स्टंट की बजाय रिजल्ट से डरते हैं Rohit Shetty, जानें क्यों

इन दिनों बॉलीवुड की सबसे सफल निर्देशकों की सूची में अपना नाम स्थापित करने वाले रोहित शेट्टी कर्नाटक के मैंगलोर से है. उन्होंने अपना कैरियर फिल्म ‘फूल और कांटे’ में सहायक निर्देशक के रूप में शुरू किया था, लेकिन उन्हें पौपुलैरिटी कॉमेडी फिल्म ‘गोलमाल फन अनलिमिटेड’ से मिली. फ़िल्मी परिवार में पैदा होने वाले रोहित को बचपन से ही निर्देशक बनने की इच्छा थी. माता-पिता ने भी उन्हें इसमें सहयोग दिया. आज वह कामयाब है और इसका श्रेय अपने परिवार को देते है. खुले विचार और हंसमुख स्वभाव के रोहित शेट्टी कलर्स टीवी पर ‘खतरों के खिलाडी’ के 10 वें season को होस्ट कर रहे है, उनकी जर्नी के बारें में बात की. आइये जानें उनकी कहानी, उन्ही से.

सवाल-किसी स्टंट को करना आपके लिए कितन मुश्किल होता है? शो में कीडे-मकोडे और जानवर भी होते है, उन्हें कैसे हैंडल करते है?

बचपन से मैंने तरह-तरह के स्टंट किये है और किसी भी स्टंट को करना मुश्किल नहीं लगता. ये मेरा फॅमिली बिज़नेस है. जहाँ मेरे माता-पिता सभी इसी क्षेत्र से जुड़े है.

इस शो को करने में पूरा साल लगता है. इसमें लाये गए जानवरों की ब्रीडिंग होती है, हैंडलर्स होते है, जो प्रोफेशनल होने के साथ-साथ इन जानवरों और कीडे-मकोडे के हाव-भाव को समझते है. शो के लिए ये खास होते है. कही से उठाकर हम जानवरों को नहीं लाते. एक बार केपटाउन में एक स्टंट मधुमक्खी के साथ था, जिसमें मैंने चॉपर और डॉक्टर्स रेडी रखी थी, ताकि कोई हादसा होने पर तुरंत उसका इलाज हो सकें. इंटरनेशनल सेफ्टी मेजर्स होती है. उनकी पूरी टीम मेरे साथ होती है.

 

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सवाल-स्टंट करते वक़्त कभी डर लगा? ऐसे किसी शो को होस्ट करना कितना कठिन होता है?

शुरू-शुरू में मुझे डर लगता था, पर बाद में समझ में आ गयी थी कि कैसे करना है. असल में मुझे डर हमेशा स्कूल की रिजल्ट से लगता था, स्टंट से नही, क्योंकि बचपन से लगता था कि यही मेरा काम है. मेरे पिता स्टंट और एक्शन करते थे, मेरी माँ स्टंट आर्टिस्ट थी, लेकिन जब दूसरे स्टंट करते है, तो डर लगता है, इसमें भी अगर अक्षय कुमार या अजय देवगन हो तो डर नहीं लगता, क्योंकि मुझे पता है कि इन लोगों ने स्टंट किया हुआ है और इन्हें आती है. इस तरह के फियर फैक्टर वाले शो को करने में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है, क्योंकि इन सबनें स्टंट नहीं किया हुआ है. ऐसे में एक जिम्मेदारी रहती है कि किसी प्रकार की गलती न हो. उनके हिसाब से, अलग और बड़ा करने के उद्देश्य से इस शो को हर बार करना मुश्किल होता है.

फिल्मों में स्टंट करना अब थोडा आसान हो गया है, क्योंकि केबल आ गए है. फेस रिप्लेसमेंट हो जाता है, पर ऐसे शो में ये सब करना अधिक मुश्किल होता है. काम आसान हो इसके लिए मैं इन्हें बेसिक टेक्निक बता देता हूँ. ये एक प्रतियोगिता है इसमें वे सबसे अच्छा परफोर्मेंस देने की कोशिश करते है, ऐसे में हड़बड़ी में कुछ गलत न कर बैठे उस पर ध्यान देता हूँ. कई बार अगर वे कुछ अधिक करना चाहते भी है तो मैं उनपर शाउट भी करता हूँ, ताकि कोई दुर्घटना न हो.

सवाल-स्टंट करते वक़्त किस तरह की सोच आप रखते है?

स्टंट के समय शांत रहने की जरुरत होती है और काम पर पूरी तरह से कंसन्ट्रेट करना पड़ता है. इससे सही समय पर सही स्टंट व्यक्ति कर पाता है. इसके अलावा कॉन्फिडेंस डेवलप होना बहुत आवश्यक होता है. कोई भी स्टंट आसान नहीं होता.

सवाल-फिल्मों में सफल होने के बावजूद आप टीवी शो करते है, इसकी वजह क्या है?

टीवी घर-घर में जाती है और इसकी वजह से किसी की भी ब्रांड स्थापित हो जाती है. यही वजह है कि सारे बड़े कलाकार इस माध्यम में काम करना पसंद करते है. इसके अलावा मेरे सफल होने में मीडिया का बहुत बड़ा योगदान है, जिसने मुझे लोगों तक पहुँचाया है.अभी मेरे फिल्मों को भी दर्शकों का प्यार बहुत मिल रहा है.

सवाल-आपका परिवार आपके इस प्रोफेशन को कैसे देखता है? क्या आप चाहते है कि आपके बेटे भी इस क्षेत्र में जाएँ?

मेरा बेटा 13 साल का है और वह कभी एक्टर तो कभी स्टंट करना चाहता है. उसने मुझे मेरे क्षेत्र में आने की इच्छा ज़ाहिर की है. मैंने भी मेरे पिता को ऐसा ही सालों पहले कहा था. ये उनके डीएनए में बसा है. मेरी माँ स्टंट से पहले कुछ नहीं कहती, पर बाद में खैरियत पूछती है.

सवाल-आजकल आपकी फिल्मों में हर कोई काम करना चाहता है, इसे कैसे लेते है?

कभी ऐसा समय था, जब कोई काम करने के लिए आगे नहीं आना चाहता था, पर आज मेरा ब्रांड बन गया है और दर्शक मेरी फिल्मों को देखना पसंद करते है. मेरी कोशिश हमेशा दर्शकों को नयी और अच्छी फिल्म देने की होती है, जिसके लिए मैं बहुत मेहनत करता हूँ.

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सवाल-स्टंट आज की जेनरेशन को बहुत पसंद आता है, वे करते है और हादसे के शिकार कई बार हो जाते है, आप उन्हें क्या सन्देश देना चाहते है?

फिल्मों में स्टंट के पीछे पूरी प्लानिंग होती है कभी भी कोई इसे बिना सोचे-समझे फोलो न करें. जो भी चेतावनी मैं देता हूँ उसे सबको समझना चाहिए. इसके लिए बहुत बड़ी ट्रेनिंग होती है. सेफ्टी के लिए पूरी टीम मौजूद होती है. बाइक स्टंट के पीछे एक सेफ्टी गियर्स रहती है, जो आम आदमी के पास नहीं होता. आम इंसान को कितना भी लगे कि वह साहसी है और कर सकता है, फिर भी उसे बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए. मैं कोई सुपर हीरो नहीं, जो कभी भी उठकर इसे कर लूँ, मैं भी पूरी प्लानिंग के बाद ही इसे करने की सोचता हूँ. ये हमारा प्रोफेशन होने के बावजूद हम पूरी सावधानी बरतते है, ऐसे में यूथ को कभी भी इसे करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

 

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पंडितों की नहीं दिल की सुनें

36 साल की प्रिया प्राइवेट ऑफिस में सीनियर एग्जीक्यूटिव है. उस का एक प्यारा सा बच्चा भी है. पति मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं. देखने से लगता है कि वह एक पूर्ण और खुशहाल जिंदगी जी रही है. मगर असल में वह बेहद तनाव भरी जिंदगी जी रही है. दिन भर ऑफिस के झमेले और रात में पति से लड़ाई झगड़ा. सुबहशाम बच्चे को संभालने की टेंशन और बाकी समय सास के तानो की चुभन.

दरअसल शादी के बाद से ही प्रिया और उस के हस्बैंड की कभी भी नहीं बनी. दोनों के ख्यालात नहीं मिलते. घर से जुड़े किसी भी फैसले में उन की सहमति नहीं बनती. छोटीछोटी बातों पर उन के बीच ईगो आड़े आ जाता है. दोनों ने अब तक का सफर लड़तेझगड़ते ही पूरा किया है और उस पर बीचबीच में सास के द्वारा आग में घी डालने की आदत रिश्ता बिगाड़ने का ही काम करती है. बकौल प्रिया शादी के बाद उस की जिंदगी नरक बन गई है.

ऐसा नहीं है कि प्रिया के पिता ने शादी से पहले पूरी तफ्तीश नहीं कराई थी. शादी से पहले लड़के और उस के घर की पूरी छानबीन कराई थी. यही नहीं शादी से 2 साल पहले ही उन्होंने ज्योतिषी के आगे अपनी बेटी की कुंडली रख दी थी. कुंडली में गुण न मिलने की वजह से कई लड़कों को नकार भी दिया गया था. मगर उन्हें क्या पता था कि इतनी मेहनत से सेलेक्ट किए गए लड़के के साथ पूरे रीतिरिवाजों के साथ की गई शादी का यह हश्र होगा.

