Gaurav Khanna 9 साल से पिता बनने को बेकरार, पत्नी आकांक्षा को एतराज

Gaurav Khanna: टीवी ऐक्टर गौरव खन्ना जोकि पिछले 20 सालों से टीवी पर अपनी बेहतरीन परफौर्मेंस से धूम मचा रहे हैं और चर्चित सीरियल ‘अनुपमा’, ‘कुमकुम,’ ‘एक प्यारा सा बंधन’, ‘सीआईडी’, ‘भाभी’, ‘यह प्यार न होगा कम’, ‘जीवनसाथी’ आदि कई हिट सीरियल की वजह से टीवी के सुपरस्टार कहलाते हैं.

कानपुर के रहने वाले गौरव फिलहाल कलर्स टीवी शो ‘बिग बॉस 19’ में बतौर प्रतियोगी धमाल मचा रहे हैं. उन की प्रोफैशनल लाइफ जहां कामयाबी से भरी हुई है, वहीं पर्सनल लाइफ में वे इतने खुश नहीं हैं, जिस की वजह है अपनी बीवी आकांक्षा से बेहद प्यार और उस प्यार के चलते बीवी की हर शर्त को मानने वाले गौरव खन्ना पिता बनने के सुख से वंचित हैं.

पिता बनने की ख्वाहिश

गौरव खन्ना की शादी को 9 साल हो चुके हैं और अब वे चाहते हैं कि वह एक खूबसूरत बच्चे के पिता बनें गौरव ने अपनी इस इच्छा को ‘बिग बॉस 19’ के घर आईं एक ज्योतिष मेहमान के सामने भी जाहिर किया, जिस का उन को पौजिटिव रिप्लाई भी मिला.

लेकिन उस के तुरंत बाद ही फैमिली राउंड में घर आईं उन की खूबसूरत पत्नी आकांक्षा, जोकि एक ऐक्ट्रैस व मौडल भी हैं, ज्योतिष की कही उस बात को पूरी तरह से झुठला दिया और अपने पति से नाराजगी भी जताई. उन्हें यह सब एक अंधविश्वास ही लगा.

सहमति जरूरी या अंधविश्वास

पत्नी आकांक्षा की नाराजगी को शांत करने के उद्देश्य से गौरव खन्ना ने कहा,”मुझे पता है कि तुम्हारा जवाब न ही होगा, इसलिए मैं ने ऐसे ही पूछ लिया, क्योंकि मुझे बच्चे पसंद हैं.”

गौरव खन्ना की इस ख्वाहिश को पूरी तरह नकारते हुए आकांक्षा ने सिर्फ गौरव के सामने, बल्कि घर वालों के सामने साफसाफ कह दिया कि बच्चा पैदा करना हलवा बनाने जितना आसान नहीं है. मुझे नहीं लगता है कि आज या कभी आगे भी मैं बच्चा पैदा करूंगी या उस बच्चे की जिम्मेदारी उठाऊंगी, क्योंकि मैं महत्त्वाकांक्षी हूं और मुझे अपना कैरियर देखना है.

सवाल यह भी है

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिन लड़कियों को सिर्फ कैरियर बनाना होता है या अपना फिगर खराब नहीं करना होता तो उन को शादी के झमेले में पड़ने की जरूरत ही क्यों है, क्योंकि ऐसी लड़कियां प्यार करने वाले पति के लिए गले की वह हड्डी बन जाती हैं जिसे उगल भी नहीं सकते और निगल भी नहीं सकते.

अपनी पत्नी को प्यार करने वाले गौरव खन्ना फिलहाल इस पोजीशन में ही हैं. टीवी के तो वे सुपरस्टार हैं लेकिन बच्चे का प्यार पाने के लिए एक दुखी इंसान. मगर यह भी सच है कि सफल वैवाहिक जीवन के लिए उन्हें अपनी बीवी पर ही भरोसा करना होगा, नकि ज्योतिष.

Gaurav Khanna

Palak Muchhal ने कराई 3800 बच्चों की हार्ट सर्जरी, गिनीज बुक में नाम दर्ज

Palak Muchhal: मशहूर गायिका पलक मुच्छल सिर्फ एक अच्छी गायिका ही नहीं, बल्कि बेहतरीन इंसान भी हैं. उन का दिल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों का दर्द देख कर भी धड़कता है.

पलक अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा बच्चों की हार्ट सर्जरी के लिए दान कर देती हैं. यहां तक कि वे अपने स्टेज शो की कमाई भी बच्चों के इलाज में डोनेट कर देती हैं. गायकी के अलावा पलक मुच्छल समाजसेवा में भी अपना काफी वक्त बिताती हैं.

बच्चों से हमदर्दी

इंदौर में जन्मीं दिलकश आवाज की मलिका पलक मुच्छल का नाम इन्हीं सब वजहों से गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स, लिम्का बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में शामिल कर लिया गया है.

सिंगर पलक ने पलाश चैरिटेबल फाउंडेशन के जरीए अब तक 3,800 से ज्यादा बच्चों की हार्ट सर्जरी करवा चुकी हैं.

पलक को बच्चों से खास हमदर्दी है. एक बार बचपन के दिनों रेलयात्रा के दौरान पलक वंचित बच्चों से मिली थीं, जो बेसहारा थे और बीमार भी थे. उस वक्त पलक एक आम इंसान थीं लेकिन उन के मन में उस वक्त यह खयाल आया कि मैं एक दिन ऐसे बच्चों की मदद जरूर करूंगी और अपने इस कार्य को उन्होंने अपना मकसद बना लिया.

दान कर देती हैं कमाई का अधिकतर हिस्सा

इस के बाद वे म्यूजिकल इवेंट की कमाई और बचत की कमाई का हिस्सा चिकित्सा कार्यों में लगाने लगीं. गौरतलब है कि बच्चों के दिल की सर्जरी के अलावा पलक काफी सालों से करगिल शहीद के परिवारों की मदद भी कर रही हैं.

Bridal Footwear: ब्राइड अपने साथ किस तरह की फुटवियर ले जाएं ससुराल

Bridal Footwear: आजकल मार्केट में आप को सैंडल्स की वैसे तो काफी वैरायटी देखने को मिल जाएगी, लेकिन कई बार शादी की शौपिंग के कामकाज में लगे रहने के कारण सही डिजाइन और वैरायटी को लड़कियां ऐक्सप्लोर नहीं कर पाती हैं. दुलहन के लिए सैंडल के लेटैस्ट डिजाइंस और वैरा

यटी, जिसे वे अपने ब्राइडल लुक में कैरी कर सकती हैं और अपनी खूबसूरती में चार चांद लगा सकती हैं.

शादी के गेटअप को खास बनाने के लिए ड्रैस, ज्वैलरी, मेकअप पर बारीकी से ध्यान दिया जाता रहा है. लेटैस्ट ट्रेंड की बात करें, तो ब्राइड्स अपनी फुटवियर पर भी ध्यान देने लगी हैं. यही वजह है कि मार्केट में कई तरह के ब्राइडल फुटवियर नजर आने लगे हैं. अगर आप दुलहन बनने जा रही हैं, तो ट्राई करें ऐसे फुटवियर्स :

शिमर वर्क हिल

शिमर वर्क हील्स दुलहन के फुटवियर में हमेशा ट्रेंड में रहने वाला एक क्लासिक और लोकप्रिय विकल्प है. यह आप के पूरे लुक में ग्लैमर और चमक जोड़ने का सब से आसान तरीका है. यह पतली स्टिलेटो हील्स के मुकाबले ज्यादा आरामदायक होती है. शिमर का काम, हील के मोटे बेस पर होने से यह और भी ज्यादा स्टाइलिश और मौडर्न दिखता है.

यह मेहंदी, संगीत से ले कर मुख्य शादी समारोह तक, हर फंक्शन के लिए यह परफैक्ट है. शैंपेन गोल्ड यह सब से ट्रेंडी है, क्योंकि यह पारंपरिक लाल, मैरून और पेस्टल रंगों के साथ खूबसूरती से मेल खाता है. वहीं सिल्वर रिसेप्शन या काकटेल पार्टी के लिए जहां गाउन या इंडो वैस्टर्न आउटफिट पहने जाते हैं, वहीं सिल्वर शिमर बहुत अच्छा लगता है. रोज गोल्ड एक सौफ्ट और रोमांटिक लुक देता है, खासकर हलके रंग के लहंगों के साथ.

स्टोन वर्क हील्स

अगर आप की शादी होने वाली है, तो आप अपने वार्डरोब में स्टोन वर्क की हील्स जरूर रखें क्योंकि नई शादी में हैवी ड्रैसेस के साथ यही अच्छा लगता है. वैसे भी अब मोटे ग्लिटर की जगह बहुत बारीक, प्रीमियम क्वालिटी के ग्लिटर और छोटेछोटे क्रिस्टल या स्टोन वर्क वाली हील्स चलन में हैं. ये दूर से चमकदार और लग्जरी फिनिश देते हैं, जो दुलहन के आउटफिट को कौंप्लिमेंट करता है. इस हील में सामने की तरफ स्टोन से वर्क होता है. ये पहनने में भी काफी आरामदायक हैं. इस हील को आप साड़ी, सूट या लहंगा किसी के साथ भी ट्राई कर सकती हैं.

पर्ल वर्क जूतियां

आजकल कपडे में या यों कहें कि दुलहन के लहंगे में मोती का काम काफी इन है. सिर्फ लहंगे में ही नहीं, बल्कि सूट और साड़ी में भी मोती का काम ट्रेंड में है. इसलिए अगर आप की ड्रैसेस में भी मोती का काम है तो ये जूतियां आप के लिए परफैक्ट हैं. जूती का बेस रंगीन (जैसे मैरून, पेस्टल पिंक या मिंट ग्रीन) मखमल या सिल्क का होता है, जिस पर जरी, कुंदन और मोतियों का घना काम होता है. इन में पेस्टल शेड्स (जैसे हलका नीला, लैवेंडर) बहुत पसंद किए जा रहे हैं, जिन पर सफेद मोतियों का काम होता है.

कुछ जूतियों में पूरे ऊपरी हिस्से को केवल मोतियों से कवर किया जाता है, जिस से वे एकदम शाही और शानदार दिखती हैं. इस तरह की जूतियां उन लहंगों या सूट के साथ परफैक्ट लगती हैं, जिन में खुद भी मोतियों का काम किया गया हो.

ग्लैडिएटर सैंडल

यह एक ऐसा स्टाइल है जो अपने क्लासिक रोमन/ग्रीक ऐंकल और काफ रैप डिजाइन के कारण हमेशा फैशन में रहता है. ये सैंडल मुख्य रूप से फैस्टिवल सीजन के लिए परफैक्ट होते हैं. पारंपरिक फ्लैट डिजाइन के बजाय अब आप को पतली स्टिलेटो या चौड़ी ब्लौक हील वाले ग्लैडिएटर मिलते हैं. ये ऊंचाई देने के साथसाथ ग्लैडिएटर का स्टाइलिश स्ट्रैपी लुक भी देते हैं. यदि आप कोई वैस्टर्न या इंडो वैस्टर्न ड्रैस (जैसे क्रोप टौप और स्कर्ट) पहन रही हैं, तो एक गोल्डन हील्ड ग्लैडिएटर बहुत ट्रेंडी और आरामदायक विकल्प हो सकता है.

मिरर वर्क जूती

मिरर वाली पंजाबी जूतियां हमेशा से ही नई दुलहनों पर खूब फब्ती हैं. जहां पहले इन जूतियों के डिजाइन में बड़ेबड़े शीशे इस्तेमाल होते थे, वहीं अब बहुत छोटे और बारीक गोल या चौकोर मिरर इस्तेमाल होते हैं. ये मिरर पासपास लगे होते हैं, जो दूर से कपड़े पर एक चिकनी, चमकदार बनावट का इफैक्ट देते हैं.

यह डिजाइन भारी लहंगे या साड़ी के साथ एक क्लासी और सोफिस्टिकेटेड लुक देता है. अब सिर्फ सिल्वर या गोल्डन धागे के साथ मिरर वर्क नहीं होता. जूती के बेस पर चमकीले और मल्टीकलर धागे (जैसे गुलाबी, नीला, हरा) का इस्तेमाल किया जाता है, जिस के बीच में मिरर वर्क किया जाता है. यह डिजाइन मेहंदी और हलदी के फंक्शन के लिए एकदम सही है, जहां वाइब्रेंट और खुशनुमा रंगों का चलन होता है. इन में पीला, मैरून, गोल्डन, सिल्वर जैसे कई कलर आते हैं.

गोल्डन स्टिलेटोज

गोल्डन स्टिलेटोज हमेशा फैशन में इन रहते हैं और दुलहन के लुक को इनहैंस करते हैं और बात जब गोल्डन डीटेलिंग वाली हील्स की हो तो क्या कहने. ये किसी भी एथनिक या वैस्टर्न आउटफिट को तुरंत एक रिच और क्लासी लुक देते हैं. पतली स्ट्रैप्स वाले या ‘केज्ड’ डिजाइन (जिस में कई स्ट्रैप्स एक जाल जैसा पैटर्न बनाती हैं) वाले गोल्डन स्टिलेटोज गाउन या शौर्ट ड्रैसेस के साथ बहुत स्टाइलिश लगते हैं.

वैसे भी अब चटख और चटकदार गोल्ड की जगह मैट या ब्रश्ड गोल्ड फिनिश वाले स्टिलेटोज ट्रेंड में हैं. ये ज्यादा सोफिस्टिकेटेड और लग्जरी लुक देते हैं. बारीक, हाई क्वालिटी ग्लिटर या शिमर वाले स्टिलेटोज बहुत पसंद किए जा रहे हैं. ये काकटेल या रिसेप्शन के लिए बेहतरीन हैं जहां लाइटिंग में ये खूब चमकते हैं.

