Family Story in Hindi: दोस्त रचाएं शादीडौटकौम

Family Story in Hindi: अविनाश की शादी एक ग्रैंड वैडिंग तो नहीं बन पाई लेकिन एक यादगार वैडिंग जरूर बन गई. ऐसी वैडिंग जिस में वैडिंग हौल दोस्त का घर था, डैकोरेशन हैड एक स्कूल टीचर और एक प्रैगनैंट दुलहन.

पुणे के हिंजवाड़ी सैक्टर में आईटी कंपनियों की कतार सी लगी है और इसी कतार में लाखों कर्मचारी अपने भविष्य को बनाने की कतार में. इन्हीं में से एक अविनाश और एक सुरभि. जो एक ही बिल्डिंग के अलगअलग औफिस में काम करते हैं. अविनाश एक आईटी सैक्टर कंपनी में तीसरी मंजिल पर और सुरभि कौस्मैटिक कंपनी में 5वीं मंजिल पर. दोनों की काम करने की मंजिल भले अलग थी लेकिन जीवन मंजिल एक ही. शायद इसलिए दोनों एक दोपहर बिल्डिंग के ओपन टैरेस जो छठी मंजिल पर था वहां अचानक से टकरा गए.

‘‘आई एम सौरी मेरा ध्यान नहीं था,’’ अविनाश ने कहा.

‘‘नो ऐक्चुअली गलती मेरी थी. मैं ही फोन में बिजी थी,’’ सुरभि ने कहा.

अविनाश अपनी चाय ले छत के एक कोने में चला गया और सुरभि अपनी सिगरेट पकड़े दूसरे कोने में. दोनों खड़े भले अलगअलग कोने में थे लेकिन अपना ध्यान एकदूसरे के कोने में ही लगा रहा.

अगले दिन अविनाश ठीक उसी समय छत पर गया. कुछ देर वहां बैठा भी

लेकिन सुरभि नहीं आई न दिखी. अविनाश ने ज्यादा उम्मीद न लगाने की बात खुद से कही. और अगले 2 दिन छत पर नहीं गया. मगर एक दिन अचानक उस की उम्मीद खुद ही पूरी हो गई. उस दिन बहुत बारिश हो रही थी. अविनाश और उस के 2 कलीग बारिश का मजा लेने छत पर चले गए. छत पर बहुत से औफिसों के कर्मचारी थे. उन्हीं के बीच अपनी 2 सहेलियों के साथ थी सुरभि. सुरभि और अविनाश की आंखें मिलीं और फिर दिल. दोनों अब रोज छत पर मिला करते थे. अच्छी दोस्ती के रास्ते दोनों ने प्यार की शुरुआत की. दोनों के रोमांटिक अफेयर्स अब दोनों के कलीग भी जानने लगे. मूवी डेट, डिनर डेट और लौंग ड्राइव अब हर वीकैंड का प्लान था. प्यार के सुहाने सफर और मीठी नोक?ोंक में कब 2 साल निकल गए पता ही नहीं चला.

इसी बीच एक दिन:

‘‘क्या कहा तुम ने?’’

‘‘वही जो तुम ने सुना. मैं प्रैगनैंट हूं.’’

सुरभि की बात सुन अविनाश कुछ देर तो चुप रह, फिर मुसकरा कर कहा, ‘‘ठीक है. मैं बाप बनने वाला हूं. यह तो गुड न्यूज है.’’

सुरभि अपना माथा पकड़े, ‘‘बिना पति बने बाप बन तुम खुश हो सकते हो लेकिन बिना बीवी बने मैं मां यह तो कोई खुशी की बात नहीं.’’

अविनाश सुरभि का हाथ पकड़ बोला, ‘‘तो बीवी बन जाओ. प्रैगनैंसी की बात तो सिर्फ हम दोनों को पता है. टैंशन क्यों ले रही हो. हम जल्दी शादी कर लेते हैं न.’’

‘‘कितना भी जल्दी करे 1-2 महीने तो लग ही जाएंगे फैमिली को मनाने में, सारी तैयारी करने में. तब तक पेट निकल गया या किसी को पता चल गया तो?’’

‘‘नहीं पता चलेगा और कोई बड़ी तैयारी नहीं करनी जो 1-2 महीने लगें. हम शादी जल्दी करेंगे. शायद 10 दिन में ही.’’

‘‘10 दिन. हमारे घर वाले नहीं मानेंगे. अरे वे हम दोनों से मिले भी नहीं.’’

‘‘ज्यादा जाननेमिलने की अब जरूरत भी नहीं. मैं अपने घर वालों से बात करूंगा और तुम अपने घर वालों से.’’

दोनों ने अपनेअपने घर वालों से बात की मगर यह नहीं बताया कि सुरभि प्रैगनैंट है. अविनाश के घर वाले जानते थे कि अविनाश की एक गर्लफ्रैंड है. तो जब अविनाश ने शादी की बात छेड़ी तो उस के पापा ने साफ कह दिया, ‘‘हम ने तुम्हारी पढ़ाई में बहुत पैसा लगाया है और जब तुम अपनी ही पसंद की शादी करना चाहते हो तो तुम अपने पैसे से करो और जब मन करे तब करो. हम बस आशीर्वाद देने आ जाएंगे.’’

उधर सुरभि के घर वाले 2-3 बार अविनाश से फोन पर बात कर चुके थे. उन्हें अविनाश से कोई दिक्कत नहीं थी. सुरभि के घर वाले मौडर्न और प्रैक्टिकल सोच के थे. इसलिए उन्होंने पहले ही साफ कर दिया कि कोई दहेज नहीं देंगे और न कोई और फालतू खर्चा करेंगे. वे सिंपल मैरिज में ही बिलीव करते हैं.

जब सुरभि ने उन से शादी की बात छेड़ी तो उन्हें कोई परेशानी महसूस नहीं हुई और

जब यह बात भी साफ हो गई कि अविनाश के मांबाप भी नाखुश ही सही अविनाश की शादी को मंजूरी दे रहे तो फालतू के खर्चे और दहेज की बात अपनेआप ही रास्ते से हट गई.

मगर दोनों को यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि बिना किसी ड्रामे के दोनों के घर वाले शादी के लिए मान कैसे गए.

अगली रात अविनाश और सुरभि दोनों शादी की प्लानिंग के लिए अपनेअपने बैंक और सेविंग का लिखा चिट्ठा ले बैठे. अविनाश अपने एक कलीग के साथ एक किराए के घर में रहता था. उसे दोनों का रिश्ता पता था. इसलिए वह भी दोनों के बीच बैठ गया.

अविनाश ने कहा, ‘‘हम दोनों की सेविंग ज्यादा तो नहीं. मगर फिर भी एक शादी तो कर ही लेंगे.’’

सुरभि निराश हो कर बोली, ‘‘हां लेकिन सारी सेविंग खत्म हो जाएगी.’’

तभी अविनाश के दोस्त ने पूछा, ‘‘लेकिन तुम शादी के बाद रहेंगे कहां?’’

अविनाश और सुरभि सुनील की बात सुन सोच में पड़ गए. सुनील ने सुरभि से कहा, ‘‘तुम गर्ल होस्टल में रहती हो और अविनाश मेरे साथ. अभी तो तुम दोनों यहां आराम से घंटे गुजार सकते हो लेकिन पूरी लाइफ नहीं. चलो शादी के बाद भी कुछ वक्त यहां रह लेना लेकिन खुद ही सोचो मेरे साथ तुम्हें रहना ठीक लगेगा?’’

सुनील की बात सही थी. भला दोनों शादी के बाद सुनील के साथ कितने दिन रहते.

सुनील ने कहा, ‘‘शादी के खर्चे से पहले घर देखो अपने लिए.’’

अगले ही दिन सुरभि और अविनाश ने घर की तलाश शुरू कर दी. इस बीच सुनील ने औफिस के खास करीबी 3 दोस्तों से अविनाश और सुरभि की बात की शेयर की और उन की फाइनैंशियल प्रौब्लम भी.

सुनील की बात सुन रूपा बोली, ‘‘सुरभि के घर वाले कितने प्रैक्टिकल हैं जो अपनी सेविंग को खर्च नहीं करना चाहते, एक शोशे के चक्कर में.’’

दीपक बोला, ‘‘हां और दोनों उतने ही स्टुपिड जो अपनी सेविंग खर्च कर रहे है.’’

विक्की बोला, ‘‘लेकिन ये करें भी तो क्या. मगर इन्हें इतनी जल्दी करनी ही क्यों है? थोड़ा वेट करें और सेविंग करें, फिर शादी करें.’’

सुनील ने कहा, ‘‘भाई शादी अभी करे या बाद में. पैसे तो इन के ही खर्च होंगे. बाद में सेविंग बड़ी भी तो वो भी तो शादी में ही खर्च हो जाएंगी.’’

चारों शादी के खर्चे को ले कर सोच ही रहे थे कि सुनील बोला, ‘‘चलो यार इन की शादी हम ही करा दें.’’

दीपक ने पूछा, ‘‘हम कैसे?’’

सुनील ने जवाब दिया, ‘‘हम चारों मिल कर कुछ काम आपस में बांट लेते और अपने बजट में कर देते है.’’

विक्की ने कहा, ‘‘मतलब खर्चा हम करें.’’

सुनील ने कहा, ‘‘खर्चा नहीं मदद. देखते हैं कि हम क्या कर सकते उन के लिए. बिना अपनी पौकेट में छेद किए.’’

रूपा ने कहा, ‘‘प्लान तो अच्छा है लेकिन करेंगे क्या?’’

सुनील ने कहा, ‘‘वही जो शादियों में होता है. पहले लिस्ट बनाते हैं कि होता क्या है. फिर उस हिसाब से काम करेंगे.’’

चारों को यह आइडिया अच्छा लगा और आइडिया पर काम करने के लिए सबने

हामी भरते रात दीपक के घर रुकने का प्लान किया.

चारों और अविनाश औफिस के बाद सीधा दीपक के घर पहुंच गए. दीपक का खुद का घर कहें एक छोटा सा बंगला था, जहां वह अकेले ही रहता था.

वहां जा अविनाश सब

से बोला, ‘‘अरे हम यहां आए

क्यों हैं?’’

सुनील बोला, ‘‘तेरी शादी

के लिए.’’

अविनाश ने कहा, ‘‘शादी, अरे मैं अभी पार्टी नहीं दे सकता.’’

सुनील ने अविनाश से कहा, ‘‘पार्टी नहीं तैयारी. हम प्लानिंग करने इकट्ठा हुए हैं. अब तू चुप कर के बैठ जा.’’

अविनाश चुप बैठे उन चारों की बातें सुन मन ही मन भावुक हो रहा था. बहुत सारी बातचीत के बाद एक लिस्ट तैयार हुई और डिनर और्डर किया गया. खाना खातेखाते रूपा दीपक के घर को निहार रही थी कि सुनील ने उसे छेड़ा, ‘‘क्या तू यहां रहने की सोच रही है? मैं पहले बता दूं दीपक की सगाई हो चुकी है’’

रूपा बोली, सुनील इसे तू चुप कर. मैं तो देख रही हूं कि लिस्ट की पहली टैंशन शायद दूर हो गई.’’

सुनील बोला, ‘‘कैसे?’’

रूपा ने सब से कहा, ‘‘सब से पहले हमें वैडिंगहौल चाहिए था. लेकिन वैडिंगहौल सस्ते नहीं हैं कि इतनी आसानी से मिल जाएं और यहां तो गैस्ट भी मुश्किल से 20 लोग होंगे. तो क्यों न शादी यहीं दीपक के गार्डन में ही कर लें.’’

दीपक अपने घर को देख बोला, ‘‘हां आइडिया अच्छा है. थोड़ी सजावट होगी.’’

सब ने रूपा की तारीफ की. इस बीच विक्की ने अपनी राय दी, ‘‘अगर शादी यही होनो है तो डैकोरेशन कोई बड़ा काम नहीं. मेरी वाइफ आर्ट ऐंड क्राफ्ट टीचर है और प्राइवेट छोटेमोटे स्कूलों और फैमिली फंक्शन में सजावट भी करती है. वह यह काम आसानी से और बिना किसी बड़े खर्चे के कर देगी.’’

‘‘वाहवाह,’’ सुनील ने कहा, ‘‘लो 2 काम लिस्ट से आउट. अब रहा कैटरिंग और म्यूजिक.’’

दीपक ने कहा, ‘‘अरे मेरे पास बहुत बढि़या म्यूजिक सिस्टम है और प्लेलिस्ट भी.’’

‘‘तो अब तो सिर्फ कैटरिंग ही रहा,’’

सुनील बोला.

इस बीच सुरभि का फोन आया. अविनाश ने उसे सारी प्लानिंग बताई. सुरभि अविनाश

के दोस्तों की प्लानिंग सुन खुशी से ?ाम उठी और कहा कि उस की होस्टल की ओनर का छोटा होटल है. खाने का सारा इंतजाम उस के यहां हो जाएगा.

‘‘लो भाई चारों बड़े काम निबट लिए. अब रही सिर्फ दूल्हादुलहन की शौपिंग और पंडित,’’ सुनील ने कहा.

अविनाश ने कहा, ‘‘शौपिंग हम दोनों कर लेंगे और एक वकील से बात कर ली है वह रजिस्ट्रेशन वाली मैरिज 5 हजार में करा देगा. पंडित का भी इंतजाम हो रहा है. अब लगभग सारे काम हो गए हैं. सिवा घर और घर के सामान की खरीदारी के.’’

अगले दिन अविनाश और सुरभि औफिस में बैठ ही घर की तलाश कर कुछ को शौर्टलिस्ट कर रहे थे कि इसी बीच सुरभि की एक दोस्त ने उसे बताया कि उस का कजिन लंदन शिफ्ट हो रहा है. इसलिए वह घर का सामान बेच रहा है. अगर सुरभि चाहे तो जा कर वह सामान देख सकती है. सैकंड हैंड सामान की बात पहले तो सुरभि को अजीब लगी लेकिन फिर अपने बजट को ध्यान रख उस ने सोचा कि देखने में क्या हरज है. शायद कुछ अच्छा मिल ही जाए. अत: सुरभि और अविनाश दोनों औफिस से हाफ डे ले पहले तो शौर्टलिस्ट घरों को देख एक को फाइनल कर आए और फिर सामान देखने गए. बहुत सा सामान काफी पुराना था और कुछ नया ही.

सारा सामान अच्छे से देखने के बाद सुरभि ने एक छोटा सोफा, फ्रिज, एक टेबल, 2 कैबिनेट पसंद कर लीं. सुरभि होस्टल में रहती थी और अविनाश का पीजी इतना बड़ा नहीं कि एक और घर का सामान आ जाए. इसलिए खरीदा सामान दीपक के घर भेजा गया.

समय थोड़ा बचा था इसलिए सुरभि और अविनाश और सामान लेने बाजार

निकल गए. नया बैड, अलमीरा, ड्रैसिंगटेबल और गैस स्टोव लिया गया. जब टीवी की बात चली तो सुरभि ने कहा, ‘‘यह फुजूल खर्चा है. हम दोनों तो अपने ही फोन में बिजी रहते हैं. फिर दोनों के पास लैपटौप तो हैं ही. जो देखना है उस पर ही देख लेंगे. सारे चैनल और ऐप तो उस में भी चलते है. अविनाश को सुरभि की बात सही लगी.

1 हफ्ते के अंदर ही सारी खरीदारी और तैयारी हो चुकी थी. दोनों के नए घर की सफेदी भी. वीकैंड में सभी दोस्तों ने मिल कर सारा सामान घर में जमा भी दिया और फिर अविनाश उस घर में रहने भी लगा. अगले वीकैंड शादी की डेट रखी गई. अविनाश के घर वाले शादी से 2 दिन पहले आ गए और अविनाश के नए घर में ठहरे.

अविनाश के पापा ने कहा, ‘‘घर तो अच्छा है. लोकेशन भी अच्छी है.’’

अविनाश की मां बोलीं, ‘‘काहे का अच्छा. एक टीवी भी नहीं है इस घर में.’’

अविनाश ने कहा, ‘‘मां, आजकल सब फोन और लैपटौप पर देख लेते हैं, इसलिए नहीं लिया. आप को क्या देखना है मैं लैपटौप में लगा देता हूं?’’

अविनाश की मां झेप कर बोलीं, ‘‘तू ही अपनी आंखें उस छोटी खिड़की पर लगा मैं

नहीं देखती.’’

अविनाश के पापा बोले, ‘‘अरे जाने दो न. आजकल टीवी पर आता ही क्या है. सब तो उलटासीधा दिखाते हैं और वही देख कर बच्चे अपनी शादी खुद तय करते हैं और मांबाप को मेहमान बना देते हैं.’’

अविनाश की मां भी ताना मारते हुए बोलीं, ‘‘हां, और जब शादी अपनी मरजी से होगी तो सामान भी कम और पुराना होगा. कम से कम उस के मांबाप को इतनी इज्जत तो रखनी थी कि सामान खरीद कर देते.’’

अविनाश ने बिना कोई आपत्ति जताए सारे ताने सुने. उस ने सोचा

कि चुप रह, ताने खा अगर शादी आसानी से हो रही है तो क्यों कोई खतरा ले.

अगले दिन सुरभि के घर वाले भी आ गए, जिन्हें दीपक के घर ठहराया गया. सुरभि के घर वाले दीपक और बाकी दोस्तों का प्लान देख बहुत खुश हुए. उन्हें उन का काम एक स्मार्ट वर्क लगा. शादी की सुबह ही विक्की की वाइफ ने दीपक के घर का लुक चेंज कर दिया. दीपक के छोटे गार्डन को एक मंडप बन दिया और पूरा डीआईवी के आर्ट से डैकोरेट कर दिया. लाइटिंग भी दीवाली की लाइटिंग की तरह कर दी गई थी जो शाम होते ही जगमगा उठी. दीपक का म्यूजिक सिस्टम भी बेहतरीन प्लेलिस्ट बजाने को तैयार था और होस्टल ओनर के होटल से 20 लोगों के लिए एक बढि़या थाली स्टाइल का खाना भी आ चुका था. बस इंतेजार था अब दूल्हे का.

अविनाश की बरात में कुल 7 लोग थे.

2 मांबाप और बाकी 5 दोस्त. लेकिन फिर भी जोश कम नहीं था. 2 ढोल वालों की ताल पर अविनाश अपने दोस्तों के साथ नाचते?ामते आ गया. विक्की की वाइफ ने लड़की वालों की तरफ से उस का दरवाजे पर स्वागत किया. दीपक की हाउस मैड ने सभी बरातियों को कुछ स्नैक और कोल्डड्रिंक सर्व की. सुरभि का जीजा अपने प्रोफैशनल कैमरे से सब की तसवीरें लेने लगा. अविनाश के घर वालों और सुरभि के घर वालों में बहत ही कम बातचीत हुई. दोनों परिवार अपनाअपना कोना पकड़ बैठ गए. उधर पंडितजी ने बिना देर लगाए फटाफट शादी की विधियां शुरू कर दी. इस बीच अविनाश की मां ने सुरभि से मिलने की बात कही. विक्की की वाइफ अविनाश की मां को ऊपर एक कमरे में ले गई, जहां सुरभि दुलहन का लाल जोड़ा पहन बैठी हुई थी. सुरभि ने उन्हें देखते ही उन के पैर छुए. विक्की की वाइफ दोनों को अकेला छोड़ वापस चली गई.

अविनाश की मां ने सुरभि से कहा, ‘‘बहुत सुंदर दिख रही हो.’’

सुरभि शरमा गई. अविनाश की मां ने आगे कहा, ‘‘यह चमक दुलहन बनने की है या मां.’’

सुरभि का चमकता चेहरा पूरा फीका पड़ गया. वह अविनाश की मां से आंख चुरा एक बुत सी खड़ी हो गई.

अविनाश की मां बोलती रहीं, ‘‘क्या सोच रही हो कि मुझे कैसे पता चला? आज तुम्हारी अलमारी जमा रही थी. सोचा भले बहू मेरी पसंद की नहीं. लेकिन है तो बहू ही, इसलिए जो तुम्हारा बैग आया था न. उसे खोला और तुम्हारे कपड़े अलमारी में जमाने शुरू किए. तभी तुम्हारी यूरिन रिपोर्ट मिली. पहले सोचा अविनाश को खूब मारूं, उस के पापा को सब बता यह शादी ही तोड़ दूं लेकिन फिर सोचा कि तुम दोनों की लापरवाही और हमारा गुस्सा इस बच्चे का भविष्य न खा जा जो भी हो शादी से पहले या बाद बच्चा तो अविनाश का ही है तो जिम्मेदारी तो बनती ही है.’’