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कहानी यहीं खत्म नहीं हुई है. प्रिया के पिता लगातार पंडितों द्वारा बताए जा रहे उपायों को आजमा रहे हैं. पढ़ीलिखी प्रिया भी लगातार आँख बंद कर के पिता और पंडितों द्वारा दिए जा निर्देशों का पालन करती आ रही है. मसलन प्रिया रोज सुबहसुबह राम दरबार के आगे घी का दीपक जलाती है. शुक्रवार को मीठी चीजों का दान करती है. चमेली के तेल में सिंदूर मिला कर पेस्ट बनाती है और फिर पान के पत्ते पर सिंदूर से सीताराम लिख कर संध्या काल में मंदिर में रख कर आती है. हर शनिवार को शाम में पीपल के नीचे सरसों के तेल का दिया भी जलाती है.

दरअसल बच्चों के बड़े होते ही माँबाप की पहली चिंता होती है उन के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश और यह तलाश पूरी करने के लिए लोग पहुँच जाते हैं ज्योतिषी या पंडित की शरण में.

ज्योतिषी के आगे बच्चों की जन्मकुंडली रखते हुए घरवालों को अहसास होता है जैसे ज्योतिषी ही उन के सुखद वैवाहिक जिंदगी की गारंटी दे सकता है. ज्योतिषी द्वारा बच्चों की कुंडली मिलाना ही सब कुछ है.

असल में रिश्ते आपसी विश्वास और प्रेम की बुनियाद पर टिके होते हैं न कि बेफालतू के टोनेटोटकों पर. पतिपत्नी के बीच यदि आपसी समझ और त्याग की भावना हो तो किसी भी तरह के घरेलू विवाद उन के बीच तनाव पैदा नहीं कर सकते. मगर हमारे यहां शुरू से ही आपसी तालमेल के बजाय ज्योतिषीय घालमेल पर ज्यादा जोर दिया जाता रहा है.

विवाह पूर्व कुंडली मिलान या गुण मिलान को अष्टकूट मिलान या मेलापक मिलान कहते हैं. इस में लड़के और लड़की के जन्मकालीन ग्रहों तथा नक्षत्रों में परस्पर साम्यता, मित्रता तथा संबंध पर विचार किया जाता है.ज्योतिषशास्त्र ने मेलापक में अलगअलग आधार पर गुणों की कुल संख्या 36 निर्धारित की है जिस में 18 या उस से अधिक गुणों का मिलान विवाह और दाम्पत्य सुख के लिए अच्छा माना जाता है.

अष्टकूट मिलान में वर्ण, वश्य, तारा, योनि, राशीश (ग्रह मैत्री), गण, भटूक और नाड़ी का मिलान किया जाता है. अष्टकूट मिलान ही काफी नहीं है. कुंडली में मंगल दोष भी देखा जाता है, फिर सप्तम भाव, सप्तमेश, सप्तम भाव में बैठे ग्रह, सप्तम और सप्तमेश को देख रहे ग्रह और सप्तमेश की युति आदि भी देखी जाती है.

ज्योतिषियों और पंडितों द्वारा लोगों के दिमाग में यह बात पूरी तरह भर दी गई है कि पतिपत्नी के बीच ग्रहों की मित्रता आपसी तालमेल निर्धारित करती है. दोनों के ग्रह ही पतिपत्नी के संबंध को अच्छा बनाते हैं. पति के लिए अच्छा वैवाहिक जीवन शुक्र से आता है. पत्नी के लिए यह काम बृहस्पति करता है. पतिपत्नी का आपसी सम्बन्ध और तालमेल कुल मिला कर बृहस्पति और शुक्र पर निर्भर करता है. जब शुक्र या बृहस्पति कमजोर हों तो वैवाहिक जीवन में काफी समस्याएं आती हैं. ये समस्यायें शनि , मंगल , सूर्य , राहु और केतु से काफी बढ़ जाती हैं और चन्द्र , बुध और बृहस्पति इन समस्याओं को कम करते हैं.

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इतना सब करने के बाद भी यदि रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच जाए तो जो उपाय बताए जाते हैं वे बेसिरपैर के होते हैं.

पते की बात यह है कि ज्योतिष के चक्कर में पड़ने से कुछ नहीं होता. शादी से पहले एकदूसरे को समझना और परखना जरूरी होता है. जीवनसाथी से आप के गुण नहीं बल्कि ख्यालात और सोच मिलनी चाहिए. मानसिक स्तर समान हो तो रिश्ते अधिक टिकते हैं. इसलिए शादी तभी करें जब आप को मनपसंद जीवनसाथी मिले.

सिर्फ रस्म निभाने या लोगों का मुंह बंद करने के लिए शादी करना उचित नहीं है. कई लड़कियाँ अपने भविष्य की चिंता में कैसे भी लड़के से इसलिए शादी कर लेती हैं क्यों कि उन के रिश्तेदार और पड़ोसी हर मोड़ पर उन्हें भय दिखाते हैं कि समय पर शादी न हुई तो उन का भविष्य खराब हो जाएगा.

पर जरा इस बात पर गौर जरूर करें कि यदि सही लड़के से शादी नहीं की गई तो क्या भविष्य के साथसाथ वर्तमान भी खराब नहीं हो जाएगा? लड़तेझगड़ते, एकदूसरे के खिलाफ जहर उगलते और तानों के बाण चलाते हुए जीने से बेहतर है कि थोड़ा धैर्य रखें और जिस के लिए दिल स्वीकृति दे उसी से शादी करें. ताकि बाद में अपने ही फैसले पर आप को पछताना न पड़े.

यदि लाख कोशिशों के बावजूद आप दोनों अपने रिश्ते को संभाल नहीं पा रहे हैं तो भी लड़तेझगड़ते रिश्ते निभाते जाने से बेहतर है कि आप एकदूसरे से अलग हो जाए. ऐसा न करने का मतलब है खुद को और अपने बच्चों को मेंटली टॉर्चर करना. छोटे बच्चों पर मांबाप की लड़ाई का बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है. इस सन्दर्भ में सिंबा गर्ल सारा अली खान का यह वक्तव्य काफी मायने रखता है जब वह एक इंटरव्यू के दौरान कहती हैं ,” ऐसे घर में रहना कभी अच्छा नहीं होता है जहां लोग खुश न रहें. मेरे माता-पिता दोनों खुश, बिंदास और कूल हैं. यदि वे एक साथ होते तो शायद ऐसे नहीं होते.

” मुझे लगता है कि उन्हें भी यह महसूस हो चुका है. शुक्र है कि अब मेरे पास एक के बजाय 2 खुशहाल और सिक्यॉर घर हैं.”

सच है कि उम्र भर एकदूसरे को झेलते रहने से लाख गुना अच्छा है अलग हो जाना और दोस्तों की तरह अलग रह कर भी साथ निभाना. टूटे हुए रिश्ते से अलग हो कर आप चाहें तो नए रिश्ते में बध जाएँ या फिर सुकून के साथ अकेले रहे. दोनों ही मामलों में आप बेहतर जिंदगी का अहसास कर पाएंगे.

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झगड़ों की वजह से अलग हो जाना सोल्यूशन नहीं

सुनीता और रंजन और उन के 2 बच्चे- एकदम परफैक्ट फैमिली. संयुक्त परिवार का कोई झंझट नहीं, पर पुनीता और रंजन की फिर भी अकसर लड़ाई हो जाती है. रंजन इस बात को ले कर नाराज रहता है कि वह दिन भर खटता है और पुनीता का पैसे खर्चने पर कोई अंकुश नहीं है. वह चाहता है कि पुनीता भी नौकरी करे, पर बच्चों को कौन संभालेगा, यह सवाल उछाल कर वह चुप हो जाती है. वैसे भी वह नौकरी के झंझट में नहीं पड़ना चाहती है.

पैसा कहां और किस तरह खर्चा जाए, इस बात पर जब भी उन की लड़ाई होती है, वह अपने मायके चली जाती है. बच्चों पर, घर पर और अपने शौक पूरे करने में खर्च होने वाले पैसे को ले कर झगड़ा होना उन के जीवन में आम बात हो गई है. वह कई बार रंजन से अलग हो जाने के बारे में सोच चुकी है. रंजन उसे बहुत हिसाब से पैसे देता है और 1-1 पैसे का हिसाब भी लेता है. पुनीता को लगता है इस तरह तो उस का दम घुट जाएगा. रंजन की कंजूसी की आदत उसे खलती है.

सीमा हाउसवाइफ है और उस के पति मेहुल की अच्छी नौकरी और कमाई है, इसलिए पैसे को ले कर उन के जीवन में कोई किचकिच नहीं है. लेकिन उन के बीच इस बात को ले कर लड़ाई होती है कि मेहुल उसे समय नहीं देता है. वह अकसर टूर पर रहता है और जब शहर में होता है तो भी घर लेट आता है. छुट्टी वाले दिन भी वह अपना लैपटौप लिए बैठा रहता है. उस का कहना है कि उस की कंपनी उसे काम के ही पैसे देती है और जैसी शान की जिंदगी वे जी रहे हैं, उस के लिए 24 घंटे भी काम करें तो कम हैं.

सीमा मेहुल के घर आते ही उस से समय न देने के लिए लड़ना शुरू कर देती है. वह तो उसे धमकी भी देती है कि वह उसे छोड़ कर चली जाएगी. इस बात को मेहुल हंसी में उड़ा देता है कि उसे कोई परवाह नहीं है.

