पितृद्वय: भाग-3

अंश चुप रहा. सुहास और नितिन को गुस्सा आया कि बच्चे से ऐसे सवाल करने की यह क्या तमीज है.

इतने में महिला के दोनों बच्चे भी बोल उठे, ‘‘बताओ न अंश कैसा लगता है?’’

अंश ने अपने दोनों हाथों में नितिन और सुहास का 1-1 हाथ पकड़ कहा, ‘‘अच्छा लगता है. तुम लोगों को तो एक पापा का प्यार मिलता है, मेरे तो 2-2 पापा हैं. सोचो, कितना मजा आता होगा मुझे.’’

सन्नाटा सा छा गया. सुहास ने आंखों की नमी को गले में ही उतार लिया. नितिन ने अंश के सिर पर अपना दूसरा हाथ रख दिया.

सुमन ने अंश का कंधा थपथपाते हुए कहा, ‘‘वैरी गुड, अंश, वैलसैड.’’

उस दिन जब तीनों पार्टी से लौटे, स्नेह का बंधन और मजबूत हो चुका था.

समय अपनी रफ्तार से चलता रहा. एमबीए करते ही अंश को अच्छी जौब भी

मिल गई. अंश की कई लड़कियां भी दोस्त थीं. उस का फ्रैंड सर्कल अच्छा था. उस के दोस्त जब भी घर आते, उत्सव का सा माहौल हो जाता. सुहास और नितिन एप्रिन बांधबांध कर कभी किचन में घुस जाते, कभी खाना बाहर से और्डर करते. सुहास और नितिन को यह देख कर अच्छा लगता कि अंश का गु्रप उन के रिश्ते को सम्मानपूर्वक देखता है, सोच कर अच्छा लगता कि आज के युवा कितने खुले और नए विचारों के हैं. पर दोनों की चिंताओं ने अब नया रूप ले लिया था.

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एक दिन सुहास ने कहा, ‘‘नितिन, अंश की कोई गर्लफ्रैंड होगी न?’’

नितिन हंसा, ‘‘इतने हैंडसम बंदे की गर्लफ्रैंड तो जरूर होगी, शैतान है, बताता नहीं. मैं ने एक दिन पूछा भी था तो बोला, जल्दी क्या है.’’

‘‘पर यार, पता नहीं कौन होगी, हमारे रिश्ते को कैसे स्वीकारेगी? उस का परिवार क्या कहेगा? मन में यही डर लगा रहता है कि सारी उम्र का हासिल अंश का प्यार ही है हमारे पास, कहीं कभी यही हम से दूर न हो जाए.’’

फिर दोनों बहुत देर तक उदास मन से कुछ सोचतेविचारते रहे. दोनों के मन में यह संशय, डर गहरी जड़ जमा चुका था कि अंश के जीवन में आने वाली लड़की पता नहीं इन दोनों को खुले दिल से स्वीकारेगी या नहीं.

कुछ महीने और बीते. एक वीकैंड की शाम को अंश एक लड़की के साथ घर आया. सुंदर सी, स्मार्ट लड़की दोनों को ‘हैलो, अंकल’ कहती हुई घर में आई.

अंश ने परिचय करवाया, ‘‘यह लवीना है. लवीना ये सुहास पापा, ये नितिन पापा.’’

अभी तक ऐेसे मौकों पर सुहास और नितिन सामने वाले की प्रतिक्रिया जानने के लिए असहज से हो जाते थे. आज तो और भी गंभीर हुए, क्योंकि अंश पहली बार किसी लड़की को अकेले लाया था. फिर भी कहा, ‘‘हैलो लवीना, हाऊ आर यू?’’

‘‘आई एम फाइन अंकल.’’

अंश ने कहा, ‘‘लवीना आप दोनों से मिलना चाह रही थी. आज पीछे ही पड़ गई तो लाना ही पड़ा,’’ कहता हुआ अंश हंस दिया तो लवीना भी शुरू हो गई, ‘‘तो इतने दिन से सुन क्यों नहीं रहे थे? अंकल, आप लोगों की इतनी तारीफ, इतनी बातें सुनती हूं तो मिलने का मन तो करेगा ही न? यह तो टालता ही जा रहा था. आज पीछे पड़ना ही पड़ा.’’

‘‘वह इसलिए कि हमारे घर की शांति भंग न हो… हमारा इतना शांत सा घर है और तुम तो चुप रहती नहीं हो.’’

‘‘अच्छा… खुद कम बोलते हो क्या?’’

सुहास और नितिन दोनों ही छेड़छाड़ का पूरा मजा ले रहे थे. घर की दीवारें तक जैसे चहक उठी थीं. अंश और लवीना का रिश्ता साफसाफ समझ आ रहा था.

सुहास ने पूछा, ‘‘तुम लोग क्या लोगे? पहले बैठो तो सही.’’

नितिन ने भी कहा, ‘‘जो इच्छा हो, बता दो. मैं तैयार करता हूं.’’

अंश ने कहा, ‘‘लवीना बहुत अच्छी कुक है, आज यही कुछ बना लेगी.’’

लवीना भी फौरन खड़ी हो गई, ‘‘हां, बताइए, अंकल.’’

‘‘अरे नहीं, तुम बैठो, मंजू आने वाली होगी.’’

‘‘आप लोगों ने उस के हाथ का तो बहुत खा लिया, आज मैं बनाती हूं.’’

तभी मंजू भी आ गई. अब तक वह भी इस परिवार की सदस्या ही हो गई थी. लवीना ने मंजू के साथ मिल कर शानदार डिनर तैयार किया. पूरा खाना सुहास और नितिन की ही पसंद का था. दोनों हैरान थे, खुश भी… खाना खाते हुए दोनों भावुक से हो रहे थे.

अंश ने दोनों के गले में बांहें डाल दीं, ‘‘क्या हुआ पापा?’’

नितिन का गला रुंध गया, ‘‘इतना प्यार, सम्मान… हमें तो हमारे अपनों ने ही भुला दिया…’’

सुहास ने माहौल को हलका किया, ‘‘कितना अच्छा लग रहा है न… यार कितनी रौनक है घर में. शुक्र है इस घर में लड़की तो दिखी.’’

लवीना ने इस बात पर खुल कर ठहाका लगाया और घर के तीनों पुरुषों को प्यार, सम्मान से देखा. आज सुहास और नितिन के दिल में भी सालों से बैठा संदेह, डर हमेशा के लिए छूमंतर हो गया था.

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लवीना ने कहा, ‘‘पापा, मेरे घर में बस मैं और मेरी मां ही हैं. मेरे पापा तो मेरे बचपन में ही चल बसे थे. अंश जब आप दोनों से मिले स्नेह, लाड़प्यार के बारे में बताता था तो मैं बहुत खुश होती थी,’’ फिर अंश को छेड़ते हुए कहने लगी, ‘‘मैं ने इस से दोस्ती ही इसलिए की है कि मुझे भी पापा का प्यार मिले और यह कमी तो अब खूब दूर होगी जब एक नहीं 2-2 पापा का प्यार मुझे मिलेगा.’’

अंश ने पलटवार किया, ‘‘ओह, चालाक लड़की, दोनों पापा के लिए दोस्ती की है… देख लूंगा तुम्हें.’’