बस इतना बोल अविनाश की मां नीचे आ गईं. कुछ देर बाद ही सुरभि भी फेरों के लिए आई. बहुत ही उत्साह और मधुर संगीत के बीच

विवाह संपन्न हुआ. दोनों ने अपने मातापिता से आशीर्वाद लिया. आशीर्वाद लेते वक्त सुरभि बहुत भावुक हो अविनाश की मां से लिपट कर रोने लगी. यह देख सब हैरान थे. सभी यही सोच रहे थे कि बेटी को अपनी मां के गले लग रोना होता है न कि सासूमां के.

सब को होटल से आई स्पैशल थाली परोसी गई. खाने का स्वाद भले अच्छा था लेकिन अविनाश के पापा का मन फीका रहा. वे खाना खातेखाते अपनी बीवी से बोले, ‘‘अपने बेटे की शादी में ढाबे का खाना खा रहे हैं जैसे हम दूल्हे के बाप नहीं कोई ड्राइवर हों.’’

दूसरी तरफ सुरभि के पापा का रिएक्शन पूरा ही उलटा था. वे कहने लगे, ‘‘खाना टेस्टी है. यह थाली सिस्टम से फुजूलखर्ची तो बची ही, साथ ही खाने की बरबादी भी नहीं होगी. भाई मानना पड़ेगा कि तुम्हारे दोस्त बहुत ही अच्छे और अक्लमंद हैं.’’

यह सुन अविनाश के पापा दबी आवाज में बोले, ‘‘हां सिर्फ दोस्त ही अक्लमंद हैं. हमारा बेटा नहीं.’’

सुरभि के जीजा बोले, ‘‘हां बात तो सच है. एक शादी इतने कम समय और बजट में बहुत ही शानदार तरीके से करा दी तुम दोस्तों ने. मैं तो कहता हूं तुम लोग अपना इवेंट मैनेजमैंट का काम शुरू कर लो. कंपनी का नाम रखना- दोस्त रचाएं शादीडौटकौम.’’

बहुत मस्ती और खाने के बाद सब ने ढेर सारी तसवीरे लीं. विदाई की घड़ी सुरभि से ज्यादा अविनाश रोरो कर अपने दोस्तों का शुक्रिया करता रहा.

सुरभि का उस के नए घर में गृहप्रवेश हुआ. जब सुरभि और अविनाश दोनों कमरे में अकेले थे तो सुरभि ने उसे अपनी और अविनाश की मां के बीच हुई बात बताई. अविनाश बहुत हैरान हुआ. उसे अपनी मां पर बहुत प्यार आ रहा था लेकिन वह शर्मिंदा भी था. उसे सम?ा नहीं आ रहा था कि वह किस तरह अपनी मां का सामना करेगा तो उस की दुविधा मिटाने के लिए उस की मां खुद ही आ गईं.

अविनाश की मां ने कहा, ‘‘हम कल चले जाएंगे. अगर कोई जरूरत लगे तो फोन कर देना मैं आ जाऊंगी. 1 महीने बाद से ही जी मतलाने लगता है. तीसरेचौथे महीने से पेट दिखता है. पहले कुछ महीने ध्यान से रहना कोई भागदौड़ का काम मत करना…’’

अपनी मां को बीच में ही टोक अविनाश बोला, ‘‘मां, तुम कितनी अच्छी हो.’’

मां मुसकराईं और एक प्यारा सा चांटा अविनाश के जड़ कहा, ‘‘और तुम बेशर्म. शर्म नहीं आई शादी से पहले बाप बनने में?’’

अविनाश आंखें चुरा कर बोला, ‘‘माफ कर दो मां.’’

‘‘अब बस एक एहसान करना दोनों. जितनी जल्दी यह शादी और बच्चा पैदा करने में की है दोनों तलाक लेने में मत करना. आजकल के बच्चे जितनी जल्दी रिश्ता जोड़ते हैं उतनी जल्दी तोड़ भी देते हैं, इसलिए जिस बच्चे की सोच कर तुम ने समझदारी दिखाते शादी की है तो उसी बच्चे के लिए शादी निभाना भी वरना नहीं हमारी खामोशी और तुम्हारे दोस्तों की निस्स्वार्थ सेवा सब मिट्टी में मिल जाएगा.’’

Family Story in Hindi

Digital India: केवल आम आदमी की परेशानी

Digital India: हाल ही में राज्यसभा में इंफोसिस फाउंडेशन की अध्यक्ष सुधा मूर्ति ने सोशल मीडिया पर बच्चों के इस्तेमाल को ले कर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि मातापिता सोशल मीडिया पर फौलोअर्स बढ़ाने के लिए बच्चों का बचपन छीन रहे हैं. मूर्ति ने बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने और उन की प्रतिभा को विकसित करने का अवसर देने की अपील की है. उन का मानना है कि बच्चों को खेलने, पढ़ने और सीखने का समय मिलना चाहिए.

आप खुद डिजिटल वर्ड के जनक हो

मगर यह समय उन्हें कैसे मिलेगा? अब उन का सारा समय तो सोशल मीडिया, मोबाइल ने खा लिया है. आप ही तो चाहते थे कि भारत जिसे सोने की चिङिया कहा जाता था उसे डिजिटल इंडिया बना दिया जाए. तो लीजिए बन गया डिजिटल इंडिया फिर अब इस टेक्नोलौजी से परहेज क्यों? अब आप खुद भी इसे ऐंजौय करिए और जनता को भी करने दीजिए.

दरअसल, आज हर किसी के हाथ में मोबाइल है. छोटेछोटे मासूम बच्चे रील्स बनाने में लगे हैं. ये डिजिटल रैव्यूलेशन का नतीजा है. पहले तो आप ने खुद ही महिलाओं और बच्चों के हाथों में मोबाइल पकड़ाए और अब जब हरकोई अपना कामधंधा सब छोड़ कर मोबाइल और रील्स बनाने में लगा है, तो आप को बच्चों की चिंता हो रही है. आप ही कहते थे कि डिजिटल रैव्यूलेशन आप को गड्ढे में धकेलने के लिए नहीं बना है. लेकिन अब अगर वह गड्ढे में धकेल रही है तो आप पेरैंट्स को दोष क्यों दें रहे हो? यह गड्ढा किस ने खोदा? आप ही तो सरकार के सारे प्रोग्राम बना रहे हो.

इंफोसिस सब से ज्यादा सरकारी पोर्टलों के ठेके लेता है. यह सुधा मूर्ति जैसे लोगों का फैलाया हुआ रायता है जिसे हम सब समेटने में लगे हैं और अब आप सहानभूति समेटने में लगी हैं.

इस से केवल आप को और सरकार को फायदा हो रहा है. फिर राज्यसभा में इस नौटंकी का क्या मतलब जबकि आप खुद ही चाहते हैं कि हर किसी के हाथ में मोबाइल हो. हर कोई टेक्नोलौजी से जुड़ा हो. लेकिन सवाल यह है इस टेक्नोलौजी का फायदा आखिर हो किसे रहा है? आम जनता सिर्फ इस से परेशान ही हो रही है.

डिजिटल इंडिया की तसवीर का एक पहलू यह भी है

‘डिजिटलीकरण’ साइबर अपराधियों के लिए स्वर्ग है : डिजिटलाइजेशन दिन पर दिन आम आदमी के लिए घातक सिद्ध हो रहा है विशेषकर वहां जहां धन का लेनदेन है. लोग रोजाना ठगी का शिकार होते जा रहे है. यह संख्या बढने पर तो है, लेकिन कम होने का कहीं नाम नहीं ले रही है.

‘डिजिटल अरेस्ट’, सिम स्वैपिंग और यूपीआई फ्रौड जैसे अपराधों में 2024-25 में भारी बढ़ोत्तरी देखी गई है. बैंक खाते से जीवनभर की कमाई एक क्लिक में गायब हो जाती है और अपराधी अकसर कानून की पकड़ से बाहर रहते हैं.

इस का मुख्य कारण है, शिक्षा तो ग्रहण कर ली, लेकिन रोजगार के अभाव में घर बैठ कर करें तो कौन सा काम करें? इसलिए वे इस अपराध की दुनिया में कदम रख रहे हैं. शायद ही कोई बैंक हो जो इस अपराध का शिकार न हुई हो?

डिजिटल डिवाइड (गरीब और अमीर के बीच की खाई)

अमीर घरों के बच्चों के पास हाईस्पीड ब्रौडबैंड, लैपटौप और लेटैस्ट स्मार्टफोन हैं. दूसरी ओर एक गरीब परिवार के पास अकसर पूरे परिवार के लिए सिर्फ एक पुराना स्मार्टफोन होता है, जिस में डेटा पैक खत्म होने का डर हमेशा बना रहता है.

लौकडाउन के दौरान हम ने देखा कि कैसे लाखों गरीब बच्चे शिक्षा से वंचित रह गए क्योंकि उन के पास औनलाइन क्लास लेने के साधन नहीं थे.

इस के आलावा जिन लोगों के पास स्मार्टफोन या डेटा नहीं हैं, वे सरकारी योजनाओं (जैसे राशन, स्वास्थ्य सेवाएं) का लाभ लेने में पिछड़ जाते हैं क्योंकि सब कुछ ‘औनलाइन’ हो गया है.

जब सरकार राशन कार्ड, पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह औनलाइन कर देती है, तो इस का सब से बुरा असर उस गरीब पर पड़ता है जिसे फौर्म भरना नहीं आता.

एक मजदूर को अपना हक पाने के लिए भी अब किसी ‘साइबर कैफे’ वाले को पैसे देने पड़ते हैं या दलालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. इस से भ्रष्टाचार का एक नया डिजिटल स्वरूप पैदा हो गया है.

निजता का खत्म होना

‘डिजिटल इंडिया’और ‘संचार साथी’ जैसे पोर्टल्स पर डेटा एकत्र होता है. अगर डेटा लीक होता है, तो विज्ञापन कंपनियों से ले कर अपराधियों तक, सब के पास आप की निजी जानकारी (नाम, पता, आधार) पहुंच जाती है.

सोशल मीडिया और ऐप्स आप की सहमति के बिना भी आप की लोकेशन, लाइक्स और औनलाइन ऐक्टिविटी को ट्रैक करते हैं, जिसे फेसबुक जैसी कंपनियां विभिन्न ऐप्स (इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप) के जरीए करती हैं. आप की निजी जानकारी गलत हाथों में पड़ने से पहचान की चोरी और फिशिंग हमलों का खतरा बढ़ जाता है.

सीनियर सिटीजन के लिए दिक्कतें

बुजुर्गों को ऐप चलाने, पासवर्ड याद रखने या बायोमीट्रिक (अंगूठे के निशान) देने में दिक्कत होती है. कई बार फिंगरप्रिंट न मिलने के कारण गरीबों को राशन तक नहीं मिल पाता. वे खुद को समाज में कटा हुआ और लाचार महसूस करने लगते हैं.

बैंकिंग से ले कर बिल भरने तक, हर जगह मशीनें आ गई हैं. जब वे बैंक जाते हैं, तो उन्हें ‘मशीन से पैसे निकालने’ या ‘ऐप डाउनलोड’ करने को कहा जाता है, जिस से वे लाचार महसूस करते हैं. उन्हें कौल कर के डराया जाता है कि उन की ‘पेंशन रुक गई है’ या उन के ‘नाम पर वारंट’ है. वे डर के मारे ओटीपी या पिन साझा कर देते हैं और जीवनभर की कमाई खो देते हैं.

डिजिटल अरेस्ट की घटनाएं बढ़ी हैं

एसआईआर या संचार साथी का हवाला दे कर पीड़ित को डराते हैं कि उन पर एफआईआर दर्ज होने वाली है. पीड़ित को घंटों तक वीडियो कौल पर रहने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसे वे ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहते हैं. इस के चलते लोग अपनी पूरी जिंदगी की कमाई कुछ ही घंटों में ही लुटा देते हैं. पढ़ेलिखे लोगों के साथ भी इस तरह की घटनाएं हो रही हैं.

डिजिटल इंडिया नहीं डिजिटल निर्वासन

यद्यपि हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज भी इंटरनैट की 80% से अधिक महत्त्वपूर्ण सामग्री और सेवाएं अंगरेजी में उपलब्ध हैं. यह उन करोड़ों भारतीयों के लिए डिजिटल निर्वासन जैसा है जो अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में बात करते और समझते हैं.

अधिकांश डिजिटल सामग्री अंगरेजी या प्रमुख भाषाओं में है, जिस से क्षेत्रीय भाषाओं के बोलने वाले लोग वंचित रह जाते हैं. क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों से पढ़ने वाले प्रतिभाशाली बच्चे केवल भाषा की कमी के कारण वैश्विक डिजिटल ज्ञान की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं. यह उन की बौद्धिक प्रगति को सीमित कर देता है. सिफर यहीं नहीं बल्कि कहने को तो हिंदी हमारी राजभाषा है लेकिन जब सारा सरकारी  कामकाज और डिजिटल सबकुछ अंगरेजी भाषा में हो रहा है, तो कैसे आप दूरदराज की आम हिंदी भाषी जनता को खुद से जोड़ पाएंगे? क्या इस डिजिटल इंडिया से उन की परेशानियां बढ़ नहीं रहीं?

संचार साथी ऐप डिजिटल पुलिस मैन है. मतलब यह आप की जेब में जबरन घुसा निगरानी कैमरा है.

‘अगर आप इस ऐप को इंस्टौल कर के सिर्फ रजिस्टर करते हैं, तो आप के फोन और एसएमएस ऐप्स का ऐक्सेस लेता है. अगर आप फोटोज अपलोड करते हैं, तो ये गैलरी का ऐक्सेस एक्सेस मांगता है. वहीं आईएमइआई कोड स्कैन करने के लिए ये कैमरे की परमिशन मांगते हैं. कुल मिलाकर ये आप के फोन, कौल लौग्स, एसएमएस, स्टोरेज, कैमरा जैसी परमिशन मांगता है. कंज्यूमर्स एक्टिवेट या डिलीट कर सकते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो यह आप की जेब में जबरन घुसा निगरानी कैमरा है.

हालांकि कुछ बुद्धिजीवियों का इस पर कहना है कि व्हाट्सऐप, गूगल प्ले और बाकी ऐप भी डेटा लेते हैं, फिर बहस क्यों?

लेकिन हम आप को बता दें कि संचार साथी की बहस इसलिए है क्योंकि पहली बार ऐसा ऐप सीधे सरकार की निगरानी में होगा और उस से बचने का विकल्प नहीं मिलेगा. डेटा भी आप का, मोबाइल भी आप का, लेकिन नियंत्रण किसी और का क्यों?

सरकार समर्थकों का तर्क है कि कई निजी ऐप पहले ही लोकेशन, कौन्टैक्ट और व्यवहारिक डेटा का उपयोग करते हैं. पेमेंट ऐप तो बिना लोकेशन के भुगतान भी नहीं होने देते हैं. मगर संचार साथी की बहस इसलिए बड़ी है क्योंकि, पहली बार ऐसा ऐप सीधे सरकार की निगरानी में होगा और उस से बचने का विकल्प नहीं मिलेगा. इस के जरीए आप की सारी प्राइवेसी और सारा डाटा सरकार के पास जा रहा है.

सच तो यह है कि जब डेटा भी आप का, मोबाइल भी आप का, लेकिन नियंत्रण किसी और का क्यों?

कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने भी इसे ‘पेगासस प्लस प्लस’ बताया. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “बड़े भाई हमारे मोबाइल फोन्स को और हमारी प्राइवेट लाइफ को टेकओवर करेंगे. इस के जरीए आप की सारी प्राइवेसी और सारा डाटा सरकार के पास जा रहा है. एक तरह से सरकार हम पर प्यूरी तरह शिकंजा कस रही है. वह भी हमारे ही हाथों से. सरकार का यह रवैया क्या किसी तानाशाह सरकार जैसा नहीं है?”

एसआईआर डिजिटलीकृत अव्यवस्था की मिसाल

देशभर में एसआईआर के नाम पर खुलेआम धांधली हो रही है. एसआईआर सिर्फ वोटरों का एड्रैस जानने के लिए की जा रही है, ताकि चुनाव के दौरान भाजपा उन तक पहुंच सके और उन्हें ट्रेन का मुफ्त टिकट व पैसे दे कर अपने पक्ष में वोट देने के लिए घर ला सके.

मतदाताओं के सामने तो एसआईआर को ले कर समस्याएं ही बनी हुई हैं. किसी का सवाल है कि अपना घर बनवा लिया और अब नए पते पर वोटर कार्ड बनवाना है तो किसी बीएलओ ने 2003 की सूची में नाम नहीं होने पर फौर्म नहीं देने की शिकायत की.

एसआईआर को लेकर जो तसवीर सामने आई है, वह किसी डिजिटलीकृत अव्यवस्था की मिसाल बन गई है. सर्वर डाउन हैं, ऐप हैंग हो रहे हैं, फौर्म नहीं छपे और फील्ड में बीएलओ हाथ मल रहे हैं. इस से 55 जिलों में वह काम, जो पिछले 4 दिसंबर तक खत्म होना था, अब दिनोंदिन और जटिल होता जा रहा है. सर्वर ठप्प होने से बीएलओ के पास न 2003 की लिस्ट, न अपडेट कौपी.

जिस डिजिटल टूल पर पूरा एसआईआर टिका है, वही सब से बड़ी कमजोरी बन गया है. आयोग ने फील्ड डेटा कलैक्शन के लिए जो बीएलओ ऐप तैयार किया, उस की तकनीकी खामियां संकट में बदल चुकी हैं. एप का सब से बड़ा झोल है ब्लड रिलेशन लिंकिंग फीचर. यह सिर्फ पिताऔर दादा के रिश्ते को मान्य करता है. किसी मतदाता को चाचा, ताऊ या भाई से जोडऩा हो तो सिस्टम उसे अमान्य बता देता है.

आम जनता को इस डिजिटल युग की दुनिया में समझ ही नहीं आ रहा कि हमें क्या करना है? कहां जाना है? किस से बात करनी है? कोई कुछ बताने वाला नहीं है. हरकोई पैसे बनाने में लगा है और सरकार बस किसी तानाशाह की तरह अपनी नईनई स्किम और फैसले जनता पर थोप रही है और सुधा मूर्ति जैसे लोग इस पर बेवजह की टिप्पणियां कर सहानभूति बटोरने का काम कर रहे हैं जबकि वे खुद इस सिस्टम का हिस्सा हैं.

तो फिर ये रोनापीटना किस के लिए किया जा रहा है? उन मासूम बच्चों के लिए जिन के हाथों में ये मोबाइल पकड़ाने वाले भी आप ही हैं या फिर खुद लाइमलाइट में आने के लिए ताकि आप की सत्ता की दुकानें यों ही चलती रहें?

Digital India

Love Story in Hindi: सुरक्षाबोध: नए प्यार की कहानी

Love Story in Hindi: लड़के ने लड़की को मैसेज किया सुंदर से गुलाब के फूल के साथ, जिस की पंखुडि़यों पर ओस की बूंदें थीं. उस के हाथ जुड़े हुए थे और उस पर लिखा था, ‘‘बीते साल में हम से कोई गलती हुई हो तो माफ कीजिएगा. यह साथ नए वर्ष में भी बना रहे.’’

उस मैसेज को पढ़ कर लड़की ने हंसते हुए अनेक इमोजी दाग दिए.

‘‘अरे, ऐसा तो मैं ने कुछ नहीं कहा कि इतना हंसा जाए,’’ बेचारा हैरान सा हो कर रह गया. अभी सोच ही रहा था कि उधर से हंसी वाले इमोजी की एक कतार और टपक पड़ी. अगले दिन जब मुलाकात हुई तो उस ने पूछ ही लिया, ‘‘भला ऐसा क्या था मेरे मैसेज में जो तुम को हंसी आ गई, जोक तो नहीं भेजा था मैं ने.’’

लड़की फिर भी लगातार हंसे जा रही थी. उस ने थोड़ा झुक कर पेट पकड़ लिया था और दोहरी हुई जा रही थी. लड़की की विस्मय से आंखें फटी जा रही थीं.

‘‘तुम ने जोक नहीं सुनाया, यह तो सही है मगर तुम ने माफी किस बात की मांगी, यह तो बताओ,’’ लड़की ने कहा.

‘‘ऐसे ही, जानेअनजाने गलती हो जाती है. बस, इसीलिए मैं ने इंसानियत के नाते माफी मांग ली.’’

18 साल की वह लड़की देखने में पूरी तरह मौडर्न कही जा सकती थी. मिनी स्कर्ट के साथ पिंक स्लीवलैस टौप उस पर खूब फब रहा था. कंधे तक कटे बाल उस पर बहुत सूट कर रहे थे. आंखों में लगे मोटेमोटे काजल ने उन्हें और बड़ा बना दिया था. वह इतनी अदा से बोल रही थी कि लड़के की नजर उस के चेहरे से हट ही नहीं रही थी. लड़का कुछ कम स्मार्ट हो, ऐसा नहीं था. अच्छाखासा कद, चौड़े कंधे, स्टाइलिश बाल, उसे देख कर कोई भी लड़की उस पर फिदा हो सकती थी.

