Serial Story: टीस (भाग-1)

‘‘गाड़ी के स्पार्क प्लग तो ठीक से लगा नहीं सकता और ख्वाब देख रहा है इंजीनियर बनने के,’’  साहिल को बेटे पर झुंझलाते देख कर रहिला मुसकरा पड़ी, तो साहिल और झुंझला उठा.

‘‘इस में मुसकराने वाली क्या बात है?’’ उस ने पूछा.

‘‘वैसे ही कुछ याद आ गया. इस वर्ष दिल्ली के जिस मशहूर न्यूरो सर्जन डा. गुलाम रसूल को पद्मविभूषण मिला है न वह बचपन में मेरा पड़ोसी था. एक बार बावर्ची के न आने पर चाचीजान ने रसूल को मछली साफ कर काटने को कहा तो वह कांपते हुए मछली ले कर मेरे पास आया. मिन्नतें कर के मुझ से मछली कटवाई और आज देखो कितना सफल सर्जन है.’’

‘‘अचानक इतनी हिम्मत कैसे आ गई?’’

‘‘पता नहीं, क्योंकि तब तो अब्बू का तबादला होने की वजह से रसूल के परिवार से तअल्लुकात टूट गए थे. फिर जब दोबारा लखनऊ आने पर मुलाकात हुई तो पता चला कि रसूल पीएमटी की तैयार कर रहा है. उस की अंगरेजी हमेशा कमजोर रही, इसलिए उस ने मिलते ही मुझ से मदद मांगी.’’

‘‘और तुम ने कर दी?’’

‘‘हां, बचपन से ही करती आई हूं. अंगरेजी में वह हमेशा कमजोर रहा. पीएमटी तो अच्छे नंबरों से पास कर ली और लखनऊ मैडिकल कालेज में दाखिला भी मिल गया, लेकिन अंगरेजी कमजोर ही थी. अत: रोज अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ कर मैं उसे अंगरेजी बोलना सिखाती थी.’’  तभी फोन की घंटी बजी और बात वहीं खत्म हो गई. आज उसी बात को  याद कर के साहिल रहिला से कह रहा था कि वह उस के बौस के परिवार के साथ दिल्ली जाए और डा. गुलाम रसूल से अपने संपर्क के बल पर तुरंत अपौइंटमैंट ले कर बौस का औपरेशन करवा दे.  साहिल के बौस जनरल मैनेजर राजेंद्र को फैक्टरी में ऊंचाई से गिरने के कारण रीढ़ की हड्डी में गहरी चोट लगी थी. डाक्टरों ने तुरंत किसी कुशल सर्जन द्वारा औपरेशन करवाने को कहा था, क्योंकि देर और जरा सी चूक होने पर वे उम्र भर के लिए अपाहिज हो सकते थे.

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इस समय सब की जबान पर पद्मविभूषण डा. गुलाम रसूल का ही नाम था. लेकिन वे केवल जटिल औपरेशन ही करते थे. औपरेशन करने में 7-8 घंटे लग जाते थे. मरीज को होश आने के बाद ही घर जाते थे. फिर थकान उतरने के बाद ही दूसरा औपरेशन करते थे. इसीलिए उन से समय मिलना बहुत मुश्किल होता था.

‘‘इतने वर्षों बाद पद्मविभूषण डा. गुलाम रसूल को रहिला की कहां याद होगी…’’

‘‘क्या बात कर रही हो रहिला, अपनी इतनी मदद करने वाली बचपन की दोस्त को कौन भूल सकता है?’’ साहिल ने बात काटी.

‘‘मदद याद होती तो तअल्लुकात ही क्यों बिगड़ते?’’ रहिला के मुंह से अचानक निकला.

‘‘मतलब? कुछ रंजिशवंजिश हो गई थी?’’ साहिल ने कुरेदा.

रहिला ने इनकार में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘नहीं, हमेशा की तरह अचानक वहां से अब्बू का तबादला हो गया था. न रसूल के परिवार ने हमारा बरेली का अतापता मांगा न हम ने दिया. मुद्दत के बाद अखबार में उसे पद्मविभूषण मिलने की खबर से पता चला कि वह दिल्ली में है…’’  ‘‘अब जब पता चल ही गया है तो उस का फायदा उठा कर राजेंद्र और उन के परिवार को नई जिंदगी दिलवा दो रहिला. अभी उन की उम्र ही क्या है… नौकरी में तरक्की मिलने वाली है… सही इलाज न हुआ तो सब खत्म हो जाएगा… उन के मासूम बच्चों और बीवी के बारे में सोचो. उन से तो तुम्हारी अच्छी दोस्ती है रहिला.’’

‘‘सवाल दोस्ती का नहीं इनसानियत का है साहिल और मैं नहीं समझती कि डा. गुलाम रसूल जैसे आदमी से इनसानियत की उम्मीद करनी चाहिए. मिलना तो दूर की बात है वह मुझे फोन पर पहचानेगा भी नहीं. उस पर समय बरबाद करने के बजाय इंटरनैट पर किसी दूसरे न्यूरो सर्जन की तलाश करते हैं.’’  ‘‘कर रहे हैं भई, मगर ट्रैक रिकौर्ड गुलाम रसूल का ही सब से बढि़या है. तुम एक बार उन्हें फोन कर के तो देखो,’’ साहिल ने आजिजी से कहा.

‘‘बगैर नंबर के?’’

‘‘यह सुनते ही कि तुम उन्हें जानती हो राजेंद्रजी की पत्नी सारिका ने डा. रसूल का मोबाइल, दिल्ली के घर का लैंडलाइन नंबर और पता मंगवा लिया है. अगर तुम ने फोन करने में देर की तो सारिका खुद आ जाएंगी तुम से मदद मांगने… अच्छा लगेगा तब तुम्हें?’’  रहिला सिहर उठी. बौस की बीवी होने के बावजूद सारिका का व्यवहार हमेशा उस से सहेली जैसा था. ‘अपने अभिमान और स्वाभिमान को ताक पर रख कर सारिका की खातिर रसूल की अवहेलना एक बार और सहन करना तो बनता ही है,’ सोच उस ने नंबर मिलाया. स्विच्ड औफ था.

घर पर फोन नौकर ने उठाया, ‘‘डाक्टर साहब औपरेशन थिएटर से बाहर आने के बाद ही मोबाइल खोलते हैं. आप मोबाइल पर ही कोशिश करती रहें. घर कब आएंगे मालूम नहीं.’’

‘‘तो तुम कोशिश करती रहो और जैसे भी हो उन्हें राजेंद्रजी का इलाज करने को मना लो. सवाल मेरी नौकरी का नहीं इनसानियत का है रहिला.’’

‘‘नौकरी तो तुम्हारी राजेंद्रजी की हालत ने और भी पक्की कर दी है. तुम ही तो संभालोगे उन की जिम्मेदारी. अत: अब सवाल हमारी नैतिकता और ईमानदारी का भी है साहिल. हमें उन का सही इलाज करवाना होगा. सोच रही हूं रसूल को कैसे घेरा जाए.’’

‘‘सोचो, मैं तब तक अस्पताल जा कर सारिका को तसल्ली देता हूं,’’ कह कर साहिल रहिला को यादों के भंवर में डूबनेउबरने के लिए छोड़ कर चला गया…  गुलाम रसूल से बचपन में तो प्यार नहीं था, लेकिन कालेज में लड़कियों से  प्यारमुहब्बत के किस्से सुनते हुए लंबा, छरहरा रसूल अपने सपनों का राजकुमार लगने लगा था और एक रोज रसूल ने यह पूछ कर कि तुम्हारे इंगलिश लिटरेचर में मेरे जैसा हैंडसम हीरो है कोई? और उस के क्यों पूछने पर यह कह कर क्योंकि तुम लड़कियों की पसंद किताबी हीरो के इर्दगिर्द ही घूमती है, उस की सोच को हकीकत में बदल दिया था और वह सपनों की रोमानी दुनिया में विचरने लगी थी.  पढ़ाई के बढ़ते बोझ ने उन का मिलनाजुलना कम कर दिया था और फिर रसूल होस्टल में रहने चला गया था. जब भी घर आता था तो उस से मिलता जरूर था. लेकिन जैसे औपचारिकता निभाने को. रहिला को एमए करते ही कालेज में लैक्चरर की नौकरी मिली ही थी कि गुलाम रसूल का रिजल्ट भी आ गया. वह भी डाक्टर बन गया था.

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Serial Story: टीस (भाग-2)

‘‘क्यों न इन दोनों की शादी कर दी जाए गुलाम अली?’’ अब्बू ने रसूल के वालिद से कहा था.

‘‘सही कह रहे हो शम्शुल हक. लाजवाब जोड़ी रहेगी डाक्टर और प्रोफैसर की. मैं रसूल और उस की अम्मी को अभी बताता हूं. कल पीर के मुबारक दिन पर महल्ले में शीरनी बंटवा देंगे?’’

अगले रोज अब्बू के पूछने पर कि शीरनी मंगवाएं, गुलाम अली ने टालने के लहजे में कहा कि रसूल अभी शादी के लिए तैयार नहीं है. एमडी करने के बाद सोचेगा.  ‘‘तो अभी शादी करने को कह कौन रहा है? रहिला को भी एमफिल करनी है. जब तक रहिला की एमफिल पूरी होगी तब तक रसूल भी एमडी कर के शादी के लिए तैयार हो जाएगा.’’

‘‘लेकिन अपने मुकाबले की डाक्टर लड़की से स्कूलकालेज में पढ़ाने वाली से नहीं. गुलाम रसूल को तो यह डाक्टरप्रोफैसर की जोड़ी बनाने वाली बात ही एकदम बचकानी लगी,’’ गुलाम अली ने व्यंग्य से कहा.

