इस कलाकार को कितना जानते हैं आप!

बॉलीवुड के हास्य अभिनेताओं में राजपाल यादव का नाम भी उल्लेखनीय है. राजपाल यादव ने अपने करियर की शुरुआत देर से की थी. लेकिन उन्होंने अपना मुकाम बहुत जल्दी हासिल कर लिया.

16 मार्च 1971 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से 40 किलोमीटर दूर कुंद्रा गांव में राजपाल यादव का जन्म हुआ. राजपाल यादव ने अपनी स्नातक की डिग्री शाहजहांपुर से प्राप्त की और लखनऊ चले गए. लखनऊ के BNA से पढ़ाई की और फिर दिल्ली में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा चले गए और फिर मुम्बई.

प्रारंभिक जीवन

राजपाल यादव ने अपने स्कूल के दिनों में भी नाटकों में हिस्सा लिया है. राजपाल यादव स्कूल में बायोलॉजी के विद्यार्थी थे और उनके प्रोफेसर उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे. लेकिन राजपाल यादव ऐसी फील्ड  में जाना चाहते थे जहां उन्हें नौकरी न करनी पड़े.

समय और सोच आगे बढ़ी राजपाल यादव ने शाहजहांपुर की ऑडियंस क्लोजिंग फैक्ट्री में एडमिशन लिया और ढ़ाई साल इन्होंने वहां से प्रशिक्षण प्राप्त किया. इसके बाद Croation Art Theatre शाहजहांपुर जो काफी स्थापित संस्था है, राजपाल यादव ने यहा आने के बाद संस्था के संस्थापक जरीफ मालिक आनंद के सानिध्य में कला का प्रशिक्षण प्राप्त किया और उसमें छोटे-छोटे रोल करने लगे. दूसरे कामों की अपेक्षा, एक्टिंग में राजपाल यादव को ज्यादा खुशी मिलती थी.

एक दफा विभा मिश्रा जी के समक्ष राजपाल यादव ने रोल प्ले किया अंधेर नगरी चौपट राजा में और इस प्ले के बाद राजपाल यादव ने अपने जीवन में एक्टिंग करने का निर्णय ले लिया था.

राजपाल यादव लखनऊ से निकलने के बाद दिल्ली चले गए और वहां पर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से ढ़ाई साल प्रशिक्षण लिया और अपनी कला को पूरी लगन के साथ निखारा. 1997 में राजपाल यादव मुम्बई गए. मुम्बई में प्रकाश झा के हित में इन्हें एक सिरियल मिला जो दूरदर्शन पर प्रसारित होता था, सिरियल का नाम था “मुंगेरी के भाई नौरंगीलाल”. 1999 में “दिल क्या करे” से हिंदी फिल्मों की शुरुआत की, अपनी पहली फिल्म में राजपाल यादव ने स्कूल के चौकीदार की भूमिका अदा की थी. और आगे चलकर हास्य कलाकारी में अपना अस्तित्व बनाया.

राजपाल यादव की फिल्में

“हलचल”, “हेरा फेरी”, “चुप चुप के”, “गरम मसाला” जैसी फिल्मों ने अपने दर्शकों को काफी लोट-पोट भी किया.

राजपाल यादव ने हास्य कलाकारी के साथ लीड रोल में भी कई फिल्में की है, “मैं मेरी पत्नी और वो”, “मैं माधुरी दिक्षित बनना चाहती हूं”, “कुश्ती”, “चांदनी बार”, “हेलो हम लल्लन बोल रहें हैं”.

राजपाल यादव अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता और अपनी ऑडियन्स को देते है.

इनके किरदार से ही है इनकी पहचान

सिनेमा के साथ साथ टीवी सीरियलों में भी काफी बदलाव आया है. आज रोज आपको अपकी टीवी स्क्रीन पर नये-नये अभिनेता देखने को मिल जाते हैं लेकिन हम आज उन कलाकारों की बात कर रहे हैं जिनका किरदार ही उनकी पहचान बन गया.

मुकेश खन्ना उर्फ शक्तिमान

दूरदर्शन के धारावाहिक शक्तिमान में मुख्य भूमिका निभाने वाले मुकेश खन्ना को जब भी बच्चे देखते हैं तो शक्तिमान-शक्तिमान कह कर चिल्लाने लगते हैं. इसके साथ ही महाभारत में भीष्म की भूमिका में भी लोगों ने मुकेश खन्ना को खासा पसंद किया है.

अरुण गोविल उर्फ श्री राम

रामानंद सागर निर्मित हिन्दी धारावाहिक रामायण में राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल को आज बहुत कम लोग उनके असली नाम से जानते हैं. बहुत से लोगों के मन में राम के रूप में अरुण गोविल का चेहरा सामने आ जाता है. यूपी के रामनगर में जन्मे अरुण गोविल आज दर्शकों के लिए साक्षात राम बन चुके हैं.

फिरोज खान उर्फ अर्जुन

50 से ज्यादा हिंदी फिल्में में अपना अभिनय कर चुके अभिनेता फिरोज खान आज भी महाभारत के अर्जुन के रूप में जाने जाते हैं. महाभारत में अर्जुन का किरदार निभाने वाले फिरोज का जन्म मुंबई में हुआ. फिरोज के रूप में अर्जुन को हमारे घरों में आज भी याद किया जाता है.

रूपा गांगुली उर्फ द्रौपदी

बंगाल के कल्याणी में जन्मी रुपा गांगुली एक अभिनेत्री के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी की नेता भी हैं लेकिन उनको पहचान मिली दूरर्दशन के धारावाहिक महाभारत में जिसमें उन्होंने द्रोपदी का किरदार निभाया. 1985 में रूपा ने अनिल कपूर अभिनीत फिल्म साहेब से बतौर एक बाल अभिनेत्री अपने करियर की शुरुआत की लेकिन द्रौपदी के किरदार ने रूपा को घर-घर पहुंचा दिया. आज रूपा बंगाल में भाजपा की एक सक्रीय नेता के रूप में कार्य कर रही हैं.

रजित कपूर उर्फ ब्योमकेश बख्शी

बासु चटर्जी द्वारा निर्मित दूरदर्शन के धारावाहिक ब्योमकेश बख्शी से अपनी पहचान बनाने वाले रजित कपूर का जन्म पंजाब के अमृतसर में हुआ है. रजित कई धारावाहिकों के अलावा कई फिल्मों में अभिनय भी कर चुके हैं. ब्योमकेश बख्शी के अलावा रजित को द मेकिंग ऑफ द महात्मा (The Making of the Mahatma) और अंताक्षरी से भी काफी नेम और फेम मिला है. हमारे घरों में रजित को आज भी डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी के रूप में ही जाना जाता है.

नितीश भारद्वाज उर्फ कृष्ण

बीआर चोपड़ा द्वारा निर्मित और उनके पुत्र रवि चोपड़ा द्वारा निर्देशित दूरदर्शन धारावाहिक महाभारत में श्री कृष्ण का किरदार निभाने वाले नितीश भारद्वाज की पहचान लोगों में कृष्ण के रूप में होती है. महाभारत में नितीश का संवाद आज भी लोगों को खूब भाता है. महाभारत के अलावा नितीश ने विष्णु पुराण, गीता रहस्य, रामायण आदि धारावाहिक में भी काम किया है जिसमें उनको काफी प्रसंशा मिली.

