

अब पाव सेकें. गैस पर तवा गरम कीजिये. पाव को बीच से चाकू की सहायता से इस तरह काटे कि वह दूसरे तरफ से जुड़ा रहे. तवे पर थोडा़ सा बटर डालकर इस पर पाव डाल कर, दोंनो ओर हल्का सा सेक लीजिए. सिके पाव को प्लेट में निकाल लीजिए इसी तरह सारे पाव भी सेक कर तैयार कर लीजिए. गरमा गरम स्वादिष्ट पाव भाजी को परोसिये और खाईये.

4 टिप्स: घर पर चांदी को चमकाएं ऐसे

चांदी जैसे-जैसे पुरानी होती जाती है, धीरे धीरे यह अपनी चमक खोने लगती है. दरअसल, चांदी एक ऐसी धातु है जिस पर दाग-धब्बे व खरोंच आसानी से पड़ जाते है. ऐसे में अगर महिलाएं चांदी के जेवर पहनती है तो कहीं न कहीं उनकी खूबसूरती फीकी पड़ जाती हैं. महिलाएं इन्हें साफ करवाने के लिए सुनार के पास भी जाती हैं. जहां समय तो लगता ही है साथ पैसे भी ज्यादा लगता है. ऐसे में आप घर पर ही कुछ आसान नुस्खों से चांदी चमका सकती हैं. आइए जानते है चांदी के बर्तन व जेवर को घर पर कैसे चमका सकते है-

नमक और एल्युमीनियम फौयल का प्रयोग

चांदी के गहनों को साफ करने के लिए एक बर्तन में पानी और नमक का घोल बना लें. अब इस में एल्युमीनियम फौयल के कुछ टुकडें मिला दें. अब इस घोल में आप चांदी के बर्तन व जेवर डाल दें. करीब 30 मिनट बाद चांदी को इस घोल में रखने के बाद निकाल लें और ब्रश से साफ कर के सूखा ले. आप चाहे तो नमक के जगह बैकिंग सोडा का भी इस्तेमाल कर सकती है. नमक और एल्युमीनियम का यह मेल चांदी के दाग धब्बों के साथ रिएक्शन कर के चांदी को चमकदार बनाने में मदद करता है.

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डिटर्जेंट पाउडर का करें इस्तेमाल

डिटर्जेंट पाउडर  के इस्तेमाल से चांदी की खोई चमक वापस आ सकती है. इसके लिए आपको पहले पानी में डिटर्जेंट  पाउडर  डाल कर उबालना होगा. अब इस में चांदी के जेवर डाल कर थोड़ी देर छोड़ दे. कुछ देर बाद इन्हें निकाल कर ब्रश के सहायता से साफ कर लें. ऐसा करने से चांदी की चमक फिर से पहले जैसी हो जाएगी.

टूथपेस्ट से भी चमकेगी चांदी

टूथपेस्ट से सिर्फ दांत ही नहीं चांदी भी चमकाई जा सकती है. टूथपेस्ट से आप आसानी से चांदी के जेवर व बर्तन को चमका सकती है. इसके लिए आप कोई भी सूती कपड़ा ले. अब इस कपड़े पर टूटपेस्ट लगाएं और जिस जेवर को चमकाना है उसे इस कपड़े के सहायता से हल्के हाथ से रगड़े.

नींबू और नमक का घोल

नींबू और नमक का घोल भी चांदी चमकाने में काफी लाभदायक है. चांदी को चमकने के लिए नींबू और नमक के घोल को मिला ले और उसमे चांदी के बर्तन व जेवर रात भर भिगों के छोड़ दे. सुबह इसे ब्रश से साफ कर ले. आपको काफी फर्क नजर आएगा.

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पीले दांतों से पाएं छुटकारा

उम्र बढ़ने के साथ, कुछ ड्रिंक्स या खा- पदार्थों से दांतों पर पीले व ग्रे धब्बे लग जाते हैं जिस कारण दांत गंदे व पीले दिखने लगते हैं. इस समस्या को जल्द से जल्द दूर करना आवश्यक है.

दांत हमारे चेहरे या कहें पूरी पर्सनैलिटी का एक अभिन्न हिस्सा हैं और मुंह खोलते ही यदि किसी के दांत पीले दिखाई पढ़ते हैं तो उस की इमेज उसी समय हमारे सामने डाउन हो जाती है. बाजार में दांतों को सफेद बनाने के लिए कई तरह की किट्स व टीथ व्हाइटनिंग स्ट्रिप्स, पेस्ट व पाउडर अवेलेबल हैं, लेकिन यदि आप उन पर पैसे खर्चना नहीं चाहते तो कुछ होम रेमेडीज भी हैं जिन्हें अपना सकते हैं.

