Pyaar Ki Kahani: रात को खाना खा कर टहल रही थी. तभी पार्किंग एरिया से मुझे कुछ किशोर बच्चों के हंसने, फुसफुसाने और खिलखिलाने की आवाजें सुनाई दीं.
पलट कर देखा तो एक किशोर वय का लड़का और 2 किशोरियां आपस में सटे हुए बैठे थे और एकदूसरे से इतना खुश हो कर बातें कर रहे थे कि उन्हें अपने आसपास का कोई भान तक नहीं था. उन्हें देख कर मेरे अधरों पर भी एक प्यारी सी मुसकान तैर गई. किशोर वय के प्यार को सिर्फ वही समझ सकता है जिस ने किशोरावस्था में किसी से प्यार किया हो, निस्स्वार्थ प्यार के उन लमहों के एहसास को महसूस किया हो. खैर, उन बच्चों की तरफ ज्यादा ध्यान न देते हुए मैं मुसकराते हुए यों ही आगे बढ़ गई. इस उम्र का प्यार तो इस तरह छिपछिप कर ही किया जाता है क्योंकि घर वाले अगर देख लें तो मानो कयामत ही आ जाए.
‘‘पढ़ाई में ध्यान लगाओ, आजकल बहुत उड़ने लगे हो, अभी जीवन बनाने की उम्र है और तुम हो कि मौजमस्ती में लगे हो,’’ जैसे लैक्चर से मानो जिंदगी की सारी रूमानियत ही खत्म कर देंगे. अपने 4 राउंड लगा कर मैं ऊपर आ गई और टीवी खोल कर बैठ गई. सामने भले ही मेरा पसंदीदा शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ चल रहा था पर मेरे कानों में अभी भी उन बच्चों की खुशी की खनक ही गूंज रही थी. मैं भी तो कितनी खुश थी जब ऋषि से पहली बार मिली थी. ऋषि मेरी ही सोसाइटी के एबी ब्लौक में रहता था और मैं आई ब्लौक में. मेरे पापा बैंक में थे और उस के पापा कोई सरकारी अधिकारी थे.
हम लोग हाल ही में भोपाल की पौश कालोनी मानी जाने वाली विराशा हाइट्स सोसाइटी में शिफ्ट हुए थे. दिल्ली पब्लिक स्कूल में मेरा वह पहला दिन था जब मैं छुट्टी के समय स्कूल बस से उतरी तो वह भी मेरे साथ ही उतरा था. उसे देख कर जितना मैं चौंकी थी उस से कहीं ज्यादा वह चौंक गया था क्योंकि क्लास में आज सुबह ही हम दोनों ने पहली बार ही एकदूसरे को देखा था. ‘‘ओह तो तुम यहां रहती हो. कौन से ब्लौक में? नए आए हो क्या?’’ आश्चर्यमिश्रित विस्फारित नेत्रों के साथ इतने सारे प्रश्न उसने दाग दिए थे. ‘‘हां लास्ट वीक ही मेरे पापा बढ़ोदरा से ट्रांसफर हो कर आए हैं. आई एम इन आई ब्लौक ऐंड यू?’’ मैं ने भी हौले से कुछ शरमातेसकुचाते हुए उस से पूछा. ‘‘वैल… मतलब वी आर क्लासमेट ऐंड सोसाइटीमेट. आई एम इन एबी ब्लौक,’’ हंसते हुए उस ने कहा और उस के बाद तो हमारी दोस्ती इतनी बढ़ गई कि एक दिन भी मेरी उस से बात न हो तो मैं बेचैन हो उठती. स्कूल जाने से हमेशा कतराने वाली मैं अब एक दिन भी स्कूल मिस नहीं करना चाहती थी.
मेरी इस रैग्युलैरिटी को देख कर मम्मी ही नहीं पापा भी हैरान थे. अकसर हम दोनों स्कूल में एक पेड़ की छांव में इस तरह बैठते कि हमें कोई देख न पाए. कई बार तो हमारे पीरियड्स भी मिस हो जाते. स्कूल से आने के बाद भी मोबाइल पर हम घंटों टैक्स्टिंग करते रहते. एक दिन स्कूल में रिसैस के समय उस ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘कल शाम को क्यों नहीं आई नीचे? मैं ने पार्किंग में कितना तेरा इंतजार किया था. और तो और मैसेज का जवाब भी नहीं दे रही थी तू, ऐसी कहां बिजी थी? पता है कल मेरा बिलकुल मन नहीं लगा पढ़ने में.
