#lockdown: फैमिली को परोसें बेसन वाला करेला

करेला हर किसी को पसंद नही आता, लेकिन उसे अगर टेस्टी तरीके से और रेसिपी को थोड़ा चेंज करके बनाया जाए तो करेला सभी का फेवरेट हो सकता. इसीलिए आज हम आपको नए तरीके से करेला बनाना सिखाएंगे जिसे खाने के बाद करेला आप के घरवालों की फेवरेट सब्जी बन जाएगी.

हमें चाहिए

250 ग्राम करेला

2 बड़े चम्मच बेसन

1 कप लच्छों में कटा प्याज

1 छोटा चम्मच सरसों

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2-3 साबूत लालमिर्च

1 छोटा चम्मच गरममसाला

1 छोटा चम्मच हल्दी

1 छोटा चम्मच लालमिर्च कुटी

थोड़ा सा तेल तलने के लिए

1-2 हरीमिर्चें

1 टमाटर

नमक स्वादानुसार.

बनाने का तरीका

करेलों को धो कर और छील कर लंबाई में टुकड़े कर लें. एक पैन में पानी डाल उस में थोड़ा सा नमक व हलदी डाल कर करेलों को भिगो दें.

एक पैन में 2 चम्मच तेल गरम कर सरसों भूनें. फिर बेसन डाल कर सुनहरा होने तक भूनें. प्याज के लच्छे डालें और नर्म होने तक पकाएं. टमाटर के टुकड़े काट कर इस में मिला दें.

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जब टमाटर कुछ गल जाएं तो थोड़ा सा पानी डाल कर कुछ देर के लिए ढक कर पकाएं. एक पैन में तेल गरम कर करेलों को पानी से निकाल कर गरम तेल में सुनहरा होने तक तलें.

तले करेलों को बेसन में डाल कर अच्छी तरह मिलाएं. सारे मसाले मिक्स करें और कुछ देर ढक कर पकाएं और फिर गरमगरम परोसें.

Edited by Rosy

#coronavirus: मास्क को लेकर लोगों में होने वाली गलतफहमियां और उनके उपाय

कोरोना वायरस के इलाज पर रिसर्च जारी है पर जब तक इसका पक्का इलाज नहीं मिलता तब तक इससे बचाव ही सबसे अच्छा उपाय है.

इस वायरस के  फैलने के बाद से लोगों के बीच जो  सबसे बड़ी  चिंता है वह मास्क पहनने की है. इस वायरस से बचाव के लिए मास्क बहुत असरदार होता है लेकिन मास्क  को लेकर लोगों में बहुत सी गलतफहमियां है. कौन सा मास्क use करें ,उसे  कब लगाये , कैसे लगाएं और इसे पहनने का क्या सही तरीका है?

आइये जानते है-

1-     कोरोना वायरस से बचाव में मास्क कितना जरूरी है और  किन-किन लोगों को और कब-कब  मास्क लगाना चाहिए?

लोगों में एक प्रकार का फोबिया या  एक प्रकार की सोच  बनी है की  मास्क तो पहनने ही है. उसके लिए लोग मार्केट में मास्क  खरीदने जा रहे हैं. यहां तक कि कुछ शॉप्स वाले मास्क ब्लैक में बेच रहे हैं और लोग  महंगे दामों पर खरीद भी रहे हैं.

इस बारे में सर गंगा राम हॉस्पिटल के वाइस चेयरमैन  डॉक्टर एस. पी ब्योत्रा का कहना है की मास्क इतना इंपोर्टेंट नहीं है कि आप सोते- बैठते, खाते-पीते हमेशा मास्क लगाये रहे. कुछ लोग जो घर में हैं  वो  भी मास्क लगाकर ही बैठे हैं. इसकी इतनी जरूरत नहीं है क्योंकि कोरोना वायरस की एक खासियत है कि यह हवा में नहीं पनपता.

यह तब  फैलता है जब कोई पेशेंट खांसता  है. जब कोई पेशेंट खांसता  है तो उसके मुंह से छोटे- छोटे से पानी के droplets निकलते है .ये 3 मीटर की दूरी पर सामने खड़े इंसान को लग सकते हैं.

इसलिए इस बात का ध्यान रखे की-

1-अगर आप  किसी ऐसे पेशेंट के साथ खड़े हैं जो  खांस  रहा है तब उसके लिए आप मास्क यूज कर सकते हैं.

2-उन लोगों के लिए भी जिनको जुखाम या खांसी है, वह लोग भी बात करने के दौरान मास्क का यूज करें क्योंकि जब हम मास्क पहन के छीकेंगे या खासेंगे तो हमारे मुंह से निकलने वाले droplets मास्क में रुक जायेंगे और सामने  वाला सुरक्षित रहेगा.

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3- आप अगर किसी ऐसे पेशेंट की तीमारदारी कर रहे हैं जिसको खांसी या जुखाम है तो आप मास्क पहन ले.

4- किसी ऐसी जगह जाने पर भी मास्क पहने जहाँ  हमें पता  नहीं है कि वहां किस तरह के पेशेंट हैं.

2– कौन -सा मास्क पहनना चाहिए?

मार्केट में बहुत तरह के मास्क आ रहे हैं. लोगों  के दिमाग में एक सोच बस गयी है  कि जो मास्क जितना ज्यादा महंगा होगा वह उतना ही ज्यादा बढ़िया होगा .

लोग सोचते हैं कि N95 मास्क , वह महंगा है तो बढ़िया है …….. इसके लिए एक बात जानना जरूरी है कि इसके लिए सिर्फ N95  मास्क ही use  करें  ऐसा कोई जरूरी नहीं है.

इस वायरस से बचने के लिए आप  नार्मल सर्जिकल मास्क भी use कर सकते है जिसे  ऑपरेशन के दौरान डॉक्टर्स लोग पहनते हैं.  एक बात हमेशा ध्यान रखें कि अगर हम इन मास्क  को यूज कर रहे हो तो उसका इस्तेमाल सिर्फ 6 से 8 घंटे तक ही करें और उसके बाद उसको हटा दें क्योंकि वह इन्फेक्टेड हो जाता है.अगर lockdown के दौरान आपके पास और मास्क नहीं है तो आप इन्ही को अच्छे से धुल कर सुखा ले और फिर उपयोग में ले आये.

3-मास्क को इस तरह से करें इस्तेमाल और इस तरह फेंके-

– मास्क पहनने से पहले अपने हाथों को सैनिटाइजर (Alcohol-based Sanitizer) या साबुन और पानी से धोएं

-एक चीज़ का ध्यान रखे अगर आप मास्क  यूज कर रहे हैं तो इसे टच नहीं करना है और अगर टच हो गया है तो अपने हाथों को अच्छे से sanatize कर ले या धो ले.

– इस बात का पूरा ध्यान रखें कि मास्क को नाक से लेकर पूरा चिन तक कवर करें. क्योंकि जो हमारे यह एरिया होते हैं जैसे मुंह और नाक जब हम कभी खांसते  हैं या छीकते हैं तो जो ड्रॉपलेट्स होते हैं वह इसी के थ्रू जाते हैं.

– जब आप मास्क का इस्तेमाल कर रहे हों तो मास्क के ऊपरी हिस्से को न छुएं

– जैसे ही कोई मास्क खराब हो, उसे तुरंत बदल दें

-मास्क को बिना ऊपर से पकड़े उतारें

-मास्क को use करने के बाद इसको टेबल पर या घर में कहीं भी hang  करके ना रखे.

– इसे एक बंद कूड़ेदान में डालें और उसके तुरंत बाद हाथ धोएं.

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जानें कहीं Bullying का शिकार तो नहीं आपका बच्चा

आर्यन दिल्ली के एक पब्लिक स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ता है. पढ़ाई में भी अच्छा है और व्यवहारकुशल भी है. हमेशा स्कूल खुशीखुशी जाता था. मगर अचानक स्कूल जाने से कतराने लगा. कभी सिरदर्द का बहाना बनाने लगा तो कभी बुखार होने का. 2 दिन से आर्यन फिर स्कूल नहीं जा रहा था. कारण था वह जब स्कूल में रेस प्रतियोगिता में फर्स्ट आने ही वाला था कि तभी उसी की क्लास के एक बच्चे ने टंगड़ी मार कर उसे गिरा दिया, जिस से उस के दोनों घुटने बुरी तरह छिल गए. आर्यन की मां रूपा कहती हैं कि पता नहीं स्कूल में बच्चे आर्यन को क्यों तंग करते हैं.

इसी तरह मोनिका कहती हैं कि उन्हें काफी समय तक पता ही नहीं चला कि उन की बेटी वंशिका स्कूल में टिफिन नहीं खा पाती है. उसी की क्लास का एक बच्चा उस का टिफिन चुपके से खा लेता. आर्यन और वंशिका की तरह और न जाने कितने बच्चे स्कूल में अपने साथी बच्चों द्वारा प्रताडि़त होते होंगे. कोलकाता में तो एक 9 वर्ष की बच्ची को उस की सीनियर्स ने बाथरूम में ही बंद कर दिया और वहीं उस की मृत्यु हो गई. ऐसी घटनाएं लगभग सभी स्कूलों में घटती हैं. कहींकहीं ये बोलचाल के जरीए या फिर हाथपैर चला कर शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखने को मिलती हैं. रूपा और मोनिका की तरह हर बच्चे की मां की दिनचर्या बच्चे को समय से उठाने, तैयार करने, बैग, टिफिन, पानी की बोतल थमाने व स्कूल बस में चढ़ाने और फिर दोपहर को घर लाने तक ही सीमित होती है. पर क्या आप ने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि खुशीखुशी स्कूल जाने वाला आप का बेटा या बेटी अचानक पेट दर्द, सिरदर्द आदि बहाना कर स्कूल जाने से कतराने लगी है. ऐसा है तो आप सतर्क हो जाएं. हो सकता है कि आप का बेटा या बेटी स्कूल में बुलिंग की शिकार हो रही हो यानी कोई बच्चा अपनी बात मनवाने या फिर वैसे ही मजा लेने के लिए बेवजह उसे तंग कर रहा हो. यानी वह बुली हो सकता है.