– एक टेबलस्पून बेकिंग सोडा में 2 टेबलस्पूनहाइड्रोजन पेरोक्साइड मिला कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट से अपने दांतों को ब्रश कीजिए. यह दांतों पर प्लाक और कीटाणु पनपने से रोकता है जिस से पीले दांत की समस्या खत्म हो जाती है. इस का इस्तेमाल आप रोज कर सकते हैं.

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– बहुत कम मात्रा में एप्पल साइडर विनेगर का इस्तेमाल किया जा सकता है. आधा गिलास पानी में 2 छोटे चम्मच एप्पल साइडर विनेगर को मिला कर माउथवाश बना लें. इसे 30 सेकंड तक मुंह में रख कर हिलाएं और फिर थूक कर साफ पानी से मुंह धो लें और ब्रश कर लें. इस का इस्तेमाल सावधानी से करें और कम मात्रा व कम समय के लिए करें.

– बाजार से एक्टीवेटेड चारकोल खरीद कर उसे दांतों पर ब्रश में ले कर लगा सकते हैं. एक्टिवेटेड चारकोल न केवल दांतों को सफेद करता है बल्कि बैक्टीरिया को भी हटाता है.

– स्ट्रौबैरी में मौजूद मेलिक एसिड दांतों की सफेदी के लिए कारगर उपाय है. स्ट्रौबैरी को पीस कर बेकिंग सोडा में मिलाएं और इस से दांतों को ब्रश करें. हालांकि यह दांतों पर बहुत ज्यादा असरदार नहीं है लेकिन दांतों से हलका पीलापन हटा सकता है. आप इसे हफ्ते में 2 से 3 बार इस्तेमाल कर सकते हैं.

– दांतों को पीले होने से बचाने के लिए शुगर युक्त खा- पदार्थों का कम सेवन करें. अपने खाने में कैल्शियम की मात्रा बढ़ाएं. गुटका या तंबाकू का सेवन न करें. रोजाना दांतों को सुबह खाना खाने से पहले और रात में खाना खाने के बाद ब्रश कर के सोएं. कौफी, सोडा,

रेड वाइन आदि खा- पदार्थ दांतों पर धब्बे छोड़ जाते हैं, इन से परहेज करें.

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चेहरे को बेदाग बनाने के एक्सपर्ट टिप्स

खूबसूरत, बेदाग चेहरा हर किसी की ख्वाहिश होती है लेकिन धूल-मिट्टी, प्रदूषण की वजह से बहुत से लोगों को पिंपल की समस्या हो जाती है. इस समस्या से बचने के लिए लोग तरह-तरह के ट्रीटमेट और ब्यूटी प्रॉडक्ट का सहारा लेते है लेकिन पिंपल्स की समस्या वैसे की वैसे ही रहती है. ऐसे में पिंपल्स को ठीक करने के लिए कुछ आसान से टिप्स बात रहें हैं, डॉ. अजय राणा  विश्व प्रसिद्ध डर्मेटोलॉजिस्ट और एस्थेटिक फिजिशियन, संस्थापक और निदेशक, आईएलएएमईडी.

1. एप्पल साइडर विनेगर पीपल्स को हटाने के लिए आजमाए जाने वाला सबसे प्रसिद्ध नुस्खा है. एप्पल साइडर विनेगर मे एंटी इंफ्लैमैटरी और एंटी बकटेरियल प्रोपर्टीज होती है. पर इसे सावधानी से इस्तेमाल किया जाना चाहिए. क्योंकि इससे कई तरह के इंफेक्शन होने के भी चांसेस होते है.

इसके लिए एप्पल साइडर विनेगर को दिन में कम से कम दो बार पिंपल पर लगाए और फिर आधे मिनट के लिए छोड़ दें. फिर आधे मिनट बाद इसको धो लें.

2. टी ट्री ऑयल पिंपल्स के लिए अच्छा माना जाता है. यह स्किन को मुलायम बनाता है और एंटी बक्टेरियल प्रोपर्टीज होने के कारण स्किन से रेडनेस निकालने में मदद भी करता है.

इसके लिए कॉटन की सहायता से टी ट्री ऑयल को पिंपल्स पर लगाए. फिर 15-20 मिनट बाद इसको अच्छे से साफ कर लें. इसके अलावा एक टेबल स्पून एलोवेरा जेल में टी ट्री ऑयल की कुछ बूँदे मिला लें. फिर इसको पिंपल्स में लगाए. फिर इसे गर्म पानी की सहायता से धो लें.

