जब मिलना हो फ्यूचर वाइफ के पेरेंट्स से

“देख अकेला पंछी मुझे यह जाल बिछाया है …. इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पर बुलाया है”

यह सदाबहार गाना अक्सर उन लोगों की जुबान पर होता है जो अपने भावी जीवनसाथी यानी बौयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड के पैरंट्स से पहली दफा मिलने की प्लानिंग कर रहे होते हैं. मन में कहीं न कहीं यह खौफ जरूर होता है कि कहीं यह मुलाकात रिश्ते के लिए खतरे की घंटी न बन जाए.

वस्तुतः पहला इंप्रेशन ही अंतिम इंप्रेशन होता है. इसलिए पहली मुलाकात को ले कर युवा बहुत ही कौन्शस होते हैं. सही भी है रिश्ते की नींव भले ही पड़ चुकी हो मगर बंधन मजबूत बने इस के लिए जरूरी है भावी जीवनसाथी के करीबी लोगों से खूबसूरत रिश्ते की शुरुआत. बात जब बौयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड के पेरेंट्स की हो तो इंसान कोई भी खतरा मोल लेना नहीं चाहता. भावी  फादर इन लौ या मदर इन लौ से पहली मुलाकात के लिए जाते समय कुछ बातों का ख्याल जरूर रखें.

1. नशे में चूर न रहें

पहली मुलाकात के समय किसी भी तरह का नशा न करें. इस से सामने वाले को महसूस होगा जैसे आप खुद पर नियंत्रण नहीं रख सकते या ईमानदार नहीं है. जब कि पहली मुलाकात में जरूरी है कि आप खुद को विश्वसनीय , ईमानदार और संतुलित मानसिकता वाले व्यक्ति के रूप में दर्शाएं.

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2. धर्म, सेक्स या राजनीतिक विषयों पर न उलझें

कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिन को जितना ही छेड़ो उतना ही विवाद बढ़ता है या सामने वाले को आप के बारे में गलत संदेश जा सकता है. भले ही आप अपने भावी जीवनसाथी के साथ इन विषयों पर कितनी भी चर्चा करते हो मगर जरूरी नहीं कि उस के पेरेंट्स भी आप के साथ इन बातों को डिस्कस करने में रुचि रखते हो.

3. झूठ का सहारा न लें

कुछ लोग पहली मुलाकात में खुद को बेहतर साबित करने के चक्कर में अपनी खूबियों को बढ़ाचढ़ा कर बोलते हैं. प्रॉपर्टी को ले कर भी झूठ बोल जाते हैं. मगर ध्यान रखें , इस तरह आप अपने जीवनसाथी और उन के अभिभावकों की नजरों में गिर जाएंगे. क्योंकि जब उन्हें असलियत पता लगेगी तो उन की नजर में आप का सम्मान कम हो जाएगा.

4. फोन से उलझे न रहे

पहली मुलाकात के समय फोन पर लगातार मैसेज करने, व्हाट्सएप या ईमेल चेक करने या ब्राउजिंग आदि करने से बचें. इस से आप के भावी जीवनसाथी के पेरेंट्स को लगेगा जैसे आप उन से बातें करने में रुचि नहीं रखते और वे खुद को अपमानित महसूस करेंगे.

5. ओपन माइंड के बने

आप का जीवनसाथी अलग परिवेश से आता है. उस के मांबाप की सोच बिल्कुल जुदा हो सकती है इसलिए उन से पहली दफा मिलते समय अपना दृष्टिकोण संकुचित न रखें. उन की किसी भी बात पर आप उत्तेजित हो जाते हैं या उलटा जवाब देते हैं तो समझिए की एक खूबसूरत रिश्ता जुडताजुड़ता रह जाएगा.

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6. मेहमान की तरह व्यवहार न करें

अगर आप मिलने के लिए उन के घर डिनर या लंच पर गए हैं तो खाना सर्व करते समय या टेबल क्लीन करते हुए बिल्कुल भी अलग बैठे न रहे. ये छोटेछोटे एटिकेट्स होते हैं जिन का ख्याल रखना जरुरी है. फैमिली मेंबर की तरह हर काम में आगे बढ़कर मदद करें.

7. पैसों के बारे में बात न करें

पहली बार मिलते समय घर पैसों से जुड़ी छोटीबड़ी बातें जैसे घर कितने का लिया, लोन पर है या खरीदा हुआ, सैलरी क्या है, या कितना किराया जाता है, कार कितने की है जैसी विषयों पर बात करने के बजाय रिश्ते को बेहतर बनाने पर फोकस करें.

8. अपने कपड़ों पर ध्यान दें

घर पर जो भी मिला वही पहन कर मिलने चल देना उचित नहीं. पहली मुलाकात में अपने कपड़ों पर विशेष ध्यान दें ताकि उन्हें महसूस हो कि आप इस मीटिंग को सीरियसली ले रहे हैं और उन को महत्व दे रहे हैं.

9. सिर्फ अपने बारे में बात न करें

पहली मुलाकात में आप और भावी जीवनसाथी के पेरेंट्स ,दोनों ही एक दूसरे से अनजान होते हैं. ऐसे में केवल अपनी जिंदगी की कहानी सुनाते रहने से अच्छा है कि आप उन के बारे में भी पूछें. ताकि उन्हें महसूस हो कि आप उन के बारे में जानने को उत्सुक है. अपनी बातचीत में संतुलन बना कर रखें.

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घर के लिए पुराने न्यूजपेपर का ऐसे करें इस्तेमाल

एक दिन अगर न्यूजपेपर न आए तो चाय का स्वाद फीका हो जाता है, पर पढ़ने के साथ ही उसे रद्दी में फेंक दिया जाता है. इसके बाद महीने के अंत में उसे कबाड़ी के हवाले कर दिया जाता है. पर क्या आप ये जानती हैं कि जिस न्यूजपेपर को आप कबाड़ समझकर फेंक रहे हैं, उसका इस्तेमाल घर की कई चीजों को सहेजने में किया जा सकता है?

1. कांच के सामान चमकाने में

क्या आपके लाख चाहने के बावजूद आपके कांच के दरवाजे , खिड़कियां और फ्रेम में चमक नहीं आ पाती है? अगर हां तो, एकबार इन चीजों को अखबार से साफ करके देखें.अखबार को हल्का गीला करके इन चीजों को साफ करने से इनकी खोई चमक लौट आती है.

2. सब्जी रखने के काम में

क्या आपकी हरी सब्जी फ्रिज में रखने के बावजूद एक या दो दिन में सूख जाती है? अगर हां, तो एकबार उन्हें अखबार में लपेटकर रखें. अखबार में लपेटकर रखी गई हरी सब्जी ज्यादा दिनों तक ताजी बनी र‍हती है.

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3. आलमारियों पर बिछाने के काम में

पुराने अखबारों को बाथरूम,किचन और दूसरे कमरों की कैबिनेट पर बिछाया जा सकता है. इन्हें हटाना और लगाना बेहद आसान है. ऐसे में पैसे बचाकर रैक और कैबिनेट को साफ रखा जा सकता है.

अगर आप एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं और आपके पास कांच का काफी सामान है तो, उनकी सुरक्षा बेहद जरूरी होती है. ऐसे में कांच के सामान को अखबार में अच्छी तरह से लपेटकर ट्रंक में रख दें. अखबार में लिपटे कांच के सामान ज्यादा महफूज होते हैं.