अब देख लेना यदि मेरे नंबर टैस्ट में कम आए तो उस की जिम्मेदार तू होगी.’’ ‘‘अरे वाह पढ़ेगा तू नहीं और नंबर मेरे कारण कम आएंगे,’’ मैं ने भी इठलाते हुए कहा, ‘‘कल थोड़ी प्रौब्लम थी कुछ गैस्ट आ गए थे पर आज शाम को 8 बजे पार्किंग में आती हूं,’’ कह कर हम दोनों क्लास में आ गए. उन दिनों मैं हरदम अपनेआप को सुंदर दिखाने की कोशिश करती. हमेशा खुद के प्रति लापरवाह रहने वाली मैं अब अपने ऊपर कुछ ज्यादा ध्यान देने लगी थी. घंटों मिरर के सामने खड़ी रहती.
मेरे इस तरह के व्यवहार को देख कर अकसर मम्मी टोकती थीं, ‘‘यह क्या दिनभर शीशे के सामने खड़ी हो कर दुनियाभर की क्रीम पोतती रहती हो.’’ ‘‘अरे मम्मी आप नहीं समझगी,’’ कह कर मैं मम्मी को चुप करा दिया करती थी. हां इस सब के बीच भी मेरे नंबर हमेशा अच्छे आते थे इसलिए मम्मीपापा ज्यादा रोकाटोकी नहीं करते थे. गरमियों की छुट्टियां हो गई थीं और अब हमारे वारेन्यारे थे. हालांकि हम दोनों ही जेईई की तैयारी कर रहे थे पर मस्ती और प्यार भी बराबर था.
हम दोनों ही एकदूसरे को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते रहते थे. जेईई का जब रिजल्ट आया तो उसे कानपुर आईआईटी मिला और मैं ने दिल्ली के जेपी कालेज में एडमिशन लिया था. इस के बाद हम दोनों ही अपनीअपनी जिंदगी में इस कदर उलझ गए थे कि कभीकभार ही मिल पाए. किशोरावस्था का प्यार यों भी कोई स्थाई तो होता नहीं महज उम्र का आकर्षण था सो न जाने कहां गुम हो गया था पर हां यह अवश्य कहूंगी कि वह मेरा पहला प्यार, मेरा पहला क्रश था जिसे मैं ने दिल से चाहा था.
सोचतेसोचते मुझे पिछले हफ्ते की वह फोन काल याद आ गई जिसे उठाते ही मेरे गाल सुर्ख हो गए, मुंह के शब्द मुंह में ही अटक गए और दिमाग एकदम इतना सुन्न हो गया था कि मैं कुछ क्षणों तक नि:शब्द हो गई, जब सामने वाले ने फिर से अपने शब्द दोहराए तो मेरी चेतना लौटी, ‘‘हैलो कैन आई स्पीक टु नैना?’’ ‘‘हैलो आई एम स्पीकिंग, हू आर यू, ऐंड टू हूम यू वांट टू स्पीक?’’ ‘‘अरे नैना मैं ऋषि, ऋषि तुम्हारा सोसाइटीमेट, क्लास मेट भूल गईं क्या?’’ ‘‘ओह ऋषि अरे तुम कहां से बोल रहे हो? इतने सालों बाद तुम्हारी आवाज सुनना एकदम अनऐक्सपैक्टेड था सो समझ ही नहीं पाई.’’ ‘‘मेरी यहीं दिल्ली में पोस्टिंग हो गई है. तुम्हारा नंबर सेव था सो लगा कर देखा तो लग गया. बताओ कब मिल रही हो? मैं मिलना चाहता हूं.
ढेर सारी बातें करनी हैं तुझ से.’’ ‘‘इस वीकैंड तो मैं भोपाल जा रही हूं नैक्स्ट वीकैंड पर मिलते हैं.’’ ‘‘ओके डन. आई विल काल यू नैक्स्ट मंडे,’’ कह कर ऋषि ने फोन रख दिया. औफिस का काम खत्म कर के मैं ने मयूर विहार से मैट्रो पकड़ी और अपनी सीट पर आ कर बैठ गई. ऋषि इसी शहर में है, कितना बदल गया होगा, कैसी होगी उस की फैमिली. यही सोचतेसोचते मेरा लक्ष्मी नगर स्टेशन भी आ गया. घर आ कर मैं ने एक अच्छी अदरक वाली चाय बनाई और 2 ब्रैडस्लाइस ले कर बालकनी में आ कर बैठ गई.