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3. पिंपल्स के लिए पपीता का उपयोग एक नैचुरल रेमडी की तरह काम करता है. पपीता स्किन से डेड स्किन सेल्स को निकालने में मदद करता है साथ ही साथ स्किन को क्लीयर बनाता है.

इसके लिए अपने चेहरे को पहले अच्छे से धो कर सुखा लें. फिर पपीता को पीस कर एक पेस्ट की तरह बना लें. फिर से चेहरे पर लगा कर 15-20 मिनट के लिए छोड़ दें. फिर इसे गर्म पानी की सहायता से धो लें. फिर अपने स्किन टोन के हिसाब से एक अच्छा सा मोइस्चराईजर इस्तेमाल करें.

4. एलोवेरा पिंपल्स को ठीक करने के लिए अपनाया जाने वाला सबसे अच्छा और घरेलू उपाय है. यह न सिर्फ पिंपल्स को हटाता है बल्कि साथ ही साथ स्किन पर होने वाले सभी प्रकार के स्कार्स को भी ठीक करता है.

इसके लिए एलोवेरा जेल में चुटकी भर हल्दी मिला कर स्किन पर रगड़े. इसमें मौजूद इंफ्लैम्माटरी और एंटी मिकरोबियल प्रोपर्टीज न केवल पिंपल्स को कम कर देगी साथ ही साथ स्किन को हाईड्रैट भी कर देगी.

5. हनी का भी इस्तेमाल पिंपल्स को ठीक करने में किया जा सकता है. यह स्किन से सभी प्रकार के रेडनेस जो पिंपल्स के कारण होते है उसको ठीक कर देता है.

इसके लिए हनी को दालचीनी के पाऊडर में मिला लें फिर इस पेस्ट को स्किन में पिंपल्स वाले एरिया में लगाए. फिर कुछ देर बाद इसको धो लें.

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6. नारियल का तेल भी पिंपल्स को ठीक करने के लिए इस्तेमाल करा जा सकता है. नारियल के तेल में एंटी बक्टेरियल प्रोपर्टीज होती है जो स्किन इंफ्लैमैशन को ठीक करता है.

इसके लिए नारियल तेल को हल्का गर्म करके पिंपल्स पर लगाए. इससे पिंपल्स सही हो जायेंगे और स्किन के सारे स्कार्स भी ठीक हो जायेंगे.

बहू का रिवीलिंग लिबास क्या करें सास

सुशीला का विवाह 30 साल पहले एक गांव में हुआ था. उन दिनों को याद करते हुए वह अकसर सोचती कि उस ने गांव में कितनी कठिनाइयों का सामना किया. उस की सास उसे हर समय घूंघट निकाले रखने को कहती. पढ़ीलिखी सुशीला के लिए ऐसा करना बहुत मुश्किल था. जब विवाह के कुछ समय बाद उस के पति नौकरी के सिलसिले में शहर आ गए तो उसे राहत की सांस मिली. पहले लंबा घूंघट छूटा और फिर अपने आसपास वालों की देखादेखी साड़ी की जगह सूट पहनना शुरू हो गया. सूट उसे साड़ी के मुकाबले आरामदायक और सुविधाजनक लगता. कुछ समय बाद सूट से दुपट्टा भी गायब हो गया.

अब जब कभी उस की सास गांव से उस के पास रहने आती तो वह उस के कपड़ों को देख कर खूब मुंह बनाती और बारबार ताने मारती. ‘‘क्या जमाना आ गया है. बहुओं ने लाजशरम बिलकुल छोड़ रखी है… नंगे सिर, बिना दुपट्टे परकटी बन घूम रही है. हमारा पल्लू आज भी सिर से नीचे नहीं गया. मेरी सास मुझे यों देखती तो मार ही डालती.’’

ऐसी तानाकशी से दुखी सुशीला मुंह बंद कर के रह जाती और सास के वापस जाने के दिन गिनती. उस वक्त सुशीला सोचा करती कि वह अपनी बहू के साथ कभी ऐसा नहीं करेगी.

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धीरेधीरे समय बदला. सुशीला के बच्चे बड़े हुए. उस की बेटी जींस पहनती तो उसे बुरा नहीं लगता. उसे लगता कि वह समय के साथ बदल गई है और अपनी सास की तरह दकियानूसी नहीं है. उस के बेटे की मुंबई में अच्छी नौकरी लगी. वहीं एक सहकर्मी से प्यार हुआ और दोनों ने परिवार की रजामंदी से शादी कर ली.

