Hindi Story: लिफाफाबंद चिट्ठी

hindi story: मैंने घड़ी देखी. अभी लगभग 1 घंटा तो स्टेशन पर इंतजार करना ही पड़ेगा. कुछ मैं जल्दी आ गया था और कुछ ट्रेन देरी से आ रही थी. इधरउधर नजरें दौड़ाईं तो एक बैंच खाली नजर आ गई. मैं ने तुरंत उस पर कब्जा कर लिया. सामान के नाम पर इकलौता बैग सिरहाने रख कर मैं पांव पसार कर लेट गया. अकेले यात्रा का भी अपना ही आनंद है. सामान और बच्चों को संभालने की टैंशन नहीं. आराम से इधरउधर ताकाझांकी भी कर लो.

स्टेशन पर बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी. पर जैसे ही कोई ट्रेन आने को होती, एकदम हलचल मच जाती. कुली, ठेले वाले एकदम चौकन्ने हो जाते. ऊंघते यात्री सामान संभालने लगते. ट्रेन के रुकते ही यात्रियों के चढ़नेउतरने का सिलसिला शुरू हो जाता. उस समय यह निश्चित करना मुश्किल हो जाता था कि ट्रेन के अंदर ज्यादा भीड़ है या बाहर? इतने इतमीनान से यात्रियों को निहारने का यह मेरा पहला अवसर था. किसी को चढ़ने की जल्दी थी, तो किसी को उतरने की. इस दौरान कौन खुश है, कौन उदास, कौन चिंतित है और कौन पीडि़त यह देखनेसमझने का वक्त किसी के पास नहीं था.

किसी का पांव दब गया, वह दर्द से कराह रहा है, पर रौंदने वाला एक सौरी कह चलता बना. ‘‘भैया जरा साइड में हो कर सहला लीजिए,’’ कह कर आसपास वाले रास्ता बना कर चढ़नेउतरने लगे. किसी को उसे या उस के सामान को चढ़ाने की सुध नहीं थी. चढ़ते वक्त एक महिला की चप्पलें प्लेटफार्म पर ही छूट गईं. वह चप्पलें पकड़ाने की गुहार करती रही. आखिर खुद ही भीड़ में रास्ता बना कर उतरी और चप्पलें पहन कर चढ़ी.

मैं लोगों की स्वार्थपरता देख हैरान था. क्या हो गया है हमारी महानगरीय संस्कृति को? प्रेम, सौहार्द और अपनेपन की जगह हर किसी की आंखों में अविश्वास, आशंका और अजनबीपन के साए मंडराते नजर आ रहे थे. मात्र शरीर एकदूसरे को छूते हुए निकल रहे थे, उन के मन के बीच का फासला अपरिमित था. मुझे सहसा कवि रामदरश मिश्र की वह उपमा याद आ गई, ‘कैसा है यह एकसाथ होना, दूसरे के साथ हंसना न रोना. क्या हम भी लैटरबौक्स की चिट्ठियां बन गए हैं?’

इस कल्पना के साथ ही स्टेशन का परिदृश्य मेरे लिए सहसा बदल गया. शोरशराबे वाला माहौल निस्तब्ध शांति में तबदील हो गया. अब वहां इंसान नहीं सुखदुख वाली अनंत चिट्ठियां अपनीअपनी मंजिल की ओर धीरेधीरे बढ़ रही थीं. लेकिन कोई किसी से नहीं बोल रही थी. मैं मानो सपनों की दुनिया में विचरण करने लगा था.

‘‘हां, यहीं रख दो,’’ एक नारी स्वर उभरा और फिर ठकठक सामान रखने की आवाज ने मेरी तंद्रा भंग कर दी. गोद में छोटे बच्चे को पकड़े एक संभ्रांत सी महिला कुली से सामान रखवा रही थी. बैंच पर बैठने का उस का मंतव्य समझ मैं ने पांव समेट लिए और जगह बना दी. वह धन्यवाद दे कर मुसकान बिखेरती हुई बच्चे को ले कर बैठ गई. एक बार उस ने अपने सामान का अवलोकन किया. शायद गिन रही थी पूरा आ गया है या नहीं? फिर इतमीनान से बच्चे को बिस्कुट खिलाने लगी.

यकायक उस महिला को कुछ खयाल आया. उस ने अपनी पानी की बोतल उठा कर हिलाई. फिर इधरउधर नजरें दौड़ाईं. दूर पीने के पानी का नल और कतार नजर आ रहें थे. उस की नजरें मुड़ीं और आ कर मुझ पर ठहर गईं. मैं उस का मंतव्य समझ नजरें चुराने लगा. पर उस ने मुझे पकड़ लिया, ‘‘भाई साहब, बहुत जल्दी में घर से निकलना हुआ तो बोतल नहीं भर सकी. प्लीज, आप भर लाएंगे?’’

एक तो अपने आराम में खलल की वजह से मैं वैसे ही खुंदक में था और फिर ऊपर से यह बेगार. मेरे मन के भाव शायद मेरे चेहरे पर लक्षित हो गए थे. इसलिए वह तुरंत बोल पड़ी, ‘‘अच्छा रहने दीजिए. मैं ही ले आती हूं. आप थोड़ा टिंकू को पकड़ लेंगे?’’

वह बच्चे को मेरी गोद में पकड़ाने लगी, तो मैं झटके से उठ खड़ा हुआ, ‘‘मैं ही ले आता हूं,’’ कह कर बोतल ले कर रवाना हुआ तो मन में एक शक का कीड़ा बुलबुलाया कि कहीं यह कोई चोरउचक्की तो नहीं? आजकल तो चोर किसी भी वेश में आ जाते हैं. पीछे से मेरा बैग ही ले कर चंपत न हो जाए? अरे नहीं, गोद में बच्चे और ढेर सारे सामान के साथ कहां भाग सकती है? लो, बन गए न बेवकूफ? अरे, ऐसों का पूरा गिरोह होता है. महिलाएं तो ग्राहक फंसाती हैं और मर्द सामान ले कर चंपत. मैं ठिठक कर मुड़ कर अपना सामान देखने लगा.

‘‘मैं ध्यान रख रही हूं, आप के सामान का,’’ उस ने जोर से कहा.

मैं मन ही मन बुदबुदाया कि इसी बात का तो डर है. कतार में खड़े और बोतल भरते हुए भी मेरी नजरें अपने बैग पर ही टिकी रहीं. लौट कर बोतल पकड़ाई, तो उस ने धन्यवाद कहा. फिर हंस कर बोली, ‘‘आप से कहा तो था कि मैं ध्यान रख रही हूं. फिर भी सारा वक्त आप की नजरें इसी पर टिकी रहीं.’’

अब मैं क्या कहता? ‘खैर, कर दी एक बार मदद, अब दूर रहना ही ठीक है,’ सोच कर मैं मोबाइल में मैसेज पढ़ने लगा. यह अच्छा जरिया है आजकल, भीड़ में रहते हुए भी निस्पृह बने रहने का.

‘‘आप बता सकते हैं कोच नंबर 3 कहां लगेगा?’’ उस ने मुझ से फिर संपर्कसूत्र जोड़ने की कोशिश की.

‘‘यहीं या फिर थोड़ा आगे,’’ सूखा सा जवाब देते वक्त अचानक मेरे दिमाग में कुछ चटका कि ओह, यह भी मेरे ही डब्बे में है? मेरी नजरें उस के ढेर सारे सामान पर से फिसलती हुईं अपने इकलौते बैग पर आ कर टिक गईं. अब यदि इस ने अपना सामान चढ़वाने में मदद मांगी या बच्चे को पकड़ाया तो? बच्चू, फूट ले यहां से. हालांकि ट्रेन आने में अभी 10 मिनट की देर थी. पर मैं ने अपना बैग उठाया और प्लेटफार्म पर टहलने लगा.

कुछ ही देर में ट्रेन आ पहुंची. मैं लपक कर डब्बे में चढ़ा और अपनी सीट पर जा कर पसर गया. अभी मैं पूरी तरह जम भी नहीं पाया था कि उसी महिला का स्वर सुनाई दिया, ‘‘संभाल कर चढ़ाना भैया. हां, यह सूटकेस इधर नीचे डाल दो और उसे ऊपर चढ़ा दो… अरे भाई साहब, आप की भी सीट यहीं है? चलो, अच्छा है… लो भैया, ये लो अपने पूरे 70 रुपए.’’

मैं ने देखा वही कुली था. पैसे ले कर वह चला गया. महिला मेरे सामने वाली सीट पर बच्चे को बैठा कर खुद भी बैठ गई और सुस्ताने लगी. मुझे उस से सहानुभूति हो आई कि बेचारी छोटे से बच्चे और ढेर सारे सामान के साथ कैसे अकेले सफर कर रही है? पर यह सहानुभूति कुछ पलों के लिए ही थी. परिस्थितियां बदलते ही मेरा रुख भी बदल गया. हुआ यों कि टी.टी. आया तो वह उस की ओर लपकी. बोली, ‘‘मेरी ऊपर वाली बर्थ है. तत्काल कोटे में यही बची थी. छोटा बच्चा साथ है, कोई नीचे वाली सीट मिल जाती तो…’’

मेरी नीचे वाली बर्थ थी. कहीं मुझे ही बलि का बकरा न बनना पड़े, सोच कर मैं ने तुरंत मोबाइल निकाला और बात करने लगा. टी.टी. ने मुझे व्यस्त देख पास बैठे दूसरे सज्जन से पूछताछ आरंभ कर दी. उन की भी नीचे की बर्थ थी. वे सीटों की अदलाबदली के लिए राजी हो गए, तो मैं ने राहत की सांस ले कर मोबाइल पर बात समाप्त की. वे सज्जन एक उपन्यास ले कर ऊपर की बर्थ पर जा कर आराम से लेट गए. महिला ने भी राहत की सांस ली.

‘‘चलो, यह समस्या तो हल हुई… मैं जरा टौयलेट हो कर आती हूं. आप टिंकू को देख लेंगे?’’ बिना जवाब की प्रतीक्षा किए वह उठ कर चल दी. मुझ जैसे सज्जन व्यक्ति से मानो इनकार की तो उसे उम्मीद ही नहीं थी.

मैं ने सिर थाम लिया कि इस से तो मैं सीट बदल लेता तो बेहतर था. मुझे आराम से उपन्यास पढ़ते उन सज्जन से ईर्ष्या होने लगी. उस महिला पर मुझे बेइंतहा गुस्सा आ रहा था कि क्या जरूरत थी उसे एक छोटे बच्चे के संग अकेले सफर करने की? मेरे सफर का सारा मजा किरकिरा कर दिया. मैं बैग से

अखबार निकाल कर पढ़े हुए अखबार को दोबारा पढ़ने लगा. वह महिला तब तक लौट आई थी.

‘‘मैं जरा टिंकू को भी टौयलेट करा लाती हूं. सामान का ध्यान तो आप रख ही रहे हैं,’’ कहते हुए वह बच्चे को ले कर चली गई. मैं ने अखबार पटक दिया और बड़बड़ाया कि हां बिलकुल. स्टेशन से बिना पगार का नौकर साथ ले कर चढ़ी हैं मैडमजी, जो कभी इन के बच्चे का ध्यान रखेगा, कभी सामान का, तो कभी पानी भर कर लाएगा…हुंह.

तभी पैंट्रीमैन आ गया, ‘‘सर, आप खाना लेंगे?’’

‘‘हां, एक वैज थाली.’’

वह सब से पूछ कर और्डर लेने लगा. अचानक मुझे उस महिला का खयाल आया कि यदि उस ने खाना और्डर नहीं किया तो फिर स्टेशन से मुझे ही कुछ ला कर देना पड़ेगा या शायद शेयर ही करना पड़ जाए. अत: बोला, ‘‘सुनो भैया, उधर टौयलेट में एक महिला बच्चे के साथ है. उस से भी पूछ लेना.’’

कुछ ही देर में बच्चे को गोद में उठाए वह प्रकट हो गई, ‘‘धन्यवाद, आप ने हमारे खाने का ध्यान रखा. पर हमें नहीं चाहिए. हम तो घर से काफी सारा खाना ले कर चले हैं. वह रामधन है न, हमारे बाबा का रसोइया उस ने ढेर सारी सब्जी व पूरियां साथ रख दी हैं. बस, जल्दीजल्दी में पानी भरना भूल गया, बल्कि हम तो कह रहे हैं आप भी मत मंगाइए. हमारे साथ ही खा लेना.’’

मैं ने कोई जवाब न दे कर फिर से अखबार आंखों के आगे कर लिया और सोचने लगा कि या तो यह महिला निहायत भोली है या फिर जरूरत से ज्यादा शातिर. हो सकता है खाने में कुछ मिला कर लाई हो. पहले भाईचारा गांठ रही है और फिर… मुझे सावधान रहना होगा. इस का आज का शिकार निश्चितरूप से मैं ही हूं.

जबलपुर स्टेशन आने पर खाना आ गया था. मैं कनखियों से उस महिला को खाना निकालते और साथ ही बच्चे को संभालते देख रहा था. पर मैं जानबूझ कर अनजान बना अपना खाना खाता रहा.

‘‘थोड़ी सब्जीपूरी चखिए न. घर का बना खाना है,’’ उस ने इसरार किया.

‘‘बस, मेरा पेट भर गया है. मैं तो नीचे स्टेशन पर चाय पीने जा रहा हूं,’’ कह मैं फटाफट खाना खत्म करते हुए वहां से खिसक लिया कि कहीं फिर पानी या और कुछ न मंगा ले.

‘‘हांहां, आराम से जाइए. मैं आप के सामान का खयाल रख लूंगी.’’