अब्बू को ही नहीं रहिला को भी यह बात सरासर अपनी काबिलीयत की तौहीन लगी थी. दोनों परिवारों में तअल्लुकात ठंडे होने शुरू हो गए थे और इस से पहले कि और बिगड़ते, हमेशा की तरह अचानक अब्बू का तबादला हो गया. जल्द ही उन्होंने रहिला के लिए इंजीनियर साहिल तलाश कर लिया…  तभी साहिल और सारिका आ गए.

‘‘डा. रसूल को फोन लगाओ रहिला, मेरे भाई का दिल्ली से फोन आया है कि डाक्टर साहब औपरेशन थिऐटर से बाहर आ गए हैं,’’ सारिका ने उतावली से कहा.  रहिला ने स्पीकर औन कर के नंबर मिलाया. दूसरी ओर से बहुत ही थकी सी आवाज में किसी ने हैलो कहा. रहिला आवाज पहचान गई.

‘‘सुनिए, मैं रहिला बोल रही हूं, रहिला शम्श…’’

‘‘बोलो रहिला,’’ थकी आवाज में अब चहक थी, ‘‘शम्शवम्श लगाने की क्या जरूरत है…’’

‘‘सोचा शायद रहिला नाम से न पहचानो, बड़ी परेशानी में फोन कर रही हूं… किसी की जिंदगी का सवाल है,’’ और एक ही सांस में रहिला ने सारी बात बता दी.

‘‘लेकिन ऐसे मरीज को भोपाल से दिल्ली कैसे लाओगी?’’

‘‘एअर ऐंबुलैंस से डाक्टर साहब,’’ साहिल बोला, ‘‘औन ड्यूटी ऐक्सीडैंट हुआ है. अत: कंपनी ने एअरऐंबुलैंस की व्यवस्था करवा दी है.’’

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‘‘तो लाने में देर मत करिए… ऐंबुलैंस में जो डाक्टर साथ आएंगे उन से मेरी बात करवा दीजिए… मैं यहां भी अपने स्टाफ को सभी जरूरी हिदायतें दे देता हूं कि पहुंचते ही मरीज को इमरजैंसी में शिफ्ट कर दें और फैमिली को रूम दे दें ताकि आप को कोई परेशानी न हो… आप बेफिक्र हो कर मरीज को ले आएं,’’ कह कर डा. गुलाम रसूल ने फोन काट दिया.

साहिल और सारिका तो खुशी से उछल पड़े, लेकिन रहिला एक बार फिर अपनी अवहेलना से तिलमिला गई. बगैर उस से कुछ कहे फोन काट देना सरासर उस की बेइज्जती थी.

‘‘आप घर जा कर दिल्ली चलने की तैयारी करिए,’’ साहिल ने सारिका से कहा, ‘‘मैं अस्पताल जा कर साथ चलने वाले डाक्टर की डा. रसूल से बात करवाता हूं और रहिला, तुम भी अपना सामान पैक करो दिल्ली जाने को.’’

‘‘मैं…मैं दिल्ली जा कर क्या करूंगी? जितनी बात की जरूरत थी कर ली…’’

‘‘अभी बहुत बातों की जरूरत है रहिला और उस से भी ज्यादा मुझे तुम्हारे साथ की जरूरत है. तुम्हारे साथ चलने से मुझे बहुत सहारा रहेगा,’’ सारिका ने रहिला के साथ पकड़ लिए.

रहिला उसे मना नहीं कर सकी और फिर जाने की तैयारी करने लगी.

‘‘रहिला, साथ चलने वाले डाक्टर से डाक्टर रसूल की बात हो गई  है. उन्होंने डाक्टर को समझा दिया है कि उड़ान में क्या सावधानियां बरतनी जरूरी हैं और यह भी कहा है बेफिक्र हो कर आइए, आप मेरे मेहमान हैं,’’ साहिल ने कुछ देर के बाद आ कर कहा.

‘‘तो फिर मेरे जाने की तो जरूरत ही नहीं रही साहिल…’’

‘‘जरूरत और भी बढ़ गई है शुक्रिया करने को… राजेंद्रजी का औपरेशन कई घंटे तक चलेगा. उस दौरान सारिका को संभालने को भी तो कोई होना चाहिए.’’

‘‘अस्पताल में मरीज के पास तो सारिका ही रह सकती हैं, मैं कहां रहूंगी?’’

‘‘अस्पताल के सामने ही एक गैस्टहाउस है, वहां पर कंपनी की ओर से कमरे बुक करवा दिए हैं. यहां से कंपनी की जनसंपर्क अधिकारी अनिता भी तुम्हारे साथ जा रही हैं और वित्त विभाग के जितेंद्र सिंह भी. दोनों को ही तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो.’’

रहिला ने राहत की सांस ली.  ‘‘इतने लोगों को ऐंबुलैंस में बैठने देंगे?’’

‘‘सिर्फ सारिकाजी को. तुम, अनिता और जितेंद्र शाम की फ्लाइट से जा रहे हो.’’

जब रहिला अस्पताल पहुंची तो राजेंद्रजी को इमरजैंसी में ऐडमिट करवा कर सारिका अपने भाई सलिल के साथ रूम में थी. दोनों भाईबहन एक स्वर में डा. रसूल के गुण गा रहे थे कि कितनी आत्मीयता से मरीज के बिलकुल ठीक हो जाने का आश्वासन दिया और उन लोगों के रहने, खाने के बारे में पूछा.

‘‘मेरे बारे में तो नहीं पूछा न?’’ रहिला ने धड़कते दिल से पूछा.

‘‘इतना समय ही कहां था उन के पास.’’

‘हां, वक्त तो मेरे पास ही खाली रहा है हमेशा कभी उसे पढ़ाने को तो कभी कोई खुशामद करने को,’ रहिला ने कड़वाहट से सोचा, ‘सारिका के साथ उस का भाई है. अत: कल औपरेशन होते ही वापस चली जाऊंगी.’  देर शाम रहिला भी सारिका के साथ औपरेशन थिएटर के बाहर खड़ी थी कि तभी थिएटर का दरवाजा खुला और डाक्टर के परिधान में रसूल बाहर आया. दोनों की नजरें मिलते ही रसूल की आंखों में पहचान की चमक उभरी, लेकिन अगले ही पल वह सारिका की ओर मुड़ा, ‘‘मैं ने चोट का मुक्कम्मल इलाज कर दिया है, अब आप ने सही तीमारदारी की तो जल्द ही आप के शौहर अपनी पुरानी फौर्म में लौट आएंगे. उन के आईसीयू में जाने से पहले आप उन्हें पल भर को देख लीजिए और फिर खुद भी आराम कीजिए. मरीज की देखभाल के लिए आप का चुस्तदुरुस्त रहना बेहद जरूरी है.’’

‘‘आप का बहुतबहुत शुक्रिया डाक्टर…’’

‘‘शुक्रिया मेरा नहीं…’’ रसूल ने बात काटी और इस से पहले कि रहिला समझ पाती वह उस की ओर देख रहा था या छत की ओर एक नर्स ने सारिका को अंदर जाने का इशारा किया. रहिला भी लपक कर उस के पीछे जाने लगी.

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‘‘अंदर सिर्फ मरीज की बीवी जा सकती है, तुम नहीं,’’ रसूल ने उसे रोका, ‘‘वैसे तुम ठहरी हुई कहां हो?’’

‘‘सामने वाले गैस्टहाउस में.’’

‘‘दैन गो देयर, यहां भीड़ लगाना मना है,’’ और रसूल तेज कदमों से आगे बढ़ गया.

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दुल्हन बनने की तैयारी कर रहीं ‘नागिन 3’ स्टार का हुआ ब्रेकअप, पढ़ें खबर

खतरों के खिलाड़ी सीजन 10 का खिताब जीतने वाली एक्ट्रेस करिश्मा तन्ना पर्सनल लाइफ को लेकर अक्सर सुर्खियों में छाई रहती हैं. बीते साल नागिन 3 फेम एक्ट्रेस अपने को स्टार पर्ल वी पुरी के साथ रिलेशनशिप को लेकर खबरों में छाई रहती थीं. दोनों को अक्सर क्वौलिटी टाइम बिताते हुए देखा गया है. हालांकि वह एक-दूसरे को अपना अच्छा दोस्त बताते थे. लेकिन अब खबरें हैं कि दोनों का ब्रेकअप हो गया है. आइए आपको बताते हैं क्या है सच…

ब्रेकअप की खबरों में छाईं करिश्मा

ताजा मिल रही खबरों की माने तो करिश्मा तन्ना और पर्ल वी पुरी का ब्रेकअप हो गया है. हाल ही में एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2 महीने पहले ही करिश्मा तन्ना और पर्ल वी पुरी ने एक दूसरे से अलग होने का फैसला किया है. वहीं यह भी कहा जा रहा है कि करिश्मा तन्ना, पर्ल वी पुरी को 5 साल से जानती हैं लेकिन नागिन 3 में संग काम करने के दौरान इन दोनों के अफेयर की खबरें आम हो गई थीं और वह इस रिलेशनशिप के दौरान पर्ल वी पुरी के काफी क्लोज आ गई थीं.