कौन होते बुलीज

कैलाश अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार मनोचिकित्सक डा. अजय डोगरा कहते हैं कि अकसर देखने में आता है कि बुली बच्चे डौमिनेटिंग होते हैं. ये शारीरिक रूप से शक्तिशाली भी होते हैं. ऐसे बच्चे अपने दोस्तों, स्कूल के साथियों और छोटे बच्चों के बीच अपनी धाक जमाने के लिए दादागीरी करते हैं. पासपड़ोस और स्कूल में ये लड़ाकू बच्चों के रूप में जाने जाते हैं. ऐसे बच्चे जो स्कूल में दादागीरी करते हैं वे अकेले भी हो सकते हैं और 3-4 के ग्रुप में भी, जिन्हें मिल कर अपने से कमजोर बच्चों को प्रताडि़त करने में खूब मजा आता है.

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बुलिंग के शिकार बच्चों में निम्न लक्षण पाए जाते हैं:

डा. अजय डोगरा कहते हैं कि बुलिंग के शिकार बच्चों को बारबार बुखार आता है. स्कूल जाने से कतराते हैं, पेट दर्द, सिरदर्द का बहाना बनाते हैं. स्कूल जाने के लिए अपना दैनिक कार्य बहुत धीरेधीरे करते हैं ताकि स्कूल बस छूट जाए.

अकसर बिस्तर गीला करने लगते हैं.

हमेशा घबराए घबराए से रहते हैं.

पढ़ाई में थोड़ा कमजोर हो जाते हैं अथवा पढ़ाई में मन नहीं लगता.

इन की दिनचर्या में अचानक परिवर्तन आ जाता है.

अचानक पौकेट मनी की मांग करने लगते हैं.

छोटीछोटी बातों पर रोने लगते हैं और कोशिश करते हैं कि उन की बात मान ली जाए.

उन में आत्मविश्वास की कमी आने लगती है. ज्यादा कुछ होने पर डिप्रैशन में भी चले जाते हैं.

 बातों के अलावा यह भी होता है:

पैंसिल बौक्स में टूटी चीजें मिलें या स्कूल बैग से कभी टिफिन बौक्स, कभी पानी की बोतल, कभी किताबकौपी, पैन आदि का गायब हो जाना.

अकसर शारीरिक चोट खा कर आना.

भारत में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि बुलिंग बहुत ही गंभीर समस्या है. लगभग 500 बच्चों पर एक अध्ययन हुआ जिन की उम्र 8 से 12 वर्ष थी. इस से पता चला कि 31.4% बच्चे या तो बोलचाल से या फिर शारीरिक रूप से चोट पहुंचाने की नीयत से शिकार हुए हैं.

बुलिंग के प्रकार

मानसिक बुलिंग: इस तरह की बुलिंग में दादागीरी दिखाने वाले बच्चे अन्य बच्चों को अपने ग्रुप में शामिल नहीं करते. खाना अपने साथ नहीं खाने देते. खेल में भी अपने साथ शामिल नहीं करते. यहां तक कि कोई अफवाह फैला कर उन्हें मानसिक रूप से तंग करते हैं.

वर्बल (मौखिक) बुलिंग: तरहतरह के नामों से पुकारना या उन के पहनावे, शक्लसूरत आदि की हंसी उड़ाना. किसी जाति विशेष के तौरतरीकों के बारे में व्यंग्य करना, मजाक उड़ाना आदि.

फिजिकल बुलिंग: इस में डांटना, मारना, काटना, चुटकी काटना, बाल खींचना, चोट पहुंचाना और धमकी देना शामिल है.

सैक्सुअल बुलिंग: अनचाहे शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करना, यौन रूप से प्रताडि़त करना अथवा इस तरह का कोई कमैंट पास करना आदि.

साइबर बुलिंग: डा. अजय डोगरा कहते हैं कि आजकल इस तरह की बुलिंग टीनऐजर्स में काफी होने लगी है. इंटरनैट पर बुलिंग की परिभाषा है कि एक ऐसा कार्य जिस में किसी एक टीन या टीनऐजर समूह द्वारा किसी अन्य टीनऐजर को इंटरनैट पर, सोशल साइट्स पर या मोबाइल पर संदेशों अथवा चित्रों द्वारा परेशान और उस की व्यक्तिगत सूचना को सार्वजनिक किया जाता है. इस से पीडि़त टीनऐजर अपनेआप को असहज महसूस करने लगता है, कमजोर समझता है. साइबर बुलिंग में चीन और सिंगापुर के बाद भारत तीसरे नंबर पर है.

अकसर यह माना जाता है कि बुलिंग ज्यादातर लड़के ही करते हैं, परंतु ऐसा नहीं है. देखा गया है कि लड़के और लड़कियां दोनों ही बुली होते हैं. यह अलग बात है कि लड़का और लड़की होने के नाते दोनों के तरीके अलगअलग हों. लड़कियां ज्यादा मनोवैज्ञानिक तरीके से तंग करती हैं जैसे सीट पर साथ न बैठने देना, साथ खाना खाने से मना करना, साथ खेलने न देना या किसी पार्टी में निमंत्रण न देना, जबकि लड़के अधिकतर शारीरिक रूप से तंग करते हैं जैसे धक्का देना, गालीगलौज करना आदि.

मातापिता ऐसे करें सहायता

मनोचिकित्सक डा. अजय डोगरा के अनुसार जब आप का बच्चा बुलिंग का शिकार हो तो आप के लिए भी काउंसलिंग की जरूरत है ताकि आप बच्चे पर नाराज न हों. हालांकि मातापिता भी परेशान हो जाते हैं, पर बच्चे के सामने जाहिर न होने दें. आप का दुख बच्चे को हताश कर सकता है. अत: निम्न बातों को अपनाएं ताकि बच्चा बुलिंग का शिकार होने से बच सके:

अपने बच्चे के साथ दोस्ताना व्यवहार करें ताकि आप के और उस के बीच दोस्तों जैसा रिश्ता बन सके. तब वह स्कूल की कोई भी बात कहने से हिचकेगा नहीं. इस तरह उस की प्रत्येक गतिविधि की आप को पूरी जानकारी मिल सकेगी.

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उसे बताएं कि वह बुली से न लड़े. जरूरत हो तो अपने टीचर की सहायता ले.

उसे समझाएं कि वह बहादुरी दिखाए और ऐसे बच्चों की बातों को अनुसनी कर अपने दोस्तों के साथ रहे.

यदि इन तरीके से भी समस्या का समाधान न हो तो बच्चे के साथ स्कूल जा कर प्रिंसिपल या टीचर से चर्चा करें. यदि जरूरी हो तो बुली के मातापिता को स्कूल बुला कर समस्या को हल करें.

न्यू बौर्न बेबी की इन प्रौब्लम से घबराएं नहीं

लेखक -डा. व्योम अग्रवाल

रात के करीब 3 बजे मुझे अंजनी का फोन आया. बड़ी घबराहट भरी आवाज में पहले तो उन्होंने मुझ से असमय फोन करने पर खेद जताया और फिर लगभग रोते हुए बोलीं कि उन का 5 दिन का बच्चा आधे घंटे से बहुत परेशान था. फिर अचानक चीख मार कर रोने लगा. 5 मिनट पहले उस ने पेशाब किया. उस के बाद अब वह आराम से सो रहा है.

दरअसल, उन्हें डर था कि बच्चे के मूत्रमार्ग में कोई रुकावट या इन्फैक्शन है या फिर किडनी की कोई परेशानी है. मैं ने सारी बात सुन कर सांत्वना देते हुए समझाया कि यह नवजातों के लिए बिलकुल सामान्य है. इस का कारण कदाचित यह होता है कि शिशुओं का अपने मूत्र विसर्जन पर नियंत्रण नहीं होता, इसलिए उन का मूत्रमार्ग कस कर बंद होता है, जिस से कि उन का पेशाब हर समय टपकता न रहे. सामान्यतया 2 महीने की उम्र तक यह होना बंद हो जाता है. इस के लिए न तो घबराने की जरूरत है न ही किसी जांच की. यदि अंजनी को यह जानकारी पहले से होती तो कदाचित वह उस के परिजन (और मैं भी) रात में परेशान न होते.

बच्चे का जन्म परिवार में सब को खुशियों से भर देता है. विशेषतया प्रथम बार मातृसुख का अनुभव करने वाली युवतियों के लिए तो यह अविस्मरणीय समय व अनुभव होता है. घर की अनुभवी महिलाएं जैसे दादी, नानी, भाभी, ननद इत्यादि बहुत सीख दे कर मां को असली मातृत्व के लिए तैयार करती हैं व दिनप्रतिदिन आने वाली समस्याओं का सरल उपाय भी बताती रहती हैं. एकल परिवारों में यह कमी प्रथम बार मां बनने वाली युवतियों के द्वारा बारबार महसूस की जाती है और दूसरों से मिलने वाली सलाह भी ठीक है या नहीं, इस का निर्णय कर पाना भी अधिकांश समय संभव नहीं हो पाता.

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1. शिशुओं की सामान्य समस्याएं

अपने लगभग 24 सालों के अनुभव से मैं ने जाना है कि नवजात के अस्पताल से घर जाने के बाद माताएं लगभग एकजैसी परेशानियां अनुभव करती हैं और उस समय डाक्टर से तुरंत संपर्क न होने पर या सही जानकारी के अभाव में बहुत विचलित हो जाती हैं. मातृत्व की दहलीज पर पहला कदम रखने वाली महिलाओं की इसी तरह की मुश्किल को ध्यान में रखते हुए शिशुओं की कुछ सामान्य समस्याओं के बारे में जानकारी दी जा रही है.