सोनिया को अपने पति से कोई शिकायत नहीं है, न ही संयुक्त परिवार में रहने पर उसे कोई आपत्ति है. विवाह को 6 वर्ष हो गए हैं, 2 बच्चे भी हैं. लेकिन इन दिनों वह महसूस कर रही है कि उस के और उस के पति के बीच बेवजह लड़ाई होने लगी है और उस की वजह हैं उन के रिश्तेदार, जो उन के बीच के संबंधों को बिगाड़ने में लगे हैं. कभी उस की ननद आ कर कोई कड़वी बात कह जाती है, तो कभी बूआसास उस के पति को उस के खिलाफ भड़काने लगती हैं.

रिश्तेदारों की वजह से बिगड़ते उन के संबंध धीरेधीरे टूटने के कगार तक पहुंच चुके हैं. वह कई बार अपने पति को समझा चुकी है कि इन फुजूल की बातों पर ध्यान न दें, पर वह सोनिया की कमियां गिनाने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ता है.

नमिता और समीर के झगड़े की वजह है समीर की फ्लर्ट करने की आदत. वह नमिता के रिश्ते की बहनों और भाभियों से तो फ्लर्ट करता ही है, उस की सहेलियों पर भी लाइन मारता है. इस बात को ले कर उन का अकसर झगड़ा हो जाता है. नमिता उस की इस आदत से इतनी तंग आ चुकी है कि वह उस से अलग होना चाहती है.

1. गलत आप भी हो सकती हैं

इन चारों उदाहरणों में आपसी झगड़े की वजहें बेशक अलगअलग हैं, पर पति की ज्यादतियों की वजह से पत्नियां पति से अलग हो जाने की बात सोचती हैं. उन की नजरों में उन के पति सब से बड़े खलनायक हैं, जिन से अलग हो कर ही उन को सुकून मिलेगा. लेकिन अलग हो जाना, मायके चले जाना या फिर तलाक लेना परेशानी का सही हल हो सकता है? कहना आसान है कि आपस में नहीं बनती, इसलिए अलग होना चाहती हूं, पर उस से क्या होगा? पति से अलग हो कर आजादी की सांस लेने से क्या सारी मुसीबतों से छुटकारा मिल जाएगा?

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एक बार अपने भीतर झांक कर तो देखिए कि क्या आप के पति ही इन झगड़ों के लिए दोषी हैं या आप भी उस में बराबर की दोषी हैं. सीधी सी बात है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती. फिर रिश्ता तोड़ कर क्या हासिल हो जाएगा? आप तो जैसी हैं, वैसी रहेंगी. इस तरह तो किसी के साथ भी ऐडजस्ट करने में आप को दिक्कत आ सकती है.

तलाक का अर्थ ही है बदलाव और यह समझ लें कि किसी भी तरह के बदलाव का सामना करना आसान नहीं होता है. कई बार मन पीछे की तरफ भी देखता है. नई जिंदगी की शुरुआत करते समय जब दिक्कतें आती हैं तो मन कई बार बीती जिंदगी को याद कर एक गिल्ट से भी भर जाता है. पति की गल्तियां निकालने से पहले यह तो सोचें कि क्या आप अपने को बदल सकती हैं? अगर नहीं तो पति से इस तरह की उम्मीद क्यों रखती हैं? उस के लिए भी तो बदलना आसान नहीं है, फिर झगड़े से क्या फायदा?

2. कोई साथ नहीं देता

झगड़े से तंग आ कर तलाक लेने का फैसला अकसर हम गुस्से में या दूसरों के भड़काने पर करते हैं, पर उस के दूरगामी परिणामों से पूरी तरह बेखबर होते हैं. मायके वाले या रिश्तेदार कुछ समय तो साथ देते हैं, फिर यह कह कर पीछे हट जाते हैं कि अब आगे जो होगा उसे स्वयं भुगतने के लिए तैयार रहो.

अंजना की ही बात लें. उस का पति से विवाह के बाद से किसी न किसी बात पर झगड़ा होता रहता था. वह उस की किसी बात को सुनती ही नहीं थी, क्योंकि उसे इस बात पर घमंड था कि उस के मायके वाले बहुत पैसे वाले हैं और जब वह चाहे वहां जा कर रह सकती है. एक बार बात बहुत बढ़ जाने पर भाई ने उस के पति को घर से निकल जाने को कहा तो वह अड़ गया कि बिना कोर्ट के फैसले के वह यहां से नहीं जाएगा. जब भाई जाने लगे तो अंजना ने पूछा कि अगर रात को उस के पति ने उसे मारापीटा तो वह क्या करेगी? इस पर भाई बोला कि 100 नंबर पर फोन कर के पुलिस को बुला लेना.

उस के बाद कुछ दिन तो भाई उसे फोन पर अदालत में केस फाइल करने की सलाह देते रहे. पर जब उस ने कहा कि वह अकेली अदालत नहीं जा सकती है तो भाई व्यस्तता का रोना ले कर बैठ गया. अंजना ने 1-2 बार अदालत के चक्कर अकेले काटे, पर उसे जल्द ही एहसास हो गया कि तलाक लेना आसान नहीं है. आज वह अपने पति के साथ ही रह रही है और समझ चुकी है कि जिन मायके वालों के सिर पर वह नाचती थी, वे दूर तक उस का साथ नहीं देंगे. न ही वह अकेले अदालत के चक्कर लगा सकती है.

3. ऐडजस्ट कर लें

तलाक की प्रक्रिया कितनी कठिन है, यह वही जान सकते हैं, जो इस से गुजरते हैं. अखबारों में पढ़ें तो पता चल जाएगा कि तलाक के मुकदमे कितनेकितने साल चलते हैं. मैंटेनैंस पाने के लिए क्याक्या करना पड़ता है. फिर बच्चों की कस्टडी का सवाल आता है. बच्चे आप को मिल भी जाते हैं तो उन की परवरिश कैसे करेंगी? जहां एक ओर वकीलों की जिरहें परेशान करती हैं, वहीं दूसरी ओर अदालतों के चक्कर लगाते हुए बरसों निकल जाते हैं. अलग हो जाने के बाद भय सब से ज्यादा घेर लेता है. बदलाव का डर, पैसा कमाने का डर, मानसिक स्थिरता का डर, समाज की सोच और सुरक्षा का डर, ये भय हर तरह से आप को कमजोर बना सकते हैं.

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कोई भी कदम उठाने से पहले यह अच्छी तरह सोच लें कि क्या आप आने वाली जिंदगी अकेली काट सकती हैं. नातेरिश्तेदार कुछ दिन या महीनों तक आप का साथ देंगे, फिर कोई आगे बढ़ कर आप की मुश्किलों का समाधान करने नहीं आएगा.

आप का मनोबल बनाए रखने के लिए हर समय कोई भी आप के साथ नहीं होगा. कोई भी फैसला लेने से पहले जिस से आप की जिंदगी पूरी तरह से बदल सकती हो, ठंडे दिमाग से आने वाली दिक्कतों के बारे में हर कोण से सोचें. बच्चे अगर आप के साथ हैं तो भी वे आप को कभी माफ नहीं कर पाएंगे. वे आप को हमेशा अपने पिता से दूर करने के लिए जिम्मेदार मानते रहेंगे. हो सकता है कि बड़े हो कर वे आप को छोड़ पिता का पास चले जाएं.

मान लेते हैं कि आप दूसरा विवाह कर लेती हैं तब क्या वहां आप को ऐडजस्ट नहीं करना पड़ेगा? बदलना तो तब भी आप को पड़ेगा और हो सकता है पहले से ज्यादा, क्योंकि हर बार तो तलाक नहीं लिया जा सकता. फिर पहले ही क्यों न ऐडजस्ट कर लिया जाए. पहले ही थोड़ा दब कर रह लें तो नौबत यहां तक क्यों पहुंचेगी. पति जैसा भी है उसे अपनाने में ही समझदारी है, वरना बाकी जिंदगी जीना आसान नहीं होगा.

झगड़ा होता भी है तो होने दें, चाहें तो आपस में एकदूसरे को लाख भलाबुरा कह लें, पर अलग होने की बात अपने मन में न लाएं. घर तोड़ना आसान है पर दोबारा बसाना बहुत मुश्किल है. जिंदगी में तब हर चीज को नए सिरे से ढालना होता है. जब आप तब ढलने के लिए तैयार है, तो पहले ही यह कदम क्यों न उठा लें.

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स्नैक्स में परोसें बेसन ड्राईफ्रूट कोथिंबीर

अगर आप घर पर स्नैक्स के लिए कुछ टेस्टी और हेल्दी स्नैक्स बनाना चाहती हैं तो महाराष्ट्र की फेमस बेसन ड्राईफ्रूट कोथिंबीर ट्राय करें. ये कम समय में बनने वाली हेल्दी और टेस्टी रेसिपी है, जो आपकी फैमिली और बच्चों के लिए परफेक्ट रहेगी.

हमें चाहिए

–  1/2 कप बेसन

–  2 बड़े चम्मच काजू बहुत छोटे टुकड़ों में कटे

–  1/2 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

–  2 हरीमिर्चें बारीक कटी

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–  1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

–  1 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर

–  1 छोटा चम्मच इमली का पल्प

–  1/4 कप धनियापत्ती कटी

–  2 छोटे चम्मच रिफाइंड

–  नमक स्वादानुसार.

बनाने का तरीका

बेसन में 3 कप पानी व सभी मसाले मिला कर गाढ़ा घोल बनाएं. काजू भी डाल दें. एक नौनस्टिक कड़ाही में 1 चम्मच तेल गरम कर के चारों तरफ फैलाएं. इस में यह घोल डाल दें. अच्छी तरह गाढ़ा होने तक पकाएं. जब मिश्रण गाढ़ा हो जाए तब धनियापत्ती डालें. एक चिकनाई लगी प्लेट में जमा दें. ठंडा होने पर चौरस टुकड़े कर दें. बचे तेल से नौनस्टिक तवा चिकना करें और इन टुकड़ों को उलटपलट कर सेंकें. बढि़या नाश्ता तैयार है.