प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर देश: भूटान

प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर भूटान अपनी संस्कृति और परंपराओं को संजो कर रखे हुए है. वहां के रहनसहन, पर्यटन स्थलों और खानपान का लुत्फ उठा कर पर्यटकों का दिल खुश हो जाता है.

दुनिया में ऐसे देश हो सकते हैं जहां रेलगाड़ियां नहीं दौड़तीं मगर शायद ही ऐसा कोई देश होगा जिस की सड़कों पर एक से बढ़ कर एक लग्जरी कारें दौड़ती हैं, वह भी बिना ट्रैफिक सिग्नल के. भारत के पूर्वोत्तर में बसे नन्हे, हिमालयी देश भूटान में ऐसी कई रोचक चीजें देखी जा सकती हैं. यहां की सड़कों पर दोपहिया वाहन दिखना दुर्लभ है.

यहां फैशन और स्टाइल है और परंपराओं का भी उतनी ही शिद्दत से पालन होता है. स्कूली बच्ची से ले कर बुजुर्ग महिला तक पारंपरिक ड्रैस ‘कीरा’ मे टहलती है तो खूबसूरत, रेशमी बालों को फैशनेबल अंदाज में बिखरा कर चलती युवती भी भूटान की इस पारंपरिक ड्रैस में बेहद सहज दिखाई देती है. युवकों के बालों के स्टाइल आकर्षक हैं, लेकिन वे भी पारंपरिक पोशाक ‘घो’ (जो बाथरोब की तरह लगता है) में ज्यादातर दिखते हैं. सचमुच 15वीं और 21वीं सदी यहां एकसाथ कदमताल करती दिखती हैं.

इस देश ने बहुत धीमी मगर संभली हुई रफ्तार से आधुनिकता को अपनाया है. इंटरनैट, मोबाइल, टैलीविजन सरीखे आधुनिक बोध के साधनों को जैसे भूटान के हिमालयी शिखरों ने लंबे समय तक यहां दाखिल नहीं होने दिया.

भूटान की राजमाता आशी दोरजी वांग्मो वांग्चुक कहती हैं कि भूटान ने अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखने की खातिर खुद पर अंकुश लगाए रखा. अलबत्ता, पिछले एक दशक में देश ने करवट लेनी सीखी है और धीरेधीरे ही सही मगर बदलाव की बयार राजधानी थिंपू समेत अन्य जगहों पर महसूस की जा रही है. लेकिन यहां के जीवन को देख कर लगता है कि भूटानी समाज अपनी परंपराओं को आज भी जकड़े हुए है.

करीब 7 लाख की आबादी वाले इस देश में जिंदगी बहुत सहज लगती है, खासतौर से भारत के बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों की धक्कामुक्की के बाद यहां जब आप कहीं भी भीड़ नहीं देखते तो सुखद एहसास होना स्वाभाविक है.

बस स्टेशन के टिकट काउंटर पर आप अकसर खुद को सब से आगे पाते हैं. टैक्सी स्टैंड पर भी टैक्सियों की कतार तो है मगर कोई शोरगुल, चिल्लपौं या ड्राइवरों की धींगामुश्ती नहीं है. अपनी मंजिल की ओर दौड़ती बस या टैक्सी की खिड़की से बाहर के खूबसूरत नजारों को निहारते हुए मन में यह सवाल अकसर कौंधता है कि क्या यह देश सचमुच आखिरी शंगरिला है.

हिमालय की गोद में बसे सिक्किम, लद्दाख, दार्जिलिंग, हिमाचल जैसे तमाम भारतीय प्रदेशों का मिलाजुला नजारा भूटान में बेशक है, मगर यह देश सब से अलग है. लालपीले वस्त्रों में ढके बौद्ध भिक्षुओं के रूप में लेहलद्दाख की  झलक यहां दिखती तो है लेकिन मठों का विशिष्ट वास्तुशिल्प इस के लैंडस्केप को अद्भुत पहचान देता है.

इस हिमालयी साम्राज्य ने बेहद सूझ बूझ से उस हिप्पी कल्चर से खुद को दूर रखा है जिस ने नेपाल जैसे एक हिमालयी देश को भ्रष्ट कर डाला है. भूटान ने बहुत समय तक विदेशी टूरिस्टों के लिए अपने दरवाजे बंद रखे और जब 1974 में पर्यटन का  झोंका आया भी तो बेहद सधे हुए अंदाज में ऐसा हुआ.

टूरिज्म के अद्भुत मौडल के चलते यहां ‘लो इंपैक्ट, हाई वैल्यू’ पर्यटन पर जोर दिया गया है. विदेशियों के लिए जहां भूटान में सैरसपाटा काफी खर्चीला है वहीं आम भारतीय सैलानी अपने मनमाने बजट के अनुरूप इस नन्हे से देश को अपनी रफ्तार से देखजान सकते हैं.

अलबत्ता, उन्हें यहां आने के लिए विशेष परमिट (भारतीयों के लिए वीजा की जरूरत नहीं है) लेना होता है जो सड़कमार्ग से आने पर फ्युंशलिंग (पश्चिम बंगाल में न्यू जलपाईगुड़ी से करीब 165 किलोमीटर दूर), समद्रुप जोंखार (गुवाहाटी से 110 किलोमीटर दूर) या असम भूटान सीमा पर गेलेफू स्थित इमिग्रेशन कार्यालय से जारी किया जाता है.

आम भूटानी नागरिक को जैसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाहरी दुनिया किस रफ्तार से दौड़ रही है. वह अपनी मंथर गति से, अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं में पूरी तरह मस्त है. थिंपू शहर हो या पारो की गलियां, हर जगह मुसकराते, खिलखिलाते चेहरे नजर आ जाएंगे.

चौथे भूटान नरेश जिग्मे सिग्मे वांग्चुक ने 1972 में देश की तरक्की को नापने के लिए जब जीडीपी जैसे ठोस आर्थिक पैमाने के बजाय जीएनएच को ज्यादा तवज्जो देने का नारा बुलंद किया था तो देखादेखी कुछ यूरोपीय देशों ने भी इस ‘राजनीतिक फुटबाल’ को खूब उछाला था. दुनिया के बाकी देशों में इस फुटबॉल की सिलाई कभी की उधड़ चुकी है लेकिन भूटान में आज खुशहाली का आलम यह है कि हर कोई अपने वर्तमान से पूरी तरह मंत्रमुग्ध दिखता है.

अकेले हैं, दुकेले हैं, परिवार के संग हैं या परिवार से दूर किसी मोनैस्ट्री की छत्रछाया में हैं, हर चेहरे पर मस्ती का अनूठा रंग है जो आप को देश के इकलौते हवाई अड्डे पारो पर उतरते ही दिखने लगता है. थिंपू शहर से करीब 55 किलोमीटर दूर खूबसूरत पारो घाटी में स्थित यह हवाई अड्डा काफी ऊपर से ही दिखने लगता है.

यह हवाई अड्डा दुनिया के सब से खतरनाक लैंडिंग वाले हवाई अड्डों में गिना जाता है, मगर यहां उतरने के बाद आप खुद को ऐसे अनोखे भूटानियों के बीच पाते हैं जिन के चेहरे की मांसपेशियों ने शायद हंसना ही सीखा है. कभीकभी तो मन होता है किसी को रोक कर पूछने का कि तनाव, दबाव, गम और चिंता से परे कैसे रहता है उन का समाज और तभी बौद्ध दर्शन याद दिलाता है कि जीवन अनावश्यक दुखों को सहने के लिए नहीं बना. बुद्ध की इस शिक्षा को अगर सही माने में किसी ने अपनाया है तो वह भूटानी समाज ही है. तभी तो सालभर तरहतरह के उत्सवों व नृत्य की मस्ती में भूटानी समाज डूबा रहता है.