4. कार में बिछाने के लिए

न्यूज पेपर को फुट मैट की जगह रखकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. खासतौर पर बरसात के दिनों में जबकि फुट मैट को रोज-रोज साफ कर पाना संभव नहीं होता है. ऐसे में अखबार बिछाकर उन्हें गंदा होने से बचाया जा सकता है.

5. किताब पर कवर लगाने में

पुराने समय में तो लोग किताबों और कॉपियों पर अखबार का ही कवर लगाया करते थे. अगर आपके पास ब्राउन पेपर नहीं है तो तुरंत की हालत में अखबार बुरा विकल्प नहीं है.

6. रचनात्मकता

यदि आप क्रिएटिव हैं तो, अखबार की मदद से तरह-तरह के पॉट, लैम्प-शेड और गुलदस्ते भी बना सकते हैं.

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Bigg Boss 13: कैप्टेंसी टास्क के चलते हुआ घर में हंगामा, शेफाली ने की सबकी नींदे हराम

बिग बौस सीजन 13 में आए दिन कोई ना कोई टास्क के चलते दर्शकों को घर में युद्ध का माहौल देखने को मिलता है. ऐसा ही कुछ बीते एपिसोड के कैप्टेंसी टास्क में देखने को मिला जिसका नाम था चूहा बिल्ली टास्क. इस टास्क में कंटेस्टेंट रश्मि देसाई और शेफाली बग्गा की जमकर लड़ाई हुई और इसकी वजह ये थी कि सबने मिलकर शेफाली बग्गा को गेम से आउट होने का बोला. इसके बाद तो जैसे शेफाली बग्गा का गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुंच गया.

रश्मि और शेफाली बग्गा के बीच घमासान युद्ध…

रश्मि और शेफाली बग्गा के बीच काफी घमासान बहस हुई जिससे कि घर का हर सदस्य दंग रह गया और यही नहीं बल्कि दर्शक भी शेफाली का ये रूप देख कर काफी हैरान थे. इन दोनो की लड़ाई के चलते रश्मि के हाथ में एक प्लेट थी जो उन्होनें काफी जोर से नीचे फेंकी और तोड़ दी. इसके बाद जब अरहान रश्मि को शांत कराने किचन एरिया में आते हैं तो रश्मि अरहान की भी कोई बात नहीं सुनती और उन्हें वहां से जाने के लिए कहती हैं.

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कैप्टेंसी टास्क हुआ रद्द

इस दौरान शेफाली बग्गा अपना आपा खो बैठती हैं और गुस्से में आ कर टास्क की हर चीज तोड़ देती हैं. ऐसा घर में पहली बार देखने को नहीं मिला है बल्कि इससे पहले भी कई बार इस सीजन में कंटेस्टेंट के इस बर्ताव को देख बिग बौस टास्क रद्द करने पर मजबूर हो जाते हैं. ऐसा कंटेस्टेंटस तब करते है जब टास्क में उनके मन का नहीं हो रहा होता तो वे पूरी कोशिश करते हैं की किसी तरह टास्क रद्द हो जाए और इसके लिए वे टास्क की चीजें तोड़ देते हैं.

शेफाली ने ऐसे उड़ाई सबकी नींद

इतना सब करके भी शेफाली बग्गा का गुस्सा शांत नहीं हुआ और वे आने वाले एपिसोड में सबकी नींदे हराम करती हुई नजर आने वाली हैं. जी हां बिग बौस शो के मेकर्स नें आज के एपिसोड का एक प्रोमो रिलीज किया है जिसमें साफ दिखाई दे रहा है कि शेफाली बग्गा गुस्से में किसी को भी सोने नहीं देती और सबके पास जा जा कर थाली बजाने लगेगी. जिसके कारण परेशान घर के सभी सदस्य मिल कर शेफाली बग्गा को बाथरूम में बंद कर देंगे.

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अब देखने वाली बात ये होगी की कैप्टेंसी टास्क रद्ध होने पर बिग बौस की क्या प्रक्रिया होगी और कौन बनेगा घर का अगला कैप्टन.

Written By:- Karan Manchanda

मैंने परिवार के साथ रहना सीखा है – गौरी किरण

मराठी फिल्म ‘पुष्पक विमान’ से चर्चित होने वाली अभिनेत्री गौरी किरण का नाम आज नामचीन अभिनेत्रियों की सूचीं में शामिल हो चुका है. किसान परिवार से सम्बन्ध रखने वाली गौरी को बचपन से ही कुछ अलग करने की इच्छा थी, जिसमें साथ दिया उनकी माता दीपाली महाजन और पिता दत्तात्रेय महाजन ने. स्वभाव से विनम्र और हंसमुख गौरी ने पहले छोटे-छोटे अभिनय कर मराठी इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनायी और जब मौका मिला तो उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वह एक अनुभवी अभिनेत्री है. कोई गौडफादर न होने और अनिश्चित विधा होने की वजह से गौरी ने पढ़ाई ख़त्म की और इस क्षेत्र में उतरी. उसकी शादी हो चुकी है, पर काम के साथ वह परिवार की भी अच्छी तरह से देखभाल करती है. गौरी के इस सफलतम जीवन का राज क्या है आइयें जाने उन्ही की जुबानी.

सवाल- अभिनय में आने की प्रेरणा कहां से और कैसे मिली?

मैं कोंकण एरिया के रत्नागिरी जिले के एक छोटे से गांव वेरल से हूं. जहां केवल एक ही बस शाम को जाती है. वहां मेरा स्कूल भी 5 किलोमीटर दूर था, जहाँ चलकर जाना पड़ता था. दूरदर्शन या सह्याद्री मराठी चैनल ही देखती थी, पर बचपन से माँ चाहती थी कि मैं कुछ अलग करूं. मेरी मां भी बहुत अच्छी मिमिक्री किसी की भी कर लेती थी. इसके अलावा जब भी गांव में किसी अवसर पर कोई कार्यक्रम होता था, मेरी माँ मुझे तैयार कर उसमें भाग लेने के लिए कहती थी. स्कूल कौलेज में और कई एकांकी नाटक भी मैंने किये, जो दर्शको को बहुत पसंद आई और मुझे अवार्ड भी मिला. इससे मेरा हौसला बढ़ा अभिनय की ओर रूचि बढ़ी. मेरी प्रिंसिपल ने भी मुझे मुंबई आकर इस क्षेत्र में काम करने की सलाह दी थी, पर मैं पढाई पूरी करने के बाद ही इस क्षेत्र में उतरी, ताकि इसमें सफल न होने पर कुछ और कर सकूं.

सवाल- संघर्ष कितना था?