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मिशन क्वार्टर नंबर 5/2बी: भाग-3

विहाग ने एक बार फिर अपनी तरफ से क्वार्टर पाने की मुहिम तेज करते हुए पीडब्लूआई के सीनियर सिविल इंजीनियर के आगे अर्जी ले कर हाजरी दी.

बहुत व्यस्त इंसान, एक तरफ सरकार के घर कोई काम होता दूसरी ओर उन के घर में कोई नया वैभवविलास जुड़ जाता. यों करतेकरते एक मंजिल मकान अंदरूनी ठाठ के साथ तीन मंजिला विशाल बंगला तो बन ही चुका था, शहर के अंदरबाहर कई मालिकाना हस्ताक्षर थे उन के नाम. यानी बीसियों जगह उन की संपत्ति बिखरी पड़ी थी, तो स्वाभाविक ही था ऐसा इंसान उन्हें संभालने में व्यस्त रहेगा ही हरदम. खातेपीते चर्बी का प्रोडक्शन हाउस था उन का शरीर.

विहाग को इंजीनियर साहब ने बड़़े गौर से परखा. अनुभवी आंखों से कुछ क्षण स्कैन होता रहा विहाग का सर्वांग चेहरे से ले कर चप्पल तक. लड़का उन के हिसाब से जरा कम समझदार है. बोले, ‘‘तुम मेरे घर आओ, यहां बात नहीं हो सकती.’’

दूसरे दिन शाम को विहाग ने अपनी ड्यूटी का समय किसी दूसरे से बदल कर, ज्यादा दुरुस्त हो कर इंजीनियर साहब से कहे जाने वाले वाक्यों के विन्यासों पर मन ही मन नजर फरमा कर दरख्वास्त के कागजों के साथ उन के घर पहुंचा.

इंजीनियर उसे अपने आधुनिक सुसज्जित ड्राईंगरूम के गद्देदार सोफे पर बिठा कर अंदर चले गए. विहाग साभार धन्यवाद करते हुए कागजात की फाइल ले कर बैठा सामने दीवार पर टंगी घड़ी की सुई गिनने लगा. कभी सायास, कभी अनायास.

घड़ी दो घड़ी का कांटा जब घंटा भरभर का होने लगा और इंतजार नामुमकिन सा हो कर विहाग को बेबस करने लगा तब अंदर से परदा हटा कर एक गोरी सुंदर बहुत ही ज्यादा गोलमटोल मलाई में चुपड़ी सी मालपूए की काया वाली लगभग 30 वर्षीया बाला का पदार्पण हुआ. हाथ में उस के बड़ा सा ट्रे था जिस में सजे थे मनलुभावन मिठाइयां, नमकीन और शर्बत. विहाग सारे माजरे को भांप अंदर ही अंदर पसीने से तरबतर होने लगा.

क्वार्टर रिपेयर की बात कब होगी, कब रिपेयर शुरू होगा, कब वह शिफ्ट होगा और यह सब पिता द्वारा दी गई वैवाहिक वचन के रस्म के साथ कैसे तालमेल में सही बैठेगा.

इस बीच उस लड़की को फोन आया, उस ने ‘हां, हूं’ की और विहाग से लग कर बैठ गई. मनुहार के साथ उस की ओर मिठाईनमकीन की तश्तरियां एकएक कर आगे बढ़ाती रही.

इस कठपुतली नाच की डोर इंजीनियर साहब के उंगलियों में थी इस में अब विहाग कोे कोई शक नहीं था. वह सोफे के एक किनारे धंसा सा महसूस कर रहा था. जरा सी भी नानुकर से क्वार्टर का काम धरा रह जाएगा. इंजीनियर साहब न मुयायने के लिए कर्मचारी भेजेंगे, न रुपया सैंक्शन होगा, न मिस्त्री लगेंगे. फिर या तो अकेले खुद अपने हाथ से काई छीलो या फिर किराए के मकान में बीबी को ले कर बारबार उखड़ो और बसो. पौकेट पर वजन जो अलग आएगा उस का हिसाब तो कनाडा जाने वाले मांबाप को रखना नहीं है.

धर्मसंकट की घड़ी थी. बेमतलब बेवजह विहाग उस बाला से सवाल करता रहा ताकि अजीब सा लगने वाला यह वक्त कटे.

आखिर इंजीनियर साहब आए. इस हाथ ले, उस हाथ दे वाली मुखमुद्रा

बना कर सामने वाले सोफे पर धंस गए. बाला

की ओर उन्होंने देखा नहीं कि वह उठ कर खड़ी हो गई और जिधर से आई थी उधर ही विलीन

हो गई.

‘‘विहाग बाबू, इकलौती कन्या है, पढ़नेलिखने में मन नहीं था, मां इस की चल बसी थी, क्या कहें, सौतली मां से भी उसे सुख नहीं मिला, डिप्रैशन में रहती थी, ज्यादा ही खा पी गई.

लाडप्यार अब जो मैं ने दी तो घर का काम भी क्या करती, फिर मैं तो हीरे के सिंहासन में बिठा कर भेजूंगा उसे और आप जैसे हीरे के साथ रह कर बाकी तो सीख ही जाएगी. उम्र कुछ ज्यादा है, 30 की होने वाली है, लेकिन आप लोग इस जमाने के मौर्डन लड़के आप के लिए इन सब बातों का क्या मोल, तो मालिनी से आप की बात पक्की समझें?’’

‘‘सर मेरी अर्जी, वो क्वार्टर?’’ विहाग को बुक्का फाड़ कर रोने का मन हो रहा था, विहाग सा लड़का जिसे चाहिए एक आधुनिक सोच वाली धरती से जुड़ी लड़की, पढ़ीलिखी लेकिन गृहस्थी में रचीबसी बिलकुल तैयार गृहिणी. वह कल्पना के पंख से उड़े और जिंदगी को जोड़ने वाले तिनके दबा कर वापस आए, घर जोड़े, मन जोड़े, सप्रयास. यह मालपूए सी मालिनी जो हीरे के सिंहासन पर बैठ कर उस के घर (जो अब तक उखड़े प्लास्टर और काईयों का संगम ही था) आएगी और इस चर्बी के प्रोडक्शन हाउस के जरिए कठपुतली नाच नाचेगी. उस की बीबी बनेगी?

इंजीनियर ने दंभ से मुसकराते हुए कहा, ‘‘जिस घर में मेरी मालिनी जाएगी वह तुम्हारा जर्जर क्वार्टर नहीं होगा? तब तो मैं खुद उसे आलीशान घर दूंगा, जिस में तुम भी ऐश करोगे.’’

मुंह पर साफ कहने की आदत वाले विहाग की जबान ठिठक गई, गरम दिमाग विहाग को लगा कि एक चांटा रसीद दे उसे. जिस के लिए विलासिता के आगे मनुष्यता का पैमाना इतना छोटा है. लेकिन वक्त की कठिनाई उसे संयत रहने का हुनर सिखा रही थी.

‘‘सर, मैं वापस जा कर अपने पापा से बात करता हूं, उन्होंने एक जगह मेरी बात पक्की कर दी है, उन लोगों से भी बात करनी पड़ेगी. तब तक क्या मैं अपनी फाइल आप को दे जाऊं?’’

‘‘सीधी सी बात है, आप पापा से बात कर लें, और तब तक अपना कागज मेरे दफ्तर में फाइल की लाइन में लगा दें, जब इस शादी को हां हो जाए तो मुझे बता दीजिएगा, कोई कमी नहीं रहेगी, इतना कह सकता हूं.’’

सरकारी नियम कुछ भी हो, कुछ बातें विहाग के अख्तियार में तो नहीं थीं.

विहाग ने वापसी की. अब भी वह समझदार नहीं हुआ था, लेकिन समझ ही गया था. हफ्तेभर की नाइट ड्यूटी और कई दफा दिन की खलल वाली नींद के बाद वह एक मजदूर को ले कर क्वार्टर पर पहुंचा. इरादा था मजदूर के संग मिल कर क्वार्टर को घर बनाने की दिशा में कुछ कदम बढ़ाना, मसलन काइयों और झड़े प्लास्टर के साथ मकड़जाल की सफाई. यानी अपने खुद के ठिकाने की तरफ एक कदम.

बरामदे में पहुंचते ही चौंकने की बारी थी, अंदर कोलाहल सा था, दरवाजा अधखुला. बैडरूम से ठहाकों और अश्लील गालीगलौज की आवाजें आ रही थीं. जुए की बाजी बिछाए 30 के आसपास के 4 पुरुष और 2 बार गर्ल की वेशभूषा में इन चारों के साथ चिपकी बैठी शातिराना मुसकान बिखेर रही 20-22 साल की लड़कियां.

विहाग के तनबदन में आग लग गई, परेशान हो कर पूछा, ‘‘भाई लोग आप सब यहां कैसे?’’

तुरंत बात खींच ली हो जैसे, उन में से

एक आदमी ने छूटते ही कहा, ‘‘बाबू चाबी सिर्फ आप के पास ही नहीं थी, एक चाबी अभी भी सरकारी दराज में थी,’’ सभी भौंड़े तरीके से

हंसने लगे.

‘‘क्या मतलब?’’विहाग क्रोधित भी था और भौंचक भी. तुरंत एक कारिंदे ने कहा, ‘‘ए लिली, जा बाबू को मतलब समझा.’’