मुझे ऋषि से अपनी कालोनी की अंतिम मुलाकात याद आ गई. हम ने तो विराशा हाइट्स में परमानैंट घर खरीद लिया था पर ऋषि एक किराएदार था. चूंकि वे लोग लखनऊ के रहने वाले थे इसलिए जब उस का एडमिशन कानपुर हुआ था तभी उस के पापा ने भी अपना ट्रांसफर कानपुर करवा लिया था. जिस दिन उस का सामान ट्रक में लोड हो रहा था तब उस ने मुझे टैक्स्ट किया, ‘‘मैं एक घंटे में जा रहा हूं तू मिलने नहीं आएगी?’’ सच कहूं तो मुझे खुद बहुत बुरा लग रहा था. जैसे ही उस का मैसेज देखा मैं ने मम्मी से एक फ्रैंड से मिलने का बहाना किया और जा पहुंची पार्किंग में जहां वह पहले से मेरा इंतजार कर रहा था. मुझे देखते ही उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘तू भूल तो नहीं जाएगी न? मुझे तेरी बहुत याद आएगी.’’ मैं कुछ बोल नहीं पाई क्योंकि अगर बोलती तो रुलाई फूट जाती सो बस न की मुद्रा में सिर हिला दिया था.
उस के बाद मेरे हाथों को हौले से दबा कर वह चुपचाप चला गया था. आज उस की आवाज सुन कर फिर से वही पवित्र और मासूम प्यार को महसूस कर मैं रोमांचित हो उठी थी. हालांकि जाने के बाद 1-2 बार ही उस का काल आया था फिर मैं भी अपनी जिंदगी की पेचीदगियों में इस कदर उलझ कि ऋषि को तो मानो भूल ही गई थी. कालेज होतेहोते मेरा प्लेसमैंट एक सौफ्टवेयर कंपनी में हो गया था भले ही पैकेज तो बहुत अच्छा नहीं था परंतु जौब लग गई इस से मैं बहुत खुश थी. चूंकि मेरे भाई की शादी पहले ही हो चुकी थी इसलिए मातापिता ने अब मेरे ऊपर शादी के लिए प्रैशर बनाना प्रारंभ कर दिया था.
मेरी एक भाभी ने शादी डौट कौम से आरुष का रिश्ता पापा को बताया जो पापा को बहुत पसंद आ गया. आरुष पुणे में एक सौफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर था. अपने मातापिता की इकलौती संतान आरुष देखने में बहुत खूबसूरत और लंबी कदकाठी का था. आरुष मूलत: अहमदाबाद का रहने वाला था. उस के पापा की अपनी गारमैंट फैक्टरी थी. फोन से आवश्यक बातचीत के बाद पापा आरुष के घर अहमदाबाद भी हो कर आए थे. कुल मिला कर पापा को आरुष और उस का परिवार जंच गया था.
शुभ मुहूर्त में हम दोनों की गोदभराई की रस्म कर दी गई थी ताकि दोनों ही पक्ष रिश्ता पक्का समझें. शादी का मुहूर्त 3 माह बाद 11 दिसंबर का निकला था. हम दोनों भी अकसर फोन पर बातचीत करते रहते थे. शादी के लिए भोपाल का पलाश होटल बुक कर लिया गया था. शादी की तैयारियां अपने जोरों पर चल रही थीं कि एक दिन पापा अपने औफिस के काम से पुणे गए थे.
पापा बहुत खुश थे कि वे अपने दामाद आरुष से मिल कर आएंगे पर जब पापा वापस आए तो आते ही सब से पहले उन्होंने पलाश होटल में फोन लगाया और बुकिंग कैंसल कर दी. जब मम्मी ने इस बावत उन से बात की तो वे क्रोध और आवेश से बोले, ‘‘सुधी, हमारी बेटी बच गई. अगर यह शादी हो जाती तो हमारी बेटी की जिंदगी बरबाद हो जाती.’’ ‘‘हुआ क्या है कुछ बोलोगे भी या यों ही पहेलियां बुझते रहोगे?’’ मम्मी ने रोंआसे स्वर में कहा. ‘‘चूंकि मेरी कल रात की ट्रेन थी, शनिवार था और आरुष घर पर होगा इसलिए मैं ने बाजार से कुछ गिफ्ट वगैरह खरीदे और आरुष के फ्लैट पर लगभग सुबह 10 बजे पहुंचा. बड़ी मुश्किल से 15 मिनट के बाद तो दरवाजा खुला.
