Hindi Social Story: गलीचा

Hindi Social Story: संगीता और नगीना का परिचय एक यात्रा के दौरान हुआ था. उस से पहले वे कभी नहीं मिली थीं. एक ही दफ्तर में काम करने के कारण उन दोनों के पति ही एकदूसरे के घर आतेजाते थे. इसीलिए वे दोनों एकदूसरे की पत्नियों से भी परिचित हो गए थे, लेकिन दोनों की पत्नियों का मिलन पहली बार इस यात्रा में ही हुआ था.

हुआ यों कि संगीता के पति दीपक ने दफ्तर से 15 दिन की छुट्टी ली. दीपक के साथ काम करने वालों ने सहज ही पूछलिया, ‘‘क्या बात है, दीपक, इतनी लंबी छुट्टी ले कर कहीं बाहर जाने का विचार है क्या?’’

दीपक ने सचाई बता दी, ‘‘हां, हमारा विचार राजस्थान के कुछ ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा करने का है. पत्नी कई दिनों से घूमनेके लिए चलने का आग्रह कर रही थी, इसीलिए मैं ने इस बार 15 दिन की यात्रा का कार्यक्रम बना डाला.’’

सभी ने दीपक के इस निश्चय की सराहना करते हुए कहा, ‘‘हो आओ. घूमनेफिरने से ताजगी आती है. आदमी को साल दो साल में घर से निकलना ही चाहिए. इस से मन की उदासी दूर हो जाती है.’’

तभी नगीना के पति रमेश ने दीपक से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे साथ और कोई भी जा रहा है?’’

‘‘नहीं, बस, श्रीमतीजी और मैं ही जा रहे हैं. बच्चे भी साथ नहीं जा रहे हैं, क्योंकि इस से उन की पढ़ाई में हर्ज होगा. वे अपने दादादादी के पास रहेंगे.’’

‘‘यह तो तुम ने बड़ी समझदारी का काम किया.’’

‘‘हां, मगर उन के बिना हमें कुछ अच्छा नहीं लगेगा. बच्चों के साथ रहने से मन लगा रहता है.’’

‘‘भई, मेरी पत्नी भी कहीं चलने के लिए जोर डाल रही है, पर सोचता हूं…’’

‘‘इस में सोचने की क्या बात है? अगर राजस्थान में घूमने की इच्छा हो तो हमारे साथ चलो.’’

‘‘तुम्हें कोई असुविधा तो नहीं होगी?’’

‘‘हमें क्या असुविधा होगी, भई, हनीमून मनाने थोड़े ही जा रहे हैं.’’किया, ‘‘जाओ,भई, ऐसा मौका मत छोड़ो. सफर में एक से दो भले. पर्यटन में अपनों का साथ होना बहुत अच्छा रहता है.’’

रमेश को यह सलाह जंच गई. उस ने उसी समय छुट्टी की अरजी दे डाली. बड़े बाबू ने अपनी शुभकामनाएं व्यक्त करते हुए उस की छुट्टी की भी स्वीकृति दे दी. इसीलिए दोनों दंपतियों का साथ हो गया.

रेलवे स्टेशन पर दोनों जोड़ों का जब मिलन हुआ तो संगीता ने नगीना से कहा, ‘‘देखिए, एक ही शहर में रहते हुए भी हम अभी तक नहीं मिल पाईं?’’

नगीना ने मोहक मुसकान के साथ जवाब दिया, ‘‘अब हम लोग खूब मिला करेंगी, पिछली सारी कसर पूरी कर लेंगी.’’

इस यात्रा में संगीता औैर नगीना का बराबर साथ रहा. रेल और मोटर में तो उन का साथ रहता ही था. वे लोग जहां ठहरते थे, वहां भी कमरे पासपास ही होते थे. एक बार तो एक ही कमरे में दोनों जोड़ों को रात बितानी पड़ी. लिहाजा, इस सफर में नगीना और संगीता को एकदूसरे को देखनेसमझने के खूब मौके मिले.

इस अवधि में संगीता ने यह जाना कि रमेश पत्नी का खूब खयाल रखता है. वह दिनरात उस की सुखसुविधा के लिए चिंतित रहता है. वह नगीना की पसंद की चीजें नजर आते ही ले आता है. आग्रह करकर के खिलातापिलाता. पत्नी को जरा सा उदास देखते ही वह प्रश्नों की झड़ी लगा देता, ‘‘क्या हो गया? तबीयत ठीक नहीं है क्या? सिरदर्द तो नहीं हो रहा है? क्या हाथपैर ही दर्द कर रहे हैं?’’

नगीना के मुंह से अगर कभी यह निकल जाता कि तबीयत कुछ ठीक नहीं है तो रमेश भागदौड़ मचा देता. पत्नी के सिर पर कभी बाम मलता तो कभी हाथपैर ही दबाने लगता. जरूरत होती तो डाक्टर को भी बुला लाता.

नगीना मना करती रह जाती, ‘‘घबराने की कोईर् बात नहीं. साधारण बुखार है.’’

मगर रमेश घबरा जाता. नगीना जब तक पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाती थी, तब तक वह बेहद परेशान रहता. जब नगीना हंसहंस कर बातें करने लगती तब कहीं उस की जान में जान आती.

पत्नी को यों खिलीखिली सी रखने के लिए वह सतत प्रयत्नशील रहता.सब से बड़ी बात तो यह थी कि उस अवधि में वह अपनी पत्नी पर न तो कभी झल्लाता, न ही नाराज होता. कई बार नगीना ने उस की इच्छा के खिलाफ भी काम किया. फिर भी उस ने कुछ नहीं कहा.

रमेश के इस व्यवहार से संगीता बड़ी प्रभावित हुई. उसे नगीना से ईर्ष्या होने लगी. वह मन ही मन अपने पति दीपक और रमेश में तुलना करने लगती.

जिन बातों की ओर संगीता का पहले कभी ध्यान नहीं जाता था उस ओर भी उस का ध्यान जाने लगा था. एक टीस सी उस के मन में उठने लगी थी, ‘एक मेरा पति है और एक नगीना का. दोनों में कितना अंतरहै. दीपक तो मेरा कभी खयाल ही नहीं रखता. 15 वर्ष से अधिक अवधि बीत गई हमारे विवाह को, फिर भी कोई जानकारी ही नहीं है.

‘दीपक तो बस अपनेआप में ही डूबा रहता है. हां, कुछ कह दूं तो भले ही ध्यान दे दे. मगर मेरे मन की बात जानने की उसे स्वयं कभी इच्छा ही नहीं होती. मन की बात छिपाना ही उसे नहीं आता. जो मन में आता है, वह फौरन जीभ पर ले आता है. उस का चेहरा ही बहुत कुछ कह देता है. कठोर से कठोर बात भी उस के मुंह से निकल जाती है. ऐसे क्षणों में उसे इस बात का भी ध्यान नहीं रहताकि किसी को बुरा लगेगा या भला? वह तो बस अपने मन की बात कह के हलके हो जाते हैं. कोई मरे या जिए उस की बला से.

‘दीपक की सेवा करकर के भले ही कोई मर जाए, फिर भी प्रशंसा के दो बोल उस के मुंह से शायद ही निकलते हैं. बीमारी तक में उसे खयाल नहीं रहता कि मेरी कुछ मदद कर दे. जाने किस दुनिया में रहता है वह. उस के जीवन से कोई और भी जुड़ा हुआ है, इस का उसे ध्यान ही नहीं रहता. पत्नी का उसके लिए जैसे कोई महत्त्व ही नहीं है. न जाने किस मिट्टी का बना है वह. अच्छा बनेगा तो इतना अच्छा कि उस से अच्छा कोई और हो ही न शायद. बुरा बनेगा तो इतना बुरा कि वैरी से भी बढ़ कर. सचमुच बहुत ही विचित्र प्राणी है दीपक.’

संगीता के मन के ये उद्गार एक दिन नगीना के सामने प्रकट हो गए. उस दिन दोनों के पति यात्रा से वापस लौटने के लिए आरक्षण कराने गए थे. वे दोनों बैठी इधर- उधर की बातें कर रही थीं. तभी नगीना ने अपने पति की आलोचना शुरू कर दी. बच्चों के लिए खरीदे गए कपड़ों को ले कर पतिपत्नी में शायद खटक चुकी थी.

संगीता कुछ देर तक तो सुनती रही, किंतु जब नगीना रमेश के व्यवहार की तीखी आलोचना करने लगी तो वह अपनेआप को रोक नहीं पाई. उस के मुंह से निकल गया, ‘‘नहीं, तुम्हारे पति तो ऐसे नहीं लगते. इन 12-13 दिनों में मैं ने जो कुछ देखा है, उस के आधार पर तो मैं यही कह सकती हूं कि तुम्हें अच्छा पति मिला है. वह तुम्हारा बड़ा खयाल रखते हैं. तुम्हारी सुखसुविधा के लिए वह हमेशा चिंतित रहते हैं. आश्चर्य है कि तुम ऐसे आदर्श पति की बुराई कर रही हो.’’

नगीना ने बड़ी तल्खी से जवाब दिया, ‘‘काश, वह आदर्श पति होते?’’

संगीता ने साश्चर्य पूछा, ‘‘फिर आदर्श पति कैसा होता है?’’

नगीना ने बड़े दर्द भरे स्वर में कहा, ‘‘संगीता, तुम मेरे पति को सतही तौर पर ही जान पाई हो, इसीलिए ऐसी बातें कर रही हो. हकीकत में वह ऐसे नहीं हैं.’’

‘‘तो फिर कैसे हैं?’’ ‘‘जैसे दिखते हैं वैसे नहीं हैं.’’ ‘‘क्या मतलब?’’ नगीना ने फर्श पर बिछे गलीचे की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘‘वह इस गलीचे की तरह हैं.’’ संगीता का आश्चर्य बढ़ता ही जा रहा था. उस ने हैरानी से पूछा, ‘‘मैं तुम्हारी बात समझ नहीं पाई?’’

फर्श पर बिछे हुए गलीचे के एक कोने को थोड़ा सा उठाती हुई नगीना बोली, ‘‘संगीता, गलीचे के नीचे छिपी हुई यह धूल, यह गंदगी, किसी को नजर नहीं आती. लोगों को तो बस यह खूबसूरत गलीचा ही नजर आता है. इसे ही अगर सचाई मानना हो तो मान लो. मगर मैं तो उस नंगे फर्श को अच्छा समझती हूं जहां ऐसा कोई धोखा नहीं है. संगीता, मुझे तुम से ईर्ष्या होती है. तुम्हें कितने अच्छे पति मिले हैं. अंदरबाहर से एक से.’’

संगीता मुंहबाए नगीना को देखती रह गई. उस से कुछ कहते ही नहीं बना. दीपक के प्रति उसे जैसे नई दृष्टि प्राप्त हुई थी. अपने सारे दोषों के बावजूद वह उसे बहुत अच्छा लगने लगा. संगीता के मन में उस के प्रति जैसे प्यार का ज्वार उमड़ पड़ा.

Hindi Social Story

Fictional Story: मुझे कबूल नहीं

Fictional Story: अब्बाजान की प्राइवेट नौकरी के कारण 3 बड़े भाईबहनों की पढ़ाई प्राइमरी तक ही पूरी हो सकी थी. लेकिन मैं ने बचपन से ही ठान लिया था कि उच्चशिक्षा हासिल कर के रहूंगी. ‘‘रेशमा, हमारी कौम और बिरादरी में पढ़ेलिखे लड़के कहां मिलते हैं? तुम पढ़ाई की जिद छोड़ कर कढ़ाईबुनाई सीख लो,’’ अब्बू ने समझाया था.

मेरी देखादेखी छोटी बहन भी ट्यूशन पढ़ा कर पढ़ाई का खर्च खुद पूरा करने लगी. 12वीं कक्षा की मेरी मेहनत रंग लाई और मुझे वजीफा मिलने लगा. इस दरमियान दोनों बड़ी बहनों की शादी मामूली आय वाले लड़कों से कर दी गई और भाई एक दुकान में काम करने लगा. मैं ने प्राइवेट कालेजों में लैक्चरर की नौकरी करते हुए पीएचडी शुरू कर दी. अंत में नामचीन यूनिवर्सिटी में हिंदी अधिकारी के पद पर कार्यरत हो गई. छोटी बहन भी लैक्चरर के साथसाथ डाक्टरेट के लिए प्रयासरत हो गई. मेरी पोस्टिंग दूसरे शहर में होने के कारण अब मैं ईदबकरीद में ही घर जाती थी. इस बीच मैं ने जरूरत की चीजें खुद खरीद कर जिंदगी को कमोबेश आसान बनाने की कोशिश की. लेकिन जब भी अपने घर जाती अम्मीअब्बू के ज्वलंत प्रश्न मेरी मुश्किलें बढ़ा देते.

‘‘इतनी डिगरियां ले ली हैं रेशमा तुम ने कि तुम्हारे बराबर का लड़का ढूंढ़ने की हमारी सारी कवायद नाकाम हो गई है.’’ ‘‘अब्बू अब लोग पढ़ाई की कीमत समझने लगे हैं. देखना आप की बेटियों के लिए घर बैठे रिश्ता आएगा. तब आप फख्र करेंगे अपनी पढ़ीलिखी बेटियों पर,’’ मैं कहती.

‘‘पता नहीं वह दिन कब आएगा,’’ अम्मी गहरी सांस लेतीं, ‘‘खानदान की तुम से छोटी लड़कियों की शादियां हो गईं. वे बालबच्चेदार भी हो गईं. सब टोकते हैं, कब कर रहे हो रेशमा और नसीमा की शादी? तुम्हारी शादी न होने की वजह से हम हज करने भी नहीं जा सकते हैं,’’ अम्मी ने अवसाद उड़ेला तो मैं वहां से चुपचाप उठ कर चली गई. यों तो मेरे लिए रिश्ते आ रहे थे, लेकिन बिरादरी से बाहर शादी न करने की जिद अम्मीअब्बू को कोई फैसला नहीं लेने दे रही थी.

शिक्षा हर भारतीय का मूल अधिकार है, लेकिन हमारा आर्थिक रूप से

कमजोर समाज युवाओं को शीघ्र ही कमाऊपूत बनाने की दौड़ में शिक्षित नहीं होने देता. नतीजतन पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी कौम आर्थिक तंगी, सीमित आय में ही गुजारा करने के लिए विवश होती है. यह युवा पीढ़ी की विडंबना ही है कि आगे बढ़ने के अवसर होने पर भी उस की मालीहालत उसे उच्च शिक्षा, ऊंची नौकरियों से महरूम कर देती है. उस दिन अब्बू ने फोन किया. आवाज में उत्साह था, ‘‘तुम्हारे छोटे चाचा एक रिश्ता लाए हैं. लड़का पोस्ट ग्रैजुएट है. प्राइवेट स्कूल में नौकरी करता है तनख्वाह 8 हजार है… खातेपीते घर के लोग हैं… फोटो भेज रहा हूं.’’

‘‘दहेज की कोई मांग नहीं है. सादगी से निकाह कर के ले जाएंगे,’’ भाईजान ने भी फोन कर बताया. अब्बू और भाईजान को तो मुंहमांगी मुराद मिल गई.

मैंने फोटो देखा. सामान्य चेहरा. बायोडाटा में मेरी डिगरियों के साथ कोई मैच नहीं था, लेकिन मैं क्या करती. अम्मीअब्बू की फिक्र… बहन की शादी की उम्र… मैं भी 34 पार कर रही थी… भारी सामाजिक एवं पारिवारिक दबाव के तहत अब्बू ने मेरी सहमति जाने बगैर रिश्ते के लिए हां कर दी. सगाई के बाद मैं वापस यूनिवर्सिटी आ गई. लेकिन जेहन में अनगिनत सवाल कुलबुलाते रहे कि पता नहीं उस का मिजाज कैसा होगा… उस का रवैया ठीक तो होगा न… मुझे घरेलू हिंसा से बहुत डर लगता है… यही तो देख रही हूं सालों से अपने आसपास. क्या वह मेरे एहसास, मेरे जज्बात की गहराई को समझ पाएगा?

तीसरे ही दिन मंगेतर का फोन आ गया. पहली बार बातचीत, लेकिन शिष्टाचार, सलीका नजर नहीं आया. अब तो रोज का ही दस्तूर बन गया. मैं थकीहारी औफिस से लौटती और उस का फोन आ जाता. घंटों बातें करता… अपनी आत्मस्तुति, शाबाशी के किस्से सुनाता. मैं मितभाषी बातों के जवाब में बस जी… जी… करती रहती. वह अगर कुछ पूछता भी तो बगैर मेरा जवाब सुने पुन: बोलने लगता.

चौथे महीने के बाद वह कुछ ज्यादा बेबाक हो गया. मेरे पुरुष मित्रों के बारे में, रिश्ते की सीमाओं के बारे में पूछने लगा. कुछ दिन बाद एक धार्मिक पर्व के अवसर पर बात करते हुए मैं ने महसूस किया कि वह और उस का परिवार पुरानी निरर्थक परंपराओं एवं रीतिरिवाजों के प्रति बहुत ही कट्टर और अडिग हैं. मैं आधुनिक प्रगतिशील विचारधारा वाली ये सब सुन कर बहुत चिंतित हो गई.

यह सच है कि बढ़ती उम्र की शादी महज मर्द और औरत को एक छत के नीचे रख कर सामाजिक कायदों को मानने एवं वंश बढ़ाने की प्रक्रिया के तहत एक समझौता होती है, फिर भी नारी का कोमल मन हमेशा पुरुष को हमसफर, प्रियतम, दोस्त, गमगुजार के रूप में पाने की ख्वाहिश रखता है… मैं ऐसे कैसे किसी संवेदनहीन व्यक्ति को जीवनसाथी बना कर खुश रह सकती हूं? एक दिन उस ने फोन पर बताया कि वह पोस्ट ग्रैजुएशन का अंतिम सेमैस्टर देने के लिए छुट्टी ले रहा है… मुझे तो बतलाया गया था कि वह पोस्ट ग्रैजुएशन कर चुका है… मैं ने उस के सर्टिफिकेट को पुन: देखा तो आखिरी सेमैस्टर की मार्कशीट नहीं थी… मेरा माथा ठनका कि इस का मतलब मुझे झूठ बताया गया. मैं पहले भी महसूस कर चुकी थी कि उस की बातों में सचाई और साफगोई नहीं है.