आगे पढ़ें- लड़कियां फुर्ती से आ कर विहाग से…

मिशन क्वार्टर नंबर 5/2बी: भाग-1

फौरीतौर पर देखा जाए तो मुझ जैसी स्टाइलिश लड़की के लिए वह बंदा इतना भी दिलचस्प नहीं था कि मैं खयालों के दीए गढूं और उन्हें अपने दिल में जलाए फिरूं. मगर जिंदगी बड़ी दिलचस्प चीज है. हम एक पल जिसे झुठलाते हैं, उसे ही दूसरे पल कबूलते हैं.

 

2 साल पहले की बात है मेरे पापा होमियोपैथी की प्रैक्टिस करते थे. अब तो उन की सेहत साथ नहीं देती, मगर एक समय था जब शहर में उन का बड़ा नाम था. रोज मरीज की लाइन लगी रहती थी. उस दिन मरीजों की कतार में एक दुबलापतला, लंबे कद वाला गेहूंए रंग का 26 वर्ष का लड़का बैठा था. हमारे 2 मंजिल के मकान के ऊपरी हिस्से में हमारा निवास था और नीचे पापा का क्लीनिक.

 

मैं उन दिनों एमबीए कर रही थी. उस दिन मुझे कालेज के लिए निकलना था. मैं ऊपर से नीचे आई. उसे मरीजों की लाइन में बैठा देखा. खैर, मैं अंदर पापा से कुछ कहने चली गई.

 

अभी मैं पापा से बात कर ही रही थी कि ये जनाब अंदर आए. पापा ने उसे कुछ ज्यादा ही इज्जत से बिठाया और मुझे रोक लिया. ‘‘देविका, ये विहाग हैं. हमारे यहां के नए स्टेशन मास्टर. पहली पोस्टिंग है. घरपरिवार से दूर हैं. अकेले हैं. तुम इन का साथ देना.’’

 

‘‘जी पापा.’’

 

‘‘तुम तो ट्रेन से कालेज जाती हो, इन से मिल कर मंथली पास बनवा लेना. मेरी इन से बात हो गई है.’’

 

‘‘जी पापा.’’

 

इस बीच उस ने अपनी बड़ीबड़ी आंखें मेरे चेहरे पर गड़ा दीं. उस की आंखों में एक अजीब सी खुमारी थी और होंठों पर लरजती सी मुसकान. मेरी सारी स्मार्टनैस गायब हो गई, ‘‘जी, जी’’ करती मैं बुत सी बनी रह गई.

 

अचानक बंदे ने पापा की ओर देख कर कहा, ‘‘सर कई दिनों से मुझे सर्दी है, रात को बंद नाक के मारे सो नहीं पाता. काफी कफ जमा है सीने में. हमेशा घरघर की आवाजें आती हैं.’’

 

मेरे पापा को शायद यह उम्मीद नहीं थी कि एक 23 साल की सुंदर, आकर्षक लड़की के सामने वह सर्दी और सीने में जमे कफ की बात करेगा. उन्हें आशा थी कि अपनी बीमारी की बात करने पापा ने जैसे ही दवा लिखने के लिए पैन उठाया मैं चुपचाप वहां से निकल आई. मेरे मन की तितलियों के पंख उस की सर्दी में लिपपुत कर औंधे मुंह गिर पड़े थे.

 

हां, मगर न, न कर के भी एक बात स्वीकार करती हूं. मैं उसे जबजब सोचती, होंठों पर खुद ही मुसकान आ जाती डायरी में कुछ लिखने की कोशिश करती, लेकिन, उफ, उस का चेहरा याद आते ही सर्दी की याद आ जाती. उस की घनी मूंछों की जब भी याद आती बंद नाक भी साथ सामने आ जाता. उस के शर्ट के जरा से खुले हुए बटन के नीचे से झांकता घना रेशमी जंगल मेरे दिल को ज्यों धड़काने को होता सीने में जमा उस का कफ मेरे इरादों को तहसनहस कर देता. मैं डायरी के हर पन्ने पर तारीख लिखती, आड़ीतिरछी रेखाएं बना कर डायरी बंद कर देतीं. रेखाएं थीं बेजुबान, वरना न जाने क्याक्या कह देती मेरे बारे में.

 

 

मेरे मन में उस की चाह ऐसी थी जैसे कोई पपीहा सूने और घने वन की किसी डाली

 

की एक अकेली सी फुनगी पर बैठ राग अलाप कर उड़ जाता हो और पीछे रह जाती हो बीहड़ की निस्तब्धता.

 

दिन बीते, मैं ने उसे भुलाने की कोशिश की. वैसे उस का आना भी अब काफी कम हो गया था. शायद उस की तबीयत अब ठीक थी.

 

मेरी शादी की बात अब जोर पकड़ने वाली थी, क्योंकि मुंबई से मुझे जौब औफर था. 30 साल की मेरी दीदी जिन्हें शादी से परहेज था, मां की मृत्यु के बाद हमारी मां बनी रहती और हमारे साथ रह कर ही नौकरी करती थी, मेरे मन की टोह लेने में लगी थी.

 

आखिर न, न करते मेरे चेहरे के भाव ने बड़ी रुखाई से बिना मेरी राय की परवाह किए मेरे दिल को साझा करने की गुस्ताखी कर ही डाली. दीदी ने मेरे मन की बात पापा तक पहुंचा दी थी.

 

अब विहाग की उपस्थिति सीधे हमारे डाइनिंग में दर्ज होने लगी. पापा की यही मर्जी थी. हर बार वह आता, मुसकरा कर बात करता और खापी कर चला जाता.

 

दिन निकल रहे थे, मेरे मुंबई जाने का दिन नजदीक आ रहा था, लेकिन इस शर्मीले मगर नीरस युवक से हम दिल की बात नहीं कह पाए. अंतत: पापा को कमर कसनी पड़ी और उन्होंने सीधे ही उस से मेरी शादी की बात पूछ ली.

 

मेरे खयाल से अन्य कोई भी युवक होता तो इतनी बार हमारे साथ डाइनिंग साझा करने के बाद मना करने में ठिठक जाता, कुछ सोचता और बाद में जवाब देने की बात कह कर महीनों टालता. हम इंतजार करते और वह मुंह छिपाने की कोशिश करता. मगर यह था ही अलग. कहा न, बंदे ने दिलचस्पी जगा दी थी.

 

खाना खा कर जाते वक्त पापा ने ज्यों ही पूछा तुरंत उस ने जवाब दे दिया. वह यहां शादी नहीं कर सकता था. वह ऐसी जगह शादी नहीं करेगा जहां उस का ससुराल नजदीक हो, ससुराल वालों के अत्यधिक संपर्क में रहना पसंद नहीं था उसे.

 

मैं डायरी को अपने कमरे के सब से ऊपरी ताक पर सीलन के हवाले कर मुंबई रवाना हो गई.

 

सालभर बाद मैं घर वापस आई. कुछ वजहों ने बहाने दिए और मेरी खामोश डायरी फिर ताक से उतर कर बोल पड़ी.

 

विहाग इस मध्यम आकार के शहर में स्टेशन मास्टर था. उस के मातापिता उज्जैन में रहते थे.

 

2 बहनें थीं जिन की शादी हो गई थी. ये छोटे थे और आत्मनिर्भर भी. 26 वर्षीय विहाग जब स्टेशन मास्टर के रूप में पदस्थापित हो कर आया तो उस ने इस छोटे से स्टेशन के सामने बने छोटेछोटे लेकिन सामान्य सुविधा युक्त एक कमरे, एक हौल वाले क्वार्टरों में से एक के लिए आवेदन दिया. क्वार्टर तो नहीं मिल पाया मगर वह शादीशुदा नहीं था तो एक सहकर्मी के सा िकिराये का मकान साझा कर रहने लगा.

 

यह साल 2013 था और नए नियुक्त इन लड़कों की तनख्वाह कुल मिला कर 25 हजार के आसपास थी. स्टेशन मास्टर की ड्यूटी अगर छोटे या मध्यम आकार के स्टेशन में होती तो स्टाफ की कमी की वजह से उन्हें 12 घंटे की ड्यूटी अकसर ही करनी पड़ती है. नाइट ड्यूटी तो आए दिन की आम बात थी. स्टाफ की कमी के कारण सप्ताह की एक छुट्टी भी मुश्किल थी. बारिश का मौसम हो, हाड़ कंपाती ठंड की रात बिना नागा ड्यूटी पर हाजिर होना ही पड़ता. छुट्टी की गुंजाइश तभी थी जब इंसान बीमार पड़ कर बिस्तर पकड़ ले.

 

आगे पढ़ें- बारिश और जाड़े की रात बाइक से भीगभीग कर…

मिशन क्वार्टर नंबर 5/2बी: भाग-4

उन की तरफ के सारे लोग बेहूदगी से हंस पड़े और 2 लड़कियां फुर्ती से आ कर विहाग से लिपट गईं. तुरंत उन में से किसी ने छोटा सा कैमरा निकाल लड़कियों के साथ विहाग की तसवीरें लेने की कोशिश की. विहाग ने बिना वक्त गंवाए उस के हाथ से कैमरा झपट कर जमीन पर दे पटका. चारों तैश में आ गए. मिल कर उन्होंने विहाग को उठा लिया और बरामदे से नीचे घास की तीखी झाडि़यों में फेंक दिया. विहाग सा सख्त जान अब कमजोर पड़ने लगा था. बाकायदा आंसू आ गए थे उस की आंखों

में. उठ कर सामने अपने स्टेशन के प्लेटफौर्म के एक किनारे लगे पेड़ के नीचे बेंच पर बैठ गया. थोड़ी देर आंखें बंद किए बैठा रहा, अंदरूनी कोलाहल ने उस की विचारने की शक्ति छीन

ली थी.