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शादी करना चाहती थीं करिश्मा

खबरों की मानें तों पर्ल वी पुरी के साथ करिश्मा तन्ना अपने इस रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहती थीं. करिश्मा ने पर्ल वी पुरी से शादी करने की बात की थी. जबकि करियर के इस मोड़ पर पर्ल वी पुरी शादी नहीं करना चाहते. जिसकी वजह से करिश्मा तन्ना ने पर्ल वी पुरी का साथ छोड़ दिया. मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो करिश्मा तन्ना को पर्ल वी पुरी के साथ अपना उज्लव भविष्य नहीं नजर आ रहा है. जिसकी वजह से उन्होंने इतना बड़ा कदम उठा लिया.

 

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बता दें, इससे पहले रियलिटी शो बिग बौस में भी वह अपने रिलेशनशिप को लेकर सुर्खियों में छाई थीं. पर्ल वी पुरी से पहले करिश्मा तन्ना बॉलीवुड एक्टर उपेन पटेल को भी डेट कर रही थीं, जिनसे उनकी मुलाकात बिग बॉस के घर में हुई थी, लेकिन शो खत्म होने के बाद इन दोनों की राहें अलग हो गई थीं. हालांकि दोनों के ब्रेकअप की वजह सामने नही आई थीं.

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‘कसौटी जिंदगी के 2’ को रिप्लेस करेगा ‘साथ निभाना साथिया 2’! जानें क्या है सच

टीवी क्वीन एकता कपूर अपने सीरियल्स के लिए जानी जाती हैं. लेकिन बीते दिनों उनका सीरियल ‘कसौटी जिंदगी के 2’ सुर्खियों में बना हुआ है. दरअसल, शो की कहानी के अलावा लीड एक्टर पार्थ समथान के कोरोना पौजिटिव निकलने के बाद जहां ताला लग गया था तो वहीं कुछ किरदारों के इस सीरियल को छोड़ने की खबरों से भी टीआरपी पर असर पड़ा था, जिसके बाद खबरें हैं की शो पर ताला लगने जा रहा है. आइए आपको बताते हैं क्या है मामला…

नवंबर में शो पर लगेगा ताला

बीते दिनों खबरें थीं कि एकता कपूर के सीरियल ‘कसौटी जिंदगी के 2’ की गिरती टीआरपी के कारण इसे बंद करने का फैसला लिया जा रहा है. वहीं अब बताया जा रहा था कि नवंबर में ‘कसौटी जिंदगी की 2’ पर ताला लग जाएगा, जिसके चलते फैंस को झटका लगने वाला है. हांलांकि अब कहानी का फोकस एरिका फर्नांडिस और पार्थ समथान की तरफ किया जाएगा. साथ ही करण पटेल और आमना शरीफ भी शो का एक अहम हिस्सा ही रहेंगे. वहीं इन बदलावों के साथ ही ‘कसौटी जिंदगी की 2’ को देर रात में ऑन एयर किया जाएगा.

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ये सीरियल कर सकता है रिप्लेस  

‘कसौटी जिंदगी के 2’ के बंद होने की खबरों के बाद कहा जा रहा है कि रिप्लेसमेंट के तौर पर ‘साथ निभाना साथिया सीजन 2’ को ऑन एयर करने की प्लॉनिंग की जा रही है. दरअसल, खबरों की माने तो सीरियल ‘कसौटी जिंदगी की 2’ के टाइम स्लॉट पर ‘साथ निभाना साथिया सीजन 2’ को ऑन एयर किया जाएगा. वहीं ‘कसौटी जिंदगी की 2’ के खत्म होते ही गोपी बहू अपने नए सफर की शुरुआत करेगी.

बता दें, हाल ही में साथ निभाना साथिया 2 के मेकर्स ने एक नया प्रोमो शेयर किया था , जिसमें गोपी बहू यानी देवोलिना भट्टाचार्जी नजर आईं थीं.

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आप भी अपने हुनर को दीजिए व्यवसाय का रूप

अक्सर कहा जाता है कि जिंदगी में कभी न कभी अवसर आपके दरवाजे पर दस्तक देता है अब उसे कैश करना या न करना आपके प्रयासों पर निर्भर करता है. ऐसा ही अवसर कोरोना के कारण मार्च में हुए लॉक डाउन में कुछ महिलाओं को प्राप्त हुआ .उस अवसर को इन्होंने अपनी मेहनत और लगन से कैश कराया और आज एक सफल आंत्रप्रेन्योर बन चुकीं है. आइये ऐसे ही कुछ उदाहरणों पर नजर डालते हैं-

एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका की नौकरी कर रहीं अस्मिता को लॉक डाउन में जब घर रहने का अवसर मिला तो अपने कुकिंग के शौक को पुनर्जीवित करने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ. अपनी सोसाइटी में ही उन्होंने इस दौरान कुछ मिठाइयां और स्नैक्स बनाकर लोंगो की आवश्यकतानुसार घर घर पहुंचाना प्रारम्भ कर दिया. गणेश चतुर्थी के दिन उन्होंने 200 मोदक बनाकर बेचे और गणेशोत्सव के 10 दिनों के दौरान उनके बनाये भांति भांति के मोदक और मिठाइयां न केवल उनकी सोसायटी बल्कि आसपास की सोसाइटीज़ के घरों में भी अपनी खुशबू बिखेर रहे हैं. लॉक डाउन ने उनकी जिंदगी को 360 डिग्री का टर्न दे दिया है और अब नौकरी को बाय बाय करके वे अपने साथ साथ 10 अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रहीं हैं.

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पुणे की माधवी ने भी लॉक डाउन में अपनी कुकिंग स्किल्स को निखारा और आज जब कि लोग होटल्स और रेस्टोरेंट में जाने से परहेज कर रहे हैं ऐसे में वे घर पर विविधता पूर्ण खाना नाश्ता बनाकर टेक अवे अर्थात पैक करके ले जाने का विकल्प प्रदान कर रहीं हैं. माधवी कहतीं हैं ,”मुझे हमेशा से कुकिंग में इंटरेस्ट रहा है और मैं इसी में कुछ करना चाहती थी और लॉक डाउन ने मुझे ये मौका दे ही दिया. आज मेरे पास आशा से अधिक ऑडर्स मिल रहे हैं, जिनको पूरा करके मुझे अपरिमित खुशी प्राप्त होती है.”
इसी प्रकार की कहानी है उज्जैन की अनीता की. कुछ वर्ष पूर्व तक अनीता कुकिंग क्लास चलातीं थीं. यू ट्यूब चैनल्स के अवतरण के बाद से उनकी क्लासेज मंद पड़ने लगीं. उन्होंने भी अपना चैनल प्रारम्भ किया पर उन्हें यह जम नहीं रहा था. तभी लॉक डाउन हो गया. अब जब कि शहर की सारी बेकरीज बंद थी तो कुछ परिचितों ने केक का आर्डर दिया बस यहीं से उनकी गाड़ी निकल पड़ी. लॉक डाउन में जब सब घरों में आराम कर रहे थे अनीता परिवार की मदद से केक के ऑडर्स पूरे करने में लगीं थीं और आज लॉक डाउन के 5 माह बाद उज्जैन शहर के लोग बड़ी दुकानों की अपेक्षा उनका केक लेना ही पसंद करते हैं क्योंकि उनके यहां के केक्स में क्वालिटी, वैरायटी, और साफ सफाई सब कुछ होता है. वे कस्टमर से उनकी थीम पूछकर केक बनातीं हैं. प्रतिदिन 20 से 25 केक बनाकर वे आज जानी मानी आंत्रप्रन्योर बन चुकीं हैं. यही नहीं आर्डर पर पिज्जा और अन्य मिठाइयां भी बनातीं हैं.

इनके अतिरिक्त कुछ और महिलाओं ने भी सिलाई, ऑनलाइन योग, ऑनलाइन काउंसिलिंग जैसे विविध क्षेत्रों में काम करके लॉक डाउन को एक खूबसूरत अवसर में बदलकर समाज को अपनी प्रतिभा से परिचित तो कराया ही है साथ ही कुछ धन अर्जित करके आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवार को आर्थिक रूप से सहयोग भी कर रहीं हैं. इनकी कहानी बताती है कि जुनून और मेहनत से कोई भी मुकाम पाया जा सकता है. घण्टों टी. वी. में आंखे गड़ाकर और अड़ोसी पड़ोसी महिलाओं के साथ, चुगली और पंचायत करने के स्थान पर आप भी अपने शौक और हुनर को कोई अंजाम दीजिए फिर देखिए आपके कदमों को कोई नहीं रोक सकता. आइए हम भी जानते हैं कि एक आंत्रप्रेन्योर कैसे बना जाता है-

-अपनी प्रतिभा को पहचानें

संसार में प्रत्येक इंसान के पास कोई न कोई हुनर अवश्य होता है बस आवश्यकता है उसे पहचानकर निखारने की. आज के समय की मांग के अनुसार अपने कौशल को व्यवसाय का रूप दें. आर्थिक आत्मनिर्भरता धनार्जन के साथ साथ आपके अंदर आत्मविश्वास का संचार भी करती है.

-लीडर बनें

अपने काम की कमान सदैव अपने हाथ में ही रखें. अपने सहकर्मियों से प्यार और विनम्रता का व्यवहार करें. सारे कार्यों को अपने ऊपर ही न ओढ़कर विकेंद्रीकरण करके अपने सुपरविजन में करवाएं. छोटे से छोटे कार्य पर अपनी बारीक नजर रखें क्योंकि अच्छे या बुरे के लिए उत्तरदायी सिर्फ आप ही हैं.

-इनोवेटिव बनें

आप जो भी कार्य प्रारम्भ करें. भेड़चाल में चलने की अपेक्षा समय और बाजार की मांग को पहचान कर उसमें अपना इनोवेशन अवश्य डालें क्योंकि आज प्रत्येक फील्ड में नएपन की ही दरकार है. यदि हो सके तो अपने क्षेत्र से सम्बंधित कोई कोर्स या क्लास जॉइन करें ताकि आपकी कला में और अधिक निखार आ सके.