‘ओह, बैग के बारे में तो भूल ही गया था. इस की नजर जरूर मेरे बैग पर है. पर क्या ले लेगी? 4 जोड़ी कपड़े ही तो हैं. यह अलग बात है कि सब अच्छे नए जोड़े हैं और आज के जमाने में तो वे ही बहुत महंगे पड़ते हैं. पर छोड़ो, बाहर थोड़ी आजादी तो मिलेगी. इधर तो दम घुटने लगा है,’ सोचते हुए मैं नीचे उतर गया. चाय पी तो दिमाग कुछ शांत हुआ. तभी मुझे अपना एक दोस्त नजर आ गया. वह भी उसी गाड़ी में सफर कर रहा था और चाय पीने उतरा था. बातें करते हुए मैं ने उस के संग दोबारा चाय पी. मेरा मूड अब एकदम ताजा हो गया था. हम बातों में इतना खो गए कि गाड़ी कब खिसकने लगी, हमें ध्यान ही न रहा. दोस्त की नजर गई तो हम भागते हुए जो डब्बा सामने दिखा, उसी में चढ़ गए. शुक्र है, सब डब्बे अंदर से जुड़े हुए थे. दोस्त से विदा ले कर मैं अपने डब्बे की ओर बढ़ने लगा. अभी अपने डब्बे में घुसा ही था कि एक आदमी ने टोक दिया, ‘‘क्या भाई साहब, कहां चले गए थे? आप की फैमिली परेशान हो रही है.’’

आगे बढ़ा तो एक वृद्ध ने टोक दिया, ‘‘जल्दी जाओ बेटा. बेचारी के आंसू निकलने को हैं,’’ अपनी सीट तक पहुंचतेपहुंचते लोगों की नसीहतों ने मुझे बुरी तरह खिझा दिया था.

मैं बरस पड़ा, ‘‘नहीं है वह मेरी फैमिली. हर किसी राह चलते को मेरी फैमिली बना देंगे आप?’’

‘‘भैया, वह सब से आप का हुलिया बताबता कर पूछ रही थी, चेन खींचने की बात कर रही थी. तब किसी ने बताया कि आप जल्दी में दूसरे डब्बे में चढ़ गए हैं. चेन खींचने की जरूरत नहीं है, अभी आ जाएंगे तब कहीं जा कर मानीं,’’ एक ने सफाई पेश की.

‘‘क्या चाहती हैं आप? क्यों तमाशा बना रही हैं? मैं अपना ध्यान खुद रख सकता हूं. आप अपना और अपने बच्चे का ध्यान रखिए. बहुत मेहरबानी होगी,’’ मैं ने गुस्से में उस के आगे हाथ जोड़ दिए.

इस के बाद पूरे रास्ते कोई कुछ नहीं बोला. एक दमघोंटू सी चुप्पी हमारे बीच पसरी रही. मुझे लग रहा था मैं अनावश्यक ही उत्तेजित हो गया था. पर मैं चुप रहा. मेरा स्टेशन आ गया था. मैं उस पर फटाफट एक नजर भी डाले बिना अपना बैग उठा कर नीचे उतर गया. अपना वही दोस्त मुझे फिर नजर आ गया तो मैं उस से बतियाने रुक गया. हम वहीं खड़े बातें कर रहे थे कि एक अपरिचित सज्जन मेरी ओर बढ़े. उन की गोद में उसी बच्चे को देख मैं ने अनुमान लगा लिया कि वे उस महिला के पति होंगे.

‘‘किन शब्दों में आप को धन्यवाद दूं? संजना बता रही है, आप ने पूरे रास्ते उस का और टिंकू का बहुत खयाल रखा. वह दरअसल अपने बीमार बाबा के पास पीहर गई हुई थी. मैं खुद उसे छोड़ कर आया था. यहां अचानक मेरे पापा को हार्टअटैक आ गया. उन्हें अस्पताल में भरती करवाना पड़ा. संजना को पता चला तो आने की जिद पकड़ बैठी. मैं ने मना किया कि कुछ दिनों बाद मैं खुद लेने आ जाऊंगा पर उस से रहा नहीं गया. बस, अकेले ही चल पड़ी. मैं कितना फिक्रमंद हो रहा था…’’

‘‘मैं ने कहा था न आप को फिक्र की कोई बात नहीं है. हमें कोई परेशानी नहीं होगी. और देखो ये भाई साहब मिल ही गए. इन के संग लगा ही नहीं कि मैं अकेली सफर कर रही हूं.’’

मैं असहज सा महसूस करने लगा. मैं ने घड़ी पर नजर डाली, ‘‘ओह, 5 बज गए. मैं चलता हूं… क्लाइंट निकल जाएगा,’’ कहते हुए मैं आगे बढ़ते यात्रियों में शामिल हो गया. लिफाफाबंद चिट्ठियों की भीड़ में एक और चिट्ठी शुमार हो गई थी.

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Short Story: कौन जिम्मेदार: किशोरीलाल ने कौनसा कदम उठाया

Short Story: ‘‘किशोरीलाल ने खुदकुशी कर ली…’’ किसी ने इतना कहा और चौराहे पर लोगों को चर्चा का यह मुद्दा मिल गया.

‘‘मगर क्यों की…?’’  भीड़ में से सवाल उछला.

‘‘अरे, अगर खुदकुशी नहीं करते, तो क्या घुटघुट कर मर जाते?’’ भीड़ में से ही किसी ने एक और सवाल उछाला.

‘‘आप के कहने का मतलब क्या है?’’ तीसरे आदमी ने सवाल पूछा.

‘‘अरे, किशोरीलाल की पत्नी कमला का संबंध मनमोहन से था. दुखी हो कर खुदकुशी न करते तो वे क्या करते?’’

‘‘अरे, ये भाई साहब ठीक कह रहे हैं. कमला किशोरीलाल की ब्याहता पत्नी जरूर थी, मगर उस के संबंध मनमोहन से थे और जब किशोरीलाल उन्हें रोकते, तब भी कमला मानती नहीं थी,’’ भीड़ में से किसी ने कहा.

चौराहे पर जितने लोग थे, उतनी ही बातें हो रही थीं. मगर इतना जरूर था कि किशोरीलाल की पत्नी कमला का चरित्र खराब था. किशोरीलाल भले ही उस के पति थे, मगर वह मनमोहन की रखैल थी. रातभर मनमोहन को अपने पास रखती थी. बेचारे किशोरीलाल अलग कमरे में पड़ेपड़े घुटते रहते थे. सुबह जब सूरज निकला, तो कमला के रोने की आवाज से आसपास और महल्ले वालों को हैरान कर गया. सब दौड़ेदौड़े घर में पहुंचे, तो देखा कि किशोरीलाल पंखे से लटके हुए थे. यह बात पूरे शहर में फैल गई, क्योंकि यह मामला खुदकुशी का था या कत्ल का, अभी पता नहीं चला था.

इसी बीच किसी ने पुलिस को सूचना दे दी. पुलिस आई और लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले गई. यह बात सही थी कि किशोरीलाल और कमला के बीच बनती नहीं थी. कमला किशोरीलाल को दबा कर रखती थी. दोनों के बीच हमेशा झगड़ा होता रहता था. कभीकभी झगड़ा हद पर पहुंच जाता था. यह मनमोहन कौन है? कमला से कैसे मिला? यह सब जानने के लिए कमला और किशोरीलाल की जिंदगी में झांकना होगा. जब कमला के साथ किशोरीलाल की शादी हुई थी, उस समय वे सरकारी अस्पताल में कंपाउंडर थे. किशोरीलाल की कम तनख्वाह से कमला संतुष्ट न थी. उसे अच्छी साडि़यां और अच्छा खाने को चाहिए था. वह उन से नाराज रहा करती थी.

इस तरह शादी के शुरुआती दिनों से ही उन के बीच मनमुटाव होने लगा था. कुछ दिनों के बाद कमला किशोरीलाल से नजरें चुरा कर चोरीछिपे देह धंधा करने लगी. धीरेधीरे उस का यह धंधा चलने लगा. वैसे, कमला ने लोगों को बताया था कि उस ने अगरबत्ती बनाने का घरेलू धंधा शुरू कर दिया है. इसी बीच उन के 2 बेटे हो गए, इसलिए जरूरतें और बढ़ गईं. मगर चोरीछिपे यह धंधा कब तक चल सकता था. एक दिन किशोरीलाल को इस की भनक लग गई. उन्होंने कमला से पूछा, ‘मैं यह क्या सुन रहा हूं?’

‘क्या सुन रहे हो?’ कमला ने भी अकड़ कर कहा.

‘क्या तुम देह बेचने का धंधा कर रही हो?’ किशोरीलाल ने पूछा.

‘तुम्हारी कम तनख्वाह से घर का खर्च पूरा नहीं हो पा रहा था, तो मैं ने यह धंधा अपना लिया है. कौन सा गुनाह कर दिया,’ कमला ने भी साफ बात कह कर अपने अपराध को कबूल कर लिया. यह सुन कर किशोरीलाल को गुस्सा आया. वे कमला को थप्पड़ जड़ते हुए बोले, ‘बेगैरत, देह धंधा करती हो तुम?’ ‘तो पैसे कमा कर लाओ, फिर छोड़ दूंगी यह धंधा. अरे, औरत तो ले आया, मगर उस की हर इच्छा को पूरा नहीं करता है. मैं कैसे भी कमा रही हूं, तेरे से तो नहीं मांग रही हूं,’ कमला भी जवाबी हमला करते हुए बोली और एक झटके से बाहर निकल गई. किशोरीलाल कुछ नहीं कर पाए. इस तरह कई मौकों पर उन दोनों के बीच झगड़ा होता रहता था. इसी बीच शिक्षा विभाग से शिक्षकों की भरती हेतु थोक में नौकरियां निकलीं. कमला ने भी फार्म भर दिया. उसे सहायक टीचर के पद पर एक गांव में नौकरी मिल गई.

चूंकि गांव शहर से दूर था और उस समय आनेजाने के इतने साधन न थे, इसलिए मजबूरी में कमला को गांव में ही रहना पड़ा. गांव में रहने के चलते वह और आजाद हो गई. कमला ने 10-12 साल इसी गांव में गुजारे, फिर एक दिन उस ने अपने शहर के एक स्कूल में ट्रांसफर करवा लिया. मगर उन की लड़ाई अब भी नहीं थमी. बच्चे अब बड़े हो रहे थे. वे भी मम्मीपापा का झगड़ा देख कर मन ही मन दुखी होते थे, मगर उन के झगड़े के बीच न पड़ते थे. जिस स्कूल में कमला पढ़ाती थी, वहीं पर मनमोहन भी थे. उन की पत्नी व बच्चे थे, मगर सभी उज्जैन में थे. मनमोहन यहां अकेले रहा करते थे. कमला और उन के बीच खिंचाव बढ़ा. ज्यादातर जगहों पर वे साथसाथ देखे गए. कई बार वे कमला के घर आते और घंटों बैठे रहते थे. कमला भी धीरेधीरे मनमोहन के जिस्मानी आकर्षण में बंधती चलीगई. ऐसे में किशोरीलाल कमला को कुछ कहते, तो वह अलग होने की धमकी देती, क्योंकि अब वह भी कमाने लगी थी. इसी बात को ले कर उन में झगड़ा बढ़ने लगा.

फिर महल्ले में यह चर्चा चलती रही कि कमला के असली पति किशोरीलाल नहीं मनमोहन हैं. वे किशोरीलाल को समझाते थे कि कमला को रोको. वह कैसा खेल खेल रही है. इस से महल्ले की दूसरी लड़कियों और औरतों पर गलत असर पड़ेगा. मगर वे जितना समझाने की कोशिश करते, कमला उतनी ही शेरनी बनती. जब भी मनमोहन कमला से मिलने घर पर आते, किशोरीलाल सड़कों पर घूमने निकल जाते और उन के जाने का इंतजार करते थे.  पिछली रात को भी वही हुआ. जब रात के 11 बजे किशोरीलाल घूम कर बैडरूम के पास पहुंचे, तो भीतर से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थीं. वे सुनने के लिए खड़े हो गए. दरवाजे पर उन्होंने झांक कर देखा, तो शर्म के मारे आंखें बंद कर लीं. सुबह किशोरीलाल की पंखे से टंगी लाश मिली. उन्होंने खुद को ही खत्म कर लिया था. घर के आसपास लोग इकट्ठा हो चुके थे. कमला की अब भी रोने की आवाज आ रही थी.

इस मौत का जिम्मेदार कौन था? अब लाश के आने का इंतजार हो रहा था. शवयात्रा की पूरी तैयारी हो चुकी थी. जैसे ही लाश अस्पताल से आएगी, औपचारिकता पूरी कर के श्मशान की ओर बढ़ेगी.

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Wife Beating: जानें कानूनी अधिकार

Wife Beating: चाहे साल 2026 हो या कोई भी हो, पत्नी पर हाथ उठाने को किसी भी तरह से जस्टीफाई नहीं किया जा सकता जा सकता. पति के द्वारा पत्नी पर हाथ उठाना घरेलु हिंसा के अंतर्गत आता है और घरेलु हिंसा को ले कर कड़े कानून हैं. लेकिन दुख इस बात का है कि पत्नियों को इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है और उन्हें लगता है कि अगर पति का घर छोड़ा तो हम कहां जाएंगे इसलिए वह पीटने सहने को मजबूर होती हैं. उन्हें लगता है की इस घर को छोड़ा तो मेरा कोई आसरा नहीं है.

आज हम यही बताने जा रहे हैं कि अगर पति हाथ उठा रहा है तो आप क्या करें? आप के क्या अधिकार हैं? कानून ने आप को इस के तहत सुरक्षा दी है बस जरूरत है कि अपने उस अधिकार को जानने और उस का फायदा लेने की. आइए, जानें क्या करें जब पति मारे.

अगर मारपीट की शुरुआत है, तो बातचीत से मामला हल करें

अगर आप के साथ मारपीट हो रही हो तो लोग क्या कहेंगे, यह सोच कर चुप न बैठें बल्कि पहली बार में ही पति की हिम्मत तोड़ दें. इस के लिए परिवार के बड़ेबुजुर्गों, रिश्तेदारों या किसी ऐसे व्यक्ति को शामिल करें जिस की बात पति सुनता हो. उन्हें स्पष्ट शब्दों में बता दें कि आप इस तरह की चीजें कतई बरदाश्त नहीं करेंगी.

मैरिज काउंसलिंग लें

अगर पति गिल्टी फील कर रहा है तो भी तुरंत माफ न करें बल्कि  दोनों को मिल कर किसी अच्छे काउंसलर से मिलना चाहिए. पेशेवर लोग झगड़े की जड़ तक पहुंचने में मदद करते हैं क्योंकि ऐसा हुआ जिस की कोई वजह होगी इसलिए उस वजह की जड़ में जाएं और समस्या को दूर करें.