सबसे अधिक संघर्ष मुंबई में आकर रहना था, किसी ने यहाँ तक कहा कि अगर इस फील्ड में काम करना है तो मेरे घर मत आओं, पर मेरी एक दूर की रिश्तेदार जो विरार में रहती थी. उनके साथ रहना शुरू किया. इसके बाद प्रसिद्ध अभिनेता जयंत घाटे की एक धारावाहिक के लिए ऑडिशन दिया, पर तब मुझे कैमरे की कोई ज्ञान नहीं थी. मैंने थिएटर की तरह ही औडिशन दिया. जिसे देख पूरा यूनिट मुझपर हंसा, पर मैं दृढ़ थी, क्योंकि मुझे इस क्षेत्र में काम करना था. इसके बाद कई धारावाहिकों में मुझे छोटी-छोटी भूमिका मिलनी शुरू हो गयी थी, पर पैसों की तंगी थी, क्योंकि कहीं से भी पैसे नहीं मिल रहे थे. मेरे परिवार की वित्तीय अवस्था इतनी अच्छी नहीं थी कि वे मुझे हेल्प कर सकें. मेरी बड़ी बहन ने मुझे इस फील्ड में आने के लिए बहुत सहायता की थी. पैसों की तंगी से बचने के लिए मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई ख़त्म होने के तुरंत बाद नौकरी कर ली और बाद में इस क्षेत्र में आने की सोची. साढ़े चाल साल नौकरी करने के बाद मुझे फिर से ब्रेक मिला.

सवाल- पति का सहयोग कितना रहता है?

मेरे पति किरण कोठावदे भी अभिनय के क्षेत्र से ही है और मैं उनसे थिएटर के दौरान मिली थी. उन्होंने मुझे मेरे अभिनय स्किल को आगे बढ़ाने की सलाह दी. फिर से मैंने अभिनय करना शुरू किया. इस दौरान मुझे ‘पुष्पक विमान’ मराठी फिल्म मिली और इसके लिए मुझे महाराष्ट्र का स्टेट अवार्ड भी मिला और मेरा काम चल पड़ा.

सवाल- संघर्ष के दौरान मानसिक सहयोग आपको कैसे मिला?

परिवार को पता था कि मैं जो भी करुँगी अच्छा ही करुँगी. उन्होंने हमें बहुत सहयोग दिया. मैं भी अपने काम के ज़रिये उन्हें रेस्पेक्ट देना चाहती थी, जो मैं कर पायी. शादी मैंने माँ की ख़ुशी के लिए ही किया, ताकि उन्हें मेरे लिए अधिक चिंता न हो, क्योंकि वे मुझसे दूर रहती है और इस इंडस्ट्री के बारें में उन्हें अधिक ज्ञान नहीं.

सवाल- किस तरह की अभिनय आप अधिक पसंद करती है?

मेरी फिल्म ‘पुष्पक विमान’ की मेरी भूमिका को दर्शकों ने अपने आप से रिलेट किया था और अब मैं निगेटिव भूमिका कर रही हूं. मुझे हर तरह के अलग और चुनौतीपूर्ण भूमिका करना पसंद है. मराठी फिल्म ‘ब्लैंकेट’ में मैंने बहुत ही अलग भूमिका निभाई है, जो दर्शकों को चकित कर देगी.

सवाल- आउटसाइडर होने की वजह से मराठी इंडस्ट्री में भेद-भाव का सामना करना पड़ा?

अधिकतर मराठी एक्ट्रेस गाँव से आयें है और सफल भी है, ऐसे में अगर आपमें प्रतिभा है तो आपका रंग रूप और आउटसाइडर होना कोई माइने नहीं रखता. देर लगती है, पर काम मिलता है.

सवाल- किस चरित्र ने आपकी जिंदगी बदल दी?

पुष्पक विमान की भूमिका स्मिता ने मेरी जिंदगी बदल दी. दर्शकों से लेकर इंडस्ट्री में सभी ने मेरी अभिनय क्षमता को देखा था.

सवाल- परिवार के साथ काम की सामंजस्य कैसे करती है?

मैंने परिवार के साथ रहना सीखा है और सालों तक रहने के बारें में सोचती हूं. इससे सामंजस्य करने में कोई समस्या नहीं आती. मेरे सास ससुर बहुर अच्छे है और मुझे किसी भी काम से रोकते नहीं. उन्होंने मुझे बेटी मान लिया है. मुझे न तो खुद बदलना है और न ही किसी को बदलने की जरुरत है, इससे  सामंजस्य अपने आप ही बैठ जाता है.

सवाल- सफल वैवाहिक जीवन का राज क्या है?

हर युवा को ये समझने की जरुरत है कि अगर आपको अगला पसंद है, तो उसे बड़ा करने के लिए उसके माता-पिता ने अपनी पूरी जान लगायी है. उसके अच्छे लगने में सबसे अधिक  सहयोग उसके माता-पिता का ही है. इसलिए उन्हें सम्हालना जरुरी है.

सवाल- आप कितनी फूडी और फैशनेबल है?

मैं बचपन से खाना बनाती हूं और बहुत फूडी हूं. महाराष्ट्रियन किसी भी व्यंजन को मैं आसानी से बना लेती हूं. फैशन सेन्स पहले मुझे बिल्कुल नहीं था. मेरा देवर पंकज को फैशन के बारें में काफी जानकारी है और वह मुझे सहयोग देता है.

सर्दियों में मेकअप के नए और लुभावने ट्रेंड्स करें ट्राय

पर्सोना सैलून और मेकओवर अकादमी की मेकओवर एक्सपर्ट मल्लिका गंभीर द्वारा विंटर सीजन के आगमन का स्वागत  करते  हुए इस साल फैशन में रहने वाले आकर्षक और लुभावने लुक्स और ट्रेंड्स पेश किये गए. ये लुक्स प्राचीन और आधुनिक के  खूबसूरत समागम को पेश करते  हुए दिखे. इस अवसर पर पेर्सोना सैलून करोल बाग और इंदिरापुरम ( गाजियाबाद ) में आर्गेनिक जोन भी लांच किया गया, जो आर्गेनिक और नेचुरल ब्यूटी रिचुअल्स को प्रमोट करेगा.

नेचुरल और सटल दिखे

खूबसूरती के इस सेलिब्रेशन में आधुनिक और अल्ट्रा मौडर्न लुक्स की शोकेसिंग की गयी,  जिसमें वेस्टर्न इन्फ्लुएंस से इंस्पायर्ड बौलीवुड के नए लुक्स पेश किये गए. इन लुक्स में जहां हेयरस्टाइल्स वेस्टर्न रहे और उन्हे ट्रेडिशनल एक्सेसरीज से सजाया गया, वहीं पिछले साल की अपेक्षा इस साल मेकअप नेचुरल और सटल दिखे,  इनोवेटिव तरीकों से इन लुक्स को प्रस्तुत किया गया, ताकि महिलाएं हर अवसर पर नया मेकओवर कर सकती हैं. इन ब्यूटी लुक्स के जरिये इस सीजन के ट्रेंड्स को शोकेस किया गया, जो दिल्ली एनसीआर के युवाओं और उनकी पसंद को ध्यान में रखकर क्रिएट किये गए. सभी लुक्स फ्यूज़न रहे और उनके द्वारा मौडर्न व आधुनिक के ब्लेंड को रिफ्लेक्ट किया गया.