सुहास और नितिन दोनों की छेड़छाड़ पर मुग्ध हुए जा रहे थे. घर में ऐसा दृश्य पहली बार जो देखा था. दोनों ने ही अंश और लवीना के सिर पर अपनाअपना हाथ रख दिया.

#coronavirus: हेल्थ केयर के क्षेत्र में भारत को मिली सीख 

कोविड 19 के लगातर बढ़ते केस और उसका सही इलाज और वैक्सीन अब तक न मिल पाने की वजह से पूरा विश्व लाचार है और सबने इतना समझ लिया है कि केवल सैन्य शक्ति और हथियार बढ़ा लेने से ही देश शक्तिमान या विकसित देश नहीं कहलाता, बल्कि वहाँ रहने वाले जनता को किसी बीमारी का सही इलाज देना भी उनके लिए चुनौती है. इस पेंडेमिक से लाखों लोग पीड़ित है और मौत का आंकड़ा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. हेल्थ केयर के क्षेत्र में दुनिया के नंबर वन कहे जाने वाले लोग भी असहाय हो चुके है, ऐसे में खास कर भारत जैसे विकासशील देश जहां किसी भी बीमारी के लिए सही इलाज आज भी मुमकिन नहीं. सही हायजिन वाले अस्पताल से लेकर अनुभवी डॉक्टर, जरुरत के अनुसार उपकरण, पैरामेडिकल स्टाफ आदि सभी की कमी है. 1.3 बिलियन की जनसँख्या, जहाँ युवाओं की संख्या सभी देशों से अधिक होने पर भी सब लाचार है. सब कुछ आस्था पर भरोषा करके ही यहाँ जीना पड़ता है, ऐसे में इंडिया इज ग्रोइंग की स्लोगन भी कोई माइने नहीं रखती.

इस तरह की अवस्था में भारत को किस तरह की सीख लेनी चाहिए? हेल्थ केयर सेक्टर में कितनी तैयारी आगे करने की जरुरत है, इस विषय हर कोई आज सोचने पर मजबूर है, इसी विषय पर डॉक्टर और हेल्थ केयर के एक्सपर्ट ने आगे आने वाले समय में हेल्थकेयर में अधिक से अधिक विकास की जरुरत को महसूस करने लगे है. इस बारें में मुंबई की रिजनेरेटिव मेडिसिन रिसर्चर डॉ. प्रदीप महाजन कहते है कि इस पेंडेमिक को लोगों ने अधिक महत्व नहीं दिया था और ये इतनी जल्दी सबमें फैलेगा ये भी पता नहीं था. किसी के पास भी इसकी तैयारी नहीं थी. इसलिए मौत का आंकड़ा इतनी जल्दी बढ़ता हुआ दिख रहा है. मेडिकल डॉक्टर्स, पैरा मेडिकल स्टाफ और दवाइयां जरुरत के हिसाब से नहीं मिल रही है. जर्मनी में इसे अच्छी तरह से मैनेज किया और डेथ परसेंट 0.1 से भी कम है, जबकि दूसरे देशों में 5 प्रतिशत कही 8 प्रतिशत तो कही 10 प्रतिशत है. भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी की वजह से तैयारी में कमी हुई है. उसकी वजह से सबसे अधिक चुनौती हमें बेड्स और वेंटीलेटर्स, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट्स (PPE), टेस्ट किट आदि की हाई लेवल की मैन्युफैक्चरिंग यहाँ नहीं है. 50 हजार वेंटिलेर्स है, जबकि जरुरत लाखों में हो सकती है. ये गैप अधिक है और देश इसे ढूंढ़ता फिर रहा है. आईसीयू का बैकअप यहाँ बहुत कम है, जो चिंता का विषय है. इसके अलावा डॉक्टर्स, नर्सेज ,पैरामेडिकल स्टाफ आदि सब कम है. ये अनुपात में जो कमी है वही इस बीमारी को बढ़ाने की वजह है. सेल्फ आइसोलेशन ने देश को कुछ हद तक बचाया है और वॉल्यूम इस वजह से कम हो रहा है, नहीं तो इसे सम्हालना मुश्किल था. इस दशा को देखते हुए कुछ सीख देश की सरकार और जनता को लेनी चाहिए.जो निम्न है,

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  • इन्फ्रास्ट्रक्चर को ठीक करना,
  • क्रिटिकल मैनेजमेंट के अंतर्गत काम करने वाले लोगों को प्रशिक्षण देना,
  • मैनपॉवर को सही करना,
  • देश के नागरिकों का भी सही तरह से सरकार का साथ देना,

ऐसी बीमारी में लगने वाले ड्रग्स और उपकरण जिसमें वेंटिलेटर्स, प्रोटेक्टिव ड्रेसेज आदि की सप्लाई प्रयाप्त मात्रा में करने की व्यवस्था करने से ऐसे किसी भी महामारी से डरने की जरुरत देश को नहीं होगी.

इसके अलावा कुछ दवाइयां हमारे यहाँ अधिक मात्रा में नहीं बनते, जिसकी जरुरत इस बीमारी से पीड़ित को होती है. क्लोरोक्वीन बहुत है ,लेकिन इसके साथ में लगने वाली एंटी वायरल दवाइयां यहाँ नहीं बनती. उनके रॉ मेटेरियल बाहर से मंगाने पड़ते है, जो अब मुश्किल हो रहा है, एंटी वायरल ड्रग्स भी देश में तैयार हो इसकी व्यवस्था भी देश को करने की जरुरत है. साथ ही रिसर्च पर अधिक जोर देने की जरुरत है.

इसके आगे डॉक्टर प्रदीप कहते है कि क्रिटिकल रोगी के लिए बेड्स, अस्पताल, प्रशिक्षित स्टाफ आदि की बहुत जरुरत है, कोविड -19 के तहत जो समस्या हमें आई है, इससे देश को सीख मिलनी चाहिए . केवल सरकारी अस्पताल ही नहीं, प्राइवेट अस्पताल को भी वैसी ही सुविधा से लैस होने की जरुरत है, ताकि जरुरत के समय वे भी साथ आ सकें.

इतना ही नहीं पब्लिक को भी साथ देने के साथ की जरुरत है, वे निर्देशों का पालन किये बिना अपना टेस्ट नहीं करवा रहे है, या फिर क्वारेंटाइन से भाग रहे है, जो लोगों को इस बीमारी के बारें में कम जानकारी की वजह से है.

डॉक्टर प्रदीप इस दिशा में रिसर्च कर रहे है, जिसके तहत मेसेंसिमेल (mesenchymal) स्टेम सेल्स और नेचुरल किलर सेल्स जिसके द्वारा टारगेट कर इस सेल को मारा जा सकता है, इसे कोरोना से अधिक आक्रांत रोगी का इलाज किया जा सकता है. ये एक नयी तकनीक आ सकती है. इसके लिए सरकार की परमिशन लेने की कोशिश की जा रही है. इसमें रोगी की इम्यून सिस्टम को बढाकर इस वायरस को काबू में किया जा सकता है. इम्युन सिस्टम बढ़ा देने से वायरस आयेगा औए चला भी जायेगा किसी को पता भी नहीं लगेगा.