2. शरीर पर लाल दाने

कुछ दिन पहले एक बच्चा सांस में दिक्कत के कारण जन्म के 3 दिन बाद तक हमारी नर्सरी में रहा. चौथे दिन बच्चे को मां के पास दूध पिलाने के लिए भेजा गया. कुछ ही देर बाद बच्चे की नानी बहुत गुस्से में नर्सरी में आईं और करीब लड़ते हुए शिकायत करने लगीं कि नर्सरी में बच्चे को जो दवा दी गई उस के कारण उसे ऐलर्जी हो गई है. उस के पूरे शरीर पर खसरे जैसे दाने निकले हुए हैं.

हमारे डाक्टर उसी समय बच्चे के पास गए और उस का अच्छी तरह से परीक्षण किया. फिर हम ने सब परिवार वालों को तसल्ली देते हुए समझाया कि ज्यादातर शिशुओं के शरीर पर

जन्म के दूसरे दिन से लाल दाने दिखाई देने लगते हैं. इन्हें इरीदेमा टौक्सिकम कहा जाता है. इसे वायु के प्रथम संपर्क में आने पर होने वाली ऐलर्जी के रूप में समझा जा सकता है. ये दाने पूर्णरूप से अहानिकारक होते हैं और 6-7 दिनों में अपनेआप ठीक हो जाते हैं.

3. हरे रंग का मल

आमतौर पर बच्चे पहले 2 दिन पहले हरे, काले रंग का मल त्याग करते हैं. अगले कुछ दिनों तक रंग बदलता है और 10 दिन तक यह सामान्य रंग का हो जाता है. सफेद रंग का मल लिवर के रोगों में ही होता है. सामान्य रूप में यदि बच्चा केवल स्तनपान पर है तो वह दिन में कितनी ही बार मल त्याग करे यह चिंता का विषय नहीं होता व केवल स्तनपान कराने वाली मांओं को इस से परेशान नहीं होना चाहिए.

अकसर मांओं को दिनप्रतिदिन बदलते रंग या बारबार दस्त आते देख बहुत चिंता हो जाती है. बारबार यह हर दुग्धपान के बाद मलत्याग उतना ही सामान्य है जितना 3-4 दिन तक पेट का साफ न होना. मैं हर माता को समझाता हूं या बिना पूछे ही यह जानकारी अवश्य देता हूं कि यह कोई घबराने की बात नहीं है, परंतु यदि

शिशु सुस्त दिखे, स्तनपान छोड़ दे या पेशाब करना कम कर दे तो निश्चित रूप से बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए.

4. स्तनपान

एक दिन एक नवजात शिशु की मां ने मुझ से पूछा कि बच्चा केवल स्तनपान करता है पर दिन में 15-20 लंगोट खराब करता है. मेरे पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि वे एक स्तन से दूध पिलाना शुरू करती हैं और 5 से 10 मिनट बाद दूसरे स्तन से दूध पिलाती हैं. उन के अनुसार ऐसा वह स्तन के खाली होने के कारण नहीं, बल्कि एक मुद्रा में बैठने से थक जाने के कारण करती हैं.

वस्तुत: यही बच्चे के ज्यादा बार मलत्याग का कारण है. मां के स्तनों में शुरू का दूध शर्करा से युक्त होता है और बाद में दूध वसा से युक्त. वसा से तृप्ति आती है, जबकि शर्करा ज्यादा होने से ज्यादा मल बनता है. बच्चे के स्वास्थ्य के लिए दोनों मिश्रित और सही मात्रा में होने जरूरी हैं. इसलिए मैं ने उन्हें समझाया कि आगे से उन्हें एक बार में एक स्तन से पूरा दूध पिलाने पर यदि जरूरत रह जाए तो दूसरे स्तन से दूध पिलाना चाहिए. 2 दिन बाद ही उन का फोन आया कि बच्चे में बहुत सुधार लग रहा है.

5. दूध उगलना

शायद ही ऐसा कोई शिशु हो जो दूध न गिराता हो. कुछ सामान्य बालक तो नाक से भी दूध निकाल देते हैं. यदि बच्चे का वजन ठीक बढ़ रहा हो, उसे दूध पीते समय फंदा सा यानी सांस की नली में कुछ अटकना न महसूस होता हो, पेशाब पूरा आता हो, वह दूध पी कर निकालने के बाद भी तुरंत भूखा न हो जाता हो, उस का पेट फूलता न हो, वह चुस्त हो और निकला दूध हरे रंग का न हो तो दूध गिराना या हर बार दूध पी कर थोड़ी उलटी करना बिलकुल सामान्य बात है. बच्चे का वजन न बढ़ना इस बात का सूचक हो सकता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है और डाक्टर से परामर्श की जरूरत है.

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6. सोनेजागने का समय

बच्चे के जन्म के बाद के प्रथम परामर्श में थकी सी प्रतीत होती मांओं की सब से बड़ी परेशानी यह है कि बच्चा दिन में तो दूध पी कर सो जाता है पर रात को हर 10-20 मिनट में उठ जाता है, रोता है और बारबार दूध मांगता है. इस का कारण गर्भावस्था में मां के सोनेजागने के चक्र से जुड़ा है. साधारण भाषा में समझें तो जब मां दिन में चलती है तो शिशु झूला पा कर सो जाता है. रात में मां के लेटने के बाद गर्भस्थ शिशु उठ जाता है और घूमता है, पैर चलाता है और सक्रिय हो जाता है. जन्म के बाद उस की दिनरात की आदतें बदलने में करीब 2 महीने लगते हैं.

अत: रात में बच्चा जागा रहता है और जागे रहने पर उसे 2 ही काम आते हैं- रोना और दूध पीना. यही उस के रात को जागने और रोने का कारण है. मांओं को चाहिए कि वे दिन में विश्राम कर लें ताकि रात को बच्चे को पूर्ण स्तनपान करा पाएं. बीचबीच में हिलाना, कमरे में धीमी रोशनी, धीमा संगीत बच्चे को रात में भी ज्यादा सोने में मदद करते हैं. किसी भी अवस्था में बच्चे का रोज केवल रात में रोने को मां के दूध की कमी नहीं समझा जाना चाहिए और बच्चे तथा मां के स्वस्थ जीवन के लिए 6 माह तक बच्चे को केवल स्तनपान पर ही रखना चाहिए.

7. नवजात लड़की में रक्तस्राव

सरीन को अपनी बच्ची के डायपर को बदलते समय उस के योनिमार्ग से खून आता दिखाई दिया तो वे घबरा गईं. नवजात लड़कियों में जन्म के पहले सप्ताह में माहवारी जैसा रक्तस्राव हो सकता है जो कि 5-6 दिन तक हो सकता है. यह रक्तस्राव कुछ बूंदों जितना होता है और स्वत: ही कुछ दिनों में रुक जाता है. जन्म के बाद मां के हारमोन शरीर से हट जाने से यह होता है और कदापि चिंता का विषय नहीं होता.

मांओें को सलाह दी जाती है कि शिशुओं के विषय में कोई भी समस्या आने पर स्वयं डाक्टर बनने की कोशिश न करें वरन तुरंत बालरोग विशेषज्ञ को दिखाएं.

#lockdown: इन हेयर पैक से करें बालों को स्ट्रेट

स्‍ट्रेट हेयर स्‍टाइल आज कल काफी ट्रेंड में है और यह हर चेहरे पर सूट भी करता है. आजकल हमारे पास स्ट्रेटनर होता है जिसके चलते हम घर पर ही बेहद आराम से जब चाहे तब बालों के स्ट्रेट कर लेते हैं. लेकिन अपने बालों को बार बार इस तरह से स्‍ट्रेट करना बड़ा ही नुकसानदायक हो सकता है. तो ऐसे में आप कुछ नेचुरल तरीका अपना सकती हैं. बालों को स्‍ट्रेट करने के लिये यहां पर कुछ होममेड हेयर पैक दिये जा रहे हैं, तो जरा ध्‍यान दीजिये.

1. आमला पाउडर और‍ शीकाकाई हेयर पैक

आधा कप आमला पाउडर, आधा कप शिकाकाई पाउडर तथा उतनी ही मात्रा चावल के आटे की 1 कटोरे में मिलाएं. अब उसमें 2 अंडा डाल कर पेस्‍ट बना लें. इस पैक को बालों में लगाएं और 1 घंटे बाद सिर धो लें. आप इस पैक को हफ्ते में दो बार लगा सकती हैं. लगातार प्रयोग से आपके बाल अपने आप ही स्‍ट्रेट हो जाएंगे.

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2. केला और पपीता हेयर पैक

1 कटोरे में केला और पपीता मैश कर लीजिये और उसमें 1 चम्‍मच शहद मिला लीजिये और बालों पर लगाकर थोड़ी देर के लिये सुखा लीजिये. जब पैक सूख जाए तब बालों को शैंपू तथा ठंडे पानी से धो कर कंघी कर लीजिये. अपने बालों को तब तक ना बांधिये जब तक की वे पूरी तरह से सूख ना जाएं.

3. मुल्‍तानी मिट्टी और चावल का आटा

1 बड़े कटोरे में 1 कप मुल्‍तानी मिट्टी, 5 चम्‍मच चावल का आटा और 1 अंडा लें. इसमें हल्‍का सा पानी मिलाइये पेस्‍ट तैयार कर लें. इस पेस्‍ट को बालों में लगाने से पहले अपने सिर की गरम तेल से मालिश कीजिये. इस पेस्‍ट को बालों पर 30 मिनट के लिये रखिये और फिर ठंडे पानी से धो लीजिये. इस पैक को हफ्ते में एक बार जरुर लगाइये जिससे आपके बाल स्‍ट्रेट हो सकें.