फिर जब मैं अंदर पहुंचा तो वहां का नजारा देख कर घबरा गया क्योंकि पूरे फ्लैट में जगहजगह शराब की बोतलें, जूठी प्लेटें और गिलास बिखरे पड़े थे और आरुष खुद बदहवास सा नजरें चुराता हुआ खड़ा था. मुझे अचानक अपने सामने देखने की तो उसे दूरदूर तक कोई उम्मीद नहीं थी. मेरी क्रोध से भरी नजरें देख कर वह घबरा गया और लगभग मिमियाते हुए बोला कि अंकल वह कल एक दोस्त का बर्थडे था इसलिए… उस घर और उस की दशा देख कर उस से बात करने का भी मन नहीं हुआ और मैं उलटे कदमों से वापस आ गया. उसी क्षण मैं ने तय कर लिया कि अब यह रिश्ता नहीं होगा.’’ ‘‘पर अब तो शादी में सिर्फ 1 महीना ही बचा है? अगले महीने आज ही के दिन तो शादी है. समाज में बदनामी होगी सो अलग. सारी तैयारियों में पैसा लग चुका है. उफ, यह क्या हो गया,’’ कह कर मम्मी ने रोना शुरू कर दिया.
फिर पापा ने मम्मी के कंधों पर अपने मजबूत हाथ रखें और बोले, ‘‘कौन से समाज की बात कर रही हो मैं अपनी बेटी की चिंता करूंगा कि समाज की? जो लड़का आज अपने दोस्त के बर्थडे पर शराब पी कर जश्न मना रहा है वह अपनी जिंदगी के खास अवसरों पर क्या करेगा और जिसे आज पीने की आदत है वह कल नहीं पीएगा इस बात की क्या गारंटी है? मैं अपनी बेटी की जिंदगी के साथ कोई खिलवाड़ नहीं कर सकता,’’ कह कर पापा ने मम्मी को चुप करा दिया.
इस के बाद आरुष और उस के मम्मीपापा ने लाख दुहाई दी कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा पर पापा नहीं पिघले और इस तरह मेरी जिंदगी से उस समय शादी का चैप्टर एक तरह से क्लोज हो गया था. अब इस घटना को 3 साल हो गए थे और मेरी उम्र भी 30 साल हो चुकी थी. उस घटना के बाद तो मुझे शादी शब्द से ही डर लगने लगा था. पुरानी बातें सोचतेसोचते मैं समय तो लगभग भूल ही गई. मोबाइल में टाइम देखा तो 9 बज चुके थे. जल्दी से दलिया बना कर खाया और जरूरी काम निबटा कर मैं बिस्तर पर आ कर लेट गई. कल सुबह शताब्दी ऐक्सप्रैस से भोपाल जाना था सो पैकिंग भी कर के रख दी.
चूंकि भैया विवाह के बाद यूएस में सैटल हो गया था इसलिए मम्मीपापा की जिम्मेदारी मैं ने अपने सिर पर ले रखी थी. यों तो दोनों स्वस्थ थे, अकेले रह भी लेते थे पर मेरी शादी की चिंता उन्हें चैन से सोने नहीं देती थी. अकसर इस बात पर हमारी बहस हो जाती थी. इस बार जैसे ही सोसाइटी में मेरी टैक्सी ने प्रवेश किया तो मुझे ऋषि की याद आ गई. इसी गेट पर मेरी और उस की पहली मुलाकात हुई थी.
2 दिन घर पर रुक कर जब मैं वापस दिल्ली आई तो इस बार कुछ नया जोश था क्योंकि मैं अपने बचपन के दोस्त ऋषि से मिलने वाली थी. सोमवार की सुबह जैसे ही मैं अपने कैबिन में आ कर लैपटौप को खोलने लगी कि तभी ऋषि की काल आ गई, ‘‘तो आज शाम का प्रोग्राम पक्का. बताओ कितने बजे मिलोगी?’’ ‘‘औफिस के बाद शाम 7 बजे, यहीं मेरे औफिस के पास ही इंडियन कौफी हाउस है.