नशामुक्ति केंद्र ले जाएं

यदि पति शराब या किसी नशे की वजह से पीटता है, तो उसे नशामुक्ति केंद्र ले जाना ही सब से बड़ा समाधान है.

गुस्सा कंट्रोल करने की थेरैपी दिलवाएं

पति को अपना गुस्सा नियंत्रित करने के लिए थेरैपी लेने की सलाह दें. बल्कि आप उन के साथ जाएं या फिर परिवार के किसी सदस्य को बोलें.

पति को दें चेतावनी

पति को स्पष्ट रूप से बताएं कि उन का व्यवहार गलत है और यदि यह दोबारा हुआ तो आप कानूनी कदम उठाएंगी. कई बार कानूनी काररवाई का डर व्यवहार बदल देता है. लेकिन यह तभी हो सकता है जब आप अपने अधिकारों के बारे में जानती हों. इसलिए पहले यह जानें कि आप कानूनी अधिकार क्या हैं?

घरेलू हिंसा अधिनियम (डीवी एक्ट), 2005 के तहत आप को ये अधिकार मिलते हैं :

-पति के घर से आप को कोई नहीं निकाल सकता, इसलिए डरें नहीं वहीं रहें.

-अकसर पत्नियों को यह डर रहता है कि कहीं शिकायत करने पर पति ने घर से बहार निकाल दिया तो वे कहां जाएंगी. इसी वजह से वे सहती रहती हैं. लेकिन हम आप को बता दें कि पति आप को घर से बाहर नहीं निकाल सकता, भले ही घर उस के नाम पर हो. अगर वह निकालता है, तो कोर्ट उसे आप को वापस घर में रखने का आदेश दे सकता है.

संरक्षण आदेश (प्रोटैक्शन और्डर) के तहत पति दोबारा मारपीट नहीं कर सकता.

कई पत्नियों को यह डर भी लगा रहता है कि अगर उन्होंने कंप्लेंट की तो वापस घर आने पर पति इस से भी ज्यादा बुरी तरह मारेगा तब वे क्या करेंगी? इस के लिए आप संरक्षण आदेश के तहत अदालत से आदेश ले सकती हैं कि पति दोबारा आप के साथ मारपीट न करे.

मारपीट के तहत हुए नुकसान का हरजाना पति से मांग सकती हैं

इस बात से भी डरने की जरूरत नहीं है कि कहीं चोट लग गए हैं तो उस के इलाज के लिए अच्छे अस्पताल गए तो खर्चा कहां से आएगा. आप अपने और अपने बच्चों के खर्च, इलाज के खर्च और मारपीट के कारण हुए नुकसान की भरपाई के लिए पैसे मांग सकती हैं.

भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) (पहले आईपीसी 498A) के तहत मामला दर्ज करा सकती हैं

आप क्रिमिनल ऐक्शन भी ले सकती हैं. आप पति और प्रताड़ित करने वाले ससुराल वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) (पहले आईपीसी 498A) के तहत मामला दर्ज करा सकती हैं. यह धारा किसी महिला के पति या उस के रिश्तेदारों द्वारा उस से क्रूरता करने (मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक) या दहेज की मांग पूरी करने के लिए उत्पीड़न करने से संबंधित है.

इस के लिए आप अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन में शिकायत (एफआईआर) दर्ज करा सकती हैं, जिस में सभी घटनाएं और सुबूत (जैसे मैडिकल रिपोर्ट, मैसेज, गवाह) हों.

मानसिक या शारीरिक क्रूरता के सुबूत, जैसे चोटों की तसवीरें, डाक्टर के पर्चे या मानसिक उत्पीड़न के मैसेज/औडियो रिकार्डिंग जुटाएं.

एक वकील से सलाह लें जो आप को प्रक्रिया और आवश्यक दस्तावेजों के बारे में बता सके.

मैडिकल एमएलसी कराएं

मारपीट होने पर तुरंत अस्पताल जा कर मैडिकल एमएलसी कराएं. यह चोट के निशान कानूनी सुबूत के तौर पर बहुत काम आते हैं.

-महिला हेल्पलाइन नंबर 1091 या 181

पुलिस आपातकालीन नंबर : 112

घरेलू हिंसा कानून के दायरे में  क्या आता है

घरेलू हिंसा कानून के दायरे में महिलाओं के खिलाफ हर तरह की हिंसा आती है. इस के तहत महिला के साथ मारपीट, जोरजबरदस्ती या चोट पहुंचाने जैसी चीजें आती हैं. वैसे महिलाओं को ज्यादातर शारीरिक हिंसा जिस में थप्पङ मारना, धक्का देना, गला दबाना और जलाना का सामना करना पड़ता है. इस के अलावा इन्हें भावनात्मक, यौन और आर्थिक हिंसा का सामना भी करना पड़ता है.

कैसे दर्ज कराएं केस

कानून के तहत सहायता पाने के लिए लोकल पुलिस स्टेशन जाने की जरूरत होती है. वहां घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया जा सकता है. घरेलू हिंसा कानून महिलाओं के साथसाथ 18 साल की उम्र तक के बच्चों को भी संरक्षण देता है.

हालांकि पुलिस अफसर पहले मामले की पड़ताल करता है. अगर उसे लगता है कि इस का कानूनी मामला बनता है तो वह इस की एफआईआर दर्ज करता है. पुलिस वाले पहले एफआईआर दर्ज नहीं करते हैं. पहले वे शिकायत दर्ज करते हैं. ज्यादातर मामलों में महिलाएं सिर्फ शिकायत दर्ज करा देती हैं, जिस से गंभीर मामलों में उचित काररवाई नहीं हो पाती.

लेकिन अगर महिलाएं चाहें तो आईपीसी 498(ए) यानी महिला उत्पीड़न कानून के तहत सीधे थाने में भी एफआईआर दर्ज करा सकती हैं.

एफआईआर के बाद मामला अदालत में जाता है. इस के बाद अदालत इस का संज्ञान लेती है. बहुत से मामले में महिलाएं सीधे अदालत में जा कर संरक्षण की फरियाद करते हैं. अदालत ऐसे मामलों में संरक्षण दिए जाने के लिए कह सकता है या फिर पीड़ित को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दे सकता है.

महिलाएं घरेलू हिंसा का मामला कहीं से भी दर्ज करा सकती हैं. अगर वे पति की ज्यादती की शिकार होने के बाद पिता के पास आ कर रहने लगी हैं तो वहां से भी मामला दर्ज करा सकती हैं.

अगर महिलाएं आर्थिक रूप से पति पर आश्रित हैं तो वे अदालत में मेंटिनेंस दिए जाने के लिए भी निवेदन कर सकती हैं. इस के लिए अदालत अंतरिम आदेश में मेंटिनेंस दिए जाने का आदेश दे सकती है.

आजकल ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की तरफ से काउंसलर की नियुक्ति की जाती है. काउंसलर दोनों पक्षों की बात सुनता है और अगर मामला बातचीत से सुलझ सकता हो तो वह दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने का प्रयास करता है. कई बार मेंटिनेंस या दूसरे मामलों पर काउंसलर के स्तर पर ही मामले में सहमति बन जाती है और आगे की अदालती प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन अगर काउंसलर अपनी रिपोर्ट में कहता है कि दोनों पक्षों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है तो कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है. इस के आलावा आप अदालत से आदेश भी ले सकती हैं कि पति दोबारा आप के साथ मारपीट न करे और न ही आप से संपर्क करे.

कांग्रेस के कार्यकाल में जो कानून पारित हुए उस से मिले महिलाओं को ये अधिकार

कांग्रेस के कार्यकाल में जो कानून पारित हुए उस ने महिलाओं की इस स्थिति को लगभग पूरी तरह बदलने का काम किया है. डोमैस्टिक वायलैंस एक्ट 2005 जैसे कानून कांग्रेस के कार्यकाल में ही बने थे जिन्होंने महिलाओं का उत्पीड़न रोकने और उन्हें हक दिलाने के लिए इन कानूनों ने बहुत कुछ ऐसा किया है, जिस से महिलाएं भी आज किसी की कैदी नहीं हैं और न ही किसी से मार खाने को मजबूर हैं. इसलिए अपने इन अधिकारों का प्रयोग करें और किसी से न डरते हुए उचित कदम उठाएं.

Wife Beating

Naseem Shaikh: एक लड़की की आजादी पूरे परिवार को बदल सकती है

Naseem Shaikh: साल 1993 में लातूर भूकंप से चर्चा में आने वली सोशल वर्कर नसीम शेख ने, जो स्वयं शिक्षण प्रयोग (एसएसपी) में एसोसिएट प्रोग्राम डाइरैक्टर हैं और महिला सशक्तिकरण, जलवायु परिवर्तन व ग्रामीण किसान स्त्रियों की सतत विकास के क्षेत्र में पिछले 20 साल से काम कर रही हैं, खासकर कृषि और खाद्य प्रणालियों में, उन का योगदान काफी है.

नसीम महाराष्ट्र के शोलापुर की हैं. इस संस्था को साल 1986 में प्रेरणा गोपालन ने शुरू किया. नसीम ने साल 1996 में इस में जौइन किया और तभी से लगातार काम कर रही हैं. वे सामाजिक कार्यकर्ता प्रेरणा गोपालन से काफी प्रेरित हैं क्योंकि वे पढ़ीलिखी होने के साथसाथ दिनरात ग्रामीण स्त्रियों के मामले को गहराई से समझती और उस दिशा में काम करती हैं.

उन का मानना है कि एक स्त्री के अंदर बहुत अधिक पोटैंसियल होती है, लेकिन उसे आगे लाने के लिए एक मंच की जरूरत होती है और उन्होंने उसे देने की कोशिश की है. इस के केंद्र शोलापुर, लातूर, उस्मानाबाद, नांदेड, वाशिम, जालना, वर्धा, पुणे आदि स्थानों पर हैं, जिन में महाराष्ट्र के लाखों सूखा प्रभावित स्त्रियों ने प्रशिक्षण ले कर अपने जीवन को सुधार लिया है और वे अपनी भूमिका जानने लगी हैं.

मिली प्रेरणा

इस क्षेत्र में आने की वजह के बारे में पूछने पर नसीम बताती हैं कि मेरी जर्नी मेरी मां से शुरू हुई. मैं ने मां की संघर्ष को देखा था, जिस में वे किसी भी कठिन परिस्थिति में भी डट कर खड़ी रहती थीं. उन से भी मैं बहुत प्रेरित थी, जिस में एक स्त्री को कुछ भी करने के लिए काफी चुनौतियां होती हैं.

शोलापुर में रहते हुए मैं ने देखा है कि कई सारी स्त्रियां, जिन के पति कमाते नहीं, नशे के शिकार हैं या अचानक मृत्यु हो चुकी है, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ जाती है. ऐसी महिलाएं बड़ी मुश्किल से अपना जीवन गुजारती हैं क्योंकि उन के पास कोई रिसोर्स नहीं है, सामाजिक चुनौतियां हैं, साथ ही पढ़ीलिखी भी नहीं हैं. ये सारी बातें मेरे दिमाग में बहुत कम उम्र से घूमती रहती थीं और इस का समाधान खोजती रहती थी.

ऐसे ही मेरे अंदर इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा जागी. इस के अलावा मेरी दादी भी स्ट्रौंग महिला थी और दूसरों की हमेशा सहायता करती थीं, ये सभी बातों ने मुझे इस क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित किया. साथ ही मेरे पिता न होने की वजह से बहुत कम उम्र से मैं ने जौब कर पढ़ाई पूरी की है क्योंकि मैं मां की तरह नहीं थी, पढ़ीलिखी लङकी बनना चाहती थी. वित्तीय अवस्था अच्छी न होने की वजह से मैं ने एक अस्पताल में पार्टटाइम काम करते हुए इंग्लिश में ग्रैजुएशन और पोस्ट ग्रैजुएट की शिक्षा पूरी की है.

लिया सही ट्रैनिंग 

नसीम आगे कहती हैं कि अस्पताल में काम करते हुए एक इमरजैंसी हुई और काफी सारे मरीज वहां आए और मैं सब की सहायता कर रही थी, तभी वहां के एक स्टाफ ने मुझे अस्पताल में काम करने के लिए सोशल वर्क में मास्टर का कोर्स करने की सलाह दी. फिर मैं ने शोलापुर में मास्टर औफ सोशल वर्क में पढ़ाई की और अस्पताल की जौब भी करती रही. उसी वक्त लातूर में भूकंप आया. मैं वहां वालंटियर के रूप में कालेज से काम करने गई और एक से डेढ़ साल तक काम करती रही. उसी दौरान मेरा कोर्स भी पूरा हो गया. मैं ने कई जगहों पर अप्लाई किया, लेकिन इंटरव्यू का इनवाइट मुझे देर से मिला और नौकरी नहीं मिली, लेकिन वहां के एक कर्मचारी ने मुझे स्वयं शिक्षण प्रयोग (एसएसपी) उस्मानाबाद जाने की सलाह दी और मुझे वहां काम मिल गया.

साल 1996 से मैं इस संस्था के साथ काम कर रही हूं. मैं ने अपनी मां के साथ 12 साल की उम्र से काम शुरू किया है और मैं मां की समस्या को समझती थी क्योंकि मेरे पिता घर पर नहीं रहते थे. मां ने ही हमारी परवरिश की है. इस के कुछ सालों बाद पिता का देहांत भी हो गया था. मैं ने मां की मानसिक व शारीरिक हर परिस्थिति को नजदीक से देखा है.

स्त्री का रूपांतरण जरूरी

नसीम कहती हैं कि काम करते हुए मैं ने महसूस किया है कि एक स्त्री को ट्रांसफौर्मेशन की काफी जरूरत है, जिस में काम करने की आजादी, उच्च शिक्षा, परिवार का सहयोग आदि सब चीजों की जरूरत है. अभी प्राइमरी शिक्षा सभी को मिल रही है, लेकिन आज के बदलते परिवेश में उच्च शिक्षा की जरूरत भी हर लड़की के लिए है क्योंकि एक लड़की के ट्रांसफौर्म होने से वह पूरे परिवार को बदल सकती है. उसी कौंसेप्ट के साथ मैं आगे बढ़ती रही, जिस में मैं तब तक उस स्त्री के साथ काम करती रहूंगी, जब तक उस का ट्रांसफौर्म न हो जाए.