सुशीला के पति का देहांत हो गया था, इसलिए वह भी बेटेबहू के साथ मुंबई रहने आ गई. शादी के शुरूशुरू में बहू ने एक आदर्श बहू वाले पारंपरिक कपड़े पहने, मगर धीरेधीरे वह उन्हीं पुराने सुविधाजनक कपड़ों में रहने लगी जो शादी से पहले पहना करती थी जैसे कैप्री, शौर्ट्स, विदाउट स्लीव और औफ शोल्डर टौप, मिडीज आदि. मगर सुशीला को बहू का ऐसा रिवीलिंग पहनावा अखरने लगा.

वह बहू को अकसर टोकने लगी, ‘‘शादी के बाद भी कोई ऐसे कपड़े पहनता है भला?’’

एक दिन तो हद हो गई जब बहूबेटे दोनों एक पार्टी में जा रहे थे. बहू ने औफशौल्डर टौप और स्कर्ट पहन लिया. उस दिन सुशीला भड़क उठी, ‘‘तुम लोगों के ज्यादा पर निकल आए हैं… बिलकुल नंगापन मचा रखा है. मैं भी कभी बहू थी, मगर हमारी क्या मजाल थी जो अपने सासससुर के सामने ऐसे कपड़े पहन लेते. मेरी सास मुझे ऐसा देखती तो मार ही डालती.’’

यह सुन कर सुशीला का बेटा बोला, ‘‘अरे मम्मी यह तो सेम वही डायलौग है न जो दादी आप को सुनाया करती थीं. आप ने यह हमें कितनी बार बताया है.’’

यह सुन कर सुशीला को एक झटका लगा कि अरे हां, सही तो है मेरी सास मुझे सूट पहनने पर ऐसे ही तो ताने मारा करती थी. मगर सूट अलग बात थी. उस में शरीर ढका रहता है. मगर बहू के कपड़े… इन्हें कैसे बरदाश्त करूं?

जो सुशीला की स्थिति है, वही आजकल की बहुत सी सासों की है. उन की सोच में बदलाव तो आ रहे हैं, मगर उतनी तेजी से नहीं जितनी तेजी से नई पीढ़ी आगे बढ़ रही है. दोनों पीढि़यों की गति में बहुत अंतर है. सामान्यतया बहू जब भी कुछ ऐसा पहनती है जो सास को अशोभनीय लगता है तो वह तुरंत मुंह बनाते हुए अपने जमाने में पहुंच जाती है और कहती है कि अरे, हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं होता था. उन की इस प्रतिक्रिया के कारण सासबहू का रिश्ता तनावपूर्ण रहता है और बहू सास से अलग रहने के मौके ढूंढ़ती है. ऐसा न हो, इस के लिए कुछ बातों को समझना जरूरी है.

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बदलाव को स्वीकारें

एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है कि परिवर्तन संसार का नियम है. संसार में रोज कुछ न कुछ परिवर्तन हो रहे हैं. जलवायु में, सुविधाओं में, तकनीक में, रहनसहन में, रिश्तों में… हर जगह कुछ भी पहले जैसा नहीं है और न ही हो सकता है. यही बात पहनावे की भी है. पीढ़ीदरपीढ़ी लोगों के खासकर महिलाओं के पहनावे में परिवर्तन होता आ रहा है और आगे भी होता रहेगा. समय के बदलते दौर की नब्ज पकड़ें और उसे स्वीकार कर अपनी सोच को लचीला बनाएं.

रिवीलिंग का यदि शाब्दिक अर्थ पकड़ें तो वह ‘राहत’ या ‘सुविधाजनक’ होता है. सुविधा की परिभाषा सब के लिए अलगअलग है. सुशीला की सास को उस का सूट पहनना पसंद नहीं था जबकि वह उस के लिए सुविधाजनक था. इसी तरह सुशीला को बहू का कैप्री, स्लीवलैस टौप, मिडीज पहनना पसंद नहीं है, जबकि बहू को ये ड्रैस सुविधाजनक लगती हैं. सास यानी सुशीला को समझना चाहिए कि बहू अपनी सुविधानुसार कपड़े पहनेगी उन की सोच के हिसाब से नहीं. और यदि दबाव में पहन भी लिए तो यह ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा. बेहतर है सुशीला अपने दृष्टिकोण में बदलाव करे ताकि दोनों के बीच फालतू का तनाव न पैदा हो.

कोई भी पहनावा अच्छा या बुरा नहीं होता. उसे अच्छा या बुरा हमारी सोच बनाती है. हम उसे जिस नजरिए से देख रहे हैं वह नजरिया उस पहनावे की परिभाषा तय करता है. जैसे तीखा खाने वाले के सामने सादा भोजन रख दिया जाए तो वह बकवास बताएगा और सादा खाने वाले के सामने तीखा भोजन रख दिया जाए तो वह उस की बुराई करेगा. जरा सोचिए, क्या आज आप स्वयं अपनी पुरानी पीढ़ी के पहनावे को पहन रहे हैं? पुरुषों की धोतियां, महिलाओं के घूंघट लगभग गायब हो चुके हैं. इसी तरह आजकल की बहुएं अपने समय के अनुसार कपड़े पहन रही हैं.