स्टोन स्टडेड पीप टोज

स्टोन स्टडेड पीप टोज बहुत ग्लैमरस लुक वाले हैं और इन्हें साड़ी, लहंगा, गाउन किसी के साथ भी कैरी किया जा सकता है. ‘पीप टोज’ का मतलब होता है वह डिजाइन जिस में जूते के आगे का हिस्सा थोड़ा-सा खुला होता है, जिस से पैर की उंगलियां थोड़ी दिखती हैं. स्टोन से सजी हुई एक पतली ऐंकल स्ट्रैप (टखने पर बांधने वाली पट्टी) पीप टोज हील्स को और अधिक सपोर्ट देती है और एक स्टाइलिश लुक देती है. यह डिजाइन नाचने या चलने में भी मदद करता है.

स्टिलेटो हील होने के बावजूद आगे के मोटे प्लेटफौर्म सोल के कारण ये पहनने में बहुत आरामदायक होते हैं और आप की ऊंचाई भी बढ़ाते हैं.स्टोन स्टडेड पीप टोज को आप रिसैप्शन गाउन, काकटेल ड्रैस या भारी लहंगे के साथ पहन सकती हैं. ये दोनों तरह के लुक (एथनिक और वेस्टर्न) को कौंप्लिमेंट करते हैं. यदि आप का ब्राइडल आउटफिट पेस्टल रंग का है, तो शैंपेन गोल्ड या सिल्वर स्टोन वर्क वाले पीप टोज चुनें. यदि आउटफिट पारंपरिक लाल या मैरून है, तो ऐंटीक या यलो गोल्ड स्टोन वाले पीप टोज चुनें.

ब्राइडल स्नीकर्स

ब्राइडल स्नीकर्स आजकल भारतीय शादियों में सब से बड़ा और सब से कूल ट्रेंड है. दुलहनें अब आराम के साथसाथ स्टाइल को भी महत्त्व दे रही हैं और स्नीकर्स इस के लिए परफैक्ट हैं.

सफेद या आइवरी रंग के स्नीकर्स पर पूरे जूते पर मोतियों, छोटे क्रिस्टल और राइनस्टोन का बारीक काम होता है. ये एक लग्जरी और क्लासी लुक देते हैं. स्नीकर्स पर पारंपरिक भारतीय कढ़ाई जैसे जरी, जरदोजी, रेशम या डोरी का काम किया जाता है. ये सीधे आप के आउटफिट की कढ़ाई से मैच करते हैं.

स्नीकर्स पर दूल्हा और दुलहन का नाम, शादी की तारीख या ‘ब्राइड’/ ‘पटाखा दुलहन’ जैसे मैसेज कस्टमाइज करवाए जाते हैं. कुछ दुलहनें अपने स्नीकर्स पर अपनी और दूल्हे की छोटी सी कार्टून वाली तसवीर या वैडिंग हैशटैग भी पेंट करवाती हैं. मोटे और प्लेटफौर्म सोल वाले स्नीकर्स भी ट्रेंड में हैं. ये हाइट देते हैं और मौडर्न ब्राइडल लुक के लिए परफैक्ट हैं.

Bridal Footwear

Shilpa Shetty की रेस्टोरैंट की कमाई जान कर हैरान रह जाएंगे

Shilpa Shetty: ऐक्ट्रैस शिल्पा शेट्टी सिर्फ एक सफल अदाकारा ही नहीं, बल्कि एक सफल बिजनैस वूमन भी हैं. करोड़ों की मालकिन शिल्पा शेट्टी का मुंबई स्थित रेस्टोरैंट बैस्टियन अमीरों का पसंदीदा रेस्टोरैंट में से एक माना जाता है.

21, 000 फुट में फैला यह रेस्टोरैंट काफी ऐक्सपेंसिव है, जहां हजारों की चाय और लाखों की शैंपेन मिलती है. यहां पर आने वाले ज्यादातर अमीर लग्जरी कारों में आते हैं.

1400 लोग एकसाथ खा सकते हैं खाना

गौरतलब है कि शिल्पा शेट्टी के इस रेस्टोरैंट में एक समय में 1,400 लोग खाना खा सकते हैं. यहां पर मिलने वाली महंगी डिशेज के प्राइस होश उड़ाने वाले हैं, जिस के चलते शिल्पा के इस रेस्टोरैंट का टर्नओवर ₹2 से 3 करोड़ है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, समान्य दिनों में ₹2 करोड़ के करीब और वीकेंड में ₹3 करोड़ के करीब शिल्पा के इस रेस्टोरैंट का टर्नओवर है.

शिल्पा शेट्टी के इस लग्जरियस और महंगे रेस्टोरैंट में नौनवेज और वेज दोनों तरह की वैरायटी मिलती है जैसे चमेली की चाय और जैस्मिन हर्बल टी का प्राइस ₹920 है, तो इंग्लिश ब्रैकफास्ट ₹360 में मिलता है.

शानदार अनुभव

वहीं दूसरी तरफ शैंपेन की कीमत लाखों में है. फ्रांस की कंपनी की स्पार्कलिंग वाइन की कीमत ₹1.59 लाख तक है तो चिकन गार्लिक नूडल्स ₹675, चिकन बरीटो ₹900 का है. बैस्टियन रेस्टोरैंट की स्पैशल सलाद की कीमत जहां ₹1,050 है, तो  अवोकाडो टोस्ट की कीमत ₹800 है.

इस के अलावा सीफूड में कई तरह की वैरायटी जैसे झींगा मछली, केकड़ा आदि की कीमत भी हजारों में है. शिल्पा शेट्टी का यह रेस्टोरैंट पूरी गति से फलफूल रहा है.

Shilpa Shetty

Big Boss: दीपक चाहर ने फैमिली वीक में कुनिका की क्लास लगाई, जानें वजह

Big Boss: कलर्स चैनल के रियलिटी शो बिग बॉस 19 के फैमिली वीक राउंड में हर प्रतियोगी का फैमिली मेंबर घर में आने का सिलसिला जारी रहा जिसमें प्रतियोगी मालती चहर के भाई प्रसिद्ध क्रिकेटर दीपक चाहर बहन मालती से मिलने पहुंचे, इस दौरान क्रिकेटर दीपक ने अपनी बहन मालती को घर की सबसे सीनियर 61 वर्षीय कुनिका सदानंद द्वारा लेस्बियन कहने पर सख्त एतराज जताया और सभी को समझाते हुए कहा यहां पर कहां हुआ एक-एक शब्द पूरे हिंदुस्तान में सुना जाता है.

ऐसे में किसी कोई भी गलत शब्द से पुकारना उसकी जिंदगी बर्बाद कर सकता है. चाहे वह मेरी बहन हो या कोई और क्योंकि उनकी शादी नहीं हुई है ऐसे में अगर कुछ भी गलत कहां गया तो उनके आगे के जीवन में भी प्रॉब्लम आ सकती है.

किसी भी लड़की या लड़के को लेस्बियन या स्ट्रेट कहना पूरी तरह से गलत है. हालांकि पूरे बिग बॉस हाउस के प्रतियोगियों को संबोधित करते समय दीपक चाहर ने इन शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया लेकिन गलत शब्दों का इस्तेमाल ना करते हुए इनडायरेक्ट अपनी बात सबके सामने रख दी, जिसके बाद कुनिका को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने मालती और उनके भाई से माफी भी मांगी.

हालांकि इस बिग बॉस 19 में शब्दों के तीर मारने में कोई भी कम नहीं है, क्योंकि शुरुआती समय में मालती ने भी अन्य प्रतियोगी बशीर को लेकर ऐसा ही कुछ कमेंट किया था.

इससे एक बात तो साबित होती है कि आज पाश्चात्य संस्कृति को फॉलो करते हुए जो लोग इस तरह के अनैतिक रिश्तों को सही ठहराते हैं उनके लिए यह एक सबक है कि आज भी समलैंगिक रिश्तो की समाज में उचित जगह नहीं है ना ही कोई इज्जत है.

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Dark Neck: गरदन की त्वचा काली पड़ने से ऐसे बचाएं

Dark Neck: नेहा के गरदन की त्वचा हमेशा थोड़ी काली और हार्ड रहती थी. उस ने कई घरेलू इलाज करवा डाले, लेकिन ठीक नहीं हुआ. अंत में उस ने डर्मेटोलौजिस्ट से कैमिकल पील्स करवाई, जिस से त्वचा का कालापन कम हुआ.

बाद में नेहा को पता चला कि उसे किसी भी मेटल की ज्वैलरी से ऐलर्जी है, जिस से उस की गरदन का रंग काला हो जाता है. डाक्टर ने उसे पहनने से भी मना किया है. अब उस ने मेटल के किसी भी नेकपीस को पहनना बंद कर दिया है. इस की जगह वह टसेल या धागे से बनी हुई ज्वैलरी पहनती है.

असल में गरदन का कालापन एक सामान्य स्थिति है, जिस में गरदन (अकसर उस के पिछले हिस्से) की त्वचा शरीर के बाकी हिस्सों की तुलना में गहरे रंग की होती है. शायद गहरे रंग की एक पट्टी या रेखा के साथ यह दिखाई पड़ती है.

गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों में गरदन का कालापन चमड़े जैसा लग सकता है. इसे काली गरदन भी कहा जाता है. गरदन पर यह हाइपरपिगमेंटेशन आमतौर पर चिंता का विषय नहीं होता है और संक्रामक भी नहीं होता है.

इस बारे में मुंबई की डाक्टर शरीफा स्किन केअर क्लिनिक की त्वचा रोग विशेषज्ञ डा. शरीफा चौसे कहते हैं कि गरदन की स्किन काली पड़ जाना कोई बीमारी नहीं होती, लेकिन यह आम लड़कियों को पसंद नहीं आती, इसलिए वे कैमिकल या लेजर ट्रीटमैंट का सहारा लेती हैं. इस के लक्षण निम्न हैं :

लक्षण

-त्वचा आसपास की त्वचा की तुलना में मोटी महसूस होना.

-स्पर्श करने पर त्वचा मखमली महसूस होना.

-खुजली होना आदि.

कारण

इस के कई कारण हो सकते हैं. जैसे, हार्मोनल बदलाव. इस के कारण युवावस्था, गर्भावस्था, मेनोपोज या थायरायड की समस्या होने पर शरीर में हार्मोंस बदलते हैं. इस से त्वचा में मेलानिन बढ़ता है और त्वचा का रंग काला पङने लगता है.

धूप में अधिक समय तक रहना

सूरज की किरणें त्वचा को नुकसान पहुंचाती हैं और मेलानिन बढ़ाती हैं, जिस की वजह से गरदन काली पड़ सकती है.

साफसफाई की कमी

अगर गरदन की ठीक से सफाई और स्क्रबिंग न की जाए, तो गंदगी, पसीना और मृत त्वचा जमा हो जाती है, जिस से त्वचा काली दिखने लगती है.

रगड़ से

टाइट कपड़े, दुपट्टा, चेन या ज्वैलरी लगातार गरदन पर रगड़ पैदा करते हैं, जिस से त्वचा काली हो सकती है.

जैनेटिक कारण

कुछ स्त्रियों में प्राकृतिक रूप से गरदन जल्दी काली पड़ने की प्रवृत्ति होती है और यह जैनेटिक कारण हो सकती है.

उम्र बढ़ना

कुछ स्त्रियों के उम्र के साथ त्वचा की नई कोशिकाएं धीरेधीरे बनती हैं. इस से मृत त्वचा जमा हो कर गरदन गहरी दिखने लगती है.

बीमारियां

कुछ खास बीमारियां जैसे ऐडिसन रोग या अकैंथोसिस नाइग्रिकन्स होने पर भी गरदन काली हो सकती है.

अकैंथोसिस नाइग्रिकन्स एक त्वचा संबंधी स्थिति है, जो गहरे रंग की मोटी त्वचा से जुड़ी होती है, जो मखमली सी महसूस हो सकती है.

यह अकसर गरदन, कमर, बगलों और त्वचा की सिलवटों वाले अन्य क्षेत्रों (जैसे, घुटनों और कुहनियों) पर होता है. यह कोई बीमारी नहीं है और न ही संक्रामक होता है.

अकैंथोसिस नाइग्रिकन्स मोटापे से ग्रस्त लोगों में ज्यादा आम है, लेकिन यह स्वस्थ लोगों में भी हो सकता है, खासकर गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों में हो सकता है.

एडिसन रोग

यह एक दुर्लभ हार्मोनल विकार है, जिस में एड्रीनल ग्रंथियां पर्याप्त कोर्टिसोल और एल्डोस्टेरोन जैसे आवश्यक हार्मोन का उत्पादन नहीं कर पाती हैं. यह स्थिति अकसर औटोइम्यून रोग के कारण होती है, जहां शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अधिवृक्क ग्रंथियों की बाहरी परत पर हमला करती है और उसे नुकसान पहुंचाती है.

एडिसन रोग के लक्षणों में थकान, कमजोरी, निम्न रक्तचाप, वजन घटना और त्वचा का काला पड़ना शामिल है.

कुछ खास दवा की वजह से स्किन पिगमेंटेशन

दवा की वजह से भी हाइपरपिग्मेंटेशन हो सकता है, जिस का असर कई बार गरदन पर दिखता है, मसलन नौन स्टेराइडल इंफ्लेमेटोरी ड्रग, कैंसर के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कीमोथेरैपी दवाएं, मिनोसाइक्लिन जैसी ऐंटीबायोटिक मलेरिया रोधी दवाएं,

ऐमियोडैरोन (हृदयरोग की एक दवा)

मनोविकार नाशक दवाएं, हार्मोनल या जन्म नियंत्रण वाली दवाएं आदि कई हैं, जिन की वजह से भी गरदन की त्वचा काली पड़ सकती है.

इलाज

अगर दवा की वजह से गरदन की त्वचा काली पड़ जाती है, तो दवा बंद करने पर वह अनायास ही कुछ समय बाद ठीक हो जाती है, लेकिन ऐसा न होने पर इलाज करवा लेना ठीक होता है, जैसे क्रीम और मलहम.