वे दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. कालेज औफ कैंपस था. आसपास का माहौल भी ऐसा था कि बिगड़े और कुछ लफंगे लड़के ही नजर आते थे. कालेज में सुबह से शाम तक हलचल रहती थी और किसी न किसी बात पर होहल्ला भी होता रहता था.

वे दोनों कैंटीन में थे. लड़की चल कर बड़ी टेबल तक पहुंच गई. लड़का भी उस के पीछेपीछे चला जा रहा था जैसे सूई के पीछे धागा. लड़की ने टेबल पर अपना पर्स उलट दिया, छोटेछोटे कई सामान गिर पड़े, ब्रेसलेट, ईयर रिंग, रूमाल आदि. उस ने ब्रेसलेट हाथ में उठाया और लड़के की नाक के पास ले गई. लड़के को लगा था माथे पर मारेगी तो थोड़ा पीछे हटा, लेकिन, लड़की नहीं मानी, वह उतना ही आगे झुक गई.

‘‘यह ब्रेसलेट मुझे उस ने दिया,’’ लड़की ने कहा.

‘‘हकलाते हुए उस ने बोला, ‘‘किस ने?’’

‘‘वह जो फर्स्ट रौ में सब से लास्ट में बैठता है.’’

‘‘अच्छाअच्छा वह तो…’’ लड़के ने राहत की सांस ली. लेकिन अगले ही पल लड़की ने परफ्यूम उठा लिया और दाएंबाएं शीशी नचाने लगी. पास आते हुए बोली, ‘‘यह मुझे उस ने दिया.’’

‘‘किस ने?’’ लड़का फिर घबरा गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि उस की सांस क्यों तेज चल रही है.

‘‘वही जिस के बाजू पर टैटू है,’’ लड़की बोली, ‘‘और कुछ कहा भी, सुनना चाहोगे?’’

लड़का हकलाने लगा था, ‘‘हां, ब…ब… बताओ… क क क्या कहा था उस ने?’’

‘‘न्यू ईयर गिफ्ट जानेमन,’’ लड़की ने बताया.

लड़के की आंखों की पुतलियां फैल गईं, ‘‘उस ने ऐसा कहा?’’

लड़की अब एक के बाद एक आइटम उठाउठा कर लड़के की आंखों के सामने नचा रही थी और देने वाले का बखान भी कर रही थी.

फिर, लड़की एकदम गंभीर हो गई.

‘‘तुम लड़के क्या समझते हो? मित्रता क्या है?’’

लड़का मौन था. जैसे सांप सूंघ गया हो. उसे लड़की की ओर देखने के अलावा कुछ और सूझ नहीं रहा था. न सूझने के कारण ही वह अवाक था. ऐसा लगने लगा जैसे उस की आंखें 2 बटन की तरह लड़की के चेहरे पर टांक दी गई थीं.

लड़की अब तटस्थ हो चली थी, ‘‘तुम लड़के हम से मित्रता करते ही क्यों हो? क्योंकि यह एक अच्छा टाइमपास है?’’ उस ने अपना मुंह दूसरी ओर घुमा लिया.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है,’’ लड़का मुश्किल से बस इतना ही बोल पाया.

‘‘तो फिर बताओ,’’ लड़की अब काफी नजदीक आ गई थी. उस का चेहरा फिर लड़के के चेहरे के बिलकुल सामने था जैसे कि उस की आंखें लड़के की आंखों में कूदी जा रही थीं.

‘‘तुम ने कभी इन सब को रोका क्यों नहीं, तुम तो जानते थे कि ये सब मुझे तंग करते हैं या नहीं, जानते थे. बोलो?’’ उस के हाथ से चुटकी बजी.

‘‘हां, थोड़ा तो…’’ लड़के ने जवाब दिया.

‘‘तो फिर?’’ लड़की ने उसे घूरते हुए कहा.

‘‘सौरी,’’ लड़का झिझकते हुए बोला.

‘‘सौरी क्यों बोल रहे हो,’’ लड़की ने आश्चर्य से उस की ओर देखते हुए कहा.

‘‘मुझे इन सब के बारे में पता नहीं था लेकिन जब मैं उन सब को तुम्हारी तरह देखता, तो मुझे लगता था जैसे तुम्हें यह अटैंशन अच्छी लगती है.’’

‘‘क्या, सच में?’’

‘‘हां, पर सच अब जान पाया हूं और गलती का एहसास हो रहा है.’’

लड़के को फिर से कुछ सूझ नहीं रहा था. कुछ न सूझने की यह बीमारी उस की एकदम नई थी. बेचारा सही अर्थों में मिट्टी का माधो हो गया था. वैसे लड़का था मेधावी. हमेशा मैरिट लिस्ट में रहता था. स्कूल के दिनों में ऐथलीट भी रहा. लेकिन इधर कालेज में आने के बाद किताबी कीड़ा हो गया था. पिता की बेकरी शौप पर भी कभीकभी बैठ लेता था. ग्राहकों से मिठयामिठया कर बोलता. वैसे कोई ऐब नहीं था लड़के में. बस, दिन में 2-4 मैसेज वह लड़की को कर ही देता था. उस का हालचाल पूछता, गुडमौर्निंग और गुडनाइट के अलावा फलानेढिमकाने दिवस की शुभकामनाएं देता रहता और हां, उस की डीपी को एकांत में जूम कर के देखा करता.

शायद लड़का लड़की को मन ही मन चाहता था पर बेचारा बोलने से घबरा जाता. उसे लगता, कहीं जितनी बात होती है वह भी बंद न हो जाए.

इधर लड़की को भी लड़के की संजीदगी पसंद थी. लड़की के सामने आने पर वह मुसकरा कर रह जाता, कभीकभी हाय बोलता. कभी अधिक बात नहीं करता था. यही उस की एक बात थी जो लड़की को अच्छी लगती थी. वह चाहती थी इस घोंचू से कुछ कहे, मगर क्यों कहे, क्या उसे खुद नहीं दिखाई देता?

जब परफ्यूम वाले लड़के ने परफ्यूम गिफ्ट किया था और जानेमन कहा था तो सातों समंदर उस के अंदर खौल पड़े थे, फिर भी वह ऊपर से शांत पानी थी. लहर का कोई निशान नहीं. निर्भया के साथ क्या हुआ इधर हैदराबाद में वेटेरिनरी डाक्टर का भी कैसा हाल हुआ था. उन्नाव में भी… तभी उसे उस लड़की का चेहरा याद आ गया. वह किसी से मदद नहीं मांग सकती. हां, यह लड़का है न, कुछ और नहीं तो कम से कम उस के साथ चल तो सकता है, उन से बात कर सकता है समझा सकता है. लेकिन लड़के ने ऐसा कुछ नहीं किया. वह किसी तरह व्हाट्सऐप नंबर पा गया था और इतने में ही खुश था. लड़की ने लंबी सांस ली और बताया, ‘‘मैं अब क्लासेस अटैंड नहीं करूंगी.’’

‘‘क्यों?’’ लड़के ने पूछा.

‘‘डर लगता है कहीं मैं भी… निर्भया…डाक्टर… उन्नाव… समझ गए न? मुझे इस माहौल में डर लगता है कभीकभी.’’

‘‘चुप,’’ न जाने कैसे लड़के का हाथ लड़की के मुंह तक चला गया. लड़की की आंखों में 2 बूंदें आंसू की छलक आई थीं. इस बार सातों समंदर में एकसाथ ज्वार आया था.

‘‘मैं वादा करता हूं,’’ लड़का अब तक स्वयं को संतुलित कर चुका था. ‘‘तुम्हारी सुरक्षा अब मेरी जिम्मेदारी है. तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा. तुम्हें अब से कोई तंग नहीं करेगा,’’ कहते हुए लड़का एक समझदार वयस्क की तरह पेश आ रहा था.

लड़की अब सुबकने लगी थी. उस ने लड़के का हाथ अपने मुंह से हटा दिया, ‘‘मगर वे तुम्हें कुछ करेंगे तो नहीं? झगड़ा मत करना प्लीज’’ लड़की को अब एक अलग तरह का डर सताने लगा था.

‘‘मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा,’’ उस ने लड़की का हाथ अपने हाथ में ले लिया, ‘‘मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे साथ रहूंगा, देखूंगा तुम्हें कोई तंग न करे, तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा, बस.’’

‘‘सच?’’ लड़की खुश थी. उस ने लड़के के कंधे को अपने सिर से हलका धक्का दिया, ‘‘जाओ, अब माफ किया.’’

‘‘हैं?’’ लड़का फिर हैरान था.

‘‘नए साल में अगर मुझ से कोई गलती हो गई हो तो प्लीज मुझे माफ करना. यह साथ यों ही बना रहे,’’ कहते हुए लड़की के मुंह से फूल और सितारे झड़ रहे थे जो सीधे धरती से आकाश तक फैल गए थे. लड़का लड़की को खुश देख कर खुश था.

Love Story in Hindi

Short Hindi Story: हारी भी तो इन से: कौन थी रीना

Short Hindi Story: आजकल मुझे सब से ज़्यादा गुस्सा किस पर आता है, बताऊं? मेरे जैसी तेज़तर्रार, गुस्सैल, ज़िद्दी औरत पर.

हारी भी तो किस से, बताऊं? अरे भई, पति और सास की बात नहीं कर रही हूं मैं, रीना शर्मा,  जिस के बारे में मेरे घर वाले, फिर दोस्तयार, फिर ससुराल वाले कानों पर हाथ रख कर यही कहते रह गए, ‘भई, रीना से कौन जीत सकता है. रीना के कौन मुंह लगे. उलटे जवाब देने की हाज़िरजवाबी में रीना का कोई मुकाबला नहीं कर सकता. रीना को कौन चुप करवा सकता है.’

लेकिन अब उम्र के चौथे दशक में रह जाती हूं मैं चुप, नहीं सूझता मुझे कि इसे क्या बोलूं.

तो आजकल एक तो मुझे डाक्टर गुप्ता पर गुस्सा आता है जिन्होंने मेरी कुछ परेशानियों को देखते हुए किचन में कुछ महीनों के लिए कुकिंग के लिए खड़ा होना बंद कर दिया है. खैर, पहले तो गुप्ताजी मुझे देवदूत से लगे, भई, कितनी औरतों को किचन से छुट्टी मिलती है. खैर, थोड़े ही दिन यह ख़ुशी बनी रह पाई क्योंकि खाना बनाने के लिए फिर दया आ गई. दया…मन में चलने वाला करुणा भाव नहीं…जीती जागती, भोली सी दिखने वाली पर मुझे बातबात में चुप करवा देने वाली दया बाई.

तो हुआ यह कि हर इंसान की तरह दया बाई में भी अपने अलग ही गुणदोष हैं. बस, मैं ने कभी यह नहीं सोचा था कि मेरे घर में, मेरे किचन में खड़े हो कर कोई मुझे ऐसे जवाब देगा कि मैं चुप हो कर खुद ही किचन से निकलना बेहतर समझूंगी. जिस ने कभी किसी की बात सुन कर चुप्पी न साधी हो, वह बाई की बात सुन कर चुप रह जाती है. और दिन होते तो कसम से दया घर में पहले जवाब के बाद ही दिखाई न देती, जैसे सासुमां चाह कर भी यहां कभी ज़्यादा न टिक पाईं.

अब तो मेरे दिल में रातदिन यही गाना चलता है कि ‘उठाए जा उन के सितम और जिए जा…’ वह खाना ठीकठाक बना लेती है तो दिल पर पत्थर रखना पड़ रहा है.

अब सुनाती हूं उस के जवाब. एक दिन रोटी ऐसी बनी थी कि जैसे कई दिनों की हो, बासी सी लगी तो मैं ने कहा, ‘दया, आज रोटी बहुत सूखी सी थी, खाई नहीं जा रही थी.’

एक सैकंड भी नहीं लगा उसे कारण सोचने में, बोली, ‘हां दीदी, गरमी तो इतनी है कि इंसान सूख रहा है, रोटी क्या चीज है. बहुत तेज़ गरमी है बाहर. लगता है, रोड पर ही गिर जाऊंगी. यहां तो सिर्फ रोटी ही सूखी है.’

बताइए, इस बात का आप क्या ज़वाब दे पाते?

मेरे दिल में जो थोड़ीबहुत इंसानियत बची है, उस के चलते मैं यह तो नहीं कह सकती थी न, कि हम से क्या मतलब, बाहर गरमी है या नहीं, हमें तो रोटी अच्छी चाहिए. अब भला ऐसे भी कभी कहा जाता है. बस, हो गई थी मैं चुप, ‘हूं’ कह कर किचन से निकलती बनी.

एक दिन हम लंच करने बैठे. मेथी की सब्जी में इतनी बड़ीबड़ी डंडियां थीं कि सब को लगा हम आज घास ही खा रहे हैं, सीधेसादे पति और शैतान बच्चों ने जैसे बस आंसू ही नहीं बहाए, दर्द उन के चेहरों पर साफ़ देखा जा सकता था. बेचारे दया का खाना यह सोच कर चुपचाप खा लेते हैं कि मुझे अभी बनाना नहीं है, मज़बूरी है. पर मेरा दिमाग घूम गया, मैं खूब बड़बड़ाई, ‘बस आज इस की छुट्टी कर दूंगी. कुछ कहती नहीं हूं तो फ़ायदा उठा रही है. आने दो इसे आज.’ मैं खूब कलपी, ‘रोज़ बहाने बनाती है. आज पूछती हूं कि मेथी ऐसे क्यों काटी. हम क्या जानवर हैं जो घास खा रहे हैं. जो पैसे मांगे, वही देते हैं. ऐसा खाना बिलकुल नहीं खाएंगे. कोई और कुक ढूंढती हूं’ वगैरहवगैरह.

आप सब ये डायलौग या तो अपने घरों में सुन चुके होंगे या कह चुकी होंगी. पति और बच्चों ने एकदूसरे को इशारा किया कि क्या लगता है, आज दया गई? बच्चों ने हंसते हुए कहा, ‘दया आंटी के जवाब का इंतज़ार है, मां. देखना है कि आज वे क्या कहेंगी’

मैडम आईं, मैं ने कहा, ‘दया, यह मेथी आज कैसी बड़ीबड़ी काट कर बना गई थी? डंडी ही मुंह में आती रही. लगा, घास खा रहे हैं.’

‘हां दीदी, मैं तो बनाते हुए ही दुखी हो रही थी कि आज आप कैसे खाना खाओगे. बहुत ही खराब मेथी आ रही है. अब कुछ दिन लाना ही मत. मुझे तो अजीब सी मेथी देख कर ही बुरा लग रहा था कि कैसे खाई जाएगी. उस में पत्तियां तो थी ही नहीं, बस डंडियां ही थीं. ये सब्जी वाले बहुत बदमाश हो गए हैं. आप आजकल फोन पर मंगवा रही हैं न, कुछ भी भेज देते हैं. आप डाँटो उन्हें. आप पैसे देती हैं. कोई फ्री में थोड़े ही ले रही हैं. कुछ भी सड़ीगली भेज देते हैं.’

मुझे कुछ न सूझा, हमेशा की तरह उसे क्या बनाना है, बता कर किचन से बाहर आई तो खून और जल गया. तीनों किचन के बाहर कान लगाए सुन रहे थे. मैं तीनों को घूरते हुए बैडरूम में चली गई, सब मेरे पीछेपीछे आए. बैड पर ही बैठ कर एकदूसरे को ऐसे देखा कि मुझे हंसी आ गई.

पति की हिम्मत बढ़ी, बोले, ‘भई, तुम हारी भी तो इस से’

नाश्ते में अकसर पोहा बनाती है, जिस में काफी गांठें पड़ जाती हैं. एक दिन टोका, तो जवाब था, ‘आप लोगों के खाने तक ठंडा हो जाता है न, दीदी, क्या आप गरम करते हुए इस में पानी नहीं डालतीं?’

मैं ने कहा, ‘पानी कौन डालता है?’

‘अरे दीदी, पानी डाल कर गांठें हाथ से मसल कर गरम किया करो, एकदम ठीक हो जाता है फिर.’

कितना सब्र आता जा रहा है मुझ में. मैं खुद हैरान हूं कि मैं इस के हर जवाब को बिना कोई रिस्पौंस दिए सुन कर किचन से निकल जाती हूं. हुंह्ह, इस ने मेरे वे जवाब अभी तक सुने नहीं हैं न, जो मैं आज तक दुनिया को दे कर चुप करवाती आई हूं. क्या यही कर्मा है? क्या जो जवाब दे कर सास, जेठानी, मां, पति, ननद, पड़ोसी सब को चुप करवाती आई हूं, क्या वही वापस मिल रहा है? हाय, दया रानी, तुम ने मेरे जलवे नहीं देखे. कोई मेरे मुंह नहीं लगता था. वह तो शरीर ने थोड़ा धोखा दे दिया, तो चुप हूं. एक बार किचन में खड़ी होने लायक हो जाऊं, तो बताती हूं तुम्हें.

घर की साफ़सफाई करने वाली दस सालों से जो मेड आती है, आरती, वह सही है. बिलकुल नहीं बोलती. कभी जितना पूछती हूं, उतना ज़वाब दे देती है. तो मुझे इस बात की तो आदत ही नहीं है न, कि कोई मुझे चुप करवा दे और मुझे कोई ज़वाब न सूझे. दया में गुण भी हैं, जैसे कि इन के नियम हैं कि 2 छुट्टी लेंगे तो वही 2 दिन नहीं आती है. आरती को चुप रहना आता है पर एक महीने में उस की 5-6 छुट्टियां होती हैं. मैं जब कहती हूं, ‘आरती, बहुत छुट्टियां हो गईं भई?’ तो बस ‘हां दीदी’ ही कहा है 10 सालों में. कर लो इस ‘हां दीदी’ पर क्लेश. कितना क्लेश अकेले कर लोगे जब कोई दूसरा आगे बोल ही नहीं रहा.!

आरती को अब साफ़ नहीं दिखता. एक दिन काफी कचरा पड़ा रह गया, उसे दिखा ही नहीं. मैं ने कहा, ‘आरती, तुम्हें अब साफ़ नहीं दिखता न?’

‘नहीं दीदी.’

‘तो चश्मा लगाया करो.’

‘दीदी, मुझे चश्मा लगाना पसंद नहीं.’

मैं ने कुढ़ कर अपना चश्मा यों ही ठीक किया, पूछा, ‘अपने घर के काम कैसे करती हो?’

‘दीदी, घर पर तो लगा लेती हूं, घर से बाहर निकलती हूं तो नहीं लगाती. काम चल ही रहा है.’

मुझे तो अपनी हाजिरजवाबी पर एक गुमान सा रहा है हमेशा. मन हुआ, कहूं, भई, तुम्हारा काम चल रहा है, यहां तो सफाई ठीक से नहीं हो रही है न. पर मैं चुप रह गई. आरती बहुत ईमानदार है, मैं किसी भी ज़रूरत के समय उस पर घर छोड़ कर निकल सकती हूं. पर कई बार सोचती हूं, इन्हें ये ज़वाब सूझ कैसे जाते हैं.

पति तो एक दिन अपनी हंसी छिपाते हुए बोल पड़े, ‘सारी दुनिया के सामने तुम्हें शेर बने देखा है, इन दोनों के सामने क्या हो जाता है तुम्हें. मेरी अम्मां यह दिन देखतीं तो बहुत खुश होतीं.’ अब तो बच्चों को भी पता चल गया है कि दया और आरती के जवाबों के सामने मुझे चुप रह जाना पड़ता है. मुझे कुछ नहीं सूझता. मैं दोनों में से किसी को कुछ भी कह रही होती हूं तो बच्चों के कान खड़े हो जाते हैं कि मुझे अब क्या ज़वाब मिलेगा और मैं कैसे कलपती हुई चुप रह जाऊंगी. दीदीदीदी कर के कैसे अपनी हर गलती को सिरे से खारिज कर मुझे चुप करवा देती हैं. हाय, मैं कभी ऐसी न थी. कभी नहीं सोचा था सब के सामने अपना मोरचा अपने दम पर संभालने वाली मेरी ज़बान इन दोनों के सामने हार जाएगी. यह गम मुझे आजकल बड़ा सता रहा है पर अब हार गई हूं. सोचिए, हारी भी तो किस से. दया और आरती से. सच कहते हैं मेरे पति, अम्मां होतीं तो आज वे बहुत खुश होतीं.