उस ने फोन पर बताया कि वह प्राइवेट नौकरी की शोषण नीति से त्रस्त हो चुका है. अब घर में रह कर अर्थशास्त्र पर किताब लिखना चाहता है. ‘‘किताब लिखने के लिए नौकरी छोड़ कर घर में रहना जरूरी नहीं है. मैं ने 2 किताबें नौकरी करते हुए लिखी हैं.’’

मेरे जवाब पर प्रतिक्रिया दिए बगैर उस ने बात बदल दी. अनुभवों और परिस्थितियों ने मुझे ठोस, गंभीर और मेरी सोच को परिपक्व बना दिया था. उस का यह बचकाना निर्णय मुझे उस की चंचल, अपरिपक्व मानसिकता का परिचय दे गया.

एक दिन मुझे औफिस का काम निबटाना था, तभी उस का फोन आ गया. हमेशा की तरह बिना कौमा, पूर्णविराम के बोलने लगा, ‘‘यह बहुत अच्छा हो गया… आप मुझे मिल गईं. अब मेरी मम्मी को मेरी चिंता नहीं रहेगी.’’

‘‘वह कैसे?’’ ‘‘क्योंकि मेरी तमाम बेसिक नीड्स पूरी हो जाएंगी.’’ सुन कर मैं स्तब्ध रह गई. मैं ने संयम जुटा कर पूछा.

‘‘बेसिक नीड्स से क्या मतलब है आप को?’’ उस ने ठहाका लगा कर जवाब दिया, ‘‘रोटी, कपड़ा और मकान.’’

मैं सुन कर अवाक रह गई. भारतीय समाज में पुरुष परिवार की हर जरूरत पूरा करने का दायित्व उठाते हैं. यह मर्द तो औरत पर आश्रित हो कर मुझे बैसाखियों की तरह इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है. इस से पहले भी उस ने मेरी तनख्वाह और बैंकबैलेंस के बारे में पूछा था जिसे मैं ने सहज वार्त्ता समझ कर टाल दिया था.

अपने निकम्मेपन, अपने हितों को साधने के लिए ही शायद उस ने पढ़ीलिखी नौकरीपेशा लड़की से शादी करने की योजना बनाई थी. आज मेरे जीवन का यह अध्याय चरमसीमा पर आ गया. मैं ने चाचा, अब्बू व भाईजान को अपनी सगाई तोड़ देने की सूचना दे कर दूसरे ही दिन मंगनी में दिया सारा सामान उस के पते पर भिजवा दिया. मेरा परिवार काठ बन गया. मुझे खुदगर्जी के चेहरे पर मुहब्बत का फरेबी नकाब पहनने वाले के साथ रिश्ता कबूल नहीं था. छलकपट, स्वार्थ, दंभ से भरे पुरुष के साथ जीवन व्यतीत करने से बेहतर है मैं अकेली अनब्याही ही रहूं.

Fictional Story

Social Story: वचन हुआ पूरा- रामकली ने कौनसा वादा किया था

Social Story: ‘‘देखोजी, मैं साहब के यहां बरतन मांजने नहीं जाऊंगी,’’ रामकली अपनी भड़ास निकालते हुए जरा गुस्से से बोली. ‘‘क्यों नहीं जाएगी तू वहां?’’ जगदीश ने सवाल किया. ‘‘बस, कह दिया मैं ने कि नहीं जाऊंगी तो नहीं जाऊंगी.’’ ‘‘मगर, क्यों नहीं जाएगी?’’ जगदीश जरा नाराज हो कर बोला. ‘‘उन साहब की नीयत जरा भी अच्छी नहीं है.’’

‘‘तू नहीं जाएगी तो साहब मुझे परमानैंट नहीं करेंगे…’’ इस समय जगदीश की आंखों में गुजारिश थी. पलभर बाद वह दोबारा बोला, ‘‘देख रामकली, जब तक ये साहब हैं, तू काम छोड़ने की मत सोच. साहब मेरी नौकरी परमानैंट कर देंगे, फिर मत मांजना बरतन.’’ ‘‘देखोजी, मुझे वहां जाने को मजबूर मत करो. औरत एक बार सब की हो जाती है न…’’ पलभर बाद वह बोली, ‘‘खैर, जाने दो. आप कहते हैं तो मैं नहीं छोड़ूंगी. यह जहर भी पी जाऊंगी.’’ ‘‘सच रामकली, मुझे तुझ से यही उम्मीद थी,’’ कह कर जगदीश का चेहरा खिल उठा. रामकली कोई जवाब नहीं दे पाई. वह चुपचाप मुंह लटकाए रसोईघर के भीतर चली गई.

जब से ये नए साहब आए हैं तब से इन्हें बरतन मांजने वाली एक बाई की जरूरत थी. जगदीश उन के दफ्तर में काम करता है. 15 साल बीत गए, पर परमानैंट नहीं हुआ है. कितने ही साहब आए, सब ने परमानैंट करने का भरोसा दिया और परमानैंट किए बिना ही ट्रांसफर हो कर चले गए.

ये साहब भी अपना परिवार इसलिए ले कर नहीं आए थे कि उन के बच्चे अभी पढ़ रहे हैं, इसलिए यहां एडमिशन दिला कर वे रिस्क नहीं उठाना चाहते थे. बंगले में चौकीदार था. रसोइया भी था. मगर बरतन मांजने के लिए उन्हें एक बाई चाहिए थी. साहब एक दिन जगदीश से बोले थे, ‘बरतन मांजने वाली एक बाई चाहिए.’ ‘साहब, वह तो मिल जाएगी, मगर उस के लिए पैसा क्यों खर्च करें…’ जगदीश ने सलाह दी थी, ‘मैं गुलाम हूं न, मैं ही मांज दिया करूंगा बरतन.’

‘नहीं जगदीश, मुझे कोई बाई चाहिए,’ साहब इनकार करते हुए बोले थे. तब जगदीश ने सोचा था कि मौका अच्छा है. बाई की जगह वह अपनी लुगाई को क्यों न रखवा दे. साहब खुश होंगे और उसे परमानैंट कर देंगे. जगदीश को चुप देख कर साहब बोले थे, ‘कोई बाई है तुम्हारी नजर में?’

‘साहब, मेरी घरवाली सुबहशाम आ कर बरतन मांज दिया करेगी,’ जगदीश ने जब यह कहा, तब साहब बोले थे, ‘नेकी और पूछपूछ… तू अपनी जोरू को भेज दे.’

‘ठीक है साहब, उसे मैं तैयार करता हूं,’ जगदीश ने उस दिन साहब को कह तो दिया था, मगर लुगाई को मनाना इतना आसान नहीं था. उसे कैसे मनाएगा. क्या वह आसानी से मान जाएगी? रामकली के पास आ कर जगदीश बोला था, ‘रामकली, मैं ने एक वादा किया है?’ ‘वादा… कैसा वादा और किस से?’ रामकली ने हैरान हो कर पूछा था. ‘साहब से?’ ‘कैसा वादा?’

‘अरे रामकली, उन्हें बरतन मांजने वाली एक बाई चाहिए थी. मैं ने कहा कि चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. इस के लिए रामकली है न.’ ‘हाय, तू ने मुझ से बिना पूछे ही साहब से वादा कर दिया.’ ‘हां रामकली, इस में भी मेरा लालच था?’ ‘लालच, कैसा लालच?’ रामकली आंखें फाड़ कर बोली थी.

‘देख रामकली, तू तो जानती है कि मैं अभी परमानैंट नहीं हूं. परमानैंट होने के बाद मेरी तनख्वाह बढ़ जाएगी. इन साहब ने मुझ से वादा किया है कि वे मुझे परमानैंट कर देंगे. तुम साहब के यहां जा कर बरतन मांजोगी तो साहब खुश हो जाएंगे, इसलिए मैं ने तेरा नाम बोल दिया.’

‘अरे, तू ने हर साहब के घर का इतना काम किया. बरतन भी मांजे, पर किसी भी साहब ने खुश हो कर तुझे परमानैंट नहीं किया. इस साहब की भी तू कितनी भी चमचागीरी कर ले, यह साहब भी परमानैंट करने वाला नहीं है,’ कह कर रामकली ने अपनी सारी भड़ास निकाल दी थी.

जगदीश बोला था, ‘देख रामकली, इनकार मत कर, नहीं तो यह मौका भी हाथ से निकल जाएगा. तब फिर कभी परमानैंट नहीं हो सकूंगा. छोटी सी तनख्वाह में ही मरतेखपते रहेंगे.

‘‘मैं अपनी भलाई के लिए तुझ पर यह दबाव डाल रहा हूं. इनकार मत कर रामकली. साहब को खुश करने के लिए सब करना पड़ेगा.’

‘ठीक है, तुम कहते हो तो मैं चली जाया करूंगी. हम तो छोटे लोग हैं. साहब बहुत बड़े आदमी हैं,’ कह कर रामकली ने हामी भर दी थी.

इस के बाद रामकली सुबहशाम साहब के बंगले पर जा कर बरतन मांजने लगी थी.

रामकली 3 बच्चों की मां होते हुए भी जवान लगती थी. गठा हुआ बदन और उभार उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

रामकली के ऐसे रूप पर साहब भी फिदा हो गए थे. जब भी वह बरतन मांजती, किसी न किसी बहाने भीतर आ कर उस के उभारों को एकटक देखते रहते थे. रामकली सब समझ जाती और अपने उभारों को आंचल में छिपा लेती थी. वे उस की लाचारी का फायदा उठाएं, उस के पहले ही वह सचेत रहने लगी थी.

यह खेल कई दिनों तक चलता रहा था. आखिरकार मौका पा कर साहब उस का हाथ पकड़ते हुए बोले थे, ‘रामकली, तुम अभी भी ताजा फूल हो.’ ‘साहब, आप बड़े आदमी हैं. हम जैसे छोटों के साथ ऐसी नीच हरकत करना आप को शोभा नहीं देता है,’ अपना विरोध दर्ज कराते हुए रामकली बोली थी.

‘क्या छोटा और क्या बड़ा, यह ऐसी आग है कि न छोटा देखती है और न बड़ा. आज मेरे भीतर की लगी आग बुझा दो रामकली,’ कह कर साहब की आंखों में हवस साफ दिख रही थी.

साहब अपना कदम और आगे बढ़ाते, इस से पहले रामकली जरा गुस्से से बोली, ‘देखो साहब, आप मेरे मरद के साहब हैं, इसलिए लिहाज कर रही हूं. मैं गिरी हुई औरत नहीं हूं. मेरी भी अपनी इज्जत है. कल से मैं बरतन मांजने नहीं आऊंगी,’ इतना कह कर वह बाहर निकल गई थी.

आज रामकली ने जगदीश से साहब के घर न जाने की बात कही, तो वह नाराज हो गया. कहता है कि मुझे परमानैंट होना है. साहब को खुश करने के लिए उस का बरतन मांजना जरूरी है, क्योंकि ऐसा करना उन्हीं साहब के हाथ में है.

जगदीश अगर परमानैंट हो जाएगा, तब उस की तनख्वाह भी बढ़ जाएगी. फिर किसी साहब के यहां जीहुजूरी नहीं करनी पड़ेगी. क्या हुआ, साहब

ही तो हैं. उन को खुश करने से अगर जगदीश को फायदा होता है तो क्यों न एक बार खुद को उन्हें सौंप दे. वैसे भी औरत का शरीर तो धर्मशाला होता है. उस के साथ सात फेरे लेने वाले पति के अलावा दूसरे मर्द भी तो लार टपकाते हैं. उस ने कई ऐसी औरतें देखी हैं, जो अपने मर्द के होते दूसरे मर्द से लगी रहती हैं. फिर आजकल सुप्रीम कोर्ट ने भी तो फैसला दिया है कि अगर कोई औरत अपने मर्द के अलावा दूसरे मर्द से जिस्मानी संबंध बना भी लेती है, तब वह अपराध नहीं माना जाएगा. फिर वह तो अपने जगदीश के फायदे के लिए जिस्म सौंप रही है.

जिस्म सौंपने से पहले साहब को साफसाफ कह देगी. इस शर्त पर यह सब कर रही हूं कि जगदीश को परमानैंट कर देना. इस मामले में मर्द औरत का गुलाम रहता है. इस तरह रामकली ने अपनेआप को तैयार कर लिया.

‘‘देखो रामकली, एक बार मैं फिर कहता हूं कि तुम साहब के यहां बरतन मांजने जरूर जाओगी,’’ जगदीश ने फिर यह कहा तो रामकली बोली, ‘‘हां बाबा, जा रही हूं. तुम्हारे साहब को खुश रखने की कोशिश करूंगी. और मैं भी उन से सिफारिश करूंगी कि वे तुझे परमानैंट कर दें,’’ कह कर रामकली साहब के बंगले पर चली गई. अभी हफ्ताभर भी नहीं बीता था कि जगदीश ने घर आ कर रामकली को बताया, ‘‘साहब ने काम से खुश हो कर मेरा परमानैंट नौकरी का और्डर निकाल दिया है. तनख्वाह भी बढ़ जाएगी.’’

‘‘क्या सचमुच तुझे परमानैंट कर दिया?’’ खुशी से उछलती रामकली ने पूछा.

‘‘हां रामकली, साहब कह रहे थे कि तू ने भी सिफारिश की थी,’’ जगदीश ने जब यह कहा, तब रामकली ने कोई जवाब नहीं दिया. वह जानती है कि साहब से उस के जिस्म के बदले यह वचन लिया था. उसी वचन को साहब ने पूरा किया, तभी तो इतनी जल्दी आदेश निकाल दिया. उसे चुप देख जगदीश फिर बोला, ‘‘अरे रामकली, तुझे खुशी नहीं हुई?’’

‘‘मुझे तो तुझ से ज्यादा खुशी हुई. मैं ने जोर दे कर साहब से कहा था,’’ रामकली बोली, ‘‘उन्होंने मेरे वचन को पूरा कर दिया.’’ ‘‘अब तुझे बरतन मांजने की जरूरत नहीं है. मैं साहब के लिए दूसरी औरत का इंतजाम करता हूं.’’ ‘‘नहीं जगदीश, जब तक ये साहब हैं, मैं बरतन मांजने जाऊंगी. मैं ने यही तो साहब से वादा किया है. चलती हूं साहब के यहां,’’ कह कर रामकली घर से बाहर चली गई.

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Family Story: टुकड़ों में बंटी जिंदगी- क्या थी पिता की गलती

Family Story: सुधा कसेरा मंदबुद्धि था. अपने मन के जज्बात व्यक्त करता भी कैसे जब समझ ही कुछ नहीं आता था. लोगों की तिरस्कृत नजरों को झेलता हुआ मैं अब बस दूसरे के हाथों की कठपुतली मात्र रह गया था… पिता की गलतियों के कारण ही मैं मंदबुद्धि बालक पैदा हुआ. जब मैं मां के गर्भ में था तो मेरी मां को भरपूर खाना नहीं मिलता था. उन को मेरे पिता यह कह कर मानसिक यंत्रणा देते थे कि उन की जन्मपत्री में लिखा है कि उन का पहला बच्चा नहीं बचेगा. वह बच्चा मैं हूं. जो 35 वर्षगांठ बिना किसी समारोह के मना चुका है.

पैदा होने के बाद मैं पीलिया रोग से ग्रसित था, लेकिन मेरा इलाज नहीं करवाया गया. मेरी मां बहुत ही सीधी थीं मेरे पापा उन को पैसे नहीं देते थे कि वे अपनी मरजी से मेरे लिए कुछ कर सकें. सबकुछ सहते हुए वे अंदर से घुटती रहती थीं. वह जमाना ही ऐसा था जब लड़कियां शादी के बाद अपनी ससुराल से अर्थी में ही निकलती थीं. मायके वाले साथ नहीं देते थे. मेरी नानी मेरी मां को दुखी देख कर परेशान रहती थीं. लेकिन परिवार के अन्य लोगों का सहयोग न मिलने के कारण कुछ नहीं कर पाईं. मैं 2 साल का हो गया था, लेकिन न बोलता था, न चलता था. बस, घुटनों चलता था.

मेरी मां पलपल मेरा ध्यान रखती थीं और हर समय मु झे गोदी में लिए रहती थीं. शायद वे जीवनभर का प्यार 2 साल में ही देना चाहती थीं. मेरे पैदा होने के बाद मेरे कार्यकलाप में प्रगति न देख कर वे बहुत अधिक मानसिक तनाव में रहने लगीं. जिस का परिणाम यह निकला कि वे ब्लडकैंसर जैसी घातक बीमारी के कारण 3 महीने में ही चल बसीं. लेकिन मैं मंदबुद्धि बालक और उम्र भी कम होने के कारण सम झ ही नहीं पाया अपने जीवन में आए इस भूचाल को. सूनी आंखों से मां को ढूंढ़ तो रहा था, लेकिन मु झे किसी से पूछने के लिए शब्दों का ज्ञान ही नहीं था.

मुझे अच्छी तरह याद है जब मेरी मां का क्रियाकर्म कर के मेरे मामा और नाना दिल्ली लौटे तो मु झे एक बार तो उन्होंने गोद में लिया, लेकिन मेरी कुछ भी प्रतिक्रिया न देख कर किसी ने भी मेरी परवाह नहीं की. बस, मेरी नानी ने मु झे अपने से बहुत देर तक चिपटाए रखा था. मेरे पापा तो एक बार भी मु झ से मिलने नहीं आए. मां ने अंतिम समय में मेरी जिम्मेदारी किसी को नहीं सौंपी. लेकिन मेरे नानानानी ने मु झे अपने पास रखने का निर्णय ले लिया. उन का कहना था कि मेरी मां की तरह मेरे पापा मु झे भी यंत्रणा दे कर मार डालेंगे. वे भूले नहीं थे कि मेरी मां ने उन को बताया था कि गलती से मेरी बांह पर गरम प्रैस नहीं गिरी थी, बल्कि मेरे पिता ने जानबू झ कर मेरी बांह पर रख दी थी, जिस का निशान आज तक मेरी बांह पर है. एक बार सीढ़ी से धकेलने का प्रयास भी किया था.