पुणे की मदरहुड हॉस्पिटल की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ.राजेश्वरी पवार बताती है कि अभी तक जो सावधानियां और इलाज़ भारत में हो रहे है वह दूसरे देश की अपेक्षा प्रसंशनीय है, क्योंकि भारत जैसे इतने बड़े देश में अचानक ऐसी महामारी से लड़ना बहुत मुश्किल का काम है, पर यहाँ लोग मास्क काफी मात्रा में बना रहे है और पहन भी रहे है. ये सही भी है अगर कोई नियमित मास्क पहनकर बाहर जाता है और घर आकर उसे साबुन से धो लेता है, तो इतनी सावधानी कोरोना संक्रमण से बचने के लिए काफी होता है. ध्यान रहे इसे किसी के साथ शेयर न करें और सोशल डिस्टेंस जरुरी है, लेकिन लॉकडाउन इसे कम करने में अवश्य बहुत हद तक सफल हुई है. ये एक सही कदम था, क्योंकि ऐसी बीमारी में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के लिंक को तोडना बहुत जरुरी होता है.

इसके आगे डॉ. राजेश्वरी कहती है कि हेल्थ केयर सेक्टर में की अगर बात करें, तो अभी सरकार बीमारी से सम्बंधित दवाओं के लिए लाईसेन्स जल्दी दे रही है, ताकि जल्द से जल्द इस बीमारी की इलाज के लिए उपकरण और सुविधाएं मिल सकें. भविष्य में भी सरकार को कुछ सीख इससे लेने की जरुरत है,

  • सरकारी अस्पतालों को अधिक से अधिक ऐसे संक्रमण युक्त बीमारी से लड़ने के लिए तैयार करना,
  • संक्रमण युक्त बीमारी के लिए अलग से अस्पताल बनाना, ताकि बाकी मरीज को इन्फेक्शन न हो,
  • उसमें स्पेशलिस्ट डॉक्टर होने की जरुरत है, जो बहुत कम है,
  • इसे बढ़ाने के लिए डॉक्टर्स की हाई लेवल की पढाई के लिए संस्थान खोले जाने की जरुरत है, क्योंकि डॉक्टर की कमी भी इस बीमारी के दौरान काफी सामने आ रही है.

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विदेशों में ऐसे डॉक्टर्स की कमी इसलिए हुई है, क्योंकि वहां संक्रमण युक्त बीमारी बहुत कम होती है, ऐसे में इस तरह के वायरस से लड़ना उनके लिए काफी मुश्किल हो रहा है, जबकि वहां की हेल्थ केयर सिस्टम काफी अच्छा है, वहां भी वेंटिलेटर्स कम पड़ गए है, हालाँकि अभी हमारे यहाँ ऐसी परिस्थिति नहीं है, पर ऐसी होने पर समस्या डॉक्टर्स को आती है कि किसे बचाया जाय, युवा या बुजुर्ग को? दोनों ही केस में डॉक्टर्स में अपराध बोध जगता है और मानसिक समस्या डॉक्टर्स को आ जाती है. स्ट्रेस लेवल और उनमें रोग फैलने का डर भी मेडिकल स्टाफ को आ जाता है. केवल रोगी को ही नहीं हेल्थ केयर में काम करने वालो के लिए भी साईकोलोजिकल सपोर्ट की जरुरत होती है, ऐसी टीम निर्धारित की जानी चाहिए. इसके अलावा जनसँख्या के हिसाब से उपकरण भी हमारे देश में होनी चाहिए.

पुणे के माय लैब की साइंटिस्ट मिताली पाटिल कहती है कि देश में गहन रिसर्च सेंटर्स, उपकरणों की मैन्युफैक्चुरिंग की व्यवस्था, जिसमें थर्मामीटर, मास्क, ग्लव्स, वेंटिलेटर्स आदि सभी में सही तरीके से इन्वेस्ट करने की जरुरत है, जिससे देश ऐसे किसी भी बीमारी से लड़ने की क्षमता को बढ़ा सकें.

5 टिप्स: गरमी के मौसम में ऐसे रखें अपने घर का ख्याल

गरमियां आते ही टैम्पेरेचर ज्यादा हो जाता है. ऐसे में घर हो या बाहर आप तेज धूप से बच नही सकते, लेकिन अगर आप पहले ही इन सभी प्रौब्लम से बचने के लिए तैयारी कर लें तो आपकी गरमियां आराम से बीतेंगी. इसके लिए जरूरी है कि आप अपने घर की सफाई और तेज गरमी के लिए एसी, कूलर का अरेंजमैंट पहले ही कर ले. इसके अलावा हम आपको बताएंगे गरमी में अपने घर को मेन्टेन रखने के लिए कुछ खास टिप्स…

  1. अपने घर की विंडो स्क्रीन को बदल या धो लें…

सरदी के बीत जाने के बाद खिड़कियों में धूल और मिट्टी जम जाती है, जो गरमी में कई बीमारियों का कारण बन जाती हैं, इसलिए गरमी में खिड़की से आने वाली साफ-सुथरी हवा के लिए खिड़कियों को साफ रखना जरूरी है. इसलिए गर्म साबुन के पानी और एक ब्रश की मदद से खिड़कियों को साफ करें.

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2. गटर (नाले) और डाउनस्पौट को साफ करना है जरूरी…

आपको समय-समय पर घर के नाले की सफाई करना चाहिए और अगर आपके घर में पेड़-पौधे ज्यादा हों तो सफाई करना और भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि पेड़ों की सफाई न करने से मच्छर हो जातें हैं जिससे खतरनाक बीमारियां होने का खतरा होता है.

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  1. सीलिंग फैन और एसी को रखें साफ ….

गरमी में एसी और पंखा कितना जरूरी है यह सभी को पता है, लेकिन सरदियों में इनका इस्तेमाल कम होता है इसलिए इन पर धूल जम जाती है या फिर एसी में गंदगी जमा हो जाती है. इसलिए जरूरी है कि फैन और एसी का इस्तेमाल करने से पहले धूल को साफ कर लें और देख लें कि पंखा और एसी ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं.

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  1. अपनी चिमनी को करें साफ

सरदी खत्म होने के बाद गरमी का टाइम चिमनी को साफ करने का सही समय है. लेकिन इतनी गरमी में खुद चिमनी को साफ करना एक मुश्किल काम हो सकता है इसीलिए चिमनी की सफाई करने वाली सेवा को कौल करना सबसे सही औप्शन है. जिसमें कम समय के साथ अच्छे से सफाई भी हो जाएगी.

  1. गरमी में अपने डेक को करें साफ…

गरमी में यह देखने के लिए कि क्या कोई बोर्ड खराब या सड़ रहे हैं, अपने डेक की सफाई जरूर करें. या उन्हें बदल दें. साथ ही चेक कर लें की कोई पेच ढीला तो नहीं है.

फेस पर चौकलेट वैक्स करवाने से जलन हो रही है है, मैं क्या करूं?