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4. नारियल और नींबू रस का पैक

1 कप नारियल का दूध लीजिये और उसमें नींबू का रस मिलाइये, अब इसे फ्रिज में करीबन 1 घंटे के लिये रख दीजिये जिससे वह क्रीमी बन जाए. अब इस पैक को अपने बालों तथा सिर की त्‍वचा पर लगाइये और 1 घंटे के लिये गरम तौलिया लपेट लीजिये.

महायोग: धारावाहिक उपन्यास, भाग-22

 अब तक की कथा :

पुलिस ईश्वरानंद के आश्रम में दबिश दे चुकी थी और आश्रम के अंदर जाने का प्रयास कर रही थी. इधर नील और उस की मां को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें. अब तक तो अंधेरा ही था, अब तो सामने गहरी खाई दिखाई दे रही थी. मां के कारण उस ने दिया को हाथ तक न लगाया और अब नैन्सी भी उस के हाथों से फिसल रही थी.

अब आगे…

अचानक दिया आगे बढ़ आई और उस ने सुनहरी पेंटिंग पर लगे हुए बड़े से सुनहरी बटन को दबा दिया. बटन दबाते ही दीवार में बना गुप्त दरवाजा खुल गया. सब की दृष्टि उस गलियारे में पड़ी जो फानूसों से जगमग कर रहा था. ब्रिटिश महिला पुलिस औफिसर एनी गलियारे की ओर बढ़ीं और उन्होंने सब को अपने पीछे आने का इशारा किया. गैलरी पार कर के सब लोग अब एक आलीशान दरवाजे के पास पहुंच गए थे जहां अंदर अब भी रासलीला चल रही थी. यहां भी दिया ने आगे बढ़ कर दरवाजे के खुलने का राज जाहिर कर दिया. दरवाजा क्या खुला, कई जोड़ी आंखें फटी की फटी रह गईं. सबकुछ इतना अविश्वसनीय था कि लोग अपनी पलकें झपकाना तक भूल गए थे.

अपनी अर्धनग्न चहेती शिष्याओं के साथ सामने के बड़े से मंच पर लगभग नग्नावस्था में विराजमान ईश्वरानंद का फूलों, केसर व चंदन से शृंगार किया जा रहा था. सुंदरियां उस के अंग को कोमलता से स्पर्श करतीं, चूमतीं और फिर उसे फूलों से सजाने लगतीं. सब इस कार्यक्रम में इतने लीन थे कि किसी को हौल में पुलिस के पहुंचने का आभास तक न हुआ. सैक्स का ऐसा रंगीला नाटक देख पुलिस भी हतप्रभ थी. इंस्पैक्टर ने साथ आए हुए फोटोग्राफर को इशारा किया और उस का मूवी कैमरा मिनटभर की देरी किए बिना वहां पर घटित क्रियाकलापों पर घूमने लगा.

ब्रिटिश पुलिस के लिए यह सब बहुत आश्चर्यजनक था. इत्र का छिड़काव जैसे ही दिया के नथुनों में पहुंचा उस को छींक आनी शुरू हो गईं. दिया को बचपन से ही स्ट्रौंग सुगंध से एलर्जी थी. छींकतेछींकते दिया बेहाल होने लगी. ईश्वरानंद की लीला में जबरदस्त विघ्न पड़ गया. यह कैसा अन्याय, सब का ध्यान भंग हुआ और उन्होंने पीछे मुड़मुड़ कर देखना शुरू किया. जैसे ही उन की दृष्टि पुलिस वालों पर पड़ी, अब तो मानो वे ततैयों की लपेट में आ गए. ईश्वरानंद अधोवस्त्र संभालता हुआ स्टेज से भागने का प्रयास कर रहा था. जैसे ही ईश्वरानंद ने सीढि़यों से उतरने को कदम बढ़ाया वैसे ही इंस्पैक्टर ने उसे धरदबोचा.

‘‘क्यों, हमें क्यों डिस्टर्ब किया जा रहा है?’’ ईश्वरानंद ने इंस्पैक्टर की बलिष्ठ भुजाओं में से सरकने का प्रयास करते हुए हेकड़ी दिखाने की चेष्टा की.

किसी ने उस की बेवकूफी का उत्तर नहीं दिया. पुलिस अपनी ड्यूटी करती रही. चेलेचांटों सहित उसे एक कतार में खड़ा कर दिया गया. पुलिस के जवान आश्रम के प्रत्येक कमरे में घुस कर तलाशी लेने लगे. सभी संदिग्ध वस्तुओं को जब्त कर लिया गया. बहुत से भारतीय सुरक्षा से जुड़े कागजात, जाली प्रमाणपत्र, जाली पासपोर्ट…और भी दूसरी अवैध चीजें, बिना लाइसैंस की गन्स, और न जाने क्याक्या बरामद कर लिया गया. एक कमरे में से धीमीधीमी सिसकने की आवाजें सुन कर दरवाजा तोड़ डाला गया और उस में से नशे से की गई बद्तर हालत में 3 लड़कियों को निकाला गया जो जिंदा लाश की तरह थीं. उन का कटाफटा शरीर, उन के मुंह पर लगे टेप, आंखों में भय व घबराहट सबकुछ दरिंदगी की कहानी बयान कर रहे थे. दिया ने उन्हें देखा तो घबराहट के कारण उस के मुख से चीख निकल गई. अगर वह फंस गई होती तो आज उस की भी यही दशा होती.

पुलिस गुरुचेलों को गाड़ी में ठूंस कर पुलिस स्टेशन ले गई. दिया दूसरी गाड़ी में उन 3 लड़कियों के साथ बैठ कर पुलिस स्टेशन पहुंची थी. लड़कियों के मुंह पर से टेप हटा दी गई थी परंतु वे कुछ कहनेसुनने की हालत में थीं ही नहीं. ईश्वरानंद, उस के चेलेचेलियां, नील व उस की मां से कोई बात नहीं की गई. उन को यह बता कर मुख्य जेल में भेज दिया गया कि उन का फैसला कोर्ट करेगी. नैन्सी से थोड़ीबहुत पूछताछ की गई और यह कह कर उसे फिलहाल रिहा कर दिया गया था कि जरूरत पड़ने पर उसे कोर्ट या पुलिस के समक्ष हाजिर होना पड़ेगा. धर्म के बारे में दिया से मौखिक व लिखित बयान ले लिए गए थे. एनी ने पहले ही दिया से खुल कर सबकुछ पूछ ही लिया था.

अब दिया को इंडियन एंबैसी ले जाने का समय था.

‘‘कैन आय टौक टू धर्म, प्लीज,’’ दिया ने पुलिस से आग्रह किया.

धर्म को उस के सामने ले आया गया.

‘‘तुम इंडिया चली जाओगी शायद 2-4 दिन में ही?’’

‘‘हूं.’’

‘‘मुझे अपनी सजा भुगतनी है.’’

‘‘हूं.’’

‘‘कुछ तो बोलो, दिया.’’

वातावरण में पसरे मौन में दिया व धर्म की सांसें छटपटाने लगीं. आंसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे. यह कैसा मिलन था? मौन ही उन की जबान बन कर भावनाओं, संवेदनाओं को एकदूसरे के दिलों तक पहुंचा रहा था.

धर्म ने दिया के गालों पर फिसलते आंसुओं को अपनी हथेली में समेट लिया. उसे गले लगाते हुए बोला, ‘‘अपनी गलतियों की सजा पा कर ही मैं भारमुक्त हो सकूंगा, दिया.’’

दिया की आंखें एक बार फिर गंगाजमुना हो आईं.

‘‘नहीं, रोते नहीं, दिया. तुम इंडिया लौट कर जाओगी, मेरी प्रतीक्षा करोगी?’’

दिया चुपचाप उसे देखे जा रही थी.

‘‘मैं जल्दी ही आऊंगा, दिया.’’

‘‘मैं प्रतीक्षा करूंगी.’’

दिया भी इंडियन एंबैसी के लिए निकल पड़ी. 3 दिन तक उसे वहां रखा गया और चौथे दिन उस की फ्लाइट थी. हीथ्रो हवाई अड्डे से सीधे अहमदाबाद की. इधर ईश्वरानंद के परमानंद आश्रम की धज्जियां उड़ गई थीं. देखते ही देखते परमानंद आश्रम के परम आनंद की खबर ब्रेकिंग न्यूज बन कर विश्वभर में फैल गई. लैंड करने के बाद दिया को हवाई अड्डे से निकलने में अधिक समय नहीं लगा. उस ने एंबैसी के अफसर को मना कर दिया था कि कृपया उस के घर पहुंचने की सूचना घर वालों को न भेजें. बाहर निकल कर वह टैक्सी में जा बैठी. भरपूर गरमी, सड़क पर दौड़ती गाडि़यां. दिया ने अपने बंगले की ओर जाने वाली सड़क ड्राइवर को बताई और कुछ ही मिनट में गाड़ी घर के बडे़ से गेट पर थी.

सुबह लगभग 9 बजे का समय. बंगले का गार्ड बगीचे में पानी देते हुए माली से बातें कर रहा था. अचानक उस की दृष्टि दिया पर पड़ी.

‘‘दिया बेबी?’’ वह चौंका. माली की दृष्टि भी ऊपर उठी.

‘‘हां, दिया बेबी ही तो हैं,’’ उस ने गार्ड की बात दोहराई.