कभी 70 के दशक की शुरुआत तक घरपरिवार ही शादीब्याह तय करते थे यहां. आज लड़कालड़की खुद ही अपना जीवनसाथी तलाश कर कभी शादी की परंपरा को अपना कर तो कभी ‘लिविंग टुगैदर’ की व्यवस्था के तहत साथसाथ जीनेमरने की कसमें उठा लेते हैं.

मातृसत्तात्मक समाज व्यवस्था आम है. लिहाजा, शादी के बाद लड़का अपनी पत्नी के घर में शिफ्ट हो जाता है और तलाक की नौबत आती है तो उतने ही सहज ढंग से वापस अपने पुराने घर लौट जाता है.

एक समय था कि हर घर से एक लड़का मठ की राह अवश्य पकड़ता था लेकिन आज भूटानी समाज इस बंधन से मुक्त है. जो परिवार अपने बच्चों को बौद्ध भिक्षु या भिक्षुणी बनाने का फैसला करते हैं, वे स्वतंत्र रूप से बिना किसी दबाव के ऐसा करते हैं. लेकिन भूटान में जगहजगह बिखरी मोनैस्ट्री और ननरी (भिक्षुणियों के मठ) इस बात के गवाह हैं कि बौद्ध धर्म की इस अनूठी व्यवस्था की जड़ों को भूटानी समाज आज भी शिद्दत से सींच रहा है.

बिहार पर बनी इन फिल्मों ने जीता नैशनल अवॉर्ड

हिंदी फिल्ममेकर्स के लिए बिहार और वहां की राजनीति हमेशा से एक पसंदीदा विषय रहा है. बिहार पर यूं तो कई फिल्में बनी हैं, मगर चंद फिल्में सच्चाई और हालातों के इतने करीब लगती हैं कि आपके दिल को छू जाती हैं. चलिए आपको बताते हैं बिहार पर बनी सात सबसे अच्छी फिल्मों के बारे में जिन्होंने नैशनल फिल्म अवॉर्ड में भी अपना झंडा गाड़ दिया.

तीसरी कसम

बासु भट्टाचार्य की 1966 में आयी तीसरी कसम बिहार के ग्रामीण जीवन को बहुत साफ और सीधे तरीके से दिखाती है. फिल्म हिंदी के उपन्यासकार फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की शॉर्ट स्टोरी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित है. फिल्म में राज कपूर और वहीदा रहमान का शानदार अभिनय देखने को मिलता है. फिल्म में बैल गाड़ी चलाने वाले राजकपूर को नौटंकी में नाचने वाली वहीदा रहमान से प्यार हो जाता है. इस फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म के लिए नैशनल फिल्म अवॉर्ड से नवाजा गया था.

दामूल

प्रकाश झा की 1985 में आयी दामूल गया के रहने वाले शैवाल की कालसूत्र कहानी पर आधारित है. फिल्म में अनु कूपर, दीप्ति नवल और श्रीला मजूमदार का शानदार अभिनय देखने को मिलता है. फिल्म बंधुआ मजदूर की कहानी कहती है जो अपनी मौत तक अपने मालिक का काम करने के लिए मजबूर है. 1984 के बिहार को दिखाती इस फिल्म में जाती की राजनीति और निचली जाती के उत्पीड़न को मार्किक तरीके से दिखाया गया है. इस फिल्म में बिहार से बड़ी मात्रा में होने वाले माइग्रेशन के मुद्दे को भी जोरदार ढंग से दिखाया गया है. प्रकाश झा की इस फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला.

शूल

अगर आप मनोज बाजपेयी के फैन हैं तो ये फिल्म आपने जरूर देखी होगी. 1999 में आयी इस फिल्म को ई. निवास ने डायरेक्ट किया था. राम गोपाल वर्मा फिल्म के लेखक और प्रोड्यूस थे. फिल्म में बिहार की राजनीति के अपराधीकरण को शानदार तरीके से दिखाया गया. मनोज बाजपेयी ने एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर का किरदार निभाया था. फिल्म के विलेन बने सैयाजी शिंदे जब भी स्क्रीन पर आते हैं छा जाते हैं. इस फिल्म के बारे में एक खास बात यह भी है कि इस फिल्म के क्लाइमेक्स की शूटिंग हैदराबाद के विधान सभा भवन में की गई. इस फिल्म को हिंदी में बेस्ट फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है.

गंगाजल

2003 में आयी निर्देशक प्रकाश झा की गंगाजल बिहार में पुलिस और अपराध की मिलीभगत और गंदी राजनीति को बेहतरीन तरीके से दिखाती है. फिल्म में अजय देवगन ने एक ईमानदार और गंभीर एसपी का किरदार शानदार तरीके से निभाया है. भागलपुर में कैदियों की आंख फोड़ने की सच्ची घटना से प्रेरित इस फिल्म में अजय के अलावा मुकेश तिवारी, मोहन जोशी, यशपाल शर्मा और अखिलेंद्र मिश्रा जैसे कई अभिनेताओं का शानदार अभिनय देखने को मिलता है. गंगाजल को सामाजिक मुद्दे पर बनी बेस्ट फिल्म के नैशनल फिल्म अवॉर्ड से नवाजा गया था.

अपहरण

2005 में आयी प्रकाश की अपहरण में अजय देवगन और नाना पाटेकर की शानदार केमिस्ट्री देखने को मिलती है. नाना पाटेकर जहां एक बाहुबली विधायक के किरदार में हैं तो वहीं अजय देवगन एक बेरोजगार युवक का किरदार निभाया जो देखते ही देखते अपहरण की दुनिया का सरताज बन जाता है.

फिल्म में बिहार में बड़े पैमाने पर होने वाली अपहरण की घटनाओं और राजनेताओं से उनके संबंध को जोरदार तरीके से दिखाया गया है. एक आदर्शवादी पिता के विचारधाराओं के बीच जूझते बेरोजगार बेटे का किरदार अजय ने शानदार तरीके से निभाया है. हमेशा की तरह नाना पाटेकर का अभिनय दमदार है. फिल्म को बेस्ट स्क्रीनप्ले के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला.

अंतरद्वंद

2010 में आयी अंतरद्वंद, बिहार में होने वाली दूल्हों की किडनैपिंग पर बनी एक शानदार फिल्म है. हालांकि फिल्म को कमर्शियल सक्सेस बहुत ज्यादा नहीं मिली लेकिन एक खास दर्शक वर्ग ने इस फिल्म को जमकर सराहा. इस फिल्म का निर्देशन सुशील राजपाल ने किया और राज सिंह चौधरी व स्वाति सेन ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं. इसके अलावा फिल्म में विनय पाठक और अखिलेंद्र मिश्रा की दमदार एक्टिंग देखने को मिलती है. इस फिल्म को सामाजिक मुद्दे पर बनी फिल्म का नैशनल फिल्म अवॉर्ड मिला.