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-समय और क्वालिटी का रखें ध्यान

समय की प्रतिबद्धता आपकी पंक्चुअलिटी और अपने कार्य के प्रति गंभीरता को प्रदर्शित करती है. समय पर ऑडर्स पूरा न होने पर ग्राहक असन्तुष्ट होता है और आपके प्रति विश्वास खो देता है. इसी प्रकार उत्पाद की क्वालिटी के साथ कोई समझौता कदापि न करें क्योंकि आज हर कोई उच्च गुणवत्ता वाली चीज ही लेना पसंद करता है.

-धैर्य रखें

किसी भी कार्य को प्रारम्भ करते समय तुरंत परिणाम की अपेक्षा न रखें. अपनी मेहनत, लगन और ईमानदारी पर भरोसा रखकर लगे रहें सफलता अवश्य मिलेगी. इसके अतिरिक्त ग्राहकों की मांग को पहचान कर अपने कार्य में निरंतर सुधार की प्रक्रिया को जारी रखें.
तो आप भी अपने हुनर को दीजिए व्यवसाय का रूप . शुरुआत भले ही छोटी सी हो मगर आपका आत्मसंतोष बहुत बड़ा होगा.

खान-पान में विटामिन सी को कभी न करें नज़रंदाज़, आइये जाने

विटामिन सी के फायदे के बारें में सभी जानते है, लेकिन प्रयाप्त मात्रा में विटामिन सी से कई प्रकार की बिमारियों से बचा जा सकता है, क्योंकि इसमें प्रचुर मात्रा में एंटी ओक्सिडेंट होते है, जिससे हड्डियों, मांसपेशियों और रक्त वाहिकाओं को मजबूती मिलती है. इस बारें में एड्रोईट बायोमेड प्राइवेटलिमिटेड के डायरेक्टर और एक्सपर्ट सुशांत रावराणे कहते है कि आम बिमारियों जैसे स्किन इन्फेक्शन, स्किन एलर्जी, पेट की समस्याएं, सर्दी-खांसी बुखार, बालों का झरना आदि के साथ-साथ अब कोरोना संक्रमण से बचना भी अब प्रायोरिटी हो चुकी है, ऐसे में इम्युनिटी को बूस्ट करना सबके लिए जरुरी हो गया है, इसे काफी हद तक कंट्रोल विटामिन सी को खान-पान में लेकर किया जा सकता है, इसलिए दैनिक खान-पान में विटामिन सी को शामिल करना अब जरुरी हो चुका है, क्योंकि बिमारियों से बचने का सबसे अच्छा तरीका रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना है.

हाल ही में बंगलुरु के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस(आईआईएसीसी) द्वारा की गयी एक अध्ययन में ये बात सामने आई है कि विटामिन सी माइकोबेक्टेरियम स्मैगमैंटिस नामक एक नॉन-पैथोजेनिक बेक्टेरिया को मार देता है, जिससे इन्फेक्शन का खतरा कम हो जाता है. शरीर को विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे इसके लिए ज़रूरी है रोज़ाना कम से कम 500 मिली ग्राम विटामिन सी का सेवन किया जाए. ऐसा करने से न केवल सर्दी-खांसी से शरीर बचा रहता है, बल्कि वायरस के द्वारा होनेवाले इन्फ़ेक्शन की संभावना भी कम होती है. बीमार पड़ने से कहीं बेहतर है, अपनी रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना. विटामिन सी के फायदे निम्न है,

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विटामिन सी से दीर्घकालीन बीमारियों यानि क्रोनिक डिज़ीज़ेस के ख़तरे को कम करता है

विटामिन सी एक शक्तिशाली ऐंटीऑक्सिडेंट है, जो आपके शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है. ऐंटी-ऑक्सीडेंट्स से हमारा इम्यूनिटी सिस्टम बेहतर होता है, जिससे सेल्स को फ्री रैडिकल्स नामक नुक़सानदेह मॉलिक्यूल्स से बचाया जा सकता है. जब ये फ्री रैडिकल्स जमा होते हैं, तो वे ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस पैदा करते हैं, जिसका संबंध कई क्रोनिक डिज़ीज़ेस यानि पुरानी बीमारियों से होता है. कई शोध यह बता चुके हैं पर्याप्त विटामिन सी का सेवन करने से ख़ून में ऐंटी-ऑक्सीडेंट्स की मात्रा क़रीब 30% तक बढ़ जाती है, जो शरीर को प्राकृतिक तरीक़े से बीमारियों से लड़ने के लिए तैयार करते हैं और शरीर में सूजन आने से रोकता है.

विटामिन सी शरीर के इम्यूनिटी सिस्टम को सुदृढ़ करता है

विटामिन सी युक्त चीज़ें खाने की सलाह इसलिए भी दी जाती हैं, क्योंकि इससे इम्यूनिटी बढ़ती है. विटामिन सी सबसे पहले वाइट ब्लड सेल्स (जिन्हें लिम्फ़ोसाइट्स और फ़ैगोसाइट्स कहा जाता है) के प्रोडक्शन को बढ़ाता है. इससे शरीर इन्फ़ेक्शन्स से लड़ने के लिए तैयार होता है. विटामिन सी वाइट ब्लड सेल्स को फ्री रैडिकल्स से होनेवाली क्षति से बचाता है, जिससे वाइट ब्लड सेल्स काफ़ी असरदार हो जाते हैं. यह भी देखने मिला है कि नियमित रूप से विटामिन सी का सेवन करनेवालों के घाव भी जल्दी भरते है.

त्वचा के साथ-साथ शरीर के ओवरऑल स्वास्थ्य के लिए लाजवाब है विटामिन सी 

त्वचा की फ्री रैडिकल्स को कम करने या ख़त्म करने के विटामिन सी के ऐंटी-ऑक्सीडेंट गुण सेकाफ़ी मदद मिलती है, पर त्वचा के लिए इसके लाभ यहीं तक सीमित नहीं हैं. जब विटामिन सी को त्वचा पर लगाया जाता है तब अपने एसिडिक गुणों के चलते यह कोलैजन और इलैस्टिक का प्रोडक्शन बढ़ा देता है, जिसकी वजह से त्वचा की हीलिंग प्रक्रिया तेज़ हो जाती है. इसमें कई तरह के वायरस और बैक्टीरियो को मारने की क्षमता होती है. खासकर मॉनसून में वायरस और बैक्टीरिया अधिक बढ़ जाता है, ऐसे में लगातार विटामिन सी का सेवन बढ़ाने से बीमारी से भी बचा जा सकता है.

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इसके अलावा यह ब्लड प्रेशर को कम करता है, बढती उम्र में त्वचा को स्वस्थ रखता है, मसूड़ों को भी स्वस्थ रखता है, इसलिए खान-पान में हमेशा नेचुरल विटामिन सी का प्रयोग करें, जिसमें नीबू, मौसंबी, अमरुद,संतरा, स्ट्राबेरी, ग्रेपफ्रूट आदि सभी फ्रेश फल में विटामिन सी की मात्रा अधिक होती है. इसे अपनी दिनचर्या में अवश्य शामिल करें.

छोटे शहरों की लड़कियां क्या असल में दकियानूसी होती हैं

बड़े शहर के लोगों के मन में हमेशा छोटे शहर से आए लोगों को लेकर एक मानसिकता देखने को मिली है कि वह उन्हें गंवार मानते हैं. छोटे शहरों से आए लोगों के प्रति यह धारणा भी होती है कि उन्हें ड्रेसिंग का सलीका नहीं होता. वह प्रजेंटेबल नहीं होते. उनमें कॉन्फिडेंस की कमी होती है और उनके कम्युनिकेशन स्किल्स बेहद खराब होते हैं.

साथ ही खासकर लड़कियों के बारे में यह सोचा जाता है कि वह दकियानूसी होती हैं.

1-उदाहरण

एक कंपनी की सीईओ जो कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे कस्बे से संबंधित हैं, कहती हैं, “एक छोटे शहर में पलने बढ़ने व 17 की उम्र में दिल्ली जैसे महानगर में शिफ्ट होने के बाद मैं यहां के लोगों में छोटे शहरों व कस्बों में रहने वाले लोगों के बारे में सोच देख कर हैरान रह गई. बहुत जानने व परखने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंच पायी कि लोगों की सोच वैसे ही बन जाती है, जैसे वे टीवी सीरियल्स में छोटे शहर के लोगो को देखते हैं. परंतु ऐसा कुछ भी नहीं है. न तो मैं किसी बन्धन में बंधी हुई हूं और न ही मैं ‘अगले जन्म मोहे बिटिया ही किजो’ जैसे सीरियल्स के मुख्य किरदार जैसी बेचारी लड़की हूं. हम छोटे शहर वाली लड़कियां भी जींस और शार्ट्स पहनती हैं. हम भी इंग्लिश मीडियम स्कूल से पढ़ीं हुईं हैं. हम में से बहुत सी लड़कियां फैशन, शिक्षा, पुरानी रीति रिवाज, हिस्ट्री व देश दुनिया में क्या हो रहा है उस चीज से अच्छी तरह वाकिफ हैं. हमें भी गुची व फरारी जैसे आधुनिक ब्रांड्स के बारे में भी अच्छे से ज्ञान है. हमारे मोबाइल्स में भी सभी तरह के आधुनिक ऐप्स हैं”.