Short Hindi Story

Social Story in Hindi: वक्त बदल रहा है

Social Story in Hindi: सुबह-सुबह अखबार के पन्ने पलटते हुए लीना की नजर स्थानीय समाचार वाले पन्ने पर छपी एक खबर पर पड़ी :

‘सुश्री हरिनाक्षी नारायण ने आज जिला कलक्टर व चेयरमैन, शहर विकास प्राधिकार समिति का पदभार ग्रहण किया.’

आगे पढ़ने की जरूरत नहीं थी क्योंकि लीना अपने कालिज और कक्षा की सहपाठी रह चुकी हरिनाक्षी के बारे में सबकुछ जानती थी.

यह अलग बात है कि दोनों की दोस्ती बहुत गहरी कभी नहीं रही थी. बस, एकदूसरे को वे पहचानती भर थीं और कभीकभी वे आपस में बातें कर लिया करती थीं.

मध्यवर्गीय दलित परिवार की हरिनाक्षी शुरू से ही पढ़ाई में काफी होशियार थी. उस के पिताजी डाकखाने में डाकिया के पद पर कार्यरत थे. मां एक साधारण गृहिणी थीं. एक बड़ा भाई बैंक में क्लर्क था. पिता और भाई दोनों की तमन्ना थी कि हरिनाक्षी अपने लक्ष्य को प्राप्त करे. अपनी महत्त्वाकांक्षा को प्राप्त करने के लिए वह जो भी सार्थक कदम उठाएगी, उस में वह पूरा सहयोग करेंगे. इसलिए जब भी वे दोनों बाजार में प्रतियोगिता संबंधी अच्छी पुस्तक या फिर कोई पत्रिका देखते, तुरंत खरीद लेते थे. यही वजह थी कि हरिनाक्षी का कमरा अच्छेखासे पुस्तकालय में बदल चुका था.

हरिनाक्षी भी अपने भाई और पिता को निराश नहीं करना चाहती थी. वह जीजान लगा कर अपनी पढ़ाई कर रही थी. कालिज में भी फुर्सत मिलते ही अपनी तैयारी में जुट जाती थी. लिहाजा, वह पूरे कालिज में ‘पढ़ाकू’ के नाम से मशहूर हो गई थी. उस की सहेलियां कभीकभी उस से चिढ़ जाती थीं क्योंकि हरिनाक्षी अकसर कालिज की किताबों के साथ प्रतियोगी परीक्षा संबंधी किताबें भी ले आती थी और अवकाश के क्षणों में पढ़ने बैठ जाया करती.

लीना, हरिनाक्षी से 1 साल सीनियर थी. कालिज की राजनीतिक गतिविधियों में खुल कर हिस्सा लेने के कारण वह सब से संपर्क बनाए रखती थी. वह विश्वविद्यालय छात्र संघ की सचिव थी. उस के पिता मुखराम चौधरी एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल ‘जनमत मोर्चा’ के अध्यक्ष थे. इस राजनीतिक पृष्ठभूमि का लाभ उठाने में लीना हमेशा आगे रहती थी. यही वजह थी कि कालिज में भी उस की दबंगता कायम थी.

एकमात्र हरिनाक्षी थी जो उस के राजनीतिक रसूख से जरा भी प्रभावित नहीं होती थी. लीना ने उसे कई बार छात्र संघ की राजनीति में खींचने की कोशिश की थी. किंतु हर बार हरिनाक्षी ने उस का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. उसे केवल अपनी पढ़ाई से मतलब था. जलीभुनी लीना फिर ओछी हरकतों पर उतर आई और उस के सामने जातिगत फिकरे कसने लगी.

‘अरे, यह लोग तो सरकारी कोटे के मेहमान हैं. थोड़ा भी पढ़ लेगी तो अफसर…डाक्टर…इंजीनियर बन जाएगी. बेकार में आंख फोड़ती है.’

कभी कहती, ‘सरकार तो बस, इन्हें कुरसी देने के लिए बैठी है.’

हरिनाक्षी पर उस के इन फिकरों का जरा भी असर नहीं होता था. वह बस, मुसकरा कर रह जाती थी. तब लीना और भी चिढ़ जाती थी.

लीना के व्यंग्य बाणों से हरिनाक्षी का इरादा दिनोदिन और भी पक्का होता जाता था. कुछ कर दिखाने का जज्बा और भी मजबूत हो जाता.

हरिनाक्षी ने बी.ए. आनर्स की परीक्षा में सर्वोच्च श्रेणी में स्थान प्राप्त किया तो सब ने उसे बधाई दी. एक विशेष समारोह में विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने उस का सम्मान किया.

हरिनाक्षी ने उस समारोह में शायद पहली और आखिरी बार अपने उद्गार व्यक्त करते हुए परोक्ष रूप से लीना के कटाक्षों का उत्तर देने की कोशिश की थी :

‘शुक्र है, विश्वविद्यालय में और सब मामलों में भले ही कोटे का उपयोग किया जाता हो, मगर अंक देने के मामले में किसी भी कोटे का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.’ यह कहते हुए हरिनाक्षी की आंखों में नमी आ गई थी. सभागार में सन्नाटा छा गया था. सब से आगे बैठी लीना के चेहरे का रंग उड़ गया था.

उस दिन के बाद से लीना ने हरिनाक्षी से बात करना बंद कर दिया था.

इस बीच हरिनाक्षी की एक प्यारी सहेली अनुष्का का दिन दहाडे़ एक चलती कार में बलात्कार किया गया था. बलात्कारी एक प्रतिष्ठित व्यापारी का बिगडै़ल बेटा था. पुलिस उस के खिलाफ सुबूत जुटा नहीं पाई थी. लिहाजा, उसे जमानत मिल गई थी.

क्षुब्ध हरिनाक्षी पहली बार लीना के पास मदद के लिए आई कि बलात्कारी को सजा दिलाने के लिए वह अपने पिता के रसूख का इस्तेमाल करे ताकि उस दरिंदे को उस के किए की सजा मिल सके.

लीना ने साफसाफ उसे इस झमेले में न पड़ने की हिदायत दी थी, क्योंकि वह जानती थी कि उस के पिता उस व्यापारी से मोटी थैली वसूलते थे.

अनुष्का ने आत्महत्या कर ली थी. लीना बुरी तरह निराश हुई थी.

हरिनाक्षी उस के बाद ज्यादा दिनों तक कालिज में रुकी भी नहीं थी. एम.ए. प्रथम वर्ष में पढ़ते हुए ही उस ने ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ की परीक्षा दी थी और अपनी मेहनत व लगन के बल पर तमाम बाधाओं को पार करते हुए सफल प्रतियोगियों की सूची में देश भर में 7वां स्थान प्राप्त किया था. आरक्षण वृत्त की परिधि से कहीं ऊपर युवतियों के वर्ग में वह प्रथम नंबर पर थी.

उस के बाद लीना के पास हरिनाक्षी की यादों के नाम पर एक प्रतियोगिता पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपी उस की मुसकराती छवि ही रह गई थी. अपनी भविष्य की योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करती हुई लीना ने जाने क्या सोच कर उस पत्रिका को सहेज कर रखा था. एक भावना यह भी थी कि कभी तो यह दलित बाला उस की राजनीति की राहों में आएगी.

लीना के पिता अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में हर जगह बेटी को पेश करते थे. लीना की शादी भी उन्होंने एक व्यापारिक घराने में की थी. उस के पति का छोटा भाई वही बलात्कारी था जिस ने लीना के कालिज की लड़की अनुष्का से बलात्कार किया था और सुबूत न मिल पाने के कारण अदालत से बरी हो गया था.

लीना शुरू में इस रिश्ते को स्वीकार करने में थोड़ा हिचकिचाई थी, लेकिन पिता ने जब उसे विवाह और उस के राजनीतिक भविष्य के बारे में विस्तार से समझाया तो वह तैयार हो गई. लीना के पिता ने लड़के के पिता के सामने यह शर्त रख दी थी कि वह अपनी होने वाली बहू को राजनीति में आने से नहीं रोकेंगे.

लीना आज अपनी राष्ट्रीय पार्टी ‘जनमत मोर्चा’ की राज्य इकाई की सचिव है. पूरे शहर के लिए हरदम चर्चा में रहने वाला एक अच्छाखासा नाम है. आम जनता के साथसाथ ब्लाक स्तर से ले कर जिला स्तर तक सभी प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी उसे व्यक्तिगत रूप से जानते हैं. अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल वह अपने पति के भवन निर्माण व्यवसाय की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति के लिए बखूबी कर रही थी. इन दिनों उस के पति कमलनाथ अपने एक नए प्रोजेक्ट का काम शुरू करने से पहले कई तरह की अड़चनों का सामना कर रहे थे.

लीना को पूरी उम्मीद थी कि हरिनाक्षी पुरानी सहपाठी होने के नाते उस की मदद करेगी और अगर नहीं करेगी तो फिर खमियाजा भुगतने के लिए उसे तैयार रहना होगा. ऐसे दूरदराज के इलाके में तबादला करवा देगी कि फिर कभी कोई महिला दलित अधिकारी उस से पंगा नहीं लेगी. कमलनाथ लीना को बता चुके थे कि इस प्रोजेक्ट में उन के लाखों रुपए फंस चुके थे.

दरअसल, शहर के व्यस्त इलाके में एक पुराना जर्जर मकान था. इस के आसपास काफी खाली जमीन थी. मकान मालिक शिवचरण उस मकान और जमीन को किसी भी कीमत पर बेचने को तैयार नहीं हो रहे थे. अपने बापदादा की निशानी को वह खोना नहीं चाहते थे. उस मकान से उन की बेटी अनुष्का की ढेर सारी यादें जुड़ी हुई थीं.

कमलनाथ ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को अपने प्रोजेक्ट में यह कह कर हिस्सेदारी देने की पेशकश की थी कि वह शिवचरण को ‘येन केन प्रकारेण’ जमीन खाली करने पर या तो राजी कर लेंगे या फिर मजबूर कर देंगे.

उस पुलिस अधिकारी ने अपने रोबदाब का इस्तेमाल करना शुरू किया, लेकिन शिवचरण थे कि आसानी से हार मानने को तैयार नहीं हो रहे थे. पहले तो वह पुलिसिया रोब से भयभीत नहीं हुआ बल्कि वह अपनी शिकायत पुलिस थाने में दर्ज कराने जा पहुंचा. यहां उसे बेहद जिल्लत झेलनी पड़ी थी. भला पुलिस अपने ही किसी आला अधिकारी के खिलाफ कैसे मामला दर्ज कर सकती थी? उन्होंने लानतमलामत कर उसे भगा दिया.

शिवचरण ने भी हार नहीं मानी और उन्हें पूरा विश्वास था कि एक न एक दिन उन की फरियाद जरूर सुनी जाएगी.

नई कलक्टर के कार्यभार संभालने की खबर ने उन के दिल में फिर से आस जगाई.

हर तरफ से निराश शिवचरण कलक्टर के दफ्तर पहुंचे.

आज कलक्टर साहिबा से वह मिल कर ही जाएंगे. चाहे कितना भी इंतजार क्यों न करना पडे़.

एक कागज पर शिवचरण ने अपना नाम लिखा और सचिव रामसेवक को दिया. रामसेवक ने कागज पर लिखा नाम पढ़ा तो उस के माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं. एक सीनियर पुलिस अधिकारी के मामले में लिप्त होने के कारण उस का नाम जिले के सभी प्रशासनिक अधिकारी जानते थे.

‘‘काम क्या है?’’ रामसेवक ने रूखे स्वर में पूछा.

‘‘वह मैं कलक्टर साहिबा को ही बताऊंगा,’’ शिवचरण ने गंभीरता से उत्तर दिया.

‘‘बिना काम के वह नहीं मिलतीं,’’ रामसेवक ने फिर टालना चाहा.

‘‘आज उन से मिले बगैर मैं नहीं जाऊंगा,’’ शिवचरण की आवाज थोड़ी तेज हो गई.

कलक्टर साहिबा के केबिन के बाहर खड़ा चपरासी यह सब देख रहा था.

अंदर से घंटी बजी.

चपरासी केबिन के अंदर जा कर वापस आया.

‘‘आप अंदर जाइए. मैडम ने बुलाया है,’’ चपरासी ने शिवचरण से कहा.

कुछ ही क्षणों के बाद शिवचरण कलक्टर साहिबा हरिनाक्षी के सामने बैठे थे.

शिवचरण को देख कर कलक्टर साहिबा चौंक पड़ीं, ‘‘चाचाजी, आप अनुष्का के पिता हैं न?’’

‘‘आप अनुष्का को कैसे जानती हैं?’’ शिवचरण थोडे़ हैरान हुए.

‘‘मैं अनुष्का को कैसे भूल सकती हूं. उस के साथ मेरी गहरी दोस्ती थी. उस का कालिज से घर लौटते समय अपहरण कर लिया गया था. 3 दिन बाद उस की विकृत लाश नेशनल हाइवे पर मिली थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार दरिंदों ने उस के साथ बलात्कार किया था और फिर गला घोंट कर उस की हत्या कर दी थी. अफसोस इस बात का है कि अपराधी आज भी बेखौफ घूम रहे हैं. खैर, आप बताइए कि आप की समस्या क्या है?’’

शिवचरण की आंखें भर आईं. एक तो बेटी की यादों की कसक और दूसरा अपनी समस्या पूरी तरह खुल कर बताने का अवसर मिलना. वह तुरंत कुछ न कह पाए.

‘‘चाचाजी, आप कहां खो गए?’’ हरिनाक्षी ने उन की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘आप अपना आवेदनपत्र दीजिए.’’

शिवचरण ने अपना आवेदनपत्र हरिनाक्षी की तरफ बढ़ाया तो वह उसे ले कर ध्यानपूर्वक पढ़ने लगी.

शिवचरण ने पूरी बातें विस्तार से लिखी थीं.

कैसे कमलनाथ ने एक पुलिस अधिकारी से मिल कर उन का जीना हराम कर दिया था और पुलिस अधिकारी ने अपनी कुरसी का इस्तेमाल करते हुए उन्हें धमकाने की कोशिश की थी. पत्र में और भी कई नाम थे जिन्हें पढ़ कर हरिनाक्षी हैरान हो रही थी. अनुष्का के बलात्कार के आरोपी निर्मलनाथ का नाम पढ़ कर तो उस के गुस्से का ठिकाना न रहा और लीना का नाम पढ़ कर तो उस ने अविलंब काररवाई करने का फैसला कर लिया.

‘खादी की ताकत का घमंड बढ़ता ही गया है लीना देवी का,’ हरिनाक्षी ने सोचा.

‘‘चाचाजी, आप चिंता न करें. आप की अपनी इच्छा के खिलाफ कोई आप को उस जमीन से, उस घर से निकाल नहीं सकता. आप जाएं,’’ हरिनाक्षी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा.

‘‘तुम्हारा उपकार मैं जीवन भर नहीं भूल सकता, बेटी,’’ शिवचरण ने भरे गले से कहा.

‘‘इस में उपकार जैसा कुछ भी नहीं, चाचाजी. बस, मैं अपना कर्तव्य निभाऊंगी,’’ हरिनाक्षी की आवाज में दृढ़ता थी.

उस ने घंटी बजाई. चपरासी अंदर आया तो हरिनाक्षी बोली, ‘‘ड्राइवर से कहो इन्हें घर तक छोड़ आए.’’

‘‘चलिए, सर,’’ चपरासी ने शिवचरण से कहा.

चपरासी के साथ शिवचरण को बाहर आता देख कर रामसेवक आश्चर्य- चकित हो उठा और तुरंत अपना मोबाइल निकाला और दोएक नंबरों पर बात की.

इस बीच, अंदर से घंटी बजी तो रामसेवक मोबाइल जेब में रख कर तुरंत उठ कर केबिन में आने के लिए तत्पर हुआ.

‘‘एस.पी. साहब से कहिए कि वह हम से जितनी जल्द हो सके संपर्क करें,’’ हरिनाक्षी ने कहा.

‘‘जी, मैडम,’’ रामसेवक ने तुरंत उत्तर दिया और बाहर आ कर एस.पी. शैलेश कुमार को फोन घुमाने लगा.

‘‘साहब, रामसेवक बोल रहा हूं. मैडम ने फौरन याद किया है.’’

‘‘ठीक है,’’ उधर से आवाज आई.

आधे घंटे बाद एस.पी. शैलेश कुमार हरिनाक्षी के सामने आ कर बैठे नजर आए.

‘‘शैलेशजी, क्या हम जिले के सभी पुलिस अधिकारियों की एक संयुक्त बैठक कल बुला सकते हैं?’’ हरिनाक्षी ने पूछा.

‘‘हां…हां…क्यों नहीं?’’ एस.पी. साहब ने तुरंत उत्तर दिया.

‘‘तो फिर कल ही सर्किट हाउस में यह बैठक रखें,’’ हरिनाक्षी ने आदेशात्मक स्वर में कहा.

‘‘जी, मैडम,’’ एस.पी. साहब ने हामी भरी.

कलक्टर हरिनाक्षी के आदेश के अनुसार संयुक्त बैठक का आयोजन हुआ. जिले के सभी पुलिस थानों के थानेदारों समेत सभी छोटेबडे़ पुलिस अधिकारी बैठक में शामिल हुए.

सभी उत्सुक थे कि प्रशासनिक सेवा में बडे़ ओहदे पर कार्यरत यह सुंदर दलित बाला कितनी कड़कदार बातें कह पाएगी.

हरिनाक्षी ने बोलना शुरू किया :

‘‘साथियो, जिले की कानून व्यवस्था को संतुलित बनाए रखना और आम जनता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना 2 अलगअलग चीजें नहीं हैं. आप को यह वरदी आतंक फैलाने या दबंगता बढ़ाने के लिए नहीं दी गई बल्कि आम लोगों के इस विश्वास को जीतने के लिए दी गई है कि हम उन की हिफाजत के लिए हर वक्त तैयार रहें.

‘‘बड़े अफसोस की बात है कि हमारे पुलिस थानों में आम जनता के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता है. इसलिए आम जन पुलिस थाने में जाने से डरते हैं जबकि पैसे वाले और प्रभावशाली लोगों को तरजीह दी जाती है. मेरे पास कई ऐसी शिकायतें लिखित रूप में आई हैं जिन्हें पुलिस स्टेशन में दर्ज होना चाहिए था, लेकिन वहां उन की बात नहीं सुनी गई.

‘‘मेरा सभी पुलिस अधिकारियों से यह आग्रह है कि मेरे पास आए ऐसे सभी आवेदनपत्रों के आधार पर केस संख्या दर्ज की जाए और संबंधित व्यक्तियों को बताया जाए और उन्हें आश्वस्त किया जाए कि उन की शिकायतों पर उचित काररवाई की जाएगी.’’

Social Story in Hindi

Fictional Story: प्रिया: क्या हुआ था हेमंत के साथ

Fictional Story: हर रोज की तरह आज भी शाम को मर्सिडीज कार लखनऊ के सब से महंगे रैस्तरां के पास रुकी और हेमंत कार से उतर कर सीधे रैस्तरां में गया. वहां पहुंच कर उस ने चारों तरफ नजर डाली तो देखा कि कोने की टेबिल पर वही स्मार्ट युवती बैठी है, जो रोज शाम को उस जगह अकेले बैठती थी और फ्रूट जूस पीती थी. हेमंत से रहा नहीं गया. उस ने टेबिल के पास जा कर खाली कुरसी पर बैठने की इजाजत मांगी.

‘‘हां, बैठिए,’’ वह बोली तो हेमंत कुरसी पर बैठ गया. इस से पहले कि दोनों के बीच कोई बातचीत होती हेमंत ने उसे ड्रिंक औफर कर दिया.

‘‘नो, इस्ट्रिक्टली नो. आई डोंट टेक वाइन,’’ युवती ने विदेशी लहजे में जवाब दिया.

हेमंत को समझते देर नहीं लगी कि युवती विदेश में सैटल्ड है.

वह युवती का नाम जान पाता, इस से पहले युवती ने बात आगे बढ़ाई और बोली, ‘‘मैं कनाडा में सैटल्ड हूं. वहां वाइन हर मौके पर औफर करना और पीना आम बात है, लेकिन मैं अलकोहल से सख्त नफरत करती हूं.’’

‘‘आप का नाम?’’ हेमंत ने पूछा.

‘‘क्या करेंगे जान कर? मैं कुछ महीनों के लिए इंडिया आई हूं और थोड़े दिनों बाद वापस चली जाऊंगी. शाम को यहां आती हूं रिलैक्स होने के लिए. क्या इतना जानना आप के लिए काफी नहीं है?’’ युवती ने जवाब दिया और अपनी घड़ी देख उठने लगी.