मैं लोकेशन भेजती हूं.’’ शाम को 7 बजतेबजते ऋषि मेरे कैबिन के बाहर आ कर ही खड़ा हो गया. उसे देख कर मैं चौंक गई, वही कदकाठी, बस शरीर थोड़ा सा भर गया था और आंखों पर चश्मा चढ़ गया था. सच कहूं तो पहले से ज्यादा स्मार्ट लग रहा था मुझे. बाहर आ कर जैसे ही इंडियन कौफी हाउस में आ कर बैठी तो अचानक से वह बोला, ‘‘इतने सालों में तुम बिलकुल नहीं बदलीं. खातीपीती नहीं हो क्या? देखो कैसी कांटे जैसी हो रखी हो या करीना कपूर वाला जीरो फिगर मैंटेंन किया हुआ है.’’ ‘‘अरे नहीं बाबा कोई जीरो फिगर नहीं बनाया है. मैं तो शुरू से ही ऐसी हूं.
तुम बताओ क्या हाल हैं? परिवार में सब कैसे हैं? तुम तो आस्ट्रेलिया चले गए थे न? फिर यहां कैसे आ गए?’’ मैं ने पूछा. तब वह एक लंबी सांस ले कर बोला, ‘‘हां तुम बिलकुल सही कह रही हो मेरा तो प्लेसमैंट ही आस्ट्रेलिया की एक कंपनी में अच्छे पैकेज पर हुआ था. मैं ने 4 साल वहां जौब भी की पर यहां मांपापा बिलकुल अकेले थे. पापा बीमार रहने लगे थे. मम्मी अकेली परेशान हो रही थीं तो अभी कुछ समय पहले मैं ने यहां इंडिया में जौइन कर लिया. पहले कुछ समय बैंगलुरु रहा फिर 6 महीने पहले दिल्ली में एक नई कंपनी जौइन कर ली है. बैंगलुरु से लखनऊ बहुत दूर पड़ता था.
अब दिल्ली से ठीक रहता है लगभग 15 दिन में एक बार मैं लखनऊ चला जाता हूं. इस से मम्मीपापा को काफी मौरल सपोर्ट रहती है.’’ ‘‘और तूने शादी नहीं की क्या?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा. ‘‘अरे छोड़ न इस सब को क्या करेगी जान कर. तू अपने परिवार के बारे में बता?’’ ‘‘क्या बताऊं तेरी ही तरह मेरे मम्मीपापा भी अकेले हैं. भैया यूएस में सैटल हो गया है. तेरी ही तरह लगभग 15 दिनों में एक बार मैं भी भोपाल का चक्कर लगाती हूं. शादी होतेहोते रह गई पर अच्छा ही हुआ जो नहीं हुई वरना आज पता नहीं तेरे सामने मैं होती भी या नहीं,’’ कहते हुए मैं ने उसे सारी कहानी कह सुनाई.
मेरी पूरी बात सुन कर वह बोला, ‘‘नैना, शराब एक ऐसा नशा है जो यदि एक बार लग जाए तो कब आप को अपनी गिरफ्त में ले लेगा आप को खुद पता नहीं चलता. मैं अंकल की तारीफ करूंगा जो उन्होंने अपनी बेटी के फेवर में इतना बड़ा स्टैप उठाया. आजकल का समय इतना खराब है कि भले ही आप ने किसी भी तरह से शादी तय की हो परंतु इस तरह की औचक विजिट करनी ही चाहिए ताकि सचाई पता चल सके.’’ ‘‘तू बता तूने क्यों नहीं की शादी?’’ ‘‘सारी बातें आज ही जानेगी या अगली बार के लिए भी कुछ छोड़ेगी? अभी वैसे ही 10 बज गए हैं बातों में टाइम का पता ही नहीं चला.
चल कल फिर से मिलें?’’ कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ. घर आ कर मैं फिर से पुरानी बातों, पुरानी यादों में ही खोई रही. तभी मम्मी का फोन आ गया. मैं ने ऋषि से हुई मुलाकात के बारे में जैसे ही मम्मी को बताया वे छूटते ही बोलीं, ‘‘उस की शादी हो गई?’’ ‘‘मां तुम कब सुधरोगी, क्यों पूछूं मैं उस से उस की शादी के बारे में,’’ मैं ने कुछ झंझलाते हुए कहा. ‘‘नहीं हुई हो तो अपने लिए सोच सकती है न. बेटा हमारे जीतेजी तू सैटल हो जाए तो हम भी चैन से ऊपर जा पाएंगे,’’ मम्मी कुछ उदास से स्वर में बोलीं. ‘‘मां यही तो समस्या है कि आप लोग बेटी की शादी होने को ही सैटल होना कहते हो. मैं इतना अच्छा कमा रही हूं. अपने पैरों पर खड़ी हूं, आप की देखभाल में कोई कसर नहीं रख रही, यह सैटल होना नहीं है क्या? शादी आजकल जरूरी नहीं है. अब आज के बाद आप शादीशादी की रट लगाना बंद कर दो.’’