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संसाधन और संभावनाओं की ओर

छोटे शहरों में सीमित संसाधन होते हैं और संभावनाएं भी शहरों के मुकाबले कम मिलती हैं. ऐसे में करियर और एज्यूकेशन में आगे बढ़ने के लिए बच्चों का सपना रहता है कि वो मेट्रो सिटी या बड़े शहरों में जाएं और नई संभावनाएं तलाश कर अपने जीवन को सफल बनाएं. स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद अक्सर लड़कियां आगे की पढ़ाई या करियर बनाने की शुरुआत करने के लिए बड़े शहरों का रुख करती हैं. कुछ आसानी से अपने माता-पिता को समझा पाते हैं और कुछ को इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है.

उदाहरण 2-

डोला बनर्जी,करनाम मल्लेश्वरी, हेमा योगेश ,प्रीति बेनिवाल

आदि ऐसे कई उदाहरण हैं जो जमाने को मुट्ठी में करने का काम बखूबी कर रही हैं. ये सब ही किसी बड़े शहर से नहीं. इन सबका जीवन उन छोटे छोटे कस्बों से शुरू हुआ, आज भी जहां सैकड़ों बंदिशें के कारण, बहुत सी लड़कियों के सपने दम तोड़ देतें हैं. ये सभी लड़कियां इन बंदिशों को तोड़, नेशनल टीम में जगह बना पाने में कामयाब हो पायीं हैं. लेकिन हकीकत में इनकी डगर आसान नहीं थी.

परिवेश का फर्क

वहीं, शहरी माहौल में पली-बढ़ी लड़कियां इससे उलट परिवेश में पली-बढ़ी होती हैं. शुरुआत से उन्हें को-एज्यूकेशन में पढ़ाया जाता है. पहनावे पर भी रोक-टोक जैसी स्थिति नहीं होती, जिससे कॉन्फिडेंस हाई रहता है और ये अपने फैसले खुद लेने के लिए स्वतंत्र होती हैं.

जबकि छोटे शहरों की लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता.उन के छोटे से छोटे डिसीज़न में परिवार शामिल रहता है. विविधता व अनावरण की कमी के कारण इन लड़कियों को  बहुत सी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है. वहां उनकी सोच व आगे बढ़ने की आजादी पर एक प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है. इसलिए जब वह अपने जज्बे को फॉलो करके अपने सपने साकार करने नए शहर में आती हैं तो उन्हें वहां के माहौल में ढलने में समय लगता है. कुछ लड़कियां स्वयं को नए शहर की लड़कियों की तुलना में कमजोर भी मानती हैं( सभी नहीं). इसी वजह से उन्हें दकियानूसी माना जाने लगता है.

इस सोच का कारण

दरअसल, उन्हें दकियानूसी इसलिए भी समझा जाता है क्योंकि जब वह छोटे शहर के माहौल से निकलकर बड़े शहर में आती हैं तो कई चीज़ों को वह पहली बार अनुभव करती हैं.  यहां छोटे शहरों के मुकाबले ज्यादा खुलापन और आज़ादी देखने को मिलती है. साथ ही 20-25 साल की उम्र में जब आप नई जगह जाओ और परिवार से रोकने-टोकने वाला कोई ना हो तो गलत रास्ते पर भी भटकने की संभावना पैदा हो जाती है. लड़कियां छोटा शहर छोड़ तो आती हैं लेकिन उनके मन में कुछ भी करने से पहले परिवार की छवि को नुकसान ना पहुँचाने का ख्याल आता है. जिससे वह संकोची हो जाती हैं और कई बार उन फैसलों को भी लेने से डर जाती हैं, जिससे उन्हें आगे बढ़ने में मदद मिलेगी और वह गलत राह पर भी नहीं होंगी. लेकिन कुछ अपवाद भी हैं.

उदाहरण 3-

उत्तर प्रदेश के बदायूं शहर से, दिल्ली यूनिवर्सिटी पढ़ने गई सुषमा का कहना है कि, हमें जाने बिना बेतुकी जजमेंट न पास करें. छोटे शहरों में बातें बहुत जल्दी बनाई जाती हैं. छोटे शहरों में बहुत सारे समुदाय एक दूसरे के साथ ही रहते हैं. सभी एक दूसरे को जानते भी हैं. यदि आप एक जवान लड़की हैं, तो आप स्वयं के बारे में तरह तरह की बातें सुनेंगी. खासकर तब जब आप लोगों द्वारा तय की गई एक सीमा को लांघ देंगी.वे लोग ही यह निश्चित करते हैं कि आप के लिए क्या सही है और क्या नहीं”.

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उदाहरण 4-

मुजफ्फरपुर निवासी जो इस समय अमेरिका की यूनिवर्सिटी की एक स्टूडेंट है कहतीं हैं कि,”छोटे शहरों में अभी भी जाति, धर्म, भेदभाव अपने स्तर पर जगह बनाये हुए हैं. जबकि आज की आधुनिक सोच वाली पीढ़ी को ये जातिगत भेद भाव बिल्कुल भी सही नहीं लगता . जो जात पात की प्रथा को मानते हैं, मुझे उन लोगों का व्यवहार बिल्कुल अच्छा नहीं लगता. समाज में जैसे एक जाति को दूसरी जाति से बड़ा माना जाता है वह मेरी समझ से बाहर है. मुझे जबकि और देशों की तरह की विविधता बहुत अच्छी लगती है. क्योंकि यही कारण है कि एक इंसान दूसरे इंसान से यूनिक या अलग बनता है.

इसलिए छोटे शहरों की महिलाएं व लड़कियां अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपने शहर को छोड़ना ही सही समझतीं है. वह समझती हैं कि यदि आप का टैलेंट यदि इस महौल से अलग है तो उसे पूरा करने के लिए उन्हें किसी मैट्रो पोलिटन शहर में ही जाना पड़ेगा.  क्योंकि छोटे शहरों में लोग केवल उन्हीं क्षेत्रों को सही मानते हैं जो उन्हें सुरक्षित लगता है जैसे मेडिकल या इंजीनिरिंग. जब लड़कियां अपने शहर को छोड़ कर बड़े शहरों में जाती हैं तो उन्हें लगता है कि उन्होंने बहुत सारे मौकों को खो दिया है जो उन्हें बड़े शहरों में आसानी से उपलब्ध हो सकते थे. वहां उन को स्वयं को आगे बढ़ाने का और अपने संकुचित दिमाग को खोलने का मौका मिलता है.

बदलाव की ओर

पहले के मुकाबले लड़कियों को लेकर स्थितियां तेजी से बदली हैं. पहले जहां गांव या अपने शहर में ही लड़कियों को पढ़ने और जॉब करने के लिए घर से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं मिलती थी. वहीं, मां-बाप और परिवार की सोच में खासा फर्क आ गया है. अब करियर में नई ऊंचाइयों को छूने के लिए ज्यादातर लड़कियों को बाहर जाने से नहीं रोक जाता. दूसरे शहर ही क्या,अब लड़कियां पढ़ाई और नौकरी के लिए दूसरे देश भी जा रही हैं.

छोटे शहरों की लड़कियां शहरी परिवेश में तेज़ी से ढलते हुए झंडे गाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं.

आज के समय में बहुत सी ऐसी बड़े और छोटे पर्दे की प्रसिद्ध अभिनेत्रियां हैं जो छोटे शहरों से बड़े शहरों की ओर गयीं, यही नहीं सब तरफ अपने कुशल अभिनय से अपनी पहचान बनाने में सफल रही हैं. जैसे सयाली भगत, प्रीति जिंटा,  समीरा रेड्डी,प्रियंका चोपड़ा, परिणीती चोपड़ा, अंकिता लोखंडे, अनुष्का शर्मा, आशा नेगी,देवोलीना भट्टाचार्जी,दिव्यांका त्रिपाठी,कृतिका सेंगर,रति पांडे,रुबीना दिलैक,शिवांगी जोशी, श्वेता तिवारी आदि .

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आजकल व्यक्ति के छोटे या बड़े शहर के होने के बजाए उसकी खूबियों, पर्सनालिटी पर ज्यादा जोर है, क्योंकि भले ही आप ऊपर से कितने भी अच्छे दिखें, अगर आपके अंदर संस्कारों की व समझदारी की कमी है. तो शहर बड़ा हो या छोटा, आपको असफलता से कोई नहीं बचा पाएगा.

DIY डीटोक्स फेस मास्क

खूबसूरत चेहरे की एक झलक पाने के लिए लोग बेचैन रहते हैं. क्योंकि खूबसूरत चेहरा ही वो चीज होती है, जिसे देख कर किसी के प्रति पहली नजर में अट्रैक्शन होता है. और अगर चेहरा बेजान , डल हो तो वो बात नहीं आ पाती. लेकिन आज के धूलमिट्टी व प्रदूषण वाले माहौल में चेहरे की नेचुरल रंगत गायब होने लगी है, जिसके लिए स्किन की प्रोपर केयर करने की जरूरत होती है. और ये केयर बॉडी की तरह स्किन को भी डीटोक्स करने से होगी . जिससे स्किन फिर से खिल उठे. तो जानते हैं कैसे घर पर डीटोक्स फेस मास्क से स्किन को फिर से पुन्र जीवित करें.

क्या है डीटोक्स फेस मास्क

डीटोक्स मतलब शरीर से वेशीले प्राधातो को बाहर निकालने की प्रक्रिया को कहते हैं. हम जो खाते हैं , हम जो पीते हैं , यहां तक क़ी हम जो सांस लेते हैं उसके जरिए वेषीले प्राधारत हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. प्रदूषण के संपर्क में आने से हमारी स्किन पर भी इसका असर दिखने लगता है. जिससे फाइन लाइन्स और एजिंग की समस्या होने लगती है. जिसे डीटोक्स करना बहुत जरूरी होता है. और ये डीटोक्स फेस मास्क से भी संभव है, ताकि आपको फिर से चमकती दमकती स्किन मिल सके.