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एक्सपर्ट से जानें

इस अवसर पर  पेर्सोना  सैलून और मेकओवर अकादमी से मेकओवर एक्सपर्ट मल्लिका गंभीर ने कहा , ” फैशन अपनी परिनिधि बदलता रहता है और दिल्ली एनसीआर की महिलाओं के समझ फैशन के मामले में बेहद सुलजी हुई है, वे अपनी पर्सनालिटी के हिसाब से वे नए नए लुक्स चाहती हैं, इस साल के ट्रेंड्स पर बात करते हुए उन्होने बताया क़ि पिछले साल की अपेक्षा इस साल मेकअप और लुक्स सॉफ्ट और सटल  रहेंगी और ब्लिंगी मेकअप को नेचुरल मेकअप रिप्लेस करेंगे, शेड्स में रेड के साथ ही मैरून, पिंक और मर्जेंटा शेड्स इन रहेंगे, हेयर स्टाइल्स में फ्लावर एक्सेसरीज और स्वरोस्की का भी फैशन दुबारा लौट कर आया है, पिछले साल पर्ल और गोल्ड लीफ एक्सेसरीज महिलाओं द्वारा पसंद की गयी थी. इस मौके पर मोगरे और गुलाब के साथ  बेहद नए और अनूठे हेयर स्टाइल्स पेश किये जो सभी को पसंद आये.

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डर लगता है कहीं मेरी आवाज़ न चली जाए- सिद्धार्थ कन्नन

जी टीवी पर आने वाले नए शो ‘प्रो म्यूजिक काउंटडाउन’ को होस्ट कर रहे हैं टीवी, रेडियो होस्ट और यू टूयब सेंसेशन सिद्धार्थ कन्नन. 14 साल की उम्र से वे रेडियो होस्ट के रूप में काम कर रहे हैं. 1997 में उन्हें सब से कम उम्र के रेडियो होस्ट का अवार्ड भी मिल चुका है. उन्होंने कई लोकप्रिय टीवी शोज होस्ट किये हैं. पेश है, हाल ही में उन से की गई बातचीत के मुख्य अंश;

सवाल- शो के दौरान आप किस सैलिब्रिटी के साथ दिल से कनेक्ट हुए?

यदि दिल से कनेक्ट होने की बात की जाए तो मैं अर्जुन कपूर का नाम लेना चाहूंगा. बातचीत के दौरान अर्जुन ने बताया कि पहली दफा जब वे फिल्म ‘संजू’ देख रहे थे तो एक दृश्य के आने पर काफी भावुक हो गए और रोने लगे. फिल्म के उस दृश्य में संजय दत्त अपनी फिल्म रिलीज होने पर रोए थे, क्यों कि उस समय तक उन की मां गुजर चुकी थीं. अर्जुन के बताने पर मैं भी भावुक हो उठा. मैं समझ सकता हूं कि मां को खोने का गम क्या होता है और यही गम अर्जुन कपूर ने भी महसूस किया था.

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सवाल- टीवी पर बहुत से चैट शो चल रहे हैं जैसे द कपिल शर्मा का शो‘, ‘कॉफी विद करणआदि. आप का शो दूसरों से अलग कैसे है?

हम मस्ती और कॉमेडी के साथसाथ वास्तविक जीवन से जुड़ी बातें भी करेंगे. हमारे शो में सैलिब्रिटीज की निजी जिंदगी और उन के सफर को ले कर काफी रोचक बातें होंगी. उन के जीवन के इमोशनल पहलू भी टच किए जाएंगे. उदाहरण के लिए अर्जुन कपूर से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि पहले उन का वजन 140 किलोग्राम था. अभी भी वे चलते हैं तो उन्हें लगता है जैसे उन का वजन बहुत ज्यादा है. इसी तरह मैं ने प्रियंका से पूछा कि निक जोंस के साथ झगड़ा इंग्लिश में करती हैं या हिंदी में तो वे बताती हैं कि दिमाग में हिंदी के शब्द घूम रहे होते हैं और लड़ाई इंग्लिश में करती हूं.

इस शो में 70 % एंटरटेनमेंट और 30 % इमोशनल टच होगा. यह शो ऑनेस्ट है, रियल है. इस में कुछ भी बनावटी नहीं है.

इस सब के अलावा हमारे इस चैट शो में ट्रेंडिंग गानों का काउंटडाउन भी है जिसे काउंटडाउन हम काफी रिसर्च के बाद तैयार कर रहे हैं कि कौन से गाने आने वाले समय में लोकप्रिय होने वाले हैं. इस शो में फिलहाल इंडियन फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े एक्टर्स शामिल किए जाएंगे.

क्या आप को लगता है कि इतनी प्रतियोगिता के बीच शो को लोकप्रिय बनाए रखना आप के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी होगी?

प्रतियोगिता होने में ही मजा आता है. इस शो में मैं फिल्म इंडस्ट्री वालों से इस तरह की बातें करता हूं जो इंडस्ट्री वाले आपस में ही करते हैं. मैं हमेशा पहले से अच्छा करने का प्रयास करता हूं. शो में बिल्कुल रियल रहता हूं. जैसे घर में बातें करता हूं, जैसा दोस्तों के साथ हूं वैसे ही शो में स्टार्स के साथ रहता हूं. इस शो में आप को कौमेडी के साथसाथ इमोशनल टच भी मिलेगा.

सवाल- 14 साल की उम्र से आप रेडियो जॉकी का काम कर रहे हैं. बतौर रेडियो जॉकी और वॉइस ओवर आर्टिस्ट आप को एंकर बनने में क्या सुविधा हुई?

जब मैं ने रेडियो में काम की शुरुआत की थी तब कंप्यूटर नहीं होते थे. उस समय आज की उन्नत टेक्नोलॉजी भी नहीं थी. हमें कई काम एकसाथ करने पड़ते थे. तब चौपिंग टेक्नीक भी नहीं थी यानी जो बोला सो बोला. आजकल जो प्रोग्राम लाइव होते है उन्हें भी 5 मिनट पहले ही शूट कर लिया जाता है. पर उस समय सब कुछ लाइव होता था यानी डाइरेक्ट लाइन होती थी. यहां तक कि सीडी प्लेयर के हिलने पर उसे खुद ही कवरअप करना पड़ता था. कोई गलती होती थी तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी खुद पर होती थी और इस बात का कॉन्फिडेंस भी आ गया था कि कुछ भी हो जाए मैं सब सही कर लूंगा. रेडियो में केवल आवाज देखी जाती है. आप के कपड़े या बाल नहीं देखे जाते. आवाज पर ही वर्क करना पड़ता है. मेरे बोलने का लहजा बेहतर होता गया. रेडियो की वजह से ही मैं अपने हुनर पर एकाग्रता ला पाया. रेडियो में काम के कारण ही मेरा प्रेजेंस ऑफ माइंड बढ़ा. रेडियो प्रोग्राम के लिए काफी रिसर्च करनी पड़ती है सो यह भी स्ट्रौंग हो गया. रेडियो की वजह से ही लाइव जाजा कर ही मेरे अंदर इतना आत्मविश्वास आया है.

सवाल- कोलकाता से यहाँ तक का सफर कितना टफ था?

मेरे पैरंट्स कॉरपोरेट वर्ल्ड में थे. 7 साल कोलकाता और 7 साल लखनऊ में रहने के बाद 14 साल की उम्र में मम्मीपापा के साथ मैं मुंबई आ गया. 16 साल की उम्र में वे चेन्नई चले गए और मैं जिद कर के अकेला भाई के साथ मुंबई में ही रहा. 16 साल से आज तक अपने मम्मीपापा से मैं ने कुछ भी नहीं लिया.