इस के पीछे उन की क्या मानसिकता थी, शायद वे जन्मपत्री की बात सत्य साबित कर के अपना अहं संतुष्ट करने की कोशिश कर रहे थे. वे मु झे कभी लेने भी नहीं आए. मां की मृत्यु के 3 महीने के बाद ही उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया. यह मेरे लिए विडंबना ही तो थी कि मु झे मेरी मां के स्थान पर दूसरी मां नहीं मिली, लेकिन मेरे पिता को दूसरी पत्नी मिलने में देर नहीं लगी. पिता के रहते हुए मैं अनाथ हो गया. मैं मंदबुद्धि था, इसलिए मेरे नानानानी ने मु झे पालने में बहुत शारीरिक, मानसिक व आर्थिक कष्ट सहे. शारीरिक इसलिए कि मंदबुद्धि होने के कारण 15 साल की उम्र तक लघु और दीर्घशंका का ज्ञान ही नहीं था, कपड़ों में ही अपनेआप हो जाता था और उन को नानी को साफ करना पड़ता था.

रात को बिस्तर गीला हो जाने पर नानी रात को उठ कर बिस्तर बदलती थीं. ढलती उम्र के कारण मेरे नानानानी शारीरिक व मानसिक रूप से बहुत कमजोर हो गए थे. लेकिन मोहवश वे मेरा बहुत ध्यान रखते थे. मैं स्कूल अकेला नहीं जा पाता था, इसलिए मेरे नाना मु झे स्कूलबस तक छोड़ने जाते थे. मु झे ऐसे स्कूल में भेजा जहां सभी बच्चे मेरे जैसे थे. उन्होंने मानसिक कष्ट सहे, इसलिए कि मेरे मंदबुद्धि होने के कारण नानानानी कहीं भी मु झे ले कर जाते तो लोग परिस्थितियों को नजरअंदाज करते हुए मेरे असामान्य व्यवहार को देख कर उन को ताने देते. उस से उन का मन बहुत व्यथित होता. फिर वे मु झे कहीं भी ले कर जाने में कतराने लगे. उन के अपने बच्चों ने भी मेरे कारण उन से बहुत दूरी बना ली थी.

कई रिश्तेदारों ने तो यहां तक भी कह दिया कि मु झे अनाथाश्रम में क्यों नहीं डाल देते? नानानानी को यह सुन कर बहुत दुख होता. कई बार कोई घर आता तो नानी गीले बिस्तर को जल्दी से ढक देतीं, जिस से उन की नकारात्मक प्रतिक्रिया का दंश उन को न झेलना पड़े. मैं शारीरिक रूप से बहुत तंदुरुस्त था. दिमाम का उपयोग न होने के कारण ताकत भी बहुत थी, अंदर ही अंदर अपनी कमी को सम झते हुए सारा आक्रोश अपनी नानी पर निकालता था. कभी उन के बाल खींचता कभी उन पर पानी डाल देता और कभी उन की गोदी में सिर पटक कर उन को तकलीफ पहुंचाता. मातापिता के न रहने से उन के अनुशासन के बिना मैं बहुत जिद्दी भी हो गया था. मैं ने अपनी नानी को बहुत दुख दिया.

लेकिन इस में मेरी कोई गलती नहीं थी क्योंकि मैं मंदबुद्धि बालक था. नानानानी ने आर्थिक कष्ट सहे, इस प्रकार कि मेरा सारा खर्च मेरे पैंशनधारी नाना पर आ गया था. कहीं से भी उन को सहयोग नहीं मिलता था. उन्होंने मेरा अच्छे से अच्छे डाक्टर से इलाज करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वैसे भी मु झे कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी. नानी मेरे भविष्य को ले कर बहुत चिंतित रहती थीं और मेरे कारण मानसिक आघात सहतेसहते थक कर असमय ही 65 वर्ष की उम्र में ही सदा के लिए विदा हो गईं. उस समय मेरी उम्र 18 वर्ष की रही होगी. अब तक मानसिक और शारीरिक रूप से मैं काफी ठीक हो गया था. अपने व्यक्तिगत कार्य करने के लिए आत्मनिर्भर हो गया था. लेकिन भावाभिव्यक्ति सही तरीके से सही भाषा में नहीं कर पाता था. टूटीफूटी और कई बार निरर्थक भाषा ही बोल पाता था.

मेरे जीवन की इस दूसरी त्रासदी को भी मैं नहीं सम झ पाया और न परिवार वालों के सामने अभिव्यक्त ही कर पाया, इसलिए नानी की मृत्यु पर आए परिवार के अन्य लोगों को मु झ से कोई सहानुभूति नहीं थी. वैसे भी, अभी नाना जिंदा थे मेरे पालनपोषण के लिए. औपचारिकता पूरी कर के सभी वापस लौट गए. नाना ने मु झे भरपूर प्यार दिया. उन के अन्य बच्चों के बच्चों को मु झ से ईर्ष्या भी होती थी कि उन के हिस्से का प्यार भी मु झे ही मिल रहा है. लेकिन उन के तो मातापिता भी थे, मैं तो अनाथ था. मेरी मंदबुद्धि के कारण यदि कोईर् मेरा मजाक उड़ाता तो नाना उन को खूब खरीखोटी सुनाते, लेकिन कब तक…? वे भी मु झे छोड़ कर दुनिया से विदा हो गए. उस समय मैं 28 साल का था, लेकिन परिस्थिति पर मेरी प्रतिक्रिया पहले जैसी थी. मेरा सबकुछ लुट चुका था और मैं रो भी नहीं पा रहा था. बस, एक एहसास था कि नाना अब इस दुनिया में नहीं हैं. इतनी मेरे अंदर बुद्धि नहीं थी कि मैं अपने भविष्य की चिंता कर सकूं. मु झे तो पैदा ही कई हाथों की कठपुतली बना कर किया गया था. लेकिन अभी तक मैं ऐसे हाथों के संरक्षण में था, जिन्होंने मु झे इस लायक बना दिया था

कि मैं शारीरिक रूप से बहुत सक्षम और किसी पर निर्भर नहीं था और कोई भी कार्य, जिस में बुद्धि की आवश्यकता नहीं हो, चुटकियों में कर देता था. वैसे भी, जो व्यक्ति दिमाग से काम नहीं करते, शारीरिक रूप से अधिक ताकत वाले होते हैं. मेरी मनोस्थिति बिलकुल 2 साल के बच्चे की तरह थी, जो उस के साथ क्या हो रहा है, उस के लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा है, सम झ ही नहीं पाता. लेकिन मेरी याद्दाश्त बहुत अच्छी थी. गाडि़यों के नंबर, फोन नंबर तथा किसी का घर किस स्थान पर है. मु झे कभी भूलता नहीं था. कहने पर मैं कोई भी शारीरिक कार्य कर सकता था, लेकिन अपने मन से कुछ नहीं कर पाता था. नाना की हालत गंभीर होने पर मैं ने अपने पड़ोस की एक आंटी के कहने पर अपनी मौसी को फोन से सूचना दी तो आननफानन मेरे 2 मामा और मौसी पहुंच गए और नाना को अस्पताल में भरती कर दिया. डाक्टरों ने देखते ही कह दिया कि उन का अंतिम समय आ गया है. उन के क्रियाकर्म हो जाने के बाद सब ने घर की अलमारियों का मुआयना करना शुरू किया. महत्त्वपूर्ण दस्तावेज निकाले गए. सब की नजर नाना के मकान पर थी. मैं मूकदर्शक बना सब देखता रहा. भरापूरा घर था. मकान भी मेरे नाना का था. मेरे एक मामा की नजर आते ही मेरे हृष्टपुष्ट शरीर पर टिक गई.

उन्होंने मेरी मंदबुद्धि का लाभ ले कर मु झे मेरे मनपसंद खाने की चीजें बाजार से मंगवा कर दीं और बारबार मु झे उन के साथ भोपाल जाने के लिए उकसाते रहे. मु झे याद नहीं आता कि कभी उन्होंने मेरे से सीधेमुंह से बात भी की हो. तब तो और भी हद हो गई थी जब एक बार मैं नानी के साथ भोपाल उन के घर गया था और मेरे असामान्य व्यवहार के लिए उन्होंने नानी को दोषी मानते हुए बहुत जलीकटी सुनाई. उन को मामा की बातों से बहुत आघात पहुंचा. जिस कारण नानी निश्चित समय से पहले ही दिल्ली लौट गई थीं. अब उन को अचानक इतना प्यार क्यों उमड़ रहा था. यह सोचने की बुद्धि मु झ में नहीं थी. इतना सहयोग यदि नानी को पहले मिलता तो शायद वे इतनी जल्दी मु झे छोड़ कर नहीं जातीं. पहली बार सब को यह विषय विचारणीय लगा कि अब मैं किस के साथ रहूंगा? नाना से संबंधित कार्यकलाप पूरा होने तक मेरे मामा ने मेरा इतना ब्रेनवौश कर दिया कि मैं कहां रहना चाहता हूं?

किसी के भी पूछने पर मैं झट से बोलता, ‘मैं भोपाल जाऊंगा,’ नाना के कई जानने वालों ने मामा को कटाक्ष भी किया कि कैसे सब खत्म हो जाने के बाद उन का आना हुआ. इस से पहले तो उन को वर्षों से कभी देखा नहीं. इतना सुनते ही ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ मुहावरे को सार्थक करते हुए वे उन पर खूब बरसे. परिणाम यह निकला कि बहुत सारे लोग नाना की तेरहवीं पर बिना खाए ही लौट गए. आखिरकार, मैं मामा के साथ भोपाल पहुंच गया. मेरी दाढ़ी और बाल बहुत बड़ेबड़े हो गए थे. सब से पहले मेरे मामा ने उन्हें संवारने के लिए मु झे सैलून भेजा, फिर मेरे लिए नए कपड़े खरीदे, जिन को पहन कर मेरा व्यक्तित्व ही बदल गया था. मेरे मामा की फैक्ट्री थी, जिस में मैं उन के बेटे के काम में हाथ बंटाने के लिए जाने लगा. जब मैं नानी के साथ एक बार यहां आया था, तब मु झे इस फैक्ट्री में घुसने की भी अनुमति नहीं थी. अब जबकि मैं शारीरिक श्रम करने के लायक हो गया तो उन के लिए मेरे माने ही बदल गए थे. धीरेधीरे मु झे सम झ में आने लगा कि उन का मु झे यहां लाने का उद्देश्य क्या था? मैं चुपचाप एक रोबोट की तरह सारा काम करता. मु झे अपनी इच्छा व्यक्त करने का तो कोई अधिकार ही नहीं था. दिल्ली के जिस मकान में मेरा बचपन गुजरा, उस में तो मैं कभी जा नहीं सकता था क्योंकि प्रौपर्टी के झगड़े के कारण उस में ताला लग गया था. और मैं भी मामा की प्रौपर्टीभर बन कर रह गया था, जिस में कोई बंटवारे का झं झट नहीं था. उन का ही एकछत्र राज्य था. मैं अपने मन से किसी के पास जा नहीं सकता था, न किसी को मु झे बुलाने का अधिकार ही था. मेरा जीवन टुकड़ों में बंट गया था.

मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं था. मैं अपना आक्रोश प्रकट भी करता तो किस के सामने करता. कोई नानानानी की तरह मेरी भावना को सम झने वाला ही नहीं था. मैं तो इस लायक भी नहीं था कि अपने पिता से पूछूं कि मेरे इस प्रकार के टुकड़ों में बंटी जिंदगी का उत्तरदायी कौन है? उन को क्या हक था मु झे पैदा करने का? मेरी मां अंतिम समय में, मेरे पिता की ओर इशारा कर के रोते हुए मामा से कह रही थीं, ‘इस ने मु झे बीमारी दी है, इस को मारो…’ लेकिन प्रतिक्रियास्वरूप किसी ने कुछ नहीं किया, करते तो तब जब उन को मेरी मां से प्यार होता. काश, मु झे इतनी बुद्धि होती कि मैं अपनी मां का बदला अपने पिता से लेता.

लेकिन काश ऐसा कोई होता जो मेरा बदला जरूर लेता. जिस के पास बुद्धि है. मेरी कथा को शब्दों का जामा पहनाने वाली को धन्यवाद, कम से कम उन को मु झ से कुछ सहानुभूति तो है, जिस के कारण मु झ मंदबुद्धि बालक, जिस को शब्दों में अभिव्यक्ति नहीं आती, की मूकभाषा तथा भावना को सम झ कर उस की आत्मकथा को कलमबद्ध कर के लोगों के सामने उजागर तो किया.

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Drama Story: चाहत- दहेज के लालच में जब रमण ने सुमन को खोया

Drama Story: सुबहसुबह औफिस में घुसते ही रमण ने चहकते हुए कहा कि आज शाम उस के घर में उस के बेटे की सगाई की रस्म पार्टी है. यह सुन कर मैं पसोपेश में पड़ गया कि अपनी पत्नी को साथ ले कर जाना ठीक रहेगा कि नहीं.

रमण हमारे इलाके का ही है. उस का गांव मेरे गांव से 3 किलोमीटर दूर है. इधर कई साल से हमारा मिलनाबोलना तकरीबन बंद ही था. अब मैं प्रमोशन ले कर उस के औफिस में उस के शहर में आ गया तो हमारे संबंध फिर से गहरे होने लगे थे. पिछले 20 सालों में हमारे बीच बात ही कुछ ऐसी हो गई थी कि हम एकदूसरे को अपना मुंह दिखाना नहीं चाहते थे.

रमण और मैं 10वीं क्लास तक एक ही स्कूल में पढ़े थे. यह तो लाजिम ही था कि हमें एक ही कालेज में दाखिला लेना था, क्योंकि 30 मील के दायरे में वहां कोई दूसरा कालेज तो था नहीं. हम दोनों रोजाना बस से शहर जाते थे.

रमण अघोषित रूप से हमारा रिंग लीडर था. वह हम से भी ज्यादा दिलेर, मुंहफट और जल्दी से गले पड़ने वाला लड़का था.

पढ़ाई में वह फिसड्डी था, पर शरीर हट्टाकट्टा था उस का, रंग बेहद गोरा.

बचपन से ही मुझे कहानीकविता लिखने का चसका लग गया था. मजे की बात यह थी कि जिस लड़की सुमन के प्रति मैं आकर्षित हुआ था, रमण भी उसी पर डोरे डालने लगा था. हमारी क्लास में सुमन सब से खूबसूरत लड़की थी.

हम लोग तो सारे पीरियड अटैंड करते, मगर रमण पर तो एक ही धुन सवार रहती कि किसी तरह जल्दी से कालेज की कोई लड़की पट जाए. अपनी क्लास की सुमन पर तो वह बुरी तरह फिदा था. खैर, हर वक्त पीछे पड़े रहने के चलते सुमन का मन किसी तरह पिघल ही गया था.

सुमन रमण के साथ कैफे जाने लगी थी. इस कच्ची उम्र में एक ही ललक होती है कि विपरीत लिंग से किसी तरह दोस्ती हो जाए. आशिकी के क्या माने होते हैं, इस की समझ कहां होती है. रमण में यह दीवानगी हद तक थी.

एक दिन लोकल अखबार में मेरी कहानी छपी. कालेज के इंगलिश के लैक्चरर सेठ सर ने सारी क्लास के सामने मुझे खड़ा कर के मेरी तारीफ की.

मैं तो सुमन की तरफ अपलक देख रहा था, वहीं सुमन भी मेरी तरफ ही देख रही थी. उस समय उस की आंखों में जो अद्भुत चमक थी, वह मैं कई दिनों तक भुला नहीं पाया था. पता नहीं क्यों उस लड़की पर मेरा दिल अटक गया था, जबकि मुझे पता था कि वह मेरे दोस्त रमण के साथ कैफे जाती है. रमण सब के सामने ये किस्से बढ़ाचढ़ा कर बताता रहता था.

सुमन से अकेले मिलने के कई और मौके भी मिले थे मुझे. कालेज के टूर के दौरान एक थिएटर देखने का मौका मिला था हमें. चांस की बात थी कि सुमन मेरे साथ वाली कुरसी पर थी. हाल में अंधेरा था. मैं ने हिम्मत कर के उस का हाथ अपने हाथ में ले लिया तो बड़ी देर तक उस का हाथ मेरे हाथ में रहा.

रमण से गहरी दोस्ती होने के बावजूद बरसों तक मैं ने रमण से सुमन के प्रति अपना प्यार छिपाए रखा. डर था कि क्या पता रमण क्या कर बैठे. कहीं कालेज आना न छोड़ दे. सुमन के मामले में वह बहुत संजीदा था.

एक दिन किसी बात पर रमण से मेरी तकरार हो गई. मैं ने कहा, ‘क्या हर वक्त ‘मेरी सुमन’, ‘मेरी सुमन’ की रट लगाता रहता है. यों ही तू इम्तिहान में कम नंबर लाता रहेगा तो वह किसी और के साथ चली जाएगी.’

रमण दहाड़ा, ‘मेरे सिवा वह किसी और के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती.’

मैं ने अनमना हो कर यों ही कह दिया, ‘कल मैं तेरे सामने सुमन के साथ इसी कैफे में इसी टेबल पर कौफी पीता मिलूंगा.’

हम दोनों में शर्त लग गई.

मैं रातभर सो नहीं पाया. सुमन ने अगर मेरे साथ चलने से मना कर दिया तो रमण के सामने मेरी किरकिरी होगी. मेरा दिल भी टूट जाएगा. मगर मुझे सुमन पर भरोसा था कि वह मेरा दिल रखेगी.

दूसरे दिन सुमन मुझे लाइब्रेरी से बाहर आती हुई अकेली मिल गई. मैं ने हिम्मत कर के उस से कहा कि आज मेरा उसे कौफी पिलाने का मन कर

रहा है.

मेरे उत्साह के आगे वह मना न कर सकी. वह मेरे साथ चल दी. थोड़ी देर बाद रमण भी वहां पहुंच गया. उस का चेहरा उतरा हुआ था. खैर, कुछ दिनों बाद वह बात आईगई हो गई.