गैंग्स ऑफ वासेपुर

गैग्स ऑफ वासेपुर शायद झारखंड (तत्कालीन बिहार) पर बनी सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है. अनुराग कश्यप का शानदार निर्देशन और मनोज बाजपेयी और नवाजुद्दीन सिद्दकी के बेमिसाल अभिनय वाली इस फिल्म को उसके डायलॉग के लिए लोग खूब याद करते हैं. झारखंड (तत्कालीन बिहार) के धनबाद में फैले कोल माफिया के इर्द-गिर्द घूमती ये फिल्म दो परिवारों की खानदानी दुश्मनी को शानदार तरीके से दिखाती है. फिल्म के पहले भाग में जहां मनोज बाजपेयी और तिग्मांशु धूलिया छाए हुए हैं तो वहीं दूसरा पार्ट नवाजुद्दीन सिद्दीकी के नाम है. फिल्म की जान हैं इस फिल्म के सपोर्टिंग कलाकार जो आपको ऐसा सिनेमा दिखाते हैं जिसे भारत में इससे पहले नहीं देखा गया था. इस फिल्म को बेस्ट ऑडियोग्राफी (पहले पार्ट के लिए) का नैशनल फिल्म अवॉर्ड और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के स्पेशल ज्यूरी अवॉर्ड से नवाजा गया.

घर सजाएं, सिंबल औफ लव से

वैलेंटाइन डे प्यार करने वालों के लिए एक खास दिन होता है. इस खास दिन पर अगर आप भी अपने समवन स्पैशल यानी अपने पार्टनर को कुछ स्पैशल अंदाज में सरप्राइज करना चाहती हैं और अपने स्वीट होम की हवा में प्यार की महक को बरकरार रखना चाहती हैं, तो अपने घर को रोमांस व प्यार की डैकोरेशन से इस तरह सजाएं कि आप का वैलेंटाइन डे खास बन जाए.

सिंबल औफ लव

हार्ट शेप गुब्बारे, गुलाब की पत्तियां, हार्ट शेप कुशंस, हार्ट शेप पिलो, गुलाब के फूलों का गुलदस्ता, हार्ट शेप फोटो फ्रेम जिस में हो आप के रोमांटिक पलों की एक खूबसूरत तसवीर. इन सभी चीजों को घर के हर कोने में सजाएं. लाल रंग प्यार का प्रतीक होता है. बैडरूम में लाल रंग की बैडशीट बिछाएं. उस पर हार्ट शेप कुशंस और पिलो सजाएं. बैडरूम की दीवार पर रैड रिबन से अपने वैलेंटाइन के लिए खूबसूरत सा लव मैसेज लिखें.

घर पर करें कैंडल लाइट डिनर

घर से बाहर भीड़भाड़ में कैंडल लाइट डिनर करने के बजाय आप अपने डाइनिंग टेबल पर कैंडल लाइट डिनर करते हुए एकदूसरे के साथ अंतरंग पल बिता सकते हैं. कैंडल लाइट डिनर के लिए टेबल को खास अंदाज में सजाने के लिए टेबल पर रैड व व्हाइट कलर का टेबल क्लौथ बिछाएं. टेबल को रोमांटिक वातावरण देने के लिए उस पर रैड व व्हाइट कैंडल्स लगाएं. खूबसूरत से फ्लौवर वास में रैड रोजेज का बुके सजाएं. चाहें तो ट्रांसपैरेंट ग्लास के बाउल में रोज की पेटल्स डाल कर फ्लोटिंग कैंडल्स भी सजा सकती हैं.

डिनर की क्रौकरी भी रैड ऐंड व्हाइट कलर की लें. एक ग्लास में रैड ऐंड व्हाइट कलर के नैपकिन को खूबसूरत स्टाइल में फोल्ड कर के टेबल पर रखें. यकीन मानिए, इस स्पैशल अरैंजमैंट को देख कर आप का पार्टनर खुद को आप के नजदीक आने से रोक नहीं पाएगा.

आप बाजार से एक कौफी मग ले कर अपनी दोनों की फोटो उस पर प्रिंट करा कर डाइनिंग टेबल पर रख सकती हैं. टेबल डैकोरेशन का यह अंदाज उन्हें व्यक्तिगत छुअन का एहसास देगा.

ड्राइंगरूम की सजावट

एक फोटो फ्रेम बनवाएं, जिस में अलगअलग रैड हार्ट शेप पेपर पर आप अपने पार्टनर की खूबियों का बखान करें. इस फोटो फ्रेम को आप ड्राइंगरूम में सजा सकती हैं. फोटो फ्रेम के जरीए अब आप के दिल का मैसेज आप के समवन स्पैशल तक पहुंचेगा, तो आप का यह वैलेंटाइन खास बन जाएगा. ड्राइंगरूम में आप कलरफुल फ्लोटिंग हार्ट बैकड्रौप लटका सकती हैं. जब हवा के साथ ये बैकड्रौप लहराएंगे तो हवाओं में प्यार की खुशबू फैल जाएगी. आप चाहें तो रंगबिरंगे लिफाफे में लवनोट्स लिख कर भी टांग सकती हैं.

ड्राइंगरूम में आप हार्ट शेप्ड रैड कलर की पेपर लैंटर्न लगा सकती हैं, जिस में से छन कर आती रोशनी आप के प्यार भरे माहौल को और भी रोमांटिक बना देगी.

यह तो इंसानी फितरत है

अभिनेता के साथ-साथ लेखक व निर्देशक के तौर पर भी सौरभ शुक्ला ने अपनी एक अलग पहचान बनायी है. उन्होंने कई सफलतम फिल्में दी है. अब एक तरफ अपनी फिल्म ‘‘जॉली एलएलबी 2’’ को लेकर उत्साहित हैं, तो दूसरी तरफ वह नाटक ‘‘बर्फ’’ को लेकर चर्चा में हैं. पूरे 18 साल बाद सौरभ शुक्ला ने थिएटर में वापसी करते हुए 2015 में पहला नाटक ‘‘टू टू टैंगो थ्री टू जाइव’’ किया था. अब वह दूसरे नाटक ‘बर्फ’ में अभिनय कर रहे हैं. जिसके वह लेखक व निर्देशक भी हैं.

आपके करियर में जो पड़ाव व मोड़ आए हैं, उनसे आपकी निजी जिंदगी व कैरियर पर क्या क्या असर हुए?

मेरे करियर में बहुत मोड़ आए हैं और बहुत से मोड़ चलते रहते हैं. पर कोई नाटकीय मोड़ नहीं लगता. मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में था. वहां नौकरी कर रहा था, यह मेरे करियर का पहला मोड़ था.  उससे पहले मैं अमैच्योर थिएटर किया करता था. उसके बाद शेखर कपूर के निर्देशन में फिल्म ‘‘बैंडिट क्वीन” की, तो मैं मुंबई आ गया. फिर शेखर कपूर ने मुझे टीवी सीरियल करने के लिए बुलाया. फिर सुधीर मिश्रा ने मुझे ‘इस रात की सुबह नहीं’ नामक फिल्म में काम करने का अवसर दिया. इसी फिल्म के अवार्ड के लिए मुझे नॉमीनेशन मिला. ‘बैंडिट क्वीन’ रिलीज होने के बाद लोगों ने मुझे अलग तरह से देखना शुरू किया. मैं शुरू से ही मोटा था. तो मेरे पास एक ही तरह के किरदार आते थे, पर लोगों ने मुझे मोटापे के लिए नहीं, बल्कि एक किरदार के लिए याद किया. चीजें बदलती रहीं, पर मेरा बुरा वक्त कभी नहीं आया. क्योंकि मैं हमेशा लिखता रहा.