कुछ खास डीटोक्स फेस मास्क , जो आपको यंग दिखाने में मददगार –

1. टोमेटो जूस एंड हनी मास्क

tomato

जिन महिलाओं को एक्ने, ब्लैकहेड्स या फिर अन्य तरह की स्किन प्रोब्लम्स होती हैं उनके लिए ये मास्क काफी फायदेमंद साबित होगा. ये एकदो बार में स्किन से सारी टैनिंग को रिमूव करके डेड सेल्स को रिमूव कर उन्हें फिर से हैल्थी स्किन देने का काम करेगा, क्योंकि टमाटर में विटामिन सी जो होता है , वहीं शहद एक्ने से लड़ने में सक्षम होता है .

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कैसे बनाएं मास्क- सबसे पहले आप एक बाउल में 2 बड़े चम्मच टोमैटो जूस लेकर उसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर पेस्ट तैयार करें. फिर उसे चेहरे पर 20 मिनट के लिए लगा छोड़ दें. और फिर फेस को धो लें. आप अपने चेहरे पर इंस्टेंट ग्लो देखेंगी. इस पैक की खास बात यह है कि ये पैक आसानी से घर पर बन जाता है.

2. स्ट्रॉबेरी फेस मास्क

strawberry

क्या आप अपना थका थका सा चेहरा देख देख कर ऊब गई हैं तो आप जरूर टाई करें स्ट्रॉबेरी फेस मास्क. ये मास्क आपके पोर्स को क्लीन और टाइट करके आपको क्लीन और यंग फेस देने का काम करता है. क्योंकि स्ट्रॉबेरी में अल्फा हाइड्रोक्सी एसिड होता है, जो डेड स्किन सेल्स को रिमूव करके स्किन को क्लियर बनाने का काम करता है.

कैसे बनाएं मास्क- इसके लिए एक बाउल में कुछ स्ट्रॉबेरी को लेकर उसमें एक छोटा चम्मच दही और शहद और कुछ बूंदे नींबू के रस की मिलाकर पेस्ट तैयार करें. फिर इसे चेहरे पर अप्लाई करके 5 मिनट बाद चेहरे को धो लें. आपके चेहरे पर नेचुरल ग्लो नजर आने लगेगा.

3. क्ले डीटोक्स मास्क

clay

सदियों से क्ले का इस्तेमाल स्किन की हैल्थ को इम्प्रूव करने के लिए किया जाता है. ये ऑयली स्किन की प्रोब्लम को ठीक कर ड्राई स्किन को मैनेज करने के साथ साथ
एक्ने की समस्या से निजात दिलवाने का काम करता है. तो अगर आपको एक्ने और ऑयली स्किन की प्रोब्लम है तो आप क्ले मास्क को जरूर अप्लाई करें.

कैसे बनाएं मास्क– एक बाउल में एक छोटा चम्मच केओलिन क्ले में 1 छोटा चम्मच एप्पल साइडर विनेगर, कुछ बूंदे एसेंशियल आयल के साथ उसमें रोज़ वाटर ऐड करके इसका पेस्ट तैयार करें. फिर इसे चेहरे पर अप्लाई करके तब तक लगा छोड़ दें जब तक पैक अच्छे से सूख न जाएं. इससे आप मिनटों में फेसिअल स्किन पा सकेंगी.

4. ओटमील दालचीनी मास्क

oats

ओटमील में एन्टिओक्सीडैंट्स और एंटी इंफ्लेमेटरी प्रोपर्टीज होने के कारण ये स्किन को एक्सफोलिएट करने के साथ सोफ्ट व डॉयनेस से निजात दिलवाने का काम करता है. वहीं दालचीनी एक्ने प्रोन स्किन के लिए एंटीसेप्टिक का काम करती है. फाइन लाइन्स और झुर्रियों को भी कंट्रोल करने में सक्षम है.

कैसे बनाएं मास्क – आधा कप ओट्स में आधा कप गरम पानी डालकर उसमें थोड़ी सी दालचीनी , एक छोटा चम्मच शहद व कुछ बूंदे नींबू के रस की मिलाकर स्मूद पेस्ट तैयार करें. फिर इसे चेहरे पर अप्लाई करके 20 मिनट के लिए लगा छोड़ दें और फिर धो लें. आपको अपने चेहरे में काफी साफ्टनेस नजर आएगी.

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डीटोक्स फेस मास्क के फायदे

1. स्किन को हाइड्रेट रखें

फेस मास्क त्वचा को हाइड्रेट करने का काम करता है . वे स्किन में ऐसी परत बनाने का काम करता है , जिससे स्किन का मोइस्चर मैंटेन रहता है और स्किन रूखी रूखी नहीं लगती है.

2. पोर्स को क्लीन करें

डीटोक्स फेस मास्क स्किन से पोर्स को डीप क्लीन करने का काम करते हैं. हमारी त्वचा में हज़ारों पोर्स होते हैं , जिसमें गंदगी जमा होने के कारण ब्लैकहेड्स, जलन और स्किन इंफेक्शन भी हो जाता है. ऐसे में डीटोक्स फेस मास्क पोर्स को क्लीन कर आपको हैल्थी स्किन देने का काम करते हैं.

3. स्किन टोन को इम्प्रूव करें

धूलमिट्टी के ज्यादा संपर्क में रहने से स्किन कम्प्लेकशन पर काफी असर पड़ता है. खासकर के स्किन चिन एरिया से काफी डार्क सी लगने लगती है. ऐस में ये फेस पैक स्किन पिगमेंटेशन को कम कर स्किन टोन को इम्प्रूव करने का काम करते हैं.

4. स्किन टाइटनिंग का काम करें

फेस मास्क स्किन को टाइट करके आपको फर्म और यंग स्किन देने का काम करते हैं . बता दें कि होममेड फेसमास्क में नेचुरल इंग्रीडिएंट्स होने के कारण ये फ्री रेडिकल्स के प्रभाव को खत्म करके कोलेजन के उत्पादन को बढ़ाने का काम करते हैं. तो फिर डीटोक्स फेस मास्क से पाएं क्लियर व यंग स्किन.

क्या फेस सीरम में ऐंटीएजिंग गुण होते हैं, जो त्वचा को जवां बनाते हैं?

सवाल-

मैं फेस सीरम के बारे में जानना चाहती हूं. क्या फेस सीरम में ऐंटीएजिंग गुण होते हैं, जो त्वचा को जवां बनाते हैं?

जवाब-

जी हां, सीरम से आप की तरह की परेशानियां कम होती हैं और चेहरा खूबसूरत बनता है. फेस सीरम कोलोजन के उत्पादन बढ़ाता है और त्वचा को जवां और स्वस्थ बनाता है. यह त्वचा पर होने वाले पिंपल्स, घावों, दागों, मुंहासों और इन्फैक्शन को हील करता है. फेस सीरम त्वचा में गहराई तक जा कर उस की समस्याओं को कम करता है. आंखों के नीचे आए डार्कसर्कल्स को कम करने में भी फेस सीरम लाभकारी रहता है. इस से चेहरे की हलके हाथों से मालिश करें.

स्किन सीएम में ऐंटीऔक्सीडैंट्स होते हैं जोकि बाहरी तत्त्वों से त्वचा की रक्षा  हैं. ये त्वचा की नई कोशिकाएं बनाने में भी मदद करते हैं, जिस त्वचा की रंगत निखरती है.

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साल भर हम अपनी स्किन का ख्याल रखने के लिए नए-नए प्रौडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं. वहीं मार्केट में भी डेली नए-नए प्रौडक्ट्स आ गए हैं, जो हमारी स्किन के लिए बेहद फायदेमंद है. उन्हीं प्रौडक्ट्स में से एक है फेस सीरम. अगर आप रोजाना मेकअप करती हैं तो फेस सीरम आपके लिए बहुत जरूरी होता है. सीरम एक ऐसा प्रौडक्ट है, जो स्किन की केयर करने में मदद करता है. सीरम से कईं प्रौब्लम्स से छुटकारा मिल जाता है, जैसे उम्र के साथ स्किन पर दिखने वाली बारीक रेखाएं, झुर्रियां, पिगमेंटेशन, स्किन की डलनेस और पोर्स का बड़ा हो जाना.

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Short Story: आज मैं रिटायर हो रही हूं

कुनकुनी धूप जाड़े में तन को कितना चैन देती है यह कड़कड़ाती ठंड के बाद धूप में बैठने पर ही पता लगता है. मेरी चचिया सास ने अचार, मसाले सब धूप में रख दिए थे. खाट बिछा कर अपने सिरहाने पर तकियों का अंबार भी लगा दिया था. चादरें, कंबल और क्याक्या.

‘‘चाची, लगता है आज सारी की सारी धूप आप ही समेट ले जाएंगी. पूरा घर ही बाहर बिछा दिया है आप ने.’’

‘‘और नहीं तो क्या. हर कपड़े से कैसी गंध आ रही है. सब गीलागीला सा लग रहा है. बहू से कहा सब बाहर बिछा दे. अंदर भी अच्छे से सफाई करवा ले. दरवाजे, खिड़कियां सब खुलवा दिए हैं. एक बार तो ताजी हवा सारे घर से निकल जाए.’’