सुमन और मेरे बीच कुछ है या हो सकता है, रमण ने इस बारे में कभी कल्पना भी नहीं की थी और उसे कभी इस बात की भनक तक नहीं लगी.

कालेज में छात्र यूनियन के चुनावों के दौरान खूब हुड़दंग हुआ. रमण ने चुनाव जीतने के लिए दिनरात एक कर दिया. वह तो चुनाव रणनीति बनाने में ही बिजी रहा. वह जीत भी गया.

चुनाव प्रचार के दौरान मुझे सुमन के साथ कुछ पल गुजारने का मौका मिला. न वह अपने दिल की बात कह पाई और नही मेरे मुंह से ऐसा कुछ निकला. दोनों सोचते रहे कि पहल कौन करे. जब कभी कहीं अकेले सुमन के साथ बैठने का मौका मिलता तो हम ज्यादातर खामोश ही बैठे रहते. एक दिन तो रमण ने कह ही दिया था कि तुम दोनों गूंगों की अपनी ही कोई भाषा है. सचमुच सच्चे प्यार में चुप रह कर ही दिल से सारी बातें करनी होती हैं.

मैं एमए की पढ़ाई करने के लिए यूनिवर्सिटी चला गया. रमण ने बीए कर के घर में खेती में ध्यान देना शुरू कर दिया. साथ में नौकरी के लिए तैयारी करता रहता. मैं महीनेभर बाद गांव आता तो फटाफट रमण से मिलने उस के गांव में चल देता. वह मुझे सुमन की खबरें देता.

रमण को जल्दी ही अस्थायी तौर पर सरकारी नौकरी मिल गई. सुमन भी वहीं थी. सुमन के पिता को हार्टअटैक हुआ था, इसीलिए सुमन को जौब की सख्त जरूरत थी. काफी अरसा हो गया था. सुमन से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई. मौका पा कर मैं उस के कसबे में चक्कर लगाता, उस कैफे में कई बार जाता, मगर मुझे सुमन का कोई अतापता न मिलता.

मेरी हालत उस बदकिस्मत मुसाफिर की तरह थी, जिस की बस उसे छोड़ कर चली गई थी और बस में उस का सामान भी रह गया था. संकोच के मारे मैं रमण से सुमन के बारे में ज्यादा पूछताछ नहीं कर सकता था. रमण के आगे मैं गिड़गिड़ाना नहीं चाहता था. मुझे उम्मीद थी कि अगर मेरा प्यार सच्चा हुआ तो सुमन मुझे जरूर मिलेगी. सुमन को तो उस की जौब में पक्का कर दिया गया. उस में काम के प्रति लगन थी. रमण को 6 महीने बाद निकाल दिया गया.

रमण को जब नौकरी से निकाला गया, तब वह जिंदगी और सुमन के बारे में संजीदा हुआ. उस के इस जुनून से मैं एक बार तो घबरा गया. अब तक वह सुमन को शर्तिया तौर पर अपना मानता था, मगर अब उसे लगने लगा था कि अगर उसे ढंग की नौकरी नहीं मिली तो सुमन भी उसे नहीं मिलेगी.

इसी दौरान मैं ने सुमन से उस के औफिस जा कर मिलना शुरू कर दिया था. मैं उसे साहित्य के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियां बताता. उसे खास पत्रिकाओं में छपी अपनी रोमांटिक कविताएं दिखाता.

रमण ने सुमन को बहुत ही गंभीरता से लेना शुरू कर दिया था. रमण मुझे कई कहानियां सुनाता कि आज उस ने सुमन के साथ फलां होटल में लंच किया और आज वे किसी दूसरे शहर घूमने गए. सुमन के साथ अपने अंतरंग पलों का बखान वह मजे ले कर करता.

पहले रमण का सुमन के प्रति लापरवाही वाला रुख मुझे आश्वस्त कर देता था कि सुमन मुझे भी चाहती है, मगर अब रमण सच में सुमन से प्यार करने लगा था. ऐसे में मेरी उलझनें बढ़ने लगी थीं.

फिर एक अनुभाग में मुझे और रमण को नियुक्ति मिली. रमण खुश था कि अब वह सुमन को प्रपोज करेगा तो वह न नहीं कहेगी. मैं चुप रहता. मैं सोचने लगा कि अब अगर कुछ उलटफेर हो तभी मेरी और सुमन में नजदीकियां बढ़ सकती हैं. हमारा औफिस सभी विभागों के बिल पास करता था. यहां प्रमोशन के चांस बहुत थे. मैं विभागीय परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया.

एक दिन मैं और रमण साथ बैठे थे, तभी अंदर से रमण के लिए बुलावा आ गया. 5 मिनट बाद रमण मुसकराता हुआ बाहर आया. उस ने मुझे अंदर जाने को कहा. अंदर जिला शिक्षा अधिकारी बैठे थे. वे मुझे अच्छी तरह से जानते थे. मेरे बौस ने ही सारी बात बताई, ‘बेटा, वैसे तो मुझे यह बात सीधे तौर पर तुम से नहीं करनी चाहिए. कौशल साहब को तो आप जानते ही हैं. मैं इन से कह बैठा कि हमारे औफिस में 2 लड़कों ने जौइन किया है. इन की बेटी बहुत सुंदर और होनहार है. ये करोड़पति हैं. बहुत जमीन है इन की शहर के साथ.

‘ये चाहते हैं कि तुम इन की बेटी को देख लो, पसंद कर लो और अपने घर वालों से सलाह कर लो. ‘रमण से भी पूछा था, मगर उस ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया. अब तुम्हें मौका मिल रहा है.’ रमण से मैं हर बार उन्नीस ही पड़ता था. बारबार कुदरत हमारा मुकाबला करवा रही थी. एक तरफ सुमन थी और दूसरी तरफ करोड़ों की जायदाद. घरजमाई बनने के लिए मैं तैयार नहीं था और सुमन से इतने सालों से किया गया प्रेम…

फिर पता चला कि शिक्षा अधिकारी ने रमण के मांबाप को राजी कर लिया है. रमण ने अपना रास्ता चुन लिया था. सुमन से सारे कसमेवादे तोड़ कर वह अपने अमीर ससुराल चला गया था. मैं प्रमोशन पा कर दिल्ली चला गया था. सुमन का रमण के प्रति मोह भंग हो गया था. सुमन ने एक दूसरी नौकरी ले ली थी और 2 साल तक मुझे उस का कोई अतापता नहीं मिला.

बहन की शादी के बाद मैं भी अखबारों में अपनी शादी के लिए इश्तिहार देने लगा था. सुमन को मैं ने बहुत ढूंढ़ा. इस के लिए मैं ने करोड़पति भावी ससुर का औफर ठुकरा दिया था. वह सुमन भी अब न जाने कहां गुम हो गई थी. उस ने मुझे हमेशा सस्पैंस में ही रखा. मैं ने कभी उसे साफसाफ नहीं कहा कि मैं क्या चाहता हूं और वह पगली मेरे प्यार की शिद्दत नहीं जान पाई.

अखबारों के इश्तिहार के जवाब में मुझे एक दिन सुमन की मां द्वारा भेजा हुआ सुमन का फोटो और बायोडाटा मिला. मैं तो निहाल हो गया. मुझे लगा कि मुझे खोई हुई मंजिल मिल गई है. मैं तो सरपट भागा. मेरे घर वाले हैरान थे कि कहां तो मैं लड़कियों में इतने नुक्स निकालता था और अब इस लड़की के पीछे दीवाना हो गया हूं.

शादी के बाद भी लोग पूछते रहते थे कि क्या तुम्हारी शादी लव मैरिज थी या अरैंज्ड तो मैं ठीक से जवाब नहीं दे पाता था. मैं तो मुसकरा कर कहता था कि सुमन से ही पूछ लो.

सुमन से शादी के बाद रमण के बारे में मैं ने कभी उस से कोई बात नहीं की. सुमन ने भी कभी भूले से रमण का नाम नहीं लिया.

वैसे, रमण सुंदर और स्मार्ट था. सुमन कुछ देर के लिए उस के जिस्मानी खिंचाव में बंध गई थी. रमण ने उस के मन को कभी नहीं छुआ.

जब रमण ने सुमन को बताया होगा कि उस के मांबाप उस की सुमन से शादी के लिए राजी नहीं हो रहे हैं तो सुमन ने कैसे रिएक्ट किया होगा.

रमण ने यह तो शायद नहीं बताया होगा कि करोड़पति बाप की एकलौती बेटी से शादी करने के लिए वह सुमन को ठुकरा रहा है. मगर जिस लहजे में रमण ने बात की होगी, सुमन सबकुछ समझ गई होगी. तभी तो वह दूसरी नौकरी के बहाने गायब हो गई.

इन 2 सालों में सुमन ने मेरे और रमण के बारे में कितना सोचाविचारा होगा. रमण से हर लिहाज में मैं पहले रैंक पर रहा, मगर सुंदरता में वह मुझ से आगे था.

आज रमण के बेटे की सगाई का समाचार पा कर मैं सोच में था कि रमण के घर जाएं या नहीं.

सुमन ने सुना तो जाने में कोई खास दिलचस्पी भी नहीं दिखाई. उसे यकीन था कि अब रमण का सामना करने में उसे कोई झेंप या असहजता नहीं होगी. इतने सालों से रमण अपने ससुराल में ही रह रहा था. सासससुर मर चुके थे. इतनी लंबीचौड़ी जमीन शहर के साथ ही जुट गई थी. खुले खेतों के बीच रमण की आलीशान कोठी थी. खुली छत पर पार्टी चल रही थी.

रमण ने सुमन को देख कर भी अनदेखा कर दिया. एक औपचारिक सी नमस्ते हुई. अब मैं रमण का बौस था, रमण के बेटे और होने वाली बहू को पूरे औफिस की तरफ से उपहार मैं ने सुमन के हाथों ही दिलवाया.

पहली बार रमण ने हमें हैरानी से देखा था, जब मैं और सुमन उस के घर के बाहर कार से साथसाथ उतरे थे. वह समझ गया था कि हम मियांबीवी हैं.

दूर तक फैले खेतों को देख कर मेरे मन में आया कि ये सब मेरे हो सकते थे, अगर उस दिन मैं जिला शिक्षा अधिकारी की बात मान लेता.

उस शाम सारी महफिल में सुमन सब से ज्यादा खूबसूरत लग रही थी. शायद उसे देख कर रमण के मन में भी आया होगा कि अगर वह दहेज के लालच में न पड़ता तो सुमन उस की हो सकती थी. चलो, जिस की जो चाहत थी, उसे मिल गई थी.

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Pyaar Ki Kahani: प्यार ही प्यार बेशुमार

Pyaar Ki Kahani:  रात को खाना खा कर टहल रही थी. तभी पार्किंग एरिया से मुझे कुछ किशोर बच्चों के हंसने, फुसफुसाने और खिलखिलाने की आवाजें सुनाई दीं.

पलट कर देखा तो एक किशोर वय का लड़का और 2 किशोरियां आपस में सटे हुए बैठे थे और एकदूसरे से इतना खुश हो कर बातें कर रहे थे कि उन्हें अपने आसपास का कोई भान तक नहीं था. उन्हें देख कर मेरे अधरों पर भी एक प्यारी सी मुसकान तैर गई. किशोर वय के प्यार को सिर्फ वही समझ सकता है जिस ने किशोरावस्था में किसी से प्यार किया हो, निस्स्वार्थ प्यार के उन लमहों के एहसास को महसूस किया हो. खैर, उन बच्चों की तरफ ज्यादा ध्यान न देते हुए मैं मुसकराते हुए यों ही आगे बढ़ गई. इस उम्र का प्यार तो इस तरह छिपछिप कर ही किया जाता है क्योंकि घर वाले अगर देख लें तो मानो कयामत ही आ जाए.

‘‘पढ़ाई में ध्यान लगाओ, आजकल बहुत उड़ने लगे हो, अभी जीवन बनाने की उम्र है और तुम हो कि मौजमस्ती में लगे हो,’’ जैसे लैक्चर से मानो जिंदगी की सारी रूमानियत ही खत्म कर देंगे. अपने 4 राउंड लगा कर मैं ऊपर आ गई और टीवी खोल कर बैठ गई. सामने भले ही मेरा पसंदीदा शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ चल रहा था पर मेरे कानों में अभी भी उन बच्चों की खुशी की खनक ही गूंज रही थी. मैं भी तो कितनी खुश थी जब ऋषि से पहली बार मिली थी. ऋषि मेरी ही सोसाइटी के एबी ब्लौक में रहता था और मैं आई ब्लौक में. मेरे पापा बैंक में थे और उस के पापा कोई सरकारी अधिकारी थे.

हम लोग हाल ही में भोपाल की पौश कालोनी मानी जाने वाली विराशा हाइट्स सोसाइटी में शिफ्ट हुए थे. दिल्ली पब्लिक स्कूल में मेरा वह पहला दिन था जब मैं छुट्टी के समय स्कूल बस से उतरी तो वह भी मेरे साथ ही उतरा था. उसे देख कर जितना मैं चौंकी थी उस से कहीं ज्यादा वह चौंक गया था क्योंकि क्लास में आज सुबह ही हम दोनों ने पहली बार ही एकदूसरे को देखा था. ‘‘ओह तो तुम यहां रहती हो. कौन से ब्लौक में? नए आए हो क्या?’’ आश्चर्यमिश्रित विस्फारित नेत्रों के साथ इतने सारे प्रश्न उसने दाग दिए थे. ‘‘हां लास्ट वीक ही मेरे पापा बढ़ोदरा से ट्रांसफर हो कर आए हैं. आई एम इन आई ब्लौक ऐंड यू?’’ मैं ने भी हौले से कुछ शरमातेसकुचाते हुए उस से पूछा. ‘‘वैल… मतलब वी आर क्लासमेट ऐंड सोसाइटीमेट. आई एम इन एबी ब्लौक,’’ हंसते हुए उस ने कहा और उस के बाद तो हमारी दोस्ती इतनी बढ़ गई कि एक दिन भी मेरी उस से बात न हो तो मैं बेचैन हो उठती. स्कूल जाने से हमेशा कतराने वाली मैं अब एक दिन भी स्कूल मिस नहीं करना चाहती थी.

मेरी इस रैग्युलैरिटी को देख कर मम्मी ही नहीं पापा भी हैरान थे. अकसर हम दोनों स्कूल में एक पेड़ की छांव में इस तरह बैठते कि हमें कोई देख न पाए. कई बार तो हमारे पीरियड्स भी मिस हो जाते. स्कूल से आने के बाद भी मोबाइल पर हम घंटों टैक्स्टिंग करते रहते. एक दिन स्कूल में रिसैस के समय उस ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘कल शाम को क्यों नहीं आई नीचे? मैं ने पार्किंग में कितना तेरा इंतजार किया था. और तो और मैसेज का जवाब भी नहीं दे रही थी तू, ऐसी कहां बिजी थी? पता है कल मेरा बिलकुल मन नहीं लगा पढ़ने में.

अब देख लेना यदि मेरे नंबर टैस्ट में कम आए तो उस की जिम्मेदार तू होगी.’’ ‘‘अरे वाह पढ़ेगा तू नहीं और नंबर मेरे कारण कम आएंगे,’’ मैं ने भी इठलाते हुए कहा, ‘‘कल थोड़ी प्रौब्लम थी कुछ गैस्ट आ गए थे पर आज शाम को 8 बजे पार्किंग में आती हूं,’’ कह कर हम दोनों क्लास में आ गए. उन दिनों मैं हरदम अपनेआप को सुंदर दिखाने की कोशिश करती. हमेशा खुद के प्रति लापरवाह रहने वाली मैं अब अपने ऊपर कुछ ज्यादा ध्यान देने लगी थी. घंटों मिरर के सामने खड़ी रहती.

मेरे इस तरह के व्यवहार को देख कर अकसर मम्मी टोकती थीं, ‘‘यह क्या दिनभर शीशे के सामने खड़ी हो कर दुनियाभर की क्रीम पोतती रहती हो.’’ ‘‘अरे मम्मी आप नहीं समझगी,’’ कह कर मैं मम्मी को चुप करा दिया करती थी. हां इस सब के बीच भी मेरे नंबर हमेशा अच्छे आते थे इसलिए मम्मीपापा ज्यादा रोकाटोकी नहीं करते थे. गरमियों की छुट्टियां हो गई थीं और अब हमारे वारेन्यारे थे. हालांकि हम दोनों ही जेईई की तैयारी कर रहे थे पर मस्ती और प्यार भी बराबर था.

हम दोनों ही एकदूसरे को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते रहते थे. जेईई का जब रिजल्ट आया तो उसे कानपुर आईआईटी मिला और मैं ने दिल्ली के जेपी कालेज में एडमिशन लिया था. इस के बाद हम दोनों ही अपनीअपनी जिंदगी में इस कदर उलझ गए थे कि कभीकभार ही मिल पाए. किशोरावस्था का प्यार यों भी कोई स्थाई तो होता नहीं महज उम्र का आकर्षण था सो न जाने कहां गुम हो गया था पर हां यह अवश्य कहूंगी कि वह मेरा पहला प्यार, मेरा पहला क्रश था जिसे मैं ने दिल से चाहा था.

सोचतेसोचते मुझे पिछले हफ्ते की वह फोन काल याद आ गई जिसे उठाते ही मेरे गाल सुर्ख हो गए, मुंह के शब्द मुंह में ही अटक गए और दिमाग एकदम इतना सुन्न हो गया था कि मैं कुछ क्षणों तक नि:शब्द हो गई, जब सामने वाले ने फिर से अपने शब्द दोहराए तो मेरी चेतना लौटी, ‘‘हैलो कैन आई स्पीक टु नैना?’’ ‘‘हैलो आई एम स्पीकिंग, हू आर यू, ऐंड टू हूम यू वांट टू स्पीक?’’ ‘‘अरे नैना मैं ऋषि, ऋषि तुम्हारा सोसाइटीमेट, क्लास मेट भूल गईं क्या?’’ ‘‘ओह ऋषि अरे तुम कहां से बोल रहे हो? इतने सालों बाद तुम्हारी आवाज सुनना एकदम अनऐक्सपैक्टेड था सो समझ ही नहीं पाई.’’ ‘‘मेरी यहीं दिल्ली में पोस्टिंग हो गई है. तुम्हारा नंबर सेव था सो लगा कर देखा तो लग गया. बताओ कब मिल रही हो? मैं मिलना चाहता हूं.