चुनौतियां

साल 1996-1997 में जब मैं ने काम शुरू किया था, तो एक स्त्री को मुझ से बात करने के लिए अपने पति, भाई या पिता की सलाह लेनी पड़ती थी. घर के अंदर जाने पर परिवार का पुरुष सदस्य सामने बैठा रहता था कि मैं उस से बात क्या कर रही हूं. अभी परिवर्तन उन जगहों पर काफी हुए हैं, लेकिन आज भी परभणी जैसे गांव में किसी स्त्री से बात करना मुश्किल होता है. मैं ने पिछले साल इस क्षेत्र में काम करना शुरू किया है.

एक बार जब मैं एक स्त्री से बात करना चाही, तो उस के दादाजी सामने बैठे हुए थे. मैं ने उन्हें बाहर जाने के लिए कहा, क्योंकि मैं मासिकधर्म के बारें में उस स्त्री से बात करने वाली थी. ऐसा कई बार होता है, जब उस महिला के दादा, चाचा या पति को बाहर भेजना पड़ता है क्योंकि यहां की स्त्रियां किसी पुरुष के सामने खुल कर बात नहीं कर सकतीं. एक स्त्री के ऊपर लगातार सामाजिक दबाव रहता है, जो उन के मानसिक विकास को क्षति पहुंचाती है.

पुरुषों का रहता है दबदबा

नसीम आगे कहती हैं कि महाराष्ट्र के उस्मानाबाद में साल 1996–1997 में मैं ने जब काम शुरू किया था, तो वहां की स्थिति को फेस करना मेरे लिए बहुत चुनौती रही, क्योंकि वहां के पुरुष चाहते ही नहीं थे कि एक स्त्री घर से निकले, काम करे, उस के हाथ में पैसा हो आदि. इस से आज भी वे डरते हैं क्योंकि महिला के आत्मनिर्भर होने पर उन का दबदबा कम हो सकता है.

इस के अलावा साल 2012 के सूखे के बाद जब मैं ने एक किसान स्त्री को कैमिकलफ्री खेती का काम करने के लिए थोड़ी प्रशिक्षण को जरूरी समझा और उन्हें घर के पास ही इसे करने की सलाह दी, तो घर वाले ने सीधे तौर पर मना कर दिया. उन्होंने कह दिया कि आप कुछ भी सीखकर यहां आ कर अप्लाई नहीं कर सकतीं. फिर मैं ने दूसरी जगह पर जा कर उन्हें प्रशिक्षित किया और जब पुरुषों को इस की गुणवत्ता के बारे में पता चला, तो उन्होंने उसे बाद में स्वीकार किया.

भूमि को ऐक्सेस करना और भूमि की मालिकाना हक अभी भी इन जगहों पर सोशल ट्रांसफौर्मेशन की दिशा में एक बड़ी समस्या है. किसी भी स्त्री की प्रोडक्टिव एसेट पर ओनरशिप बहुत कम है. नई जैनरेशन इसे सुधारने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह तब तक संभव नहीं होगा, जब तक घर के पुरुष यह न समझ लें कि कोई भी लड़की जो भी काम करती है, उस का फायदा उस के पूरे परिवार को ही मिलेगा.

कृषि के क्षेत्र में काम करते हुए मैं ने पाया कि इस में एक अनुपात होता है, मसलन 10 हजार महिलाओं के साथ काम किया और पाया कि 10 से 12 फीसदी स्त्रियों के पास भी भूमि का मालिकाना हक नहीं था, लेकिन अभी 2 लाख किसान महिलाएं मेरे साथ हैं और इस की अनुपात बढ़ कर 49% लैंड ओनरशिप उन्हें मिल चुका है. एक बदलाव धीरेधीरे अब समाज और परिवार में हो रहा है.

पति और परिवार वालों ने दिया सहयोग 

मुसलिम परिवार की नसीम के परिवार में उन की मां के अलावा उन का ससुराल भी एक ग्रामीण परिवार से है, जहां उन के पति गांव के ही एक स्कूल के टीचर हैं. शादी तय होने से पहले नसीम ने परिवार वालों को कह दिया था कि उन्हें वही परिवार शादी के लिए मंजूर होगी, जो उन्हें शादी के बाद भी काम करने की पूरी आजादी दें. वे कहती हैं कि मेरा काम घूमनेफिरने और लोगों के पास जाने का होता है, जिस में समय सीमा तय नहीं की जा सकती क्योंकि मुझे जरूरतमंदों के पास किसी भी समय जाना पड़ता है. मैं अपनी लाइफ में शादी के बाद कोई बदलाव नहीं चाहती और यह संभव नहीं हुआ, तो मुझे शादी करनी ही नहीं है, लेकिन मेरे ससुराल वालों ने मेरी पूरी शर्तें मान लीं और मेरी शादी हुई और मैं एक बेटे की मां भी बनी.

मेरा बेटा जब छोटा था तो मेरे पति बाबासाहेब शेख और सासससुर ने मुझे पूरा सहयोग दिया है.

जलवायु परिवर्तन पर असर

नसीम का कहना है कि स्त्रियों की समस्याओं के साथसाथ क्लाइमेट पर बहुत सारा काम करती हैं क्योंकि जलवायु का असर एक नारी के जीवन पर बहुत गहरा होता है. जब सूखा पड़ता है या बाढ़ आती है, तो परिवार को खाना नहीं मिलता, डोमैस्टिक वायलेंस बढ़ती है. इस प्रकार हर चीज की कमी का असर एक महिला के जीवन पर पड़ता है. इसलिए पर्यावरण को बैलेंस करते हुए एक परिवार को कैसे आगे बढ़ाया जाए और महिला सशक्तिकरण पर ध्यान दिया जाए आदि पर काम कर रही हूं, ताकि जीवन तनावमुक्त हो. इस काम में वित्तीय जरूरतें पूरी हो जाती हैं क्योंकि ये सारे काम एक स्त्री के जीवन को सुधारने के लिए ही होता है, जिस में ट्रैनिंग की खास भूमिका होती है और इसे आगे लाने के लिए सरकार, प्राइवेट सैक्टर्स, डोनर्स आदि की भूमिका बड़ी होती है. सब को साथ आ कर एकजैसा सोचना पड़ेगा.

अभी जीवन एक बड़ी चुनौती है, आपदा कब क्या हो समझना मुश्किल होता है, लेकिन इस का असर सब से पहले परिवार में एक स्त्री पर पड़ता है क्योंकि हर परिस्थिति में उसे ही अपने परिवार को संभालना पड़ता है.

Naseem Shaikh

Love Story in Hindi: घोंसले के पंछी: क्या मिल पाए आदित्य और ऋचा

Love Story in Hindi:आदित्य गुमसुम से खड़े थे. पत्नी की बात पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ. वे शब्दों पर जोर देते हुए बोले, ‘‘क्या तुम सच कह रही हो ऋचा?’’

‘‘पहले मुझे विश्वास नहीं था लेकिन मैं एक नारी हूं, जिस उम्र से अंकिता गुजर रही है उस उम्र से मैं भी गुजर चुकी हूं. उस के रंगढंग देख कर मैं समझ गई हूं कि दाल में कुछ काला है.’’

आदित्य की आंखों में एक सवाल था, ‘वह कैसे?’

ऋचा उन की आंखों की भाषा समझ गई. बोली, ‘‘सुबह घर से जल्दी निकलती है, शाम को देर से घर आती है. पूछने पर बताया कि टाइपिंग क्लास जौइन कर ली है. इस की उसे जरूरत नहीं है. उस ने इस बारे में हम से पूछा भी नहीं था. घर में भी अकेले रहना पसंद करती है, गुमसुम सी रहती है. जब देखो, अपना मोबाइल लिए कमरे में बंद रहती है.’’

‘‘उस से बात की?’’

‘‘अभी नहीं, पहले आप को बताना उचित समझा. लड़की का मामला है. जल्दबाजी में मामला बिगड़ सकता है. एक लड़का हम खो चुके हैं, अब लड़की को खो देने का मतलब है पूरे संसार को खो देना.’’

आदित्य विचारों के समुद्र में गोता लगाने लगे. यह कैसी हवा चली है. बच्चे अपने मांबाप के साए से दूर होते जा रहे हैं. वयस्क होते ही प्यार की डगर पर चल पड़ते हैं, फिर मांबाप की मरजी के बगैर शादी कर लेते हैं. जैसे चिडि़या का बच्चा पंख निकलते ही अपने जन्मदाता से दूर चला जाता है, अपने घोंसले में कभी लौट कर नहीं आता, उसी प्रकार आज की पीढ़ी के लड़के तथा लड़कियां युवा होने से पहले ही प्यार के संसार में डूब जाते हैं. अपनी मरजी से शादी करते हैं और अपना घर बसा कर मांबाप से दूर चले जाते हैं.

आदित्य और ऋचा के एकलौते पुत्र ने भी यही किया था. आज वे दोनों अपने बेटे से दूर थे और बेटा उन की खोजखबर नहीं लेता था. इस में गलती किस की थी? आदित्य की, उन की पत्नी की या उन के बेटे की कहना मुश्किल था.

आदित्य ने पहले ध्यान नहीं दिया था, इस के बारे में सोचा तक नहीं था परंतु आज जब उन की एकलौती बेटी भी किसी के प्यार में रंग चुकी है, किसी के सपनों में खोई है, तो वे विगत और आगत का विश्लेषण करने पर विवश हैं.

प्रतीक एम.बी.ए. कर चुका था. बेंगलूरु की एक बड़ी कंपनी में मैनेजर था. एम.बी.ए. करते समय ही उस का एक लड़की से प्रेम हुआ था. तब तक उस ने घर में बताया नहीं था. नौकरी मिलते ही मांबाप को अपने प्रेम से अवगत कराया. आदित्य और ऋचा को अच्छा नहीं लगा. वह उन का एकलौता बेटा था. उन के अपने सपने थे. हालांकि वे आधुनिक थे, नए जमाने के चलन से भी वाकिफ थे परंतु भारतीय मानसिकता बड़ी जटिल होती है.

हम पढ़लिख कर आधुनिक बनने का ढोंग करते हैं, नए जमाने की हर चीज अपना लेते हैं, परंतु हमारी मानसिकता कभी नहीं बदलती. हमारे बच्चे किसी के प्रेम में पड़ें, वे प्रेमविवाह करना चाहें, हम इसे बरदाश्त नहीं कर पाते. अपनी जवानी में हम भी वही करते हैं या करना चाहते हैं परंतु हमारे बच्चे जब वही सब करने लगते हैं, तो सहन नहीं कर पाते हैं. उस का विरोध करते हैं.

प्रतीक उन का एकलौता बेटा था. वे धूमधाम से उस की शादी करना चाहते थे. वे उसे कामधेनु गाय समझते थे. उस की शादी में अच्छा दहेज मिलता. इसी उम्मीद में अपने एक रिश्तेदार से उस की शादी की बात भी कर रखी थी. मामला एक तरह से पक्का था. मांबाप यहीं पर गलती कर जाते हैं. अपने जवान बच्चों के बारे में अपनी मरजी से निर्णय ले लेते हैं. उन को इस से अवगत नहीं कराते. बच्चों की भावनाओं का उन्हें खयाल नहीं रहता. वे अपने बच्चों को एक जड़ वस्तु समझते हैं, जो बिना चूंचपड़ किए उन की हर बात मान लेंगे. परंतु जब बच्चे समझदार हो जाते हैं तब वे अपने जीवन के बारे में वे खुद निर्णय लेना पसंद करते हैं. वे अपना जीवन अपने तौर पर जीना चाहते हैं.

जब प्रतीक ने अपने प्यार के बारे में उन्हें बताया तो उन के कान खड़े हुए. चौंकना लाजिमी था. बेटे पर वे अपना अधिकार समझते थे. आदित्य और ऋचा ने पहले एकदूसरे की तरफ देखा, फिर प्रतीक की तरफ. वह एक हफ्ते की छुट्टी ले कर आया था. मांबाप से अपनी शादी के बारे में बात करने के लिए. प्रेम उस ने अवश्य किया था परंतु वह उन की सहमति से शादी करना चाहता था. अगर वे मान जाते तो ठीक था, अगर नहीं तब भी उस ने तय कर रखा था कि अपनी पसंद की लड़की से ही शादी करेगा. जिस को प्यार किया था, उसे धोखा नहीं देगा. मांबाप माने या न मानें.

ऋचा ने ही बात का सिरा पकड़ा था, ‘‘परंतु बेटे, हम ने तो तुम्हारी शादी के बारे में कुछ और ही सोच रखा है.’’

‘‘अब वह बेकार है. मैं ने अपनी पसंद की लड़की देख ली है. वह मेरे अनुरूप है.

हम दोनों ने एकसाथ एम.बी.ए. किया था. अब साथ ही नौकरी भी कर रहे हैं, साथ ही जीवन व्यतीत करेंगे.’’

‘‘परंतु हमारे सपने…’’ ऋचा ने प्रतिवाद करने की कोशिश की परंतु प्रतीक की दृढ़ता के सामने वह कमजोर पड़ गईं. ऋचा की आवाज में कोई दम नहीं था. उसे लगा, वह हार जाएगी.

‘‘मम्मी, आप समझने की कोशिश कीजिए. बच्चे ही मांबाप का सपना होते हैं. अगर मैं खुश हूं तो आप के सपने साकार हो जाएंगे, वरना सब बेकार है.’’

‘‘बेकार तो वैसे भी सब कुछ हो चुका है. मैं बंसलजी को क्या मुंह दिखाऊंगा?’’ आदित्य ने पहली बार मुंह खोला, ‘‘उन के साथसाथ सारे नातेरिश्तेदार हैं. वे भी अलगथलग पड़ जाएंगे.’’

‘‘कोई किसी से अलग नहीं होता. आप धूमधाम से शादी आयोजित करें. रिश्तेदार 2 दिन बातें बनाएंगे, फिर भूल जाएंगे. प्रेमविवाह अब असामान्य नहीं रहे,’’ प्रतीक ने बहुत धैर्य से अपनी बात कही.