सवाल-

मेरी उम्र 43 वर्ष है. पिछले सप्ताह अपनी ब्यूटीशियन की सलाह से मैंने चेहरे पर चौकलेट वैक्स करवाया, क्योंकि मेरे चेहरे पर बहुत बाल थे, जो अब डार्क और लंबे भी होते जा रहे थे. उस के बाद मेरे चेहरे पर लाल दाने व फुंसियां हो गईं. चेहरे पर कपड़ा छूने पर भी जलन होती है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

यह आप की गलतफहमी है कि आप के चेहरे पर रैशेज, दाने व बाल वैक्स के कारण हैं. आप एक बार अपने खून की जांच करवाएं, क्योंकि आप की यह प्रौब्लम हारमोन असंतुलन के कारण भी हो सकती है. हारमोंस को स्टैबिलाइज करने के लिए उचित इलाज करा सकती हैं.

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गरमी में हर लड़की स्लीवलेस या शौर्टस जैसे कपड़े पहनना पसंद करती हैं, जिसके लिए आप वैक्सिंग करवाना कभी नहीं भूलती. वैक्सिंग से आप अपनी बौडी के अनचाहे बाल तो हटा देतें हैं, लेकिन वैक्सिंग के बाद कईं ऐसी नई प्रौब्लम शुरू हो जाती हैं जो आपकी डेली लाइफ पर असर डालती है. जैसे रेडनेस होना या स्किन काली पड़ जाने जैसी आम प्रौब्लम. इसीलिए आज हम आपको कुछ ऐसी टिप्स के बारे में बताएंगे, जिससे आप वैक्सिंग के बाद होने वाली सभी प्रौब्लम से छुटकारा पा सकती हैं.

1. वैक्सिंग करवाने के बाद यह करना है जरूरी

अगर आपको वैक्सिंग करवाने के बाद स्किन पर तरह-तरह की परेशानी होती है तो आप वैक्सिंग करवाने के बाद अपनी स्किन को एक्सोफोलिएटिड यानी परत हटाने करने के लिए आप वैक्स वाली जगह पर आराम से सक्रब करें. हफ्ते में 1-2 बार ऐसे करने से आपकी स्किन सौफ्ट रहेगी.

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Serial Story: एहसास (भाग-3)

लेखिका- रश्मि राठी

सुधांशी उन दोनों को बहुत गौर से देख रही थी. आज उस का परिचय प्यार के एक नए रूप से हो रहा था. यह भी तो प्यार है कितना पवित्र, एकदूसरे के लिए समर्पण की भावना लिए हुए. उसे महसूस हो रहा था कि प्यार सिर्फ वह नहीं जो रात के अंधेरे में किया जाए. प्यार के तो और भी रूप हो सकते हैं. लेकिन उस ने तो कभी सुशांत की पसंद जानने की भी कोशिश न की. उस ने तो हमेशा अपनी आकांक्षाओं को ही महत्त्व दिया.

‘‘चलो, हम दूसरे कमरे में बैठ कर बातें करते हैं, ये लोग तो अपने दफ्तर की बातें करेंगे,’’ अमिता ने सुधांशी को उठाते हुए कहा.

अमिता और सुधांशी के विचारों में जमीनआसमान का फर्क था. अमिता घर के बारे में बातें कर रही थी, जबकि सुधांशी ने कभी घर के बारे में कुछ सोचा ही नहीं था. तभी अमिता ने कहा, ‘‘बड़ी सुंदर साड़ी है तुम्हारी, क्या सुशांत ने ला कर दी है?’’

‘‘नहीं, नहीं तो,’’ चौंक सी गई सुधांशी, ‘‘मैं ने खुद ही खरीदी है.’’

‘‘भई, ये तो मुझे कभी खुद लाने का मौका ही नहीं देते. इस से पहले कि मैं लाऊं ये खुद ही ले आते हैं. लेकिन इस बार मैं ने भी कह दिया है कि अगर मेरे लिए साड़ी लाए तो बहुत लड़ूंगी. हमेशा मेरा ही सोचते हैं. यह नहीं कि कभी कुछ अपने लिए भी लाएं. इस बार मैं उन्हें बिना बताए उन के लिए कपड़े ले आई. दूसरों की जरूरतें पूरी करने में जितना मजा है वह अपनी इच्छाएं पूरी करने में नहीं है.’’

‘‘चलो, आज घर नहीं चलना है क्या?’’ सुशांत ने उस की बातों में खलल डालते हुए कहा.

‘‘अच्छा, अब चलते हैं. किसी दिन आप लोग भी समय निकाल कर आइए न,’’ सुधांशी ने चलते हुए कहा.

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आज हर्षल के घर से लौटने पर सुधांशी के मन में हलचल मची हुई थी. उस के कानों में अमिता के स्वर गूंज रहे थे, ‘एकदूसरे की जरूरतें पूरी करने में जितना मजा है, अपनी इच्छाएं पूरी करने में वह नहीं है.’

लेकिन उस ने तो कभी दूसरों की जरूरतों को जानना भी नहीं चाहा था. उस ने तो यह भी नहीं सोचा कि घर में किस चीज की जरूरत है और किस की नहीं? और एक अमिता है, सुंदर न होते हुए भी उस से कहीं ज्यादा सुंदर है. जिम्मेदारियों के प्रति अमिता की सजगता देख कर सुधांशी के मन में ग्लानि का अनुभव हो रहा था.

‘‘अमिता भाभी, बहुत अच्छी हैं न,’’ सुधांशी ने मौन तोड़ते हुए कहा.

‘‘हां,’’ सुशांत ने ठंडी आह छोड़ते हुए कहा.

उस रात सुधांशी चैन से सो न सकी. सुबह उठी तो उसे तेज बुखार था. सुशांत ने तुरंत डाक्टर को बुलाया. डाक्टर ने दवा दे दी. सुधांशी को आराम करने के लिए कह कर सुशांत दफ्तर चला गया. सुधांशी को बुखार के कारण सिर में बहुत दर्द था. तभी गरिमा लड़खड़ाते हुए आई, ‘‘कैसी तबीयत है, भाभी? लाओ, तुम्हारा सिर दबा दूं,’’ कह कर सिर दबाने लगी.

मां भी बहुत चिंतित थीं. समयसमय पर मां दवा दे रही थीं. आज सुधांशी को महसूस हो रहा था कि उस ने कभी भी इन लोगों की तरफ ध्यान नहीं दिया, लेकिन फिर भी उस के जरा से बुखार ने किस तरह सब को दुखी कर दिया. अपने पैर में चोट होने के बावजूद गरिमा उस का कितना ध्यान रख रही थी. मां भी कितनी परेशान थीं उस के लिए?

3-4 दिन में सुधांशी ठीक हो गई. आज वह सुशांत से पहले ही उठ गई थी. चाय बना कर सुशांत के पास आई, ‘‘उठिए जनाब, चाय पीजिए, आज दफ्तर नहीं जाना है क्या?’’

सुशांत को तो अपनी आंखों पर यकीन नहीं आ रहा था.

‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न, आज इतनी जल्दी कैसे जाग गईं?’’ उस ने हड़बड़ाते हुए पूछा.

‘‘जल्दी कहां, मेरी आंखें तो बहुत देर में खुलीं,’’ शून्य में देखते हुए सुधांशी ने कहा.

आज उस ने घर के सारे काम खुद ही किए थे. काम करने में मुश्किल तो बड़ी हो रही थी, मगर फिर भी यह सब करना उसे अच्छा लग रहा था. आज वह पहली बार नाश्ता बनाने के लिए रसोई में आई थी.