‘‘सुबह से मुग्गल धूप जलने की तेज सुगंध आ रही है. मैं सोच रही थी कि पड़ोस के गुप्ताजी के घर आज किसी का जन्मदिन होगा सो हवन करवा रहे हैं, तो आप ने ही हवन सामग्री जलाई होगी घर में.’’

‘‘कल तेरे चाचा भी कह रहे थे कि घर में हर चीज से महक आ रही है. सोचा, आज हर कोने में सामग्री जला ही दूं.’’

सलाइयां लिए स्वेटर बुनने में मस्त हो गईं चाची. उन की उंगलियां जिस तेजी से सलाइयों के साथ चलती हैं हमारा सारा खानदान हैरान रह जाता है. बड़ी फुर्ती से चाची हर काम करती हैं. रिश्तेदारी में किसी के भी घर पर बच्चा पैदा होने की खबर हो तो बच्चे का स्वेटर चाची पहले ही बुन कर रख देती हैं. दूध के पैसे देने जाती हैं तो स्वेटर साथ होता है. 60-65 के आसपास तो उन की उम्र होगी ही फिर भी लगता नहीं है कभी थक जाती होंगी. उन की बहू और मैं हमउम्र हैं और हमारे बीच में अच्छी दोस्ती भी है. हम कई बार थक जाती हैं और उन्हें देख कर अपनेआप पर शरम आ जाती है कि क्या कहेगा कोई. जवान बैठी है और बूढ़ी हड्डियां घिसट रही हैं.

‘‘चाची, आप बैठ जाओ न, हम कर तो रही हैं. हो जाएगा न… जरा चैन तो लेने दो.’’

‘‘चैन क्या होता है बेटा. आधा काम कर के भी कभी चैन होता है. बस, जरा सा ही तो रह गया है. बस, हो गया समझो.’’

‘‘मां, तुम कोई भी काम ‘मिशन’ ले कर मत किया करो. तुम तो बस, करो या मरो के सिद्धांत पर काम करती हो. कल दिन नहीं चढ़ेगा क्या? बाकी काम कल हो जाएगा न… या सारा आज ही कर के सोना है.’’

‘‘कल किस ने देखा है बेटा, कल आए न आए. कल का नाम काल…’’

‘‘कैसी मनहूस बातें करती हो मां. चलो, छोड़ो, भाभी और निशा कर लेंगी.’’

विजय भैया, चाची को खींच कर ले जाते हैं तब कहीं उन के हाथ से काम छूटता है.

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आज 15-20 दिन के बाद धूप निकली है और चाची सारा का सारा घर ही बाहर ले आई हैं. निशा के माथे के बल आज कुछ गहरे लग रहे हैं. सर्दी की वजह से उस की बांह में कुछ दिन से काफी दर्द चल रहा था. घर का जरूरी काम भी वह मुश्किल से कर पा रही थी. ऊपर से बच्चों के टैस्ट भी चल रहे हैं. सारी की सारी रसोई और सारे के सारे बिस्तर बाहर ले आने की भला क्या जरूरत थी. धूप कल भी तो निकलेगी. लोहड़ी के बाद तो वैसे भी धूप ही धूप है. सुबह तो सामान महरी से बाहर रखवा लिया, शाम को समेटते समय निशा की शामत आएगी. दुखती बांह से निशा रात का खाना बनाएगी या भारी रजाइयां और गद्दे उठाएगी. कैसे होगा उस से? कुछ कह नहीं पाएगी सास को और गुस्सा निकालेंगी बच्चों पर या विजय भैया पर.

मैं जानती हूं. आज चाची के घर परेशानी होग  बिस्तर तो परसों भी सूख जाते या 4 दिन बाद भी. टैस्ट को कैसे रोका जाएगा. और वही हुआ भी.

दूसरे दिन निशा धूप में कंबल ले कर लेटी थी और चाची उखड़ीउखड़ी थीं.

‘‘क्या हुआ चाची, निशा की बांह का दर्द कम नहीं हुआ क्या?’’

‘‘कल 4 बिस्तर जो उठाने पड़े. बस, हो गई तबीयत खराब.’’

‘‘चाची, उस की बांह में तो पहले से ही दर्द था. आप ने इतना झमेला डाला ही क्यों था. आप समझती क्यों नहीं हैं. ज्यादा से ज्यादा आप अपना तकियारजाई ले आतीं. जोशजोश में आप निशा पर कितना काम लाद देती हैं. मैं ने आप से पहले भी कहा था कि अब घर के काम में ज्यादा दिलचस्पी लेना आप छोड़ दीजिए. अपनी बहू को उस के हिसाब से सब करने दीजिए पर मानती ही नहीं हैं आप.’’

मैं ने कान में धीरे से फुसफुसा कर कहा. चाची ने गौर से मुझे देखा. मैं दावा कर सकती हूं कि चाची के साथ भी मेरा मित्रवत व्यवहार चलता है. दकियानूस नहीं हैं चाची और न ही अक्खड़. समझाओ तो समझ भी जाती हैं.

‘‘अब उस की बांह तो और दुख गई न. आप ने इतना बखेड़ा कर डाला. एक बिस्तर सुखा लेतीं. आज भी तो धूप है न… कुछ आज भी हो जाता.’’

सुनती रहीं चाची फिर धीरे से उठ कर नीचे चली गईं. वापस आईं तो उन के हाथ में लहसुन जला गरमगरम तेल था.

‘‘निशा, उठ बेटा.’’

चाची ने धीरे से निशा का कंबल खींचा. उठ कर बैठ गई निशा. उन्होंने उस की बांह में कस कर मालिश कर दी.

‘‘तुम ने बताया क्यों नहीं, बांह में दर्द है. मैं बादामसौंठ का काढ़ा बना देती. अभी नीचे गैस पर चढ़ा कर आई हूं. रमिया को समझा आई हूं कि उसे कब उतारना है…अभी गरमागरम पिएगी तो रात तक दर्द गायब हो जाएगा.’’

मैं कनखियों से देखती रही. निशा के माथे के बल धीरेधीरे कम होने लगे थे.

‘‘रात को खिचड़ी बना लेंगे,’’ चाची बोलीं, ‘‘तेरे पापा को भी अच्छी लगती है.’’

सासबहू की मनुहार मुझे बड़ी प्यारी लग रही थी. निशा चुपचाप काढ़ा पी रही थी. मेरी सास नहीं हैं और इन दोनों को देख कर अकसर मुझे यह प्रश्न सताता है कि अगर मेरी सास होतीं तो क्या चाची जैसी होतीं या किसी और तरह की. मुझे याद है, मेरे बेटे के जन्म के समय मुझे खुद पता नहीं कि चाची क्याक्या पिला दिया करती थीं. मैं मना करती तो चपत सिर पर सवार रहती.

‘‘खबरदार, फालतू बात मत करना.’’

‘‘चाची, इतना क्यों खिलाती हो?’’

‘मेरी सास कहा करती थीं कि बहू  और घोड़े को खिलाना कभी व्यर्थ नहीं जाता. तू चुपचाप खा ले जो भी मैं खिलाऊं.’’

‘‘घोड़ा और बहू एक कैसे हो गए, चाची?’’

‘‘घोड़ा ताकतवर होगा तो ज्यादा बोझ उठाएगा और बहू ताकतवर होगी तो बीमार कम पड़ेगी. बीमार कम पड़ेगी तो बेटे की कमाई, दवा पर कम लगेगी और कामों में ज्यादा. सेहतमंद बहू के बच्चे सेहतमंद होंगे और घर की बुनियाद मजबूत होगी. सेहतमंद बहू ज्यादा काम करेगी तो घर के ही चार पैसे बचेंगे न. अरे, बहू को खिलाने के फायदे ही फायदे हैं.’’

‘‘आप की सास आप को बहुत खिलाती थीं क्या?’’

‘‘तेरी सास नानुकर करती रहती थी. खानेपीने में नकारी…इसीलिए तो बीमार रहती थी. मुझे देख मैं अपनी सास का कहना मानती थी इसीलिए आज भी भागभाग कर सब काम कर लेती हूं.’’ चाची अपनी सास को बहुत याद करती हैं. अकसर मैं ने इस रिश्ते को बदनाम ही पाया है. सास भी कभी प्यार कर सकती है यह सदा एक प्रश्न ही रहा है. पराए खून और पराई संतान पर किसी को प्यार कम ही आता है. मुझे याद है जब निशा इस घर में आई थी तब मेरी शादी को 2 साल हो चुके थे. चाचाचाची अपनी दोनों बेटियां ब्याह कर अकेले रह रहे थे. विजय की नौकरी तब बाहर थी. हमारी कोठी बहुत बड़ी है. आमनेसामने 2 घर हैं, बीच में बड़ा सा आंगन. पूरे घर पर एक ही बड़ी सी छत.

मेरी भी 2 ननदें ब्याही हुई हैं और पापा की छत्रछाया में मैं और मेरे पति बड़े ही स्नेह से रहते हैं. चाचीचाचा का बड़ा सहारा है. विजय भैया शादी के बाद 2 साल तो बाहर ही रहे अब इसी शहर में उन की बदली हो गई है.  निशा के आने तक चाची ही मेरी सास थीं. मेरी दोनों ननदें बड़ी हैं. इस घर में क्या माहौल है क्या नहीं मुझे क्या पता था. मन में एक डर था कि बिना औरत का घर है, पता नहीं कैसेकैसे सब संभाल पाऊंगी, ननदें ब्याही हुई थीं…उन का भी अधिकार मित्रवत न हो कर शुरू में रोबदार था. चाची कम दखल देती थीं और लड़कियों को अपनी करने देती थीं. कुछ दिन ऐसा चला था फिर एक दिन पापा ने ही मुझे समझाया था :

‘‘मुझे अपने घर में लड़कियों का ज्यादा दखल पसंद नहीं है. इसलिए तुम जराजरा बात के लिए उन का मुंह मत देखा करो. तुम्हारी चाची हैं न. कोई भी समस्या हो, कुछ भी कहनासुनना हो तो उन से पूछा करो. लड़कियां अपने घर में हैं… जो चाहें सो करें, मेरे घर में तुम हो, मेरी छोटी भाभी हैं… एक तरह से वे भी मेरी बहू जैसी ही हैं. फिर क्यों कोई बाहर वाली हमारे घर के लिए कोई भी निर्णय ले.’’