‘‘बेटे, तुम नहीं समझोगे. हम वैश्य हैं और हमारे समाज ने इस मामले में आधुनिकता की चादर नहीं ओढ़ी है. कितने लोग तुम्हारे लिए भागदौड़ कर रहे हैं. अपनी बेटी का विवाह तुम्हारे साथ करना चाहते हैं. जिस दिन पता चलेगा कि तुम ने गैर जाति की लड़की से शादी कर ली है, वे हमें समाज से बहिष्कृत कर देंगे. तुम्हारी छोटी बहन की शादी में तमाम अड़चनें आएंगी.’’

‘‘उस का भी प्रेमविवाह कर देना,’’ प्रतीक ने सहजता से कह दिया. परंतु आदित्य और ऋचा के लिए यह सब इतना सहज नहीं था.

‘‘बेटे, एक बार तुम अपने निर्णय पर पुनर्विचार करो. शायद तुम्हारा निश्चय डगमगा जाए. हम उस से सुंदर लड़की तुम्हारे लिए ढूंढ़ कर लाएंगे.’’

ये भी पढ़ें- बेईमानी का नतीजा: क्या हुआ बाप और बेटे के साथप्रतीक हंसा, ‘‘मम्मी, यह मेरा आज का फैसला नहीं है. पिछले 3 सालों से हम दोनों का यही फैसला है. अब यह बदलने वाला नहीं. आप अपने बारे में बताएं. आप हमारी शादी करवाएंगे या हम स्वयं कर लें.’’

किसी ने प्रतीक की बात का जवाब नहीं दिया. वे अचंभित, भौचक और ठगे से बैठे थे. वे सभ्य समाज के लोग थे. लड़ाईझगड़ा कर नहीं सकते थे. बातों के माध्यम से मामले को सुलझाने की कोशिश की परंतु वे दोनों न तो प्रतीक को मना पाए, न प्रतीक के निर्णय से सहमत हो पाए. प्रतीक अगले दिन बेंगलूरु चला गया. बाद में पता चला, उस ने न्यायालय के माध्यम से अपनी प्रेमिका से शादी कर ली थी.

वे दोनों जानते थे कि प्रतीक ने भले अपनी मरजी से शादी की थी. परंतु वह उन के मन से दूर नहीं हुआ था. बस उन का अपना हठ था. उस हठ के चलते अभी तक बेटे से संपर्क नहीं किया था. बेटे ने पहले एकदो बार फोन किया था. आदित्य और ऋचा ने उस से बात की थी, हालचाल भी पूछा परंतु उस को दिल्ली आने के लिए कभी नहीं कहा. फिर बेटे ने उन को फोन करना बंद कर दिया.

अब शायद वह हठ टूटने वाला था. अंकिता के साथ वह पहले वाली गलती नहीं दोहराना चाहते थे.

आदित्य ने शांत भाव से कहा, ‘‘ऋचा, हमें बहुत समझदारी से काम लेना होगा. लड़की का मामला है. प्रेम के मामले में लड़कियां बहुत नासमझी और भावुकता से काम लेती हैं. अगर उन्हें लगता है कि मांबाप उन के प्रेम का विरोध कर रहे हैं, तो बहुत गलत कदम उठा लेती हैं. या तो वे घर से भाग जाती हैं या आत्महत्या कर लेती हैं. हमें ध्यान रखना है कि अंकिता ऐसा कोई कदम न उठा ले.’’

ऋचा बेचैन हो गई, ‘‘क्या करें हम?’’

‘‘कुछ करने की आवश्यकता नहीं है, बस उस से बात करो. उस की सारी बातें ध्यान से सुनो. उस के मन को समझने का प्रयास करो. शायद हम उस की मदद कर सकें. अगर वह समझ गई तो बहकने से बच जाएगी. उस के पैर गलत रास्ते पर नहीं पड़ेंगे. ये रास्ते बहुत चिकने होते हैं. फिसलने में देर नहीं लगती.’’

‘‘ठीक है,’’ ऋचा ने आश्वस्त हो कर कहा.

ऋचा ने देर नहीं की. जल्दी ही मौका निकाला. अंकिता से बात की. वह अपने कमरे में थी. ऋचा ने कमरे में घुसते ही पूछा, ‘‘बेटा, क्या कर रही हो?’’

अंकिता हड़बड़ा कर खड़ी हो गई. वह बिस्तर पर लेटी मोबाइल पर किसी से बातें कर रही थी. अंकिता के चेहरे के भाव बता रहे थे, जैसे वह चोरी करते हुए पकड़ी गई थी. ऋचा सब समझ गई, परंतु उस ने धैर्य से कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?’’

अंकिता बी.ए. के दूसरे साल में थी.

‘‘ठीकठाक चल रही है,’’ अंकिता ने अपने को संभालते हुए कहा. उस की आंखें फर्श की तरफ थीं.

वह मां की तरफ देखने का साहस नहीं जुटा पा रही थी.

अंकिता जिन मनोभावों से गुजर रही थी, ऋचा समझ सकती थी. उस ने बेटी को पलंग पर बैठाते हुए कहा, ‘‘बैठो और मेरी बात ध्यान से सुनो.’’

वह भी बेटी के साथ पलंग पर एक किनारे बैठ गई. उसे लग रहा था किसी लागलपेट की जरूरत नहीं, मुझे सीधे मुद्दे पर आना होगा.

अंकिता का हृदय तेजी से धड़क रहा था. पता नहीं क्या होने वाला था? मम्मी क्या कहेंगी उस से? उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था परंतु उस के मन में अपराधबोध था. मम्मी ने उसे फोन करते हुए देख लिया था.

ऋचा ने सीधे वार किया, ‘‘बेटी, मैं तुम्हारी मनोदशा समझ रही हूं. मैं तुम्हारी मां हूं. इस उम्र में सब को प्रेम होता है,’’ प्रेम शब्द पर ऋचा ने अधिक जोर दिया, ‘‘तुम्हारे साथ कुछ नया नहीं हो रहा है. परंतु बेटी, इस उम्र में लड़कियां अकसर बहक जाती हैं. लड़के उन को बरगला कर, झूठे सपनों की दुनिया में ले जा कर उन की इज्जत से खिलवाड़ करते हैं. बाद में लड़कियों के पास बदनामी के सिवा कुछ नहीं बचता. वे बदनामी का दाग ले कर जीती हैं और मन ही मन घुलती रहती हैं.’’

अंकिता का दिल और जोर से धड़क उठा.

‘‘बेटी, अगर तुम्हारे साथ ऐसा कुछ हो रहा है, तो हमें बताओ. हम नहीं चाहते तुम्हारे कदम गलत रास्ते पर पड़ें. तुम नासमझी में कुछ ऐसा न कर बैठो, जो तुम्हारी बदनामी का सबब बने. अभी तुम्हारी पढ़ाई की उम्र है लेकिन यदि तुम्हारे साथ प्रेम जैसा कोई चक्कर है, तो हम शादी के बारे में भी सोच सकते हैं. तुम खुल कर बताओ, क्या वह लड़का तुम्हारे साथ शादी करना चाहता है? वह तुम को ले कर गंभीर है या बस खिलवाड़ करना चाहता है.’’

अंकिता सोचने लगी पर उस के मन में दुविधा और शंका के बादल मंडरा रहे थे.

बताए या न बताए. मम्मी उस के मन की बात जान गई हैं. कहां तक छिपाएगी? नहीं बताएगी तो उस पर प्रतिबंध लगेंगे. उस ने आगे आने वाली मुसीबतों के बारे में सोचा. उसे लगा कि मां जब इतने प्यार और सहानुभूति से पूछ रही हैं, तो उन को सब कुछ बता देना ही उचित होगा.

अंकिता खुल गई और धीरेधीरे उस ने मम्मी को सारी बातें बता दीं. गनीमत थी कि अभी तक अंकिता ने अपना कौमार्य बचा कर रखा था. लड़के ने कोशिश बहुत की थी, परंतु वह उस के साथ होटल जाने को तैयार नहीं हुई. डर गई थी, इसलिए बच गई. मम्मी ने इतमीनान की गहरी सांस ली और बेटी को सांत्वना दी कि वह सब कुछ ठीक कर देंगी. अगर लड़का तथा उस के घर वाले राजी हुए तो इसी साल उस की शादी कर देंगे.

अंकिता ने बताया था कि वह अपने साथ पढ़ने वाले एक लड़के के साथ प्यार करती है. उस के घरपरिवार के बारे में वह बहुत कम जानती है. वे दोनों बस प्यार के सुनहरे सपने देख रहे हैं. बिना पंखों के हवा में उड़ रहे थे. भविष्य के बारे में अनजान थे. प्रेम की परिणति क्या होगी, इस के बारे में सोचा तक नहीं था. वे बस एकदूसरे के प्रति आसक्त थे. यह शारीरिक आकर्षण था, जिस के कारण लड़कियां अवांछित विपदाओं का शिकार होती हैं.

ऋचा ने आदित्य को सब कुछ बताया. मामला सचमुच गंभीर था. अंकिता अभी नासमझ थी. उस के विचारों में परिपक्वता नहीं थी. उस की उम्र अभी 20 साल थी. वह लड़का भी इतनी ही उम्र का होगा. दोनों का कोई भविष्य नहीं था. वे दोनों बरबादी की तरफ बढ़ रहे थे. उन्हें संभालना होगा.

स्थिति गंभीर थी. ऋचा और आदित्य का चिंतित होना स्वाभाविक था. परंतु ऋचा और आदित्य को कुछ नहीं करना पड़ा. मामला अपनेआप सुलझ गया. संयोग उन का साथ दे रहा था. समय रहते अंकिता को अक्ल आ गई थी. उस की मम्मी की बातों का उस पर ठीक असर हुआ था.

ये भी पढ़ें- सनक: नृपेंद्रनाथ को हुआ गलती का एहसासअंकिता ने जब शिवम को बताया कि उस की मम्मी को उस के प्रेम के बारे में सब पता चल गया है तो वह घबरा गया.

‘‘इस में घबराने की क्या बात है? मम्मी ने तुम्हारे डैडी का फोन नंबर व पता मांगा है. वह तुम्हारे घर वालों से हमारी शादी की बात करना चाहती हैं.’’

‘‘अरे मर गए, क्या तुम्हारे पापा को भी पता है?’’ उस के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं.

‘‘जरूर पता होगा. मम्मी ने बताया होगा उन को. परंतु तुम इतना परेशान क्यों हो रहे हो? हम एकदूसरे से प्रेम करते हैं, शादी करने में क्या हरज है? कभी न कभी करते ही, कल के बजाय आज सही,’’ अंकिता बहुत धैर्य से यह सब कह रही थी.

‘‘अरे, तुम नहीं समझतीं. यह कोई शादी की उम्र है. मेरे डैडी जूतों से मेरी खोपड़ी गंजी कर देंगे. शादी तो दूर की बात है,’’ वह हाथ मलते हुए बोला.

‘‘अच्छा,’’ अंकिता की अक्ल ठिकाने आ रही थी. वह समझने का प्रयास कर रही थी. बोली, ‘‘तुम मुझ से प्रेम कर सकते हो तो शादी क्यों नहीं. प्रेम मांबाप से पूछ कर तो किया नहीं था. अगर वे हमारी शादी के लिए तैयार नहीं होते, तो शादी भी उन से बिना पूछे कर लो. आखिर हम बालिग हैं.’’

‘‘क्या बकवास कर रही हो, शादी कैसे कर सकते हैं?’’ वह झल्ला कर बोला, ‘‘अभी तो हम पढ़ रहे हैं. मांबाप से पूछे बगैर हम इतना बड़ा कदम कैसे उठा सकते हैं?’’

‘‘अच्छा, मांबाप से पूछे बगैर तुम जवान कुंआरी लड़की को बरगला सकते हो. उस को झूठे प्रेमजाल में फंसा सकते हो. शादी का झांसा दे कर उस की इज्जत लूट सकते हो. यह सब करने के लिए तुम बालिग हो परंतु शादी करने के लिए नहीं,’’ वह रोंआसी हो गई.

उसे मम्मी की बातें याद आ गईं. सच कहा था उन्होंने कि इस उम्र में लड़कियां अकसर बहक जाती हैं. लड़के उन को बरगला कर, झूठे सपनों की दुनिया में ले जा कर उन की इज्जत से खिलवाड़ करते हैं. शिवम भी तो उस के साथ यही कर रहा था. समय रहते उस की मम्मी ने उसे सचेत कर दिया था. वह बच गई. अगर थोड़ी देर होती तो एक न एक दिन शिवम उस की इज्जत जरूर लूट लेता. कहां तक अपने को बचाती. वह तो उस के लिए पागल थी.

शिवम इधरउधर ताक रहा था. अंकिता ने एक प्रयास और किया, ‘‘तुम अपने घर का पता और फोन नंबर दो. तुम्हारे मम्मीडैडी से पूछ तो लें कि वे इस रिश्ते के लिए राजी हैं या नहीं.’’

‘‘क्या शादीशादी की रट लगा रखी है,’’ वह दांत पीस कर बोला, ‘‘हम कालेज में पढ़ने के लिए आए हैं, शादी करने के लिए नहीं.’’

‘‘नहीं, प्यार करने के लिए…’’ अंकिता ने उस की नकल की. वह भी दांत पीस कर बोली, ‘‘तो चलो, नाचेगाएं और खुशियां मनाएं,’’ अब उस की आवाज में तल्खी आ गई थी, ‘‘कमीने कहीं के, तुम्हारे जैसे लड़कों की वजह से ही न जाने कितनी लड़कियां अपनी इज्जत बरबाद करती हैं. मैं ही

बेवकूफ थी, जो तुम्हारे फंदे में फंस गई. थू है तुम पर.. भाड़ में जाओ. सब कुछ खत्म हो गया. अब कभी मेरे सामने मत पड़ना. गैरत हो तो अपना काला मुंह ले कर मेरे सामने से चले जाओ.’’

उस दिन शाम को अंकिता जल्दी घर पहुंच गई. बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ था. ऋचा और आदित्य ने भेदभरी नजरों से एकदूसरे की तरफ देखा. अंकिता चुपचाप अपने कमरे में चली गई थी. आदित्य ने ऋचा को इशारा किया. वह पीछेपीछे अंकिता के कमरे में पहुंची. आदित्य भी बाहर आ कर खड़े हो गए थे.