गार्ड ने दीनू को आवाज दी, वह बरामदे में भागता आया और तुरंत मुसकराते हुए अंदर की ओर भागा. आश्चर्य और घबराहट से भर कर सभी लोग बरामदे तक भागे आए. यशेंदु भी अपनी व्हीलचेयर पर सब के पीछे तेजी से कुरसी के पहियों को चलाते हुए पहुंचे, दादी भी अपनेआप को धकेलती हुई मंदिर से बरामदे तक न जाने कैसे अपने भगवानज को छोड़ कर आ पहुंची थीं. सब से पीछे कामिनी थी जो शायद कालेज जाने की तैयारी छोड़ कर पति के पीछेपीछे तेजी से आ रही थी. दादी ने सब से आगे बढ़ कर दिया को अपने निर्बल बाहुपाश में जकड़ लिया. उस ने कोई प्रतिकार नहीं किया. स्वयं को दादी की निर्बल बांहों में ढीला छोड़ दिया. कुरसी पर बैठे एक टांगविहीन पापा को और उन के पीछे खड़ी मां की गंगाजमुनी आंखों को देख कर उस की आंखों का स्रोत फिर बहने लगा. दिया के मन में एक टीस सी उठी. वह दादी के गले से हट कर पापा के गले से चिपट गई और हिचकियां भर कर रोने लगी. काफी देर दिया पिता के गले से चिपकी रही. कामिनी ने धीरे से उस के सिर पर हाथ फेरा तो वह पिता से हट कर मां से जा चिपटी. कामिनी ने कुछ नहीं कहा और सहारा दे कर उसे अंदर की ओर ले आई.

दिया सब की आंखों में प्रश्नचिह्नों का सैलाब साफसाफ देख पा रही थी परंतु उत्तर देने वाले की मनोस्थिति देखते हुए सब को अपने भीतर ही प्रश्नों को रोक लेना पड़ा. दादी के मन में तो उत्सुकता, उत्कंठा और उत्साह कलाबाजियां खा रहे थे. दादी जल्दी से कुरसी खिसका कर उस के पास बैठ गईं.

‘‘दिया, नील और तेरी सास तो मजे में हैं न?’’

दादी चाहती थीं कि दिया ससुराल की सारी बातें बताए. आखिर उन की लाड़ली पोती कितने दिनों बाद विदेश से वापस आई थी. छुटकारा न होते देख दिया ने दादी की बात के लिए हां कहा और फिर बोली, ‘‘मां, मैं अपने कमरे में जाना चाहती हूं,’’ कह कर वह ऊपर अपने कमरे में आ गई.

दीनू कई बार ऊपर बुलाने आया परंतु दिया का मन बिस्तर से उठने का नहीं हुआ. नीचे सब की आंखों में प्रश्न भरे पड़े थे. दादीमां बड़ी बेचैन थीं, दिया से ढेर सी बातें करना चाहती थीं. कामिनी ने नीचे आ कर सब को समझाने की चेष्टा की.

‘‘अभी बहुत थकी हुई है. आराम कर के फ्रैश हो जाएगी तो अपनेआप नीचे आ जाएगी.’’

-क्रमश:

 

महायोग: धारावाहिक उपन्यास, भाग-15

अचानक धर्मानंदजी दिखाई पड़े. गौरवपूर्ण, लंबे, सुंदर शरीर वाला यह पुरुष उसे वैसा ही रहस्यमय लगता था जैसे नील व उस की मां थे. उस की दृष्टि धर्मानंद के पीछेपीछे घूमती रही. न जाने उसे क्यों लग रहा था कि हो न हो, यह आदमी ही उस के पिंजरे का ताला खोल सकेगा. नील की मां के पास बहुत कम लोग आतेजाते थे. उन में धर्मानंद उन के बहुत करीब था, दिया को ऐसा लगता था. अब प्रवचन चल रहा था. तभी दिया ने देखा कि नील की मां मंदिर में बने हुए रसोईघर की ओर जा रही हैं. उसे एहसास हुआ कि उसे उन के पीछेपीछे जा कर देखना चाहिए. वह चुपचाप उठ कर पीछेपीछे चल दी. उस का संशय सही था. नील की मां धर्मानंदजी से मिलने ही गई थीं. वह चुपचाप रसोई के बाहर खड़ी रही. दिया के कान उन दोनों की बातें सुनने के लिए खड़े हो गए थे. वहबड़ी संभल कर रसोईघर के दरवाजे के पीछे छिप कर खड़े होने का प्रयत्न कर रही थी. दोनों की फुसफुसाहट भरी बातें उस के कानों तक पहुंच रही थीं.

‘‘धर्मानंद आप ने पासपोर्ट संभाल कर रखा है?’’

‘‘हां, ठीक जगह रखा है. पर… क्या फर्क पड़ता है अगर खो भी जाए तो…?’’ धर्मानंद ने बड़े सपाट स्वर में प्रश्न का उत्तर दिया. फिर आगे बोले, ‘‘देखिए मिसेज शर्मा, इस लड़की के तो कहीं गुणवुण मिलने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं. आप ने किस से मिलवाई थीं इन की कुंडलियां?’’

‘‘अरे भई, जब हम इंडिया गए तो आप यहां थे और जब हम यहां आए तो आप इंडिया पहुंच गए. मुझे जन्मपत्री रवि से ही मिलवानी पड़ीं. आप की जगह उस समय तो वही था यहां,’’ नील की मां का राज दिया पर खुलता जा रहा था.

‘‘और इस लड़की की दादी थीं कि पत्री मिलाए बिना एक कदम आगे बढ़ने को तैयार नहीं थीं. सो, जल्दीबाजी में…’’

‘‘आप भी, आप तो जानती हैं रवि को मैं ही सिखा रहा हूं. अभी तो जुम्माजुम्मा आठ भी दिन नहीं हुए यह विद्या सीखते हुए उसे. अभी क्या औकात उस की? वैसे भी अपना नील तो नैंसी के साथ इतना कस कर बंधा हुआ है. यह तो बेचारी वैसे ही फंस गई,’’ धर्मानंद के स्वरों में मानो दिया के लिए कुछ करुणा सी उभर रही थी.

‘‘अरे धर्मानंदजी, मैं ने बताया तो था कि यह है बहुत बड़े घर की. अगर इस के घरवालों को यह सब पता चल गया तो फजीहत हो जाएगी हमारी. आप ही बताइए कोई उपाय?’’

‘‘लड़की है भी प्यारी, सुंदर सी. अगर कहीं नील ने इस के साथ रिलेशन बना लिया तो उस का भविष्य तो गया पानी में. वैसे तो वह नैंसी के साथ खुश है. आप ने क्यों शादी करा दी उस की?’’ धर्मानंद को दिया से सहानुभूति होती जा रही थी, ‘‘इस से तो किसी गरीब घर की साधारण लड़की लातीं तो उस का भी उद्धार हो जाता और आप का काम भी.’’

‘‘नैंसी तो शादी करने के लिए तैयार ही नहीं है न. और अगर शादी कर भी लेगी तो क्या मेरे साथ निभा सकती है? पर आप ने तो नील को संबंध बनाने तक से रोक दिया है.’’

‘‘भई, मेरा जो फर्ज था, मैं ने किया. अब आप को या नील को जैसा ठीक लगे करिए,’’ धर्मानंद विचलित से हो गए थे.

‘‘अरे नहीं धर्मानंद, आप के बगैर बताए क्या हम एक कदम भी चलते हैं? आप की जब तक ‘हां’ न हो, नील को उस की तरफ ताकने भी नहीं दूंगी. मैं कहां चाहती थी कि दिया को इस तरह की परेशानी हो पर जब आप…और मुझे लगा था कि नील पर से खतरा टल जाएगा तो यहीं दिया से इस की शादी करवा देंगे. इतनी सुंदर और अमीर बहू पा कर वह नैंसी को भूल जाएगा. पर…’’ दिया ने लंबी सांस छोड़ी. उस को अपना पूरा जीवन ही गर्द और गुबार से अटा हुआ दिखाई देने लगा. वह चुपचाप दरवाजे के पीछे से हट कर भक्तों की भीड़ में समा गई जहां तबले, हारमोनियम व तालियों के साथ  भक्तजन झूम रहे थे. कुछ देर बाद नील की मां ने आ कर देखा, दिया वैसे ही आंख मूंद कर बैठी थी. उन्होंने चैन की सांस ली और मानो फिर कुछ हुआ ही न हो, सबकुछ वैसा चलने लगा जैसा चल रहा था.

अगले दिन सुबह घर में हंगामा सा उठ खड़ा हुआ. नील काम पर जाने की तैयारी कर रहा था कि अचानक माताजी धड़धड़ करती हुई ऊपर से नीचे उतरीं. ‘‘दिया, तुम से कितनी बार कहा है कि अपने कपड़े वाशिंग मशीन में नील के कपड़ों के साथ मत डाला करो, पर तुम बारबार यही करती हो.’’

‘‘तो मैं अपने कपड़े कैसे धोऊं?’’ उस दिन दिया के मुंह से आवाज निकल ही गई.

‘‘कैसे धोऊं, क्या मतलब? अरे, यहां क्या चूना, मिट्टी, धूल होता है जो तुम्हारे कपड़ों में लगेगा? पानी से निकाल कर सुखा दो. कितनी देर लगती है?’’

‘‘पर, मुझ से नहीं धुलते कपड़े. मुझ को कहां आते हैं कपड़े धोने?’’ दिया रोंआसी हो कर बोल उठी.

नील चुपचाप अपना बैग संभाल कर बाहर की ओर चल दिया था. शायद वह जानता था कि आज दिया की अच्छी प्रकार से खबर ली जाएगी. दिया ने 2-3 मिनट बाद कार स्टार्ट होने की आवाज भी सुनी. उसे लगा आज तो वह भी कमर कस ही लेगी. अगर ये उसे परेशान करेंगी तो उसे भी जवाब तो देना ही होगा न? आखिर कब तक वह बिना रिश्ते के इस कबाड़खाने में सड़ती रहेगी.

‘‘देखो दिया, मैं तुम्हें फिर से एक बार समझा रही हूं, तुम नील के कपड़ों के साथ अपने कपड़े मत धोया करो. क्या तुम नहीं चाहतीं कि नील सहीसलामत रहे? हर शादीशुदा औरत अपने पति की सलामती चाहती है और तुम…कितनी बार समझाया तुम्हें…’’

‘‘मुझे समझ में नहीं आता कपड़े एकसाथ मशीन में धोने में कहां से नील की सलामती खतरे में पड़ जाएगी?’’