ढेर सारी बातें करनी हैं तुझ से.’’ ‘‘इस वीकैंड तो मैं भोपाल जा रही हूं नैक्स्ट वीकैंड पर मिलते हैं.’’ ‘‘ओके डन. आई विल काल यू नैक्स्ट मंडे,’’ कह कर ऋषि ने फोन रख दिया. औफिस का काम खत्म कर के मैं ने मयूर विहार से मैट्रो पकड़ी और अपनी सीट पर आ कर बैठ गई. ऋषि इसी शहर में है, कितना बदल गया होगा, कैसी होगी उस की फैमिली. यही सोचतेसोचते मेरा लक्ष्मी नगर स्टेशन भी आ गया. घर आ कर मैं ने एक अच्छी अदरक वाली चाय बनाई और 2 ब्रैडस्लाइस ले कर बालकनी में आ कर बैठ गई.

मुझे ऋषि से अपनी कालोनी की अंतिम मुलाकात याद आ गई. हम ने तो विराशा हाइट्स में परमानैंट घर खरीद लिया था पर ऋषि एक किराएदार था. चूंकि वे लोग लखनऊ के रहने वाले थे इसलिए जब उस का एडमिशन कानपुर हुआ था तभी उस के पापा ने भी अपना ट्रांसफर कानपुर करवा लिया था. जिस दिन उस का सामान ट्रक में लोड हो रहा था तब उस ने मुझे टैक्स्ट किया, ‘‘मैं एक घंटे में जा रहा हूं तू मिलने नहीं आएगी?’’ सच कहूं तो मुझे खुद बहुत बुरा लग रहा था. जैसे ही उस का मैसेज देखा मैं ने मम्मी से एक फ्रैंड से मिलने का बहाना किया और जा पहुंची पार्किंग में जहां वह पहले से मेरा इंतजार कर रहा था. मुझे देखते ही उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘तू भूल तो नहीं जाएगी न? मुझे तेरी बहुत याद आएगी.’’ मैं कुछ बोल नहीं पाई क्योंकि अगर बोलती तो रुलाई फूट जाती सो बस न की मुद्रा में सिर हिला दिया था.

उस के बाद मेरे हाथों को हौले से दबा कर वह चुपचाप चला गया था. आज उस की आवाज सुन कर फिर से वही पवित्र और मासूम प्यार को महसूस कर मैं रोमांचित हो उठी थी. हालांकि जाने के बाद 1-2 बार ही उस का काल आया था फिर मैं भी अपनी जिंदगी की पेचीदगियों में इस कदर उलझ कि ऋषि को तो मानो भूल ही गई थी. कालेज होतेहोते मेरा प्लेसमैंट एक सौफ्टवेयर कंपनी में हो गया था भले ही पैकेज तो बहुत अच्छा नहीं था परंतु जौब लग गई इस से मैं बहुत खुश थी. चूंकि मेरे भाई की शादी पहले ही हो चुकी थी इसलिए मातापिता ने अब मेरे ऊपर शादी के लिए प्रैशर बनाना प्रारंभ कर दिया था.

मेरी एक भाभी ने शादी डौट कौम से आरुष का रिश्ता पापा को बताया जो पापा को बहुत पसंद आ गया. आरुष पुणे में एक सौफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर था. अपने मातापिता की इकलौती संतान आरुष देखने में बहुत खूबसूरत और लंबी कदकाठी का था. आरुष मूलत: अहमदाबाद का रहने वाला था. उस के पापा की अपनी गारमैंट फैक्टरी थी. फोन से आवश्यक बातचीत के बाद पापा आरुष के घर अहमदाबाद भी हो कर आए थे. कुल मिला कर पापा को आरुष और उस का परिवार जंच गया था.

शुभ मुहूर्त में हम दोनों की गोदभराई की रस्म कर दी गई थी ताकि दोनों ही पक्ष रिश्ता पक्का समझें. शादी का मुहूर्त 3 माह बाद 11 दिसंबर का निकला था. हम दोनों भी अकसर फोन पर बातचीत करते रहते थे. शादी के लिए भोपाल का पलाश होटल बुक कर लिया गया था. शादी की तैयारियां अपने जोरों पर चल रही थीं कि एक दिन पापा अपने औफिस के काम से पुणे गए थे.

पापा बहुत खुश थे कि वे अपने दामाद आरुष से मिल कर आएंगे पर जब पापा वापस आए तो आते ही सब से पहले उन्होंने पलाश होटल में फोन लगाया और बुकिंग कैंसल कर दी. जब मम्मी ने इस बावत उन से बात की तो वे क्रोध और आवेश से बोले, ‘‘सुधी, हमारी बेटी बच गई. अगर यह शादी हो जाती तो हमारी बेटी की जिंदगी बरबाद हो जाती.’’ ‘‘हुआ क्या है कुछ बोलोगे भी या यों ही पहेलियां बुझते रहोगे?’’ मम्मी ने रोंआसे स्वर में कहा. ‘‘चूंकि मेरी कल रात की ट्रेन थी, शनिवार था और आरुष घर पर होगा इसलिए मैं ने बाजार से कुछ गिफ्ट वगैरह खरीदे और आरुष के फ्लैट पर लगभग सुबह 10 बजे पहुंचा. बड़ी मुश्किल से 15 मिनट के बाद तो दरवाजा खुला.

फिर जब मैं अंदर पहुंचा तो वहां का नजारा देख कर घबरा गया क्योंकि पूरे फ्लैट में जगहजगह शराब की बोतलें, जूठी प्लेटें और गिलास बिखरे पड़े थे और आरुष खुद बदहवास सा नजरें चुराता हुआ खड़ा था. मुझे अचानक अपने सामने देखने की तो उसे दूरदूर तक कोई उम्मीद नहीं थी. मेरी क्रोध से भरी नजरें देख कर वह घबरा गया और लगभग मिमियाते हुए बोला कि अंकल वह कल एक दोस्त का बर्थडे था इसलिए… उस घर और उस की दशा देख कर उस से बात करने का भी मन नहीं हुआ और मैं उलटे कदमों से वापस आ गया. उसी क्षण मैं ने तय कर लिया कि अब यह रिश्ता नहीं होगा.’’ ‘‘पर अब तो शादी में सिर्फ 1 महीना ही बचा है? अगले महीने आज ही के दिन तो शादी है. समाज में बदनामी होगी सो अलग. सारी तैयारियों में पैसा लग चुका है. उफ, यह क्या हो गया,’’ कह कर मम्मी ने रोना शुरू कर दिया.

फिर पापा ने मम्मी के कंधों पर अपने मजबूत हाथ रखें और बोले, ‘‘कौन से समाज की बात कर रही हो मैं अपनी बेटी की चिंता करूंगा कि समाज की? जो लड़का आज अपने दोस्त के बर्थडे पर शराब पी कर जश्न मना रहा है वह अपनी जिंदगी के खास अवसरों पर क्या करेगा और जिसे आज पीने की आदत है वह कल नहीं पीएगा इस बात की क्या गारंटी है? मैं अपनी बेटी की जिंदगी के साथ कोई खिलवाड़ नहीं कर सकता,’’ कह कर पापा ने मम्मी को चुप करा दिया.

इस के बाद आरुष और उस के मम्मीपापा ने लाख दुहाई दी कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा पर पापा नहीं पिघले और इस तरह मेरी जिंदगी से उस समय शादी का चैप्टर एक तरह से क्लोज हो गया था. अब इस घटना को 3 साल हो गए थे और मेरी उम्र भी 30 साल हो चुकी थी. उस घटना के बाद तो मुझे शादी शब्द से ही डर लगने लगा था. पुरानी बातें सोचतेसोचते मैं समय तो लगभग भूल ही गई. मोबाइल में टाइम देखा तो 9 बज चुके थे. जल्दी से दलिया बना कर खाया और जरूरी काम निबटा कर मैं बिस्तर पर आ कर लेट गई. कल सुबह शताब्दी ऐक्सप्रैस से भोपाल जाना था सो पैकिंग भी कर के रख दी.

चूंकि भैया विवाह के बाद यूएस में सैटल हो गया था इसलिए मम्मीपापा की जिम्मेदारी मैं ने अपने सिर पर ले रखी थी. यों तो दोनों स्वस्थ थे, अकेले रह भी लेते थे पर मेरी शादी की चिंता उन्हें चैन से सोने नहीं देती थी. अकसर इस बात पर हमारी बहस हो जाती थी. इस बार जैसे ही सोसाइटी में मेरी टैक्सी ने प्रवेश किया तो मुझे ऋषि की याद आ गई. इसी गेट पर मेरी और उस की पहली मुलाकात हुई थी.

2 दिन घर पर रुक कर जब मैं वापस दिल्ली आई तो इस बार कुछ नया जोश था क्योंकि मैं अपने बचपन के दोस्त ऋषि से मिलने वाली थी. सोमवार की सुबह जैसे ही मैं अपने कैबिन में आ कर लैपटौप को खोलने लगी कि तभी ऋषि की काल आ गई, ‘‘तो आज शाम का प्रोग्राम पक्का. बताओ कितने बजे मिलोगी?’’ ‘‘औफिस के बाद शाम 7 बजे, यहीं मेरे औफिस के पास ही इंडियन कौफी हाउस है.

मैं लोकेशन भेजती हूं.’’ शाम को 7 बजतेबजते ऋषि मेरे कैबिन के बाहर आ कर ही खड़ा हो गया. उसे देख कर मैं चौंक गई, वही कदकाठी, बस शरीर थोड़ा सा भर गया था और आंखों पर चश्मा चढ़ गया था. सच कहूं तो पहले से ज्यादा स्मार्ट लग रहा था मुझे. बाहर आ कर जैसे ही इंडियन कौफी हाउस में आ कर बैठी तो अचानक से वह बोला, ‘‘इतने सालों में तुम बिलकुल नहीं बदलीं. खातीपीती नहीं हो क्या? देखो कैसी कांटे जैसी हो रखी हो या करीना कपूर वाला जीरो फिगर मैंटेंन किया हुआ है.’’ ‘‘अरे नहीं बाबा कोई जीरो फिगर नहीं बनाया है. मैं तो शुरू से ही ऐसी हूं.

तुम बताओ क्या हाल हैं? परिवार में सब कैसे हैं? तुम तो आस्ट्रेलिया चले गए थे न? फिर यहां कैसे आ गए?’’ मैं ने पूछा. तब वह एक लंबी सांस ले कर बोला, ‘‘हां तुम बिलकुल सही कह रही हो मेरा तो प्लेसमैंट ही आस्ट्रेलिया की एक कंपनी में अच्छे पैकेज पर हुआ था. मैं ने 4 साल वहां जौब भी की पर यहां मांपापा बिलकुल अकेले थे. पापा बीमार रहने लगे थे. मम्मी अकेली परेशान हो रही थीं तो अभी कुछ समय पहले मैं ने यहां इंडिया में जौइन कर लिया. पहले कुछ समय बैंगलुरु रहा फिर 6 महीने पहले दिल्ली में एक नई कंपनी जौइन कर ली है. बैंगलुरु से लखनऊ बहुत दूर पड़ता था.

अब दिल्ली से ठीक रहता है लगभग 15 दिन में एक बार मैं लखनऊ चला जाता हूं. इस से मम्मीपापा को काफी मौरल सपोर्ट रहती है.’’ ‘‘और तूने शादी नहीं की क्या?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा. ‘‘अरे छोड़ न इस सब को क्या करेगी जान कर. तू अपने परिवार के बारे में बता?’’ ‘‘क्या बताऊं तेरी ही तरह मेरे मम्मीपापा भी अकेले हैं. भैया यूएस में सैटल हो गया है. तेरी ही तरह लगभग 15 दिनों में एक बार मैं भी भोपाल का चक्कर लगाती हूं. शादी होतेहोते रह गई पर अच्छा ही हुआ जो नहीं हुई वरना आज पता नहीं तेरे सामने मैं होती भी या नहीं,’’ कहते हुए मैं ने उसे सारी कहानी कह सुनाई.

मेरी पूरी बात सुन कर वह बोला, ‘‘नैना, शराब एक ऐसा नशा है जो यदि एक बार लग जाए तो कब आप को अपनी गिरफ्त में ले लेगा आप को खुद पता नहीं चलता. मैं अंकल की तारीफ करूंगा जो उन्होंने अपनी बेटी के फेवर में इतना बड़ा स्टैप उठाया. आजकल का समय इतना खराब है कि भले ही आप ने किसी भी तरह से शादी तय की हो परंतु इस तरह की औचक विजिट करनी ही चाहिए ताकि सचाई पता चल सके.’’ ‘‘तू बता तूने क्यों नहीं की शादी?’’ ‘‘सारी बातें आज ही जानेगी या अगली बार के लिए भी कुछ छोड़ेगी? अभी वैसे ही 10 बज गए हैं बातों में टाइम का पता ही नहीं चला.

चल कल फिर से मिलें?’’ कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ. घर आ कर मैं फिर से पुरानी बातों, पुरानी यादों में ही खोई रही. तभी मम्मी का फोन आ गया. मैं ने ऋषि से हुई मुलाकात के बारे में जैसे ही मम्मी को बताया वे छूटते ही बोलीं, ‘‘उस की शादी हो गई?’’ ‘‘मां तुम कब सुधरोगी, क्यों पूछूं मैं उस से उस की शादी के बारे में,’’ मैं ने कुछ झंझलाते हुए कहा. ‘‘नहीं हुई हो तो अपने लिए सोच सकती है न. बेटा हमारे जीतेजी तू सैटल हो जाए तो हम भी चैन से ऊपर जा पाएंगे,’’ मम्मी कुछ उदास से स्वर में बोलीं. ‘‘मां यही तो समस्या है कि आप लोग बेटी की शादी होने को ही सैटल होना कहते हो. मैं इतना अच्छा कमा रही हूं. अपने पैरों पर खड़ी हूं, आप की देखभाल में कोई कसर नहीं रख रही, यह सैटल होना नहीं है क्या? शादी आजकल जरूरी नहीं है. अब आज के बाद आप शादीशादी की रट लगाना बंद कर दो.’’

अगले दिन 7 बजे हम दोनों फिर इंडियन कैफे हाउस में बैठे थे. कौफी और डोसा का और्डर दे कर ऋषि बिना किसी लागलपेट के बोला, ‘‘तुम तो शादी की बरबादी से बच गईं परंतु मैं तो ऐसा फंसा कि अभी 6 महीने पहले ही मुक्त हुआ हूं. मेरी शादी 4 साल पहले यानी मेरी नौकरी लगने के 6 माह बाद ही मेरी दूर के रिश्ते की मामी की भतीजी से तय हुई थी. चूंकि नातेरिश्तेदारी थी सो मम्मीपापा और मैं किसी भी तरह की धोखाधड़ी होने से आश्वस्त थे. लड़की यानी रितु देखने में बहुत खूबसूरत और इकहरे बदन वाली थी. चूंकि वह भी एमबीए थी इसलिए मैं ने सोचा कि इसे भी आस्ट्रेलिया में ही नौकरी जौइन करवा दूंगा ताकि घर में अकेली बोर न हो. शादी के बाद तुरंत ही हम लोग आस्ट्रेलिया चले गए. वह भी बहुत खुश थी क्योंकि यह उस की पहली विदेश यात्रा थी.

‘‘आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में मेरी पोस्टिंग थी. सिडनी न्यू साउथ वेल्स की राजधानी है और बहुत खूबसूरत शहर है. यहां का ओपेरा हाउस, हार्बर ब्रिज, रायल बोटेनिकल गार्डन, टारोंग ब्रिज जैसी अनोखी वास्तुकलाओं के लिए जाना जाता है. हम जैसे ही अपने घर में पहुंचे तो रितु बहुत खुश हुई पर जब मैं ने उसे रात में स्पर्श करने की कोशिश की तो वह बोली कि ऋषि, आज नहीं कल. आज जरा भी मन नहीं है. मैं ने इसे बहुत साधारण तरीके से लिया. वह हर समय फोन पर बिजी रहती थी. जब भी मैं कहता कि दिनभर तुम फोन पर क्या करती हो तो उस का जबाब होता कि तुम तो चले जाते हो तो मैं क्या करूं. इसलिए कुछ फ्रैंड्स बना लिए हैं. उन से बात करती हूं तो टाइम कट जाता है.

‘‘तुम तो एमबीए हो, यहां का कोई कोर्स कर लो और जौब जौइन कर लो तो तुम्हारा टाइम भी आराम से कटेगा. इस तरह दिनभर फोन में लगी रहोगी तो बोरियत तो होगी ही. मोबाइल का क्या है तुम पूरे दिन स्क्रौल करती रहो टाइम वेस्ट होगा और हाथ कुछ नहीं लगेगा. ‘‘अब तक हमारे विवाह को लगभग 1 साल होने को आया था और तुम आश्चर्य करोगी कि इतने दिनों में बमुश्किल 3 से 4 बार ही हम दोनों पास आए होंगे. खैर, मैं ने थोड़ा और समय अपने रिश्ते को देने का निर्णय किया और उस का जरमन लैंग्वेज सीखने के लिए एडमिशन करवा दिया पर जो मैं ने सोचा हुआ बिलकुल उस का उलटा. हर सुबह तैयार होती और निकल जाती.

यही नहीं कईकई बार तो रात को भी घर नहीं लौटती थी और जब भी मैं उस के साथ संबंध बनाने की कोशिश करता वह बिदक जाती. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मेरे साथ क्या खेल खेल रही है. ‘‘ऐसी ही एक सुबह मैं ने कहा कि रितु कहां थीं तुम रात को और शक्ल देखो जरा अपनी क्या बना रखी है. ऐसा लगता है रातभर नशे में पड़ी रही हो. ‘‘इस पर वह बोली कि हां वह मेरी एक फ्रैंड का बर्थडे था सो थोड़ी सी ले ली थी. पर इस के बाद हर दूसरे दिन रितु घर से गायब हो जाती और 2-3 दिन के बाद लौटती थी. धीरेधीरे मैं ने नोटिस किया कि वह नशे की गिरफ्त में आ चुकी है. फिर एक दिन मुझे गुस्सा आ गया तो मैं ने कहा कि रितु यह क्या तमाशा लगा रखा है.