‘‘आज बहुत जल्दी आ गईं बेटी,’’ ऋचा अंकिता से पूछ रही थी.

‘‘हां मम्मी, आज मैं अपने मन का बोझ उतार कर आई हूं. बहुत हलका महसूस कर रही हूं,’’ फिर उस ने एकएक बात मम्मी को बता दी.

मम्मी ने उसे गले से लगा लिया. उसे पुचकारते हुए बोलीं, ‘‘बेटी, मुझे तुम पर गर्व है. तुम्हारी जैसी बेटी हर मांबाप को मिले.’’

‘‘मम्मी यह सब आप की समझदारी की वजह से हुआ है. समय रहते आप ने

मुझे संभाल लिया. मैं आप की बात समझ गई और पतन के गर्त में जाने से बच गई. आप थोड़ा सी देर और करतीं तो मेरी बरबादी हो चुकी होती. मैं आप से वादा करती हूं कि मन लगा कर पढ़ाई करूंगी. आप की नसीहत और मार्गदर्शन से एक अच्छी बेटी बन कर दिखाऊंगी.’’

‘‘हां बेटी, तुम्हारे सिवा हमारा और कौन है? तुम चली जातीं तो हमारे जीवन में क्या बचता?’’

‘‘मम्मी, ऐसा क्यों कह रही हैं? मैं आप के साथ हूं और भैयाभाभी भी तो हैं.’’

ऋचा ने अफसोस से कहा, ‘‘वे अब हमारे कहां रहे? हम ने एकदूसरे को नहीं समझा और वे हम से दूर हो गए.’’

‘‘ऐसा नहीं है मम्मी, वे पहले भी हमारे थे और आज भी हमारे हैं.’’

‘‘ये क्या कह रही हो तुम?’’

‘‘मम्मी, मैं आप को राज की बात बताती हूं. भैया और भाभी से मैं रोज बात करती हूं. भाभी खुद फोन करती हैं. मैं ने उन्हें देखा नहीं है परंतु वे बातें बहुत प्यारी करती हैं. वे हम सब को देखना चाहती हैं. भैया तो एक दिन भी बिना मुझ से बात किए नहीं रह सकते. वे और भाभी यहां आना चाहते हैं लेकिन डैडी से डरते हैं, इसीलिए नहीं आते. मम्मी, आप एक बार…सिर्फ एक बार उन से कह दो कि आप ने उन्हें माफ किया, वे दौड़ते हुए आएंगे.’’

‘‘सच…’’ ऋचा ने उसे अपने सीने से लगा लिया, ‘‘बेटी, आज तू ने मुझे दोगुनी खुशी दी है,’’ वह खुशी से विह्वल हुई जा रही थी.

‘‘हां, मम्मी, आप उन्हें फोन तो करो,’’ अंकिता चहक रही थी, ‘‘मैं भाभी से मिलना चाहती हूं.’’

‘‘अभी करती हूं. पहले उन को बता दूं. सुन कर वे भी खुशी से पागल हो जाएंगे. हम लोगों ने न जाने कितनी बार उन को बुलाने के बारे में सोचा. बस हठधर्मिता में पड़े रहे. बेटे के सामने झुकना नहीं चाहते थे परंतु आज हम बेटे के लिए और उस की खुशी के लिए छोटे बन जाएंगे. उसे फोन करेंगे.’’

वह बाहर जाने के लिए मुड़ी. कमरे के बाहर खड़े आदित्य अपनी आंखों से आंसू पोंछ रहे थे. आज उन्हें खोई हुई खुशी मिल रही थी. बेटी भी वापस अंधेरी गलियों में भटकने से बच गई थी. वह सहीसलामत घर लौट आई थी. बेटा भी मिल गया था. आज उन की हठधर्मिता टूट गई थी. उन्हें अपनी गलती का एहसास हो चुका था.

ऋचा ने आदित्य को बाहर खड़े देखा. वे समझ गईं कि अब कुछ कहने की जरूरत नहीं थी. वे सब सुन चुके थे. उन के पास जा कर भरे गले से बोली, ‘‘चलिए, बेटे को फोन कर दें और बहू के स्वागत की तैयारी

करें. आज हमें दोगुनी खुशी मिल रही है.

ऐसा लग रहा है, जैसे घोंसले के पंछी वापस आ गए हैं. अब हमारा आशियाना वीरान

नहीं रहेगा.’’

‘‘हां, ऋचा,’’ आदित्य ने उसे बांहों के घेरे में लेते हुए कहा, ‘‘घोंसले के पंछी घोंसले में ही रहते हैं, डाल पर नहीं. प्रतीक को वापस आना ही था. हमारी बगिया के फूल यों ही हंसतेमुसकराते रहें. उन की सुगंध चारों ओर फैले और वे अपनी महक से सब के जीवन को गुलजार कर दे.

Love Story in Hindi

China vs America: नारेबाजी से दुनिया नहीं चलती

China vs America: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खप्पीपनी टैरिफों के खिलाफ चीन ने इस साल अमेरिका से सोयाबीन और मक्का खरीदना बंद कर दिया है और लाखों टन सोयाबीन और मक्का अमेरिकी खेतों में सड़ रहा है. चीन पर टैरिफ उसी राष्ट्रपति ने लगाए जो इन खेतों के मालिकों के वोटों से जीत कर आया है. एक तरह से जैसी करनी वैसी भरनी की कहावत का मामला हुआ है जिस में गोरे, धर्मनिष्ठ किसान जो रिपब्लिकन पार्टी के अंधभक्त हैं बेसिरपैर की नीतियों के शिकार हो रहे हैं.

चीन 18.57 अरब डौलर के मक्का के अमेरिका से निर्यात में से 5.21 अरब डौलर का अकेला ग्राहक था. सोयाबीन की बिक्री 70-75% चीन को होती थी. जब से डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के मुकाबले मोरचे खोले हैं, चीन ने अमेरिका से खरीदारी कम या बंद कर दी है और अमेरिकी अनाज सड़ने लगा है. चीन सूअरों को खिलाने के लिए सोयाबीन खरीदता है और अब ब्राजील व दूसरे देशों से खरीद रहा है.

अमेरिका भारत के बाजार में अपना फालतू कृषि उत्पाद बेचना चाह रहा है पर इस से भारतीय बाजार एकदम लुढ़क जाएगा और इस से भारत का गरीब किसान और भूखा मरने लगेगा, इसलिए अमेरिका की जिद पर भारत अपना बाजार खोले मानने को तैयार नहीं है. चीन खरीदने को तैयार है पर अमेरिका से नहीं. अमेरिकी राष्ट्रपति और उन की लाल टोपी वाले मागा जब तक नया बाजार ढूंढ़ेंगे तब तक 2 फसलें निबट चुकेंगी और सैकड़ोंहजारों अमेरिकी किसान डोनाल्ड ट्रंप के नारों पर विश्वास करने की कीमत चुकाते रहेंगे.

मामला खेतों का हो या इंडस्ट्री का, कोई भी नया बाजार बनाना आसान नहीं होता. ग्राहक का पता करने और फिर उस की मनपसंद की चीज बनाने में समय लगता है जो अमेरिकी किसान खास तरह की किस्म का सोयाबीन या मक्का चीन के लिए उगा रहे थे उन्हें उसे दूसरे देशों में बेचने में काफी कठिनाई होगी. नए ग्राहक यह जान कर कि बेचने वाले की गर्ज है, दाम काफी कम देंगे. भारत के किसानों की तरह अमेरिकी किसानों की हालत पतली ही रहती है, चाहे उतनी बुरी नहीं जितनी यहां है पर वहां भी बिचौलिए और व्यापारी ज्यादा मुनाफा हड़प जाते हैं. ज्यादातर किसान अमेरिका में भी कर्ज में डूबे रहते हैं पर हैं पक्के धर्मनिष्ठ और इसीलिए नए धर्मगुरु पोप डोनाल्ड ट्रंप के वोटर हैं.

अब उन्हें अपने धर्म के कारण गहरा नुकसान होगा. इस से उन की निष्ठा डिगेगी ऐसा तो नहीं लगता पर यह जरूर है कि चट्टान जैसी भक्ति में दरारें पड़ने लगी हैं क्योंकि नारेबाजी से दुनिया नहीं चलती. डोनाल्ड ट्रंप के नारों से आम अमेरिकी वैसे ही खमियाजा भरेगा जैसे अफगानिस्तान, ईरान में लोग भर रहे हैं या हिटलर और स्टालिन के युग में यूरोपीयों ने भरा था.

China vs America

Monopoly खतरनाक हो सकती है

Monopoly: इंडिगो एअरलाइंस का दिसंबर के पहले सप्ताह में फियास्को एक डैंजर जोन की ओर इशारा कर रहा है कि हर तरह की मोनोपोली कितनी खतरनाक हो सकती है. इंडिगो ने कई हजार उड़ानें रद्द कर दी थीं और इन में से ज्यादा की सीटें आधे से ज्यादा बिक चुकी थीं यानी लोगों ने प्लान बना कर होटल, टैक्सियां बुक कर ली थीं, शादियों के हौल तैयार कर लिए थे, एक शहर के हवाईअड्डे से दूसरे शहर जाने के भी टिकट खरीद लिए जिन में कुछ इंडिगो के नहीं थे.

4-5 दिन में लोगों के कई हजार करोड़ रुपए बरबाद हो गए और ये लोग वे हैं जिन के पास पैसा, आवाज, हैसीयत है, मीडिया है, प्रभाव है. फिर भी एक कंपनी के आगे बेबस एअरपोर्टों पर धर्मशालाओं की तरह घंटों नहीं कितनी ही रातों तक बने रहना पड़ा.

बहुतों का सामान खो गया जो कुछ महीनों बाद इंडिगो कबाड़ी को बेच देगा. इस सामान में गहने भी होंगे, जरूरी कागजात भी होंगे, रोजमर्रा के कपड़े भी होंगे.

ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि यह मोनोपोली सरकार ने बनने नहीं दी बनवाई. मोदी सरकार ने जानबूझ कर बनने दिया. इंडिगो के बोर्ड में अमिताभ कांत जैसे नरेंद्र मोदी के चहेते पूर्व आईएएस अफसर भी हैं, उद्योगपति भी हैं जो नरेंद्र मोदी के गुणगान करते नहीं थकते. पर मजाल है कि नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की सेवा से कुछ घंटे निकाल कर जनता को दिए हों.

इस जनता में अधिकांश उस जमात के लोग हैं जो आंख मूंद कर सरकार का हर बात में समर्थन करते हैं, पूजापाठी हैं. राममंदिर जाना भी बहुतों के प्रोग्राम में था. कुछ रामेश्वरम जा रहे थे तो कुछ वैष्णो देवी या हरिद्वार या तिरुपति या नासिक. इंडिगो ने सब को गच्चा दे कर दिखा दिया कि देश को ठप्प करने के लिए 6 लोगों का बोर्ड काफी है, दूसरे देश की आर्मी का हमला जरूरी नहीं है. पर इंडिगो की देशभक्ति के बारे में कुछ नहीं कहा गया जबकि नारे भर लगाने वालों को माओवादी, कम्युनिस्ट, देशद्रोही, पाकिस्तानी कह कर बंद करना इस देश में आम है.

इंडिगो की तरह बहुत सी मोनोपोली बन गई हैं. एअरटेल और जियो की मोनोपोली से टैलीफोन बजना सैकंडों में बंद हो सकता है. गूगल करोड़ों जीमेल अकाउंटों को रोक कर पत्र भेजना भी बंद कर ही सकता है. पैसों का लेनदेन भी बंद कर सकता है. व्हाट्सऐप खुद को बंद कर के करोड़ों को अपनों से काट सकता है. जीपीएस बंद कर के होम डिलिवरी को खत्म कर सकता है.

कुछ लोगों के हाथों में अब अरबों लोगों की जिंदगी गिरवी हो गई है जिस में भारत सहित दुनिया के अधिकांश लोग शामिल हैं. इंडिगो ने तो सैंपल दिया है कि अगर उसे बांह मरोड़नी हो तो कैसे मिनटों में वह जनता के अरबों स्वाहा कर सकता है और मजबूत सरकार भी कुछ नहीं कर सकती.

पहले सेनाओं की जरूरत होती थी एक देश पर कब्जा करने के लिए, आज कुछ बोर्डरूमों में फैसला हो सकता है और बिना खूनखराबे के पूरा देश जेल में बदल सकता है. कोविड-19 में सरकार ने लौकडाउन कर के यह किया था, अब प्राइवेट कंपनी ने तेवर दिखा दिए हैं.

Monopoly

धर्म डराते क्यों हैं

Religion: दुनिया के कुछ इंस्टिट्यूशंस हैं जो आलतूफालतू की लिस्टें बनाते रहते हैं पर इन लिस्टों में ही जीवन की खुशियां और गम छिपे रहते हैं. यूएस न्यूज ऐंड वर्ल्ड रिपोर्ट ने दुनिया के 35 सब से ज्यादा फ्रैंडली देशों की सूची बनाई और जैसा आप अनुमान लगा सकते हैं इस में ज्यादातर देश यूरोप के हैं.

पैसे वाले आमतौर पर फ्रैंडली हो जाते हैं क्योंकि उन्हें दूसरों से डर नहीं लगता. वे भी ज्यादा फ्रैंडली होते हैं, जिन्हें यह बचपन से नहीं सिखाया जाता कि दूसरे रंग, बोली, कपड़ों, बड़ेछोटे मकान वालों से डरने की जरूरत होती है. धर्म सब से ज्यादा डराते हैं क्योंकि हर धर्म यही सिखाता है कि जो अपने धर्म का नहीं है, वह दुश्मन है.

हिंदू धर्म तो अब सब से ज्यादा कट्टर हो गया है. जब से धर्म का इस्तेमाल सत्ता पाने के लिए किया जाने लगा है और अब सत्ता में बने रहने के लिए किया जा रहा है हर जना जो अपने धर्म का नहीं, डरने लायक है, दोस्ती के लायक नहीं है, यह सिखाया जा रहा है.