इस सफर की  शुरुआत मैं ने 14 साल की उम्र में रेडियो से की थी. उस वक्त कोई भय नहीं था कि मुझे बड़ा सुपरस्टार बनना है या पैसा कमाना है .इन सब बातों का कोई प्रेशर नहीं था. तब मैं क्लास 10 में था. एक शो के 300 रूपए मिलते थे. 200 बच जाते थे जिन्हें कॉलेज में जा कर खर्च कर आता था. बड़े स्टार्स के साथ भी बिंदास बातें करता था. यंग था. कुछ खोने का डर नहीं था. एक होस्ट, वौइस् ओवर आर्टिस्ट और आर जे के रूप में आगे बढ़ता रहा.

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सवाल- अपनी प्रेरणा किसे मानते हैं?

मेरे मातापिता ही मेरी प्रेरणा हैं. उन्होंने मुझे सिखाया है कि जीवन में करने के लिए बहुत कुछ है. केवल पढ़ाई या केवल काम के बजाय जिंदगी जीने और नई चीज़ें सीखने का भी प्रयास करते रहना चाहिए. हर इंसान की कद्र करनी चाहिए और जो मन में है उसे बोल देना चाहिए.

सवाल- आप को जिंदगी में किस बात का डर लगता है?

मुझे डर लगता है कि कहीं मेरी आवाज़ न चली जाए. मैं किसी दिन उठूं और बोल नहीं पाऊं तो क्या करूँगा? एक्चुअली करीब 7 साल पहले मेरे साथ ऐसा हो चुका है. मेरे गले में लंप आ गया था और मुझे बोलने में तकलीफ होने लगी. बहुत बोलने और पर्याप्त पानी न पीने की वजह से यह समस्या हुई थी. तब डॉक्टर ने सलाह दी थी क़ि या तो 6 माह चुप बैठो या फिर सर्जरी करा लो. मगर सर्जरी से आवाज़ भी जा सकती थी. 45 दिन चुप रहने के बाद अंततः मैं ने सर्जरी करा ली थी .

छोटी सरदारनी: क्या मेहर के बच्चे का सारा सच जान पाएगी हरलीन?

कलर्स के शो छोटी सरदारनी में मेहर की प्रेग्नेंसी का खुलासा हो चुका है. गिल फैमिली में खुशी का माहौल है. हर कोई मेहर और सरब को बधाई दे रहा है, लेकिन अब लगता है शो में जल्द ही इन खुशियों पर ग्रहण लगने वाला है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आने वाला ट्विस्ट…

मेहर ने किया हरलीन से वादा

पिछले एपिसोड में आपने देखा कि प्रैग्नेंसी के चलते हरलीन मेहर का ख्याल रखना शुरू कर देती है, इससे मेहर अपने आप में शर्मिंदगी महसूस होने लगती है. मेहर हरलीन से कहती है कि जब उसे जरूरत हो तो वह कुछ भी मांग सकती है.

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मेहर की प्रैग्नेंसी रिपोर्ट लगी हरलीन के हाथ

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पार्टी में परम मेहर की प्रेग्नेंसी रिपोर्ट लेकर आता है, जो हरलीन के हाथ लग जाती है. लेकिन हरलीन के हाथ लगी प्रैग्नेंसी रिपोर्ट में ऐसा क्या था, जिसे देखकर वह हैरान रह जाती है.

क्या पूरा सच पता कर पाएगी हरलीन

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हरलीन को अपनी आंखो पर भरोसा नही हो रहा है, वो विश्वास नही कर पा रही है की मेहर की रिपोर्ट में जो उसने देखा वह सच है.

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इसी के साथ ये देखना भी दिलचस्प होगा कि क्या हरलीन मेहर की प्रैग्नेंसी से जुड़ा पूरा सच पता लगा पाएगी? जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, रात 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

ये रोग छीन सकते हैं आपके आंखों की रोशनी

जिस्म का हर अंग बेहद अहम है, लेकिन आंखों से ज्यादा अहम दूसरा अंग नहीं होता. आप के आंखों की रोशनी सही है, देखने में कोई दिक्कत नहीं है तो आप को इस बात की फिक्र नहीं होगी कि आंखों पर कोई आंच आ सकती है. यह और बात है कि उम्र बढ़ने के साथ आंखों की रोशनी आज जैसी मजबूत नहीं रहेगी.

आंखों के सिलसिले में आंख खोलने वाली बात यह है कि आंख से जुड़ी बीमारियों के अलावा भी कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं जो आंखों की रोशनी को इतना ज्यादा प्रभावित कर सकती हैं कि इंसान अंधेपन के करीब पहुंच जाए.

विशेषज्ञ डाक्टरों का कहना है कि ऐसी कई बीमारियां हैं जो आंखों से जुड़ीं नहीं होती हैं लेकिन वे आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं. वे कहते हैं कि डायबिटीज और हाइपरटेनसिव रेटिनोपैथी, तम्बाकू और अल्कोहल एम्ब्लौयोपिया, स्टेरौयड का इस्तेमाल और ट्रामा इंसान को अंधा बना सकते हैं और लोगों को इस का पता बहुत देर से चलता है.

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गौरतलब है कि लांसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल की पिछले साल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 3.6 करोड़ अंधे लोगों में से 88 लाख अंधे भारत में थे. भारत के राज्यों में ब्लाइंडनेस यानी अंधेपन को कंट्रोल करने के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाया जाता है जो कहता है कि अंधेपन के करीब 80-90 फीसदी मामलों का या तो इलाज हो सकता है या उस की रोकथाम की जा सकती है.

जांच है अहम

आंखों को सेहतमंद रखने की लिए उन की जांच कराते रहना चाहिए और जांच के बाद डाक्टर जो सलाह दें उस पर अमल करना चाहिए. डाक्टरों का कहना है कि शुगर और ग्लूकोमा के मरीजों में अंधेपन के मामले रेगुलर जांच नहीं कराने के चलते होते हैं. रोग का इलाज जितना अहम होता है उतना ही अहम फौलो-अप होता है यानी रेगुलर जांच कराना.

बच्चों में रेफ्रेक्टिव एरर के कई मामलों में मातापिता उन्हें चश्मा पहनने के लिए हतोत्साहित करते हैं. कई बच्चों की आंखें कमजोर होती हैं, उन की आंखों का इलाज नेत्र विशेषज्ञ से कराना चाहिए.

वहीं, उम्र और मौडर्न लाइफ के तनावों से ज्यादातर लोगों को आंख पर दबाव महसूस होता है. इस बारे में डाक्टरों का कहना है कि अकसर लोगों को यह एहसास ही नहीं होता कि प्रदूषण, धूम्रपान, ज्यादा शराब पीने के अलावा डायबिटीज, मोटापा और हाइपरटेंशन जैसी जीवनशैली से जुड़ीं बीमारियां आंखों की रोशनी पर बुरा असर डालती हैं.

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20 से 25 साल की उम्र वाले काफी लोग आंखों की कमजोर रोशनी की समस्या से जूझ रहे होते हैं लेकिन उन्हें इस के बारे में पता तक नहीं होता है. वे अपनी आंखों की जांच कभी नहीं करवाते. उन्हें लगता है कि सिरदर्द तनाव से हो रहा है. यहां पर डाक्टरों का कहना है कि अगर मरीज को इस का एहसास हो जाए और वह फौरन अपनी आंखों की जांच कराए तो कभीकभी रोशनी खराब होने से रोका जा सकता है.