‘‘मांजी, आज से नाश्ता मैं बनाया करूंगी,’’ मांजी के हाथ से बरतन लेते हुए सुधांशी ने कहा.

‘‘बहू, तुम नाश्ता बनाओगी?’’ मां ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मैं जानती हूं, मांजी, मुझे कुछ बनाना नहीं आता, लेकिन आप मझे सिखाएंगी न? बोलिए न मांजी, आप सिखाएंगी मुझे?’’

‘‘हां बहू, अगर तुम सीखना चाहोगी तो जरूर सिखाऊंगी.’’

आज सुशांत को बड़ा अजीब लग रहा था. उस का सारा सामान उसे जगह पर मिल गया था. कपड़े भी सलीके से रखे हुए थे. जब तैयार हो कर नाश्ते के लिए आया तो सुधांशी को नाश्ता लाते देख चौंक गया.

‘‘आज तुम ने नाश्ता बनाया है क्या?’’

‘‘क्यों? मेरे हाथ का बना नाश्ता क्या गले से नीचे नहीं उतर पाएगा?’’ मुसकराते हुए सुधांशी बोली.

‘‘नहीं, यह बात नहीं है,’’ सैंडविच उठाते हुए सुशांत बोला, ‘‘सैंडविच तो बड़े अच्छे बने हैं. तुम ने खुद बनाए हैं?’’ सुशांत ने पूछा, फिर कुछ रुपए देते हुए बोला, ‘‘तुम कल अपनी साडि़यों के लिए पैसे मांग रही थीं न, ये रख लो.’’

सुशांत के दफ्तर जाने के बाद जब सुधांशी ने सैंडविच चखे तो उस से खाए नहीं गए. नमक बहुत तेज हो गया था. उसे सुशांत का खयाल आ गया, जो इतने खराब सैंडविच खा कर भी उस की तारीफ कर रहा था, शायद उस का दिल रखने के लिए सुशांत ने ऐसा किया था. उस की पलकें भीग गईं. प्यार की भावना को देख कर उस का मन श्रद्धा से भर उठा.

उस ने जल्दीजल्दी सारा काम खत्म किया. घर का काम करने में आज उसे अपनत्व का एहसास हो रहा था. फिर उसे सुशांत के दिए गए पैसों का खयाल आया. उस ने गरिमा को साथ लिया

और बाजार गई. सुशांत के दफ्तर से लौटने से पहले उस ने सारा काम निबटा लिया था.

‘‘अपनी साडि़यां ले आईं?’’ शाम को चाय पीतेपीते सुशांत ने पूछा.

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‘‘मेरे पास साडि़यों की कमी कहां है? आज तो मैं ढेर सारा सामान ले कर आई हूं,’’ इतना कह कर उस ने सारा सामान सुशांत के सामने रख दिया, ‘‘यह मां की साड़ी है, यह गरिमा का सूट और यह तुम्हारे लिए.’’

सुशांत उसे अपलक निहार रहा था. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही सुधांशी है, जिसे अपनी जरूरतों के अलावा कुछ सूझता ही नहीं था. आज उसे सुधांशी पहले से कहीं अधिक सुंदर लगने लगी थी.

‘‘अपने लिए कुछ नहीं लाईं?’’ प्यार से पास बिठाते हुए सुशांत ने पूछा.

‘‘क्या तुम सब लोग मेरे अपने नहीं हो? सच तो यह है कि आज पहली बार ही मैं अपने लिए कुछ ला पाई हूं. यह सामान ला कर जितनी खुशी मुझे हुई है उतनी कई साडि़यां ला कर भी न मिल पाती. सच, आज ही मैं प्यार का वास्तविक मतलब समझ पाई हूं.

‘‘प्यार एक भावना है, समर्पण की चेतना, खो जाने की प्रक्रिया, मिट जाने की तमन्ना. इस का एहसास शरीर से नहीं होता, अंतर्मन से होता है, हृदय ही उस का साक्षी होता है,’’ कह कर सुधांशी ने अपना सिर सुशांत के सीने पर रख दिया.

Serial Story: एहसास (भाग-2)

लेखिका- रश्मि राठी

सोचने लगा कि अगर वह सुशी की तरह जिद करेगा तो बात और बिगड़ जाएगी. अगर उसे अपने फर्ज का एहसास नहीं तो क्या वह भी अपना फर्ज भूल जाएगा? उसे सुशी के साथ किए गए अपने व्यवहार पर गुस्सा आने लगा था. इसी कशमकश में उसे पता ही नहीं चला कि सूरज निकल आया और उस ने पूरी रात यों ही काट दी.

आज उस का दफ्तर जाने को बिलकुल मन नहीं हो रहा था. मन ही मन उस ने तय कर लिया था कि वह सुधांशी को समझा कर वापस ले आएगा. सुशी के बिना उसे एकएक पल भारी पड़ रहा था. उसे लग रहा था कि उस की दुनिया एक वृत्त के सहारे घूमती रहती है, जिस का केंद्रबिंदु सुशी है.

उधर सुशी भी कम दुखी न थी. लेकिन उस का अहं उस के और सुशांत के बीच दीवार बन कर खड़ा था. उसे लग रहा था जैसे हर पल सुशांत उस का पीछा करता रहा हो या शायद वह ही सुशांत के इर्दगिर्द मंडराती रही हो. अपने खयालों में खोई हुई ही थी कि मां ने बताया, ‘‘नीचे सुशांत आया है. तुम्हें बुला रहा है.’’

उसे तो अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. जल्दीजल्दी तैयार हो कर नीचे आई.

‘‘मैं तुम्हें लेने आया हूं. अगर तुम खुशी से अपने मांबाप के पास रहने आई हो, तो ठीक है, लेकिन अगर नाराज हो कर आई हो तो अपने घर वापस चलो,’’ सुशांत ने अधिकार से सुधांशी का हाथ पकड़ते हुए कहा.

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सुशांत को इस तरह मिन्नत करते देख उस के मन में फिर अहं जाग उठा, ‘‘मैं उस घर में बिलकुल नहीं जाऊंगी.

तुम इसलिए ले जाना चाहते हो ताकि अपनी मांबहन के सामने मुझे लज्जित कर सको.’’

‘‘तुम पत्नी हो मेरी और तुम्हारा पति होने के नाते इतना तो हक है मुझे कि तुम्हारा हाथ पकड़ कर जबरदस्ती ले जा सकूं. बाहर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं. अपना सामान बांध कर आ जाओ,’’ कह कर सुशांत कमरे से बाहर निकल गया.

जाने की खुशी तो सुधांशी को भी कम नहीं थी, वह तो सुशांत पर सिर्फ यह जताना चाहती थी कि उसे उस का घर छोड़ने का कोई अफसोस नहीं था.

घर पहुंच कर सुशांत ने सुधांशी को कुछ नहीं कहा. मामला शांत हो गया. अब तो सुशांत ने उसे टोकना भी बंद कर दिया था.

एक दिन सुशांत दफ्तर से लौटा तो देखा, मां रसोई में काम कर रही हैं. पूछने पर पता चला कि गरिमा काम करते हुए फिसल गई थी. पैर में चोट आई है. डाक्टर पट्टी बांध गया है.