अचानक आंखें खुली तो सामने मुझे बैठ उसे अपलक निहारता देख वह दंग रह गया, ‘‘सोचा भी नहीं था न. मुंबई वाली नौकरी छोड़ अब पापा के पास ही आ गई हूं. दीदी के औफिस से उसे जापान भेजा गया है, लगभग 3 साल उसे वहां रहना है. पापा अकेले न पड़ें इसलिए मैं वापस आई. 4 स्टेशन बाद एक जगह नौकरी करती हूं. अभी ही ट्रेन से उतर कर तुम्हें यों बेहाल बैठा देख…’’

विहाग मेरे सानिध्य में जाने कैसे अपनी तकलीफ और चिंताएं भूलने सा लगा. कहीं सच के संदूक में अगर वह ताकझांक कर लेता तो अपने मन को वह पहले ही जान पाता.

‘‘क्या हुआ? क्यों उदास से अमावस के चांद बने बैठे हो?’’

विहाग असमंजस में था. एक ओर सुंदर शालीन उस के सामने देविका यानी मैं और मेरा प्रफुल्लित करने वाला सरल सानिध्य, तो दूसरी ओर जिंदगी की कशमकश.

इतने दिनों बाद मुझे देख कर विहाग को अच्छा ही नहीं, बल्कि काफी सुकून सा महसूस हुआ लेकिन तब भी विहाग तो विहाग ही था.

मुझ पर सामान्य सी नजर डालते हुए वह उठ खड़ा हुआ और जाने की रुत में खड़ाखड़ा पूछा, ‘‘और कैसी हो? शादी नहीं की अब तक?’’

‘‘नहीं, अरे कहां चले?’’

‘‘चलूंगा देविका आता हूं.’’

सचमुच यह आदमी, मैं भी भुनभुनाती हुई उठ खड़ी हुई.

किराए के कमरे में वापस आ कर वह सूनी आंखों से सूने छत की ओर

ताकता बिस्तर पर पड़ा रहा बेचैन. अचानक उस ने अपनी जरूरी नंबरों की डायरी निकाली, रोज के कुछेक संपर्क नंबर ही उस के हैंडसेट में रहते थे, जिस संपर्क की उसे तलाश थी उसे उस के बाबूजी ने तब दिया था जब उन्होंने उस की क्वार्टर की समस्या से पल्ला झाड़ कर उसे‘‘ससुराल वालों से बुझ लाइयो’’ के अंदाज में टरकाया था. धकधकाती सी छाती लिए उस ने फोन मिला लिया, तैयारी यह थी कि फोन पर जो भी मिलेगा उसे उस के मंगेतर रेवती से बात करवाने की अपील करेगा.

रिंग जाती रही, किसी ने उठाया नहीं. हार कर विहाग ने अपना सोचा हुआ त्याग दिया.

दूसरे दिन जब वह स्टेशन में ड्यूटी पर था टिकट काउंटर पर मैं पहुंची. विहाग को ड्यूटी पर देख पहले तो मैं बड़ी खुश हुई, पल में ही विहाग की मेरे प्रति विरक्ति की बात सोच उदास भी हो गई.

‘‘अभी तक मंथली पास नहीं बनवाया? रोजरोज किराया भरती हो?’’ मदद की इच्छा मन में दबाए विहाग ने अपना काम निबटाते हुए कहा.

‘‘इसी महीने से आनाजाना कर रही हूं

न,’’ विहाग की मेरे प्रति रुचि देख मुझे बड़ी तसल्ली हुई.

‘‘ये फार्म ले जाओ, वापसी में मेरी ड्यूटी तो खत्म हो जाएगी, तुम मेरा घर आ कर फार्म देना चाहो तो दे सकती हो, मेरे घर वैसे तुम्हारे घर से नजदीक ही पड़ेगा. मेरा फोन नंबर ले लो.’’

ढेर सारी कोयल की कूंकें मेरे सीने की अनजानी कंदराओं में चहचहा उठीं. बड़ी सी उम्मीद भरी मुसकान लिए मैं ने कहा, ‘‘नजदीक न भी होता तब भी देने आ जाती.’’ उस ने मेरी ओर एक नजर देख, बिना किसी प्रतिक्रिया के अपना काम देखने लगा. बुझी सी मैं फिर भी उस के चेहरे पर एक रोशनी देख रही थी. शाम 6 बजे तक मैं विहाग के कमरे में थी. कुछ देर पहले ही विहाग भी औफिस से लौटा था और सांझ वाली रसोई में अपनी चाय बना रहा था. इसी बीच मैं आ पहुंची और उस के बैडरूम में रखी कुरसी पर अपना आसन जमा लिया. चाय बनाते हुए ही वह रसोई से ही बात भी करने लगा और मुझे कमरे में ही बैठने को कहा. बात मसलन ऐसी हो रही थी कि यहां 5 कमरे हैं, जिन में 2-2 लोग कमरे साझा कर के रहते हैं. विहाग के कमरे का किराया कुछ ज्यादा है मगर अकेले रहने की सहूलियत पाने के लिए इतना सा ज्यादा देना वह पसंद करता है. पर अभी भी समस्या साझा रसोई की है ही, इतने लोगों के बीच 2 ही रसोई अनगिनत समझौतों की मुश्किलें पैदा करती है.

विहाग 2 कप चाय और प्लेट में नाश्ता रख जब तक रसोई से कमरे में मेरे पास आता कमरे में रखा विहाग का फोन बजा. स्क्रीन पर नंबर था, नाम नहीं. मैं ने फोन उठा कर ‘हैलो’ कहा ही था कि फोन कट गया.

‘‘कौन था?’’

‘‘पता नहीं, फोन उठते ही तो काट दिया.’’

विहाग ने नंबर देखा, रेवती या होने वाले ससुराल से था. विहाग इस वक्त शायद वहां फोन करना नहीं चाहता था. उस ने मुझ से ही धीरेधीरे बात करना जारी रखा. ‘‘एक बड़ी समस्या है. मुझे रेलवे क्वार्टर तो मिला है लेकिन रिपेयर करवाने की बड़ी समस्या आ गई है और अब तो गुंडों का भी कब्जा हो गया है, मेरे साथ बदसुलूकी भी की उन्होंने अब.’’

‘‘ओह, क्या तुम मुझे अपना क्वार्टर नंबर बता पाओगे? मैं कुछ कोशिश कर सकती हूं.’’

‘‘अच्छा? क्वार्टर रिपेयर का बहुत सा काम पड़ा है, अब मेरी तनख्वाह इतनी भी नहीं कि

मन पसंद रिपेयर करवा सकूं. बाहर किराए पर मकान लूं तो बारबार घर बदलने की उठापटक.

इसी वजह पीडब्लूआई के इंजीनियर के पास

गया था, लेकिन उस ने पहले तो अपनी बेटी मालिनी को मेरे सिर मढ़ने की कई तिकड़मे की, और बाद में क्वार्टर में गुंडे बिठा दिए. इधर

नौकरी की परेशानियां और अब तक रहने का सही इंतजाम नहीं.’’

मैं ने जरा टोह ली तो मालिनी से ही ब्याह… ‘‘मेरे इतना भर कहने से ही वह परेशान सा इधरउधर देखता बात घुमाने की कोशिश सी

करने लगा कि अचानक जैसे उस का मेरी कही बात पर ध्यान गया हो. चौंक कर पूछा, ‘‘तुम कुछ कर पाओगी?’’

मैं समझ गई महाशय बड़े मासूम से टैक्निकल हैं, इन का रोमांस जीने की जुगत से शुरू हो कर इसी में खत्म हो जाता है. अगर मैं उस की जिंदगी में आ पाई तो तेलनून में ही फूलों की खुशबू पैदा कर दूंगी.

मन की प्रसन्नता को छिपाते हुए और विहाग की सकारात्मकता को भांपते हुए मैं ने

कहा, ‘‘यह मेरे लिए आसान है, तुम मुझ पर

छोड़ दो.’’

‘‘क्या तुम्हारी कोई जानपहचान है? गुंडों को हटाना क्या आसान होगा?’’

‘‘तुम एक बार चाबी दे दो न, कोशिश

तो करूं.’’

‘‘समझा, लेकिन यह सरकारी काम है. विभाग से ही होना चाहिए थे, लेकिन फाइल तो कतार में लगी है, सब की अपनीअपनी भूख.’’

‘‘फाइलें कतार में पड़ी रहें तो क्या हम भी ऐसे ही पड़े रहें. इतनी बंदिशों में रहोगे तो समस्या से मुक्ति कैसे मिलेगी? थोड़ा और प्रैक्टिकल सोचो विहाग, बल्कि सोचना ही काफी नहीं जब तक किसी समस्या का समाधान हमें न मिले प्रयास करते ही रहना चाहिए.’’