इस प्रकार, आप सावधान हो जाएं और कोई भी बीमारी होने पर डाक्टर से कंसल्ट करें और उन की बताई सलाह पर अमल करें ताकि आप की आंखें इस खूबसूरत दुनिया को आप की आखिरी सांस तक निहारती रहें.

इंटरनैट पर साइबर बुलिंग का आतंक

भारत में साइबर मौबिंग का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. देश में किशोरों और बच्चों को धमकाने, प्रताडि़त करने और ब्लैकमेल करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है. ऐसी ही कुछ घटनाएं हाल में हुई हैं. कानपुर के एक स्कूल में पढ़ने वाला विवेक साइबर बुलिंग का शिकार हो गया. कुछ बदमाश युवकों की दहशत से विवेक अब न तो कंप्यूटर पर काम करता है और न ही स्कूल के मैदान में खेलने जाता है. वह लगातार आसमान की तरफ देखता रहता है.

ऐसा ही कुछ सृजन के साथ भी हुआ. वह बनारस के एक पब्लिक स्कूल में पढ़ता है. उस के दोस्तों ने फोटोशौप पर उस की फोटो एडिट कर क्लास की एक लड़की के साथ जोड़ दी और सोशल नैटवर्किंग साइट पर अपलोड कर दी. तभी से सृजन और वह लड़की शर्म के मारे एक महीने तक स्कूल नहीं गए. पंजाब में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली 21 साल की एक छात्र अपने हौस्टल के कमरे में पंखे से लटकी मिली. उस का कंप्यूटर इंजीनियर बनने का सपना था. उस के कमरे में एक नोट मिला जिस में उस ने आरोप लगाया था कि कालेज के 2 पूर्व छात्र कथित तौर पर फेसबुक पर उस के बारे में आपत्तिजनक कमैंट कर उसे परेशान करते थे.

इसी तरह बेंगलुरू में आईएमए में पढ़ने वाली नीलम जो एक होनहार लड़की थी, ने भी आत्महत्या कर ली. नीलम का अपने बौयफ्रैंड से ब्रैकअप हुआ और सुबह जब वह उठी तो उस युवक ने कथित तौर पर फेसबुक पर लिखा था. ‘मैं सुपर कूल महसूस कर रहा हूं क्योंकि मैं ने अपनी ऐक्स गर्लफ्रैंड को छोड़ दिया है.’ इस के बाद नीलम ने आत्महत्या कर ली. इलाहाबाद के एक स्कूल में निशी को मामूली सी बात पर उस के दोस्तों ने अपने गु्रप से बाहर कर दिया क्योंकि उस की स्कूल गु्रप के एक लड़के से कहासुनी हो गई थी. उस का बदला लेने के लिए उस की कक्षा के बच्चों ने निशी को व्हाट्सऐप गु्रप से डिलीट और फेसबुक से अनफ्रैंड कर दिया. 16 साल की निशी ने इस से खुद को अपमानित महसूस किया.

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उस के चेहरे की खुशी गायब हो गई. उस के गुमसुम रहने के कारण मातापिता भी चिंतित हैं सार्वजनिक होती जिंदगी आजकल बहुत से युवा अपने निजी जीवन का एकएक पल फेसबुक, ट्विटर पर खुल्लमखुल्ला जीते हैं. उन्हें यह समझ में नहीं आता कि ऐसे में उन की निजी जिंदगी अपनी न रह कर सार्वजनिक हो जाती है. फिर उन के जीवन का हर पहलू दुनिया के सामने रहता है. जब अनजान लोगों से करीबी बढ़ती है तो ऐसे में साइबर बुलिंग की आशंका भी बढ़ जाती है. देश में बच्चे जिस तेजी से इंटरनैट से जुड़ रहे हैं, उसी तेजी से वहां होने वाली गुंडागर्दी के शिकार भी हो रहे हैं. साइबर की दुनिया उन्हें चंद मिनटों में मजाक का पात्र बना रही है. वे अपने ही दोस्तों में बदनाम होने लगे हैं और आत्महत्या कर रहे हैं.

आज साइबर बुलिंग मातापिता और टीचर्स के लिए चुनौती बन रही है. उन की समझ में नहीं आ रहा कि बच्चों को इस से कैसे बचाया जाए, आज साइबर दुनिया में कमैंट्स से दादागीरी करने वालों की भरमार है. ऐसे लोग बेवजह दूसरों के निजी मामलों में घुसपैठ करते हैं. कमैंट्स, अश्लील टिप्पणी तथा कैंपेन पेज बनाने में उन को मजा आता है. ये दूसरों का सुखचैन खत्म करने पर तुले रहते हैं. दरअसल, साइबर बुलिंग आज साइबर दुनिया की जानलेवा वजह बन गई है. सुनंदा पुष्कर की मौत क्यों हुई? यह जांच का विषय है, लेकिन सच यह है कि वे भी साइबर दुनिया के उन सिरफिरों की शिकार थीं जो किसी के भी मानसम्मान और नाम पर दाग लगाने को आमादा हैं.

साइबर बुलिंग है क्या साइबर बुलिंग के बारे में लोग ज्यादा नहीं जानते, इसलिए वे उस के शिकार होते हैं, लेकिन इसे समझना मुश्किल नहीं है. आज यह बालिग और नाबालिग हर तरह के नैट यूजर्स के लिए खतरा बन चुका है. दरअसल, इस का मतलब इंटरनैट के जरिए किसी को धमकाया, डराना या प्रताडि़त करना होता है. इंटरनैट पर की गई हर ऐसी गतिविधि बुलिंग है जो किसी आदमी को निशाना बनाती है. किसी की निजी जानकारी, फोटो या वीडियो सार्वजनिक करना साइबर बुलिंग है. किसी के बारे में इंटरनैट पर अश्लील बातें करना भी साइबर बुलिंग है. साइबर संसार में किसी भी तरीके से किसी को ब्लैकमेल करना भी साइबर बुलिंग ही कहलाता है.

आंकड़ों की बात करें तो भारत में इस तरह औनलाइन प्रताड़ना, परेशानी या शर्मिंदगी का शिकार होने वालों में 53% इंटरनैट का इस्तेमाल करने वाले हैं. एक सर्वेक्षण के मुताबिक, अकेले कोलकाता महानगर में यह समस्या हर साल 30 फीसदी की दर से बढ़ रही है. करीब 55 फीसदी अभिभावकों का मानना है कि नैटवर्किंग साइबर के कारण ऐसा हो रहा है. भारत में करीब 50 प्रतिशत किशोर मोबाइल फोन पर इंटरनैट का इस्तेमाल करते हैं. दरअसल, साइबर अपराधों और कानून की जानकारी न होने की वजह से देश में ऐसे अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं. युवा इस के सब से ज्यादा शिकार हैं. सोशल नैटवर्किंग साइबर पर बनने वाले काल्पनिक मित्र किशोरों को कल्पना की दुनिया में ले जाते हैं. बस, वहीं से उन के प्रताडि़त होने की जमीन तैयार होती है.