‘कायर कहीं का,’ उस ने मन ही मन सोचा, ‘और कहां से है वह शादीशुदा?’ न जाने कितनी बार उस का मन होता है कि वह मांबेटे का मुंह नोच डाले. अगर अपने घर पर होती तो…बारबार ऐसे ही सवाल उस के जेहन में तैरते रहते हैं. वह अपने मनोमंथन में ही उलझी हुई थी.

‘‘तुम्हें क्या मालूम कितने खतरनाक हैं तुम्हारे स्टार्स, शादी हो गई, चलो ठीक पर अब नील को बचाना तो मेरा फर्ज है न. पंडितजी ने बताया है कि अभी कुछ समय उसे तुम से दूर रखा जाए वरना…यहां तक कि तुम्हारे साए से भी,’’ नील की मां ने हाथ नचा कर आंखें मटकाईं. इतनी बेहूदी औरत. बिलकुल छोटे स्तर के लोग जैसे बातें करते हैं, वह वैसे ही हाथ नचानचा कर बातें कर रही थी. उन के यहां नौकरों को भी जोर से बोलने की इजाजत नहीं थी. दिया का यौवन मानो उस की हंसी उड़ाने लगा था. ऐसा भी क्या कि कोई तुम पर छा जाए, तुम्हें दबा कर पीस ही डाले और तुम चुपचाप पिसते ही रहो.

‘‘तुम सुन रही हो दिया, मैं ने क्या कहा?’’ उस के कानों में मानो किसी ने पिघला सीसा उड़ेल दिया था.

‘‘जी, सुन रही हूं. आप केवल अपने बेटे को प्रोटैक्ट करना चाहती हैं. मुझे बताइए, मेरा क्या कुसूर है इस में? आप ने क्यों मुझे इस बेकार के बंधन में बांधा है? मैं तो शादी करना भी नहीं चाहती थी. जबरदस्ती…’’

‘‘अरे वाह, बाद में तुम्हारी रजामंदी से शादी नहीं हुई क्या? तुम ने नील को पसंद नहीं किया था क्या? और तुम्हारी वो दादी, जो मेरे नील को देखते ही खिल गई थीं, उन की मरजी नहीं थी तुम्हारी शादी नील से करवाने की?’’

‘‘शादी करवाने की उन की इच्छा जरूर थी लेकिन आप ने मेरे साथ इतना अन्याय क्यों किया? मैं क्या कहूं आप से, आप सबकुछ जानती थीं.’’

दिया की आवाज फिर से भरभरा गई, ‘‘मेरा और नील का रिश्ता भी क्या है जो…’’ आंसू उस की आंखों से झरने लगे.

‘‘वहां पर आप ने वादा किया था कि मैं अपना जर्नलिज्म का कोर्स करूंगी लेकिन यहां पर मुझे कैद कर के रख लिया है. कहां गए आप के वादे?’’

‘‘दिया अब तो जब तक तुम्हारे स्टार्स ही तुम्हें फेवर नहीं करते तब तक तो हम सब को ही संभल कर रहना पड़ेगा,’’ नील की मां ने चर्चा की समाप्ति की घोषणा सी करते हुए कहा.

दिया का मन फिर सुलगने लगा. उसे लगा कि अभी वह सबकुछ उगल देगी परंतु तुरंत यह खयाल भी आया कि यदि वह सबकुछ साफसाफ बता देगी तब तो उस पर और भी शिकंजे कस जाएंगे. एक बार अगर इन लोगों को शक हो गया कि दिया को सबकुछ मालूम चल गया है तब तो ये धूर्त लोग कोई और रास्ता अपना लेंगे, फिर उस के हाथ में कुछ भी नहीं रह जाएगा. परिस्थितियां कैसे मनुष्य को बदल देती हैं. ऐसी लाड़ली, खिलंदड़ी सी दिया को अपना पिंजरा खोलने के लिए चाबी ढूंढ़नी थी. अब उसे यहां सालभर होने को आया था. मां, पापा, भाइयों के फोन आते तो वह ऐसी हंसहंस कर बात करती मानो कितनी प्रसन्न हो. यश सहारा ले कर चलने लगे थे. उन्होंने काम पर भी जाना शुरू कर दिया था.

दिया की समझ में नहीं आ रहा था यह गड़बड़ घोटाला. एक ओर तो उस ने नील की मां को धर्मानंदजी से यह कहते सुना था कि उन्होंने सोचा था कि नील दिया को पा कर नैंसी को भूल जाएगा दूसरी ओर वे हर पल दिया पर जासूसी करती रहती थीं. यों तो दिया का मन अब बिलकुल भी नील को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था परंतु उसे नील के माध्यम से ही अपने पिंजरे की चाबी प्राप्त करनी थी. इसलिए उस ने भावनाओं से काम न ले कर दिमाग से काम लेना शुरू कर दिया था. इस औरत को कैसे वश में करे, यह सब से कठिन समस्या थी उस के सामने. आज तो उस की जबान खुल ही गई थी. काफी सोचविचार करने के बाद उस ने अपने को संतुलित किया और फिर से चुप्पी साध ली.

‘‘नील को यूनिवर्सिटी के काम से जरमनी जाना है,’’ नील की मां ने एक दिन दिया के हाथ की गरमागरम रोटी खाते हुए कहा.

‘‘जरमनी?’’ दिया का माथा ठनका. ऐसा लगा, जरमनी का जिक्र अभी कुछ दिन पूर्व ही सुना था उस ने.

खाना खा कर नील की मां ने प्लेट सिंक में रखी और एक बार फिर बोलीं, ‘‘नील ये कपड़े रख कर गया है. तुम खाना निबटा कर मशीन लगा देना. हीट पर डाल दोगी तो जल्दी ही सूख जाएंगे. रात को ही प्रैस कर देना. सुबह 10 बजे की फ्लाइट है. घर से तो साढ़े 6 बजे ही निकल जाना पड़ेगा,’’ कहतीकहती वे रसोईघर से बाहर चली गईं. दिमाग की उड़ान के साथसाथ उस का शरीर भी मानो फटाफट चलने लगा. आज जब वह सब काम निबटा कर कमरे में आई तब दोपहर के 3 बजे थे. खिड़की पर बैठ बाहर टकटकी लगाए उसे पता ही नहीं चला कब नील की मां कमरे में आ पहुंचीं.

‘‘दिया, कपड़े हो गए?’’ उन्होंने इधरउधर देखते हुए पूछा.

‘‘हां, हो गए होंगे,’’ उस ने दीवार पर लटकी घड़ी पर दृष्टि घुमा कर देखी. 4 बज गए थे.

वह उठी और जा कर मशीन में से कपड़े ला कर हीट पर डाल दिए. अभी बाहर बारिश हो चुकी थी, इसलिए कपड़े अंदर ही डालने थे. चाय का टाइम हो चुका था. किचन में जा कर उस ने चुपचाप चाय बनाई और 2 प्यालों में छान ली. आदत के अनुसार माताजी बिस्कुट के डब्बे निकाल कर टेबल पर बैठी थीं. दिया भी आ कर टेबल पर बैठ गई. सासूमां ने बिस्कुट कुतरते हुए डब्बा उस की ओर बढ़ाया. दिया ने बिना प्रतिरोध के बिस्कुट निकाल लिया और कुतरने लगी. वह वातावरण को जाननेसमझने, उस से निकल भागने के लिए नौर्मल बने रहने का स्वांग करने लगी थी तो माताजी को यह उन की विजय का एहसास लगने लगा था. भीतर ही भीतर सोचतीं, ‘आखिर जाएगी कहां? भूख तो अच्छेअच्छों को सीधा कर देती है. फिर इस की तो बिसात क्या, सीधी हो जाएगी.’

‘‘मैं सोचती हूं दिया, तुम लंदन घूम आओ,’’ अचानक ही चाय की सिप ले कर उन्होंने दिया से कहा.

दिया का मुंह खुला का खुला रह गया. सालभर से घर के बंद पिंजरे में उस चिडि़या के पिंजरे का दरवाजा खुलने की आहट से वह चौंक पड़ी. ‘क्या हो गया इन्हें?’ उस ने सोचा. इस में भी जरूर कोई भेद ही होगा.

महायोग: धारावाहिक उपन्यास, भाग-10

अब तक की कथा : 

मां को देखते ही दोनों बेटे विचलित हो उठे. अब दिया के अतिरिक्त यशेंदु की चिंता भी थी. पापा की टांग कट जाने पर दिया व दादी कैसे सहज रह सकेंगी? दिया ने मां व भाइयों की बात सुन ली थी और वह दादी को तथा अपनेआप को इन परेशानियों का कारण मान रही थी. लंदन से उस के ‘स्पौंसरशिप’ के कागजात आ चुके थे परंतु वह पिता को इस हालत में छोड़ने के लिए तैयार न थी. फोन पर नील मीठीमीठी बातें बनाता और अपनी व्यस्तता का ढोल पीटता. दिया हादसों से घबरा गई थी. यश उसे बारबार नील के पास जाने के लिए कहते.

अब आगे…

दिया को समझ नहीं आ रहा था कि करें तो करें क्या? बहुत सोचविचार कर लगभग एक हफ्ते बाद दिया ने अपने पिता से ससुराल जाने की हामी भर ही दी. कितनी रौनक सी आ गई थी यश के चेहरे पर. उन का बनावटी पैर अब तक लग चुका था और नर्स उन्हें गार्डन में रोज घुमाने ले जाती थी. मां समझतीं कि उन का बेटा अपने पैर की कसरत करने गार्डन जाता है. पता नहीं उन्होंने कहांकहां से गंडेतावीज ले कर यश और दिया के बिस्तरों के नीचे रखने शुरू कर दिए थे. कामिनी ने घर के नौकरों को समझा रखा था कि दिया के कमरे में ऐसा कुछ मिले तो दिया को बिलकुल न बताएं और चुपचाप उसे ला कर दे दें. नौकर यही करते. परंतु एक दिन न जाने कैसे जब नौकरानी दिया का बिस्तर साफ कर रही थी, उस के हाथ में दिया ने डोरी जैसी कोई चीज देख ली. वह अचानक वाशरूम से निकल कर उस के सामने आ कर खड़ी हुई.