आगे पढ़ें- अमूमन आम भारतीय पुरुषवादी सोच इस ओर घूम जाती है कि लड़की…

मिशन क्वार्टर नंबर 5/2बी: भाग-2

ऐसी जद्दोजहद वाली ड्यूटी में स्टेशन से निवास स्थान की दूरी भी अच्छीखासी

परेशानी बन गई थी विहाग के लिए. बारिश और जाड़े की रात बाइक से भीगभीग कर ड्यूटी जाने के कारण छोटी सी सर्दी भी दमा बन जाती थी. वापस आ कर खाना बनाओ, घर के काम भी संभालो और परिवार वाले उस के पास आने के लिए उसे अपना एक अकेले का मकान लेने को उतावला करें, सो अलग निबटो. खैर, विहाग की परेशानी किसी तरह बड़े साहब तक पहुंचाई गई और काफी लिखापढ़ी के बाद उस के नाम पर क्वार्टर आवंटित हुआ. विहाग झट से क्वार्टर देखने निकल पड़ा.

मध्यम आकार का चिरपरिचित रेलवे क्वार्टर.

क्वार्टर के सामने बगीचा बनाने लायक अच्छीखासी जमीन थी, लेकिन यह बिन फेंसिंग बाउंड्री वाल के पास उगे झाड़झंखाड़ तथा चूहों के बिल से पटी पड़ी थी.

आगे बढ़ते, आसपास झांकते हुए विहाग 4 ऊंची सीढि़यों से चढ़ते हुए बरामदे में पहुंचते ही बड़ीबड़ी म??????यह क्वार्टर सही मायनों में रहने लायक बनाने के लिए उस की भी हालत इन चूसे हुए कीड़ों सी हो जाएगी. व्यवस्था का मकड़जाल तो बल्कि उस से भी ज्यादा निर्मम है. खैर विहाग टोह लेता आगे बढ़ा और लकड़ी के खड़खड़ाते घुन लगे दरवाजे खोल अंदर गया. यह क्वार्टर करीबकरीब 2 साल से इस्तेमाल में नहीं था. विहाग से पहले इस स्टेशन में एक बुजुर्ग स्टेशन मास्टर बहाल थे, जो अपने घर से आ कर ड्यूटी बजाते. उन के रिटायरमैंट के बाद विहाग की नई पोस्टिंग थी. सो अब तक इस क्वार्टर को कोई पूछने वाला नहीं था.

कमरे में चारों ओर प्लास्टर उखड़ा पड़ा था, खिड़कीदरवाजे, टूटेफूटे नल, बदहाल

साफसफाई के सैकड़ों काम अलग मुंह चिढ़ा

रहे थे. विहाग ने उज्जैन वाले घर में खुद

अपनी पसंद का बाथरूम बनवाया था, एकएक सैटिंग आधुनिक.

उस ने बाथरूम का दरवाजा धकेला. दरकी हुई जमीन पर सूखी हुई काई का डेरा. पानी रखने का सीमेंटेड टैंक भी क्रैक. आंगन में दरारें आ चकी थीं और टैंक में भी कई क्रैक थे. घर में मुंह धोने को एक बेसिन तक नहीं. उज्जैन के अपने चुस्तदुरुस्त घर में रहने के आदी विहाग के लिए यहां रहना नामुमकिन था. उस ने ठान लिया कि शिफ्ट करने से पहले वह इस क्वार्टर को अपने मनमुताबिक ढालेगा. इसे आधुनिक सुविधासंपन्न करेगा, मगर कैसे? एक सुविधा संपन्न क्वार्टर के लिए इस समय खर्च तो 40 से 50 हजार का बैठता ही है. आए कहां से?

सरकार को अर्जी लगाने से ले कर उस के बनने में कम से कम 6 महीने तो आराम से लगेंगे तब भी इस से यह क्वार्टर नियमानुसार इतना ही सुधरेगा जैसे कि कोई नाकभौं सिकोड़ कर किसी नामुराद सी जगह में प्रवेश करता है और काम निबटा कर निकलते ही एक भरपूर सांस लेता है. यह विहाग का घर होगा या यह वह घर हो पाएगा जहां विहाग के छोटेछोटे सपने अंगड़ाइयां ले कर आएंगे?

अपनी नई सी गृहस्थी के फूलों वाले झूले पर अनुराग के मोती जड़ेंगे? सोच कर ही विहाग का मन उचट गया.

वह सपनों की दुनिया में खो नहीं जाता, हां, सपनों को हकीकत में बदलने के लिए वास्तव के धरातल पर कुछ ठोस कदम रखना जरूर जानता है.

तो वे कदम क्या हों जो उस की जायज मुरादों में जान फूंक दें? इस के पिताजी कुछ अलग किस्म के हैं, शायद एहसान जताने वाले कहना भी बहुत गलत नहीं होगा, विहाग उन की मदद किसी भी हाल में नहीं लेगा. रह गई बात उस की तो 25 हजार सैलरी में अभी उस के पास इतने तो हैं नहीं कि वह इस क्वार्टर को इस लायक बना ले कि शादी के बाद बीबी और उस के घरवालों के सामने वह सर उठा कर यह साबित कर दे कि स्टेशन मास्टर की नौकरी कोई ऐरेगैरे की नौकरी नहीं.

घूमफिर कर बात वही इंजीनियरिंग विभाग में अर्जी देने की आती है.

विहाग अगले दिन सुबह 6 से दोपहर 2 बजे की ड्यूटी पूरी कर सिविल इंजीनियरिंग सैक्शन में अर्जी ले कर पहुंचा. उम्मीद थी अपना परिचय देने पर यहां के कर्मचारी द्वारा तवज्जो से बात की जाएगी. लेकिन विहाग द्वारा अपना परिचय दिए जाने के बाद भी वे जिस तल्लीनता से फाइल में मुंह घुसाए मिले उस से विहाग को अंदाजा हो गया कि इन बाबुओं की जेबों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति बड़ी तेज है और इस आकर्षण से जरूरत के मारे आगंतुकों की जेबों का बच पाना टेढ़ी

खीर है.

विहाग को यहां कई टेबल पर प्रवचन मिले तो कुछ टेबल पर प्रौपर चैनल से गुजर कर काम निकालने में लगने वाले समय की भयावहता का अंदाजा. इस तरह इस विभाग में 2 घंटे भटक कर भी नतीजा नहीं निकला. अब विहाग के पास नया काम था ‘‘मिशन क्वार्टर नंबर 5/2 बी’’.

चुपचाप रहने वाले लड़के की अब दिनचर्या बदल गई. ड्यूटी के बाद लोगों से वह मेलजोल बढ़ाता, संपर्क सूत्र ढूंढ़ता, जानकारी जुटाता, अपील करता और उदास होता रहता.

सर्दीजुकाम तो जबतब होता रहता है उसे, लेकिन अब उस का हमारे यहां आना नहीं के बराबर था.

घर से उसे उस के पिताजी का फोन आया था. उन्होंने एक लड़की देखी थी जो विहाग के

लिए माकूल यानी योग्य थी. विहाग को जल्द हां कहना था. हां कहने का कोई दूसरा विकल्प नहीं था, यह हां तो विवाह में वर के उपस्थित रहने की रजामंदी भर ही थी वरना विवाह तय ही था.

सरकारी नौकरी, पद नाम स्टेशन मास्टर. उस के पापा के अनुसार ग्रैजुएट लड़की से विवाह के लिए यह रुतबा सही था. बाकी विहाग जाने.

विहाग के लिए अपने पापा से बात करना जरूरी था. उस ने किया भी, ‘‘मुझे शादी करने में कोई आपत्ति नहीं, बल्कि मैं तो करना ही चाहता हूं, रोजरोज खाना बना कर ड्यूटी जाना अब दूभर हो चुका है. लेकिन ब्याह कर लाऊंगा तो रखूंगा कहां उसे? क्वार्टर मेरे खुद के पैर रखने की हालत में नहीं है.’’

‘‘मुझे यह सब मत सुनाओ, मकान किराए पर ले लो, तुम्हारे दायित्व से निबट कर हम दोनों तुम्हारी दीदी का घर संभालने कनाडा जाएंगे. रिटायरमैंट के बाद अब तक कहीं गया नहीं, सालभर वहां रुक कर छोटी के पास कैलिफोर्निया, उज्जैन का घर किराए पर चढ़ा कर आ रहे हैं, तुम्हारे लिए कुछ हिस्सा रखा रहेगा. 2 साल बाद जब लौटना होगा तब किराया खाली कराएंगे. शादी तय करने का इतना बड़ा काम हम ने कर दिया अब खुद संभालो.’’

‘‘शादी तो मैं भी कर लेता, ठौरठिकाने की सोचते तो बात ज्यादा भली न होती.’’ मन में सोच कर ही रह गया कोफ्त से भराभरा विहाग.

पिता ने सांत्वना के दो शब्द जोड़ते हुए कहा, ‘‘ज्यादा दिक्कत है तो लड़की के घर वालों से बात करो, मैं एक फोन नंबर दे दूंगा तुम्हें. हम ने बात पक्की कर ली है, इतना खयाल रखना.’’

फोन कट गया, विहाग भी समझ गया. बहस बेकार है, उस की मां भी जिंदगीभर

ऐसे दबंग पति के आगे गरदन झुकाने के सिवा कुछ कर नहीं पाई. वह भी तो उसी खेत की मूली है.

आगे पढ़ें- विहाग ने एक बार फिर अपनी तरफ से …

मिशन क्वार्टर नंबर 5/2बी: भाग-5

पहली बार विहाग को दो कदम आगे सोचने वाला मिला था. अमूमन आम भारतीय पुरुषवादी सोच इस ओर घूम जाती है कि लड़की शादी से पहले इतनी तेज है तो शादी के बाद जरूर पति को गुलाम बना कर छोड़ेगी, विपरीत इस के विहाग काफी प्रसन्न था कि यह लड़की जिम्मेदारी उठाने में निसंकोच है. यह मिशन सिर्फ क्वार्टर का ही तो नहीं था, मिशन जीवन को एक सशक्त आधार देने के लिए ठोस संबल के चुनाव का भी था.