कई बार लोग त्वचा काली पङने पर क्रीम लगाते हैं. हाइड्रोक्विनोन, रेटिनौइड्स जैसी क्रीमें त्वचा का रंग हलका करने में मदद करती हैं और मेलानिन कम करती हैं.

कैमिकल पील्स

ये त्वचा पर जमा मृत कोशिकाएं हटा कर कालेपन को कम करती हैं और त्वचा की चमक को बनाए रखती हैं.

लेजर उपचार

लेजर मेलानिन पर सीधा असर करता है और धीरेधीरे कालेपन को कम करने में मदद करता है.

गरदन के कालेपन से बचने के कुछ सुझाव :

-रोज गरदन साफ करें और हफ्ते में 1-2 बार स्क्रब करें.

-जब भी बाहर जाएं तो 30 से 50 एसपीएफ वाले सनस्क्रीन लगाना न भूलें और बाहर जाते समय गरदन को अवश्य ढकें.

-ज्यादा पानी पीने से त्वचा हाइड्रेटेड रहती है और स्वस्थ दिखती है.

-टाइट या रगड़ देने वाले कपड़ों को पहनने से बचें.

इस प्रकार गरदन के कालेपन की वजह को समझने के बाद ऐक्सपर्ट की सही इलाज से आप आसानी से इस की सुंदरता को बनाए रख सकते है, क्योंकि सुंदर और साफ ग्रीवा ही खूबसूरती में चार चांद लगाती है.

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Long Story in Hindi: डुप्लीकेट- आखिर मनोहर क्यों दुखी था

Long Story in Hindi: कल्पना सिनेमाघर में काफी पुरानी फिल्म ‘अपना कौन’ चल रही थी. बहुत कम दर्शक थे. मनोहर भी फिल्म देखने आया था. जैसेजैसे वह सीन निकट आ रहा था, उस के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. एक घंटे बाद वह सीन आया. अचानक फिल्म की हीरोइन सीढि़यों से लुढ़कती हुई फर्श पर आ गिरती है.

यह देखते हुए मनोहर के मुंह से दुखभरी चीख निकली. वह बुरी तरह कांप उठा. उस का मन बहुत भारी हो गया. वह सीट से उठा और सिनेमाघर से बाहर निकल गया. वह बस इतनी ही फिल्म देखने आया था.

सिनेमाघर से बाहर आ कर मनोहर ने एक रिकशा वाले को जनकपुरी चलने को कहा.

मनोहर के चेहरे पर दुख की रेखाएं फैलती जा रही थीं. 20 साल पहले बनी थी यह फिल्म ‘अपना कौन’. किसी को क्या पता था कि सीढि़यों से लुढ़क कर फर्श पर गिरने वाली हीरोइन नहीं, बल्कि हीरोइन की डुप्लीकेट नीलू थी. नीलू उस की पत्नी ऊंचे जीने से बुरी तरह लुढ़कती हुई फर्श पर गिरी. उस के बाद वह कभी उठ ही न पाई.

फिल्म नगरी की नकली सुनहरी चमकदमक. खिंचे चले जा रहे हैं अनेक नौजवान. न जाने कितने चेहरे इस चमक के पीछे छिपे गहरे अंधकार में हमेशा के लिए खो जाते हैं.

मनोहर विचारों के सागर में गोते लगाने लगा

मनोहर विचारों के सागर में गोते लगाने लगा. उसे याद आ रहा था जब वह नौजवान था, हैंडसम था. उसे ऐक्टिंग करने का शौक था. शहर के कुछ मंचों पर नाटकों में भी ऐक्टिंग की थी. उसे भी फिल्मों में काम करने का भूत सवार हो गया था. वह घर से मुंबई भाग आया था. महीनों मारामारा घूमता रहा. जो रुपए लाया था, खत्म हो गए.

तभी उस की दोस्ती विजय से हो गई जो फिल्मों में डुप्लीकेट का काम करता था. विजय उसे भी स्टूडियो में साथ ले जाने लगा. वहां वह फिल्मों की शूटिंग देखता और सोचता कि काश, मुझे भी किसी फिल्म में काम मिल जाता.

वह दिन मनोहर की खुशी का दिन था जब एक फिल्म में विजय ने उसे भी डुप्लीकेट का काम दिला दिया था. उस ने मन ही मन सोचा था कि आज वह डुप्लीकेट बना है, कल हीरो भी जरूर बनेगा.

पर, यह सोचना कितना गलत रहा, क्योंकि फिल्म नगरी में हीरो कभी डुप्लीकेट नहीं बनता और डुप्लीकेट कभी हीरो नहीं बनता. जो जिस लाइन पर चल निकला, सो चल निकला. जिस पर जो लेबल यानी ठप्पा लग गया, सो लग गया.

फिल्मी दुनिया में मनोहर भी एक डुप्लीकेट बन कर रह गया

फिल्मी दुनिया में मनोहर भी एक डुप्लीकेट बन कर रह गया था. वह कुछ नामचीन हीरो के लिए काम करने लगा था. शीशे तोड़ कर कमरे में घुसता. ऊंचीऊंची इमारतों पर विलेन के डुप्लीकेट से लड़ाई के शौट देता. कभी वह पहाडि़यों से लुढ़कता तो कभीकभी ऐसे स्टंट भी करने पड़ते जिन्हें देख कर दर्शक अपनी सांसें रोक लेते.

फिल्मों की शूटिंग पर मनोहर सुंदर सलोनी सी एक लड़की को देखा करता था. एक दिन जब उस से बात की गई, तो उस ने बताया था कि उस का नाम नीलिमा है. पर सभी उसे नीलू कहते हैं. उसे भी थोड़ीबहुत ऐक्टिंग आती थी. वह भी अपने शहर में कई नाटकों में रोल कर चुकी थी. वह भी फिल्मों में हीरोइन बनना चाहती थी.

यहां मुंबई में नीलू के दूर के एक रिश्ते का मामा रहता है. उस से फोन पर बात हुई तो उस ने एकदम कह दिया कि आ जाओ, मेरी बहुत जानपहचान है फिल्म नगरी में.

नीलू ने जब मम्मीपापा को मुंबई में जाने के बारे में बताया तो दोनों ने साफ मना कर दिया था. फिल्मी दुनिया में फैली अनेक बुराइयों व परेशानियों के बारे में भी उसे समझाया था.

पापा ने कहा था, ‘नए लोगों को वहां पैर जमाने में बहुत संघर्ष करना पड़ता है. उन लड़कियों के लिए दलदल में गिरने जैसी बात हो जाती है जिन का फिल्म नगरी या मुंबई में कोई अपना नहीं होता.’

‘वहां पर मामा जगत प्रसाद तो हैं. उन्होंने फोन पर मुझ से कहा है कि उन की बहुत जानपहचान है,’ नीलू बोली थी.

‘नीलू बेटी, वह तेरा सगा मामा तो है नहीं. दूर के रिश्ते में मेरा भाई लगता है. तू फिल्मी दुनिया के सपने छोड़ कर यहीं पढ़ाईलिखाई में अपना ध्यान दे,’ मम्मी ने कहा था.

पर नीलू नहीं मानी. उस की जिद के सामने वे मजबूर हो गए. उन दोनों को नाराज कर वह मुंबई पहुंच गई. जगत मामा व मामी उसे देख कर बहुत खुश हुए.

जगत मामा ने नीलू को फिल्मी दुनिया के अनेक लोगों के साथ अपने फोटो भी दिखाए. उसे पूरा विश्वास हो गया था कि मामा उसे जल्द ही किसी न किसी फिल्म में रोल दिला देंगे.

एक दिन मामी बाजार गई हुई थीं. मामा और वह घर पर अकेले ही थे. वह एक फिल्मी पत्रिका पढ़ रही थी.

‘नीलू, एक दिन तुम्हारी तसवीरें भी इसी तरह पत्रिकाओं व अखबारों में छपेंगी.’

‘सच, मामाजी,’ नीलू की आंखों में खुशी भरी चमक तैरने लगी मानो उस की फिल्म की शूटिंग हो रही है. उसे हीरोइन की सहेली का रोल मिला है. उस के फोटो भी अखबारों में छप रहे हैं.

तभी नीलू चौंक उठी. मामा ने एक झटके से उसे अपनी तरफ खींचना चाहा था. वह एकदम बोल उठी, ‘यह क्या करते हो आप मामाजी?’

मामा ने मुसकरा कर उस की ओर देखा था. मामा की आंखों में वासना के डोरे तैर रहे थे.

‘मामाजी, आप से मैं क्या कहूं? आप को तो शर्म आनी चाहिए. आप अपनी भांजी के साथ ऐसी हरकत कर रहे हो.’

‘अरे, तुम मेरी सगी भांजी तो हो नहीं. मेरी 2-3 निर्माताओं से बात चल रही है. उन्होंने कहा है कि वे जल्द ही तुम्हें स्क्रीन टैस्ट के लिए बुला लेंगे. स्क्रीन टैस्ट के नाम पर यह सब होना मामूली बात है.

‘अगर तुम इस से बचना चाहोगी तो नामुमकिन हो जाएगा काम मिलना. अखबारमैगजीनों में तुम ने पढ़ा होगा कि बहुत सी हीरोइन अपने इंटरव्यू में बता देती हैं कि फिल्मों में काम देने के नाम पर उन का यौन शोषण हुआ है.’

नीलू भी मजबूर हो गई थी. उस का सब से पहला यौन शोषण मामा ने किया. स्क्रीन टैस्ट के नाम पर कई बार यौन शोषण हुआ, पर उसे किसी फिल्म में काम नहीं मिला.

शूटिंग देखतेदेखते नीलू की दोस्ती निशा से हो गई थी. निशा फिल्मों में डुप्लीकेट का काम करती थी. कभीकभी छोटामोटा रोल भी उसे मिल जाता था.

एक दिन एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी. निशा के डुप्लीकेट के रूप में कुछ शौट फिल्माए जाने थे. अचानक निशा की तबीयत खराब हो गई तो उस ने अपना काम नीलू को दिला दिया.

इतने साल हो गए हैं डुप्लीकेट का रोल करतेकरते, पर किसी फिल्म में कोई ढंग का रोल नहीं मिला.

इस के बाद मनोहर व नीलू का मिलनाजुलना बढ़ता रहा. एक दिन वह आया जब उस ने नीलू से शादी कर ली.

शादी के बाद उस ने नीलू को किसी भी फिल्म में डुप्लीकेट का काम करने को बिलकुल मना कर दिया था.

2 साल बाद उन के घर में एक नन्हामुन्ना मेहमान आ गया. बेटे का नाम कमल रखा गया.

एक दिन नीलू ने उस से कहा, ‘मैं तो चाहती हूं कि तुम भी डुप्लीकेट का काम छोड़ दो. जब तुम शूटिंग पर चले जाते हो, मुझे बहुत डर लगता है. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो हम दोनों का क्या होगा?’

‘हां नीलू, तुम ठीक कहती हो. मैं भी यही सोच रहा हूं. मेरा मन भी इस काम से ऊब चुका है. इस काम में इज्जत तो बिलकुल है ही नहीं. कभीकभी तो अपनेआप से ही नफरत होने लगती है.

क्या हम बेइज्जती के ही हकदार हैं, शाबाशी के नहीं?

‘जब कोई मामूली सा डायरैक्टर भी सब के सामने डांट देता है तब लगता है कि क्या हम इतने गिरे हुए हैं जो हमारी इस तरह बेइज्जती कर दी जाती है? क्या हम बेइज्जती के ही हकदार हैं, शाबाशी के नहीं?

‘अब तो यहां मुंबई में रहते हुए मेरा मन ऊब गया है,’ नीलू ने कहा था.

‘तुम ठीक कहती हो. हम जल्द ही यहां से चले जाएंगे किसी छोटे से शहर में या किसी पहाड़ी इलाके में. वहीं पर मैं कोई छोटामोटा काम कर लूंगा. हम अपने बेटे कमल को इस फिल्मी दुनिया से दूर ही रखेंगे.’

नीलू ने मुसकराते हुए उस की ओर देखा था.

एक दिन मनोहर की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो गई. इलाज शुरू हुआ. कई डाक्टरों को दिखाया गया, पर बीमारी कम नहीं हो रही थी. जो भी पास में पैसा था, बीमारी की भेंट चढ़ गया.

एक स्पैशलिस्ट डाक्टर को दिखाया गया तो उस ने कुछ जरूरी जांच, दवा, इंजैक्शन वगैरह लिख दिए थे.

मनोहर बिस्तर पर लेटा हुआ कुछ सोच रहा था. उस की आंखों से पता नहीं कब आंसू बह निकले.

नीलू ने उस के आंसू पोंछते हुए कहा था, ‘आप अपना मन दुखी न करो. डाक्टर ने कहा है कि तुम ठीक हो जाओगे.’

‘नीलू, इतने रुपए कहां से आएंगे? तुम रहने दो, जो होगा वह हो जाएगा.’

‘तुम किसी भी तरह की चिंता मत करो. मैं प्रकाश स्टूडियो जाऊंगी. वहां फिल्म ‘अपना कौन’ की शूटिंग चल रही है. डायरैक्टर प्रशांत राय तुम्हें और मुझे जानता है.’

‘नहीं नीलू, तुम्हें चौथा महीना चल रहा है. तुम दोबारा पेट से हो. ऐसे में तुम्हें मैं कहीं नहीं जाने दूंगा.’

‘तुम्हारी यह नीलू कोई गलत काम कर के पैसे नहीं लाएगी. मुझे जाने दो,’ कह कर नीलू चली गई थी.

मनोहर चुपचाप लेटा रहा. उस ने मन ही मन यह फैसला कर लिया था कि बीमारी ठीक होते ही वह नीलू व बेटे कमल के साथ यहां से चला जाएगा. उसे नींद आने लगी थी.