‘‘यह तुम्हारे हाथ में क्या है, छबीली?’’ नौकरानी सकपका गई.

‘‘क्या बीबी?’’ उस ने उस डोरी को छिपाने का भरसक प्रयास किया परंतु दिया की दृष्टि से छिपा न सकी.

‘‘दिखाओ, दो मुझे,’’ दिया ने कुछ इस प्रकार नौकरानी को डांटा कि उस से तावीज छिपाते न बना. उसे दिया को देना ही पड़ा. दिया डोरा ले दनदनाती हुई यश के कमरे में गई. रविवार का दिन था. सब घर में ही थे. कामिनी को बड़ी मुश्किल से कभीकभी आराम के लिए समय मिलता था. यश जागे हुए थे. नर्स उन्हें सहारा दे कर सुबह की हवा खिलाने के लिए गार्डन ले जाने के लिए व्हीलचेयर पर बिठा ही रही थी कि दिया की आवाज सुन कर पूरा वातावरण अशांत हो गया.

‘‘यह है क्या आखिर, पापा?’’ उस ने लाल डोरा फेंकते हुए यश से पूछा.

यश को मालूम था कि मां आजकल ये सब टोनेटोटके करवा रही हैं. उन का मुंह उतर गया. यश ने नर्स को वहां से जाने का इशारा किया, फिर जो दिया ने बवाल खड़ा किया कि पूरा परिवार ही हड़बड़ाते हुए यश के कमरे में आ पहुंचा. पंडितों के पाठ की आवाज धीमी पड़ गई. थरथराती हुई दादी भी यश के कमरे में आ गईं. उन्होंने दिया को पुचकारने का प्रयास किया परंतु दिया दनदनाती हुई कमरे से बाहर निकल गई और ऊपर अपने कमरे में जा कर दरवाजा जोर से बंद कर लिया.

‘‘मां, मैं ने आप से कितनी बार कहा कि आप अब ये सब करना बंद कर दें,’’ यश ने मां के सामने हाथ जोड़ दिए.

‘‘यश, तुम भी ये सब अपनी मां से कह रहे हो. तुम दिया को क्यों नहीं समझा सकते कि जो कुछ भी अच्छा हो रहा है वह सब पूजापाठ और इन सब की वजह से ही हो रहा है. नहीं तो…’’ मां के पास बस एक ही अस्त्र था-आंसुओं का. उन के नेत्रों से गंगाजमुना बहने लगी.

‘‘क्या अच्छा हो रहा है, मां, बताइए? दिया के विवाह में आप को अभी तक क्या अच्छाई दिखाई दी है? जब वह ससुराल जा कर सुखी रहेगी तब असलियत पता चलेगी. मैं ने एक्सिडैंट में अपनी एक टांग खो दी, वह अच्छाई है या…आप ही बताइए, आखिर दिया के ब्याह के बाद कौन सी चीज हमारे साथ अच्छी हुई है? आप तो रो कर अपने मन को हलका कर लेती हैं, भजन करती और करवाती रहती हैं पर मैं तो इस सब पर नहीं बैठ सकता. मुझे तो लग रहा है जो इतने वर्षों की कमाई थी बच्चों के रूप में, धन के रूप में, इज्जत के रूप में, सब खत्म होती जा रही है और आज मैं अपंग बन कर बिस्तर पर पड़ा हूं.’’

पहले तो दादी को यश की बात समझ में ही नहीं आई, जब दोबारा यश ने अपंग कहा तो उन के आंसू निकलने बंद हो गए. उन की फटी आंखें यश की ढकी हुई टांग को घूरने लगीं. यश के पैरों से कपड़ा हटा कर देखने पर ‘हाय राम’ कह कर वे जमीन पर धम से बैठ गईं. कामिनी दौड़ कर आई. उस ने नर्स को आवाज लगाई. नर्स के आने पर दोनों ने मिल कर मांजी को उठा कर पलंग पर बैठाया. मां रोतेरोते बेहोशी की हालत में आ गई थीं. दीप, स्वदीप ने दौड़ कर दादी को हाथों में उठाया और गाड़ी में डाल कर अस्पताल की ओर भागे. दादी की सांस की गति बहुत तेज हो गई थी. दादीमां को अस्पताल में ऐडमिट करवा दिया गया. दिया शाम तक अपने कमरे में बंद रही. बाहर से कई बार कामिनी ने उसे दादी के अस्पताल पहुंच जाने की सूचना दी थी परंतु दिया बिलकुल गुमसुम बनी रही. नौकरानी कई बार नाश्ता, खाना ले कर गई परंतु दिया ने दरवाजा नहीं खोला. वह सोच रही थी कि दादी मां के जीवन की संध्या बेला है परंतु उस के तो प्रभातकाल में ही सबकुछ घटित होता जा रहा है. दिया लगभग 4-5 बजे यश के कमरे में आई.

‘‘पापा, नील के पास जाने की तैयारी करवा दीजिए,’’ दिया बोली तो यश ने चौंक कर उस की ओर देखा, फिर कुछ खंखार कर बोले, ‘‘दिया, बेटा, दादी अस्पताल में हैं.’’

‘‘मालूम है मुझे, पापा, ठीक हो जाएंगी. आप चिंता न करें. स्वदीप भैया से कह कर जितनी जल्दी हो सके मेरी जाने की तैयारी करवा दीजिए.’’

न जाने किस मिट्टी की बन गई थी दिया. दोनों भाई अस्पताल में चक्कर लगाते, कामिनी सुबहशाम सास को देखने अस्पताल पहुंचती परंतु दिया? उस का तो मन ही नहीं होता था दादी से मिलने का.

पूरा घर मानो बिखराव से तहसनहस हो गया. अभी तो कामिनी और बेटों ने काफी लंबे अरसे के बाद अपनाअपना काम शुरू किया था कि फिर से उस में जबरदस्त व्यवधान आ खड़ा हुआ. कामिनी अस्पताल और घर के बीच चक्कर लगातेलगाते थक गई थी. उधर, नील ने जल्दी मचानी शुरू कर दी थी. और…अब तो हद हो गई जब नील ने दिया का टिकट भेज दिया. अचानक ही एअरलाइंस से फोन आया कि दिया का टिकट भेजा जा रहा है. यह ठीक हुआ कि दिया मुंबई जा कर वीजा की फौरमैलिटीज पूरी कर आई थी. 2 दिन बाद का टिकट था. नील के फोन लगातार आते रहे और वह अनमनी सी उस से बात कर के पापा या मां को फोन पकड़ाती रही. नील शायद उस से कुछ रोमांटिक बातें करना चाहता पर वह बेमन से ही उस की बातों का उत्तर दे पाती. पता नहीं क्यों? उसे बारबार यही लग रहा था मानो वह एक लड़की से एक मदारी की बंदरिया में तबदील हो गई है.

दादी अस्पताल में थीं परंतु दिया अपनी लंदन जाने की तैयारी में खुद को व्यस्त दिखाती रही. दादी ने कई बार दिया के बारे में पूछा. इस में तो शक था ही नहीं कि दादी दिया से बहुत प्यार करती थीं. वे चाहती थीं कि अपनी पोती की विदाई खूब धूमधाम से करें. अपने पंडितजी से मुहूर्त निकलवा कर पूजाअर्चना के बाद ही दादी उसे विदेश विदा करें. जब भी घर का कोई सदस्य उन के पास आता तो बारबार यह पूछना न भूलती, अरे, पंडितजी को बुला भेजा है न? पूजा तो हो रही है न घर में? और हां, दिया को बिठाना है पूजा में. यश भी बैठ जाएगा. हे भगवान, कैसे समय में मुझे यहां फंसा दिया  मैं कुछ कर नहीं पा रही हूं अपने बच्चों के लिए.

जब वे बड़बड़ करने लगतीं तभी डाक्टर के आदेश से उन्हें इंजैक्शन दे दिया जाता और थोड़ी देर बाद ही वे खामोश हो जातीं. डाक्टर के अनुसार, उन के मस्तिष्क को शांत रखना आवश्यक था. दादी को इस बात की भी बहुत तकलीफ थी कि दिया उन से मिलने नहीं आई. उन्हें लगता कि दिया अपने पति के पास जाने के लिए बहुत उत्सुक है और तैयारियों में व्यस्त है. जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं. अपने कुछेक कपड़े एक अटैची में डाल कर दिया तैयार ही थी. जब ओखली में सिर दे ही दिया है तो मूसलों से क्या डरना. देखा जाएगा जो होगा. वह अधिकांश समय पापा के पास ही गुजारती परंतु बातबात में चहकने वाली दिया के मुख पर पसरी उदासी, आंखों में नीरवता और चाल में ढीलापन देख कर यश और कामिनी उस की मानसिक स्थिति से भली प्रकार अवगत थे. परंतु अब उन के पास भी प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था, केवल भविष्य की प्रतीक्षा, जिस के बारे में किसी को कुछ पता नहीं होता. न मनुष्य को और न ही हाथ की रेखाएं पढ़ने वाले पंडितों को. इन लोगों के मस्तिष्क में एक ही बात थी कि किसी भी प्रकार उन की बिटिया सुखी रहे. उस की आंखों की चमक लौट आए, उस के पैरों में फिर से बिजलियां भर जाएं और चेहरे पर मुसकराहट.