यद्यपि विहाग का मुझ पर इस काम को पूरा कर लेने के संबंध में विश्वास कम ही था, लेकिन अभी उस के पास सिवा इस के कोई चारा भी नहीं था कि वह इस मामले में मुझे अपना प्रयास कर लेने दे.

घर जा कर मैं ने अपने कालेज के दोस्त का नंबर ढूंढ़ा, जो रेलवे पुलिस बल में अधिकारी था. अच्छी बात थी कि इसी शहर में उस की पोस्टिंग थी. मैं ने अपनी परेशानी बताई तो वह गुंडों को क्वार्टर से हटवाने में मेरी मदद करने को राजी तो हो गया लेकिन बात यह थी कि इस समय वह स्वयं कुछ व्यस्त और परेशान चल रहा था.

दरअसल उस की दूसरे राज्य में शादी तय हो गई थी, और उसे बारातियों के लिए ट्रेन में कोच बुक करना था, जिस में कुछ कानूनी बातें आड़े आ रही थी. मैं इन दोनों कामों के बीच सेतु बन गई और विहाग की मदद से उस दोस्त का काम और दोस्त की मदद से विहाग का काम करवा दिया. दोनों बेहद खुश हुए और विहाग के दिल में मेरे लिए एक अलग जगह बन गई.

सरकारी महकमे में बात पहुंचते ही सिविल विभाग से कुछ कर्मचारी मुयाएने को पहुंचे, फाइल निकाली गई और हफ्ते 10 दिन में रिपेयरिंग के लिए सैंक्शन भी आ पहुंचा. मोटे तौर पर रेलवे

की ओर से जो मरम्मत का काम हुआ उस से

कुछ हद तक घर रहने लायक बना ही, मैं भी अपने औफिस से छुट्टी ले कर और अपने पैसे की चिंता न कर घर के सौंदर्यीकरण पर जो दिल से लगी रही, इस से सरकारी क्वार्टर अब वाकई सपनों से सींचा स्वप्न महल बन गया था. बीचबीच में जब भी विहाग क्वार्टर आता मैं उस से उस की पसंद पूछना न भूलती, इस से विहाग को बड़ी तसल्ली होती.

मरम्मत के लिए साजोसामान से ले कर घर की फिटिंग और मिस्त्रियों से काम निकालने की कला तक में मैं ने जो छाप छोड़ी विहाग कायल हुए बिना नहीं रह सका.

बीती रात विहाग के पिताजी ने फोन किया था. कहा, ‘‘क्या बात है शादी से पहले तुम्हारे साथ कौन सी लड़की थी? रेवती को तुम ने फोन किया था, बाद में उस ने जब फोन किया तो किसी लड़की ने फोन उठाया?’’‘‘यह खबर इतनी बड़ी थी कि आप तक पहुंच गई.’’

‘‘तुम असली बात बताओ न. शादी से पहले किसी होने वाली पत्नी को यह अच्छा लगेगा क्या?’’

‘‘बुरा लगने से पहले उसे पता तो होना चाहिए कि बुरा लगने वाली बात थी भी या नहीं. ठीक है, जैसे उसे बिना जाने ही बुरा लगा और आप के पास मेरी स्थिति समझे बिना ही शिकायत चली गई, वैसे ही मैं भी बिना कुछ बताए इस रिश्ते में आगे न बढ़ पाने की अपनी असमर्थता जता रहा हूं, बता दीजिएगा.’’

विहाग के पापा तो चीख ही पड़े, अंदाजा ही नहीं था कि विहाग की इतनी हिम्मत हो जाएगी.

‘‘क्या बोल रहे हो, कुछ होश है.’’

विहाग को थोड़ी देर के लिए खुद पर आश्चर्य हुआ, कहीं इस हौंसले के पीछे मेरे प्यार की महीन सी अनुभूति तो नहीं थी. उसी रौ में कहा उस ने, ‘‘शादी में कोई समझौता नहीं पापा,यह आपसी समझ और पसंद की बात है, मुझे तब तो कोई लड़की नहीं मिली थी, जब उस ने फोन किया था, लेकिन अब बहुत ही हुनरमंद, जिम्मेदार, समझदार और खयाल रखने वाली लड़की मिल गई है और नि:संदेह मैं उसी से शादी करने वाला हूं.’’

‘‘इतनी हिम्मत मत दिखाओ, मैं बात कर चुका हूं.’’

‘‘आप मना कर दीजिए पापा, शादी सिर्फ आप की बात रखने के लिए नहीं करूंगा. बिना जाने ही जो शक कर ले उस के साथ आगे नहीं बढ़ूंगा. मेरे हिसाब से बीबी देविका जैसी होनी चाहिए, पति के हर काम में मददगार, जिम्मेदारी उठाने में समर्थ. शांत और सहज.’’

‘‘लड़की कहां की है?’’

‘‘इसी शहर की.’’

‘‘कहता था आसपास ससुराल पसंद नहीं.’’

‘‘जब लड़की भा गई तो ससुराल कहीं भी हो. फिर गैरजिम्मेदार लड़कियों का मायका नजदीक हो तो रिश्ते दरकने लगते हैं, देविका ऐसी नहीं है, उसे रिश्तों की समझ और परख दोनों हैं.’’

पापा ने फोन रख दिया था, यानी विहाग स्वतंत्र था.

और अंतत: मेरी संवाद कला ने वह समां बांध दिया कि विहाग के घरवालों का आशीष भी शहनाई के सुर में सरगम सा शामिल हो गया.

विवाह बाद नातेरिश्तेदारों के चले जाने से पसरी रिक्तता में चांदनी रात की स्वप्निल दूधिया रोशनी में आंगन वाले झूले पर बैठे हम दोनों एकदूसरे को अपलक देख रहे थे.

विहाग की आवाज शहद थी, कहा, ‘‘देविका.’’

चितवन की चपलता ने मेरा भी मधुकलश खोल दिया था, ‘‘हूं, कहो.’’

‘‘सर्दी लग जाएगी, बाहर ठंड बढ़ रही है और कल बिस्तर की चादर वगैरह धो लेना, नएपन की खुशबू से मुझे एलर्जी हो जाती है.’’

मुझे हंसी आ गई, मैं ने क्या उम्मीद की थी और यह विहाग. मैं ने उस का माथा

चूमते हुए कहा, ‘‘जरूर, मगर आज की रात कितनी खास है. क्या तुम मुझे और कुछ नहीं कहोगे.’’

विहाग को अपनी रूखी सी बात पर अफसोस हुआ, तृष्णा जड़ी दो स्वप्निल आंखों ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘चलोचलो, अंदर, यहां सर्दी लग जाएगी. अंदर जा कर सिर्फ कहूंगा ही नहीं…’’

ये बंदा बड़ा प्रैक्टिकल सा रोमांटिक है. थोड़ा बच्चा भी. सम्मोहित सी मैं मुसकरा कर उस के साथ चल पड़ी.

भाई के रिसेप्शन पर छाईं टीवी की रानी श्वेता तिवारी, पिंक साड़ी में बिखेरा जलवा

पौपुलर टीवी एक्ट्रेस श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) इन दिनों अपने भाई निधान तिवारी की शादी में फैमिली संग जमकर मस्ती कर रही हैं. पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में रहने वाली श्वेता (Shweta Tiwari)  की फोटोज सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही हैं. हाल ही में श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) की बेटी पलक तिवारी संग ग्लैमरस फोटोज ने काफी धमाल मचाया था, जिसके बाद अब श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) ने कुछ फोटोज शेयर की हैं, जिसमें वह अकेले ही हुस्न के जलवे बिखेरती नजर आईं. आइए आपको दिखाते हैं श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) की लेटेस्ट फोटोज…

लहंगे में श्वेता तिवारी ने बिखेरे जलवे

श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) ने हाल ही में पिकं कलर के लहंगे में फोटोज शेयर की, जिसमें वह बेहद खूबसूरत लग रही थीं. पिंक कलर के लहंगे में औफस्लीव ब्लाउज के साथ श्वेता तिवारी का लुक ग्लैमरस था, जिसमें वह बेटी पलक तिवारी (Palak Tiwari) को टक्कर दे रही हैं.

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साड़ी में श्वेता का लुक था परफेक्ट


भाई की शादी के रिसेप्शन में श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) का लुक भी देखने लायक था, वेडिंग रिसेप्शन में श्वेता (Shweta Tiwari) ब्राउन कलर की सिंपल साड़ी में नजर आईं. साथ ही वह अपने इस लुक में फोटोज भी क्लिक करवाती नजर आईं. एक फोटो में तो श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) शरमाते हुए भी नजर आईं.

शादी की फोटोज कर रही हैं शेयर

श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) के भाई निधान तिवारी की शादी धूमधाम से संपन्न हो गई है, जिसकी हर रस्मों की फोटोज श्वेता अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर फैंस के लिए शेयर कर रही हैं. वहीं फैंस को भी श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) की ये फोटोज काफी पसंद आ रही हैं.

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बेटी के साथ श्वेता का दिखा ग्लैमरस लुक

 

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सोशल मीडिया पर वायरल हुई फोटोज में श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) और उनकी बेटी पलक चौधरी साथ में मस्ती करते हुए नजर आ रही हैं, जिसमें दोनों की बौंडिंग साफ दिख रही है. भाई की शादी में शामिल होने के लिए श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) और उनकी बेटी पलक तिवारी ने खूबसूरत गाउन पहना था, जिसमें उनका लुक काफी ग्लैमरस लग रहा था.

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