फिल्म ‘सत्या’ मैंने अनुराग कश्यप के साथ मिलकर लिखी थी. इसमें कल्लू मामा का किरदार निभाया था. मेरा किरदार हिट हो गया, फिल्म हिट हो गयी, पर पूरे 6 साल तक मैं घर पर खाली बैठा रहा. मुझे कोई काम नही मिला. लोगों के फोन आते थे कि सर एक दिन का छोटा सा कैमियो रोल है. एक दिन के कैमियो रोल के लिए ना तो पैसे मिलते थे ना कलाकार के तौर पर पहचान और ना ही कलाकार के रूप में संतुष्टि. छह साल तक यही सिलसिला चला. एक दिन मैंने सोचा था कि मेरे अंदर वास्तव में प्रतिभा है या सिर्फ मुझे ही लगता है? उसके बाद मुझे अनुराग बसु की फिल्म ‘‘बर्फी मिली’’. फिर ‘‘जॉली एलएलबी’’ व ‘‘लाहौर” मिली. चीजें बदलती चली गयी. अब कोई फोन करके मुझसे नही कहता कि सर एक दिन का कैमियो रोल है. अब बड़ा रोल मिल रहा है, अच्छे पैसे मिल रहे हैं. कुल मिलाकर सफर अच्छा जा रहा है. फिर यह तो हम पर निर्भर करता है कि हम अपने सफर को किस नजरिए से देखते हैं. आप चाहें तो कुढ़ सकते हैं, पर कुढ़ने से सिर्फ नुकसान होता है. कुढ़ने से पैसा भी नही आता. अब 10 फरवरी को मेरी नई फिल्म ‘‘जॉली एलएलबी 2’’ प्रदर्शित होगी. जो कि ‘जॉली एलएलबी’’ का सिक्वअल है.

पिछले चार-पांच वर्ष से मेरी समझ में आ गया है कि अंततः यह कोई निर्णय नहीं लेने वाला है कि आप कहां जा रहे हैं. किस मोड़ पर पहुंचे हैं. आपको किसको साबित करना है. मुद्दा इतना है कि आप कितनी बार हंसे, कितनी बार रोए. आपने खुद कितनी बार अपने कैरियर में उथान महसूस किया. इसलिए मैं फिल्में अपनी पसंद की ही कर रहा हूं. बीच में मैं सेमीनार में चला जाता हूं.

‘‘जॉली एलएलबी’’ और ‘‘जॉली एलएलबी 2’’ में कितना फर्क है?

दोनों अच्छी फिल्में हैं. पर यह सवाल गलत है. दोनों फिल्मों का विषय एक नहीं है, सिर्फ प्रिमायसेस एक है. दोनों अलग-अलग कहानियां हैं. दो अलग अलग मुद्दे हैं. दोनों फिल्मों की कहानी का आधार कानून व्यवस्था ही है. मगर कहानी अलग है. किरदार अलग है.

पर आपका किरदार वही है. पिछली बार इसी किरदार के लिए आपको राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. तो इस बार भी?

मैं कैसे तय करुंगा कि मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए. मैं न कमेटी में हूं. मैं बहुत अच्छा टेबल टेनिस खेलता हूं और फिल्मों में अभिनय करता हूं. हम लिखते या अभिनय करते समय इंज्वॉय करते हैं, उस वक्त हम अवार्ड आदि को लेकर नहीं सोचते. हमें उस किरदार को जीना होता है. सारा ध्यान उसी पर होता है. यह बहुत व्यावहारिक बात है.

तो फिर हर पुरस्कार के बाद विवाद जन्म क्यों लेते हैं?

यह तो इंसानी फितरत है. यह दुनिया ठीक है. दुनिया में कुछ बुरा नही है. पुरानी कहावत है-‘जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है, जो होगा, अच्छा ही होगा.’ जो होता है, उस पर सवाल नहीं कर सकते? मैं यह नहीं कहता कि मुझे ईर्ष्या या चिढ़न नहीं होती है. मैं भी इंसान हूं. इस संसार में ईर्ष्या बहुत महत्वपूर्ण है.

आपको किस बात ईर्ष्या होती है?

कई बार बेवकूफी वाली बातों पर भी ईर्ष्या होती है. जिस बात से मुझे ईर्ष्या होती है, वह दूसरे का अच्छा काम देखकर होती है कि मैंने इतना अच्छा काम क्यों नहीं किया. मैंने पहले ऐसा क्यों नहीं किया. यह अच्छी ईष्र्या है.इस ईष्र्या ने जीवन भर मेरे अंदर ललक रखी. इसने मुझे असंतोष नहीं दिया. 

‘‘जॉली एलएलबी’’ में आपके साथ अरशद वारसी थे. इस बार ‘‘जॉली एलएल बी 2’’ में आपके साथ अक्षय कुमार हैं?

दोनों से मैं सह कलाकार के रूप में ही मिला हूं. दोनों के साथ मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा. मैंने जितने कलाकारों के साथ काम किया, आज तक किसी के भी साथ मेरा अनुभव गलत नहीं रहा. मेरा मूल अनुभव फिल्म के साथ रहता है. जब अच्छी फिल्म बनती है, तो सब कुछ अच्छा ही होता है. अरशद वारसी बहुत कर्मठ इंसान हैं. अक्षय कुमार भी मेहनती हैं. वह सुबह चार, साढ़े चार बजे उठते हैं. वह सुबह सात बजे सेट पर पहुंच जाते थे. वह कभी लेट नहीं होते थे. आप उनकी फिल्मोग्राफी देखेंगे, तो पाएंगे कि उन्होंने हर तरह की फिल्में की हैं. ‘एअरलिफ्ट’ व ‘रूस्तम’ की. ‘जॉली एलएल बी 2’’ की है. उनके अंदर संभावनाएं हैं. वह उन्हीं संभावनाओं को अपनी जिंदगी में पाना चाहते हैं. वह किस शिद्दत से काम करता है. ‘जॉली एलएल बी 2’ के सेट पर अक्षय कुमार का भी काम अच्छा है. अक्षय कुमार ने इससे पहले ‘स्पेशल छब्बीस’ सहित दूसरी फिल्मों में उस तरह का काम नहीं किया है, जिस तरह का बेहतरीन काम उन्होंने ‘जॉली एलएलबी 2’ में किया है. ‘एअरलिफ्ट’ का आदमी अलग है. ‘स्पेशल छब्बीस’ का आदमी अलग है. वह बहुत अच्छे कलाकार हैं. उन्हें पता है कि अपना स्टार पॉवर किस तरह बरकरार रखना है. यह बहुत बड़ी बात है. वह अपनी फिल्म को बड़े प्लेटफार्म पर ले आते हैं. मसलन, आमीर खान ने ‘दंगल’ जैसी फिल्म को बड़ा स्केल दे दिया.

अरशद वारसी बहुत अच्छे कलाकार हैं. बहुत प्रतिभाशाली हैं. किस्मत की बात है कि उन्हें वह जगह नहीं मिली, जिसके वह हकदार हैं. इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि अरशद वारसी जाने माने कलाकार हैं और उनके साथ काम करने से कोई इंकार नहीं करता. फिल्म निर्माण सिर्फ कला नहीं,  बल्कि व्यवसाय भी है.