‘‘प्लीज, कुछ देर बैठिए. मैं आप के साथ कुछ देर और बैठना चाहता हूं. मुझे गलत मत समझिए. आप के विचारों ने मुझे बहुत इंप्रैस किया है, प्लीज,’’ हेमंत ने कहा.

मौडर्न तरीके से साड़ी में लिपटी हुई उस युवती ने कुछ सोचा फिर बैठ गई और बोली, ‘‘मेरा नाम प्रिया है और मैं एनआरआई हूं. एक टीम के साथ गैस्ट बन कर इंडिया घूमने आई हूं. यहां लखनऊ में मेरे चाचा रहते हैं, इसलिए उन से मिलने आई हूं. मेरे पेरैंट्स वर्षों पहले कनाडा शिफ्ट कर गए थे. वहां वे सरकारी स्कूल में टीचर हैं.’’

इतना कह कर उस ने फिर चलने की बात कही तो हेमंत ने कहा, ‘‘चलिए मैं आप को चाचा के घर छोड़ देता हूं. मुझ पर विश्वास कीजिए और यकीन न हो तो अपने चाचा से इजाजत ले लीजिए. उन से कहिए कि सुपर इंडस्ट्रीज के मालिक की गाड़ी से घर आ रही हूं. सुपर इंडस्ट्रीज लखनऊ और पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है.’’

प्रिया ने उस से विजिटिंग कार्ड मांगा. उसे देखा फिर पर्स में रखा और उस के साथ चलने को राजी हो गई. गाड़ी में बैठते वक्त हेमंत अत्यधिक विचलित सा था. पता नहीं क्यों एक अनजान युवती को वह अपना समझने लगा था. शायद युवती के आकर्षक व्यक्तित्व व अंदाज से प्रभावित हो गया था. गाड़ी में हेमंत ने पारिवारिक बातें छेड़ीं और अपने परिवार और बिजनैस के बारे में बताता रहा. गाड़ी तो चल पड़ी, लेकिन जाना कहां है हेमंत को मालूम नहीं था. उस ने प्रिया से पूछा, ‘‘कहां जाना है?’’

‘‘अमीनाबाद,’’ प्रिया का संक्षिप्त जवाब था.

‘‘तुम्हारे चाचा क्या करते हैं?’’ हेमंत ने फिर सवाल किया.

प्रिया ने बताया कि उस के चाचा इरिगेशन डिपार्टमैंट में जौब करते हैं और अमीनाबाद में उन का फ्लैट है.

‘‘गाड़ी रोकिए , मेरा घर पास ही है,’’ प्रिया ने कहा.

हेमंत ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘‘चलिए घर तक छोड़ देता हूं.’’

‘‘नहींनहीं ठीक है. अब मैं खुद चली जाऊंगी,’’ प्रिया का जवाब था.

फिर मिलने की बात नहीं हो पाई. प्रिया कार से उतर कर रोड क्रौस कर के गायब हो गई. हेमंत उदास सा अपने घर की ओर चल पड़ा. गेट पर दरबान ने विस्मय से हेमंत की ओर देखा और बोला, ‘‘साहब, बड़ी जल्दी घर आ गए.’’ हेमंत बिना कुछ बोले गाड़ी पोर्टिको में रख कर बंगले में पहुंचा. मम्मी अपने कमरे में थीं. उस की इकलौती लाडली छोटी बहन ड्राइंगरूम में बैठ कर एक बुकलेट में हीरों का सैट देख कर पैंसिल से उन्हें टिक कर रही थी.

हेमंत ने पूछा, ‘‘क्या देख रही हो बिन्नी?’’

बिन्नी ने हेमंत के प्रश्न का उत्तर दिए बिना कहा, ‘‘भैया, आज जल्दी आ गए हो तो चलो हीरे का सैट खरीद दो. मेरा बर्थडे भी आ रहा है, वह मेरा गिफ्ट हो जाएगा.’’ हेमंत सोफे पर बैठा ही था कि हाउसमेड ऐप्पल जूस का केन और कुछ ड्राई फ्रूट्स ले कर आ गई. जूस पीते हूए हेमंत समाचारपत्र देखने लगा और बिन्नी से बोला, ‘‘जल्दी रेडी हो जाओ. चलो तुम्हारा सैट खरीद देता हूं.’’

वे डायमंड सैट खरीद कर लौट रहे थे तो बिन्नी ने हिम्मत जुटा कर अपने भैया से पूछा, ‘‘भैया, एक सैट तो मैं ने अपनी पसंद से खरीदा, लेकिन दूसरा सैट तुम ने अपनी पसंद से क्यों खरीदा?’’ हेमंत के पास तुरंत कोई जवाब नहीं था, वह बस मुसकरा कर रह गया. बिन्नी को लगा कि पैरेंट्स 2 वर्षों से जिस दिन का इंतजार कर रहे थे, संभवतया वह दिन आने वाला है. वरना दर्जनों विवाह के रिश्ते को ठुकराने के बाद भैया ने आज क्व18 लाख का डायमंड सैट क्यों खरीदा? जरूर आने वाली भाभी के लिए.

घर जा कर जब बिन्नी ने यह रहस्य खोला तो पूरे घर में उत्सव का माहौल हो गया. हाउसमेड ने मुसकराते हुए रात का खाना परोसा, तो कुक ने एक स्पैशल डिश भी बना डाली. खाना खा कर सभी हंसतेखिलखिलाते अपनेअपने कमरों में चले गए.

सुबह हुई तो हेमंत के डैडी ने कोई गाना गुनगुनाते हुए चाय की चुसकी ली, तो बिन्नी और उस की मम्मी ने दिन भर शादी की तैयारी पर बातचीत की. गैस्ट की लिस्ट भी जुबानी तैयार की.

फिर वही शाम, लखनऊ का वही रैस्तरां. लेकिन घंटों इंतजार के बाद भी प्रिया नहीं आई, तो हेमंत उदास सा देर रात में अपने घर लौटा. अगली शाम कुछ देर के इंतजार के बाद प्रिया ने रैस्तरां में प्रवेश किया, तो हेमंत लगभग दौड़ता हुआ उस के पास गया और पूछा, ‘‘कल क्यों नहीं आईं?’’

‘‘क्या मेरे नहीं आने से आप को कोई प्रौब्लम हुई?’’ प्रिया ने उलटा सवाल किया.

हेमंत ने अपने दिल की बात कह डाली, ‘‘मुझे तुम्हारे जैसी लड़की की तलाश थी, जो मेरे लाइफस्टाइल से मैच करे और मेरी मां और बहन को पूरा प्यार दे सके. यह सिर्फ भारतीय मानसिकता वाली लड़की ही कर सकती है. सच कहूं, यदि तुम्हारी शादी नहीं हुई है तो समझो मैं तुम्हें अपनी बीवी मान बैठा हूं.’’

प्रिया ने प्रश्न किया, ‘‘बिना पूरी तहकीकात किए इतना बड़ा फैसला कैसे ले सकते हैं? आप मेरे नाम के सिवा और कुछ भी जानते हैं? आप के बारे में भी मुझे पूरी जानकारी हासिल नहीं है. मुझे अपने पेरैंट्स की भी सलाह लेनी है. जैसे आप अपने परिवार के बारे में सोचते हैं, वैसे ही मेरे भी कुछ सपने हैं, परिवार के प्रति जवाबदेही है. और इस की क्या गारंटी है कि शादी के बाद सब ठीकठाक होगा?’’

हेमंत ने प्रस्ताव रखा, ‘‘चलो मेरे घर, वहीं पर फैसला होगा.’’

प्रिया घर जाने को राजी नहीं हुई. उस का कहना था कि वह अपने चाचा के साथ उस के घर जा सकती है. कार में बैठ कर अगले दिन अपने चाचा को रैस्तरां में लाने का वादा कर प्रिया नियत मोड़ पर कार से उतर गई.

अगली शाम फिर वही रैस्तरां. प्रिया आज अत्यधिक स्मार्ट लग रही थी. साथ में एक 20-22 वर्ष का लड़का था, जिसे प्रिया ने अपना कजिन बताया. चाचा के बारे में सफाई दी कि चाचा अचानक एक औफिस के काम से चेन्नई चले गए हैं, सप्ताह भर बाद लौटेंगे. हेमंत चुप रहा, लेकिन प्रिया उस के दिलोदिमाग में इस कदर छा गई थी कि वह एक कदम भी पीछे नहीं हटने को तैयार नहीं था. घर में पूरी तैयारी भी हो चुकी थी, ऐसे में उस ने मौके को हाथ से जाने देने को मुनासिब नहीं समझा.

प्रिया और उस के कजिन को ले कर हेमंत अपने घर पहुंच गया. बिन्नी और उस की मां ने घर के दरवाजे पर आ कर दोनों का स्वागत किया. बिन्नी प्रिया का हाथ पकड़ कर अंदर ले गई.

सीधीसाधी किंतु स्मार्ट युवती को देख कर सभी खुश थे पर हेमंत के डैडी इतनी जल्दी फैसला लेने को तैयार नहीं थे. लेकिन हेमंत, बिन्नी और पत्नी के आगे उन की एक न चली. हेमंत की मां बहू पाने की लालसा में अत्यंत उत्साहित थीं. हेमंत द्वारा खरीदा हुआ क्व18 लाख का हीरे का सैट प्रिया को मुंह दिखाई में दे दिया गया. मंगनी की चर्चा होने पर प्रिया ने कहा कि मंगनी 1 महीने बाद की जाए, क्योंकि मेरे पेरैंट्स अभी इंडिया नहीं आ सकते. वैसे मां से मेरी बात हुई है. मां ने मुझ से कह दिया है कि मेरी पसंद उन सब की पसंद होगी.

हेमंत को एक बिजनैस ट्रिप में विदेश जाना था. उस ने इच्छा जताई कि मंगनी की रस्म जल्दी संपन्न कर दी जाए. परिवार वालों ने हामी भर दी, तो मंगनी की तारीख 2 दिन बाद की तय हो गई. फाइव स्टार होटल के अकबर बैंक्वैट हौल में हेमंत का परिवार और तकरीबन 100 गैस्ट आए. प्रिया पर सभी मेहमानों ने भेंट स्वरूप गहनेऔर कैश की वर्षा कर दी. हेमंत ने हीरे की अंगूठी पहनाई, तो प्रिया ने भी एक वजनदार सोने की अंगूठी हेमंत को पहनाई. हेमंत की मां ने फिर क्व25 लाख का हीरों का सैट दिया. डिनर के बाद सभी गैस्ट बधाई देते हुए एकएक कर के विदा हो गए, तो दस्तूर के अनुसार बिन्नी और उस की मां ने गहनों और कैश का आकलन किया. लगभग क्व5 लाख कैश और क्व85 लाख मूल्य के गहने भेंट स्वरूप प्राप्त हुए थे. बिन्नी मुबारकबाद देते हुए प्रिया से गले मिली और एक पैकेट में पैक कर के गिफ्ट उस के हाथों में थमा दिया. हमेशा की तरह हेमंत ने अपने ड्राइवर को प्रिया मैडम को घर तक छोड़ने की हिदायत दी और गार्ड को भी साथ जाने का हुक्म दिया. फिर अगले दिन लंच साथ करने का औफर देते हुए प्रिया को विदा किया. अगली सुबह ब्रेकफास्ट के बाद हेमंत ने औफिस पहुंच कर जल्दी काम निबटाया. औफिस स्टाफ ने बधाइयां दीं और मिठाई की मांग की. तो हेमंत पार्टी का वादा कर प्रिया के घर की ओर चल पड़ा. 20-25 मिनट बाद अमीनाबाद पहुंच कर ड्राइवर ने वहां गाड़ी रोक दी जहां हर बार प्रिया उतरती थी और हेमंत से सवाल किया, ‘‘अब किधर जाना है, साहब?’’

‘‘प्रिया मैडम के घर चलो,’’ हेमंत ने ड्राइवर की ओर देख कर कहा.

‘‘साहब, मैडम रोज यहीं उतर जाती थीं. कहती थीं कि लेन के अंदर कार घुमाने में प्रौब्लम होगी,’’ ड्राइवर ने जवाब दिया.

‘‘अरे, बुद्धू, तुम रोज मैडम को यहीं सड़क पर उतार देते थे. मंगनी की रात गार्ड को भी भेजा था. वह जरूर साथ गया होगा, उसे फोन लगाओ,’’ हेमंत गरजा.

गार्ड बंगले की ड्यूटी पर था. उस ने जवाब दिया, ‘‘मैं ने बहुत जिद की पर मैडम बोलती रहीं कि वे खुद चली जाएंगी. उन के हुक्म और जिद के आगे हमारी कुछ नहीं चली.’’

हेमंत जोर से चिल्लाया, ‘‘बेवकूफ, मैं ने तुम्हें मैडम की सिक्यूरिटी के लिए भेजा था और तुम ने उन्हें आधे रास्ते पर छोड़ कर अकेले जाने दिया? मैं तुम दोनों की छुट्टी कर दूंगा.’’ हेमंत ने अब प्रिया को फोन किया लेकिन उस का स्विच औफ मिला. उस ने अपने औफिस पहुंच कर फिर फोन लगाया. इस बार प्रिया का रेस्पौंस आया. वह धीमी आवाज में बोली, ‘‘मेरे कजिन की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है. उसे डाक्टरअभी देख रहे हैं. मैं रात में बात करती हूं,’’ इतना कह कर प्रिया ने मोबाइल का स्विच औफ कर दिया.

हेमंत की रात बैचेनी से कटी. अगली सुबह मौर्निंग जौगिंग छोड़ कर हेमंत अमीनाबाद की ओर चल पड़ा. मंगनी के 36 घंटे बीत चुके थे. प्रिया से पूरी तरह संपर्क टूट चुका था. ड्राइवर ने जिस गली को प्रिया मैडम के घर जाने का रास्ता बताया था, दिन के उजाले में हेमंत अनुमान से उस जगह पर पहुंच गया और कार को रुकवा फुटपाथ पर चाय की दुकान पर चाय पीने लगा. हेमंत को हर हाल में आज प्रिया से मिलना था, अत: उस ने चाय वाले से हुलिया बताते हुए पूछताछ की. बाईचांस चाय वाले ने प्रिया को 2 बार कार से उतरते देखा था, लेकिन उस ने भी निराशाजनक जवाब दिया.उस ने हेमंत को बताया, ‘‘आप ने जो हुलिया बताया वैसे हुलिए की अनेक महिलाएं हैं और रात में देखे गए चेहरे की पहचान करना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन एक बात पक्की है कि जिस गाड़ी से 2 बार मैं ने उन्हें उतरते देखा, यह वही गाड़ी है जिस से आप आए हैं.’’

हेमंत पैदल चलते हुए गली में प्रवेश कर गया. सुबह का समय था इसलिए प्राय: हर कोई घर में ही था. कुछ लोगों ने प्रिया नाम सुन कर कहा कि इस नाम की किसी लड़की को नहीं जानते, लेकिन एक पढ़ेलिखे नेता टाइप के मौलवी साहब ने जो बातें हेमंत को बताईं, उसे सुन कर हेमंत के पैरों तले मानो जमीन खिसक गई. मौलवी साहब ने कहा, ‘‘बेटे, इस गली में या तो मजदूर या छोटीमोटी नौकरी करने वाले लोग रहते हैं. यहां कभी भी किसी एनआरआई या आप के बताए हुए हुलिए की युवती को कभी नहीं देखा गया है. यह गली जहां खत्म होती है उस से आगे रिहाइशी इलाका भी नहीं है, आप गलत जगह आ गए हैं.’’

हेमंत को महसूस होने लगा कि उस के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है. उस के पास प्रिया के घर के पते के नाम पर सिर्फ अनजान गली की जानकारी भर थी. हेमंत वहां से निकल कर रैस्तरां की ओर चल पड़ा. रैस्तरां में अभी साफसफाई चल रही थी, किंतु हेमंत साहब को सुबहसुबह देख कर सारा स्टाफ बाहर आ गया. हेमंत को वहां जो जानकारी मिली उस ने उस की शंका को हकीकत में बदल दिया. सिक्यूरिटी गार्ड ने बताया कि वे मैडम जब पहली दफा रैस्तरां आई थीं, तब उन्होंने मुझ से पूछा कि सुपर इंडस्ट्रीज वाले हेमंत रस्तोगी कौन हैं? मैं ने आप की ओर इशारा किया था. इस के बाद आप दोनों को साथसाथ निकलते देखा तो हम सब यह समझे कि आप लोग एकदूसरे को जानते हैं.

हेमंत सुन कर लड़खड़ा सा गया, तो स्टाफ ने मिल कर उसे संभाला. हेमंत को प्रिया का तरीका समझ में आ गया था. पूरी योजना बना कर और एक अच्छे होमवर्क के साथ हेमंत को टारगेट बना कर उस के साथ फ्रौड किया गया था. हेमंत संभल कर कार में बैठा और घर जा कर सभी को यह कहानी सुनाई. अपने घबराए हुए बेटे को आराम की सलाह दे कर हेमंत के पापा सिटी एसपी के औफिस पहुंच गए. एसपी ने ध्यान से सारी बातें सुनीं, इंगैजमैंट की तसवीर रख ली और दूसरे दिन आने के लिए कहा. एसपी के कहने पर प्रिया के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई.

अगले दिन हेमंत और उस के डैडी सिटी एसपी के औफिस पहुंचे, तो उन्होंने बताया कि दिल्ली क्राइम ब्रांच से खबर मिली है कि इस सूरत की एक लड़की हिस्ट्री शीटर है. फोटो की पहचान पर दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से पता चला है कि बताई गई मंगनी की तारीख के दूसरे दिन वह युवती कनाडा के लिए रवाना हो गई है. यह भी पता चला कि यह युवती बीचबीच में इंडिया आती है और अपना नाम बदल कर विभिन्न शहरों में ऐसा फ्रौड कर के सफाई से विदेश भाग जाती है. एक बार तो जयपुर में शादी रचा डाली और सारा सामान ले कर चंपत हो गई. लेकिन अब वह बच नहीं पाएगी, क्योंकि मैं ने रैडअलर्ट की सिफारिश कर दी है. अगली बार इंडिया आते ही पकड़ी जाएगी. हेमंत को अब यह बात समझ में आ गई कि उस युवती ने कजिन की बीमारी के नाम पर संपर्क तोड़ा और आसानी से भाग निकली.

हेमंत के डैडी ने एसपी साहब से पूछा कि आगे क्या होगा? तो उन्होंने कहा कि अगर लड़की पकड़ी गई तो पहचान के लिए पुलिस थाने आना होगा और केस चलने पर कोर्ट में भी आना होगा. कई तारीखों पर गवाह के रूप में आना आवश्यक होगा. इन सब से पहले तफतीश के समय पुलिस के सामने बयान देना होगा और अपने गवाहों के बयान भी दर्ज कराने पड़ेंगे. हेमंत के डैडी ने टिप्पणी की, ‘‘यानी अपने बिजनैस से टाइम निकाल कर कोर्टकचहरी और पुलिस के चक्कर लगाने होंगे.’’ एसपी साहब ने मुसकरा कर कहा, ‘‘ये तो कानून से जुड़ी बातें हैं. इन का पालन तो करना ही होगा.’’

अब हेमंत ने मुंह खोला और बोला, ‘‘लाखों का फ्रौड और कोर्टकचहरी की दौड़ भी. नुकसान तो बस हमारा ही है.’’ एसपी ने दोबारा पुलिस के संपर्क में बने रहने की बात कही और हेमंत के डैडी से हाथ मिला कुरसी से खड़े हो गए. हेमंत के हिस्से में अब पछतावे और अफसोस के सिवा कुछ भी नहीं बचा था.

Fictional Story

Best Hindi Story: फातिमा बीबी- 10 साल बाद भी क्यों नहीं भुला पाई वह

Best Hindi Story: राजपूताना राइफल्स के मुख्यालय में अपने केबिन में बैठे कर्नल अमरीक सिंह सरकारी डाक देख रहे थे. एक पत्र उन की नजरों में ऐसा आया जो सरकारी नहीं था. वह एक विदेशी और प्राइवेट पत्र था. पत्र पर लगे डाक टिकट से उन्होंने अनुमान लगाया कि या तो यह पत्र किसी गल्फ देश से है या पड़ोसी देश पाकिस्तान से. उर्दू में लिखे शब्दों से यही लगता था. उन्हें इन देशों से पत्र कौन लिख सकता है, अपने दिमाग पर जोर देने पर भी उन्हें दूरदूर तक ऐसा कोई अपना याद नहीं आया, जो विदेश में जा कर बस गया हो.