इस लिस्ट में सब से ऊपर कनाडा है और यह वही कनाडा है जहां सिख बड़ी संख्या में हैं, कनाडियों के साथ उठतेबैठते हैं और सरकार में मंत्री तक हैं. कनाडा सरकार का अपना धर्म नहीं है. अमेरिका एक जमाने में बड़ा फ्रैंडली देश था पर जब से वहां चर्च की एक शाखा मागा, जो नाम ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के पहले अक्षरों से बना है, को पावर मिली है, वहां गोरे चर्च जाने वाले अमेरिकी हर गैर गोरे को दुश्मन मानने लगे हैं.

स्पेन, न्यूजीलैंड, नीदरलैंड, पुर्तगाल, आस्टे्रलिया, इटली, नौर्वे तो लिस्ट में हैं ही पर 9वें नंबर पर थाईलैंड है जहां कभी भारतीयों की अच्छी पैठ थी. 22वें नंबर पर मलेशिया है, 24वें नंबर पर सिंगापुर है, 33वें नंबर पर एशिया का ही इंडोनेशिया है और 35वें नंबर पर वियतनाम है.

दुनिया का सब से अमीर देश अमेरिका 35में से नहीं, दूसरे नंबर का अमीर देश चीन भी नहीं है, सब से ज्यादा आबादी वाला भारत भी नहीं है. ये 3 बड़े विशाल देश बड़े होने के बावजूद फ्रैंडली नहीं हैं. अमेरिका तो इतना अनफ्रैंडली है कि वहां जितने लोग नहीं हैं उस से ज्यादा प्राइवेट गनपिस्तौलों से ले कर राइफलों तक हैं, जिन्हें वहां के लोग बेमतलब में अपने आसपास के लोगों को डराने के लिए इस्तेमाल करते रहते हैं.

हमारे यहां गन तो पुलिस वालों के पास ही होती है जिसे वे हर तरह के एनकाउंटर में इस्तेमाल कर सकते हैं पर हर हाथ में लाठी तो है. गांधी ने लाठी बुढ़ापे में सहारे के लिए इस्तेमाल की थी पर हमारे यहां लाठी वाला पक्का अनफ्रैंडली होता है क्योंकि वह लाठी सहारे के लिए नहीं सिर फोड़ने के लिए इस्तेमाल करता है. हमें बचपन से सिखाया जाता है कि दूसरे धर्म, जाति, रंग, भाषा वाला दोस्त नहीं हो सकता. हमारे यहां दफ्तरों, स्कूलों, महल्लों, एक ही सोसाइटी या मल्टी में बने 400-500 घरों में भयंकर गुटबाजी होती है और हर गुट दूसरे का दुश्मन होता है और कहीं न कहीं इस में धर्म, उपधर्म, पूजे जाने वाले देवता या देवी (जो हमारे में है) या कोई जिंदा, मुरदा व्यक्ति होता है.

फ्रैंडली होना एक आवश्यक गुण है. सिविलाइजेशन इसी पर टिकी है. आम आदमी अकेला कुछ नहीं कर सकता. आज की सोसाइटी बहुतों की मित्रता पर टिकी है. अगर हमें समाज विभाजन सिखाता है तो इस का वायरस हमारे घर में भी घुस जाता है, पतिपत्नी के बीच में आ जाता है, भाईबहनों के बीच में आ जाता है, बेटीबेटी के बीच में आ जाता है.

छोटेछोटे अमीर देश फ्रैंडली हैं तभी वहां भारतीय घुसपैठिए भरे हैं जबकि उन का रंग, भाषा, धर्म सब अलग हैं. ब्राजील, आइसलैंड, बैल्जियम, क्रोशिया सुखी भी हैं और फ्रैंडली भी हैं. अफ्रीका का या मिडल ईस्ट का कोई देश नहीं है क्योंकि अफ्रीकी से लूटने का डर लगता है. मिडल ईस्ट के अमीर देशों में कट्टर पुलिस के कारण डर लगता है. इन अनफ्रैंडली देशों में बाहर वाला भी डरा रहता है तो इन देशों वाला भी अपने पड़ोसी से डरा रहता है.

फ्रैंडशिप का मतलब यह नहीं है कि आप किसी को घर में बसा लो. बस इतना है कि उसे आप से डर नहीं लगे, वह आप से न डरे. आफत में दोनों एकदूसरे के काम आएं. गिनती कर के देखें कि आप कितने फ्रैंडली हैं, कब किस अनजान की पैसे से नहीं, अपने व्यवहार से सहायता की है? पैसे तो हमारे देश में भगवानों को चढ़ाए जाते हैं और हर भगवान की जगह भक्तों में आपस में धक्कामुक्की होती है. फ्रैंडली मंदिर कोई होगा यह तो पता ही नहीं है.

Religion

Wedding Makeup: ट्रेंड में वैडिंग मेकअप

Wedding Makeup: शादी का सीजन आते ही हर लड़की के मन में एक ही सवाल घूमता है कि मेकअप ऐसा हो जो नैचुरल लगे, साफ्ट हो और स्किन को सूट करे. आजकल का ट्रेंड है हैवी मेकअप से दूर रहना बल्कि ऐसा लुक जो ग्लोइंग हो, सौफ्ट हो और आप की नैचुरल ब्यूटी को हाइलाइट करे. वैसे तो शादी में मेकअप करवाया जाता है मगर आप को नौलेज हो तो करवाते समय आप खुद भी ध्यान दे सकते हैं कि मेकअप आर्टिस्ट क्या इस्तेमाल कर रही है. आप मेकअप खुद कर रही हैं तो यह जानना जरूरी है कि स्किन टोन के हिसाब से मेकअप कैसे चुनें.

सब से पहले तो अपनी स्किन टोन को अच्छे से समझना जरूरी है.

स्किन टोन 3 मुख्य तरह की होती हैं:

फेयर यानी गोरी, मीडियम या व्हीटिश जो इंडियन स्किन की सब से कौमन है और डस्की या डीप जो सांवली लेकिन बहुत रिच लगती है. टोन जानने का आसान तरीका यह है कि दिन की नैचुरल लाइट में देखें कि आप की स्किन पर गोल्ड ज्वैलरी ज्यादा सूट करती है या सिल्वर. अगर गोल्ड है तो वार्म अंडरटोन, सिल्वर है तो कूल और दोनों हैं तो न्यूट्रल.

अब सौफ्ट मेकअप के लिए हमेशा सौफ्ट शेड्स चुनें. ज्यादा डार्क या ब्राइट कलर्स से बचें और ड्यूई फिनिश यानी हलका ग्लो वाला लुक रखें.

जब त्वचा हो गोरी

बात करते हैं फेयर स्किन वाली लड़कियों की. अगर आप की स्किन गोरी है तो सौफ्ट पेस्टल कलर्स आप पर कमाल के लगेंगे. फाउंडेशन चुनते वक्त लाइट शेड लें जो पिंक या पीच अंडरटोन वाला हो जैसे लैक्मे या मैक के लाइट रेंज. ज्यादा हैवी मत लगाएं बस स्किन को इवन करें और हलका प्राइमर यूज करें ताकि ग्लो आए. ब्लश के लिए सौफ्ट पिंक या पीची शेड्स बैस्ट हैं, ज्यादा रैड मत डालें वरना चेहरा लाल हो जाएगा. आई मेकअप में पेस्टल शेड्स जैसे लाइट ब्राउन, सौफ्ट ग्रे या पीच यूज करें, हलका स्मोकी लुक बनाएं लेकिन बहुत डार्क नहीं. मसकारा के 2 कोट जरूर लगाएं ताकि आंखें बड़ी और नैचुरल लगें और लाइनर थिन रखें. लिप्स पर न्यूड पिंक, सौफ्ट कोरल या लाइट रैड लगाएं, मैट नहीं बल्कि क्रीमी फिनिश वाली ताकि सौफ्ट लगे. हाइलाइटर बहुत हलका चीक्स और नोज पर डालें जैसे सिल्वर या परल वाला. अगर प्रोफैशनल से करवा रही हैं तो बोलें कि ड्यूई और नैचुरल फिनिश चाहिए, हैवी कंटूरिंग नहीं. खुद कर रही हैं तो पहले प्रैक्टिस करें और हमेशा स्किन को पहले मौइस्चाइज करें.

व्हीटिश स्किन

मीडियम या व्हीटिश स्किन की बात करें तो यह स्किन टोन इंडिया में सब से ज्यादा है जैसे दीपिका या प्रियंका की तरह. यहां वार्म शेड्स बहुत अच्छे लगते हैं. फाउंडेशन यलो या गोल्डन अंडरटोन वाला चुनें. ब्लैंडिंग अच्छे से करें ताकि नैचुरल लगे. ब्लश में पीच या लाइट कोरल यूज करें जो स्किन को वार्म ग्लो दे. आई मेकअप के लिए गोल्डन, लाइट ब्रौंज या सौफ्ट कौपर शेड्स परफैक्ट हैं. हलका काजल लगाएं और विंग्ड लाइनर थोड़ा सौफ्ट रखें. आंखों को बड़ा दिखाने के लिए इनर कार्नर पर हलका हाइलाइट डालें. लिप्स पर सौफ्ट कोरल, न्यूड ब्राउन या लाइट प्लम कलर लगाएं जो रोजाना की तरह नैचुरल लगे लेकिन शादी वाला ग्लो दे. हाइलाइटर गोल्डन वाला चीक्स हाई पौइंट्स पर हलका सा लगाएं. सौफ्ट लुक के लिए ज्यादा लेयर्स मत डालें. बस 2-3 लेयर्स काफी हैं. प्रोफैशनल से करवाते वक्त बोलें कि वार्म टोन्ड और ग्लोइंग फिनिश चाहिए. एअरब्रश अगर पौसिबल हो तो बैस्ट रहेगा.

डस्की स्किन

डस्की या डीप स्किन वाली लड़कियों के लिए तो सौफ्ट मेकअप और भी खूबसूरत लगता है. आप की स्किन रिच होती है तो सौफ्ट लेकिन वार्म कलर्स इसे और ग्लोइंग बनाते हैं. फाउंडेशन गोल्डन या रिच ब्राउन अंडरटोन वाला लें. ग्रे अंडरटोन से बचें. ब्लश डीप पीच या सौफ्ट बेरी कलर का यूज करें जो स्किन में मर्ज हो जाए. आई मेकअप में गोल्डन, सौफ्ट पर्पल या लाइट एमराल्ड शेड्स ट्राई करें हलका स्मोकी लेकिन नैचुरल. काजल मोटा लेकिन स्मज्ड रखें ताकि सौफ्ट लगे. लिप्स पर सौफ्ट बरगंडी, न्यूड ब्राउन या लाइट औरेंज लगाएं जो स्किन को कौंप्लिमैंट करे. हाइलाइटर चैंपेन या गोल्डन लें मगर बहुत हलका सा ताकि ग्लो नैचुरल आए. कंटूरिंग हलकी करें, सिर्फ शेप देने के लिए. प्रोफैशनल को बोलें कि रिच लेकिन सौफ्ट पिगमैंट्स यूज करें और ड्यूई फिनिश रखें. ये लुक आप पर इतना ऐलिगैंट आएगा कि सब तारीफ करेंगे.

कुछ कौमन टिप्स

– कुछ कौमन टिप्स जो हर स्किन टोन के लिए काम आएंगे.

– सब से पहले स्किन प्रिपेयर करें. शादी से एक हफ्ता पहले अच्छा फेशियल करवाएं. रोज मौइस्चराइजर और सनस्क्रीन यूज करें.

– मेकअप से पहले प्राइमर जरूर लगाएं. यह बेस स्मूद बनाता है.

– वाटरप्रूफ प्रोडक्ट्स चुनें क्योंकि शादी

में इमोशंस हाई होते हैं. हाइड्रेटेड रहें.

पानी ज्यादा पीएं ताकि स्किन इनसाइड से ग्लो करे.

– अगर खुद मेकअप कर रही हैं तो यूट्यूब पर सौफ्ट इंडियन ब्राइडल ट्यूटोरियल देखें लेकिन अपनी स्किन पर मैच कर के ट्राई करें. प्रोफैशनल चुनते वक्त उन का पोर्टफोलियो देखें, रिव्यूज पढ़ें और ट्रायल सैशन बुक कर सकती हैं.

– ब्रैंड्स की बात करें तो बजट के हिसाब से लैक्मे, मेबेलीन भारती तनेजा से शुरू करें या हाई ऐंड जैसे मैक, हुडा. लेकिन याद रखें, अच्छा मेकअप वह है जो आप की स्किन को ब्राइट करे न कि छिपाए.

– शादी आप की है तो मेकअप ऐसा हो जो आप को खुशी दे. सौफ्ट लुक आजकल सब से ट्रेंडी है क्योंकि यह टाइमलैस होता है, फोटोज में भी नैचुरल आता है. मगर जो अपनी स्किन पर नैचुरल लगे वही बैस्ट है.

Wedding Makeup

Shrenu Parikh: दर्शकों का प्यार ही सब से बड़ा अवार्ड है

Shrenu Parikh: वडोदरा की एक साधारण फैमिली से आने वाली श्रेनु पारिख को बचपन से ही स्टेज पर परफौर्म करना, डांस और आर्ट में डूब जाना पसंद था. मगर एक पारंपरिक गुजराती परिवार में मौडलिंग और ऐक्टिंग के सपनों को ज्यादा प्रोत्साहन नहीं मिलता था. उन के पिता इंजीनियर और मां बैंकर हैं.

श्रेनु की जर्नी किसी प्लान के साथ शुरू नहीं हुई थी. बचपन में कभी उन्होंने ऐश्वर्या जैसा बनने का सपना देखा था. वे आर्टिस्ट बनना चाहती थीं. यह सपना धीरेधीरे, एकएक कदम कर के बना. श्रेनु ने अपने सपनों को कालेज तक छिपा कर रखा था. फिर उन्होंने अपना पहला ब्यूटी पेजेंट जीता और वहीं से सबकुछ बदल गया. कालेज में थिएटर और परफौर्मैंस ने उन्हें ऐक्टिंग की ओर खींचा. मुंबई आ कर जैसेतैसे औडिशन देने शुरू किए. स्ट्रगल, रिजैक्शन और सीख इन सब ने उन्हें मजबूत बनाया. उन का मानना है कि आज वे जो भी हैं उन्हीं अनुभवों का नतीजा है.