न बनें टिपिकल सास

जब कोई मां अपने पढ़ेलिखे बेटे के लिए बहू ढूंढ़ती है तो उस की चाहत होती है उस की बहू भी आधुनिक और पढ़ीलिखी हो जो उस के बेटे के साथ कदम से कदम मिला कर चल सके. मगर जब रहनसहन और पहनावे की बात आती है तो वह वही टिपिकल सास बन जाती है, जो चाहती है उस की बहू उस की सोच के हिसाब से चले. जो उसे अच्छा नहीं लगता वह न पहने. मगर ऐसा नहीं होता. आप को यह समझना जरूरी है कि आप की बहू एक आत्मनिर्भर व्यक्तित्व है. उस की अपनी सोच, अपनी पसंदनापसंद है. वह

आप के आदर की वजह से आप की बात मान सकती है, मगर आप अपनी सोच उस पर थोप नहीं सकतीं.

यदि आप को बहू की रिवीलिंग ड्रैस पर कोई आपत्ति है और आप यह बात उस तक पहुंचाना चाहती हैं तो इस तरह से कहें कि उसे बुरा भी न लगे और आप भी अपनी बात कह पाएं. लेकिन क्या पहनना है क्या नहीं, इस का निर्णय उसी पर छोड़ देना चाहिए.

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रमा की बहू एक फैमिली फंक्शन में जाने के लिए औफशौल्डर गाउन पहन कर तैयार हो रही थी. जहां उन्हें जाना था वहां का माहौल रूढि़वादी था. रमा ने जब उसे देखा तो पहले उस की बहुत तारीफ करते हुए बोलीं, ‘‘अरे, वाह बहू, आज तो तुम गजब ढा रही हो. बहुत ही सुंदर लग रही हो, मगर आज जहां यह पार्टी है उन लोगों का नजरिया थोड़ा पुराना है. हो सकता है उन्हें तुम्हारा यह आधुनिक पहनावा अच्छा न लगे, वे तुम पर कुछ कमैंट करें. और मेरी प्यारी बहू के लिए कोई उलटासीधा बोलेगा तो मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए मैं चाहूंगी कि तुम कोई पारंपरिक डै्रस पहन लो. लेकिन

मैं तुम्हें फोर्स नहीं करूंगी, जैसा तुम्हें सही लगे तुम करो.’’

बहू ने सास की प्यार से कही गई बात को सुना और तुरंत चेंज करने के लिए तैयार हो गई.

बहू को बदलने के बजाय सास ही जमाने की नब्ज पकड़ कर अपने पहनावे में बदलाव ले आए. टिपटौप बहू के साथ वह भी आधुनिक बन जाए. वह बहू के साथ जींसशर्ट पहन कर कदम से कदम मिला कर चले और 2 पीढि़यों का भेद ही मिटा दे. लगेगा जैसे उम्र आगे बढ़ने के बजाय पीछे जा रही है और आप स्वयं को आउटडेटेड भी महसूस नहीं करेगी.

आजकल की लड़कियां आजकल चलने वाले कपड़े ही पहनेंगी. सिर्फ इसलिए कि उन की शादी आप के बेटे से हो गई, उन की सोच, उन का व्यक्तित्व और पसंद बदल नहीं जाएगी. बेहतर है, आप उन्हें अपना पहनावा चुनने की और पहनने की आजादी दें. उन पर कोई दबाव न बनाएं. यदि आप को उन का पहनावा पसंद आ रहा है तो खुल कर तारीफ करें और यदि नहीं आ रहा है तो मुंह बनाने या ताने मारने जैसी छोटी हरकतें तो बिलकुल न करें. वह आप की बहू है, उसे उस की पसंदनापसंद के साथ पूरे प्यार से स्वीकार करें. यह कदम आप के रिश्तों में मिठास घोल देगा.

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औरतें सजावटी गुड़िया नहीं

औरतों के बारे में मर्दों की खीज किस तरह की और कितनी गहरी है यह आधुनिक, तकनीक में सब से आगे, सब से अमीर देश अमेरिका के राष्ट्रपति के महान बोल से साबित होता है. डैमोक्रेटिक पार्टी के जो बायडन द्वारा कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार चुनने पर ट्रंप जनाब ने बोला है कि कुछ पुरु ष इसे अपमानजनक मानेंगे. अमेरिका के व्हाइट हाउस में औरतें सिर्फ  सजावटी बनी रहें यह सोच आज भी अमेरिका में खूब फै ली हुई है और 2016 में हिलेरी क्लिंटन की हार के पीछे उन का एक औरत होना ही था.