अगले दिन 7 बजे हम दोनों फिर इंडियन कैफे हाउस में बैठे थे. कौफी और डोसा का और्डर दे कर ऋषि बिना किसी लागलपेट के बोला, ‘‘तुम तो शादी की बरबादी से बच गईं परंतु मैं तो ऐसा फंसा कि अभी 6 महीने पहले ही मुक्त हुआ हूं. मेरी शादी 4 साल पहले यानी मेरी नौकरी लगने के 6 माह बाद ही मेरी दूर के रिश्ते की मामी की भतीजी से तय हुई थी. चूंकि नातेरिश्तेदारी थी सो मम्मीपापा और मैं किसी भी तरह की धोखाधड़ी होने से आश्वस्त थे. लड़की यानी रितु देखने में बहुत खूबसूरत और इकहरे बदन वाली थी. चूंकि वह भी एमबीए थी इसलिए मैं ने सोचा कि इसे भी आस्ट्रेलिया में ही नौकरी जौइन करवा दूंगा ताकि घर में अकेली बोर न हो. शादी के बाद तुरंत ही हम लोग आस्ट्रेलिया चले गए. वह भी बहुत खुश थी क्योंकि यह उस की पहली विदेश यात्रा थी.
‘‘आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में मेरी पोस्टिंग थी. सिडनी न्यू साउथ वेल्स की राजधानी है और बहुत खूबसूरत शहर है. यहां का ओपेरा हाउस, हार्बर ब्रिज, रायल बोटेनिकल गार्डन, टारोंग ब्रिज जैसी अनोखी वास्तुकलाओं के लिए जाना जाता है. हम जैसे ही अपने घर में पहुंचे तो रितु बहुत खुश हुई पर जब मैं ने उसे रात में स्पर्श करने की कोशिश की तो वह बोली कि ऋषि, आज नहीं कल. आज जरा भी मन नहीं है. मैं ने इसे बहुत साधारण तरीके से लिया. वह हर समय फोन पर बिजी रहती थी. जब भी मैं कहता कि दिनभर तुम फोन पर क्या करती हो तो उस का जबाब होता कि तुम तो चले जाते हो तो मैं क्या करूं. इसलिए कुछ फ्रैंड्स बना लिए हैं. उन से बात करती हूं तो टाइम कट जाता है.
‘‘तुम तो एमबीए हो, यहां का कोई कोर्स कर लो और जौब जौइन कर लो तो तुम्हारा टाइम भी आराम से कटेगा. इस तरह दिनभर फोन में लगी रहोगी तो बोरियत तो होगी ही. मोबाइल का क्या है तुम पूरे दिन स्क्रौल करती रहो टाइम वेस्ट होगा और हाथ कुछ नहीं लगेगा. ‘‘अब तक हमारे विवाह को लगभग 1 साल होने को आया था और तुम आश्चर्य करोगी कि इतने दिनों में बमुश्किल 3 से 4 बार ही हम दोनों पास आए होंगे. खैर, मैं ने थोड़ा और समय अपने रिश्ते को देने का निर्णय किया और उस का जरमन लैंग्वेज सीखने के लिए एडमिशन करवा दिया पर जो मैं ने सोचा हुआ बिलकुल उस का उलटा. हर सुबह तैयार होती और निकल जाती.
यही नहीं कईकई बार तो रात को भी घर नहीं लौटती थी और जब भी मैं उस के साथ संबंध बनाने की कोशिश करता वह बिदक जाती. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मेरे साथ क्या खेल खेल रही है. ‘‘ऐसी ही एक सुबह मैं ने कहा कि रितु कहां थीं तुम रात को और शक्ल देखो जरा अपनी क्या बना रखी है. ऐसा लगता है रातभर नशे में पड़ी रही हो. ‘‘इस पर वह बोली कि हां वह मेरी एक फ्रैंड का बर्थडे था सो थोड़ी सी ले ली थी. पर इस के बाद हर दूसरे दिन रितु घर से गायब हो जाती और 2-3 दिन के बाद लौटती थी. धीरेधीरे मैं ने नोटिस किया कि वह नशे की गिरफ्त में आ चुकी है. फिर एक दिन मुझे गुस्सा आ गया तो मैं ने कहा कि रितु यह क्या तमाशा लगा रखा है.