दिया ने पिता से बहुत सख्ती से कह दिया था कि उसे मुंबई तक कोई भी छोड़ने नहीं जाएगा. आगे उसे अकेले ही जाना है, सो वह मैनेज कर लेगी. लाख समझाने पर भी वह टस से मस न हुई. ‘‘आप लोग चाहते हैं न कि मैं अपनी ससुराल जाऊं. तो जा रही हूं. वहां भी तो मुझे आप सब से दूर ही रहना है, अकेले ही, तो यहां क्यों नहीं? दूसरी बात, मुझे किसी की इतनी जरूरत नहीं है जितनी यहां पर भाई लोगों की. इसलिए पापा, मां, अब इस बात पर कोई बहस मत कीजिए प्लीज, आई विल मैनेज, कोई पहली बार तो हवाई जहाज में जा नहीं रही हूं. फिर वहां तो कोई मेरे साथ अंदर रह नहीं पाएगा. सो, कोई फायदा तो है नहीं मुंबई तक जाने का. भाई लोग यहां का संभालें, बस.’’

लेकिन भाइयों ने दिया की एक न सुनी और हवाई अड्डे तक साथ जाने के लिए दिया को राजी कर ही लिया. लेकिन कितनी बार कोशिश की गई कि दिया जाने से पहले एक बार दादी से मिल ले परंतु कोई समझाइश काम न आई. वह भी तो आखिर अपनी दादी की ही पोती थी. जो ठान लिया, बस. ऐसी परिस्थिति में भी वह कभीकभी स्वयं को ही कोसने लती, यदि नील से मिलने के समय वह इतनी दृढ़ रह पाती तो. आखिर क्यों ढीली पड़ी वह?

खैर, जो होना था, हो चुका था. मांपापा को रोते छोड़ वह भाइयों के साथ हवाईअड्डे पहुंच गई थी. वह अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के भीतर प्रवेश कर गई कुछ इस अदा से मानो वह कोई सिपाही हो जो लाम पर जा रहा हो. प्रवेशद्वार पर एक बार ठिठक कर उस ने पीछे घूम कर दोनों भाइयों की आंखों में तैरती उदासी को भांपा, धीरे से उन की ओर हाथ उठा कर एक बार बाय का संकेत किया और आगे बढ़ गई. वह जानती थी कि जब तक हवाई जहाज उड़ान नहीं भरेगा, उस के दोनों भाई बाहर ही खड़े रहेंगे. लेकिन उस से फायदा क्या?

अपने ही विचारों में गुम वह फौरमैलिटीज पूरी करती रही और जा कर दूसरे यात्रियों के साथ बैठ गई.

अधिकतर यात्री चाय या कौफी ला कर अपनी कुरसियों या सोफों में धंस गए थे. पारदर्शी शीशे से रनवे पर खड़े हुए 2-3 हवाई जहाज नजर आ रहे थे.

नील ने दिया को बिजनैस क्लास का टिकट भेजा था. एअरहोस्टेस ने उस की सीट दिखा कर उस पर एक बड़ी सी मुसकराहट फेंक दी थी. वह भी उसे देख कर मुसकरा दी. थैंक्स कह कर वह सीट पर जा बैठी और खिड़की की ओर ताकने लगी. अपने दिलोदिमाग को शांत करने के प्रयास में वह भीतर से और भी अशांत होती जा रही थी. नया देश, नया परिवेश, नए लोग…हां, नए ही तो हैं. कहां समझ पाई है दिया नील को भी. एक नईनवेली की सी कोई भी उमंग उस के भीतर हलचल नहीं मचा रही थी. अब प्लेन में बैठ कर उसे अपनी सहेलियां याद आ रही थीं जिन से वह मिल कर भी नहीं आई थी. यही सोचेंगी न उस की सहेलियां कि दिया कैसी बेवफा निकली. यद्यपि यश के साथ हुई दुर्घटना का सब को पता चल गया था. एक तो शादी का कमाल हुआ था, दूसरा, अब होने जा रहा था और दिया इस कमाल को स्वयं ही झेलना चाहती थी. अचानक ही उस ने अपने कंधे पर किसी का मजबूत दबाव महसूस किया और झट से गरदन घुमा कर देखा.

Lockdown: दिहाड़ी मजदूरों की खातिर एकता कपूर ने लिया एक बड़ा फैसला, दिया ये बयान

कोरोनावायरस संकट से आज पूरा देश प्रभावित है. भारत में इस वायरस संक्रमित लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है संकट के इस बुरे दौर में सभी अपनी-अपनी तरफ से कुछ न कुछ मदद कर रहे है. अब टेलीविजन और फिल्मों की जानी-मानी क्वीन एकता कपूर संकट के इस समय में मदद के लिए सामने आईं हैं, उन्होंने ट्वीट कर  कोरोनवायरस से जंग के लिए किया ये बड़ा ऐलान किया है कि वह बालाजी टेलीफिल्म्स से अपनी एक साल की सैलरी यानी 2.5 करोड़ रुपये नहीं लेंगी.

सोशल मीडिया पर दी जानकारी

एकता कपूर ने ट्वीट करते हुए लिखा, “यह मेरी पहली और प्रमुख जिम्मेदारी है कि मैं उन सभी फ्रीलांसरों और दिहाड़ी मजदूरों की देखभाल करूं जो बालाजी टेलीफिल्म्स में काम करते हैं. शूटिंग रुकने के कारण उन पर भारी दवाब आ गया है और उन्हें नुकसान भी हुआ है. मैं ऐलान करती हूं कि मैं बालाजी टेलीफिल्म्स में अपनी एक साल की सैलरी नहीं लूंगी. जो कि 2.5 करोड़ रुपये है. जिससे मेरे साथ काम करने वाले वर्कर्स को इस संकट और पूरे लॉकडाउन के समय में कोई परेशानी ना हो आगे केवल एक ही रास्ता है, साथ रहिए… सुरक्षित रहिए, स्वस्थ रहिए.”

 

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The only way ahead, is together! #StaySafeStayHealthy ??

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शूटिंग बंद होने के चलते हो रहा नुकसान

दूसरे लोगों की तरह एकता कपूर को भी कोरोनावायरस के चलते  काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है. पहली बार उन्हें अपनी बालाजी प्रोडक्शन कंपनी बंद करनी पड़ी है और उनके सीरियलों की शूटिंग भी रुक गई है. शूटिंग रुकने के चलते इन लोगों पर दवाब पड़ा है और नुकसान भी हुआ है ऐसे में उनकी स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है. इसलिए हम सभी को आगे आकर कुछ ऐसे कदम उठाने पड़ेगे जिससे उन लोगों की तकलीफ कम हो सके. इस समय कोरोना की सबसे ज्यादा मार दिहाड़ी मजदूरों पर ही पड़ रही है, जिनके पास इस समय कोई भी काम नहीं है. ऐसे में एकता कपूर का ये ऐलान उन लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.

 

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Shit the world is going backwards! #panickattack

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आपको बता दें कि देश में कोरोना संकट को लेकर 14 अप्रैल तक लॉकडाउन जारी है. लौकडाउन में बौलीवुड के कई ऐसे बड़े स्टार हैं, जिन्होंने इस मुश्किल घड़ी में दान देकर मदद की है. जिसमें  सलमान खान, कार्तिक आर्यन, शाहरुख खान, अक्षय कुमार, ऋतिक रोशन जैसे कई स्टार शामिल हैं.

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#lockdown: ‘लॉकडाउन के किस्से’ लेकर आएंगी ताहिरा कश्यप, पढ़ें खबर

ताहिरा कश्यप खुराना में एक नहीं बल्कि कई प्रतिभायें हैं, डायरेक्शन से लेकर लिखने के अलावा उन्होंने दर्शकों तक ऐसी कहानियां लायीं हैं जो न केवल हमें भावनात्मक रूप से छूती हैं, बल्कि एक बदलाव लाने में भी सफल रही हैं. ताहिरा कश्यप कोरोनोवायरस महामारी के कारण लॉकडाउन के दौरान कैसे रह रही हैं, इससे जुड़ी हर चीज से सभी को अपडेटेड रखती है. इस बार, वह हमें  लॉकडाउन की दिलचस्प कहानियों से परिचित कराने के लिए पूरी तरह तैयार है, जो वर्तमान वास्तविक जीवन की स्थिति से प्रेरित हैं और इसमें उन्होंने अपनी कल्पना से ट्विस्ट दिया है| ये कहानियां लोगों के रोजमर्रा के जीवन से भावनाओं और क्षणों को दर्शाती हैं कि कैसे वो लॉकडाउन से प्रभावित होते हैं. इन कहानियों की वीडियो सीरीज़ बनने जा रही हैं जिसे वह अपने सोशल मीडिया पर शेयर करेंगी.

ताहिरा के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान स्थितियों को देखने के लिए दो तरीके हैं, पहला, या तो जो उपलब्ध है उसका लाभ उठाएं या फिर सिर्फ शिकायत करें. वह मानती हैं कि उन्होंने ये दोनों किये जिसके बाद उनके पास इन लॉकडाउन टेल्स का आइडिया आया.

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इस बारे में बात करते हुए ताहिरा कश्यप खुराना ने एक बयान में कहा, “मैं रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी खास कहानियों को लोगों तक पहुंचाने के लिए वास्तव में उत्साहित हूं. ये मानवता के बारे में सरल कहानियां हैं लेकिन जटिल समय में हैं. मुझे लेखन पसंद है और सच कहूं तो, बिना किसी एजेंडे के ये कहानियाँ बस बहने लगीं. ये लॉकडाउन टेल्स हमारे जीवन से लिए गए एक क्षण या विचार मात्र हैं और कई बार, हमें बस उसे संजोने की जरूरत होती है. ”


सकारात्मकता फैलाने के लिए ताहिरा के इस कदम को लेकर हम काफी रोमांचित हैं,  खास बात ये है कि उन्होंने इन दिलचस्प कहानियों को बुना है ताकि हम सभी का मनोरंजन कर सकें.

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