देखिए, सभी कहते हैं कि सौरभ शुक्ला अच्छे कलाकार हैं. सौरभ शुक्ला को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, मगर कोई सौरभ शुक्ला को लेकर फिल्म नहीं बनाता. यह जरुरी भी नहीं है.

जब आपने अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा था. तब टीवी उभर रहा था. अब टीवी बहुत बड़ा माध्यम बन गया है. टीवी में आए बदलाव को लेकर क्या सोचते हैं?

कुछ नहीं सोचता. मैं टीवी नही देखता. मुझे टीवी की प्रोग्रामिंग व टीवी के कार्यक्रम बनाने के तरीकों से निजी स्तर पर सख्त नफरत है. क्योंकि टीवी पर मार्केटिंग वालों ने यह पाया कि सौरभ शुक्ला, तो पैसे ज्यादा मांगते हैं. बल्कि कुछ लोग तो मुफ्त में काम करने को तैयार हैं. तो उन्होंने पूरी प्रोग्रामिंग ही बदल दी. मेरा मानना है कि मेरा बचपन गलत नहीं हो सकता. मुझे बचपन में जो पढ़ाया गया था, वह अलग है. यह जरूरी नहीं है कि जिसे मैं पसंद ना करूं, उससे जुडू. इसलिए मैंने टीवी से दूरी बना ली. अंग्रेजी मेरी भाषा नही है. पर मैंने अंग्रेजी सीरियल ज्यादा देखे, वहां विविधतापूर्ण चीजें देखने को मिली. वैसे वहां भी बुरा काम हो रहा है. टीवी में पिछले 25 वर्षों से सास बहू चल रहा है. कलाकारों के चेहरों पर भाव नजर नहीं आते. मैं टीवी के बारे में सोचता भी नहीं. टीवी देखता भी नही. टीवी को खुद ही अपने बारे में सोचना चाहिए. अब वह जाने. जैसा कर्म करेगा, भगवान वैसा फल देगा.

सिनेमा में हास्य की स्थिति कितनी बनती या बिगड़ती रही है?

सिनेमा में हास्य हमेशा अच्छा रहा है. आज भी अच्छा है.‘‘चुपके चुपके’’ में किस तरह से अपने ऊपर ही किरदार हंसे. कहानीकार किस तरह अपनी ही विसंगतियों पर हंसा है.

हास्य जीवन में हर क्षण, हर वक्त रहता है, दुःख के वक्त भी रहता है. हास्य की वजह से ही हम जी सकते हैं. जब दर्द या गम हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तो इंसान रोते हुए नहीं, हंसते हुए नजर आता है. मेरा इतना मानना है कि हास्य या कॉमेडी दो प्रकार का होता है. अपने आप पर हंस लूं या आप पर हंस लूं. आप पर हंस लेना ज्यादा आसान है. पर यह मुझे नीच दरजे की हरकत लगती है. मैं अपने आप पर हंस लेता हूं, वही हास्य मुझे पसंद है. मैं इसी तरह का हास्य पढ़ना या देखना पसंद करता हूं. जब आप अपने आप पर हंस लेते हैं, तब आप दुनिया पर हंस सकते हैं.  

2017 में आपकी दूसरी कौन सी फिल्में आएंगी?

‘जग्गा जासूस ’आएगी. यह मेरी पसंदीदा फिल्म भी है. इसके बाद कमल हासन की फिल्म ‘शाबाश गुल्लू’ आएगी. इसके लेखक कमल हासन हैं, मगर हिंदी रूपांतरण मैंने किया है. मैं अभिनय भी कर रहा हूं. सुधीर मिश्रा की फिल्म और ‘‘और देवदास’’ में मेरी मुख्य खलनायक की बहुत बड़ी भूमिका है. इस फिल्म को लेकर बहुत उत्साहित हूं. इसे हमने लखनऊ में फिल्माया था. एक फिल्म ‘‘लाली की शादी में लड्डू दीवाना’’ की है, जिसमें नसिरूद्दीन शाह के बेटे विवान शाह व कमल हासन की बेटी अक्षरा हासन हैं.

रणबीर-कैट ने काट दिए इस डायरेक्टर के बाल

फिल्म जग्गा जासूस की शूटिंग के दौरान रणबीर कपूर और कटरीना कैफ डायरेक्टर अनुराग बसु ने सबके साथ खूब मस्ती की. रणबीर-कैट ने फिल्म की शूटिंग के वक्त एक साथ काफी समय बिताया.

दरअसल कुछ दिनों पहले अनुराग बसु रणबीर और कटरीना के साथ कुछ पैच वर्क सीन शूट कर रहे थे. फिल्म से जुड़े एक शख्स ने बताया, फिल्म की शूटिंग के दौरान अनुराग ने अपनी टीम के साथ खूब प्रैंक किए थे. इसमें उन्होंने अपने दो-तीन असिस्टेंट्स के बाल भी काट दिए.

अब किसी असिस्टेंट में तो इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह अनुराग के बालों को हाथ भी लगा सकें. ऐसे में उन्होंने रणबीर से मदद मांगी. रणबीर भी मदद के लिए झट से तैयार हो गए. फिर क्या था रणबीर और कटरीना ने मिलकर अनुराग बसु को कुर्सी पर बैठाया और असिस्टेंट डायरेक्टर्स का बदला लेने के लिए अनुराग के बाल काटना शुरू कर दिया.

रणबीर पर्दे पर भले ही एक बेहतरीन कलाकार हैं. लेकिन ये हेयर स्टाइलिस्ट का काम उन्होंने अच्छे से नहीं किया. रणबीप ने ऐसी चॉपिंग की कि अनुराग बसु के बाल थोड़े अजीब दिखने लगे. अब अनुराग के पास एक ही ऑप्शन है कि वह अपने बाल बढ़ने का इंतजार करें ताकि दोबारा कोई बढ़िया स्टाइल अपना सकें.

बागबानी के ये भी हैं फायदे, आप भी जानिए

एक समय था जब बहुमंजिला इमारतों में आशियाना नहीं तलाशा जाता था, खुले आंगन और छोटे से बगीचे वाले आशियाने को प्राथमिकता दी जाती थी. बगीचे पर तो खासतौर पर ध्यान दिया जाता था, क्योंकि यही उन के घर की साजसज्जा का जरीया होता था और अपनी पसंद की सब्जियां वगैरह उगाने का भी. वक्त ने करवट बदली, तो आधुनिकता ने आंगन भी निगल लिया और बगीचा भी. लेकिन एक बार फिर लोगों में अपने घर पर एक छोटा सा बगीचा तैयार करने की उत्सुकता को देखा जा रहा है. भले ही लोग गार्डन को जरूरत या शौक के नजरिए से न देख लाइफस्टाइल स्टेटस में इजाफा समझ कर अपने आशियाने में जगह दे रहे हों, लेकिन होम गार्डन के ट्रैंड पर उन्होंने अपनी सहमति की मुहर जरूर लगा दी है.

इस बाबत बागबानी विशेषज्ञा डाक्टर दीप्ति कहती हैं, ‘‘बगीचा होना अब घर की शान समझा जाता है. लोग इस में फैंसी पौधे और फूल उगाते हैं, जो घर की खूबसूरती को बढ़ाते हैं. असल में गार्डन होना और गार्डनिंग करने में बहुत अंतर है. भले गार्डन आशियाने की रौनक को बढ़ा दे, मगर उस में रहने वालों को इस का असली सुख तभी  मिलेगा जब वे इस की उपयोगिता को भी समझेंगे.’’