‘‘सुधांशी कहां है, मां?’’ सुधांशी को घर में न देख कर सुशांत ने पूछा.

मां ने थोड़े गुस्से में कहा, ‘‘बहू तो सुबह से अपनी किसी सहेली के यहां गई हुई है.’’

शाम के 7 बज रहे थे और सुधांशी का कोई पता न था. तभी दरवाजे की घंटी बजी. उस ने दरवाजा खोला. सामने सुधांशी खड़ी थी.

‘‘अफसोस है, हम लोग फिल्म देखने चले गए थे. लौटतेलौटते थोड़ी देर हो गई. बहुत थक गई हूं आज,’’ पर्स कंधे से उतारते हुए सुधांशी ने कहा.

सुशांत चुप ही रहा. उस ने सुधांशी से कुछ नहीं कहा.

अगले दिन जब सुधांशी कमरे से बाहर आई तो डाक्टर को आते हुए देखा.

‘‘मांजी, अपने यहां कौन बीमार है?’’ उस ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘गरिमा के पैर में चोट लगी है,’’ मां ने सपाट लहजे में उत्तर दिया.

‘‘गरिमा को चोट लगी है और किसी ने मुझे बताया भी नहीं?’’

‘‘तुम्हें शायद सुनने की फुरसत नहीं थी, बहू,’’ मां के स्वर की तल्खी को सुधांशी ने महसूस कर लिया था.

वह तुरंत गरिमा के पास गई, ‘‘अब कैसी हो, गरिमा?’’

‘‘ठीक हूं, भाभी,’’ धीमे स्वर में गरिमा ने जवाब दिया.

‘‘मुझे तो तुम्हारे भैया ने भी कुछ नहीं बताया तुम्हारी चोट के बारे में,’’ सुधांशी ने थोड़ा झेंपते हुए कहा.

‘‘उन्होंने तुम्हें परेशान नहीं करना

चाहा होगा, भाभी,’’ गरिमा ने बात टालते हुए कहा.

मगर आज सुधांशी को लग रहा था कि वह अपने ही घर में कितनी अजनबी हो कर रह गई है. शायद घर वालों की बेरुखी का कारण उसे मालूम था, लेकिन वह जानबूझ कर ही अनजान बनी रहना चाहती थी.

शाम को सुशांत लौटा तो उस ने शिकायत भरे स्वर में कहा, ‘‘तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं कि गरिमा को चोट लगी है?’’

‘‘तुम पहले ही थकी हुई थीं,’’ सुशांत ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, ‘‘और हां, आज शाम को मेरे एक दोस्त ने हमें खाने पर बुलाया है. तैयार हो जाना.’’

घूमने की बात सुनते ही सुधांशी खुश हो गई. जल्दी से अंदर जा कर तैयार होने लगी. एक पल उसे गरिमा की चोट का खयाल भी आया मगर फिर उस ने नजरअंदाज कर दिया.

‘‘भई, खाने में मजा आ गया. भाभीजी तो बहुत अच्छा खाना पकाती हैं,’’ सुशांत ने उंगलियां चाटते हुए कहा, ‘‘तुम तो बहुत खुशकिस्मत हो, हर्षल, जो तुम्हें इतना अच्छा खाने को मिल रहा है.’’

‘‘यार, तुम भी तो कम नहीं हो. इतनी सुंदर भाभी हैं हमारी. जितनी सुंदर वे खुद हैं उतना ही अच्छा खाना भी पकाती होंगी,’’ हर्षल ने हंसते हुए कहा, ‘‘अमिता, खाना तो हो गया है. अब जरा हम लोगों के लिए कुछ मिठाई भी ले आओ.’’

अमिता मिठाई लाने चली गई, ‘‘और भाभीजी, अब आप कब हमें अपने हाथ का बना खाना खिला रही हैं?’’ हर्षल ने सुधांशी से पूछा.

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सुधांशी ने सुशांत की तरफ देखा और झेंप गई. अमिता का घर देख कर उसे खुद पर शर्म आ रही थी. अमिता सांवली थी और दिखने में भी कोई खास न थी, लेकिन उस ने अपना पूरा घर जिस सलीके से सजा रखा था उस से उस की सुंदरता का परिचय मिल रहा था. सारा खाना भी अमिता ने खुद ही बनाया था. लेकिन उस ने तो कभी खाना बनाने की जरूरत ही नहीं समझी थी. सुशांत को इस तरह अमिता के खाने की प्रशंसा करते देख उसे शर्मिंदगी का एहसास हो रहा था. तभी अमिता मिठाई ले आई. सब को देने के बाद एक टुकड़ा फालतू बचा था, ‘‘लो हर्षल, इसे तुम ले लो,’’ अमिता ने मिठाई हर्षल को देते हुए कहा.

‘‘भई, नहीं, तुम ने इतनी मेहनत की है, इस पर तुम्हारा ही हक है,’’ इतना कह कर हर्षल ने मिठाई का टुकड़ा अमिता के मुंह में रख दिया.

आधा टुकड़ा अमिता ने खाया और आधा हर्षल को खिलाती हुई बोली, ‘‘मेरी हर चीज में आधा हिस्सा तुम्हारा भी है.’’

यह देख सभी लोग हंस पड़े.

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Serial Story: एहसास (भाग-1)

लेखिका- रश्मि राठी

कितने चाव से इस घर में सुधांशी बहू बन कर आई थी. अपने मातापिता की इकलौती बेटी होने के कारण लाड़ली थी. उस के मुंह से बात निकली नहीं कि पूरी हो जाती थी. ज्यादा आजादी की वजह से बेपरवा भी बहुत हो गई थी. मां जब कभी पिताजी से शिकायत भी करतीं तो वे यही कह कर टाल देते, ‘‘एक ही तो है, उस के भी पीछे पड़ी रहती हो. ससुराल जा कर तो जिम्मेदारियों के बोझ तले दब ही जाना है. अभी तो चैन से रहने दो.’’

मां बेचारी मन मसोस कर रह जातीं.

आज उस ने अपनी ससुराल में पहला कदम रखा था. पति एक अच्छी फर्म में मैनेजर के पद पर कार्यरत थे. घर में एक ननद और सास थी.

शादी के बाद 1 महीना तो मानो पलक झपकते ही बीत गया. घर में सभी उसे बेहद चाहते थे. नईनवेली होने के कारण कोई उस से काम भी नहीं करवाता था. सुशांत भी उस का पूरा ध्यान रखता. उस की हर फरमाइश पूरी की जाती. सुधांशी भी नए घर में बेहद खुश थी. उस की ननद गरिमा दिनभर काम में लगी रहती, मगर भाभी से कभी कुछ नहीं कहती.

सुशांत का खयाल था कि धीरेधीरे सुधांशी खुद ही कामों में हाथ बंटाने लगेगी, लेकिन सुधांशी घर का कोई भी काम नहीं करती थी. उस की लापरवाही को देख कर सुशांत ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा, ‘‘देखो सुशी, गरिमा मेरी छोटी बहन है. उस के सिर पर पढ़ाई का बोझ है और फिर इस उम्र में मां से भी ज्यादा काम नहीं हो पाता. तुम कामकाज में गरिमा का हाथ बंटा दिया करो.’’