मेरा हाथ पकड़ कर पापा चाची की रसोई में ले गए थे. सिर पर पल्ला खींच चाची ने अपने हाथ का काम रोक लिया था.

‘‘बीना, आज से इसे तुम्हें सौंपता हूं. तुम्हीं इस की मां भी हो और सास भी.’’

बरसों बीत गए हैं. मुझे वे क्षण आज भी याद हैं. चाची ने गुलाबी रंग की सफेद किनारी वाली साड़ी पहन रखी थी. माथे पर बड़ी सी सिंदूरी बिंदिया. तब चाची पूरियां तल रही थीं. आटा छिटक कर परात से बाहर जा गिरा था, हमारे घरों में ऐसा मानते हैं कि आटा परात से बाहर जा छिटके तो कोई मेहमान आता है. विजय भैया और चाचा तब नाश्ता कर रहे थे.

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‘‘मां, तुम्हारा आटा छिटका…देखो आज कौन आता है.’’

ये दोनों बातें साथसाथ हुई थीं. रसोई में मेरा प्रवेश करना और चाची का आटा छिटकना.

‘‘जी सदके… मेहमान क्यों आज तो मेरी बहूरानी प्रीति आई है…आजा मेरी बच्ची…’’

अकसर ऐसा होता है न कभीकभी जब हम स्वयं नहीं जानते कि हम कितने उदास हो चुके हैं. मायका दूर था…घर में करने वाली मैं अकेली औरत, पापा और मेरे पति अजय के जाने के बाद घर में अकेली घुटती रहती थी या जराजरा बात के लिए अपनी ननदों को फोन करती. शायद पापा को उस दिन पहली बार मेरी समस्या का खयाल आया था.

…और चाची ने बांहें फैला कर जो उस पल छाती से लगाया तो वह स्नेहिल स्पर्श मैं आज तक भूली नहीं हूं. रोने लगी थी मैं. शायद उस पल की मेरी उदासी इतनी प्रभावी थी कि सब भीगभीग से गए थे. पापा आंखें पोंछ चले गए थे. विजय भैया ने मेरा सिर थपक दिया था.

‘‘हम हैं न भाभी. रोइए मत. चुप हो जाइए.’’

वह दिन और आज का दिन, चाची से ऐसा प्यार मिला कि अपना मायका ही भूल गई मैं. चाची मेरी सखी भी बन गईं और मेरी मां भी.

मेरे दोनों बेटों के जन्म पर चाची ने ही मुझे संभाला. विजय भैया की शादी में चाची ने हर जिम्मेदारी मुझ पर डाल रखी थी. निशा के गहनों में, चूडि़यों में, गले के हारों में, कपड़ों में सूटसाडि़यों से शालस्वेटरों तक चाची ने मेरी ही राय को प्राथमिकता दी थी. निशा भी हिलीमिली सी लगी. आते ही मुझ से  प्यार संजो लिया उस ने भी. लगभग 8 साल हो गए हैं निशा की शादी को और 10 साल मुझे इस घर में आए. बहुत अच्छी निभ रही है हम में. एक उचित दूरी और संतुलन रख कर हमारा रिश्ता बड़ा अच्छा चल रहा है. निशा के माथे पर जरा सा बल पड़े तो समझ जाती हूं मैं.

‘‘चाची, आप थोड़ाथोड़ा अपना हाथ खींचना शुरू कर दीजिए न. उसे उसी के तरीके से करने दीजिए, अब आप की जिम्मेदारी खत्म हो चुकी है. जरा देखिए, हम कैसेकैसे सब करती हैं, कहीं कोई परेशानी आएगी तो पूछ लेंगे न.’’

‘‘मैं बेकार हो जाऊंगी तब. हाथपैर ही न चलाए तो आज ही जंग लग जाएगा.’’

‘‘जंग कैसे लगेगा. सुबह उठ कर चाचाजी के साथ सैर करने जाइए, रसोई के अंदर जरा कम जाइए. बाहर से मदद कर दीजिए, सब्जी काट दीजिए, सलाद काट दीजिए. सूखे कपड़े तह कर के अलगअलग रख दीजिए. कितने ही हलकेफुलके काम हैं…जराजरा अपने अधिकार कम करना शुरू कीजिए.’’

‘‘तुझे क्या लगता है कि मैं अनावश्यक अधिकार जमाती हूं? निशा ने कुछ कहा है क्या?’’

‘‘नहीं चाची, उस ने क्या कहना है. मैं ही समझा रही हूं आप को. अब आप चिंता मुक्त हो कर जीना शुरू कीजिए, सुबहसुबह उठ कर नहाधो कर रसोई में जाने की अब आप को क्या जरूरत है, फिर आप के जोड़ भी दुखते हैं.

‘‘ऐसा कौन बरात का खाना बनाना होता है. 10 बजे तक सारे काम निबटा देना आप की कोई जरूरत तो नहीं है न. 7 बजे उठ कर भी नाश्ता बन सकता है. दोपहर का तो 2 बजे चाहिए, इतनी हायतौबा सुबहसुबह किसलिए. अपने वक्त किया न आप ने, अब निशा का वक्त शुरू हुआ है तो करने दीजिए उसे. रिटायर हो जाइए अब आप.’’

चाची चुपचाप सुनती रहीं. मुझे डर भी लग रहा था कि कहीं यह मेरी अनावश्यक सुलह ही प्रमाणित न हो जाए. कहीं निशा यही न समझ ले कि मैं ही सासबहू में दुख पैदा कर रही हूं. सच तो यह है कि सास कभीकभी बिना वजह अपनी हड्डियां तोड़ती रहती हैं, जो बेटे की गृहस्थी में योगदान नहीं बनता बल्कि एक अनचाहा बोझ बन जाता है.

‘‘अब मां ने कर ही दिया है तो ठीक है, यों ही सही.’’

‘‘मैं ने तो सोचा था आज कोफ्ते बनाऊंगी… मां ने सुबहसुबह उठ कर दाल चढ़ा दी.’’

‘‘हम सोच रहे थे कि इस इतवार नई पिक्चर देखने जाएंगे पर मां ने मामीजी को खाने पर बुला लिया.’’

‘‘जोड़ों का दर्द है मां को तो सुबहसुबह क्यों उठ जाती हैं. सारा दिन खाली ही तो रहते हैं हम. इतनी मारधाड़ भी किसलिए.’’

निशा का स्वर कई बार कानों मेें पड़ जाता है जिस कारण मुझे चिंता भी होने लगती है. चाची का ममत्व अनचाहा न बन जाए. वे तो सदा से इसी तरह करती आ रही हैं न. सो आज भी करती हैं. उन्हें लगता है कि वे बहू की सहायता कर रही हैं जबकि बहू को सहायता चाहिए ही नहीं. अकसर यह भी देखने में आता है कि बहू नकारा होती नहीं है बस, सास के अनुचित सेवादान से नकारी हो जाती है. जाहिर सी बात है, जिस तरह एक म्यान में 2 तलवारें नहीं समा सकतीं उसी तरह 2 मंझे हुए कलाकार, 2 बहुत समझदार लोग, 2 कमाल के रसोइए एक ही साथ काम नहीं कर सकते, क्योंकि दोनों ही ‘परफैक्ट’ हैं, दोनों ही संपूर्ण हैं.

रात भर मुझे नींद नहीं आई, पता नहीं सुबह क्या दृश्य मिलेगा, सुबह 6 बजे उठी तो देखा सामने चाची की रसोई में अंधेरा था. कहीं चाची बीमार तो नहीं हो गईं. वे तो 6 बजे तक नहाधो कर सब्जियां भी चढ़ा चुकी होती हैं. कहीं मेरी ही कोई बात उन्हें बुरी तो नहीं लग गई जो कुछ मन पर ले लिया हो.  लपक कर चाची का दरवाजा खटखटा दिया. ‘‘आ जाओ बेटी, दरवाजा खुला है,’’ चाचा का स्वर था.

भीतर जा कर देखा तो नया ही रंग नजर आया. चाची रजाई में बैठी आराम से अखबार पढ़ रही थीं. मेज पर चाय के खाली कप पड़े थे. मेरी तरफ देखा चाची ने. एक प्यारी सी हंसी आ गई उन के होंठों पर.

‘‘चाची, आप ठीक तो हैं न,’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह तो मैं भी पूछ रहा हूं. कह रही है कि आज से मैं रिटायर हो रही हूं. रात को ही इस ने निशा को समझा दिया कि सुबह से वही रसोई में जाएगी मैं नहीं… पता नहीं इसे एकाएक क्या सूझा है… मैं समझाता रहा…मेरी तो सुनी ही नहीं… आज अचानक से इस में इतना बड़ा परिवर्तन…’’

चाचा अपनी ऐनक उतार स्नानागार में चले गए और मैं मंत्रमुग्ध सी चाची का एक और प्यारा सा रूप देखती रही.

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