पत्र खोला तो वह भी उर्दू में था. वे जब पहली क्लास में स्कूल गए थे तो पंजाब के स्कूलों ने उर्दू पढ़ाना बंद कर दिया था. पत्र में क्या लिखा है, वे कैसे जान पाएंगे. दिमाग पर जोर दिया कि उन की रैजिमैंट में ऐसा कौन है जो उर्दू पढ़नालिखना जानता हो. अरे, हां, कैप्टन नूर मुहम्मद, वह अवश्य उर्दू जानता होगा. मुसलमान होने के साथसाथ वह लखनऊ का रहने वाला है जहां उर्दू खासतौर पर पढ़ी और लिखी जाती है.

उन्होंने घंटी बजाई. केबिन के बाहर खड़ा जवान आदेश के लिए तुरंत हाजिर हुआ.

‘‘कैप्टन नूर मुहम्मद से कहिए, मैं ने उन को याद किया है.’’

जवान आदेश ले कर चला गया. थोड़ी देर बाद कैप्टन नूर मुहम्मद ने कर्नल साहब को सैल्यूट किया और सामने की कुरसी पर बैठ गए.

कर्नल साहब ने उन की ओर देखा और पत्र आगे बढ़ा दिया.

‘‘आप तो उर्दू जानते होंगे? आप इसे पढ़ कर बताएं कि पत्र कहां से आया है और किस ने लिखा है?’’

‘‘जी, जरूर. यह पत्र लाहौर, पाकिस्तान से आया है और लिखने वाली हैं कोई बीबी फातिमा.’’

‘‘ओह.’’

‘‘सर, आप तो पाकिस्तान कभी गए नहीं, फिर फातिमा बीबी को आप कैसे जानते हैं?’’

‘‘सब बताऊंगा, पहले पढ़ो कि लिखा क्या है.’’

‘‘जी, जरूर. लिखा है, कर्नल अमरीक सिंह साहब को फातिमा बीबी का सलाम. यहां सब खैरियत है, उम्मीद करती हूं, सारे परिवार के साथ आप भी खैरियत से होंगे. परिवार से मेरी मुराद रैजिमैंट के अफसरों, जूनियर अफसरों और जवानों से है.

‘‘मुझे सब याद है, मैं आप सब को कभी भूल ही नहीं पाई. वह खूनी खेल, चारों तरफ खून ही खून, लाशें ही लाशें, लाशें अपनों की, लाशें बेगानों की, बूढ़े मां, बाप, भाइयों की लाशें, टुकड़ों में बिखरी पड़ी थीं. मैं बहुत डरी हुई थी जब आप के जवानों की टुकड़ी ने मुझे रिकवर किया था. आप ने जिस तरह मेरी हिफाजत की थी, तब से मेरा आप के परिवार से संबंध बन गया था. मैं इस संबंध को कभी भूल नहीं पाई. इस बात को 10 साल होने जा रहे हैं. आज मैं हर तरह से खुश हूं. मेरी खुशहाल जिंदगी है, जो आप की देन है, मैं इसे कभी भूल नहीं पाई और कभी भूल भी नहीं पाऊंगी.

‘‘जब आप को मेरा यह खत मिलेगा, मैं दिल्ली के लिए रवाना हो चुकी होऊंगी. वहां मेरी खाला (मौसी) रहती हैं जिन का पता भी लिख रही हूं. मुझे पता नहीं, आप हिंदुस्तान में कहां हैं पर मैं जानती हूं, आप कुछ ऐसा जरूर करेंगे कि मैं आप से और आप के परिवार से मिल सकूं.

‘‘आप की खैरियत चाहने वाली.

फातिमा.’’

कैप्टन नूर मुहम्मद ने देखा, शेर सा दिल रखने वाले कर्नल साहब, जिन्हें भारत सरकार ने उन की बहादुरी के लिए ‘महावीर चक्र’ से नवाजा है, यह छोटा सा पत्र सुन कर पिघल गए, आंखें नम हो गईं. यह आश्चर्य ही था कि विकट से विकट परिस्थितियों में चट्टान की तरह खड़ा रहने वाला व्यक्ति इस प्रकार भावनाओं में बह जाएगा.

‘‘सर, आप की आंखों में आंसू? और यह फातिमा कौन है?’’

‘‘क्यों भई, मैं भी इंसान हूं. मेरी आंखों में भी आंसू आ सकते हैं. फातिमा की एक लंबी कहानी है. आप रैजिमैंट में 65 की लड़ाई के बाद आए.

‘‘65 की लड़ाई का अभी सीजफायर हुआ ही था. 22 दिन यह लड़ाई चली थी. हमारी रैजिमैंट पाक के सियालकोट सैक्टर के ‘अल्लड़’ गांव में थी. ‘अल्लड़’ रेलवे स्टेशन हमारे कब्जे में था. वही रैजिमैंट का मुख्यालय भी था. सियालकोट से डेराबाबा नानक तक पाकिस्तान की मिलिटरी सप्लाई बिलकुल रोक दी गई थी. रैजिमैंट मोरचाबंदी मजबूत करने और छिपे हुए दुश्मनों को सफाया करने में व्यस्त थी. गांव के एक घर से अस्तव्यस्त और क्षतविक्षत अवस्था में यह फातिमा हमारी एक पैट्रोलिंग पार्टी को मिली जिस की कमांड मेजर रंजीत सिंह के हाथ में थी. फातिमा के परिवार के सारे लोग लड़ाई में मारे गए थे. पाक के फौजी फातिमा के पीछे पड़े हुए थे. शायद उस की इज्जत लूटने के बाद मार देते. पर हमारी टुकड़ी से उन की भिड़ंत हो गई. कुछ मारे गए, कुछ भाग गए. डरी, सहमी और जख्मी फातिमा को रिकवर कर लिया गया. जब उसे मेरे सामने पेश किया गया तो वह डर के मारे थरथर कांप रही थी. कपड़े जगहजगह से फटे हुए थे, शरीर पर जख्म थे जिन से खून बह रहा था. उस की आंखों से भी झलक रहा था कि वह अपने फौजियों से बड़ी मुश्किल से बची है, अब तो वह दुश्मन के खेमे में है.

‘‘उस के डर को मैं बखूबी समझ रहा था. वह एकदम पत्थर हो गई थी. मैं ने मेजर रंजीत से कहा, तुरंत डाक्टर को भेजो और इस के शरीर को कंबल से ढंकने का प्रबंध करो. आदेश का पालन हुआ, कंबल से जब उस ने शरीर को ढक लिया तो अनायास ही मेरे मुख से निकला, ‘माफ करना, बहन, इस समय हमारे पास इस से अधिक कुछ नहीं है. लड़ाई के मैदान में जनाना कपड़े नहीं मिलेंगे.’ पहली बार उस ने अपनी बड़ीबड़ी आंखों से मेरी ओर देखा. पहली बार मैं ने भी उसे गौर से देखा. गोरा रंग, सुंदर व कजरारी आंखें. सांचे में ढला शरीर, ऐसी सुंदरता मैं ने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखी थी.

‘‘वह थोड़ी देर मुझे देखती रही फिर उस की आंखें छलछला आईं. उस की सीमा का बांध टूट गया था. परिवार को खोने का दुख, दुश्मनों के हाथों पड़ने का गम. भविष्य की अनिश्चितता. जीवन में अंधेरा ही अंधेरा था. उस का रोना जायज था. मैं उसे चुप नहीं कराना चाहता था. रोने से मन हलका हो जाता है. मैं ने मेजर रंजीत को पानी देने को कहा. उस ने पानी लिया. कुछ पीया, कुछ से अपना मुंह धो लिया. मैं ने मुंह पोंछने के लिए अपना रूमाल आगे किया. उस ने फिर एक बार मेरी ओर देखा. मैं बोला, ‘ले लो, गंदा नहीं है. बस, थोड़ी नाक पोंछी थी,’ और मुसकराया. मैं ने माहौल को हलका करने का भरसक प्रयत्न किया परंतु उस के चेहरे का दुख कम नहीं हुआ. थोड़ी देर बाद उस ने कहा, ‘बाथरूम जाना है.’ मैं ने अपने लिए निश्चित बाथरूम की ओर इशारा किया. वह अंदर गई.

‘‘‘सर, एक सुझाव है.’

‘‘‘यस, मेजर रंजीत.’

‘‘‘सर, अल्लड़ गांव में बहुत सा सामान पड़ा है जिसे हमारे जवानों ने छुआ तक नहीं. जैसे किचन का सामान, कपड़ों के टं्रक आदि. उन में इस लड़की के नाप के कपड़े मिल जाएंगे.’

‘‘‘गुड आइडिया.’

‘‘‘सर, वह लड़की.’

‘‘‘हमें पता ही नहीं चला, वह कब बाथरूम से निकल कर हमारे पीछे आ कर खड़ी हो गई थी. हम ने सोचा, उस ने हमारी बातें सुन ली थीं. ‘इस के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है,’ मैं ने कहा, ‘हमें आप का नाम नहीं पता, नहीं तो हम आप को नाम से पुकारते.’

‘‘कुछ देर वह चुप रही, फिर उस के मुख से निकला, ‘फातिमा सिद्दीकी’. पहली बार हम जान पाए कि उस का नाम फातिमा है. उस की आंखें फिर छलछला आईं. वह रोने भी लगी.

‘‘‘अब आप क्यों रो रही हैं? आप यहां बिलकुल महफूज हैं. मैं कर्नल अमरीक सिंह, राजपूताना राइफल्स का कमांडिंग अफसर, इस बात का यकीन दिलाता हूं.’

‘‘‘एक सवाल मुझे बारबार  साल रहा है. मैं अपनी  पाकिस्तान की फौज के रहते महफूज नहीं थी तो यहां दुश्मन की फौज में कैसे महफूज हूं?’

‘‘‘यह हिंदुस्तान की फौज है जो दुश्मनों के साथ दुश्मनी निभाती है और इंसानों के साथ इंसानियत,’ थोड़ी देर बाद मैं ने फिर कहा, ‘यह बताओ, आप के परिवार वालों को किस ने मारा?’

‘‘‘पाकिस्तान की फौज ने, घर की औरतों की इज्जत लूटने के लिए वे बहुत सी औरतों को अपने साथ भी ले गए. मैं आप की टुकड़ी की वजह से बच गई.’

‘‘‘इतने समय में आप को हिंदुस्तान और पाकिस्तान की फौज में अंतर नजर नहीं आया?’

‘‘‘जी.’

‘‘‘मैं ने आप को बहन कहा है. मेरी पूरी रैजिमैंट मेरा परिवार है. इस नाते आप भी इस परिवार की सदस्य हैं. हमारे देश में जिस को भी बहन कह दिया जाता है उस की रक्षा फिर अपनी जान दे कर भी की जाती है. यही हमारे देश और हमारी फौज की रिवायत है, परंपरा है.’

‘‘इतने में एक जवान ट्रंक ले कर हाजिर हुआ. मैं ने फातिमा को अपने लिए कपड़े चुनने के लिए कहा, ‘मुझे दुख है, मैं आप के लिए इस से अच्छा इंतजाम नहीं कर सका.’

‘‘मैं बाहर जाने लगा कि फातिमा अपने लिए कपड़े निकाल कर पहन सके. उसी समय मेजर रंजीत ने आ कर बताया कि मोरचाबंदी पूरी हो चुकी है और अल्लड़ गांव क्लियर कर दिया गया है.

‘‘‘अच्छी बात है, पर सभी को आगाह कर दिया जाए कि पूरी चौकसी बरती जाए. दीपक जब बुझने लगता है तो उस की लौ और बढ़ जाती है. सांप घायल हो कर और खतरनाक हो जाता है, इसलिए सावधान रहा जाए.’

‘‘‘यस सर.’

‘‘‘देखो, अभी तक डाक्टर क्यों नहीं आया.’

‘‘‘सर, मैं हाजिर हूं. कुछ घायल जवानों को संभालना जरूरी था, इसलिए थोड़ी देर हो गई.’

‘‘‘ओके फाइन. ड्रैसिंग के साथ आप यह भी जांच करें कि कोई सीरियस चोट तो नहीं है. इस के बाद हमें इसे तुरंत पीछे कैंप में भेजना होगा. तब तक इस की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी है.’

‘‘‘जी सर. अगर आप इजाजत दें तो मैं इलाज के लिए इसे एमआई रूम में ले जाऊं, वहां इस की अच्छी देखभाल हो सकेगी.’

‘‘‘ले जाओ पर ध्यान रहे, इस की जान को कुछ नहीं होना चाहिए. इस की सुरक्षा हमें अपनी जान से भी प्यारी है. पूरी रैजिमैंट की इज्जत का सवाल है.’

‘‘‘मैं समझता हूं, सर. जान चली जाएगी पर इस को कुछ नहीं होने दिया जाएगा,’ डाक्टर ने कहा.

‘‘‘इसे कुछ खिलापिला देना, सुबह से कुछ नहीं खाया.’

‘‘‘यस सर.’

‘‘‘एडयूटैंट साहब से बोलो, इस के बारे में सारी जानकारी हासिल करें और ब्रिगेड हैडक्वार्टर को इन्फौर्म करें,’ आदेश दे कर मैं अपने कमरे में आ गया.

‘‘थोड़ी देर बाद एडयूटैंट मेजर राम सिंह मेरे सामने थे.

‘‘‘सर, यह लड़की इसी गांव अल्लड़ की रहने वाली है. इस के साथ बहुत बुरा हुआ. सारा परिवार पाकिस्तानी फौजों के हाथों मारा गया. घर की जवान औरतों को वे साथ ले गए और बूढ़ी औरतों को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया. इस भयानक दृश्य को इस ने अपनी आंखों से देखा है. यह किसी बड़े ट्रंक के पीछे छिपी रह गई और बच गई. पाक फौज इसे ढूंढ़ ही रही थी कि हमारी टुकड़ी से टक्कर हो गई. कुछ मारे गए, कुछ भाग गए. यह सियालकोट के जिन्ना कालेज के फर्स्ट ईयर की स्टूडैंट है. रावलपिंडी में इस का मामू रहता है जिस का उस ने पता दिया है.’

‘‘‘यह सब ब्रिगेड हैडक्वार्टर को लिख दो और आदेश का इंतजार करो.’

‘‘‘यस सर,’ कह कर एडयूटैंट साहब चले गए.

‘‘युद्ध के बाद चारों ओर भयानक शांति थी, श्मशान सी शांति. दूसरे रोज फातिमा के लिए आदेश आया कि 2 रोज के बाद पाकिस्तान के मिलिटरी कमांडरों के साथ कई मुद्दों को ले कर सियालकोट के पास मीटिंग है. उस में फातिमा के बारे में भी बताया जाएगा. यदि उन के कमांडर रावलपिंडी से उस के मामू को बुला कर वापस लेने के लिए तैयार हो गए तो ठीक है, नहीं तो वह पीछे कैंप में भेजी जाएगी, तब तक वह आप की रैजिमैंट में रहेगी, मेहमान बन कर. हमें ऐसे आदेश की आशा नहीं थी. सारी रैजिमैंट समझ नहीं पा रही थी कि ब्रिगेड ने ऐसा आदेश क्यों दिया.

‘‘हमारे अगले 2 दिन बड़े व्यस्त थे. मोरचाबंदी के साथसाथ घायल सैनिकों को पीछे बड़े अस्पताल में भेजना था. शहीद सैनिकों के शव भी पीछे भिजवाने थे. सब से महत्त्वपूर्ण था, लिस्ट बना कर पाकिस्तान के शहीद सैनिकों को दफनाना. उन की बेकद्री किसी भी कीमत पर बरदाश्त नहीं की जा सकती थी. इस में पूरे 2 दिन लग गए. हम जान ही नहीं पाए कि फातिमा कैसी है और किस हाल में है.

‘‘जब याद आया तो मेरे पांव खुद ही एमआई रूम की ओर उठ चले. जब वहां पहुंचा तो फातिमा नाश्ता कर रही थी. मुझे देखते ही उठ खड़ी हुई.

‘‘‘बैठोबैठो, नाश्ता करो. माफ करना, फातिमा, 2 दिन तक हम आप की सुध नहीं ले पाए. आप को कोई तकलीफ तो नहीं हुई?’

‘‘‘नहीं सर, कोई तकलीफ नहीं हुई, बल्कि सभी ने इतनी खिदमत की कि मैं अपने गमों को भूलने लगी,’ फिर प्रश्न किया, ‘आप सभी दुश्मनों के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं?’

‘‘‘यह हिंदुस्तानी फौज की रिवायत है, परंपरा है कि हमारी फौज अपने दुश्मनों के साथ भी मानवीय व्यवहार करने के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है.’

‘‘फिर मैं ने ब्रिगेड के आदेश और 2 दिन बाद कमांडरों की मीटिंग के बारे में बताया कि यदि उन्होंने मान लिया तो बहुत जल्दी वह अपने मामू के पास भेज दी जाएगी.

‘‘‘सर, यदि ऐसा हो गया तो मरते दम तक मैं आप को, आप के पूरे परिवार को यानी आप की रैजिमैंट को, उन जांबाज जवानों को जिन्होंने

अपनी जान पर खेल कर पाक फौजी दरिंदों से मुझे बचाया था, कभी भूल नहीं पाऊंगी.’

‘‘‘हमारी फौज की यही परंपरा है कि जब कोई हम से विदा ले तो वह उम्रभर हमें भूल कर भी भूल न पाए.’

‘‘एक सप्ताह के भीतर फातिमा को हमारे और पाक कमांडरों की देखरेख में सियालकोट के पास उस के मामू के हवाले कर दिया गया.’’

कर्नल अमरीक सिंह पूरी कहानी सुना कर फिर भावुक हो उठे. उन की आंखें फिर नम हो गईं.

कैप्टन नूर मुहम्मद ने कहा, ‘‘सर, मेरे लिए क्या आदेश है? क्या फातिमा को आने के लिए लिखा जाए?’’

‘‘नहीं, कैप्टन साहब, फातिमा को उन की मीठी यादों के सहारे जीने दो. किसी भी मुल्क के सिविलियन को मिलिटरी यूनिट विजिट करने की इजाजत नहीं दी जा सकती. हां, उस के लिए हमारी ओर से तोहफा ले कर आप अवश्य जाएंगे, बिना किसी अंतर्विरोध के. उस का देश हमारे देश में आतंकवाद फैलाता है, लाइन औफ कंट्रोल पर जवानों के गले काटता है, 26/11 जैसे हमले करता है, सूसाइड बौंबर भेजता है.’’

Best Hindi Story

Romantic Story: बेवफा: एकतरफा प्यार करने वाली प्रिया के साथ क्या हुआ?

Romantic Story: ‘‘इट्स टू मच यार, लड़के कितने चीप, आई मीन कितने टपोरी होते हैं.’’ कमरे में घुसते ही सीमा ने बैग पटकते हुए झुंझलाए स्वर में कहा तो मैं चौंक पड़ी.

‘‘क्या हुआ यार? कोई बात है क्या? ऐसे क्यों कह रही है?’’

‘‘और क्या कहूं प्रिया? आज विभा मिली थी.’’

‘‘तेरी पहली रूममेट.’’

‘‘हां, यार. उस के साथ जो हुआ मैं तो सोच भी नहीं सकती. कोई ऐसा कैसे कर सकता है?’’

‘‘कुछ बताएगी भी? यह ले पहले पानी पी, शांत हो जा, फिर कुछ कहना,’’ मैं ने बोतल उस की तरफ उछाली.

वह पलंग पर बैठते हुए बोली, ‘‘विभा कह रही थी, उस का बौयफ्रैंड आजकल बड़ी बेशर्मी से किसी दूसरी गर्लफैं्रड के साथ घूम रहा है. जब विभा ने एतराज जताया तो कहता है, तुझ से बोर हो गया हूं. कुछ नया चाहिए. तू भी किसी और को पटा ले. प्रिया, मैं जानती हूं, तेरी तरह विभा भी वन मैन वूमन थी. कितना प्यार करती थी उसे. और वह लफंगा… सच, लड़के होते ही ऐसे हैं.’’

‘‘पर तू सारे लड़कों को एक जैसा क्यों समझ रही है? सब एक से तो नहीं होते,’’ मैं ने जिरह की.

‘‘सब एक से होते हैं. लड़कों के लिए प्यार सिर्फ टाइम पास है. वे इसे गंभीरता से नहीं लेते. बस, मस्ती की और आगे बढ़ गए, पर लड़कियां दिल से प्यार करती हैं. अब तुझे ही लें, उस लड़के पर अपनी जिंदगी कुरबान किए बैठी है, जिस लफंगे को यह भी पता नहीं कि तू उसे इतना प्यार करती है. उस ने तो आराम से शादी कर ली और जिंदगी के मजे ले रहा है, पर तू आज तक खुद को शादी के लिए तैयार नहीं कर पाई. आज तक अकेलेपन का दर्द सह रही है और एक वह है जिस की जिंदगी में तू नहीं कोई और है. आखिर ऐसी कुरबानी किस काम की?’’