हम पतिपत्नी हैं हमारे विवाह को भी लगभग 8 महीने होने को आए हैं और तुम हर दिन गायब रहती हो. आखिर मैं ने इसलिए तो शादी नहीं की है?’’ ‘‘मेरी बात सुन कर बोली कि ऋषि देखो मुझे तुम से विवाह करने में कोई इंटरैस्ट नहीं था. मम्मीपापा को मैं ने बताया था कि मैं हरप्रीत से प्यार करती हूं और उस से शादी करना चाहती हूं पर मेरे मम्मीपापा उस से मेरी शादी करने को तैयार नहीं थे. इसीलिए मुझे तुम से पतिपत्नी वाला रिश्ता बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’ ‘‘रितु की ये बातें सुन कर तो मेरे होश उड़ गए. कुछ समझ नहीं आया कि यह मेरे साथ क्या हो गया. हाथपैर मानो सुन्न हो गए थे. उस दिन औफिस भी नहीं जा पाया था मैं. इस के बाद मेरी जिंदगी पूरी तरह बदल गई थी.

न जौब में मन लगता था, न घर में, रितु थी पर मेरी उस से बोलचाल बंद हो गई थी. सच कहूं तो मैं डिप्रैशन में जाने लगा था. तब मांपापा को कुछ शक हुआ और एक दिन उन के बहुत फोर्स करने पर मैं ने संक्षेप में उन्हें 2-4 बातें बता दीं. तब उन्होंने ही मुझे वहां से रिजाइन कर के यहां इंडिया में जौब जौइन करने की सलाह दी. ‘‘रितु भी मेरे साथ इंडिया आ गई पर वह मेरे घर न आ कर अपने किसी दोस्त के यहां चली गई और 10 दिन बाद ही रितु ने मुझे तलाक के पेपर्स पर साइन करने को कहा. मैं ने पेपर्स पर साइन कर दिए पर रितु से कहा कि रितु यदि तुम ने मुझे पहले बताया होता तो मैं खुद इस शादी से मना कर देता. मेरी जिंदगी इस तरह बरबाद करने का तुम्हें कोई हक नहीं है. तुम्हारे मांपापा ने तुम्हारी बात नहीं मानी पर इस में मेरा क्या कुसूर था जो तुम ने मेरे साथ ऐसा किया? ‘‘जवाब में वह बोली कि देखो मेरे पापा दिल के मरीज हैं जब मेरे बारबार कहने पर भी वे नहीं माने तो मेरे पास इस शादी को करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मैं ने भी सोचा कि तुम से शादी कर के कम से कम मुझे विदेश घूमने का मौका तो मिलेगा. अब तलाक ले कर मैं इंडिया हरप्रीत से ही शादी कर लूंगी और तुम भी अपनी पसंद की किसी लड़की से शादी कर लेना.’’ ‘‘तो तुम ने तलाक ले लिया उस से…’’ ‘‘हमारे यहां तलाक मिलना क्या आसान होता है? जैसे ही तलाक के बारे में हम दोनों के घर वालों को पता चला तो वे कहने लगे कि अरे छोटीमोटी बातें घरगृहस्थी में होती ही रहती हैं. थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा.

कुल मिला कर दोनों ही पक्ष हमारे तलाक के निर्णय से खुश नहीं थे पर उन्हें कौन समझए कि ऐसी शादी से क्या फायदा जो सिर्फ दिखावे के लिए हो. ऐसे घुटघुट कर शादी निभाने से तो अच्छा है कि अलग हो कर चैन से रहो. 1 साल तक लंबे कानूनी केस के बाद अभी 6 महीने पहले हमारा केस क्लोज हुआ है जिस में ऐलीमनी के तौर पर एकमुश्त 11 लाख रुपए रितु को देने पड़े. अब तुम ही बताओ कि इस में मेरा क्या कुसूर था जो मुझे और मेरे परिवार को इतना आर्थिक और मानसिक नुकसान सहना पड़ा?’’ ‘‘सच में यह तो तुम्हारे साथ बहुत ही बुरा हुआ यानी हम दोनों ही इस मामले में कुदरत के मारे हैं. शायद हम दोनों की ही जिंदगी में शादी का सुख नहीं है,’’ मैं ने थोड़ा रूमानी सा होते हुए कहा. ‘‘अरे यार शादी इंसान एक अच्छे जीवनसाथी मिलने की कामना में करता है ताकि जिंदगी के हर मोड़ पर उस के साथ एक साथी खड़ा रहे, जो जिंदगी के हर सुखदुख में उस के साथ कदम से कदम मिला कर चल सके और अगर ऐसा नहीं हो पा रहा है तो अलग होना या शादी न करना ही बेहतर है.’’ ‘‘हां बात तो तुम्हारी सही है शादी के लिए एक सच्चा और अच्छा लाइफ पार्टनर मिलना जरूरी है वरना शादी को बरबादी में बदलते देर नहीं लगती.

चलें अब आज के लिए काफी है. वैसे भी 10 बज गए हैं.’’ उस के बाद हम दोनों ही काफी खुल गए थे, मुलाकातें बढ़ गईं थीं. हमें एकदूसरे से मिलते. 6 महीने होने को आए थे. उस दिन बहुत तेज पानी बरस रहा था. दिल्ली में यों भी जरा सा पानी बरसता है तो मानो पूरा शहर झल में तबदील हो जाता है. मैं अभी सोच ही रही थी कि घर कैसे पहुंचूंगी क्योंकि मैट्रो स्टेशन तक पहुंचना भी बहुत बड़ी चुनौती थी. तभी ऋषि का फोन आ गया, ‘‘मैं तुम्हारे बैंक के सामने ही हूं बाहर आ जाओ मैं घर छोड़ दूंगा.’’ कुछ ही देर में ऋषि के साथ मैं उस की कार में थी. बाहर तेज बारिश थी. गाड़ी में गाना बज रहा था, ‘‘रिम?िम गिरे सावन, सुलगसुलग जाए मन, भीगे आज इस मौसम में लगी कैसी यह अगन… रिमझिम गिरे सावन…’’ कुछ देर तक गाने को गुनगुनाने के बाद अचानक ऋषि बोला, ‘‘नैना, क्या हम बचपन के प्यार में जिंदगीभर के लिए नहीं बंध सकते.’’ अचानक रखे गए ऋषि के इस प्रस्ताव पर मैं चौंक गई. यह सही है कि मैं भी कहीं न कहीं दिल के एक कोने में ऋषि से फिर से प्यार करने लगी थी पर एकदम से हां या न कहने की स्थिति में अभी नहीं थी सो धीरे से बोली, ‘‘मुझे कुछ समय चाहिए.’’ उस दिन मुझे घर छोड़ते समय ऋषि बोला, ‘‘मैं तुम्हारे इंतजार करूंगा.’’ मैं ने जब इस बारे में मम्मी को बताया तो पहले तो वे बहुत खुश हुईं पर जैसे ही तलाक के बारे में सुना तो बिदक गईं, ‘‘पागल हो गई है क्या, दूजा ही बचा है क्या तेरी जिंदगी में? समाज क्या कहेगा? किसकिस को जवाब देंगे हम?’’ ‘‘मुझे समझ नहीं आता हमेशा समाज के बारे में ही क्यों सोचते रहते हो आप लोग.

जब मेरी शादी टूटी थी तब कहां था समाज? जब पापा को अटैक आया था तब कहां था आप का समाज? तब तो मैं ने और आप ने ही सब झेला था न. पापा आप ही समझओ अब मम्मी को. मेरी बात तो इन्हें समझ आने से रही,’’ कह कर मैं ने उम्मीदभरी नजरों से पापा की तरफ देखा. ‘‘तलाकशुदा ही मिला तुम्हें,’’ पापा ने गुस्से से कहा तो न चाहते हुए भी मैं बोल पड़ी, ‘‘देखा तो था आप ने पहला जो शराबी था. ऋषि तलाकशुदा है पर शराबी नहीं. हम दोनों एकदूसरे को बचपन से जानते हैं.

अगर एक बार गलत इंसान मिल गया तो क्या फिर से नई शुरुआत नहीं की जा सकती क्या पापा? आप दोनों मेरे साथ हैं तो मुझे किसी की चिंता नहीं है. बोलिए पापामम्मा क्या आप मेरे जीवन की नई शुरुआत करने में मेरा साथ देंगे?’’ ‘‘मेरी बातें सुन कर पापामम्मी दोनों ने हां में सिर हिलाते हुए मुझे अपने आगोश में ले लिया और अगले ही दिन मैं अपने बचपन के उस प्यार को प्यार ही प्यार बेशुमार बनाने की तैयारी में लग गई.

Pyaar Ki Kahani

Love Story in Hindi: काश यह बंधन पहले बंधा होता

Love Story in Hindi: अनुज और अनुजा एक ही दफ्तर में काम करते थे. साथसाथ काम करते हुए कब एकदूसरे की तरफ खिंचाव महसूस करने लगे, नहीं जान पाए. अब तो ऐसे लगता जैसे एकदूसरे को देखे बिना चैन नहीं आता. पूरा दिन औफिस में साथ रहने के बावजूद जब शाम को अपनेअपने घर जाते तो लगता मानो अभी तो मिले थे और अभी बिछड़ रहे हैं. आखिर एक दिन दोनों ने अपने प्यार का इजहार कर दिया. लगभग 1 साल तक उन के प्यार का पौधा फूलनेफलने लगा और प्यार में एक दिन वह सब कर बैठते हैं जो शादी के बिना करना गलत माना जाता है अर्थात अनुजा और अनुज केवल मन से ही नहीं तन से भी एकदूसरे के हो गए.

अनुजा अनुज के प्यार में इतनी पागल हो गई कि बिन शादी के ही अपनी अस्मत उस पर कुरबान कर दी. ‘‘अनुज मेरे मातापिता मुझ पर शादी के लिए ज़ोर दे रहे हैं. मुझे लगता है अब हमें भी इस बारे में सोचना चाहिए.’’ ‘‘अनुजा डियर, यह प्यार के बीच में शादी कहां से आ गई?’’ ‘‘लेकिन एक न एक दिन तो शादी करनी ही है न?’’ ‘‘मैं शादी में विश्वास नहीं करता. शादी तो बिना बात का झंझट है. एक ऐसा बंधन है जो इंसान को पूरी जिंदगी न चाहते हुए भी ढोना पड़ता है.’’ ‘‘तो क्या… तुम… तुम मुझ से शादी नहीं करोगे? क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करते?’’ अनुजा ने आंखों में आंसू लाते हुए पूछा. ‘‘अनुजा… तुम ऐसा क्यों सोचती हो कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता. मैं तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता हूं.

तुम कहो तो मैं पल में तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकता हूं. क्या तुम्हें मेरे प्यार पर विश्वास नहीं? अगर हम दोनों को एकदूसरे पर विश्वास है तो हमें शादी के ढकोसले की आवश्यकता नहीं. जरा सोचो जब हम इन बेवजह के बंधनों में बंध जाएंगे तो क्या हम इस तरह से अपनी लाइफ को ऐंजौय कर पाएंगे? हर पल, हर क्षण हमें इस बंधन में बंधे होने का एहसास होगा. रिश्तेनाते, बच्चे, घरपरिवार इन्हीं सब के घेरे में ही हमारी जिंदगी बीत जाएगी और अंत में हम जिंदगी न जीने का मलाल लिए जिस तरह से रोते हुए इस दुनिया में आए थे उसी तरह पछतावा करते हुए रोते हुए चले जाएंगे.

कुदरत ने हमें अमूल्य जीवनरूपी धरोहर दी है तो क्यों न इसे संवारे, न कि इसे उजाड़ें,’’ इस तरह से अनुज ने अनुजा को शादी के बंधनों से मुक्त रहने के लिए कहा. तब अनुजा ने भी सोचा कि अनुज ठीक कह रहा है क्योंकि उस ने मातापिता को तथा औफिस में भी कुछ लोगों को घरपरिवार के झंझटों में उलझे हुए अपने अरमानों का गला घोटते हुए, लड़तेझगड़ते, जिंदगी को बोझ समझ कर ढोते हुए देखा. और फिर शादी न कर लेती है, जिस कारण उसे मातापिता से विमुख होना पड़ा. अब अनुज और अनुजा बिना शादी के पतिपत्नी की तरह अर्थात लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगे. दोनों हर बंधन से मुक्त हंसीखुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे. अचानक उन की जिंदगी में बहुत बड़ा बदलाव आया.

लगभग लिव इन रिलेशनशिप में 8-10 साल हंसीखुशी बिताने के बाद एक दिन अपनी ही जिंदगी के आनंद में खोई अनुजा को पता ही नहीं चला कि कब वह 1 से 2 होने की तैयारी में है अर्थात अनुजा को एक बार महावारी नहीं आई तो उस ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया लेकिन जब अगले महीने फिर से महावारी नहीं आई तो उसे चिंता होने लगी. चैक कराने पर पता चला कि अनुजा मां बनने वाली है. हर औरत में एक कोना मां का भी होता है. उस के अंदर की सुषुप्त मां जिसे आज तक उस ने अपनी खोखली खुशियों के नीचे दबाया हुआ था वह जाग उठी. एक मां का दिल धड़कने लगा. वह खुशी से फूली न समाई. अब तक दोनों ही अपनी जौब में तरक्की कर चुके थे जिस से कि दोनों अलगअलग औफिस में सीईओ की ऊंची पोस्ट पर थे. अनुजा ने सोचा कि आज घर पहुंचते ही अनुज को वह बहुत बड़ा सरप्राइज देगी.

औफिस से लौटते हुए अनुजा मिठाई, फूलों का गुलदस्ता और बच्चे के छोटेछोटे 2-3 खिलौने तथा एक पालना भी लेती आई. जैसे ही घर आई अनुज ने सारा सामान देख कर पूछा, ‘‘अरे, किस कैदी के घर जाना है. (अर्थात वे शादीशुदा लोगों को कैदी कहा करते थे) किस का बच्चा हुआ है जो इतना सामान ले कर आई हो?’’ प्यार से अनुज के गले में बांहें डालते हुए अनुजा ने कहा, ‘‘आज मैं किसी और के बच्चे के लिए नहीं अपने बच्चे के लिए ये सब लाई हूं. हमारे बच्चे के लिए.’’ ‘‘क्या… तुम पागल तो नहीं हो गई? नहीं… नहीं… हमें नहीं चाहिए कोई बच्चा,’’ अनुज ने हंसते हुए कहा. ‘‘अनुज मैं सच कह रही हूं, मैं मां और तुम पापा बनने वाले हो. दरअसल, कुछ दिनों से मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही थी और मुझे 2 महीने से महावारी भी नहीं आई थी लेकिन मैं ने इस बारे में ज्यादा सोचा ही नहीं. लेकिन आज मैं ने डाक्टर से चैक कराया तो पता चला कि मैं मां बनने वाली हूं.’’ ‘‘तुम्हारा दिमाग तो ठीक है… जिन बंधनों से छूटने के लिए हम ने शादी नहीं की फिर से उन्हीं बंधनों में बंधने के लिए कह रही हो? मेरी मानो तो अभी चल कर अबौर्शन करा लो.

मेरे एक दोस्त की बीवी डाक्टर है. मैं उस से अभी फोन पर अपौइंटमैंट ले लेता हूं. तुम कल जा कर उन से मिल लेना और इस बंधन से छुटकारा पा लेना.’’ ‘‘नहीं अनुज मुझे यह बंधन जान से भी प्यारा है. मैं इस बंधन के लिए दिल से तैयार हूं. मैं मां बनना चाहती हूं अनुज… मां… हां अनुज आज मैं सचमुच इन बंधनों में बंधने के लिए तैयार हूं और तुम देखना एक दिन तुम्हें भी यह बच्चा अपने बंधन में बांध देगा.’’ ‘‘देखो अनुजा… तुम अभी उतावलेपन में निर्णय ले रही हो, इसलिए अभी तुम दिमाग से नहीं दिल से सोच रही हो और जिंदगी दिल से नहीं दिमाग से सोचने पर चलती है. हम दिमाग से सोचते हैं तभी हम कमाते हैं, खाते हैं, पहनते हैं, जीवन का आनन्द लेते हैं.

अगर दिल से सोचते तो हम काम के बदले में धन क्यों लेते? यही सोचते कि चलो कोई बात नहीं हम ने किसी की काम में मदद कर दी और अगर धनार्जन नहीं करते तो खाते कहां से? खाते नहीं तो जीते कैसे और इस अमूल्य जीवन का आनंद लेते कैसे? मेरी बात को शांत दिमाग से सोचो. इस बच्चे के आने से तुम्हारा जीवन अस्तव्यस्त हो जाएगा, तुम अपने जीवन को जी कर नहीं बल्कि एक बंधन निभाते हुए काट कर बिताओगी. शेष जैसे तुम चाहो लेकिन मुझ से कोई आशा न रखना. तुम अपने जीवन में स्वतंत्र हो, लेकिन तुम अगर सोचो कि मैं इस में तुम्हारे साथ हूं तो ऐसा नहीं.

तुम मेरी तरफ से आजाद हो.’’ तुम मेरी तरफ से आजाद हो यह शब्द सुन कर अनुजा पर तो मानो गाज गिर पड़ी. लगभग 40 साल की उम्र में अब वह कहां जाए? मातापिता रहे नहीं, भाई ने दुनिया के तानों से बचने के लिए बहन से रिश्ता ही खत्म कर लिया था और जिस के लिए घरपरिवार छोड़ा, लोगों के ताने सहे, आज वह भी उसे छोड़ने को तैयार बैठा है. लेकिन उस ने एक निर्णय मजबूत मन से लिया कि वह मां बन कर रहेगी. यही सोच कर उसी समय अपना सामान पैक किया और चल दी अनजान राह पर.