उपयोगिता बागबानी की

बागबानी समय का सब से अच्छा सदुपयोग है. बागबानी विशेषज्ञ डाक्टर आनंद सिंह कहते हैं, ‘‘आज की भागतीदौड़ती दिनचर्या में किसी के पास वक्त नहीं है. लोग औफिस के काम से फुरसत पाते हैं तो घरेलू कार्यों में मसरूफ हो जाते हैं. फिर अगर समय मिलता है तो वीकैंड में शौपिंग करने निकल जाते हैं. कई बार तो  फुजूलखर्ची करते हैं. ऐसे में मानसिक संतुष्टि मिलने के बजाय उलटा अवसाद घेर लेता है. अत: इस से अच्छा तो यह हो कि घर पर रह कर कुछ रचनात्मक काम किया जाए. इस में बागबानी से बेहतर और कोई विकल्प नहीं हो सकता है, क्योंकि यह आप को मानसिक सुख देने के साथसाथ अच्छी सेहत और भरपूर ज्ञान भी देगा.’’

यहां डच (जरमनी) लोगों का उदाहरण देना सही रहेगा, क्योंकि वहां करीब करीब सभी लोगों के पास अपना बगीचा है, जिस में खाली समय में वे बागबानी करते हैं. उन्हें मौल्स में घूमने से ज्यादा बेहतर बागबानी करना लगता है. यहां आम लोग ही नहीं वरन सैलिब्रिटीज भी गार्डनिंग का शौक रखते हैं. एक डच पत्रिका में जरमनी के मशहूर शैफ, जौन लफर के अनुसार, यदि वे देश के मशहूर शैफ न बन पाते तो खुशी से गार्डनिंग के पेशे में आते. वैसे शैफ जौन अभी भी अपने पेशे के अलावा गार्डनिंग में खास दिलचस्पी रखते हैं. यही वजह है कि वे अपने पौटेड प्लांट्स कलैक्शन के पैशन को छिपा नहीं पाते.

वैसे जरमनी ही नहीं हमारे देश में भी बहुत से लोग बागबानी का शौक रखते हैं, लेकिन विस्तृत जानकारी के अभाव और इस की उपयोगिता से अनजान होने की वजह से अपने शौक को बढ़ावा नहीं दे पाते. फिर भी कुछ सैलिब्रिटीज की बात करें तो बौलीवुड के अभिनेता और अभिनेत्रियां, जिन का ज्यादा वक्त शूटिंग करते ही बीतता है, खाली वक्त में या तो पार्टी करना पसंद करते हैं या फिर छुट्टियां बिताने विदेश पहुंच जाते हैं. लेकिन कुछ अरसा पहले एक इंटरटेनमैंट वैबसाइट को दिए इंटरव्यू में अभिनेत्री सेलिना ने कहा कि वे अपने प्रोफैशन से वक्त मिलते ही छत पर बनाई अपनी बगिया में पहुंच जाती हैं. वहां उन्हें नए पौधे लगाना, उन में खाद डालना, पानी देना बहुत अच्छा लगता है. उन्हें गार्डनिंग का शौक इस कदर है कि इस के लिए उन्होंने विशेषतौर पर ट्रेनिंग भी ली है और वक्त मिलने पर वे बागबानी से जुड़ी किताबें भी पढ़ती रहती हैं.

लाइफ इंश्योरैंस पौलिसी है बागबानी

मगर सेलिना जैसे लोग बहुत कम हैं, जो अपने गार्डनिंग के पैशन को उभारने की जगह उसे दबा देते हैं. वजह, जानकारी का अभाव ही है. डाक्टर दीप्ति कहती हैं, ‘‘बहुत से लोग बागबानी का शौक रखते हैं. पर उस में खर्र्च करना नहीं चाहते, उन्हें बागबानी में निवेश की कोई संभावना नहीं दिखती, जबकि बागबानी एक लाइफ इंश्योरैंस पौलिसी की तरह है. आप उस में जितना समय देंगे आप की सेहत उतनी ही अच्छी रहेगी.’’

नैशनल ज्योग्राफिक औथर एवं रिसर्चर डैन बटनर के अध्ययन के अनुसार, बागबानी करने वालों का जीवन आम लोगों से 14 वर्ष अधिक होता है. कैसे, आइए जानें:

– बागबानी दिन में ही की जाती है, इसलिए जाहिर है कि बागबानी के दौरान सूर्य के संपर्क में आना पड़ता है, जिस से शरीर को विटामिन डी मिल जाता है. विटामिन डी शरीर को कैंसर और हृदय से जुड़ी बीमारियों से बचाता है.

– यह भ्रम है कि मिट्टी में हाथ सनने से बैक्टीरिया चिपक जाते हैं, जिस से संक्रमण का खतरा रहता है. दरअसल, मिट्टी प्राकृतिक बैक्टीरिया, मिनरल्स, माइक्रोऔर्गैनिज्म का प्रमुख स्रोत होती है. रोजाना मिट्टी के स्पर्श से शरीर का इम्यून सिस्टम अच्छा होता है.

– लोगों में भ्रांति है कि नंगे पैर जमीन पर रखने से वे मैले हो जाते हैं. लेकिन यह सोचना गलत है. त्वचा का धरती से सीधा संपर्क शरीर में इलैक्ट्रिकल ऐनर्जी द्वारा पौजिटिव इलैक्ट्रोंस जेनरेट करता है.

– आधुनिक जीवनशैली में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने लोगों को अवसाद के आगोश में धकेल दिया है, जिस से तमाम तरह की बीमारियां जन्म ले रही हैं. बागबानी इन बीमारियों से बचने का एक सरल उपाय है, क्योंकि इस से मिलने वाला सुख शरीर पर प्रत्यक्ष रूप से असर डालता है और दिमाग को तनावमुक्त रखता है.

– बागबानी का अर्थ केवल फूल उगाना नहीं. घरों में किचन गार्डन भी तैयार किया जा सकता है. इस से मिलने वाली सब्जियां आप के शरीर को पोषण देने के साथसाथ ऐंटीऔक्सिडैंट भी देंगी और जहरीले तत्त्वों से भी शरीर की सुरक्षा करेंगी.

– बागबानी करने वालों को जिम जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती, क्योंकि बागवानी में काम करते हुए ही पूरी ऐक्सरसाइज हो जाती है.

कम जगह और पैसों में भी संभव

यह सच है कि बागबानी महंगा शौक है.  लेकिन आप चाहें तो कम पैसों में भी यह संभव हो सकती है. जरा सोचिए, फल और सब्जियों के आसमान छूते भाव के चलते अपनी जेब ढीली करने से बेहतर यही है कि घर पर ही इन्हें उगा लिया जाए, जो आप को अच्छा स्वाद, सेहत और संतुष्टि देने के साथसाथ आप के बजट को भी बिगड़ने नहीं देंगी. डाक्टर दीप्ति कहती हैं, ‘‘आजकल बड़े शहरों में ताजा हवा के लिए औक्सीजन जोन बनाए जा रहे हैं. वहां लोग भारी कीमत चुका कर चंद घंटे गुजारने जाते हैं. लेकिन चंद घंटों में मिली ताजा हवा से क्या होता है? ऐसा आप महीने में 1 बार कर सकते हैं. रोज तो पैसे खर्च नहीं कर सकते न? इसलिए यदि आप घर पर ही बागबानी करें तो घर पर ही ताजा हवा का आनंद लिया जा सकता और वह भी फ्री में. जो कीमत आप औक्सीजन जोन की ऐंट्री की चुकाएंगे उसी में बीज, खाद और गमले आ जाएंगे. सब से बड़ी बात तो यह है कि अपने हाथों से उगाई सब्जी खाने में जिस स्वाद और संतुष्टि की अनुभूति होगी उस से बेहतर और क्या सुख हो सकता है.’’