हम पतिपत्नी हैं हमारे विवाह को भी लगभग 8 महीने होने को आए हैं और तुम हर दिन गायब रहती हो. आखिर मैं ने इसलिए तो शादी नहीं की है?’’ ‘‘मेरी बात सुन कर बोली कि ऋषि देखो मुझे तुम से विवाह करने में कोई इंटरैस्ट नहीं था. मम्मीपापा को मैं ने बताया था कि मैं हरप्रीत से प्यार करती हूं और उस से शादी करना चाहती हूं पर मेरे मम्मीपापा उस से मेरी शादी करने को तैयार नहीं थे. इसीलिए मुझे तुम से पतिपत्नी वाला रिश्ता बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’ ‘‘रितु की ये बातें सुन कर तो मेरे होश उड़ गए. कुछ समझ नहीं आया कि यह मेरे साथ क्या हो गया. हाथपैर मानो सुन्न हो गए थे. उस दिन औफिस भी नहीं जा पाया था मैं. इस के बाद मेरी जिंदगी पूरी तरह बदल गई थी.
न जौब में मन लगता था, न घर में, रितु थी पर मेरी उस से बोलचाल बंद हो गई थी. सच कहूं तो मैं डिप्रैशन में जाने लगा था. तब मांपापा को कुछ शक हुआ और एक दिन उन के बहुत फोर्स करने पर मैं ने संक्षेप में उन्हें 2-4 बातें बता दीं. तब उन्होंने ही मुझे वहां से रिजाइन कर के यहां इंडिया में जौब जौइन करने की सलाह दी. ‘‘रितु भी मेरे साथ इंडिया आ गई पर वह मेरे घर न आ कर अपने किसी दोस्त के यहां चली गई और 10 दिन बाद ही रितु ने मुझे तलाक के पेपर्स पर साइन करने को कहा. मैं ने पेपर्स पर साइन कर दिए पर रितु से कहा कि रितु यदि तुम ने मुझे पहले बताया होता तो मैं खुद इस शादी से मना कर देता. मेरी जिंदगी इस तरह बरबाद करने का तुम्हें कोई हक नहीं है. तुम्हारे मांपापा ने तुम्हारी बात नहीं मानी पर इस में मेरा क्या कुसूर था जो तुम ने मेरे साथ ऐसा किया? ‘‘जवाब में वह बोली कि देखो मेरे पापा दिल के मरीज हैं जब मेरे बारबार कहने पर भी वे नहीं माने तो मेरे पास इस शादी को करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मैं ने भी सोचा कि तुम से शादी कर के कम से कम मुझे विदेश घूमने का मौका तो मिलेगा. अब तलाक ले कर मैं इंडिया हरप्रीत से ही शादी कर लूंगी और तुम भी अपनी पसंद की किसी लड़की से शादी कर लेना.’’ ‘‘तो तुम ने तलाक ले लिया उस से…’’ ‘‘हमारे यहां तलाक मिलना क्या आसान होता है? जैसे ही तलाक के बारे में हम दोनों के घर वालों को पता चला तो वे कहने लगे कि अरे छोटीमोटी बातें घरगृहस्थी में होती ही रहती हैं. थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा.
कुल मिला कर दोनों ही पक्ष हमारे तलाक के निर्णय से खुश नहीं थे पर उन्हें कौन समझए कि ऐसी शादी से क्या फायदा जो सिर्फ दिखावे के लिए हो. ऐसे घुटघुट कर शादी निभाने से तो अच्छा है कि अलग हो कर चैन से रहो. 1 साल तक लंबे कानूनी केस के बाद अभी 6 महीने पहले हमारा केस क्लोज हुआ है जिस में ऐलीमनी के तौर पर एकमुश्त 11 लाख रुपए रितु को देने पड़े. अब तुम ही बताओ कि इस में मेरा क्या कुसूर था जो मुझे और मेरे परिवार को इतना आर्थिक और मानसिक नुकसान सहना पड़ा?’’ ‘‘सच में यह तो तुम्हारे साथ बहुत ही बुरा हुआ यानी हम दोनों ही इस मामले में कुदरत के मारे हैं. शायद हम दोनों की ही जिंदगी में शादी का सुख नहीं है,’’ मैं ने थोड़ा रूमानी सा होते हुए कहा. ‘‘अरे यार शादी इंसान एक अच्छे जीवनसाथी मिलने की कामना में करता है ताकि जिंदगी के हर मोड़ पर उस के साथ एक साथी खड़ा रहे, जो जिंदगी के हर सुखदुख में उस के साथ कदम से कदम मिला कर चल सके और अगर ऐसा नहीं हो पा रहा है तो अलग होना या शादी न करना ही बेहतर है.’’ ‘‘हां बात तो तुम्हारी सही है शादी के लिए एक सच्चा और अच्छा लाइफ पार्टनर मिलना जरूरी है वरना शादी को बरबादी में बदलते देर नहीं लगती.