रात गैस्टहाउस में बिताई. सुबह ही अपने लिए कोई ठिकाना तलाश किया और दूसरे शहर में जौब के लिए अप्लाई किया. इत्तफाक से 2-4 दिनों में ही जौब मिल गई और अनुजा उस शहर को अलविदा कह कर चली गई. अनुजा अपना सामान्य जीवन जीने लगी लेकिन उस ने उस के बाद कभी अनुज से मिलने की कोशिश नहीं की और उधर अनुज कुछ समय में ही अनुजा को भूल कर किसी और के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने लगा. वक्त बीता अनुजा की प्यारी सी बेटी हुई.

मगर हर उस कदम पर अनुजा को मुश्किलों का सामना करना पड़ा जहां पिता के नाम की आवश्यकता होती है क्योंकि जब विधि से विवाह ही नहीं हुआ तो कौन उस का पति कहलाता और कौन बेटी का पिता? वह स्वयं को विधवा भी तो नहीं कह सकती थी. कहती भी तो किस की विधवा कहती वह खुद को? अनुजा की बेटी सारा आज 25 साल की खूबसूरत युवती है और इत्तफाक से अनुज के शहर उसी के ही औफिस में उस की नौकरी लगी.

न जाने क्यों पहले ही दिन से अनुज और सारा दोनों ने ही एकदूसरे की तरफ एक खिंचाव सा महसूस किया. लेकिन इस बीच जब अनुजा और अनुज का संबंध विच्छेद हुआ था तो उस बीच दोनों को ही एकदूसरे के बारे में जानकारी नहीं रही, दोनों अपने जीवन में आगे बढ़ चुके थे. लेकिन इस ढलती उम्र में अब अनुज के साथ कोई नहीं था क्योंकि उस के इस बिना शादी के साथ रहने के फैसले से उस के मातापिता ने भी संबंध विच्छेद कर लिया था और रही बात जीवनसाथी की तरह साथ रहने की तो इस अधेड़ उम्र में कोई भी लड़की या औरत साथ रहने को तैयार नहीं होती.

एक दिन अनुज को औफिस में बैठेबैठे ही हार्टअटैक आया. उसे तुरंत अस्पताल तो पहुंचाया गया मगर रिश्तेदार के नाम पर कोई न था जोकि उस की देखभाल करता. सारा स्टाफ शाम को अपनेअपने घर चला गया. मगर जब सारा ने देखा कि अनुज सर की देखभाल के लिए कोई भी नहीं है तो वह वहीं अस्पताल में रुक गई क्योंकि औफिस से आते ही रोज वह मां से बात किया करती और बात करतेकरते उन से वीडियो कालिंग पर पूछपूछ कर खाना बनाती थी.

लेकिन आज फोन न आने पर अनुजा को चिंता होने लगी तब अनुजा ने सारा को फोन किया. सारा ने मां को बताया कि वह आज अस्पताल में ही रुकेगी क्योंकि उस के बौस को हार्टअटैक आया है तथा उन की स्थिति चिंताजनक है. उन का कोई रिश्तेदार नहीं है जो उन के साथ रह सके. सारा की बात सुन कर अनुजा परेशान हो उठी कि अकेली लड़की को किसी पराए मर्द के साथ कैसे छोड़े? न जाने कल को यह जमाना उस पर क्याक्या तोहमत लगाए इसलिए वह फौरन सारा से अस्पताल का पता पूछ कर वहां के लिए निकल पड़ी.

इधर भोर होते ही जब डाक्टर चैक करने आए तो बताया कि सर अब खतरे से बाहर है. सर को खतरे से बाहर घोषित कर दिया गया था. अनुजा ने आतेआते सुना तो बेटी से बोली, ‘‘अब सर ठीक हैं तो तुम घर चलो, ऐसे यहां तुम्हारा अकेले रहना ठीक नहीं. अब कोई न कोई रिश्तेदार आ ही जाएंगे उन की देखभाल के लिए.’’ ‘‘ठीक है मां मैं सर से एक बार मिल कर आती हूं तो फिर चलते हैं. अरे हां मां, आप यहां तक तो आ ही गई हैं सर से तो मिल लीजिए, उन्हें भी अच्छा लगेगा.’’ ‘‘हां सारा यह तुम ने सही कहा. चलो एक बार मिल कर फिर घर चलते हैं.’’ लेकिन जैसे ही अनुज के कमरे में कदम रखा, अनुज को देख कर अनुजा के कदम रुक गए.

वह बुत की तरह जहां खड़ी थी वहीं की वहीं खड़ी रही गई. ‘‘मम्मां आओ न, रुक क्यों गए?’’ सारा ने अनुजा को झंझड़ा तो अनुजा जैसे अचेतन से चेतन अवस्था में आई. ‘‘अ… हां… हां… चलो बेटा.’’ ‘‘सर ये मेरी मम्मा हैं और मम्मा ये सर हैं. सर आप अपने परिवार वालों का नंबर दीजिए हम उन्हें फोन कर के बता दें ताकि वे समय पर आप के पास आ सकें.’’ अनुज भरी आंखों से अनुजा की तरफ देखे जा रहा था. उसे बोलने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे कि आज इतने बरसों बाद अनुजा को देख कर वह क्या कहे और क्या न कहे. दोनों को चुप देख कर सारा मां अर्थात अनुजा को कुहनी मार कर बोली, ‘‘मां… क्या कर रही हो सर को ग्रीड तो करो.’’

तब अनुजा एकदम जैसे सोते से जागी हो, ‘‘ओह… हां… हां… नमस्कार सर, अब तबीयत कैसी है आप की?’’ अनुजा के इस तरह बोलने से अनुज के दिल पर चोट लगी, ‘‘अनुजा… क्या…. क्या… यह… यह हमारी बेटी… हमारी बेटी है?’’ ‘‘सौरी सर… यह मेरी बेटी है.’’ ‘‘अनुजा… प्लीज…. मुझे माफ कर दो… मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है. काश… मैं ने तुम्हारी बात मान ली होती.’’ सारा उन दोनों को बड़ी हैरानी से देखे जा रही थी कि ये एकदूसरे को कैसे जानते हैं और सर किस बात की उस की मां से माफी मांग रहे हैं. ‘‘सर, आप को कोई गलतफहमी हुई है, शायद आप को मेरा चेहरा किसी से मिलताजुलता लग रहा है,’’ और इतना कहते ही सारा मां हाथ पकड़ कर जाने के लिए मुड़ी. जैसे ही अनुजा जाने के लिए मुड़ी, ‘‘मुझ से शादी करोगी?’’ अनुज एकदम से बोला.

उस की बात सुन कर दोनों रुक गईं. लेकिन अब सारा चुप न रही. बोली, ‘‘मम्मा यह क्या है? क्या आप दोनों एकदूसरे को जानते हैं? सर आप… आप ऐसे किस तरह से मेरी मम्मा से बात कर रहे हैं? मैं कुछ समझ नहीं पा रही कि आखिर मामला क्या है?’’ ‘‘अनुजा मैं जानता हूं मैं ने बहुत गलत किया था उस समय, काश… मैं उस समय तुम्हारी बात को समझता, बंधनों का मूल्य जान पाता.

काश, मैं यह जान पाता कि ये शादी के बंधन कितने आवश्यक हैं, काश मैं इन बंधनों में बंधा होता. आज मेरा भी परिवार होता, मेरा भी कोई दुखसुख का साथी होता, मेरा भी कोई अपना कहने और कहलाने वाला होता. लेकिन मैं इन पवित्र बंधनों को बोझ समझता रहा और दूर भागता रहा इन से. आज मैं इन बंधनों का मूल्य जान पाया हूं. मुझे इस बंधन में बांध लो अनुजा, मुझे इतनी बड़ी सजा मत दो. मैं तुम्हारे लिए, अपने अंश के लिए बहुत तरसा हूं, मुझे और न तरसाओ. मेरा विश्वास करो मैं ने तुम्हें बहुत ढूंढ़ने की कोशिश की मगर तुम्हारा कुछ पता नहीं चला.

तुम्हारे सभी दोस्तों से जानने की कोशिश की लेकिन किसी ने भी कुछ न बताने का प्रण कर रखा हो जैसे. शायद कुदरत ने इसीलिए मुझे यह सजा दी है. अब मेरा परिवार मिला है तो अब मैं इस बंधन को कमजोर नहीं होने दूंगा.’’ अनुजा मूक खड़ी अनुज की बातें सुन रही थी. उस से कुछ बोलते न बना. अनुज की आंखों से झरझर गंगाजमुना बहने लगी. इधर अनुजा के भी आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे. इन सब में सारा हैरानपरेशान सी उन दोनों को देखते हुए मां से बोली, ‘‘मम्मा… आप रो क्यों रहे हो और जहां तक मैं समझ रही हूं कि आप दोनों एकदूसरे को अच्छे से जानते हो, लेकिन इस के पीछे क्या कहानी है यह मैं समझ नहीं पा रही.’’ ‘‘सारा मेरी बच्ची मैं तुम्हें सुनाता हूं अपने कर्मों की सारी कहानी.

तू मेरा अंश है मेरी बच्ची, आ एक बार मेरे सीने से लग कर अपने पापा की विरह में झलसते मन को ठंडक पहुंचा दो,’’ इतना कह कर अनुज ने बांहें फैलाईं और सारा को अपने सीने से लगा लिया. सारा की आंखों से भी गंगाजमुना बह रही थी, मगर वह क्या कहे और क्या न कहे कुछ समझ नहीं आ रहा था. अचानक अनुज को खून की उलटी हुई. अनुजा एकदम से चीख उठी, ‘‘अ…नु…ज…’’ क्योंकि प्यार कभी मरता नहीं, बेशक दोनों अलग थे मगर प्यार तो दिल में था. अनुजा ने सदा अनुज को ही अपना पति माना. अनुजा की चीख सुन कर डाक्टर, नर्स सभी दौड़े आए. इतनी ही देर में बहुत से प्रैस रिपोर्टर भी आ गए क्योंकि अमीर का कुत्ता भी बीमार हो तो अखबार की सुर्खियां बन जाता है और ये तो शहर की सब से बड़ी कंपनी के सीईओ और शहर के सब से बड़े अस्पताल में दाखिल कोई न्यूज न बने ऐसा तो हो नहीं सकता न.

सभी रिपोर्टर्स मना करने के बावजूद कमरे में घुस गए. उस पर लड़खड़ाती जबान में अनुज ने भी कहा कि रिपोर्टर्स को अंदर आने की इजाजत दी जाए क्योंकि वह अनुजा और सारा के साथ अपना रिश्ता सरेआम बताना चाहता था. इसलिए अनुज ने डाक्टरों के मना करने के बावजूद किसी को कमरे से बाहर नहीं जाने दिया. अनुज ने लड़खड़ाती जबान में बोलना शुरू किया, ‘‘डाक्टर मेरा समय आ गया है. मुझे इलाज की नहीं अपने परिवार की आवश्यकता है इसलिए मेरी विनती है कि मुझे अंतिम क्षण अपने परिवार के साथ बिताने दिए जाएं.’’ डाक्टर भी देख चुके थे कि अनुज की कंडीशन सीरियस है इसलिए उन्होंने अपना प्रयास जारी रखते हुए किसी को भी उन से दूर अर्थात कमरे से बाहर जाने को मजबूर नहीं किया.

अनुज ने अपने खून से अंगूठे को लगा कर अनुजा की मांग में लगा दिया और बोला, ‘‘जब तक मेरी सांसें हैं तब तक तुम मेरी पत्नी कहलाओगी और मेरे मरने के बाद तुम मेरी विधवा कहलाओगी. सारा आज और अभी से अनुज की बेटी है. अनुज की पोस्ट एवं प्रोपर्टी पर केवल सारा का हक है. मेरी मुखाग्नि देने का हक भी सारा को है,’’ इतना कहते ही अनुज चुप हो गया. उस की गरदन एक ओर लुढ़क गई. सारा और अनुजा चीखचीख कर अनुज को पुकारने लगीं कि काश यह बंधन पहले बांधा होता, मगर अनुज कहां था जो सुन पाता. लेकिन हां वह बंधन में तो आज खुशीखुशी बंध चुका था.’’

Love Story in Hindi

Fictional Story: वह एक थप्पड़

Fictional Story: पति से अलग होते ही नेहा के सामने पहली बड़ी समस्या आई कि रहा कहां जाए? रोहन तो ऐलीमनी देने को राजी था लेकिन नेहा के जमीर को यह गवारा न हुआ कि वह अपने स्वाभिमान को छोड़े, हालांकि कानूनी तौर पर वह ऐलीमनी की हकदार थी लेकिन कानूनी हक से ज्यादा वह अपने स्वाभिमान को स्पेस देती थी. रोहन नेहा के लिए बीती जिंदगी से अधिक कुछ नहीं था.

हां, कभी वह जीवन का हिस्सा था, पर जब उस ने पहली बार उस पर हाथ उठाया था तब से भीतर ही भीतर बहुत कुछ टूटने लगा था. नेहा ने उस थप्पड़ के बाद भी रिश्ता निभाने की कोशिश की थी, मगर हर बार वह थप्पड़ जैसे दीवार पर छपा निशान बन कर खड़ा रहा. आखिरकार नेहा ने तय किया कि अब नहीं. उस ने अब जिंदगी को नए सिरे से जीने का प्लान किया. रहने के लिए दिल्ली के वसंत कुंज में किराए पर नया घर लिया. एक दिन अचानक बिजली चली गई तो वह नीचे वाले फ्लैट में मोमबत्ती मांगने गई.

नई जगह शिफ्ट करने पर न चाहते हुए भी रोजमर्रा की जिंदगी की कितनी ही चीजें हम नहीं ला पाते. अचानक उन की जरूरत पड़े तो पड़ोसी आज भी काम आते हैं. नेहा को याद है, जब वह गांव में रहती थी तो खाने की वस्तुओं का आदानप्रदान पड़ोसपड़ोस में खूब चलता था, मूंग की दाल की कटोरी के बदले में उड़द की दाल एकदूसरे के घर से ली जाती थी. तब बाजार की दाम व्यवस्था ज्यादा माने नहीं रखती थी, आपसी मेलजोल को लोग ज्यादा तवज्जो देते थे.

उस समय को याद कर नेहा को हंसी आई. नीचे के फ्लैट की डोरबैल बजाते ही दरवाजा खुला तो सामने एक दुबलेपतले बुजुर्ग खिचड़ी में तड़का डाल रहे थे. सफेद कुरता, सादगी से सजी छोटी रसोई और दीवार पर कुछ पुराने फोटो. एक में उन की पत्नी, एक बेटे का दीक्षांत समारोह और एक में छोटा बच्चा केक काट रहा था. ‘‘मोमबत्ती चाहिए? ले लो बेटा.’’ ‘‘जी, लाइट चली गई है.’’ ‘‘हां, तुम नए आए हो शायद ऊपर वाले फ्लैट में?’’ ‘‘जी.’’ ‘‘अच्छा किया. अकेलापन थोड़ा कम लगता है जब घरों में लोग होते हैं.’’ धीरेधीरे बातचीत बढ़ी. कभी कोई काम, कभी कोई बहाना तो कभी बस यों ही शाम की हवा में 2 बातें.

वे पार्क की एक बैंच पर रोज शाम को बैठते. चाय की थर्मस लाते, नेहा भी शाम को पार्क घूमने जाती. वे नेहा को भी चाय का कप औफर करते. नेहा को धीरेधीरे उन के साथ एक मानसिक सुकून मिलने लगा.

शायद इसलिए कि उन के भीतर भी कोई टूटी चीज थी जो नेहा की अपनी टूटन से मेल खाती थी. एक दिन बारिश हो रही थी. वे दोनों पार्क के शैड के नीचे बैठे थे, जब उन्होंने अचानक पूछा, ‘‘कभी अमेरिका गई हो?’’ ‘‘नहीं,’’ नेहा ने जवाब दिया, ‘‘पर जाना चाहती हूं.’’ ‘‘अच्छा पर वापसी का टिकट खुला रखना.’’ नेहा मुसकराई पर उन की आंखों में मुसकान नहीं थी. उन्होंने कहना शुरू किया, बहुत धीरे और थमे हुए शब्दों में, ‘‘बेटा टैक्सास में रहता है. पढ़ाई कर के वहीं बस गया. बहू नौकरी करती है, आईटी कंपनी में.

नाती 8 साल का है, बहुत तेज. 2 साल पहले गया था मैं उन के पास, सोचा थोड़े दिन साथ रहूंगा, वक्त बिताऊंगा, पोते को जानूंगा. मेरी पत्नी नहीं रही, यहां अकेलापन खाता है.’’ उन्होंने हलकी सांस ली. फिर आगे बोले, ‘‘पहले कुछ दिन अच्छे रहे. घर बड़ा था, सब सुविधाएं थीं. पोता स्कूल जाता, शाम को मोबाइल और टैबलेट में खोया रहता. एक दिन वह गेम खेलतेखेलते गालियां देने लगा. मैं ने टोका. बोला तो और चिल्लाने लगा. आदतन जैसे अपने बेटे को कभीकभी थप्पड़ मार दिया करता था, वैसे ही हलके से एक थप्पड़ दे दिया. बस, यही गलती थी मेरी.’’ नेहा सुनते हुए हैरान थी. ‘‘पोता ने तुरंत चीखा कि डौंट टच मी, आई विल काल द पोलिस,’’ मैं ने सोचा, मजाक कर रहा है.

लेकिन वो सीधा कमरे में गया और 911 डायल कर दिया. 5 मिनट में पुलिस आ गई. बहू ने दरवाजा खोला और अंगरेजी में बताया कि डैड ने बच्चे को मारा है. मैं कुछ समझा नहीं पा रहा था. मुझे लगा, बेटा समझाएगा. लेकिन वह आया तो सिर्फ इतना कहा कि डैड यू कांट हिट किड्स हियर. इट इज सीरियस और फिर अपनी गरदन झाका ली. ‘‘पुलिस मुझे साथ ले गई. वहां घंटों बैठा रहा.