परेशानी तो इस बात की है कि बच्चों के मातापिता भी जानेअनजाने में उन को बढ़ावा देते हैं. हालात अब यह है कि सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर 5 साल के बच्चे का भी अकाउंट बन जाता है जबकि इस की न्यूनतम आयु 13 साल है. क्या कहता है हमारा कानून भारत ने वर्ष 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी कानून पारित किया था. उस समय सोशल नैटवर्किंग साइट्स का चलन नहीं था. साइबर अपराध से जुडे़ यह कानून कारगर नहीं हैं. अगर इस से मुकदमा दर्ज हो भी गया तो जमानत मिल जाती है. इसलिए लोगों के मन में डर नहीं है. कानून की कुछ अहम बातें ये हैं

अगर आप अपने मोबाइल या कंप्यूटर के जरिए कोई आपत्तिजनक संदेश भेजते या प्रकाशित करते है तो ये दंडनीय अपराध है.

सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66 ए के तहत साइबर बुलिंग के कुछ मामले कवर होते हैं. द्य इस अपराध में केवल 3 साल की सजा का प्रावधान है. साथ ही, 5 लाख रुपए जुर्माना भी देना होगा.

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इस अपराध में जमानत आसानी से मिल जाती है. सो, अभिभावकों को अपने बच्चों को साइबर बुलिंग से भी बचाना होगा वरना उन का बहकना तय है. मन पर गहरा असर सोशल साइट्स पर अपमानित होने के कारण किशोरमन पर गहरा असर पड़ता है. ये साइट्स नशे की तरह कम उम्र के बच्चों को अपनी चपेट में लेती जा रही हैं. अभिभावकों को इस खतरे के प्रति जागरूक होना जरूरी है. भारत में 77 प्रतिशत मातापिता साइबर बुलिंग से अवगत हैं. साइबर मौबिंग कहीं भी हो सकती है. इस से किशोर उम्र के बच्चों में उग्रता बढ़ रही है. वे अपनी हर बात मनवाना चाहते हैं. पहले दादागीरी स्कूल और खेल के मैदानों तक ही सीमित थी. लेकिन आज यह औनलाइन हो गया है. औनलाइन सैकड़ों लोगों के सामने युवाओं को धमकाए जाने या मजाक उड़ाए जाने की स्थिति में उन का आत्मविश्वास डगमगा जाता है. इस से या तो वे उग्र हो जाते हैं या फिर हीनभावना के शिकार हो जाते हैं.

मातापिता के दफ्तर जाने के बाद बच्चे ज्यादातर समय कंप्यूटर पर बिताते हैं. मध्यम तबके के लोग भी अब बच्चों को लैपटौप खरीद कर दे रहे हैं. इस के अलावा स्मार्टफोन ने भी औनलाइन रहना आसान बना दिया है. लेकिन इन सब से फायदे के बजाय नुकसान ही हो रहा है.

बच्चे घर आएं तो न समझें मेहमान

पढ़ाई व नौकरी के सिलसिले में काफी बच्चे घर से बाहर रहने चले जाते हैं. मातापिता बच्चों  के उज्जवल भविष्य के लिए उन्हें भेज तो देते हैं लेकिन उन्हें हमेशा बच्चों के आने का इंतजार रहता है खासकर मां को. जब वे आते हैं तो मातापिता उन के लिए तरहतरह की तैयारियां करते हैं. बच्चों की हर इच्छा पूरी की जाती है. कभीकभी तो ऐसा भी होता है कि जब बच्चे आते हैं तब मातापिता इतना ज्यादा ध्यान रखने लगते हैं कि बच्चे को घर में ऊबन होने लगती है. वे चिड़चिड़ा व्यवहार करने लगते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली सपना कहती हैं, ‘‘जब मैं घर जाने वाली होती हूं तब 3-4 दिनों पहले से ही मेरी मम्मी फोन पर पूछने लगती हैं, क्या बनाऊं, तुझे क्या खाना है, कब आ रही है. जब मैं घर पहुंचती हूं तो हर 10 मिनट पर कहती रहती हैं ये खा लो, वो खा लो, अभी ये कर लो. 1-2 दिनों तक तो मुझे अच्छा लगता है, लेकिन फिर मुझे गुस्सा आने लगता है. गुस्से में कईर् बार मैं कह भी देती हूं कि क्या मम्मी, आप हमेशा ऐसे करती हैं, इसलिए मेरा घर आने का मन नहीं करता.’’

बच्चों के आने की खुशी में मांएं अकसर ऐसा करती हैं. यह ठीक है कि आप अपने बच्चे से बहुत प्यार करती हैं, घर आने पर उसे हर सुखसुविधा देना चाहती हैं लेकिन कईर् बार इस स्पैशल अटैंशन की वजह से बच्चे बिगड़ भी जाते हैं. उन्हें लगने लगता है कि वे घर जाएंगे तो उन की हर इच्छा पूरी होगी तो वे इस बात का फायदा उठाने लगते हैं. कभीकभी तो वे झूठ बोल कर चीजें खरीदवाने लगते हैं. बात नहीं मानने पर वे मातापिता से गुस्सा हो जाते हैं और घर नहीं आने की धमकी देने लगते हैं. इसलिए, जरूरी है कि आप संतुलन बना कर रखें. बच्चों के साथ सामान्य व्यवहार करें ताकि उन्हें यह न लगे कि वे अपने घर के बजाय किसी गैर के यहां मेहमान के रूप में रहने आए हैं.

क्या न करें

1. हर समय इर्दगिर्द रहने की कोशिश न करें

जब बच्चे घर आएं, उन से चिपके न रहें. हर समय उन के आसपास रहने की कोशिश न करें. इस बात को समझने की कोशिश करें कि अब आप के बच्चे अकेले रहते हैं, उन्हें अपने तरीके से जिंदगी जीने की आदत हो गई है. ऐसे में अगर आप रोकाटोकी करेंगी और हर बात के लिए पूछती रहेंगी कि क्या कर रहे हो, किस से चैट कर रहे हो, कौन से दोस्त से मिलने जा रहे हो, तो उन्हें अजीब लगेगा. वे आप के साथ रहना पसंद नहीं करेंगे. आप से कटेकटे रहेंगे. इसलिए उन्हें थोड़ा स्पेस दें. लेकिन हां, इस बात का ध्यान जरूर रखें कि वे आप से छिपा कर कोई गलत काम न कर रहे हों.

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2. गुस्से के डर से न भरें हामी

कई बच्चे ऐसे भी होते हैं कि जब पेरैंट्स उन की बात नहीं मानते तो वे गुस्सा हो जाते हैं, खानापीना छोड़ देते हैं. बच्चों की इन आदतों के चलते मातापिता उन की हर बात मान लेते हैं. वे नहीं चाहते कि छुट्टियों में बच्चे आए हैं तो किसी बात के लिए वे नाराज हों या गुस्सा करें और घर का माहौल खराब हो.

कई बार तो गुस्से के डर से मातापिता वैसी चीजों के लिए भी हामी भर देते हैं जो उन्हें पता है कि उन के बच्चे के लिए सही नहीं है. अगर आप ऐसा करते हैं तो करना बंद कर दें क्योंकि आप के ऐसा करने से बच्चे इस का फायदा उठा कर अपनी मनमानी करने लगते हैं.