रात के 3 बज रहे थे. दरवाजे पर खटखटाहट हुई तो उस ने उठ कर दरवाजा खोल दिया. सामने खड़े विजय को देख कर मनोहर बुरी तरह चौंका.

विजय एकदम बोल उठा, ‘मनोहर, जल्दी अस्पताल चलना है. भाभी बहुत सीरियस हैं.’

मनोहर ने घबराई आवाज में पूछा, ‘क्या हुआ नीलू को?’

‘प्रकाश स्टूडियो में ‘अपना कौन’ की शूटिंग चल रही थी. नीलू भाभी ने तुम्हारी बीमारी की बता कर डायरैक्टर प्रशांत राय से काम मांगा. डायरैक्टर ने डुप्लीकेट का काम दे दिया. हीरोइन को सीढि़यों से लुढ़क कर नीचे फर्श पर गिरना था.

‘यही सीन नीलू भाभी पर फिल्माया गया. वे फर्श पर गिरीं तो फिर उठ न सकीं. बेहोश हो गईं. शायद वे पेट से थीं,’ विजय ने बताया था.

यह सुन कर मनोहर सन्न रह गया था. विजय ने एक टैक्सी की और उसे व कमल को साथ ले कर चल दिया.

विजय ने रास्ते में बताया था, ‘जब नीलू भाभी बेहोश हो गईं तो डायरैक्टर प्रशांत राय ने कहा था कि आजकल किसी के साथ हमदर्दी करना भी ठीक नहीं. इस ने हम को बताया नहीं था अपनी प्रैगनैंसी के बारे में. यह सीरियस है. इसे अभी अस्पताल ले जाओ और इस के घर पर खबर कर दो,’ कहते हुए डायरैक्टर ने मुझे कुछ रुपए भी दिए थे.

मनोहर के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था.

अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि नीलू आपरेशन थिएटर में है. कुछ देर बाद लेडी डाक्टर ने बाहर आ कर कहा था, ‘सौरी, ज्यादा खून बह जाने के चलते नीलू को नहीं बचाया जा सका. उसे इस हालत में यह काम नहीं करना चाहिए था.’

मनोहर चुपचाप सुनता रहा. वह कुछ भी कहने की हालत में नहीं था.

नीलू ने तो उस से यह डुप्लीकेट का काम न करने का वादा ले लिया था, पर यही काम नीलू को हमेशा के लिए उस से बहुत दूर ले गया था.

फिर उस की जिंदगी में आई निशा. वह निशा को भी कई सालों से जानता था. निशा नीलू की सहेली थी. निशा पड़ोस में ही रहती थी. उसे भी नीलू के इस तरह मरने का बहुत दुख था.

निशा के साथ मनोहर का मेलजोल बढ़ता रहा. वह भी फिल्म नगरी के इस अंधकार से ऊब चुकी थी. वह भी यहां से कहीं दूर जाना चाहती थी, पर अकेली कहां जाए? हर जगह इनसान के रूप में ऐसे भेडि़ए मौजूद हैं जो उस जैसी अकेली को नोचनोच कर खा जाना चाहते हैं.

मनोहर व निशा को एकदूसरे के सहारे की जरूरत थी. सो, उन्होंने शादी कर ली.

कुछ दिनों बाद वे दोनों मुंबई से हजारों किलोमीटर दूर इस शहर में आ गए थे.

यहां आ कर अपने पैर जमाने के लिए मनोहर को बहुत मेहनत करनी पड़ी थी.

15 साल बीत गए. इस बीच निशा ने एक बेटी को जन्म दिया, जिसे मधुरिमा कहा जाने लगा. मधुरिमा अब 10वीं में और कमल बीए फाइनल में पढ़ रहा था.

जनकपुरी में रिकशा रुका तो मनोहर यादों से बाहर निकला. रिकशे वाले को पैसे दे कर वह भारी मन से घर पहुंचा. एक कमरे में सोफे पर जा कर वह पसर गया. उस ने आंखें बंद कर लीं. बारबार आंखों के सामने वही सीन आ रहा था, जब नीलू सीढि़यों से लुढ़क कर गिरती है.

मनोहर के पास आ कर निशा सोफे पर बैठते हुए बोली, ‘‘देख आए वह सीन. सचमुच देखा नहीं जाता. बहुत दुख होता है. उस समय नीलू को कितना दर्द सहना पड़ा होगा.’’

मनोहर कुछ नहीं बोला.

‘‘मैं तुम्हारे लिए चाय बना कर लाती हूं,’’ कह कर निशा रसोईघर की ओर चल दी.

मनोहर की नजर दीवार पर लगी नीलू की तसवीर पर चली गई. वह एकटक उस की ओर ही देखता रहा.

निशा ने चाय मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘चाय पी लीजिए. मन ज्यादा दुखी करने से कुछ नहीं होगा.’’

मनोहर ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘कमल अभी तक नहीं आया? कहां रह गया वह? उस का कोई फोन आया या नहीं?’’

‘‘हां, एक घंटा पहले आया था कि अभी पहुंच रहा हूं.’’

‘‘फिल्म की शूटिंग देखने वह लखनपुर गया है?’’

‘‘हां, मैं ने तो उसे बहुत मना किया था, पर वह माना नहीं, बच्चों की तरह जिद करने लगा. कह रहा था कि पहली बार फिल्म की शूटिंग देखने जा रहा हूं. बचपन में मुंबई में देखी होगी, वह तो अब याद नहीं. साथ में उस का दोस्त सूरज भी जा रहा है. बस शाम तक लौट आएंगे?’’

‘‘फिल्मी दुनिया की चमकदमक किसे अच्छी नहीं लगती,’’ मनोहर ने कह कर लंबी सांस छोड़ी.

मधुरिमा दूसरे कमरे में पढ़ाई कर रही थी, तभी घर के बाहर मोटरसाइकिल के रुकने की आवाज आई तो मनोहर समझ गया कि कमल आ गया है.

कमल कमरे में घुसा. उस के माथे पर पट्टी बंधी देख मनोहर व निशा बुरी तरह चौंक उठे.

‘‘यह क्या हुआ? कोई हादसा हो गया था क्या?’’ मनोहर ने पूछा.

‘‘नहीं पापा…’’

‘‘फिर यह चोट…? तू तो लखनपुर शूटिंग देखने गया था न? वहां किसी से झगड़ा तो नहीं हो गया?’’ निशा ने कमल की ओर देखते हुए पूछा.

तभी मधुरिमा भी कमरे से बाहर निकल आई. उस ने भी एकदम पूछा, ‘‘यह क्या हुआ भैया?’’

कमल ने कहा, ‘‘मैं शूटिंग देखने ही गया था. जैसे ही शूटिंग शुरू हुई तो हीरो के डुप्लीकेट के पेट में भयंकर दर्द हो गया. जब दवा से भी आराम नहीं हुआ तो उसे शहर के एक बड़े अस्पताल में भेज दिया. प्रोड्यूसर माथा पकड़ कर बैठ गया, तभी डायरैक्टर की नजर मुझ पर पड़ी…’’

‘‘फिर…?’’ मनोहर ने पूछा.

‘‘डायरैक्टर ने मुझे अपने पास बुलाया. नीचे से ऊपर तक देखा और कहा कि एक छोटा सा काम करोगे. काम बहुत आसान है. हीरोइन नाराज हो कर जाती है. हीरो आवाज देता है, पर हीरोइन सुनती नहीं और चली जाती है. हीरो उस के पीछे दौड़ता है. पैर फिसलता है और छोटी सी पहाड़ी से लुढ़क कर नीचे गिरता है. बस यही काम था उस डुप्लीकेट का.

‘‘मैं मना नहीं कर सका. सीन ओके हो गया. तब डायरैक्टर ने मेरी पीठ थपथपा कर मुझे 10,000 रुपए भी दिए थे. सिर में मामूली सी चोट लग गई है. 2-4 दिन में ठीक हो जाएगी,’’ कमल ने बताया.

यह सुन कर मनोहर ने एक जोरदार थप्पड़ कमल के मुंह पर मारा और चीखते हुए कहा, ‘‘तू भी बन गया डुप्लीकेट. दफा हो जा मेरी नजरों के सामने से. मैं तेरी सूरत भी नहीं देखना चाहता. जा, भाग जा… चला जा मुंबई. वहां जा कर देख कि किस तरह कीड़ेमकोड़े की जिंदगी जीते हैं ये डुप्लीकेट.

‘‘मेरे साथ चल कर देख फिल्म ‘अपना कौन’ में तेरी मम्मी डुप्लीकेट का काम करतेकरते हमेशा के लिए हमें छोड़ कर चली गई. मुझे इस काम से क्यों नफरत हो गई थी. मैं यह काम छोड़ कर क्यों मुंबई से यहां आ गया था? तुझे भी तो यह सब मालूम है, फिर तू ने क्यों जानबूझ कर अपने माथे पर डुप्लीकेट का लेबल लगा लिया?

‘‘अगर तुझे आज कुछ हो जाता तो हमारा क्या होता? यह सब नहीं सोचा होगा तू ने,’’ कहतेकहते मनोहर का गला भर्रा उठा.

कमल को अपनी भूल का अहसास हो रहा था. वह बोला, ‘‘माफ कर देना पापा, मुझे दुख है कि मैं ने आप का दिल दुखाया. यह मेरी पहली और आखिरी भूल है.’’

Long Story in Hindi

Social Story: खूनी सुबूत- क्या सही था निर्मल का तरीका

Social Story: निर्मल ड्रैसिंग रूम में अपने कपड़े बदल कर खेल के मैदान में आया. प्रदेश के खेलकूद के दलों के लिए परीक्षाएं चल रही थीं, और निर्मल को पूरा विश्वास था कि वह लौंग जंप (लंबाई की कूद) में सफलता पाएगा. कालेज के खेलों में वह हमेशा लौंग जंप में प्रथम स्थान पाता आया था और डिग्री हासिल करने के बाद वह पिछले 2 सालों से लगातार अभ्यास कर रहा था.

निर्मल ने नीचे झंक कर अपनी पोशाक को जांचा. गंजी, निकर, मोजे, जूते, सब नए, सब बड़ी नामी कंपनियों के बने हुए, सब बेहद कीमती थे. उस के पिता ने उसे जबरदस्ती यह पोशाक पहनाई थी. आखिर वह एक बड़े आदमी का बेटा था, वह साधारण कपड़े कैसे पहन सकता था. ‘चुनने वाले तुम्हारी एक झलक देखते ही तुम्हें चुन लेंगे,’ उन्होंने कहा था.

निर्मल ने बहुत कोशिश की कि वह अपने पिता को समझए कि चुनने वाले यह नहीं देखेंगे कि उस ने कैसी पोशाक पहनी है. वे यह देखेंगे कि उस ने कितनी लंबी छलांग लगाई है. पर उस के पिता उस की बात सुनने को तैयार ही नहीं थे. निर्मल मन में प्रार्थना कर रहा था कि उस के नए जूते उस के पैरों को कोई दिक्कत न दें.

निर्मल लौंग जंप अखाड़े की ओर जा रहा था कि उस ने देखा, बाईं तरफ महिलाओं की 400 मीटर दौड़ की परीक्षा चल रही थी. उस के देखतेदेखते दौड़ने वाली लड़कियां भागती हुई आईं और जो उन सब से आगे थी उस ने फीता तोड़ा. उस ने तीनचार कदम और लिए और फिर जमीन पर गिर गई. तुरंत उस के चारों ओर लोग इकट्ठा हो गए. निर्मल भी उन में शामिल हो गया. लड़की बेहोश सी पड़ी थी.

कई लोग एकसाथ बोलने लगे और हड़बड़ी मच गई. इतने में लड़की ने अपनी आंखें खोलीं और उठ कर बैठ गई. अपने चारों ओर भीड़ देख कर शरमा गई और बोली, ‘‘चिंता मत कीजिए, मुझे कुछ नहीं हुआ है. माफ कीजिए, पर मैं ने दौड़ में अपनी पूरी जान लगा दी थी, इस कारण शायद मैं कुछ समय के लिए बेहोश हो गई थी. पर अब मैं बिलकुल ठीकठाक हूं.’’

निर्मल को उस की गहरी आवाज पसंद आई. उस ने यह भी देखा कि उस का चेहरा साधारण सा था, पर फिर भी मोहक प्रभाव का था. मन ही मन उस ने सोचा कि वह उस लड़की के बारे में और जानकारी हासिल करेगा.

लड़की खड़ी ही हुई थी कि एक अधिकारी वहां आया और उस से बोला ‘‘मुबारक हो मिस सुमन. आप 400 मीटर दौड़ की विजेता हैं, इस कारण आप प्रदेश के दल की सदस्य चुनी गई हैं. इस विषय में आप को जल्दी ही अधिकारपूर्वक सूचना दी जाएगी.’’

‘अब मैं कम से कम उस का नाम तो जानता हूं. उस से दोस्ती करना आसान होगा,’ निर्मल ने सोचा. फिर वह अपनी लौंग जंप की परीक्षा देने गया. उस ने आसानी से प्रदेश की टीम में अपनी जगह बना ली.

अगले कुछ दिनों के दौरान निर्मल ने सुमन के बारे में काफी जानकारी हासिल की, पर ऐसे तरीके से कि लोगों को शक न हो कि वह उस लड़की में कोई खास रुचि ले रहा है.

उस ने पता किया कि लड़की का पूरा नाम सुमन गुप्ता था और उस के पिता की एक बाजार में किराने की दुकान थी. उस को यह भी पता चला कि सुमन खेलकूद की शौकीन थी. 400 मीटर की दौड़ के अलावा वह हौकी और बास्केटबौल भी खेला करती थी. निर्मल ने तय किया कि वह सुमन से किसी न किसी बहाने ‘गलती’ से मिलेगा.

दो दिनों के बाद उसे मौका मिला. निर्मल अभ्यास पूरा कर के ड्रैसिंग रूम की ओर लौट रहा था कि सुमन नजर आई. उस ने अपनी दौड़ उसी समय पूरी की थी और कमर पर हाथ रखे हांफती हुई खड़ी थी.