‘‘भई, मैं ने तो अपने मायके में कभी एक गिलास पानी का भी नहीं उठाया और फिर मैं ने नौकरानी बनने के लिए तो शादी नहीं की,’’ अदा से अपने बाल संवारती हुई सुधांशी ने जवाब दिया.

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सुशांत को उस से ऐसे जवाब की जरा भी उम्मीद न थी. फिर भी उस ने गुस्से पर काबू करते हुए कहा, ‘‘घर का काम करने से कोई नौकरानी नहीं बन जाती, फिर नारी का पूर्ण सौंदर्य तो इसी में है कि वह अपने साथसाथ घर को भी संवारे.’’

सुधांशी ने उस की बात का कोई जवाब न दिया और मुंह फेर कर सो गई. सुशांत ने चुप रहना ही उचित समझा. सुबह जब वह उठी तो सुशांत दफ्तर जा चुका था. सुधांशी को ऐसी उम्मीद तो जरा भी न थी. उस ने तो सोचा था कि सुशांत उसे मनाएगा. दिनभर बिना कुछ खाएपीए कमरा बंद कर के लेटी रही. गरिमा ने उसे खाना खाने के लिए कहा भी, मगर उस ने मना कर दिया.

‘‘भाभी सुबह से भूखी हैं, उन्होंने कुछ नहीं खाया,’’ शाम को सुशांत के लौटने पर गरिमा ने उसे बताया.

सुशांत तुरंत उस के कमरे में गया और स्नेह से सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘क्या अभी तक नाराज हो. चलो, खाना खा लो.’’

‘‘मुझे भूख नहीं है, तुम खा लो.’’

‘‘अगर तुम नहीं खाओगी तो मैं भी कुछ नहीं खाऊंगा. अगर तुम चाहती हो कि मैं भी भूखा ही सो जाऊं तो तुम्हारी मरजी.’’

‘‘अच्छा चलो, मैं खाना लगाती हूं,’’ मुसकराते हुए सुधांशी उठी. बात आईगई हो गई. इस के बाद तो जैसे उसे और भी छूट मिल गई. रोज नईनई फरमाइशें करती. खाली वक्त में घूमने चली जाती. घर का उसे जरा भी खयाल न था. कई बार सुशांत के मन में आता कि उसे डांटे लेकिन फिर मन मार कर रह जाता.

आज सुशांत को दफ्तर जाने में पहले ही देर हो रही थी. उस ने कमीज निकाली तो देखा, उस में बटन नहीं थे. झल्ला कर सुधांशी को आवाज दी, ‘‘तुम घर में रह कर सारा दिन आईने के आगे खुद को निहारती हो, कभी और कुछ भी देख लिया करो. मेरी किसी  भी कमीज में बटन नहीं हैं. क्या पहन कर दफ्तर जाऊंगा?’’

‘‘लेकिन मुझे तो बटन लगाना आता ही नहीं. गरिमा से लगवा लो.’’

‘‘तुम्हें आता ही क्या है? सिर्फ शृंगार करना,’’ कह कर सुशांत बिना बटन लगवाए ही दफ्तर चला गया.

आज उस का मन दफ्तर में जरा भी नहीं लग रहा था. उसे महसूस हो रहा था कि शादी कर के भी वह संतुलनपूर्ण जीवन नहीं बिता पा रहा है. उस ने जैसी पत्नी की कल्पना की थी उस का एक अंश भी उसे सुधांशी में नहीं मिल पाया था. दिखने में तो सुधांशी सौंदर्य की प्रतिमा थी. किसी बात की कोई कमी न थी, उस के रूप में. लेकिन जीवन बिताने के लिए उस ने सिर्फ सौंदर्य प्रतिमा की कल्पना नहीं की थी. उस ने ऐसे जीवनसाथी की कल्पना की थी जो मन से भी सुंदर हो, जो उस का खयाल रख सके, उस की भावनाओं को समझ सके.

‘‘अरे यार, क्या भाभी की याद में खोए हुए हो?’’ हर्षल की आवाज ने उसे चौंका दिया.

‘‘हां, नहीं, नहीं तो.’’

‘‘यों हकला क्यों रहे हो? क्या शादी के बाद हकलाना भी शुरू कर दिया?’’ हर्षल ने छेड़ते हुए कहा, ‘‘कभी भाभीजी को घर भी ले कर आओ या उन्हें घर में छिपा कर ही रखोगे?’’

‘‘नहीं यार, यह बात नहीं है. किसी दिन समय निकाल कर हम दोनों जरूर आएंगे,’’ सुशांत ने उठते हुए कहा.

आज उस का मन घर जाने को नहीं हो रहा था. खैर, घर तो जाना ही था. बेमन से घर चल दिया.

‘‘भैया, तुम्हारे जाने के बाद भाभी मायके चली गईं,’’ घर पहुंचते ही गरिमा ने बताया.

‘‘बहू बहुत गुस्से में लग रही थी, बेटा, क्या तुम से कोई बात हो गई?’’ मां ने घबराते हुए पूछा.

‘‘नहीं, नहीं तो, यों ही चली गई होगी. बहुत दिन हो गए न उसे अपने मातापिता से मिले,’’ सुशांत ने बात संभालते हुए कहा.

‘‘भैया, तुम्हारा खाना लगा दूं?’’

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‘‘नहीं, आज भूख नहीं है मुझे,’’ कह कर सुशांत अपने कमरे की तरफ बढ़ गया. बिस्तर पर अकेले लेटेलेटे उसे सुधांशी की बहुत याद आ रही थी.

याद करने पर बीते हुए सुख के लमहे भी दुख ही देते हैं. ऐसा ही कुछ सुशांत के साथ भी हो रहा था. सुशांत जानता था कि जब तक वह सुशी को लेने नहीं जाएगा वह वापस नहीं आएगी. लेकिन वह ही उसे लेने क्यों जाए? गलती तो सुशी की है. जब उसे ही परवा नहीं, तो वह भी क्यों चिंता करे? लेकिन उस का मन नहीं मान रहा था. बिस्तर से उठ कर गैलरी में आ कर टहलने लगा.

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#lockdown: अचानक इतना साफ कैसे हो गया गंगा-यमुना का पानी, विशेषज्ञ भी हैं हैरान

कोरोना वायरस की वजह से देश की लगभग 1.3 अरब आबादी, घरों में ही सिमटी हुई है. लोग सबकुछ सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकी एक नौर्मल लाइफ जी सकें. वहीं दूसरी तरफ प्रकृति खुद को बैलेंस करने में लगी है.

जी हां दोस्तों, लौकडाउन की वजह से पाल्यूशन में काफी कमी देखी गई है. अब रात को आसमान साफ दिखने लगा है और चांद-तारों का दिदार भी होने लगा है. ऐसा ही कुछ नज़ारा है यमुना नदी का, जो पाल्यूशन की वजह से नाले के रूप में बदल गई थी. लेकिन लौकडाउन ने जैसे यमुना नदी की काया ही पलट दी. आपको जानकर खुशी होगी कि इस समय यमुना नदी का पानी काफी साफ हो गया है. वही यमुना नदी जिसे पाल्यूशन ने बदबूदार बना दिया था, लेकिन अब वहां का वातावरण खुशबूदार हो गया है. कोरोना वायरस की वजह से 21 दिनों के लौकडाउन का यमुना नदी पर ख़ास असर देखने को मिला है.