कमला हैरिस एक दक्षिण भारतीय मां और जमैका के मूल अफ्र ीकी वंश के पिता की बेटी हैं और पहले खुद राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल थीं पर जब लगा कि यह हो नहीं पाएगा तो जो बायडन के पक्ष में बैठ गई थीं. कैलीफ ोर्निया में कई सालों तक अटौर्नी जनरल और कई सालों तक सीनेटर रहीं कमला हैरिस को अमेरिकी गोरे कट्टरपंथी ऐसी ही पसंद नहीं करेंगे जैसे हमारे यहां 2013 में सुषमा स्वराज को योग्य होते हुए भी भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाया.

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हमारा देश और डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका फि लहाल एक ही से रास्ते पर चल रहे हैं और तभी इसी साल भारत के अहमदाबाद में डोनाल्ड ट्रंप का भारी भीड़ ने स्वागत करते हए नारे लगाए थे कि एक बार फि र ट्रंप सरकार. कमला हैरिस में भारतीय खून है पर फि र भी अपने को भारतीयों में श्रेष्ठ समझने वाले शायद इसी कारण एक बार फि र गोरे कट्टरपंथियों के साथ डोनाल्ड ट्रंप को वोट दें. वहां भारतीय मूल के अमेरिकी चाहे गुणगान भारतीय कट्टरपंथी रीतिरिवाजों का करते रहें, वे दोयम दरजे नागरिक होते हुए भी  ऊंचों, अमीरों, गोरों की चरणवंदना करते रहते हैं और उन्हें अमेरिका के बराबरी की मांग करने वाले कालों, लैटिनों, औरतों के ग्रुप नहीं भाते.

कमला हैरिस अपना भारतीयन बहुत कम दिखाती हैं और खुद का विशुद्ध अमेरिकी ही मानती हैं पर फिर भी कुछ लगाव तो उस देश से होता ही है जहां की मिट्टी से कुछ संबंध हो. नरेंद्र मोदी के लिए जो बायडन के जीतने पर कुछ दिक्कत होगी क्योंकि वे खुल्लमखुल्ला रिपब्लिकन ऐजेंडे का समर्थन कर चुके हैं, जिस में चीन से 2-2 हाथ भी करने हैं.

अमेरिका की यह खासीयत है कि उस ने हाल में ही अमेरिका में आए योग्य लोगों को भी खुले दिल से अपनाया है. वहां रेसिज्म है, बहुत है, पर फि र भी उदार लोगों की भी कमी नहीं है जो गोरों, कालों, भूरों, पीलों के मर्दों को निरर्थक मानते हैं और जो जैंडर से ऊ पर हैं.

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अगर डैमोक्रेटिक उम्मीदवार 3 नवंबर को होने वाले चुनाव में जीतते हैं तो पटाखे भारत में भी फूटने चाहिए कि एक संपूर्ण देशी मां की बेटी उपराष्ट्रपति बन गई हैं. देश को चाहे आर्थिक या व्यावसायिक लाभ न हो पर फि र भी थोड़ी इज्जत तो बढ़ेगी और इस का असर हमारी कट्टरपंथी राजनीति पर भी पड़ेगी.

एक छत के नीचे: महीनेभर बाद घर पहुंची तरु के साथ क्या हुआ?

Serial Story: एक छत के नीचे (भाग-2)

पूर्व कथा

बेटी सोनिया व पति मिलन के साथ तरु की जिंदगी सामान्य गुजर रही होती है. भाभी के उपकारों का बोझ कुछ हलका करने के लिए तरु अपनी भतीजी निक्की को गांव से शहर ले आती है. इस पर सास ससुर ही नहीं, पति भी तरु से नाराजगी प्रकट करते हैं. सासससुर की सुनने की आदी तरू मिलन को समझा लेती है और वे निक्की को घर का सदस्य मान लेते हैं.