निर्मल उस के पास से गुजरने का बहाना बनाते हुए उस से बोला ‘‘आप बहुत अच्छी तरह दौड़ती हैं.’’

‘‘धन्यवाद,’’ सुमन ने गहरी सांसों के बीच जवाब दिया.

‘‘मैं निर्मल पांडे हूं. मैं लौंग जंप दल का सदस्य हूं,’’ कहते हुए निर्मल ने अपना हाथ बढ़ाया.

सुमन ने नाम के लिए हलके से उस के हाथ को छूते हुए हिलाया. ‘‘मेरा नाम सुमन गुप्ता है. मैं 400 मीटर दौड़ लगाती हूं.’’

बात आगे बढ़ाने के लिए निर्मल के पास कोई बहाना नहीं था. इस कारण उस ने विदाई ली, ‘‘आप से मिल कर खुशी हुई मिस सुमन. आशा है हम फिर मिलेंगे. गुड बाय.’’

निर्मल सुमन को अपने खयालों से निकाल नहीं सका. वह कोई न कोई बहाना बना कर, उस से तकरीबन रोज मिलने लगा. धीरेधीरे उसे महसूस होने लगा कि उस को सुमन से प्यार हो गया है.

निर्मल एक समझदार लड़का था. वह यह अच्छी तरह समझता था कि शादीब्याह के मामलों में जल्दबाजी अच्छी नहीं होती है. इन पर बहुत गंभीरता से विचार करना पड़ता है. इस कारण सुमन से शादी के बारे में काफी गहराई से वह सोचने लगा.

सुमन और उस की शादी की पहली रुकावट तो साफ नजर आ रही थी, जिस को पार करना तकरीबन असंभव लग रहा था. वह यह था कि निर्मल एक उच्च श्रेणी का ब्राह्मण था और सुमन कायस्थ थी. उस का पिता पुराने खयालात का एक सनातन पंथी था, जो दूसरी जाति की लड़की से शादी के लिए कभी राजी नहीं होता. खासकर नीची जाति की लड़की से तो बिलकुल भी नहीं.

निर्मल के पिता उस का रिश्ता एक कायस्थ लड़की के साथ शायद फिर भी मान जाते अगर वे किसी करोड़पति की बेटी होती. पर सुमन के पिता तो मामूली दुकानदार थे और निर्मल के पिता एक उद्योगपति, जिन के पास दो कारखानों के अलावा आधे दर्जन शोरूम थे. अपने से इतनी नीची सामाजिक स्थिति वाले खानदान की लड़की को अपनी बहू के रूप में वह कभी नहीं स्वीकार करते.

निर्मल को पता था कि अगर वह हिम्मत कर के अपने पिता के सामने सुमन से शादी की बात छेड़ता तो उस के पिता का बदला हुआ स्वरूप क्या होगा. वे कभी नहीं मानते कि वे जाति के आधार पर रिश्ता ठुकरा रहे हैं. पर वह अपने मन की बात छिपा कर कुछ ऐसे बोलते, ‘निर्मल बेटे, मुझे इस शादी से कोई एतराज नहीं है. आखिरकार लड़की तुम्हारी पसंद की है. उस में कई गुण होंगे. पर यह सोचो कि लोग क्या कहेंगे. सुधीर पांडे, करोड़ों का मालिक, शहर का सब से बड़ा उद्योगपति, वह अपने एकमात्र बेटे की शादी एक छोटे से दुकानदार की बेटी से करवा रहा है. जरूर दाल में कुछ काला है. लड़के ने लड़की के साथ कुछ गड़बड़ की होगी और इसी कारण मजबूरन यह शादी करनी पड़ रही है. निर्मल बेटे, तुम लोगों के मुख को बंद नहीं कर सकोगे. इस तरह की दर्जनों अफवाहें फैलेंगी. तुम्हारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी, साथसाथ मेरे भी नाम और इज्जत के चिथड़े हो जाएंगे.’

सोचतेसोचते निर्मल को एक नया खयाल आया. ‘जरा धीरेधीरे चल मिस्टर’ उस के दिमाग ने उसे टोका. ‘तुम इतने आगे कैसे निकल गए? तुम्हें पक्का यकीन है कि सुमन तुम से शादी करना चाहेगी? तुम ने अभी तक उस से पूछा तक नहीं है और तुम चले हो उस के बारे में अपने पिता से बात करने. अगर तुम अपने पिता को किसी तरह मनवा ही लो और फिर सुमन तुम से शादी करने के लिए इनकार करे तो फिर तुम कहां के रहोगे?’ मन ही मन में निर्मल ने निर्णय लिया कि जब वह अगली बार सुमन से मिलेगा तो उस के सामने शादी का प्रस्ताव अवश्य रखेगा.

दो दिनों बाद निर्मल और सुमन फिर मिले. निर्मल डर रहा था कि कहीं सुमन बुरा मान कर उसे डांट न दे. डर के मारे वह हकलाने लगा.

‘‘क्या बात है निर्मल?’’ सुमन ने पूछा. ‘‘तुम ऐसे तो पहले कभी नहीं बात करते थे. लगता है तुम कुछ सोच रहे हो और बोल कुछ और रहे हो. सचसच बताओ तुम कहना क्या चाहते हो.’’

निर्मल ने अपनी पूरी हिम्मत इकट्ठी की और बोल ही दिया ‘‘सुमन मैं तुम से प्यार करता हूं और शादी करना चाहता हूं.’’

सुमन चौंकी पर थोड़ी देर चुप रही. वह कुछ सोच रही थी.

निर्मल को चिंता होने लगी. तब सुमन ने जवाब दिया. ‘‘मैं तुम्हारी पत्नी बनने से इनकार नहीं करूंगी. मुझे इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं है. मैं तुम्हें काफी अच्छी तरह जानती हूं और तुम मुझे भले आदमी लगते हो. पर तुम तो जानते हो कि मैं एक हिंदुस्तानी लड़की हूं. मेरे खयालात इतने आधुनिक नहीं हैं कि मैं अपनी मनमरजी से शादी के लिए हां कर दूं. मुझे अपने मातापिता से बात कर के उन की आज्ञा लेनी होगी.’’

‘‘मैं तुम्हारी बात समझता हूं,’’ निर्मल ने कहा. दोनों के बीच कुछ देर और बात हुई और यह तय हो गया कि दोनों अपनेअपने मातापिता से बात करने के बाद ही मामला आगे बढ़ाएंगे.

निर्मल को यह पता नहीं था कि सुमन को अपने मातापिता को मनाने में कितनी दिक्कत होगी, पर उस को पक्का यकीन था कि उस के अपने सामने जो समस्या थी, उसे सुलझना तकरीबन असंभव था.

निर्मल को एक पूरा दिन लगा एक संभव योजना बनाने में, जिस से शायद सुमन से शादी का रास्ता खुल जाए.

उस दिन शाम को जब वह अपने मातापिता के साथ खाना खाने बैठा तो बातोंबातों में उस ने आकस्मिक स्वर में कहा, ‘‘हमारे यहां एक बहुत सुंदर रूसी लड़की है. उस का नाम मारिया है और वह तैराकी की कोच है. वैसे तो उस की उम्र 35 साल है पर देखने में 20-22 साल की लगती है. मैं उसे बहुत पसंद करता हूं और हम दोनों एकदूसरे से लंबीलंबी बात करते रहते हैं.’’

निर्मल ने देखा कि उस के पिता और उस की माता एकदूसरे से नजर मिला रहे थे. उस ने आगे कुछ और नहीं कहा और अपने खाना खाने में व्यस्त हो गया. उस के मातापिता भी चुप ही रहे. अगले दिन प्रशिक्षण के दौरान निर्मल सुमन से मिला.

‘‘मैं तुम्हारे लिए अच्छी खबर लाई हूं,’’ सुमन ने उस से कहा. ‘‘मैं ने अपने मातापिता से तुम्हारे बारे में बातचीत की. शुरूशुरू में तो वे कुछ हैरान थे और शायद नाखुश भी कि मैं ने अपना वर स्वयं चुन लिया था. काफी बहस के बाद मैं ने उन को यकीन दिला दिया कि मामला कुछ गड़बड़ी का नहीं है और उन को तुम्हारे मातापिता से मिलने को राजी किया. तुम कहां तक पहुंचे हो?’’

‘‘मैं कोशिश कर रहा हूं,’’ निर्मल ने जवाब दिया, ‘‘मुझे थोड़ा और समय चाहिए. पर तुम चिंता मत करो, मुझे पक्का विश्वास है कि मेरे मातापिता तुम्हें बहू के रूप में स्वीकार कर लेंगे.’’

उस दिन शाम को निर्मल ने अपनी योजना के अनुसार अगला कदम उठाया. खाना खाते हुए उस ने कहा, ‘‘आज उस रूसी लड़की मारिया और मेरी काफी लंबीचौड़ी और गहराई में बातचीत हुई. हम अपने भविष्य के बारे में काफी देर तक विवेचन करते रहे. पिताजी, मैं उसे जल्दी ही यहां बुलाना चाहता हूं ताकि वह आप लोगों से मिले.’’

‘‘निर्मल,’’ उस के पिता ने गुस्से भरी आवाज में उसे टोका. ‘‘मैं आशा करता हूं कि तुम इस लड़की से शादी करने की नहीं सोच रहे हो, क्योंकि अगर तुम्हारा ऐसा इरादा है तो मैं इसे कभी मंजूरी नहीं दूंगा. मेरे खानदान का लड़का एक विदेशी लड़की से शादी करे, वह भी जो शायद ईसाई धर्म की है और मेरे लड़के से अधिक उम्र की है. मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगा. लोग मेरा हंसीमजाक उड़ाएंगे. मैं तुम्हें उस लड़की से फिर मिलने से मना करता हूं.’’निर्मल के दिल में खुशी हुई. उसे लग रहा था कि उस की योजना सफलता के रास्ते पर थी. पर उस ने मुख ऐसे बनाया जैसे वह कच्चा करेला खा रहा था. खाने को बीच में छोड़ कर वह खड़ा हो गया. ‘‘मैं और नहीं खाऊंगा,’’ कहते हुए वह अपने कमरे की ओर चला.

‘‘निर्मल बेटे…’’ उस की मां ने करुण स्वर में उसे रोकने की कोशिश की, पर निर्मल ने उन की ओर देखा तक नहीं.

‘‘जाने दो,’’ उस के पिता ने कहा. ‘‘अगर आज रात भूखा रहेगा तो शायद उस के दिमाग में कुछ अक्ल आएगी.’’

निर्मल अपने कमरे में गया और वहां अपनी भूख उन सैंडविच से मिटाई, जिन्हें वह घर आते समय बाजार से खरीद कर लाया था.

अगले दिन सुबह का नाश्ता खाते समय उस ने अपने चेहरे को बुरा सा बना रखा था और बातचीत सिर्फ हां या न तक सीमित रखी. उस के मातापिता भी कुछ खास नहीं बोले. उस रात को वह काफी देर से घर आया.

खाने की टेबल पर बैठते ही उस ने दुखभरी आवाज में कहा, ‘‘मैं ने मारिया को समझ दिया कि हम दोनों भविष्य में फिर कभी न मिल सकेंगे, मेरे मातापिता उसे पसंद नहीं करते हैं. नापसंदी का कारण उस का विदेशी होना है. उस ने मुझ से काफी बहस की, पर अंत में मान गई कि आज से हमारे रास्ते अलग होंगे.  मुझे आशा है कि अपने बेटे का दिल तोड़ कर आप लोग अब संतुष्ट हैं.’’

‘‘शाबाश बेटे,’’ उस के पिता ने कहा. ‘‘मैं जानता था कि तुम एक आज्ञाकारी पुत्र हो.’’

निर्मल की मां ने कुछ नहीं कहा पर उस के चेहरे से लग रहा था कि उन के दिमाग से काफी बोझ उठ गया है.

दो दिनों बाद निर्मल ने अपनी अगली चाल चली. ‘‘पिताजी,’‘ उस ने कहा, ‘‘एक सुमन नाम की लड़की है. वह दौड़ लगाती है और वह प्रदेश के खेलकूद दल की सदस्य है. वह मेरी दोस्त है और कई दफे घर से लाया हुआ नमकीन या मीठा स्नैक मुझे भी खिलाती है. मैं उसे घर पर चाय के लिए बुलाना चाहता हूं.’’

जैसे निर्मल ने सोचा था वैसा ही हुआ. उस के पिता की आंखों में चमक आ गई, ‘‘क्या वह भारतीय नागरिक है?’’ उन्होंने पूछा, ‘‘क्या वह हिंदू है?’’

‘‘हां, वह तो नागरिक और हिंदू दोनों है,’’ निर्मल ने जवाब दिया. ‘‘पर इन बातों और उस की चाय पर आने में क्या रिश्ता है? मैं

समझ नहीं.’’

उस के पिता ने जवाब में दो और सवाल पूछे, ‘‘उस की आयु क्या है और क्या वह शादीशुदा है?’’

‘‘वह मुझ से करीब 2 साल छोटी है और अभी तक कुंआरी है,’’ निर्मल ने अपनी आवाज आश्चर्यजनक बनाने की कोशिश की, ‘‘पर मैं पूछता हूं कि इन सवालों का सुमन का चाय पर आने से क्या लेनादेना है?’’

‘‘तुम सुमन को चाय पर अवश्य बुलाओ,’’ उस के पिता ने कहा, ‘‘और उस को बोलो कि वह अपने साथ अपने मातापिता को भी लाए, ताकि तुम्हारी मां और मुझे भी कोई बातचीत करने  को मिले.’’

यह तो स्पष्ट था कि निर्मल का पिता जल्दी से जल्दी उसे किसी ‘देसी’ लड़की के साथ बांधना चाहता था, इस से पहले कि वह किसी और फिरंगी महिला के जाल में फंसे.