मैं ने टोका, ‘‘ऐक्सक्यूजमी. मैं ने किसी के लिए जिंदगी कुरबान नहीं की. मैं तो यों भी शादी नहीं करना चाहती थी. बस, जीवन का एक मकसद था, अपने पैरों पर खड़ा होना, क्रिएटिव काम करना. वही कर रही हूं और जहां तक बात प्यार की है, तो हां, मैं ने प्यार किया था, क्योंकि मेरा दिल उसे चाहता था. इस से मुझे खुशी मिली पर मैं ने उस वक्त भी यह जरूरी नहीं समझा कि इस कोमल एहसास को मैं दूसरों के साथ बांटूं, ढोल पीटूं कि मैं प्यार करती हूं. बस, कुछ यादें संजो कर मैं भी आगे बढ़ चुकी हूं.’’

‘‘आगे बढ़ चुकी है? फिर क्यों अब भी कोई पसंद आता है तो कहीं न कहीं तुझे उस में अमर का अक्स नजर आता है. बोल, है या नहीं…’’

‘‘इट्स माई प्रौब्लम, यार. इस में अमर की क्या गलती. मैं ने तो उसे कभी नहीं कहा कि मैं तुम से प्यार करती हूं, शादी करना चाहती हूं. हम दोनों ने ही अपना अलग जहां ढूंढ़ लिया.’’

‘‘अब सोच, फिजिकल रिलेशन की तो बात दूर, तूने कभी उस के साथ रोमांस भी नहीं किया और आज तक उस के प्रति  वफादार है, जबकि वह… तूने ही कहा था न कि वह कालेज की कई लड़कियों के साथ फ्लर्ट करता था. क्या पता आज भी कर रहा हो. घर में बीवी और बाहर…’’

‘‘प्लीज सीमा, वह क्या कर रहा है, मुझे इस में कोई दिलचस्पी नहीं, लेकिन देख उस के बारे में उलटासीधा मत कहना.’’

‘‘हांहां, ऐसा करने पर तुझे तकलीफ जो होती है तो देख ले, यह है लड़की का प्यार. और लड़के, तोबा… मैं आजाद को भी अच्छी तरह पहचानती हूं. हर तीसरी लड़की में अपनी गर्लफ्रैंड ढूंढ़ता है. वह तो मैं ने लगाम कस रखी है, वरना…’’

मैं हंस पड़ी. सीमा भी कभीकभी बड़ी मजेदार बातें करती है, ‘‘चल, अब नहाधो ले और जल्दी से फ्रैश हो कर आ. आज डिनर में मटरपनीर और दालमक्खनी है, तेरी मनपसंद.’’

मुसकराते हुए सीमा चली गई तो मैं खयालों में खो गई. बंद आंखों के आगे फिर से अमर की मुसकराती आंखें आ गईं. मैं ने उसे एक बार कहा था, ‘तुम हंसते हो तो तुम्हारी आंखें भी हंसती हैं.’

वह हंस पड़ा और कहने लगा, ‘तुम ने ही कही है यह बात. और किसी ने तो शायद मुझे इतने ध्यान से कभी देखा ही नहीं.’

सच, प्यार को शब्दों में ढालना कठिन होता है. यह तो एहसास है जो सिर्फ महसूस किया जा सकता है. इस खूबसूरत एहसास ने 2 साल तक मुझे भी अपने रेशमी पहलू में कैद कर रखा था. कालेज जाती, तो बस अमर को एक नजर देखने के लिए. स्मार्ट, हैंडसम अमर को अपनी तरफ देखते ही मेरे अंदर एक अजीब सी सिहरन होती.

वह अकसर जब मेरे करीब आता तो गुनगुनाने लगता. मुझ से बातें करता तो उस की आवाज में कंपन सी महसूस होती. उस की आंखें हर वक्त मुझ से कुछ कहतीं, जिसे मेरा दिल समझता था, पर दिमाग कहता था कि यह सच नहीं है. वह मुझ से प्यार कर ही नहीं सकता. कहां मैं सांवली सी अपने में सिमटी लड़की और कहां वह कालेज की जान. पर अपने दिल पर एतबार तब हुआ जब एक दिन उस के सब से करीबी दोस्त ने कहा कि अमर तो सिर्फ तुम्हें देखने को कालेज आता है.

मैं अजीब सी खुशफहमी में डूब गई. पर फिर खुद को समझाने लगी कि यह सही नहीं होगा. हमारी जोड़ी जमेगी नहीं. और फिर शादी मेरी मंजिल नहीं है. मुझे तो कुछ करना है जीवन में. इसलिए मैं उस से दूरी बढ़ाने की कोशिश करने लगी. घर छोड़ने के लिए कई दफा उस ने लिफ्ट देनी चाही, पर मैं हमेशा इनकार कर देती. वह मुझ से बातें करने आता तो मैं घर जाने की जल्दी दिखाती.

इसी बीच एक दिन आशा, जो हम दोनों की कौमन फ्रैंड थी, मेरे घर आई. काफी देर तक हम दोनों ने बहुत सी बातें कीं. उस ने मेरा अलबम भी देखा, जिस में ग्रुप फोटो में अमर की तसवीरें सब से ज्यादा थीं. उस ने मेरी तरफ शरारत से देख कर कहा, ‘लगता है कुछ बात है तुम दोनों में.’ मैं मुसकरा पड़ी. उस दिन बातचीत से भी उसे एहसास हो गया था कि मैं अमर को चाहती हूं. मुझे यकीन था, आशा अमर से यह बात जरूर कहेगी, पर मुझे आश्चर्य तब हुआ जब उस दिन के बाद से वह मुझ से दूर रहने लगा.

मैं समझ गई कि अमर को यह बात बुरी लगी है, सो मैं ने भी उस दूरी को पाटने की कोशिश नहीं की. हमारे बीच दूरियां बढ़ती गईं. अब अमर मुझ से नजरें चुराने लगा था. कईकई दिन बीत जाने पर भी वह बात करने की कोशिश नहीं करता. मैं कुछ कहती तो शौर्ट में जवाब दे कर आगे बढ़ जाता, जबकि आशा से उस की दोस्ती काफी बढ़ चुकी थी. उस के इस व्यवहार ने मुझे बहुत चोट पहुंचाई. भले ही पहले मैं खुद उस से दूर होना चाहती थी, पर जब उस ने ऐसा किया तो बहुत तकलीफ हुई.

इसी बीच मुझे नौकरी मिल गई और मैं अपना शहर छोड़ कर यहां आ गई. हौस्टल में रहने लगी. बाद में अपनी एक सहेली से खबर मिली की अमर की शादी हो गई है. इस के बाद मेरे और अमर के बीच कोई संपर्क नहीं रहा.

मैं जानती थी, उस ने कभी भी मुझे याद नहीं किया होगा और करेगा भी क्यों? हमारे बीच कोई रिश्ता ही कहां था? यह मेरी दीवानगी है जिस का दर्द मुझे अच्छा लगता है. इस में अमर की कोई गलती नहीं. पर सीमा को लगता है कि अमर ने गलत किया. सीमा ही क्यों मेरे घर वाले भी मेरी दीवानगी से वाकिफ हैं. मेरी बहन ने साफ कहा था, ‘तू पागल है. उस लड़के को याद करती है, जिस ने तुझे कोई अहमियत ही नहीं दी.’

‘‘किस सोच में डूब गई, डियर?’’ नहा कर सीमा आ चुकी थी. मैं हंस पड़ी, ‘‘कुछ नहीं, फेसबुक पर किसी दूसरे नाम से अपना अकाउंट खोल रही थी.’’

‘‘किसी और नाम से? वजह जानती हूं मैं… यह अकाउंट तू सिर्फ और सिर्फ अमर को ढूंढ़ने के लिए खोल रही है.’’

‘‘जी नहीं, मेरे कई दोस्त हैं, जिन्हें ढूंढ़ना है मुझे,’’ मैं ने लैपटौप बंद करते हुए कहा.

‘‘तो ढूंढ़ो… लैपटौप बंद क्यों कर दिया?’’

‘‘पहले भोजन फिर मनोरंजन,’’ मैं ने प्यार से उस की पीठ पर धौल जमाई.

रात 11 बजे जब सीमा सो गई तो मैं ने फिर से फेसबुक पर लौगइन किया और अमर का नाम डाल कर सर्च मारा. 8 साल बाद अमर की तसवीर सामने देख कर यकायक ही होंठों पर मुसकराहट आ गई. जल्दी से मैं ने उस के डिटेल्स पढ़े. अमर ने फेसबुक पर अपना फैमिली फोटो भी डाला हुआ था, जिस में उस की बहन भी थी. कुछ सोच कर मैं ने उस की बहन के डिटेल्स लिए और उस के फेसबुक अकाउंट पर उस से दोस्ती के लिए रिक्वैस्ट डाल दी.

2 दिन बाद मैं ने देखा, उस की बहन निशा ने रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली है. फिर क्या था, मैं ने उस से दोस्ती कर ली ताकि अमर के बारे में जानकारी मिलती रहे. वैसे यह बात मैं ने निशा पर जाहिर नहीं की और बिलकुल अजनबी बन कर उस से दोस्ती की.

निशा औनलाइन अपने बारे में ढेर सारी बातें बताती. वह दिल्ली में ही थी और प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी. उस ने लाजपत नगर में कमरा किराए पर ले रखा था. अब तो जानबूझ कर मैं दिन में 2-3 घंटे अवश्य उस से चैटिंग करती ताकि हमारी दोस्ती गहरी हो सके.

एक दिन अपने बर्थडे पर उस ने मुझे घर बुलाया तो मैं ने तुरंत हामी भर दी. शाम को जब तक मैं उस के घर पहुंची तबतक  पार्टी खत्म हो चुकी थी और उस के फ्रैंड्स जा चुके थे. मैं जानबूझ कर देर से पहुंची थी ताकि अकेले में उस से बातें हो सकें. कमरा  खूबसूरती से सजा हुआ था. हम दोनों जिगरी दोस्त की तरह मिले और बातें करने लगे. निशा का स्वभाव बहुत कुछ अमर की तरह ही था, चुलबुली, मजाकिया पर साफ दिल की. वह सुंदर भी काफी थी और बातूनी भी.

मैं अमर के बारे में कुछ जानना चाहती थी जबकि निशा अपने बारे में बताए जा रही थी. उस के कालेज के दोस्तों और बौयफ्रैंड्स की दास्तान सुनतेसुनते मुझे उबासी आ गई. यह देख निशा तुरंत चाय बनाने के लिए उठ गई.

अब मैं चुपचाप निशा के कमरे में रखी चीजों का दूर से ही जायजा लेने लगी, यह सोच कर कि कहीं तो कोई चीज नजर आए, तभी टेबल पर रखी डायरी पर मेरी नजर गई तो मैं खुद को रोक नहीं सकी. डायरी के पन्ने पलटने लगी. ‘निशा ने अच्छा संग्रह कर रखा है,’ सोचती हुई मैं डायरी के पन्ने पलटती रही. तभी एक पृष्ठ पर नजरें टिक गईं. ‘बेवफा’ यह एक कविता थी जिसे मैं पूरा पढ़ गई.

मैं यह कविता पढ़ कर बुत सी बन गई. दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. ‘तुम्हारी आंखें भी हंसती हैं…’ यह पंक्ति मेरी आंखों के आगे घूम रही थी. यह बात तो मैं ने अमर से कही थी. एक नहीं 2-3 बार.

तभी चाय ले कर निशा अंदर आ गई. मेरे हाथ में डायरी देख कर उस ने लपकते हुए उसे खींचा. मैं यथार्थ में लौट आई. मैं अजीब सी उलझन में थी, नेहा ने हंसते हुए कहा, ‘‘यार, यह डायरी मेरी सब से अच्छी सहेली है. जहां भी मन को छूती कोई पंक्ति या कविता दिखती है मैं इस में लिख लेती हूं.’’ उस ने फिर से मुझे डायरी पकड़ा दी और बोली, ‘‘पढ़ोपढ़ो, मैं ने तो यों ही छीन ली थी.’’

डायरी के पन्ने पलटती हुई मैं फिर उसी पृष्ठ पर आ गई. ‘‘यह कविता बड़ी अच्छी है. किस ने लिखी,’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह कविता…’’ निशा मुसकराई, ‘‘मेरे अमर भैया हैं न, उन्होंने ही लिखी है. पिछली दीवाली के दिन की बात है. वे चुपचाप बैठे कुछ लिख रहे थे. मैं पहुंच गई तो हड़बड़ा गए. दिखाया भी नहीं पर बाद में मैं ने चुपके से देख लिया.’’

‘‘किस पर लिखी है इतनी अच्छी कविता? कौन थी वह?’’ मैं ने कुरेदा.

‘‘थी कोई उन के कालेज में. जहां तक मुझे याद है, प्रिया नाम था उस का. भैया बहुत चाहते थे उसे. पहली दफा उन्होंने किसी को दिल से चाहा था, पर उस ने भैया का दिल तोड़ दिया. आज तक भैया उसे भूल नहीं सके हैं और शायद कभी न भूल पाएं. ऊपर से तो बहुत खुश लगते हैं, परिवार है, पत्नी है, बेटा है, पर अंदर ही अंदर एक दर्द हमेशा उन्हें सालता रहता है.’’

मैं स्तब्ध थी. तो क्या सचमुच अमर ने यह कविता मेरे लिए लिखी है. वह मुझे बेवफा समझता है? मैं ने उस के होंठों की मुसकान छीन ली.

हजारों सवाल हथौड़े की तरह मेरे दिमाग पर चोट कर रहे थे.

मुझ से निशा के घर और नहीं रुका गया. बहाना बना कर मैं बाहर आ गई. सड़क पर चलते वक्त भी बस, यही वाक्य जहर बन कर मेरे सीने को बेध रहा था… ‘बेवफा’… मैं बेवफा हूं…’

तभी भीगी पलकों के बीच मेरे होंठों पर हंसी खेल गई. जो भी हो, मेरा प्यार आज तक मेरे सीने में दहक रहा है. वह मुझ से इतना प्यार करता था तभी तो आज तक भूल नहीं सका है. बेवफा के रूप में ही सही, पर मैं अब भी उस के दिलोदिमाग में हूं. मेरी तड़प बेवजह नहीं थी. मेरी चाहत बेनाम नहीं. बेवफा बन कर ही सही अमर ने आज मेरे प्यार को पूर्ण कर दिया था.

‘आई लव यू अमर ऐंड आई नो… यू लव मी टू…’ मैं ने खुद से कहा और मुसकरा पड़ी.

Romantic Story

Duology Movies: क्यों नकार रहे हैं दर्शक

Duology Movies: पिछले कुछ सालों से बौलीवुड में 2 भागों में बनी फिल्मों का क्रेज फिल्म मेकर के बीच शुरू हो चुका है, इस में वे किसी भी बड़ी स्टारकास्ट को ले कर, कहानी में थोड़ी फेरबदल कर फिल्म को 2 भागों या इस से अधिक में बना लेते हैं. इस में उन्हें अधिक कुछ सोचना नहीं पड़ता और ऐक्शन व बेकार की कौमेडी के बीच उसे हौल में रिलीज कर देते हैं.

इसी कड़ी में ‘हाउसफुल 5’ जो 2 भागों में बनी थी, जिस की कहानी और कौमेडी दोनों ही बेसिरपैर रही, 1 भाग को देखने के बाद दर्शक इतने मायूस हुए कि दूसरा देखने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पाए और फिल्म बुरी तरह से फ्लौप रही.

जोखिम 

असल में 2 भागों में बनी फिल्म (डुओलौजी) बनाना जरूरी है या नहीं, यह कहानी की प्रकृति, बजट और निर्देशक की विजन पर निर्भर करता है. यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है जब कहानी इतनी बड़ी हो कि एक फिल्म में न समा पाए, जैसे ‘बाहुबली’, ‘केजीएफ’, जिस से कहानी में गहराई और दर्शकों के लिए ज्यादा जुड़ाव आता है, लेकिन इस के लिए ज्यादा समय, पैसा और मार्केटिंग लगती है और यह जोखिमभरा भी हो सकता है.

अगर पहला भाग सफल न हो, तो दूसरे भाग को देखने के लिए दर्शक साहस नहीं जुटा पाते और फिल्म फ्लौप हो जाती है.

घटित घटना का महिमामंडन

2 भागों में बनी फिल्में बेहद सफल हो सकती हैं, बशर्ते कहानी दमदार हो और दोनों भागों को दर्शकों का प्यार मिले, जैसे ‘धुरंधर’ हालिया उदाहरण है, जिसे दर्शकों ने कमोवेश पसंद किया, क्योंकि इस की कहानी से दर्शक खुद को रिलेट कर पाए क्योंकि इस फिल्म में दिखाई गई किसी भी घटना से दर्शक परिचित रहे और फिल्ममेकर को इस की कहानी लिखते हुए अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी. उन्होंने इसे एअरकंडीशन होटल में बैठ कर लिखा और वीएफएक्स के प्रभाव से इसे दर्शकों तक पहुंचाया.

पुरानी फिल्म ‘शोले’ भी वैसी ही एक फिल्म थी, जिस का प्रभाव दर्शकों पर पड़ा क्योंकि उस दौरान डाकुओं का प्रभाव देश के कुछ भागों पर था, जिस से कहानीकार ने मनोरंजक फिल्म के जरीए लोगों तक पहुंचाया और फिल्म हिट रही.

आज अगर इस तरह की फिल्म बनती है, तो शायद वह दर्शकों को हौल तक खींचने में समर्थ नहीं हो सकती क्योंकि ऐसी कहानियां अब गुजरे जमाने की हो चुकी हैं. इतना ही नहीं, हौलीवुड में भी कई भागों में फिल्में बनाने का प्रचलन है. मसलन, ‘द डार्क नाइट’ और ‘गौडफादर’ के पार्ट 2 जैसी फिल्मों ने रिकौर्ड तोड़े हैं, जो दिखाते हैं कि अगर कहानी और निर्देशन सही हो, तो यह फौर्मूला बहुत सफल होता है.

समझते है सेट फौर्मूला

इस बारे में शौर्ट फिल्ममेकर और लेखक विकास कुमार मित्रा कहते हैं कि असल में एक फिल्म के हिट होने पर फिल्ममेकर इसे सेट फौर्मूला मानते हैं क्योंकि उस के चरित्र से दर्शक खुद को जोड़ पाते हैं, चरित्र अलाइव होता है, इसलिए उन सभी कैरेक्टर को बीच में रख कर पहली कहानी से मेलखाती हुई दूसरी फिल्म फिल्ममेकर लिख लेते हैं, जैसा अंगरेजी फिल्म ‘ट्वाईलेट’, ‘सीरीज औफ शेरलक होम्स’, अगाथा क्रिस्टी की ‘हरलोक फुरो’ आदि थी.

असल में एक चरित्र के हाइलाइट होने पर औडियंस उसे देखना पसंद करते हैं, जैसा मिशन इंपोसिबल फिल्म थी, जिस के कई पार्ट बने.

धारावाहिकों में भी ऐसा होता है, जहां एक चरित्र के स्थापित हो जाने पर दर्शक उसे देखना पसंद करते हैं, इस का फायदा सीरियल वाले उठाते हैं, लेकिन केवल चरित्र से कुछ नहीं हो सकता, कहानी अच्छी और रुचिकर होनी चाहिए ताकि स्टैब्लिश किए गए कलाकार का फायदा फिल्ममेकर को हो.

अगर फिल्म का फर्स्ट पार्ट ठीक नहीं बना, तो दूसरा पार्ट भी फ्लौप होता है. फिल्म ‘भूलभुलैया’ की पहला पार्ट अच्छी थी, बाद में बनाई गई दोनों सीरीज नहीं चली क्योंकि कहानी अच्छी नहीं थी, कलाकार के स्टैब्लिश होते हुए भी लोगों ने उसे देखने से नकार दिया.

मानसिक दिवालिएपन के शिकार फिल्ममेकर

असल में फिल्म एक शौर्ट स्टोरी होती है. नौवेल में कई कहानियां होती हैं. फिल्म ‘लाइफ इन मैट्रो’ में सारी कहनियों को एकसाथ जोड़ कर एक अच्छी फिल्म बनी जबकि आज के फिल्ममेकर एक छोटी कहानी को लंबा खींचते जाते हैं, जिस में कहानी का अस्तित्व खत्म हो जाता है और वे उस में खो जाते हैं और कहानी बेसिर पैर बन जाती है. फिल्म ‘हाउसफुल 5’ की भी यही हालत रही.

देखा जाए तो आज के फिल्ममेकर मानसिक दिवालिएपन के शिकार हो रहे हैं और दर्शकों के चौइस को समझ नहीं पा रहे हैं और फिल्में फ्लौप हो रही हैं क्योंकि आज कोई लेखक दर्शक तक नहीं पहुंचता. इस से वे उन की भावनाओं को समझ नहीं पाते और फिल्म की कहानियां भी आम जीवन से दूर होती हैं, जिस से कोई रिलेट नहीं कर सकता.