डाक्टर आनंद सिंह कहते हैं, ‘‘बाजार में सुंदर टमाटर, बैगन, लौकी देख कर लोग उन पर टूट पड़ते हैं. लेकिन यह ध्यान रहे कि सब्जी दिखने में जितनी सुंदर होगी उतनी ही नकली होगी. घर पर उगाई सब्जियां भले ही दिखने में उतनी खूबसूरत न हों, लेकिन स्वाद और सेहत के मामले में उन का कोई मुकाबला नहीं.’’

कभीकभी खर्चे के अलावा कुछ और परेशानियां बागबानी के शौकीनों को घर पर बगीचा तैयार करने से रोक देती हैं. छोटा घर और कम जगह इन परेशानियों में से ही हैं. लेकिन घर कितना भी छोटा क्यों न हो पौधे लगाने के लिए थोड़ी जगह मिल ही जाती है. यदि वह भी न मिले तो आजकल हैंगिंग गार्डन का फैशन चलन में है. इस विधि के अनुसार गमलों को फर्र्श पर रखने की जगह दीवारों या खूंटे के सहारे हवा में टांग दिया जाता है. इस से फर्श भी खाली रहता है और बागबानी का शौक भी पूरा होजाता है.

सच हुआ मॉडल बनने का सपना

इस साल पड़ोसी देश नेपाल की अंजली लामा के लिए यह एक वाकई बहुत बड़ा मौका था, वे भारत के फरवरी 2017 में हुए मशहूर फैशन शो, लेक्मे फैशन वीक समर रिसोर्ट के रैंप पर कैटवॉक करने वाली “पहली ट्रांसजेंडर मॉ़डल” हैं.

अंजली का जन्म नेपाल के एक गरीब किसान परिवार में बेटे के रूप में हुआ था. अंजली  ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे कभी मॉडलिंग करेंगी और यही उनका पेशा बनेगा.

उनके जीवन की सबसे पहली चुनौती ये स्वीकार करना था कि वह अंदर से एक पुरुष नहीं बल्कि महिला हैं. अंजली कहती हैं कि बचपन में ही उन्हें पता चल गया था कि लड़का होना उन्हें अच्छा नहीं लगता. लड़कों जैसे कपड़े पहनना भी उन्हें पसंद नहीं था, लेकिन नेपाल में अपने गांव में और लोगों को यह बात समझाना उनके लिए बहुत मुश्किल था. वे बताती हैं कि स्कूल में दूसरे लड़के कैसे उनका मजाक उड़ाया करते थे. सभी दुविधाओं के कारण अंजली तनावग्रस्त भी होने लगी थीं.

उनके जीवन के विषय में मिलने वाली खबरों के अनुसार जब वे एक किशोर के रूप में काठमांडू पहुंचीं थी तब उन्हें वहां कोई नहीं जानता था. लेकिन यही वो समय था जहां से उन्हें अपने जीवन के बड़े कई सवालों के जबाव मिलने शुरू हो गए थे. काठमांडू में रहते हुए उन्हें समलैंगिक और ट्रांसजेंडर लोगों के लिए काम करने वाली एक ब्लू डायमंड सोसायटी के बारे में मालूम हुआ और यहीं से उनकी जिंदगी बदल गई.

साल 2005 में उन्होंने अपने परिवार और सभी दोस्तों को ये बता दिया कि वे एक ट्रांसजेंडर हैं. उनका जीवन किसी पुर्जन्म की तरह शुरु हुआ और उन्हें ये एहसास हुआ कि वे दुनिया में अकेली नहीं हैं. उनके जैसे और भी बहुत से लोग हैं, जो उनके साथ हैं.

इसके कुछ सालों बाद अंजली ने ब्रेस्ट इम्पलांट करा लिया. इस सब के बाद उन्हें ख्याल आया कि वे फैशन इंडस्ट्री में अपना करियर बनाना चाहती हैं. नेपाल में रहते हुए अंजली ने ट्रांसजेंडर लोगों के बारे में एक पत्रिका में एक विस्तृत लेख लिखा और इस लेख के साथ अंजली को पत्रिका के कवर पर जगह भी मिली. नेपाल में उन्होंने कई सालों तक संघर्ष किया, लेकिन उन्हें ज्यादा कामयाबी नहीं मिल सकी. फिर उन्होंने पड़ोसी देश जहां एक विशाल फैशन इंडस्ट्री है, भारत का रुख किया.

अंजली लामा भारतीय रैंप पर चलने वाली पहली नेपाली ट्रांसजेंडर मॉडल हैं. इस साल, अंजली ने ही लक्मे फैशन वीक की भव्य शुरुआत की थी. शो के लिए एक चमकीले हरे रंग की साड़ी पहने अंजली किसी तूफान की तरह भारतीय रैंप को अपने साथ ले चलीं.

इस फैशन वीक के बाद, अब वे मुंबई में ही बस जाने की योजना बना रही हैं और साथ ही एक एजेंसी के साथ मिलकर अपने पोर्टफोलियो को मजबूत करने की योजना को भी साकार करने में लगी हुई हैं. अंजली ये मानती हैं कि मुंबई शहर हो या भारत के लोग, उन्हें यहां सभी से हर संभव मदद, बहुत सारी आशाऐं और बहुत सा प्रेम मिला है.

जब शाहरुख ने सलमान को दे दी अपनी अवॉर्ड

बात उस समय की है जब बॉवीवुड के दो खान अच्छे दोस्त हुआ करते थे. दोनों एक दूसरे के फिल्म में काम किया करते थे. दरअसल हम बात कर रहे हैं आज के सुपरस्टार्स शाहरुख और सलमान खान की. 90 की दशक में दोनों अच्छे दोस्त हुआ करते थें. दोनों ने एक दूसरे के फिल्म में कैमियो भी किया है. शाहरुख ने सलमान की ‘हम तुम्हारे हैं सनम’ में तो सलमान ने शाहरुख की ‘कुछ कुछ होता है’ में.

आज शाहरुख और सलमान दोनों ही एक दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं. दोनों के फिल्मों के बीच कांटे की टक्कर होती है. अगर अभी हम आपसे यह कहे कि शाहरुख ने अपना अवॉर्ड सलमान के नाम कर दिया था तो क्या आप यकीन करेंगे. नहीं ना. लेकिन यह सच है. किंग खान ने अपना अवॉर्ड बॉलीवुड के सुल्तान सलमान को दे दिया था.

दरअसल बात 1998 की है. इसी साल शाहरुख की बेहतरीन फिल्मों में से एक ‘कुछ कुछ होता है’ रिलीज हुई थी. इस फिल्म ने अवॉर्ड जितने के रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ में शाहरुख को उनके किरदार राहुल के लिए बेस्ट एक्टर के अवॉर्ड से नवाजा गया था.

अवॉर्ड लेने के बाद शाहरुख ने बिना किसी को धन्यवाद देते हुए सबसे पहले सलमान को स्टेज पर बुलाया और उसके बाद जो हुआ वह आप इस वीडियो में देखें.

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