दोनों बुजुर्ग जोडि़यों की मुलाकात बहुत संतोषजनक रही. निर्मल को अपनी मां के बारे में कोई चिंता नहीं थी. वह जानता था कि आमतौर पर महिलाएं एकदूसरे से आसानी से घुलमिल जाती हैं. ऊपर से उस की मां इतने अमीर आदमी की पत्नी होने के बावजूद एक साधारण सी महिला थीं जो सब से दोस्ती रखती थीं. उस की चिंता अपने पिता के बारे में ही थी कि कहीं वे अपने वैभव की ताकत दिखा कर सुमन के पिता को नीचा दिखाने की कोशिश न करें.

निर्मल को चिंता करने की जरूरत नहीं थी. दोनों पिताओं ने जल्दी ही एक पारस्परिक शौक ढूंढ़ा- क्रिकेट. कुछ ही समय बाद दोनों खिलाडि़यों के बारे में और इन के टैस्ट मैचों और सैंचुरियों पर लंबी बातचीत में लीन हो गए थे.

निर्मल और सुमन की शादी जल्दी पक्की हो गई. कुछ ही दिनों बाद दोनों तरफ के घरवालों, रिश्तेदारों से सलाह ले कर, शादी की तारीख 6 हफ्ते बाद की रखी गई.

शादी उतनी धूमधाम से नहीं हुई जितनी निर्मल के पिता चाहते थे, पर उन दिनों प्रदेश में गैस्ट कंट्रोल और्डर (मेहमान नियंत्रण आदेश) लागू था जो बहुत सख्ती से बाध्य किया जा रहा था. इस के अनुसार मेहमानों की संख्या अधिक से अधिक 50 हो सकती थी. खाने के पकवानों पर भी बहुत पाबंदी थी. इस के बावजूद शादी की रस्मों में कोई बाधा नहीं पड़ी.

उस रात सजीधजी सुमन शादी के सजाए हुए बिस्तर पर बैठी निर्मल का इंतजार कर रही थी. कुछ देर बाद कमरे का दरवाजा खुला और निर्मल अंदर आया. ‘‘अब तो मैं तुम्हें ‘हे प्रिय’ कह सकता हूं क्योंकि अब  हम पतिपत्नी हैं,’’ उस ने कहा और जेब से एक छोटी सी  बोतल निकाली.

सुमन कुछ हैरान हुई और उस ने पूछा, ‘‘बोतल में क्या है?’’

‘‘खून,’’ निर्मल ने जवाब दिया.

सुमन चौंक गई, ‘‘खून, किस का खून?’’

‘‘तुम्हारा खून,’’ निर्मल ने कहा.

‘‘मैं कुछ समझ नहीं.’’ सुमन का दिमाग चकरा रहा था.

‘‘मेरी प्यारी सुमन,’’ निर्मल ने समझया. ‘‘मैं ने तुम्हें बता दिया था कि मेरे परिवार वाले सनातन पंथी हैं. उन की सोच पुराने जमाने की है. वे सुहागरात के बाद कल सुबह हमारे पलंग के चादर पर तुम्हारे खून का दाग देखना चाहते हैं. अगर दाग उन्हें नहीं मिले तो वे समझेंगे कि तुम कुंआरी नहीं थीं और तुम्हारी जिंदगी नरक बना देंगे और शायद मुझे मजबूर कर देंगे कि तुम को तलाक दे दूं.’’

‘‘हो… नहीं,’’ सुमन बोल उठी.

‘‘पर तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है,’’ निर्मल ने उसे समझया, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम जैसी खेलकूद में भाग लेने वाली लड़कियों का हाइमन अकसर तनाव के कारण फट जाता है. इस वजह से सुहागरात के यौन संबंध के समय खून नहीं निकलता तो अगर तुम पलंग से उठ जाओ तो मैं चादर पर तुम्हारा कुछ खून गिरा दूं.’’

सुमन से कुछ जवाब देते न बना.

Social Story

Hindi Fictional Story: विश्वास का मोल- क्या चिन्मयानंद को गलती समझ आई

Hindi Fictional Story: जैसे ही बड़े भैया का फोन आया कि फौरन दिल्ली जाना है, आशीष, मेरे भांजे, को किसी ने जहर खिला दिया है और उस की हालत गंभीर है, मेरे तो हाथपैर ठंडे हो गए. बारबार बस यही खयाल आया कि हो न हो चिन्मयानंद ने ही यह कांड किया होगा, नहीं तो सीधेसादे आशीष के पीछे कोई क्यों पड़ेगा? क्यों कोई उसे जहर खिलाएगा?

जब से चिन्मयानंद ने मेरी भांजी  झरना से शादी कर मेरी बहन के घर अपना अड्डा जमाया तभी से मेरा मन किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त था और आखिरकार मेरी आशंका सच साबित हुई.

हम सभी  झरना की शादी इस पाखंडी चिन्मयानंद से होने के खिलाफ थे.  झरना की मां यानी मेरी बड़ी बहन हमारे परिवार तथा परिचितों में ‘दिल्ली वाली’ के नाम से जानी जाती हैं. यह सब उन्हीं की करनी थी. उन्हें शुरू से साधुसंतों पर अटूट विश्वास था. आएदिन उन के घर न जाने कहांकहां के साधुसंतों का जमावड़ा रहता. जब से उन के यहां बद्रीनाथ के बाबा के आशीर्वाद से आशीष और  झरना का जन्म हुआ तब से वे साधुसंन्यासियों पर आंखें मूंद कर विश्वास करने लगी थीं. जब भी उन के घर जाओ, उन के मुंह से किसी न किसी आदर्श साधुसंत के गुणगान सुनने को मिलते.

मु झे उन की इस आदत से बहुत दुख होता और मैं उन्हें इस के लिए खरीखोटी सुनाती. लेकिन मेरा सारा कहनासुनना वे एक तरल मुसकराहट से पी जातीं और बहुत ही धैर्य व तसल्ली से सम झातीं, ‘देख लल्ली, तू ठहरी आजकल की पढ़ीलिखी छोरी. तु झे इन साधुसंतों के चमत्कारों का क्या ज्ञान. तू तो सदा खुशहाल रही है. मेरे जैसे दुखों की तो तु झ पर परछाईं भी नहीं पड़ी है. सो, तु झे इन साधुसंतों की शरण में जाने की क्या जरूरत? देख लल्ली, मैं कभी न चाहूंगी कि जिंदगी में कभी किसी दुख या निराशा की बदली तेरे आंगन में छाए, लेकिन फिर भी मैं तु झ से कहे देती हूं कि कभी किसी तरह के दुख या विपरीत परिस्थितियों से तेरा सामना हो तो सीधे मेरे पास चली आना. इतने गुणी और चमत्कारी साधुमहात्माओं से मेरी पहचान है कि सारे कष्टों की बदली को वे अपने एक इशारे से हटा सकते हैं.

‘दिल्ली वाली कभी बड़े बोल नहीं बोलती लेकिन तू ही बता, साधुसंतों की बदौलत आज मु झे किस बात की कमी है? धनदौलत और औलद, सब से तो मेरा घरआंगन लबालब है.’

दीदी की यह गर्वोक्ति सुन कर मैं ने मन ही मन प्रकृति से यही मांगा कि मेरी बहन की खुशहाली को कभी किसी की नजर न लगे. हमेशा उन के घरचौबारे में खुशहाली रहे.

औलाद के अलावा उन को किसी चीज की कमी नहीं रही थी जिंदगी में. शादी से पहले से दीदी डीलडौल में कुछ ज्यादा ही इक्कीस थीं लेकिन भीमकाय काया के बावजूद अपने अच्छे कर्मों की बदौलत उन की शादी अच्छे मालदार घराने में बहुत ही छरहरे, सुदर्शन युवक से हुई.

जीजाजी दिल के इतने अच्छे कि दीदी के मुंह से कोईर् बात निकलती नहीं कि जीजाजी  झट उसे पूरा कर देते. जिंदगी में उन्हें बस एक कमी थी कि शादी के 15 वर्षों बाद तक उन के आंगन में कोई किलकारी नहीं गूंजी थी. जीजाजी को बच्चे न होने का कोई गम न था.

वे तो हमेशा दीदी से कहते, ‘अरे, अपना कोई बच्चा नहीं है तो अच्छा है न, तू मु झे कितना लाड़ लड़ाती है. अपने बीच बच्चे होते तो वह लाड़ बंट न जाता भला.’ लेकिन दीदी बच्चे के बिना जिंदगी कलपकलप कर गुजारतीं. वे तमाम मंदिरों, गुरुद्वारों, मजारों आदि पर बच्चा होने की मनौतियां मांग आई थीं. दिनभर साधुमहात्माओं के ठिकानों पर पड़ी रहतीं और उन के बताए व्रत, उपवास आदि पूरी निष्ठा से करतीं.

उसी दौरान दिल्ली में बद्रीबाबा नाम के एक साधु की बहुत धूम मची थी. दीदी उन के भक्तिभाव तथा चुंबकीय व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थीं. उन्होंने दीदी को एक अनुष्ठान करने के लिए कहा था. उन के कहे अनुसार लगातार 51 सोमवारों को यज्ञ करते ही दीदी गर्भवती हो गई थीं और नियत वक्त पर उन के यहां चांद सा सुंदर बेटा हुआ. बेटे के जन्म के बाद एक बेटी पाने को दीदी ने स्वामीजी द्वारा बताया अनुष्ठान दोबारा किया और फिर गर्भधारण करने पर नियत वक्त पर उन्होंने बहुत सुंदर कन्या को जन्म दिया. जैसेजैसे समय बीतता गया, साधुमहात्माओं में ‘दिल्ली वाली’ की निष्ठा बढ़ती ही गई.

अब तो पिछले कुछ सालों से उन के घर में बाकायदा चिन्मयानंद नाम के एक स्वामी ने घुसपैठ कर ली थी. वह स्वामी खुद को दिल्ली वाली का पिछले जन्म का बेटा बताता था. दीदी के घर में उसे दीदी और जीजाजी का अत्यधिक लाड़ मिलता. घर में उसे वे सारे अधिकार मिले थे जो उन के बेटे आशीष को थे. आशीष तो यहां तक कहने लगा था कि मां, उस से ज्यादा स्वामी चिन्मयानंद को चाहने लगी हैं. कभीकभी तो चिन्मयानंद को ले कर वह मां से  झगड़ बैठता और मां से चिन्मयानंद का पक्ष लेने की बाबत उन से हफ्तों रूठा रहता.

सरल स्वभाव के जीजाजी वही करते जो दीदी कहतीं. उन्होंने जिंदगी में कभी दीदी का सही या गलत किसी बात का विरोध नहीं किया. दीदी की खुशी में ही उन की खुशी थी. सो, उन्होंने चिन्मयानंद को बेटे की तरह रखा.

चिन्मयानंद भी पूरे अधिकारभाव से परिवार में रहता. उस ने सारे परिवार को अपने सम्मोहक व्यक्तित्व के वश में कर रखा था.

चिन्मयानंद ने घर वालों को बताया था कि उस के असली मांबाप तो काशी में रहते हैं. उस के कई भाईबहन हुए, लेकिन सब बचपन में ही चल बसे. एक वही कुछ ज्यादा दिनों तक जिंदा रहा. सो

10-11 वर्ष का होते ही मातापिता ने उसे उसी साधु के सुपुर्द कर दिया जिस के आशीर्वाद से उस का जन्म हुआ था. वह साधु उसे अपने अन्य शागिर्दों की टोली के साथ हिमालय की तराइयों में ले गया था.

उस का बचपन स्वामीजी के साथ हिमालय की तराइयों में ही बीता. थोड़ा बड़ा होने पर उस ने स्वामीजी से दीक्षा ली थी.

चिन्मयानंद का स्वर बहुत ही मधुर था. स्वामीजी के ठिकाने पर कीर्तन का दायित्व उसी के कंधों पर था. जब भी वह अपने मधुर स्वरों में कोई भजन छेड़ता, कीर्तन में श्रद्धालुओं की संख्या दोगुनी हो जाती.

एक दिन किसी प्रसिद्ध संगीत कंपनी के मालिक ने जब चिन्मयानंद का एक भजन सुना तो उस ने उस की गायन क्षमता से प्रभावित हो कर उस के भजनों के 2-3 कैसेट निकलवा दिए.

इधर यहां आने के कुछ ही दिनों बाद चिन्मयानंद ने इस घर से रिश्ता जोड़ने का पुख्ता इंतजाम कर लिया था. दीदी की एकलौती बेटी  झरना उस पर री झ कर उस के प्रेमपाश में जकड़ गई थी और उस की मंशा उस से विवाह करने की थी.

रूपलावण्य में अति सुंदर  झरना हिंदी साहित्य से एमए पास, खासी मेधावी लड़की थी. लेकिन जहां चिन्मयानंद की बात आती, हमें लगता कि उस के दिमाग के सारे कपाट बंद हो गए हों. मैं जब भी उस से मिलती, उसे सम झाती कि वह क्यों एक अनपढ़जाहिल युवक से शादी कर जिंदगी बरबाद करने पर तुली है. भजनों के 2-3 कैसेटों के अलावा जिंदगी में उस की कोई उपलब्धि नहीं थी. शिक्षा के नाम पर वह कोरा था. उस के कहे अनुसार स्वाध्याय से कुछ धार्मिक पुस्तकों का ज्ञान उस ने जरूर प्राप्त किया था पर उच्चशिक्षा प्राप्त  झरना कैसे एक अनपढ़ के साथ जिंदगी बिताएगी, यह मेरी सम झ के बाहर था.

मैं ने और मेरे भाइयों ने  झरना को हर संभव दलीलें दे कर सम झाने की कोशिशें की थीं कि चिन्मयानंद के साथ शादी कर वह सारी जिंदगी पछताएगी. लेकिन हमारी दलीलों का उस पर कोई असर नहीं होता. वह यही कहती कि चिन्मयानंद मृदुभाषी, सम झदार, सरल स्वभाव का कलाकार युवक है और अगर उस ने उस से शादी नहीं की तो वह किसी और युवक से शादी कर कभी खुश नहीं रह पाएगी.