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बता दें कि, दिल्ली में यमुना नदी  के 22 किलोमीटर सफर के दौरान 18 गंदे नाले इसमें मिल जाते हैं. साथ ही यमुना नदी को गंदा करने में सबसे बड़ा हाथ औद्योगिक प्रदूषण का है. फिलहाल ये कारखाने बंद हैं इसलिए यमुना नदी का पानी साफ नजर आ रहा है.

अगर बात करें गंगा नदी की तो यहां भी कुछ ऐसा ही नज़ारा है. विशेषज्ञों का मानना है कि देशभर में लौकडाउन के बाद से गंगा नदी की स्वच्छता में काफी सुधार देखने को मिला है, क्योंकि गंगा नदी में कारखानों का कचरा गिरना कम हो गया है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों की माने तो, लौकडाउन के बाद ज्यादातर केद्रों में गंगा नदी के पानी को नहाने लायक पाया गया है. वहीं गंगा नदी के 36 निगरानी इकाइयों में करीब 27 बिन्दुओं पर पानी की गुणवत्ता नहाने, वन्यजीव और मछली पालन के लिए अनुकूल पाई गई है.

इससे पहले की बात करें तो उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश में नदी के प्रवेश करने के कुछ स्थानों को छोड़कर, बंगाल की खाड़ी में गिरने तक आने वाले रास्ते में कहीं भी नहाने लायक नहीं पाया गया था. विशेषज्ञों का कहना है कि औद्योगिक क्षेत्र बंद होने के कारण गंगा नदी का पानी साफ हुआ है. साथ ही लौकडाउन की वजह से आने वाले कुछ दिनों में पानी की क्वालिटी में और सुधार हो सकता है.

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#coronavirus: लॉकडाउन से कैसे कोरोना को भगा सकते है ! 

वैश्विक महामारी के इस दौर में पुरे विश्व में लॉक डाउन लगा हुआ है , दुनिया का 90 प्रतिशत भाग आंशिक या पूर्ण लॉक डाउन लगा हुआ है, वह10 प्रतिशत भाग कोरोना से कोरोना से अपने अपने तरीके से कोरोना से लड़ाई लड़ रहे है. तो आइये जानते है लॉक डाउन से कैसे विश्व से महामारी को भगाया जा सकता है .

1. दूसरे देशों से तेजी से लॉकडाउन लागू हुआ

जिन देश ने लॉक डाउन समय रहते नहीं किया उनका हालत आप देख सकते है. भारत ने दूसरे देशों से लॉकडाउन को लागू करने पर तेजी से काम किया.इसलिए अभी भी हालत बतर नहीं है . देश में समय से लॉकडाउन हुआ है तो उसका नतीजा भी सामने आएगा. कोरोना का सामुदायिक प्रसार पर रोक लगाना संभव हुआ है. अचानक लॉक डाउन होने से समाज के हर वर्ग के सामने  कुछ परेशानियां जरूर आई है , लेकिन आप स्वास्थ्य रहेंगे  तो वह परेशानियां भी दूर हो जाएगी. जीवन अनमोल है.इसे बचाना जरुरी है.

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2. समय पर लॉक डाउन नहीं तो स्थिति बना गंभीर

अमेरिका, इटली , स्पेन ,फ़्रांस और विट्रेन की स्वास्थ्य सुविधाएं हमारे देश से बहुत ही बेहतर है , लेकिन इन देशों ने समय रहते लॉक डाउन का फैसला नहीं किया , जिसका परिणाम आज यहाँ कोरोना समुदाय स्तर पर पहुंच गया है . जिससे कोरोना मरीजों की संख्यों निरंतर बढ़ रही है. अगर अपना देश समय पर लॉक डाउन नहीं करता और जो स्थिति अमेरिका में है वह स्थिति भारत में बनती, तो क्या होता आप सोच सकते है, यहां तबाही आ सकती थी.

3. समुदाय स्तर पर वायरस को फैलने से रोकना है

लॉक डाउन को इस लिए ही लागू किया गया कि सामाजिक दुरी का पूरा ख्याल रखते हुए बीमारी को फ़ैलाने से रोका जा सके और संक्रमित लोगो को अलग आइसोलेट किया जा सके. कोरोना का वायरस लोगो से लोगो में ना फैले और  समुदाय में वायरस न फ़ैल सके . जिस देश में समुदाय में वायरस घूमता रहा वहां कोरोना का संक्रमण तेजी से फैला है और रोगियों का हालत बहुत बुरा हो चूका है .

4. सबका मदद करना है और कोरोना को हराना है

लॉकडाउन एक मुश्किल समय होता है. लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है. लेकिन बीमारी से मुकाबला करने के लिए यह जरूरी है. हम बात को समझ कर हम खुद को अपने समुदाय को बीमारी से बचा सकते हैं.  भारत की आबादी बहुत ज्यादा है. घनी आबादी की वजह से कई लोग लॉकडाउन में जहाँ -तहा फंस गए है , आये दिनों इन्हे विभिन्न रूप में देख भी गया. सरकार और सामजिक संस्थान अपने अपने स्तर पर इन लोगो का मदद कर रहे है.  नियम अनुसार लॉकडाउन को बनाये हुए है. क्यों कि कोरोना को हराना है और  हर किसी को सुरक्षित रहना है.

5. WHO ने देश में जारी लॉकडाउन का समर्थन किया

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोनावायरस से मुकाबले के लिए भारत की कोशिशों की तारीफ की है। डब्ल्यूएचओ के विशेष प्रतिनिधि डॉ. डेविड नवारो ने एक इंटरव्यू में कहा कि यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देशों ने जहां कोरोना को गंभीरता से नहीं लिया, वहीं भारत में इस पर तेजी से काम हुआ। कोरोना से मुकाबले के लिए मोदी सरकार की तरफ से उठाए गए सख्त कदमों की सराहना की। लॉकडाउन को लेकर लोगों को होने वाली परेशानियों पर उन्होंने कहा कि तकलीफ जितनी ज्यादा होगी, उससे उतनी ही जल्दी निजात मिलेगी.

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6. 59 हजार लोगो का जान बचा

‘इम्पिरियल कॉलेज लंदन’ ने अपने इसी सोमवार को एक अध्ययन में यह माना है कि  लॉक डाउन के कारण  59 हजार लोगो का जान अब तक बचाया सका है. अध्ययन में यह कहा गया है कि‘‘कम से कम मार्च के अंत तक लागू बंद के मद्देनजर हमें अनुमान है कि इससे सभी 11 देशों में 31 मार्च तक 59,000 लोगों की मौत टाली जा सकी.  अध्ययन में कहा गया है कि इटली में 38,000 लोगों , स्पेन में करीब 16,000, फ्रांस में 2,500, बेल्जियम में 560, जर्मनी में 550, ब्रिटेन में 370, स्विट्जरलैंड में 340, आस्ट्रिया में 140, स्वीडन में 82, डेनमार्क में 69 और नॉर्वे में 10 लोगों का जीवन बचाए जाने का अनुमान लगाया है.

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