रियल स्टोरी पर फिल्में आज कोई नहीं लिखता, इसलिए बौलीवुड की हालत बहुत खराब हो चुकी है. फिल्म ‘धुरंधर’ भी इसलिए चली क्योंकि इस में दिखाए गए सभी घटनाओं से लोग परिचित हैं, साथ ही हाइप की गई एक एपिसोडिक कहानी है. सोशल मीडिया के इस जमाने में बहुत सारी चीजें कैमोफ्लौज हो कर आगे बढ़ जाती हैं. मसलन, ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म चली, लेकिन ‘बंगाल फाइल्स’ और ‘उदयपुर फाइल्स’ जैसी फिल्में नहीं चलीं.

किताबें पढ़ना हुआ कोसों दूर

निर्देशक विकास आगे कहते हैं कि नई कहानी, जिसे दर्शक देखे और हौल से निकलने पर सोचने के लिए मजबूर हो, ऐसा कोई नहीं लिखता क्योंकि आज के फिल्ममेकर समाज की गलत चीजों को रिविल नहीं करना चाहते. उन का टारगेट केवल दर्शकों से पैसे निकलवाना है और आज बौलीवुड एक तमाशा बन चुका है. फिल्मों का आर्ट से कोई लेनादेना नहीं. सेंसिबल फिल्में आज नहीं बनतीं. फाइव स्टार होटल में बैठ कर लोग कहानी लिखते हैं. समुद्र के किनारे या किसी नैचुरल जगह पर बैठ कर सिचुएशन को फील कर कहानी लिखने की प्रथा अब खत्म हो चुकी है. इस तरह से वे दर्शकों के साथ कनेक्शन को खो चुके हैं क्योंकि वे दर्शकों के मनमस्तिष्क को पढ़ नहीं पाते, वे किताबें या नौवेल नहीं पढ़ते, जो आज के परिवेश के अनुसार लिखी जाती है.

तकनीक की दृष्टि से हम आगे बढ़े हैं, लेकिन कहानी और स्क्रिप्ट में बहुत अधिक पिछड़ चुके हैं.

अभी फिल्ममेकर प्रोडक्ट को पैकेजिंग कर पब्लिक के सामने बेच रहे हैं. सामाजिक इश्यू पर आज बहुत कम फिल्में बनती हैं. पहले कई फिल्में एकजैसी स्टारकास्ट ले कर फिल्ममेकर ऋषिकेश मुखर्जी बनाया करते थे. मसलन ‘गोलमाल’, ‘नरमगरम’ आदि. वैसी ही लीजैंड फिल्ममेकर सत्यजीत रे ने भी ‘अपू ट्रायोलौजी’ में अपू को ले कर ही 3 भागों में फिल्में बनाई थीं. जैसे ‘पाथेर पांचाली’, ‘अपराजितो’ और ‘अपूर संसार’. ये फिल्में एक बंगाली लड़के अपू के बचपन से ले कर वयस्कता तक के जीवन का चित्रण करती हैं और इसे विश्व सिनेमा की महत्त्वपूर्ण कृतियों में गिनी गया.

इस प्रकार 2 भागों में बनी फिल्में एक लंबी और जटिल कहानी कहने का अच्छा तरीका है, जिस से कहानी में गहराई आती है और दर्शक पूरी तरह जुड़ पाते हैं. अंगरेजी फिल्म ‘हंगर गेम्स’ की कहानी अच्छी थी, इसलिए चली, लेकिन कहानी को कृत्रिम रूप से लंबा खींचा जाए या दोनों भाग संतोषजनक न हों, तो दर्शक निराश हो सकते हैं.

यह पूरी तरह निर्देशक और कहानी पर निर्भर करता है कि वह इसे कितनी सफलतापूर्वक पेश कर पाते हैं और ऐसा कंटैंट अगर फिल्ममेकर के पास न हो, तो उसे न बनाने में ही भलाई है क्योंकि दिमागी दिवालिएपन का शिकार दर्शक एक बार ही होता है, बारबार नहीं.

Duology Movies

Social Story: तरकीब- क्या खुद को बचा पाई झुमरी

लेखक- जयप्रकाश

Social Story: रतन सिंह की निगाहें पिछले कई दिनों से झुमरी पर लगी हुई थीं. वह जब भी उसे देखता, उस के मुंह से एक आह निकल जाती. झुमरी की खिलती जवानी ने उस के तनमन में एक हलचल सी मचा दी थी और वह उसे हासिल करने को बेताब हो उठा था. वैसे भी रतन सिंह के लिए ऐसा करना कोई बड़ी बात न थी. वह गांव के दबंग गगन सिंह का एकलौता और बिगड़ैल बेटा था. कई जरूरतमंद लड़कियों को अपनी हवस का शिकार उस ने बनाया था. झुमरी तो वैसे भी निचली जाति की थी. झुमरी 20वां वसंत पार कर चुकी एक खूबसूरत लड़की थी. गरीबी में पलीबढ़ी होने के बावजूद जवानी ने उस के रूप को यों निखारा था कि देखने वालों की निगाहें बरबस ही उस पर टिक जाती थीं. गोरा रंग, भरापूरा बदन, बड़ीबड़ी कजरारी आंखें और हिरनी सी मदमस्त चाल.

इस सब के बावजूद झुमरी में एक कमी थी. वह बोल नहीं सकती थी, पर उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वह अपनेआप में मस्त रहने वाली लड़की थी. झुमरी घर के कामों में अपनी मां की मदद करती और खेत के काम में अपने बापू की. उस के बापू तिलक के पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा था, जिस के सहारे वह अपने परिवार को पालता था. वैसे भी उस का परिवार छोटा था. परिवार में पतिपत्नी और 2 बच्चे, झुमरी और शंकर थे. अपनी खेती से समय मिलने पर तिलक दूसरों के खेतों में भी मजदूरी का काम कर लिया करता था. गरीबी में भी तिलक का परिवार खुश था. परंतु कभीकभी पतिपत्नी यह सोच कर चिंतित हो उठते थे कि उन की गूंगी बेटी को कौन अपनाएगा?

झुमरी इन सब बातों से बेखबर मजे में अपनी जिंदगी जी रही थी. वह दिमागी रूप से तेज थी और गांव के स्कूल से 10 वीं जमात तक पढ़ाई कर चुकी थी. उसे खेतखलिहान, बागबगीचों से प्यार था. गांव के दक्षिणी छोर की अमराई में झुमरी अकसर शाम को आ बैठती और पेड़ों के झुरमुट में बैठे पक्षियों की आवाज सुना करती. कोयल की आवाज सुन कर उस का भी जी चाहता कि वह उस के सुर में सुर मिलाए, पर वह बोल नहीं सकती थी. झुमरी की इस कमी को रतन सिंह ने अपनी ताकत समझा. उस ने पहले तो झुमरी को तरहतरह के लालच दे कर अपने प्रेमजाल में फांसना चाहा और जब इस में कामयाब न हुआ, तो जबरदस्ती उसे हासिल करने का मन बना लिया. रात घिर आई थी. चारों तरफ अंधेरा हो चुका था. आज झुमरी को खेत से लौटने में देर हो गई थी. पिछले कई दिनों से उस की ताक में लगे रतन सिंह की नजर जब उस पर पड़ी, तो उस की आंखों में एक तेज चमक जाग उठी.

मौका अच्छा जान कर रतन सिंह उस के पीछे लग गया. एक तो अंधेरा, ऊपर से घर लौटने की जल्दी. झुमरी को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि कोई उस के पीछे लगा हुआ है. वह चौंकी तब, जब अमराई में घुसते ही रतन सिंह उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया. ‘‘मैं ने तुम्हारा प्यार पाने की बहुत कोशिश की…’’ रतन सिंह कामुक निगाहों से झुमरी के उभारों को घूरता हुआ बोला, ‘‘तुम्हें तरहतरह से रिझाया. तुम से प्रेम निवेदन किया, पर तू न मानी. आज अच्छा मौका है. आज मैं छक कर तेरी जवानी का रसपान करूंगा.’’ रतन सिंह का खतरनाक इरादा देख झुमरी के सारे तनबदन में डर की सिहरन दौड़ गई. उस ने रतन सिंह से बच कर निकल जाना चाहा, पर रतन सिंह ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. उस ने झपट कर झुमरी को अपनी बांहों में भर लिया.

झुमरी ने चिल्लाना चाहा, पर उस के होंठों से शब्द न फूटे. झुमरी को रतन सिंह की आंखों में वासना की भूख नजर आई. रतन सिंह झुमरी को खींचता हुआ अमराई के बीचोंबीच ले आया और जबरदस्ती जमीन पर लिटा दिया. इस के पहले कि झुमरी उठे, वह उस पर सवार हो गया. झुमरी उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. दूसरी ओर वासना में अंधा रतन सिंह उस के कपड़े नोचने लगा. उस ने अपने बदन का पूरा भार झुमरी के नाजुक बदन पर डाल दिया, फिर किसी भूखे भेडि़ए की तरह उसे रौंदने लगा. झुमरी रो रही थी, तड़प रही थी, आंखों ही आंखों में फरियाद कर रही थी, लेकिन रतन सिंह ने उस की एक न सुनी और उसे तभी छोड़ा, जब अपनी वासना की आग बुझा ली. ऐसा होते ही रतन सिंह उस के ऊपर से उठ गया. उस ने एक उचटती नजर झुमरी पर डाली. जब उस की निगाहें झुमरी की निगाहों से टकराईं, तो उस को एक झटका सा लगा. झुमरी की आंखों में गुस्से की चिनगारियां फूट रही थीं, पर अभीअभी उस ने झुमरी के जवान जिस्म से लिपट कर जवानी का जो जाम चखा था, इसलिए उस ने झुमरी के गुस्से और नफरत की कोई परवाह नहीं की और उठ कर एक ओर चल पड़ा.

इस घटना ने झुमरी को झकझोर कर रख दिया था. वह 2 दिन तक अपने कमरे में पड़ी रही थी. झुमरी के मांबाप ने जब उस से इस की वजह पूछी, तो उस ने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया था. कई बार झुमरी के दिमाग में यह बात आई थी कि वह इस के बारे में उन्हें बतला दे, पर यह सोच कर वह चुप रह गई थी कि उन से कहने से कोई फायदा नहीं. वे चाह कर भी रतन सिंह का कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे, उलटा रतन सिंह उन की जिंदगी को नरक बना देगा. इस मामले में जो करना था, उसे ही करना था. रतन सिंह ने उस की इज्जत लूट ली थी और उसे इस के किए की सजा मिलनी ही चाहिए थी. पर कैसे?

झुमरी ने इस बात को गहराई से सोचा, फिर उस के दिमाग में एक तरकीब आ गई. रात आधी बीत चुकी थी. सारा गांव सो चुका था, पर झुमरी जाग रही थी. वह इस समय अमराई से थोड़ी दूर बांसवारी यानी बांसों के झुरमुट में खड़ी हाथों में कुदाल लिए एक गड्ढा खोद रही थी. तकरीबन 2 घंटे तक वह गड्ढा खोदती रही, फिर हाथ में कटार लिए बांस के पेड़ों के पास पहुंची. उस ने कटार की मदद से बांस की पतलीपतली अनेक डालियां काटीं, फिर उन्हें गड्ढे के करीब ले आई. डालियों को चिकना कर उन्हें बीच से चीर कर उन की कमाची बनाईं, फिर उन की चटाई बुनने लगी. अपनी इच्छानुसार चटाई बुनने में उसे तकरीबन 3 घंटे लग गए.

चटाई तैयार कर झुमरी ने उसे गड्ढे के मुंह पर रखा. चटाई ने तकरीबन एक मीटर दायरे के गड्ढे के मुंह को पूरी तरह ढक लिया. यह चटाई किसी आदमी का भार हरगिज सहन नहीं कर सकती थी. सुबह होने में अभी चंद घंटे बचे थे. हालांकि बांसों के इस झुरमुट की ओर गांव वाले कम ही आते थे और दिन में यह सुनसान ही रहता था, फिर भी झुमरी कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती थी. उस ने जमीन पर बिखरे बांस के सूखे पत्तों को इकट्ठा कर उन का ढेर लगा दिया. इस काम से निबट कर झुमरी ने बांस की चटाई से गड्ढे का मुंह ढका, पर उस पर पत्तों को इस तरह डाल दिया, ताकि चटाई पूरी तरह ढक जाए और किसी को वहां गड्ढा होने का एहसास न हो. गड्ढे से निकली मिट्टी को उस ने अपने साथ लाई टोकरी में भर कर गड्ढे से थोड़ी दूर डाल दिया.

काम खत्म कर झुमरी ने एक निगाह अपने अब तक के काम पर डाली, फिर अपने साथ लाए बड़े से थैले में अपना सारा सामान भरा और थैला कंधे पर लाद कर घर की ओर चल पड़ी. 7 दिनों तक झुमरी का यह काम चलता रहा. इतने दिन में उस ने 7 फुट गहरा गड्ढा तैयार कर लिया था. गड्ढे में उतरने और चढ़ने के लिए वह अपने साथ घर से लाई सीढ़ी का इस्तेमाल करती थी. काम पूरा कर उस ने पत्ते डाले, फिर अपने अगले काम को अंजाम देने के बारे में सोचती. रतन सिंह ने झुमरी की इज्जत लूट तो ली थी, परंतु अब वह इस बात से डरा हुआ था कि कहीं झुमरी इस बात का जिक्र अपने मांबाप से न कर दे और कोई हंगामा न खड़ा हो जाए. परंतु जब 10 दिन से ज्यादा हो गए और कुछ नहीं हुआ, तो उस ने राहत की सांस ली. अब उसे रात की तनहाई में वो पल याद आते, जब उस ने झुमरी के जवान जिस्म से अपनी वासना की आग बुझाई थी. जब भी ऐसा होता, उस का बदन कामना की आग में झुलसने लगता था.

इस बीच रतन सिंह ने 1-2 बार झुमरी को अपने खेत की ओर जाते या आते देखा था, परंतु उस के सामने जाने की उस की हिम्मत न हुई थी. पर उस दिन अचानक रतन सिंह का सामना झुमरी से हो गया. वह विचारों में खोया अमराई की ओर जा रहा था कि झुमरी उस के सामने आ खड़ी हुई. उसे यों अपने सामने देख एकबारगी तो रतन सिंह बौखला गया था और झुमरी को देखने लगा था. झुमरी कुछ देर तक खामोशी से उसे देखती रही, फिर उस के होंठों पर एक दिलकश मुसकान उभर उठी. उसे इस तरह मुसकराते देख रतन सिंह ने राहत की सांस ली और एकटक झुमरी के खूबसूरत चेहरे और भरेभरे बदन को देखने लगा. इस के बावजूद जब झुमरी मुसकराती रही, तो रतन सिंह बोला, ‘‘झुमरी, उस दिन जो हुआ, उस का तुम ने बुरा तो नहीं माना?’’

झुमरी ने न में सिर हिलाया.

‘‘सच…’’ कहते हुए रतन सिंह ने उस की हथेली कस कर थाम ली, ‘‘इस का मतलब यह है कि तू फिर वह सब करना चाहती है?’’ बदले में झुमरी खुल कर मुसकराई, फिर हौले से अपना हाथ छुड़ा कर एक ओर भाग गई. उस की इस हरकत पर रतन सिंह के तनमन में एक हलचल मच गई और उस की आंखों के सामने वो पल उभर आए, जब उस ने झुमरी की खिलती जवानी का रसपान किया था. झुमरी को फिर से पाने की लालसा में रतन सिंह उस के इर्दगिर्द मंडराने लगा. झुमरी भी अपनी मनमोहक  अदाओं से उस की कामनाओं को हवा दे रही थी. झुमरी ने एक दिन इशारोंइशारों में रतन सिंह से यह वादा कर लिया कि वह पूरे चांद की आधी रात को उस से अमराई में मिलेगी. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. उस की चांदनी चारों ओर बिखरी हुई थी. ऐसे में रतन सिंह बड़ी बेकरारी से एक पेड़ के तने पर बैठा झुमरी का इंतजार कर रहा था.

झुमरी ने आधी रात को यहीं पर उस से मिलने का वादा किया था, परंतु वह अब तक नहीं आई थी. जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे रतन सिंह की बेकरारी बढ़ रही थी. अचानक रतन सिंह को अपने पीछे किसी के खड़े होने की आहट मिली. उस ने पलट कर देखा, तो उस का दिल धक से रह गया. वह झटके से उठ खड़ा हुआ. उस के सामने झुमरी खड़ी थी. उस ने भड़कीले कपड़े पहन रखे थे, जिस से उस की जवानी फटी पड़ रही थी. जब झुमरी ने रतन सिंह को आंखें फाड़े अपनी ओर देखा पाया, तो उत्तेजक ढंग से अपने होंठों पर जीभ फेरी. उस की इस अदा ने रतन सिंह को और भी बेताब कर दिया. रतन सिंह ने झटपट झुमरी को अपनी बांहों में समेट लेना चाहा, लेकिन झुमरी छिटक कर दूर हो गई.

‘‘झुमरी, मेरे पास आओ. मेरे तनबदन में आग लगी है, इसे अपने प्यार की बरसात से शांत कर दो,’’ रतन सिंह बेचैन होते हुए बोला. झुमरी ने इशारे से रतन सिंह को खुद को पकड़ लेने की चुनौती दी. रतन सिंह उस की ओर दौड़ा, तो झुमरी ने भी दौड़ लगा दी. अगले पल हालत यह थी कि झुमरी किसी मस्त हिरनी की तरह भाग रही थी और रतन सिंह उसे पकड़ने के लिए उस के पीछे दौड़ रहा था. झुमरी अमराई से निकली, फिर बांस के झुरमुट की ओर भागी. वह उस गड्ढे की ओर भाग रही थी, जिसे उस ने कई दिनों की कड़ी मेनत से तैयार किया था. वह जैसे ही गड्ढे के नजदीक आई, एक लंबी छलांग भरी और गड्ढे की ओर पहुंच गई. झुमरी के हुस्न में पागल, गड्ढे से अनजान रतन सिंह अचानक गड्ढे में गिर गया. उस के मुंह से घुटीघुटी सी चीख निकली.

कुछ देर तक तो रतन सिंह कुछ समझ ही नहीं पाया कि क्या हो गया है. वह बौखलाया हुआ गड्ढे में गिरा इधरउधर झांक रहा था, पर जैसे ही उस के होशोहवास दुरुस्त हुए, वह जोरजोर से झुमरी को मदद के लिए पुकारने लगा. परंतु उधर से कोई मदद नहीं आई. झुमरी की ओर से निराश रतन सिंह खुद ही गड्ढे से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा. उस ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर गड्ढे के किनारे को पकड़ना चाहा, परंतु वह उस की पहुंच से दूर था. रतन सिंह ने उछल कर बाहर निकलने की 2-4 बार नाकाम कोशिश की. आखिरकार वह गड्ढे का छोर पकड़ने में कामयाब हो गया. उस ने अपने बदन को सिकोड़ कर अपना सिर ऊपर उठाया. उस का सिर थोड़ा ऊपर आया, तभी उस की नजर झुमरी पर पड़ी. उस के हाथों में कुदाल थी और उस की आंखों से नफरत की चिनगारियां फूट रही थीं. इस के पहले कि रतन सिंह कुछ समझता, झुमरी ने कुदाल का भरपूर वार उस के सिर पर किया.

रतन सिंह की दिल दहलाने वाली चीख से वह सुनसान इलाका दहल उठा. उस का सिर फट गया था और खून की धारा फूट पड़ी थी. गड्ढे का किनारा रतन सिंह के हाथ से छूट गया और वह गिर पड़ा था. गड्ढे में गिरते ही रतन सिंह ने अपना सिर थाम लिया. उस की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था और उस पर बेहोशी छाने लगी थी. उस के दिमाग में एक विचार बिजली की तरह कौंधा कि यह झुमरी का फैलाया हुआ जाल था, जिस में फंसा कर वह उसे मार डालना चाहती है. तभी रतन सिंह के सिर पर ढेर सारी मिट्टी आ गिरी. उस ने अपनी बंद होती आंखें उठा कर ऊपर की ओर देखा, तो झुमरी टोकरी लिए वहां खड़ी थी.

अगले ही पल वह बेहोशी के अंधेरों में गुम होता चला गया. झुमरी ने मिट्टी से पूरा गड्ढा भर दिया, फिर उस पर पत्तियां डाल कर उठ खड़ी हुई. उस ने सिर उठा कर ऊपर देखा. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. थोड़ी देर बाद झुमरी कंधे पर थैला लादे अपने घर को लौट रही थी.

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