दीदी अपनी बेटी के इस फैसले से बहुत खुश थीं. वे हम से यही कहतीं कि इतनी पढ़ीलिखी मेरी बेटी आदमी की सही कद्र जानती है. किताबी पढ़ाई से कुछ नहीं होता, बस, आदमी अच्छा होना चाहिए. मेरी  झरना ने न जाने कौन से ऐसे अच्छे कर्म किए होंगे जो उसे इतना गुणी, धर्म में आस्था रखने वाला पति मिला है.

जब हम उन से पूछते कि  झरना से शादी कर चिन्मयानंद बिना किसी नियमित आय के अपनी गृहस्थी कैसे चलाएगा तो उन का जवाब होता कि, ‘उसे कमाने की जरूरत ही क्या है? हमारी इतनी जमीनजायदाद और संपत्ति आशीष और  झरना की ही तो है. हमारा किराया ही इतना आता है कि बच्चों को कमाने की जरूरत ही नहीं. चिन्मयानंद और  झरना तो बस भजन में लगे रहें, उन का घर तो हम चलाते रहेंगे.’

जब मैं ने दीदी से चिन्मयानंद के उन के घर में आ कर रहने की कैफियत जाननी चाही तो उन्होंने बताया था, ‘देख, लल्ली, मैं कितनी खुशहाल हूं कि इस जन्म में तो एक बेटाबेटी पा कर मैं धन्य हुई ही हूं. न जाने किन अच्छे कर्मों से मु झे मेरे पिछले जन्म का बेटा भी मिल गया है.

‘कोई विश्वास नहीं करेगा लल्ली, लेकिन चिन्मयानंद जब पहली बार मेरे दरवाजे पर आया तो उसे देख कर मेरी आंखों से आंसुओं की  झड़ी इस कदर लगी कि क्या बताऊं. खुद उस की आंखों से भी खूब आंसू बहे. न जाने किन अच्छे कर्मों के प्रताप से वर्षों से बिछड़े हम मांबेटे दोबारा मिले. अब तू ही बता, अगर हम दोनों के बीच कोईर् रिश्ता नहीं होता तो क्यों हम दोनों की आंखें यों  झर झर बरसतीं?

‘मु झे देखते ही चिन्मयानंद के मुंह से शब्द निकले थे, ‘मां, तू मेरी पिछले जन्म की मां है. कितने दरवाजों पर ठोकरें खाने के बाद मु झे तुम से मिलने का मौका मिला है. अब इस जन्म में मु झे खुद से कभी दूर मत करना.’ इस लड़के को देखते ही मेरे मन में अथाह लाड़ का सागर हिलोरें मारने लगता है. मैं तो बस इतना जानती हूं कि इस लड़के से मेरा जन्मजन्मांतर का रिश्ता है और इस जन्म में तो कोई मेरा व उस का रिश्ता नहीं तोड़ सकता.’

हम तीनों भाईबहन व हमारे मातापिता दीदी के घर चिन्मयानंद के अड्डा जमाने से बहुत ज्यादा परेशान हो गए थे और हमें डर लगता कि कहीं यह युवक कोई अपराधी न हो जो कभी भी घर के सदस्यों को कोई नुकसान पहुंचा कर फरार हो जाए. हम ने दीदी और जीजाजी को लाख सम झाने की कोशिशें की थीं कि यों किसी अनजान व्यक्ति को घर में आश्रय देना मुनासिब नहीं और वह कभी भी उन्हें किसी तरह का भारी नुकसान पहुंचा सकता है. हो सकता है चिन्मयानंद ने सम्मोहन विद्या का प्रयोग दीदी पर किया हो जिस से वे उस के मोहपाश में जकड़ गईं.

1-2 बार हम अपनी जानपहचान के एक बड़े पुलिस अधिकारी को भी दीदी के घर ले गए जिन्होंने चिन्मयानंद से बातें कीं. लेकिन वे भी उस से पीछा छुड़ाने में हमारी कोई मदद न कर सके. एक दिन हमारे सब से बड़े भाईर्साहब दादा किस्म के कुछ युवकों को ले कर दीदी के घर पहुंचे और उन्होंने चिन्मयानंद को घर से धक्के दे कर बाहर निकाल दिया था. लेकिन यह सब देख कर दीदी ने अपना सिर दीवार से मारमार कर बुरी तरह रोना शुरू कर दिया था, जिसे देख कर मजबूरन बड़े भाईसाहब को उन युवकों के साथ वापस लौटना पड़ा था.

दीदी के इस रवैए की वजह से चिन्मयानंद को उन के घर से किसी भी तरह निकाला नहीं जा सकता था और हम भाईबहन चिंतित होने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते थे. तभी चिन्मयानंद ने एक और गुल खिलाया. हमें सूचना मिली थी कि चिन्मयानंद और  झरना की शादी हो गई है.

दीदी के लगभग सभी रिश्तेदार चिन्मयानंद के खिलाफ थे. इसलिए इस शादी में दीदी ने अपने या जीजाजी के किसी भी संबंधी को यह दलील देते हुए नहीं बुलाया कि चिन्मयानंद को भीड़भाड़ बिलकुल पसंद नहीं है और वह सीधीसादी शादी चाहता है.

हमें तो विवाह की सूचना ही शादी के 2 दिनों बाद मिली. शादी की खबर मिलने पर हम भाईबहन सिर पीट कर रह गए थे. इस युवक का जो मुख्य उद्देश्य था, इस धर्मभीरु परिवार में पुख्ता घुसपैठ करना, सो वह पूरा कर चुका था. अब हम भी चुप बैठ गए थे. पर हम भाईबहन निरंतर इस आशंका से जू झते रहते कि न जाने कब वह घर उस अजनबी युवक के किसी षड्यंत्र का शिकार हो जाए और आखिरकार हमारी आशंका निर्मूल नहीं निकली. उस की वजह से ही आज आशीष की जान खतरे में थी.

हम दिल्ली के लिए घर से निकलने ही वाले थे कि वहां से खबर आई कि आशीष अब नहीं रहा.

आशीष के मरने के बाद अब  झरना अपनी मां की अपार संपत्ति की अकेली वारिस होगी, जरूर चिन्मयानंद ने यही सोच कर आशीष की हत्या का मंसूबा बनाया होगा. हम घर वालों की इच्छा तो यही थी कि दिल्ली पहुंचते ही चिन्मयानंद को आशीष की हत्या के इलजाम में पुलिस के सुपुर्द कर दिया जाए लेकिन हम सोच रहे थे कि क्या  झरना और दिल्ली वाली इस के लिए राजी भी होंगी?

लेकिन दिल्ली पहुंचने पर हमें कुछ दूसरा ही नजारा देखने को मिला. हमारे पहुंचने से पहले ही  झरना ने चिन्मयानंद को आशीष की हत्या के इलजाम में पुलिस के सुपुर्द कर दिया था और वह खुद आगे बढ़ कर पुलिस को बयान दे रही थी. हमें देखते ही वह कहने लगी, ‘‘मौसी, मैं बहुत शर्मिंदा हूं. मैं चिन्मयानंद के प्रेमाकर्षण में अंधी हो गई थी.

‘‘मु झे इस बात का तनिक भी एहसास नहीं था कि पिताजी की दौलत के लालच में चिन्मयानंद इतना अंधा हो जाएगा कि आशीष को रास्ते से हटा देगा. मैं तो उसे बहुत ही धार्मिक, सरल हृदय युवक सम झती थी. अब पाखंडी को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाइए जिस से मेरे भाई की मौत का बदला लिया जा सके.’’

दूसरी ओर एकलौते बेटे की मौत के गम में दीदी तो रोरो कर बेहाल हो गई थीं.

एक दिन मैं दीदी के साथ सो रही थी कि आधी रात को अचानक वे उठ कर बैठ गईं. उन्होंने मु झे  झक झोर कर जगाया और अपना सीना बेचैनी से मलते हुए कहने लगीं, ‘‘लल्ली… लल्ली, मेरे दिल पर बहुत बड़े पाप का बो झ है जिस के चलते मैं कलपकलप कर दिन बिता रही हूं. मेरे दिल का चैन छिन गया है. तेरी दिल्ली वाली वह नहीं जो बाहर से दिखती है. वह गिरी हुई एक औरत है. मैं ने एक गैरमर्द के साथ संबंध बनाए हैं. तेरे जीजाजी नामर्द हैं, सो, मैं बद्रीबाबा की मर्दानगी पर री झ गई थी. जिंदगी में पहली बार मैं किसी पूरे मर्द के संपर्क में आई थी और न जाने क्या हुआ, मैं उस पर अपना सबकुछ लुटा बैठी.

‘‘तेरे जीजाजी की नामर्दी के चलते मैं ने बहुत दिन अपनी देह की आंच में सुलग कर बिताए हैं. बद्रीबाबा की मर्दानगी पर मैं अपना तनमन, सबकुछ लुटा बैठी थी.  झरना और आशीष उसी बद्रीबाबा की संतानें हैं. मैं ने इतने बुरे कर्म किए हैं जिन की सजा विधाता ने मेरे आशीष को मु झ से छीन कर दी है. सच लल्ली, तेरे जीजाजी तो महान पुरुष हैं, सबकुछ जानसम झ कर भी उन्होंने कभी मु झ से एक शब्द तक नहीं कहा. उन्होंने आशीष और  झरना को सगे बाप सा प्यार दिया.

‘‘उसी बद्रीबाबा ने ही चिन्मयानंद की घुसपैठ मेरे घर में कराई और उस ने तेरे जीजाजी को नशे की लत लगा दी है जिस में डूब कर वे व्यापार से अपना ध्यान हटा बैठे हैं. तेरे जीजाजी का सारा व्यापार चिन्मयानंद ने अपने कब्जे में कर लिया था और मैं चिन्मयानंद को अपना मानती रही. उफ, यह मैं ने अपने ही घर में कैसी बरबादी कर डाली,’’ कह कर दीदी फूटफूट कर रो पड़ी थीं.

‘‘दिल्ली वाली, जो होना था सो तो हो चुका. तुम्हारे परिवार वाले तुम्हारे साथ हैं. चिंता मत करो. अब बद्रीबाबा और चिन्मयानंद का खेल खत्म हो चुका. वे अब तुम्हारा और अनिष्ट नहीं कर पाएंगे,’’ मैं ने दीदी को सांत्वना दे कर नींद की 2 गोलियां दी थीं जिस से वे नींद की आगोश में समा गई थीं.

इधर, पुलिस ने बद्रीबाबा के ठिकाने पर छापा मारा था जहां से उस ने नशीले पदार्थों का अपार भंडार जब्त किया था. बद्रीबाबा नशीले पदार्थों का व्यापार करता था. उस के ठिकाने पर करीब 25 साधुओं का गिरोह था. सारे साधु भ्रष्ट थे और उन्हें नशीले पदार्थों की लत थी. निसंतान और अन्य समस्याओं से जकड़ी औरतों व उन के परिवारजनों को अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से अपने चंगुल में फंसाना उन का पेशा था. वे अकसर बेऔलाद औरतों को अपनी वासना का शिकार बनाते थे. पुलिस ने बद्रीबाबा समेत सभी 25 साधुओं को गिरफ्तार कर लिया था.

आशीष के क्रियाकर्म के बाद एक दिन  झरना ने मु झे से कहा था, ‘मौसी, मु झे अपने अस्तित्व से घृणा हो गई है. अभी थोड़े दिनों पहले जब से मां ने मु झे बताया था कि मैं ब्रदीबाबा की संतान हूं, मैं इन साधुओं के प्रति अजीब सा अपनापन महसूस करने लगी थी.

‘‘मैं खुद को उन में से एक मानने लगी थी और जब चिन्मयानंद मेरे संपर्क में आया तो मैं उस की ओर बुरी तरह आकर्षित हो गई थी. लेकिन अब मेरा भ्रमजाल पूरी तरह टूट चुका है. ये साधुसंत निरे अपराधी होते हैं. अब तो मु झे मम्मीपापा को संभालना है. पापा को ठीक करना है. उन की नशे की लत छुड़ानी है जिस से वे एक बार फिर से सामान्य, खुशहाल जिंदगी जी सकें.’’

दीदी के घर पर सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मी लगवा कर और उन्हें भलीभांति यह सम झा कर कि वे दोबारा बद्रीबाबा या चिन्मयानंद के किसी चेले या संगीसाथी से बात तक न करें, हम वापस लौट आए थे. लौटते वक्त बस एक ही विचार मन में बारबार आ रहा था कि धर्मभीरुता और सरल स्वभाव का कितना बड़ा खमियाजा चुकाना पड़ा था दिल्ली वाली को.