तरु  अब सोनिया की ही नहीं, निक्की की भी मां होती है. शुरूशुरू में निक्की किसी से बात नहीं करती थी. जब तक मैं कालेज से वापस न लौटती, वह एक ही कमरे में दुबकी रहती. सोनिया उसे खूब चिढ़ाती. एक दिन ऐसे ही सोनिया ताली पीटपीट कर निक्की को चिढ़ा रही थी. निक्की कभी मिलन को देखती, कभी मुझे निहारती. मिलन ने प्यार से जैसे ही निक्की को अपने पास बुलाया, वह उन के गले में झूल गई थी. समय गुजरा और सोनिया की शादी हो गई. वह ससुराल चली जाती है. इधर, तरु कालेज की नौकरी छोड़ कर समाज सेवा करने में व्यस्त हो जाती है. इस बीच, मिलन को एहसास होता है कि तरु उन को समय नहीं दे पा रही है. जब तरु उन से कहती कि निक्की तो उन की देखभाल कर लेती है तो वे कहते कि…रात में…

अब आगे…

पिछली बार जब निक्की को वायरल हुआ था तो मैं ने सुबह उठ कर भवानी से घर को साफसुथरा करवाया. फिर निक्की के लिए दलियाखिचड़ी तैयार कर के घर से निकल रही थी कि मिलन ने मुझे रोक लिया था.

‘आज मत जाओ तरु. रुक जाओ. निक्की को अच्छा लगेगा.’

‘थोड़ी देर में लौट आऊंगी.’ मिलन सब कामों को ताक पर रख कर मिलनेजुलने वालों से किनारा कर के निक्की के आसपास ही मंडराते रहते थे. उसे अपने हाथ से खिलाते, जूस पिलाते. उस वक्त उन की छवि एक ममतामयी मां की बन गई थी. निक्की अल्हड़ता से उन की गरदन में हाथ डाल कर झूल जाती.

‘अंकल, आप तो बढ़ी हुई दाढ़ी में भी हैंडसम लगते हैं. बिखरेबिखरे बाल, ढीलाढाला कुरतापाजामा. आप तो बिलकुल मेरे पापा बन जाते हैं.’

‘मेरे पापा बनने पर शक है क्या तुम्हें?’ मिलन नाराजगी प्रकट करते. निक्की पहले से ज्यादा गुमसुम रहने लगी थी. एक बार भी मेरे मन में यह खयाल नहीं आया कि उस के साथ कोई ऊंचनीच तो नहीं हो गई? मैं इस बिन बाप की बच्ची की मांबाप, भाईबहन सबकुछ तो थी. कितने जतन से उसे संभालती आई थी. उस के ही दायरे में बंधे, उस के इर्दगिर्द घूमते हुए, पलपल उसे बढ़ते देख, उस की छोटीछोटी गतिविधियों का अवलोकन करते हुए न जाने मेरा कितना समय बीत गया. अपने बारे में सोचने का खयाल, कभी अवचेतन तक में भी नहीं आया.

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बरसात थमे अभी थोड़ा ही वक्त हुआ था, लेकिन बादलों के काले गोले, अभी भी नीले आकाश में तैर रहे थे. खिड़की से आने वाली हवा सिहरन पैदा कर रही थी. मिलन कमरे में लौट आए थे. मैं ने घड़ी की तरफ देखा. 10 बज चुके थे. भवानी काम निबटा कर लौट गई थी. शाम को मैं ने उसे जल्दी आने के लिए कह दिया था. इतने दिनों बाद सोनिया आ रही थी. उस की मनपसंद चीजें तैयार करनी थीं.

अचानक मिलन ने मेरी पीठ पर हाथ रख कर मुझे अपने करीब खींचा तो मैं उन से छिटक कर दूर जा खड़ी हुई. क्रोध के आवेश में होंठ थरथराने लगे. दिमाग की शिराएं तन गईं.

‘‘कब से चल रहा है यह सब?’’ मैं ने घृणा भरी नजर मिलन पर डाली.

‘‘क्यों? क्या किया है मैं ने? कुछ कहोगी भी या यों ही पहेलियां बुझाती रहोगी.’’

‘‘निक्की की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करते हुए तुम्हें शरम नहीं आई?’’ मैं विद्रोह करने पर उतारू थी.

‘‘यह क्या बकवास है. शरम आनी चाहिए तुम्हें ऐसी बेहूदा बातें करते हुए,’’ मिलन का स्वर सख्त हो उठा.

‘‘जब तुम्हें बेहूदा हरकत करने में शरम नहीं आई तो मुझे कहने में शरम क्यों आएगी?’’ मैं गुस्से से बोली, ‘‘औरत की नजर बहुत तेज होती है पुरुष की अच्छीबुरी नजर पहचानने में. और पत्नी पति की नजर न पहचाने, यह असंभव है. तुम्हारी नजरें बता रही हैं कि तुम कितना सच बोल रहे हो.’’

‘‘तुम मुझ पर तोहमत लगा रही हो,’’ मिलन ने प्रतिवाद किया.