चलें अब आज के लिए काफी है. वैसे भी 10 बज गए हैं.’’ उस के बाद हम दोनों ही काफी खुल गए थे, मुलाकातें बढ़ गईं थीं. हमें एकदूसरे से मिलते. 6 महीने होने को आए थे. उस दिन बहुत तेज पानी बरस रहा था. दिल्ली में यों भी जरा सा पानी बरसता है तो मानो पूरा शहर झल में तबदील हो जाता है. मैं अभी सोच ही रही थी कि घर कैसे पहुंचूंगी क्योंकि मैट्रो स्टेशन तक पहुंचना भी बहुत बड़ी चुनौती थी. तभी ऋषि का फोन आ गया, ‘‘मैं तुम्हारे बैंक के सामने ही हूं बाहर आ जाओ मैं घर छोड़ दूंगा.’’ कुछ ही देर में ऋषि के साथ मैं उस की कार में थी. बाहर तेज बारिश थी. गाड़ी में गाना बज रहा था, ‘‘रिम?िम गिरे सावन, सुलगसुलग जाए मन, भीगे आज इस मौसम में लगी कैसी यह अगन… रिमझिम गिरे सावन…’’ कुछ देर तक गाने को गुनगुनाने के बाद अचानक ऋषि बोला, ‘‘नैना, क्या हम बचपन के प्यार में जिंदगीभर के लिए नहीं बंध सकते.’’ अचानक रखे गए ऋषि के इस प्रस्ताव पर मैं चौंक गई. यह सही है कि मैं भी कहीं न कहीं दिल के एक कोने में ऋषि से फिर से प्यार करने लगी थी पर एकदम से हां या न कहने की स्थिति में अभी नहीं थी सो धीरे से बोली, ‘‘मुझे कुछ समय चाहिए.’’ उस दिन मुझे घर छोड़ते समय ऋषि बोला, ‘‘मैं तुम्हारे इंतजार करूंगा.’’ मैं ने जब इस बारे में मम्मी को बताया तो पहले तो वे बहुत खुश हुईं पर जैसे ही तलाक के बारे में सुना तो बिदक गईं, ‘‘पागल हो गई है क्या, दूजा ही बचा है क्या तेरी जिंदगी में? समाज क्या कहेगा? किसकिस को जवाब देंगे हम?’’ ‘‘मुझे समझ नहीं आता हमेशा समाज के बारे में ही क्यों सोचते रहते हो आप लोग.
जब मेरी शादी टूटी थी तब कहां था समाज? जब पापा को अटैक आया था तब कहां था आप का समाज? तब तो मैं ने और आप ने ही सब झेला था न. पापा आप ही समझओ अब मम्मी को. मेरी बात तो इन्हें समझ आने से रही,’’ कह कर मैं ने उम्मीदभरी नजरों से पापा की तरफ देखा. ‘‘तलाकशुदा ही मिला तुम्हें,’’ पापा ने गुस्से से कहा तो न चाहते हुए भी मैं बोल पड़ी, ‘‘देखा तो था आप ने पहला जो शराबी था. ऋषि तलाकशुदा है पर शराबी नहीं. हम दोनों एकदूसरे को बचपन से जानते हैं.
अगर एक बार गलत इंसान मिल गया तो क्या फिर से नई शुरुआत नहीं की जा सकती क्या पापा? आप दोनों मेरे साथ हैं तो मुझे किसी की चिंता नहीं है. बोलिए पापामम्मा क्या आप मेरे जीवन की नई शुरुआत करने में मेरा साथ देंगे?’’ ‘‘मेरी बातें सुन कर पापामम्मी दोनों ने हां में सिर हिलाते हुए मुझे अपने आगोश में ले लिया और अगले ही दिन मैं अपने बचपन के उस प्यार को प्यार ही प्यार बेशुमार बनाने की तैयारी में लग गई.
Pyaar Ki Kahani