Hindi Fictional Story

Drama Story: शगुन का नारियल- क्या थी पंडित जी की कहानी

Drama Story: ‘‘दिमाग फिर गया है इस लड़की का. अंधी हो रही है उम्र के जोश में. बापदादा की मर्यादा भूल गई. इश्क का भूत न उतार दिया सिर से तो मैं भी बाप नहीं इस का,’’ कहते हुए पंडित जुगलकिशोर के मुंह से थूक उछल रहा था. होंठ गुस्से के मारे सूखे पत्ते से कांप रहे थे. ‘‘उम्र का उफान है. हर दौर में आता है. समय के साथसाथ धीमा पड़ जाएगा. शोर करोगे तो गांव जानेगा. अपनी जांघ उघाड़ने में कोई समझदारी नहीं. मैं समझऊंगी महिमा को,’’ पंडिताइन बोली. ‘‘तू ने समझया होता, तो आज यों नाक कटने का दिन न देखना पड़ता. पतंग सी ढीली छोड़ दी लड़की. अरे, प्यार करना ही था, तो कम से कम जातबिरादरी तो देखी होती. चल पड़ी उस के पीछे जिस की परछाईं भी पड़ जाए तो नहाना पड़े. उस घर में देने से तो अच्छा है कि लड़की को शगुन के नारियल के साथ जमीन में गाड़ दूं,’’

पंडित जुगलकिशोर ने इतना कह कर जमीन पर थूक दिया. बाप के गुस्से से घबराई महिमा सहमी कबूतरी सी गुदड़ों में दुबकी बैठी थी. आज अपना ही घर उसे लोहे के जाल सा महसूस हो रहा था, जिस में से सिर्फ सांस लेने के लिए हवा आ सकती है. शगुन के नारियल के साथ जमीन में गाड़ देने की बात सुनते ही महिमा को ‘औनर किलिंग’ के नाम पर कई खबरें याद आने लगीं. उस ने घबरा कर अपनी आंखें बंद कर लीं. 21 साल की उम्र. 5 फुट 7 इंच का निकलता कद. धूप में संवलाया रंग और तेज धार कटार सी मूंछ. पहली बार महिमा ने किशोर को तब देखा था, जब गांव के स्कूल से 12वीं जमात पास कर वह अपना टीसी लेने आया था. महिमा भी वहां खड़ी अपनी 10वीं जमात की मार्कशीट ले रही थी. आंखें मिलीं और दोनों मुसकरा दिए थे. किशोर झेंप गया, महिमा शरमा गई. तब वह कहां जातपांत के फर्क को समझती थी. धीरेधीरे बातचीत मुलाकातों में बदलने लगी और आंखों के इशारे शब्दों में ढलने लगे. महक की तरह इश्क भी फिजाओं में घुलने लगा और जबानजबान चर्चा होने लगी. इस से पहले कि चिनगारी शोला बन कर घर जलाती, किशोर आगे की पढ़ाई के लिए शहर चला गया, इसलिए उन की मुलाकातें कम हो गईं.

इधर महिमा ने 12वीं जमात पास करने के बाद कालेज जाने की जिद की. उधर, किशोर की कालेज की पढ़ाई पूरी होने वाली थी. महिमा होस्टल में रह कर कालेज की पढ़ाई करने लगी और किशोर ग्रेजुएट होने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया. सही खादपानी मिलते ही दम तोड़ती प्यार की दूब फिर से हरी हो गई. मुलाकातें परवान चढ़ने लगीं. एक दिन गांव के किसी भले आदमी ने दोनों को साथसाथ देख लिया. बस, फिर क्या था तिल का ताड़ बनते कहां देर लगती है. नमकमिर्च लगी खिचड़ी पंडित जुगलकिशोर के घर तक पहुंचने की ही देर थी कि पंडितजी राशनपानी ले कर किशोर के बाप मदना के दरवाजे पर जा धमके. ‘‘सरकार ने ऊपर चढ़ने की सीढ़ी क्या दे दी, अपनी औकात ही भूल बैठे. आसमान में बसोगे क्या? अरे, चार अक्षर पढ़ने से जाति नहीं बदल जाती.

नींव के पत्थर कंगूरे में नहीं लगा करते,’’ और भी न जाने क्याक्या वे मदना को सुनाते, अगर बड़ा बेटा महेश उन्हें जबरदस्ती घसीट कर न ले जाता. ‘‘कमाल करते हो बापू. अरे, यह समय उबलने का नहीं है. जरा सोचो, अगर जातिसूचक गालियां निकालने के केस में अंदर करवा दिया, तो बिना गवाह ही जेल जाओगे. जमानत भी नहीं मिलेगी,’’ महेश ने अपने पिता को समझया. पंडित जुगलकिशोर को भी अपनी जल्दबाजी पर पछतावा तो हुआ, लेकिन गुस्सा अभी भी जस का तस बना हुआ था. ‘‘पंचायत बुला कर गांव बदर न करवा दिया तो नाम नहीं,’’ पंडितजी ने बेटे की आड़ में मदना को सुनाया. पंडित जुगलकिशोर का गांव में बड़ा रुतबा था. मंदिर के पुजारी जो ठहरे. हालांकि अब पुरोहिताई में वह पहले वाली सी बात नहीं रही थी. बस, किसी तरह से दालरोटी चल जाती है, लेकिन कहते हैं न कि शेर भूखा मर जाएगा, लेकिन घास नहीं खाएगा. वही तेवर पंडितजी के भी हैं. चाहे आटे का कनस्तर रोज पैंदा दिखाता हो, लेकिन मजाल है, जो चंदन के टीके में कभी कोई कमी रह जाए.

वह तो पंडिताइन के मायके वाले जरा ठीकठाक कमानेखाने और दानदहेज में भरोसा करने वाले हैं, इसलिए समाज में पंडित जुगलकिशोर की पंडिताई की साख बची हुई है, वरना कभी की पोल चौड़े आ जाती. महिमा की पढ़ाईलिखाई का खर्चा भी उस के मामा यानी पंडिताइन के भाई सालग्राम ही उठा रहे हैं. कुम्हार का कुम्हारी पर जोर न चले, तो गधे के कान उमेठता है. पंडित जुगलकिशोर ने भी महेश को भेज कर महिमा को शहर से बुलवा कर घर में नजरबंद कर दिया. पति का बिगड़ा मिजाज देख कर पंडिताइन ने अपने भाई को तुरंत आने को कह दिया. 50 साल का सालग्राम कसबे में क्लर्की करता था. सरकारी नौकरी में रहने के चलते राजकाज के तौरतरीके और सरकार की पहुंच समझता था. वह जानता था कि भले ही सरकारी काम सरकसरक कर होते हैं, लेकिन यह सरकार अगर गौर करने लगे तो फिर ऐक्शन लेने में मिनट लगाती है.

गांव से पहले घर में पंचायत बैठी. मामा को देख महिमा के जी को शांति मिली. प्यार मिले न मिले, किस्मत की बात… जान की सलामती तो रहेगी. एक तरफ पंडित जुगलकिशोर थे, तो वहीं दूसरी तरफ पूरा परिवार, लेकिन अकेले पंडितजी सब पर भारी पड़ रहे थे. रहरह कर दबी हुई स्प्रिंग से उछल रहे थे. ‘‘चौराहे पर बैठा समझ लिया क्या ससुरों ने? अरे, शासन की सीढि़यां चढ़ लीं तो क्या गढ़ जीत लिया? चले हैं हम से रिश्ता जोड़ने… दो निवाले दोनों बखत मिलने क्या लगे तो औकात भूल गए…’’ पंडितजी ने अपने साले को सुनाया. ‘‘समय को समझने की कोशिश करो जीजाजी. अब रजवाड़ों का समय नहीं है. यह लोकतंत्र है. यहां भेड़बकरी एक घाट पर पानी पीते हैं,’’ सालग्राम ने पंडित जुगलकिशोर को समझया. ‘‘मामा सही कह रहे हैं बापू. जातपांत आजकल पिछड़ी सोच वाली बात हो गई.

आप कभी गांव से बाहर गए नहीं न इसलिए आप को अटपटा लग रहा है. शहरों में आजकल दो ही जात होती हैं, अमीर और गरीब,’’ मामा की शह पा कर महेश के मुंह से भी बोल फूटे. पंडितजी ने उसे खा जाने वाली नजरों से घूरा. महेश सिर नीचा कर के खड़ा हो गया. ‘‘इस बच्चे को क्या आंखें दिखाते हो. सब सही ही तो कह रहे हैं. आप तो रामायण पढ़े हो न… भगवान राम ने केवट और शबरी को कैसा मान दिया था, याद नहीं…?’’ पंडिताइन बातचीत के बीच में कूदीं. ‘‘हां, रामायण पढ़ी है. माना कि समाज में सब का अपना महत्व है, लेकिन पैर की जूती को सिर पर पगड़ी की जगह नहीं पहना जाता,’’ पंडितजी ने पत्नी को घुड़क दिया. ‘‘चलो छोड़ो इस बहस को. बाहर चल कर चाय पी कर आते हैं,’’ सालग्राम ने एक बार के लिए घर की पंचायत बरखास्त कर दी. महिमा की उम्मीदों की कडि़यां जुड़तीजुड़ती बिखर गईं. ‘‘जीजाजी, मैं मानता हूं कि जो संस्कार हमें घुट्टी में पिलाए गए हैं,

उन के खिलाफ जाना आसान नहीं है, लेकिन मैं तो सरकारी नौकर हूं और मेरे अफसर यही लोग हैं. हमें तो इन के बुलावे पर जाना भी पड़ता है और इन का परोसा खाना भी पड़ता है. इन्हें भी अपने यहां न्योतना पड़ता है और इन के जूठे कपगिलास भी उठवाने पड़ते हैं. ‘‘अब इस बात को ले कर आप मुझे जात बाहर करो तो बेशक करो,’’ सालग्राम के हरेक शब्द के साथ पंडित जुगलकिशोर की आंखें हैरानी से फैलती जा रही थीं. ‘‘आप छोरी की पढ़ाईलिखाई मत छुड़वाओ. उसे पढ़ने दो. हो सकता है कि वह खुद ही आप के कहे मुताबिक चलने लगे या फिर समय का इंतजार करो. ज्यादा जोरजबरदस्ती से तो गाय भी खूंटा तोड़ कर भाग जाती है,’’ सालग्राम ने कहा. वे दोनों गांव के बीचोंबीच बनी चाय की थड़ी पर आ कर बैठ गए. लड़का 2 कप चाय रख गया. तभी शोर ने उन का ध्यान खींचा. देखा तो पुलिस की गाड़ी सरपंचजी के घर के सामने आ कर रुकी थी.

2 सिपाही उतर कर हवेली में गए और वापसी में सरपंचजी हाथ जोड़े उन के साथ आते दिखे. ‘‘देखें, क्या मामला है…’’ सालग्राम ने कहा और दोनों जीजासाला तमाशबीन भीड़ का हिस्सा बन गए. सालग्राम ने पुलिस अफसर की वरदी पर लगी नाम की पट्टी को देखा और जीजा को कुहनी से ठेला मार कर उन का ध्यान उधर दिलाया. नाम पढ़ कर पंडितजी सोच में पड़ गए. ‘‘इन का यह रुतबा है. सरपंच भी हाथ जोड़े खड़ा है,’’ सालग्राम ने कहा, तो पंडित जुगलकिशोर समझने की कोशिश कर रहे थे. तभी हवेली के भीतर से चायपानी आया और सरपंचजी मनुहार करकर के अफसर को खिलानेपिलाने लगे. ‘रामराम… धर्म भ्रष्ट हो गया…’ पंडितजी कहना चाह कर भी नहीं कह सके. वे साले के साथ चुपचाप वापस लौट आए. रात को घर की पंचायत में फैसला हुआ कि महिमा की पढ़ाई जारी रखी जाएगी. उसे ऊंचनीच समझ कर मामा के साथ वापस शहर भेज दिया गया. जब पंडित जुगलकिशोर के घर से इस चर्चा पर विराम लग गया, तो फिर किसी और की हिम्मत भी नहीं हुई बात का बतंगड़ बनाने की.

साल बीततेबीतते महिमा ग्रेजुएट हो गई और अब शहर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गई. महेश ने भी शहर के कालेज में भरती ले ली थी. इस बीच न तो महिमा की जबान पर कभी किशोर का नाम आया और न ही बेटे ने कोई चोट देती खबर दी तो पंडितजी ने राहत की सांस ली. उन्हें लगा मानो यह दूध का उफान था,जो अब रूक गया है. लड़की अपना भलाबुरा समझ गई है. ‘‘जीजाजी, सुना आप ने… प्रशासनिक सेवाओं का नतीजा आ गया है. आप के गांव के किशोर का चयन हुआ है,’’ सालग्राम ने घर में घुसते ही कहा. यह सुनते ही पंडिताइन खिल गईं. पंडितजी के माथे पर बल पड़ गए. ‘‘हुआ होगा.. हमें क्या? बहुत से लोगों के हुए हैं,’’ पंडित जुगलकिशोर ने लापरवाही से कहा. ‘‘बावली बातें मत करो जीजाजी. समय को समझ. जून सुधर जाएगी कुनबे की. अरे, छोरी तो राज करेगी ही, आगे की पीढि़यां भी तर जाएंगी. बच्चों के साथ तो बाप का नाम ही जुड़ेगा न,’’ सालग्राम ने जीजा को समझया. ‘‘मामा सही कह रहे हैं बापू. जिस की लाठी हो भैंस उस की ही हुआ करे. राज में भागीदारी न हो तो जात का लट्ठ बगल में दबाए घूमते रहना. कोई घास न डालने का,’’ महेश भी मामा के समर्थन में उतर आया था.

‘‘अरे, ये तो छोराछोरी के भले संस्कार हैं जो इज्जत ढकी हुई है, वरना शहर में कोर्टकचहरी कर लेते तो क्या कर लेता कोई? कानून भी उन्हीं का साथ देता,’’ पंडिताइन कहां पीछे रहने वाली थीं. ‘‘लगता है, पूरा कुनबा ही ज्ञानी हो गया, एक मैं ही बोड़म बचा,’’ पंडितजी से कुछ बोलते नहीं बना, तो उन्होंने सब को झिड़क दिया, लेकिन इस झिड़क में उन की झेंप और कुछकुछ सहमति भी झलक रही थी. मामला पक्ष में जाते देख पंडिताइन झट भीतर से नारियल निकाल कर लाईं और जबरदस्ती पति के हाथ में थमा दिया. ‘‘छोरा गांव आया हुआ है, आज ही रोक लो, वरना गुड़ की खुली भेली पर मक्खियां आते कितनी देर लगती है,’’ पंडिताइन ने सफेद कुरताधोती भी ला कर पलंग पर रख दिए. पंडितजी कभी अपने कपड़ों को तो कभी सामने रखे मोली बंधे शगुन के नारियल को देख रहे थे. उन्होंने कुरता पहन कर धोती की लांग संवारी और नारियल को लाल गमछे में लपेट कर मदना के घर चल दिए बधाई देने.

Drama Story

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