‘‘मिलन, मैं ने किसी और से सुना होता तो कतई विश्वास नहीं करती. मैं ने खुद तुम दोनों को रंगेहाथों पकड़ा है.’’

‘‘चुप हो जाओ तरु. लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे. हर जगह बदनाम हो जाऊंगा मैं.’’ मिलन के स्वर में गिड़गिड़ाहट थी. वे अपराधी बने मेरे सामने खड़े थे. मेरा सारा शरीर अपमान की ज्वाला में तप रहा था. अपने भीतर की उथलपुथल शांत करने के लिए मैं ने उन से पुन: अपना प्रश्न दोहराया.

‘‘इस सब की शुरुआत कब हुई थी, मिलन?’’

‘‘तुम्हारे जाने के बाद निक्की उदास हो जाती थी, बेहद उदास. मैं जरा सी पूछताछ करता तो वह रो पड़ती. तरु, तुम्हें याद होगा, जब भूकंप पीडि़तों की सहायता के लिए तुम सप्ताह भर के लिए भुज गई थीं, निक्की उन दिनों मेरा पूरा ध्यान रखती थी. मेरे खानेपीने से ले कर मेरे कपड़ों की व्यवस्था के प्रति वह पूर्ण सजग रहती. थकीहारी निक्की के चेहरे पर मैं ने कभी तनाव की रेखा नहीं देखी थी. हमेशा मधुर मुसकान ही देखी थी.

‘‘उन्हीं दिनों मुझे 2 दिन के लिए गुवाहाटी जाना पड़ा. निक्की ने मेरा सामान व्यवस्थित किया. फिर रसोई में जा कर मेरे लिए लड्डू और मठरी बनाने लगी. पसीने से तरबतर निक्की को मैं जबरन अपने कमरे में ले आया और एअरकंडीशनर चला दिया. उस ने मेरे हाथ, अपनी पसीने से भीगी हुई हथेलियों में कस कर भींच लिए, फिर बोली, ‘अंकल, आप के जाने के बाद मैं बहुत अकेली हो जाऊंगी.’

‘‘ ‘2 दिन की बात है. मैं भवानी से कह दूंगा. तुम्हारे पास रात को सो जाएगी.’

‘‘मैं ने उसे ढाढ़स बंधाया, लेकिन उस का मन बहुत बेचैन था. मैं उसे पुचकारता रहा, सहलाता रहा और अपनापन जताता रहा. वह चुपचाप लेटी रही. उस की आंखें, उनींदी हो कर झपकने लगी थीं. मैं काफी देर तक उसे चूमता रहा. न जाने उस के भीतर क्या हुआ. उस की आंखें बंद हो गईं और मैं देर तक उस की गरम सांस अपनी छाती और गले पर महसूस करता रहा. उस की इस निकटता का मुझ पर ऐसा अजीब प्रभाव पड़ा कि मैं धीरेधीरे संयम खोता चला गया और फिर…’’

मुझे याद आया सहज ही अनैतिक संबंध हो जाने के 2 मुख्य कारण होते हैं. आवश्यकता और उपलब्धता. पत्नी की अनुपस्थिति से उपजी मिलन की भूख, जिस की सहज पूर्ति, अकेलेपन के कारण निक्की की उपलब्धि से हो गई. निक्की की छोटीबड़ी आवश्यकताओं को दूर करतेकरते मिलन न जाने कब निक्की की भावनाओं में बसते चले गए. निक्की भी उम्र के इस दौर पर पहुंच चुकी थी, जब शरीर कुछ अपेक्षाएं करने लगता है. ये नैसर्गिक इच्छाएं अकेले में मिलन से मिलते ही साकार रूप ले कर उस के सामने खड़ी हो जाती होंगी. हम दोनों के बीच अबोला सा ठहर गया था. सोनिया के सामने हम दोनों सामान्य बने रहते, लेकिन उस की गैरमौजूदगी में एकएक पल काटना भारी लगता था मुझे. सामान्य मनोदशा ठीक न होने के बावजूद सामान्य बने रहने का नाटक करना कितना कठिन होता है, यह तो भुक्तभोगी ही जानता है.

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सोनिया की कौन्फ्रैंस समाप्त हो गई. उस के लौटने का समय नजदीक आ गया. मिलन ने इन दिनों दफ्तर से अवकाश ले लिया था. एक दिन सोनिया ने लंबाचौड़ा प्रोग्राम बना लिया था. पहले जी भर कर किसी मौल में खरीदारी, फिर किसी होटल में लंच. इतनी बड़ी हो गई, लेकिन फिर भी उस का बचपना नहीं गया. मैं ने निक्की को फोन कर बुला लिया था.

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