3. हर वक्त खाना न बनाते रहें

बच्चे जब घर आते हैं तो मांएं सोचती हैं कि ज्यादा से ज्यादा चीजें बना कर खिलाएं. इसी वजह से वे अपना पूरा समय किचन में खाना बनाने में बिता देती हैं. कई बार तो ऐसा भी होता है कि वे कई तरह की डिशेज बनाती हैं लेकिन बच्चे कुछ भी नहीं खाते. ऐसे में वे उदास हो जाती हैं कि पता नहीं, क्यों नहीं खा रहा है, पहले तो रोता था ये चीजें खाने के लिए. लेकिन आज एक भी चीज नहीं खा रहा है.

उन का इस तरह से सोचना गलत है क्योंकि बाहर रहने पर बच्चों की खाने की आदत में थोड़ा बदलाव आ जाता है. वे एक बार में कई तरह की चीजें नहीं खा पाते हैं. इसलिए, बहुत सारी डिशेज बनाने के बजाय एक ही डिश बनाएं ताकि सब खा भी पाएं और वे अपने बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम बिता सकें.

4. गलतियां कर के सीखने दें

घर आने पर बच्चों को राजकुमार या राजकुमारी की तरह न रखें, बल्कि उन्हें तरहतरह के काम करने दें ताकि गलतियां करें और सीखें. यह न सोचें कि 4 दिनों के लिए आए हैं और आप ऐसी चीजें करवा रही हैं, बल्कि अगर वे आप के सामने काम करते हुए गलतियां करते हैं तो आप उन्हें सिखा सकती हैं. जरा सोचिए अगर वे अकेले में ऐसी गलतियां करेंगे तो क्या होगा. इसलिए, बेहतर है कि उन्हें छोटेछोटे काम करना सिखाएं.

5. तारीफ न करते रहें

अगर आप का बच्चा किसी कालेज में पढ़ाई कर रहा है या किसी अच्छी कंपनी में जौब करता है तो इस का यह मतलब नहीं है कि आप सब के सामने हमेशा उस की तारीफ करते रहें. ऐसा करने से बच्चों के अंदर घमंड आ जाता है.

6. भावनाएं न दिखाएं बारबार

बच्चे से कभी भी न कहें कि हम सब तुम्हें बहुत याद करते हैं, तुम्हारी मां तुम्हारे जाने के बाद रोती रहती है, कोई नहीं होता जिस से वे बात कर सकें. अगर कभी बच्चा भी अपनी किसी समस्या के बारे में बताता है तो उस से न कहें कि घर वापस आ जा, क्या जरूरत है परेशान होने की. इस से बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाते हैं. ऐसा करने से आप भी दुखी होती हैं और बच्चे भी.

7. समय को ले कर न हों पाबंद

घर में हर काम समय पर किया जाता है लेकिन जरूरी नहीं है कि बच्चे भी वही टाइमटेबल अपनाएं. इसलिए उन पर ऐसा कोई दबाव न डालें कि सुबह 6 बजे उठना है, देररात में घर से बाहर नहीं निकलना है, रात में टीवी नहीं देखना है आदि. बल्कि, उन्हें घर पर रिलैक्स होने दें.

8. बच्चों में न करें फर्क

ऐसा न करें कि बड़े बच्चे के आते ही छोटे बच्चे को भूल जाएं. वह कुछ भी कहें तो यह न कह दें कि तुम  घर में ही रहते हो, तुम्हारी बहन इतने दिनों के बाद आई है. आप के ऐसा करने से बच्चों के बीच में दूरी आने लगती है. वे सोचते हैं कि इस के आते ही इसे तो स्पैशल ट्रीटमैंट मिलने लगता है और मुझ पर कोई ध्यान नहीं देता.

क्या करें

गलती करें तो हक से डांटें  :  बच्चे जब गलती करते हैं तब आप की जिम्मेदारी बनती है कि आप उसे अधिकारपूर्ण डांटे, क्योंकि आप की एक छोटी सी भूल या हिचक उस के आगे की जिंदगी खराब कर सकती है. इतना ही नहीं, अगर उस की कुछ गलत आदतों के बारे में आप को पता चले तो सोचने न बैठ जाएं कि आप का बच्चा गलत रास्ते पर चला गया है अब क्या करें. सोचने में समय बरबाद करने के बजाय उसे समझाने की कोशिश करें.

1. क्वालिटी टाइम दें

ऐसा न हो कि आप के बच्चे घर आएं तो भी आप अपने कामों में ही व्यस्त रहें, औफिस से देर से घर आएं, मेड से कह दें कि बच्चों का ध्यान रखें. ऐसा न करें क्योंकि आप के ऐसा करने से बच्चों को लगने लगता है कि घर आने से बेहतर तो वे वहीं रह लेते. इसलिए, बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं. बेशक आप 1 घंटा ही समय साथ बिताएं, लेकिन उन के साथ दोस्त की तरह व्यवहार करें ताकि वे आप के साथ एंजौय करें.

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2. जो बने वही खिलाएं

हर दिन कुछ स्पैशल बना कर बच्चों की आदत न बिगाड़ें. 1-2 दिन तो ठीक है लेकिन अगर आप हर समय स्पैशल खिलाती रहेंगी तो बच्चे की आदत बिगड़ जाएगी. जब वह वापस जाएगा तो वहां उसे ऐडजस्ट करने में समस्या होगी. उसे वहां का खाना अच्छा नहीं लगेगा.

3. पति की उपेक्षा न करें

बच्चे जब घर आते हैं तो सारा ध्यान इसी बात पर रहता है कि क्या बनाना है, बच्चों को क्या चाहिए. इन सब के बीच अगर पति कुछ कहते हैं तो आप का जवाब होता है कि हमेशा तो आप के लिए ही करती हूं, अभी तो मुझे मेरे बेटे के लिए करने दो. कुछ महिलाएं तो पति को पूरी तरह से इग्नोर कर देती हैं. आप ऐसा करने के बजाय दोनों को समय दें.

अगर आप अपने बच्चे को खास मेहमान समझती हैं तो इस के कई नुकसान हैं जिन के बारे में शायद ही आप का ध्यान कभी जाता होगा.

4. बच्चे होते हैं भावनात्मक रूप से कमजोर

घर पर मातापिता बच्चों को ढेर सारा प्यार देने की कोशिश करते हैं लेकिन वास्तव में वे ऐसा कर के बच्चों को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाते हैं. जब बच्चे उन्हें छोड़ कर वापस जाते हैं तब उन का मन नहीं लगता. वे हर समय घर के बारे में ही सोचते रहते हैं. वे हर चीज की तुलना घर से करते हैं. ऐसे में उन्हें ऐडजस्ट करने में समस्या होती है.

5. बिगड़ता है बजट

बच्चों के आने पर उन के लिए तरहतरह के पकवान बनाती हैं, उन्हें शौपिंग करवाने ले कर जाती हैं, उन की पसंदीदा चीजें खरीदती हैं, लेकिन, इन सब चीजों से आप का बजट बिगड़ता है और बाद में आप को परेशानी होती है. कुछ मातापिता तो ऐसे भी होते हैं जो अपने बच्चों को खास ट्रीटमैंट देने के लिए पैसे उधार ले लेते हैं और बाद में उधार चुकाने में उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

कुल मिला कर बच्चे जब बाहर से आएं तो उन्हें समय दें, प्यार दें लेकिन जरूरत से ज्यादा नहीं. उन्हें मेहमान न बनाएं, न उन्हें मेहमान समझें ताकि वे अनुशासित ही रहें और उन में व आप के बीच स्नेह और भी बढ़े.

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