2010 में श्रेनु ने टीवी सीरियल ‘गुलाल’ से ऐंटरटेनमैंट इंडस्ट्री में डेब्यू किया. इस के बाद पहला लीड रोल टीवी सीरियल ‘हवन’ में मिला. श्रेनु को 2013 में टीवी सीरियल ‘इस प्यार को क्या नाम दूं 2’ से पहचान मिली. उन्होंने 3 फिल्मों में भी काम किया. फिल्म ‘थोड़ीथोड़ी मनमानियां’ से बड़े परदे पर डेब्यू किया था. फिल्म ‘फैमिली पौलिटिक्स औफ ब्लड’ में भी काम किया. वे 2 वैब सीरीज में भी काम कर चुकी हैं. टीवी रिएलिटी शो ‘नच बलिए’ की कंटैस्टैंट भी रह चुकी थीं. दिसंबर, 2023 में उन्होंने अपने को स्टार अक्षय म्हात्रे से शादी की. उन्होंने कई ब्यूटी पेजेंट्स जीते हैं जैसेकि ‘मिस यूनिवर्सिटी,’ ‘फेस औफ द ईयर,’ ‘मिस वडोदरा’ आदि.

सीरियल ‘इस प्यार को क्या नाम दूं’ के लिए 2014 में बैस्ट पत्नी का अवार्ड स्टार परिवार के लिए मिला और गुजराती फिल्म ‘लम्बू रास्तू’ के लिए बैस्ट डेब्यू ऐक्ट्रैस फीमेल का अवार्ड मिला. ‘इश्कबाज’ सीरियल के लिए 2017 में बैस्ट बहू का अवार्ड मिला. इन के अलावा और भी कई अवार्ड्स मिले.

अवार्ड्स से ज्यादा दर्शकों का प्यार

श्रेनु कहती हैं, ‘‘मेरे लिए इन अवार्ड्स से ज्यादा दर्शकों का प्यार माने रखता है. आज भी जब लोकल ट्रेन में या किसी ट्रिप पर लोग मुझे मेरे किसी किरदार जैसेकि ‘आस्था’ या ‘गौरी’ या ‘पार्वती’ कह कर बुलाते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है. यह प्यार, यह पहचान ही मेरे लिए सब से बड़ा अवार्ड है.’’

श्रेनु टीवी सीरियल ‘इस प्यार को क्या नाम दूं,’ ‘एक बार फिर,’ ‘दिल बोले ओबेराय,’ ‘इश्कबाज,’ ‘एक भ्रम सर्वगुण संपन्ना,’ ‘घर एक मंदिर,’ ‘मैत्री’ जैसे कई फेमस शोज में काम किया है. वे हर किरदार को सिर्फ स्क्रिप्ट से नहीं बल्कि अपने औब्जर्वेशन और सैंसिटिविटी से बिल्ड करती हैं. वे अपने कैरियर का बड़ा ग्रोथ पौइंट ‘इश्कबाज’ सीरियल को मानती हैं. इस शो ने उन्हें एक पहचान दी और उन की ऐक्टिंग लोगों तक पहुंची.

वे कहती हैं कि उन का बहुत से किरदारों से जुड़ाव रहा लेकिन ‘गणेश कार्तिकेय’ सीरियल में देवी पार्वती का किरदार उन के दिल के बेहद करीब है. इस में शक्ति भी है और एक मां की कोमलता भी.

श्रेनु बताती हैं, ‘‘मैं ने शुरुआत मौडलिंग से की थी. फोटो शूट्स, ब्रैंड शूट्स वगैरह में व्यस्त रहती थी. वैसे हमेशा टीवी में काम करना चाहती थी. मैं ने अलगअलग विषयों पर बहुत सारे शोज किए. लेकिन पौराणिक शो पहली बार किया और इस शो से मुझे एक अलग सुख और जुड़ाव महसूस हुआ. ये कहानियां हमें बहुत कुछ सिखाती हैं जैसे त्याग, परिवार का प्यार, कर्तव्य, शक्ति आदि.’

आइए, श्रेनु के बारे में विस्तार से जानते हैं:

फिल्मों या सीरियल्स में पहला ब्रेक?

‘‘मेरा पहला ब्रेक तब था जब मैं कालेज के लास्ट ईयर में थी. यह एक दोस्त का किरदार था जो बहुत ही आसानी से मिल गया था लेकिन मेरे पेरैंट्स चाहते थे कि मैं लास्ट ईयर कंप्लीट कर के फिर इस इंडस्ट्री में आऊं. इसलिए छोटा रोल किया जो जल्दी खत्म हो जाए और मैं पढ़ाई जारी रख सकूं. यह रोल करते समय चुनौती थी मुंबई से वडोदरा का अपडाउन. कभी भी रात को कौल आ जाता था कि कल शूट है. तब मैं कालेज मिस करती थी. मेरे पेरैंट्स मुझे बिना टिकट, जनरल टिकट पर मुंबई लाते थे फिर मैं शूट करती और वापस वडोदरा आ जाती.’’

अभी वर्तमान में आप किस शो में काम कर रही हैं? 

‘‘अभी मैं सोनी सब चैनल पर आने वाले सीरियल ‘गाथा शिव परिवार की गणेश कार्तिकेय’ में देवी पार्वती का किरदार निभा रही हूं. मेरी ऐंट्री बहुत और्गेनिक तरीके से हुई. मेरे टैस्ट के दौरान जिस शांति और मातृत्व की ऊर्जा प्रोड्यूसर को चाहिए थी वह उन्हें मुझ में दिखी और मुझे यह रोल मिल गया. इस रोल की खास बात यह है कि यह सिर्फ दिव्यता नहीं बल्कि एक मां, एक पत्नी, एक महिला की आंतरिक शक्ति को भी बहुत खूबसूरती से दर्शाता है. सैट का माहौल बेहद सकारात्मक है. हरकोई एकदूसरे को सपोर्ट करता है. हमारे को ऐक्टर्स बहुत डैडिकेटेड हैं जिस से काम करना सहज हो जाता है.’’

आप को ऐक्टिंग का कौन सा पहलू सब से ज्यादा पसंद है?

‘‘मुझे कैरेक्टर बिल्डिंग बहुत पसंद है. उस के लेयर्स सम?ाना, उस की इमोशंस को महसूस करना और स्क्रीन पर उसे ब्रीथिंग रिएलिटी देना.’’

आप के जीवन और कैरियर में आप का प्रेरणास्रोत कौन रहा है?

‘‘मेरे मातापिता. उन की वैल्यूज और विश्वास ने मुझे हर उतारचढ़ाव से निकलने की हिम्मत दी.’’

ऐक्टिंग फील्ड में महिलाएं किन चुनौतियों का सामना करती हैं और उन्हें आप की क्या सलाह होगी?

‘‘इस फील्ड में काफी अनसर्टैन्टी है. आप को पता नहीं होता कि अगला रोल कब और कैसा मिलेगा या सीरियल कितना लंबा चलेगा. काम के लौंग वर्किंग आवर्स कभीकभी असहज महसूस कराते हैं. इमोशनल प्रैशर, स्टीरियोटाइप्स जैसी बहुत चीजें हैं जो चुनौती बन जाती हैं. इस फील्ड में आने वाली नई अभिनेत्रियों को मेरी यही सलाह है कि वे अपनी बाउंड्रीज सैट करें, अपनी वर्थ समझें और काम में कंसिस्टैंट रहें. काम में अपना हंड्रेड परसैंट दें.’’

आप ने जीवन में किस तरह के संघर्ष देखे हैं?

‘‘जीवन में संघर्ष बहुत पहले ही आ गया था. पहले तो एक गुजराती लड़की के लिए इस फील्ड में आना ही मुश्किल था, पेरैंट्स को इस कैरियर के लिए मनाना जिन्होंने मुझे फार्मेसी की डिगरी दिलाई थी. उस के बाद कैरियर शिफ्ट करने की जद्दोजहद. फिर दूसरा संघर्ष था मुंबई आना और यहां एडजस्ट होना. हमारा यहां कोई रिश्तेदार नहीं था तो शुरुआत से शुरू करना था. घर ढूंढ़ने में दिक्कतें आईं. मैं अकसर बहुत होमसिक हो जाती थी. फ्लैट्स में अजीब लगता था और वडोदरा बहुत याद आता था. मुंबई की लाइफ बहुत फास्ट थी. लोकल्स में आनाजाना भी जीवन का एक कठिन दौर था.

‘‘पहले शो के बाद मैं ने मन बना लिया था कि वापस चली जाऊंगी क्योंकि वह पहला शो उतना चला नहीं था. लेकिन उस वक्त मेरे परिवार ने मुझे ताकत दी और फिर से कोशिश करने को कहा. मैं ने ऐसा ही किया. फिर तो एक के बाद एक शो चलने लगे और मेरा भी मन लगने लगा.

‘‘मगर इस प्रोफैशन में मैं ने बहुत सारे पर्सनल लौसेज देखे हैं. मेरे नानानानी जिन्होंने मुझे पालापोसा था, उन के आखिरी पलों में मैं उन से मिल नहीं पाई. अपने कितने ही कजिंस और दोस्तों की शादी मिस की. ऐसा मान लीजिए कि मैं एक अलग फोकस्ड लाइफ जी रही थी, जिस में सिर्फ और सिर्फ मेरा काम था.

‘‘आज जब मैं अपने भाई के आने पर एक छुट्टी लेती हूं तो वह हैरान हो जाता है कि तुम ने छुट्टी कैसे ले ली क्योंकि कोई भी फैमिली मैंबर आता था तो वे मेरे सैट पर मुझ से मिलते थे. मैं ने ऐसे बहुत सारे सैक्रिफाइस किए हैं.’’

परिवार की कितनी सपोर्ट मिली?

‘‘मेरे परिवार ने हमेशा मेरा साथ दिया है, मुझ पर हमेशा विश्वास रखा है. मैं परिवार में अकेली बेटी थी, जिस ने ऐक्टिंग के फील्ड में कैरियर बनाया फिर भी मेरा परिवार हमेशा मेरी ताकत बना रहा. औडिशंस देने, वडोदरा से मुंबई ट्रेन से आना, रैंट पर घर लेना, मुझे इमोशनल सपोर्ट देना यह सब मेरा परिवार करता था.

‘‘अब अगर पति और ससुराल की बात करूं तो मेरे पति अक्षय म्हात्रे भी ऐक्टर हैं. इसलिए मेरी स्ट्रगल्स समझना उन के लिए आसान हो जाता है. छोटीछोटी बातें जैसे टिफिन बनाना, लेट पैक अप होना, रिहर्सल्स करना, ये सब मेरे साथ मेरे पति करते हैं. उन की फैमिली भी मुझे बहुत प्यार करती है और मुझे पैंपर करती है. शादी के बाद सोशल रिस्पौंसिबिलिटीज आ जाती हैं लेकिन मेरे ससुराल वाले मेरी ऐक्टिंग के फील्ड को जानते हैं. उन्होंने कभी मेरी गैरमौजूदगी को गलत नहीं समझ. उन के साथ ट्रैवल करने में मुझे बहुत मजा आता है. वे बिलकुल मेरे असली पेरैंट्स जैसे हैं. हर कदम पर उन का प्यार और समझदारी मेरे लिए स्ट्रैंथ है.’’

महिलाओं की सब से बड़ी शक्ति क्या है?

‘‘उन की रैजिलियंस गिर कर भी कई गुना मजबूती से उठना.’’

इमोशनल पल?

‘‘मेरे जीवन का बहुत इमोशनल पल वह था जब मेरे नानानानी की मौत हुई और मैं उन के पास नहीं थी. मेरी मम्मा वर्किंग मौम थीं सो जब मैं कुल 8 महीने की थी तब से  मुझे मम्मी नाना के घर रखती थीं क्योंकि वह एक ऐसा पौइंट था जब मम्मी को जौब छोड़नी पड़ती. तब नाना ने कहा कि बच्ची को हम संभालेंगे. मेरे नानानानी जब बीमार थे तो मैं शूटिंग कर रही थी. नया शो था सो मुझे छुट्टी नहीं मिली. मैं उन्हें देखने भी नहीं जा पाई जब वे गुजर गए. मुझे इस बात की गिल्ट हमेशा रहेगी.

‘‘नानी के साथ भी ऐसा ही हुआ. वे बीमार थीं. तब ‘मैं इस प्यार को क्या नाम दूं’ की शूटिंग कर रही थी. भाई स्पैशली मुझे बताने आया क्योंकि वे जानते थे नानी मेरे लिए कितनी खास थीं. मैं शूटिंग में थी तो उन्होंने मेरा पैकअप होने का इंतजार किया. लेकिन अचानक एक रिश्तेदार का मैसेज आया कि आप की नानी के बारे में सुन कर दुख हुआ. मैं विश्वास नहीं कर पा रही थी. मुझे उस दिन पहली बार पैनिक अटैक आया था. मेरी टीम ने पैकअप किया और मुझे नानी के रिचुअल्स में जाने दिया. यह सब अब भी मुझे गिल्ट फील कराता है.’’

आप की सफलता का सीक्रेट क्या है?

‘‘मैं अपनी सफलता का सीक्रेट अपनी कंसिस्टैंसी, डिसिप्लिन और ग्रैटिट्यूड को मानती हूं.’’

आगे क्या करना चाहेंगी?

‘‘मैं भविष्य में कौमिक जोनर ट्राई करना चाहूंगी. मेरी कौमिक टाइमिंग नैचुरली अच्छी है सो उसे ऐक्सप्लोर करना चाहूंगी.’’

आज की महिलाओं को समाज और वर्कप्लेस में कौन सी चुनौतियां स्वीकार करनी पड़ती हैं और आप क्या सलाह देना चाहेंगी?

‘‘मुझे लगता है महिलाओं को जजमैंट, बैलेंसिंग रोल्स और कौंस्टैंट प्रैशर की चुनौतियां सहनी पड़ती हैं. मेरी सलाह है कि आप सदा सीखते रहो, अपने लिए खड़े रहो और कभी गिल्ट में मत जीओ.’’

समाज में महिलाओं की स्थिति में बदलाव?

‘‘पिछले कुछ सालों में महिलाओं की आवाज और पोजिशन दोनों मजबूत हुई हैं. लेकिन बदलाव अभी भी जारी है. आज की महिला अपने कैरियर, अपनी पहचान और अपने चौइसेज पर ज्यादा कौन्फिडैंट हैं.’’

Shrenu Parikh

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