सवाल पूछे गए जैसे मैं कोई अपराधी हूं. वकील आया, बेल कराई गई. रात में बेटे ने घर ला कर सिर्फ इतना कहा कि पापा, आप को यहां के नियम समझने होंगे. बहू ने कहा कि हम आप को बहुत मानते हैं, लेकिन बच्चों को मारना यहां जुर्म है. मैं चुप रहा. अगली सुबह फ्लाइट बुक कर ली. बेटा एअरपोर्ट तक आया बहू नहीं. रास्ते भर कोई बात नहीं हुई.’’ बारिश अब धीमी हो गई थी.

वे सामने सड़क की ओर देख रहे थे जैसे कोई पुरानी बात याद कर रहे हों. वापस आया तो यह घर वीरान लग रहा था. पत्नी तो कब की जा चुकी थी पर कभीकभी फोन आता है बेटे का. बस हालचाल. नाती से बात नहीं होती. मैं पूछता भी नहीं. ‘‘पड़ोसी पूछते हैं, क्या हुआ जी, बहू से झागड़ा हो गया? कोई कहता है, बुजुर्ग वहां नहीं टिकते, बच्चों के बीच एडजस्ट नहीं कर पाते. मैं चुप रहता हूं.

किसी को क्या समझाऊं कि मेरी गलती क्या थी? बस एक थप्पड़.’’ अब वे चुप हो गए. नेहा भी चुप थी. ‘‘अब अकेले रहता हूं. सुबह खुद के लिए चाय बनाता हूं, खुद ही सब्जी काटता हूं. पुराने गाने सुनता हूं. कभीकभी फ्लैट में भजन बजा देता हूं, शायद उस सन्नाटे को भरने के लिए.’’ नेहा ने देखा, उन की आंखें भीग चुकी थीं. ‘‘जानता हूं, तुम भी कभी विदेश जाओगी. बस इतना याद रखना, संवेदनाओं का अनुवाद नहीं होता और वहां संस्कृति भी पासपोर्ट मांगती है. हमारे यहां प्यार में गुस्सा आता है, वहां गुस्से में मुकदमा हो जाता है.’’ फिर वे और छड़ी संभालते हुए बोले, ‘‘मुझे वह बच्चा अब भी याद आता है और सोचता हूं, क्या वह एक थप्पड़ इतना बड़ा अपराध था?’’ नेहा उन्हें जाते देखती रही.

उसे याद आया वह दिन जब रोहन ने उसे थप्पड़ ही तो मारा था, वह भीतर ही भीतर महसूस करती रही, वह थप्पड़ शायद किसी गाल पर नहीं, रिश्तों की नींव पर पड़ा था और उस दिन से आज तक वह नींव हिलती ही रही. मगर आज उन बुजुर्ग की कहानी सुन कर नेहा को लगा कि शायद गलती सिर्फ ‘थप्पड़’ में नहीं थी बल्कि उस समय और संवेदना में थी जो अब बीत चुकी है.

  • पूजा अग्निहोत्री

Fictional Story

Hindi Family Story: दोस्त बस और कुछ नहीं

Hindi Family Story: रचना ने दरवाजे का ताला खोला और अंदर आ गई. पीछेपीछे सामान का थैला उठाए प्रसून भी अंदर आ गया. रचना पूरे महीने का सामान इकट्ठा नहीं लाती थी. दुकान से वापस आते हुए हफ्ते में एक बार जितना जरूरी होता था उतना खरीद लाती थी. प्रसून ने थैला किचन में जा कर रख दिया और फिर रचना से बोला, ‘‘तुम फटाफट चाय बनाओ तब तक मैं प्रियांशु को ले आता हूं.’’ ‘‘जी ठीक है,’’ कह कर रचना हाथमुंह धोने बाथरूम में चली गई. प्रसून प्रियांशु को लेने चला गया.

2-3 घर छोड़ कर ही एक घर में बच्चों का झलाघर था जिस में 6 महीने से ले कर 13-14 वर्ष तक के बच्चे रहते थे. यह एक वृद्ध दंपती का घर था. उन के दोनों बच्चे अमेरिका में सैटल हो चुके थे और अपनीअपनी गृहस्थी में पूरी तरह रम गए थे और खुश थे. यह उन की खुशी का ही परिणाम था कि यह वृद्ध दंपती नातीपोतों से खेलने की उम्र में यहां अकेले एकाकी रह गए थे. अपना एकाकीपन काटने के लिए उन्होंने झलाघर खोल लिया. इस महल्ले में वे 40 वर्षों से रह रहे थे. स्वभाव के भी अच्छे थे. सब लोग उन्हें जानते और मानते थे. 1-1 कर दूर पास के कई बच्चे उन के पास आ गए. घर विभिन्न उम्र के नातीपोतों से भर गया, साथ ही अतिरिक्त आय भी हो जाती.

समय एक अच्छे काम में व्यतीत हो जाता. बच्चों को प्यार से संभालने वाले दादादादी मिल गए और मातापिता को बच्चों की अच्छी और सुरक्षित देखभाल का आश्वासन. सब की समस्याओं का समाधान हो गया. प्रसून रोहनजी के घर पहुंचा तो प्रियांशु उन की गोद में बैठा कहानी सुन रहा था. बाकी बच्चे दरी पर आसपास बैठे थे. प्रियांशु तो रोहन दंपती का खास प्यारा था. प्रसून को देखते ही प्रियांशु चहक उठा, ‘‘अंकल आ गए.’’ प्रसून ने हंस कर उसे गोद में ले लिया, ‘‘घर चलें बेटा?’’ ‘‘हां चलो,’’ प्रियांशु ने उस के गले से लिपटते हुए कहा. प्रसून ने प्रियांशु का स्कूल बैग लिया, रोहनजी को नमस्ते कहा और घर की ओर आ गया.

रचना ने चाय तैयार रखी थी और प्रियांशु के लिए दूध भी. प्रियांशु दूध पीने में नखरे करने लगा तो प्रसून ने थैली में रखे तरहतरह के बिस्कुट दिखा कर दूध पीने को राजी कर लिया. क्रीम वाले बिस्कुट देख कर प्रियांशु खुश हो कर दूध पी गया. रचना और प्रसून चाय पीने लगे. चाय पीने के बाद प्रसून जाने लगा तो रचना ने उसे रोक लिया कि वह रात का खाना खा कर ही जाए. ‘‘प्रिया दीदी तो है नहीं अब आप रात का खाना खाकर ही घर जाइए. अकेले क्या बनाएंगे.’’ ‘‘ठीक है तुम खाने की तैयारी करो तब तक मैं प्रियांशु को पार्क में झले पर झुला लाता हूं,’’ प्रसून ने कहा और प्रियांशु को ले कर बाहर चला गया. रचना जा कर रोहन दंपती को भी रात के खाने का न्योता दे आई.

झला घर के सब बच्चों के जाने के बाद थोड़ी देर आराम कर के रोहन रचना के पास चले आए उस की मदद कराने. दोनों रसोईघर में काम करते हुए गप्पें मारने लगीं. सुनीता यानी रोहन की पत्नी को अपनी दोनों ही बहुओं के साथ रहने, बातें करने का सुख तो मिला ही नहीं. एक बहू तो विदेशी ही थी. उसे तो उन्होंने आज तक देखा ही नहीं. उन के बड़े बेटे ने चर्च में शादी कर लेने के बाद अपनी शादी की खबर देते हुए फोन कर दिया और फोटो भेज दिए थे. उन्होंने बहुत कहा कि बस एक बार बहू को ले कर भारत आ जाओ तो वे लोग प्रत्यक्ष उस से मिल लेंगे लेकिन उन की अल्ट्रा मौडर्न विदेशी बहू यहां आने को किसी भी कीमत पर तैयार नहीं हुई.

दूसरे बेटे के लिए उन्होंने खुद लड़की देखी थी लेकिन वह भी शादी कर के अमेरिका जा बसी तो आज तक कभी 4 दिन भी उन के पास आ कर नहीं रही. 4 साल में उन का छोटा बेटाबहू 2 बार भारत आए लेकिन हर बार उन्हें न बता कर चुपचाप बहू के मायके में पूरी छुट्टियां बिता कर 2-4 दिन जाने के पहले उन के पास औपचारिकतावश रह जाते हैं. अब तो रोहन सुनीता ने अपना पूरा ध्यान झलाघर के बच्चों पर केंद्रित कर लिया है और अपने दिमाग से बेटेबहू को पूरी तरह निकाल दिया है.

जो भी खुशी है वह इन बच्चों और महल्ले के पुराने परिचितों में ही है. यही उन का सच्चा परिवार है. रचना से सुनीता आंटी को बहुत स्नेह है. वह भी हालात की मारी हुई और ससुराल से सताई हुई लड़की है. लेकिन उस ने हिम्मत और धीरज से काम लेते हुए अपनेआप को भी संभाला और अपने बच्चे को भी पाल रही है. सुनीता आंटी की मदद से रचना का काम काफी जल्दी हो गया. तब तक रोहन अंकल और प्रसून भी प्रियांशु को ले कर आ गए. सब ने साथ बैठ कर खाना खाया. खाने के बाद आंटी ने फटाफट किचन साफ कर दिया. 9 बजे प्रसून अपने घर चला गया. थोड़ी देर बाद अंकलआंटी भी अपने घर चले गए.

रचना ने दरवाजे पर ताला लगाया और प्रियांशु को ले कर कमरे में आ गई. सुबह 7 बजे ही प्रियांशु की बस आ जाती है तो वह रात में जल्दी सो जाता है. उस के सोते ही रचना की भी आंखें झपकने लगीं और जल्द ही वह भी सो गई. सुबह 5 बजे अलार्म बजने के साथ ही रचना की नींद खुल गई. वह जल्दी से उठी, हाथमुंह धो कर प्रियांशु का टिफिन बनाने लगी. एक तरफ उस ने चाय का पानी चढ़ा दिया.

प्रियांशु के लिए दूध गरम कर के उस ने उसे उठाया और नहला कर स्कूल के लिए तैयार कर दिया. दूधबिस्कुट खिला कर रचना ने पानी की बोतल और टिफिन उस के बैग में रखा और उसे बस स्टौप पर छोड़ने गई. 5-7 मिनट में ही बस आ गई. रचना ने प्रियांशु को बस में बैठाया और घर वापस आ गई. थोड़ी देर अखबार पढ़ते हुए रचना ने चाय पी और फिर घर के बाकी काम निबटाने लगी. काम भी क्या, रचना ने एक गहरी सांस ली, छोटा सा रसोईघर, थोड़े से बरतन, बाहर एक छोटी सी बैठक उसी से लगा हुआ डाइनिंग हाल और एक छोटा सा बेडरूम बस. अपने लिए 2-4 रोटियां बनाईं और खाना तैयार.

नहाधो कर उस ने लंच पैक किया और तैयार हो गई. 9 बजे प्रसून आ जाता था उसे लेने और उसे सुपरमार्केट में ड्रौप कर देता था जहां वह काम करती थी. उसी मार्केट से आगे प्रसून का औफिस था. शाम को लौटते हुए प्रसून उसे वापस ले आता था और घर पर ड्रौप कर देता था. पिछले 4 सालों से उस की यही दिनचर्या है. रोहन दंपती प्रसून और प्रियांशु यही उस की छोटी सी दुनिया और यही उस का परिवार है. कभीकभी प्रसून की पत्नी प्रिया और दोनों बच्चे भी आ जाते. प्रिया बहुत सुलझ हुई स्त्री थी. 8 बरस पहले पास के शहर में उस की शादी हुई थी. परिवार ने लड़के के बारे में बड़ीबड़ी बातें की थीं.

संपन्न घर था बड़ा सा मकान, गाड़ी. मध्यवर्गीय मातापिता ने तुरतफुरत उस का विवाह कर दिया. विवाह के बाद पता चला लड़का अर्थात आशीष कुछ करता नहीं है, बेरोजगार है. पिता और बड़े भाइयों की कमाई पर घर में पड़ा रहता है. घर में उस की कोई इज्जत नहीं है. भाईभाभियां सभी सारा समय उसे दुत्कारते रहते हैं. जब पति की कोई इज्जत न हो तब पत्नी का कौन सम्मान करता है.

शादी के 6 महीने बाद सासससुर का रवैया भी बदल गया. वे रचना को ही ताने देते कि हम ने तो सोचा था कि तुम उसे समझबुझ कर काम करने के लिए मना लोगी. जिम्मेदारी पड़ने से वह सुधर जाएगा लेकिन तुम पत्नी हो कर भी उसे जिम्मेदार नहीं बना पाई, सुधार नहीं पाई. क्या फायदा हुआ तुम्हें घर लाने का? 1 के बजाय 2 लोगों को बैठा कर खिलाना पड़ता है.’’ एकडेढ़ साल तक रचना ससुराल में अपमान के घूंट पीती नौकरों की तरह काम करती रही. आशीष को मनाती रही कोई कामधंधा या छोटीमोटी ही सही नौकरी करने को, लेकिन उस निठल्ले के बस का कुछ नहीं था.

हार कर रचना ने एक स्कूल में नौकरी कर ली. पैसा ज्यादा तो नहीं मिलता था लेकिन कम से कम उसे छोटीछोटी जरूरत के लिए घर में जेठानियों के आगे हाथ तो नहीं फैलाने पड़ते थे. मगर यहां भी दुख ने पीछा नहीं छोड़ा. आशीष ने उस के स्कूल के टीचर्स से पैसा उधार लेना शुरू कर दिया. जब आशीष उन टीचर्स को पैसा चुकता नहीं कर पाया तो उन्होंने रचना को बताया. रचना ने सिर पीट लिया. खुद तो कुछ कमाता नहीं है रचना कमा रही है तो वहां भी चैन नहीं. रचना की सारी कमाई तो आशीष की उधारी चुकाने में खत्म हो जाती. उस ने सारे टीचर्स से निवेदन किया कि वह अब आगे से आशीष को कोई पैसा उधार न दें. लेकिन अब तक की उधारी तो उसे चुकानी ही पड़ रही थी. रचना दोनों तरफ से पिस गई.

एक तरफ घर का सारा काम उसे करना पड़ता तो दूसरी तरफ स्कूल की नौकरी, उस पर भी हालत वैसी ही कि हाथ में एक फूटी कौड़ी नहीं आती और घर पर ताने पड़ते सो अलग. रचना को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे. उस के मातापिता अलग अपराधबोध से घिरे रहते थे कि जल्दबाजी में यह कैसे नकारा से ब्याह दिया उन्होंने अपनी बेटी को. जैसेतैसे आशीष के लिए हुए कर्ज से मुक्त हो ही पाई थी वह कि पता चला वह मां बनने वाली है. जैसेतैसे रचना कुछ महीनों तक अपने शरीर को और खींचती रही लेकिन फिर तकलीफ बढ़ जाने से उसे नौकरी छोड़नी पड़ी.

घर में आशीष की वजह से उसे हर कदम पर बेइज्जत होना पड़ता था. रातदिन ताने सुनने पड़ते थे. घरबाहर दोनों मोरचों पर पिस कर भी कुछ हासिल नहीं था. तंग आ कर वह अपनी मां के यहां आ गई. पिता अपने अपराधबोध में घुलते हुए अचानक एक दिन हार्ट अटैक से चल बसे. मां के ही घर प्रियांशु का जन्म हुआ. आशीष 2-3 बार उसे घर वापस ले जाने के नाम पर वहां आया और खुद भी वही टिक गया. पिता तो रहे नहीं मां स्वयं ही बड़े भाइयों पर आश्रित थी. भाई तो फिर भी कुछ कहते नहीं थे मगर भाभियों की जबान खुलने लगी. वे दोनों रातदिन ताने मारने लगीं. आशीष की वजह से ससुराल में रचना को जेठानियों के ताने सुनने पड़ते थे और अब मायके में भी उसे चैन नहीं.

बच्चे को ले कर अगर वह ससुराल वापस जाती तो भी आशीष की बेरोजगारी और आवारागर्दी उसे त्रस्त कर डालती. प्रियांशु की देखभाल के बहाने वह मायके में ही रही और जैसेतैसे उस ने आशीष को वहां से चलता किया और स्पष्ट बोल दिया कि अगर ढंग की नौकरी मिले तो ही उसे लेने आए वरना उसे और बच्चे को उन के हाल पर छोड़ दे. रचना ने फिर एक स्कूल में नौकरी कर ली. प्रियांशु की देखभाल मां कर ही लेती थी. लेकिन दुख ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा और प्रियांशु साल भर का हुआ ही था कि मां चल बसीं.

अब तक मां के कारण जो भाभियां जैसेतैसे रचना को सहन कर रही थीं उन्होंने मां की 13वीं होते ही रचना को अपनी ससुराल वापस चले जाने का फरमान सुना दिया. रचना किसी भी कीमत पर ससुराल वापस नहीं जाना चाहती थी. वह अब और जिल्लत से भरी जिंदगी नहीं जी सकती थी. उस ने ठान लिया कि अब वह अपने पैरों पर खड़ी हो कर सम्मान के साथ ही जीएगी. उस ने भाभियों से थोड़े दिनों की मोहलत मांगी और अपने नन्हें बच्चे के साथ दरदर भटकते हुए काम की तलाश करने लगी. कोई ऐसा काम जिस में इतना पैसा मिले कि वह एक कमरा किराए पर ले कर प्रियांशु को किसी अच्छे झलाघर में रख सके.

बहुत तलाशने के बाद रचना की मुलाकात रोहन दंपती से हुई. उन्होंने उसे मानसिक संबल दिया तथा पास ही एक कमरा किराए पर दिला दिया. उन्होंने ही उसे प्रसून से मिलाया. प्रसून ने रचना को अपने दोस्त के यहां सुपरमार्केट में नौकरी दिला दी. रचना प्रियांशु को ले कर यहां आ गई. उस ने किसी को भी अपना पता नहीं बताया था. वह अतीत के सारे अपमान, सारी तकलीफें, कड़वाहट सब भूल जाना चाहती थी.

भाईभाभियों ने भी राहत की सांस ली और अपने हाथ झटक लिए. उन्हें क्या परवाह थी कि वह कहीं भी रहे किसी भी हाल में रहे. 2 साल में अपनी मेहनत और ईमानदारी से रचना ने असिस्टैंट मैनेजर का पद प्राप्त कर लिया. अब एक कमरे की जगह उस ने यह छोटा सा पोर्शन किराए पर ले लिया था, जिस में छोटी सी किचन, बैडरूम, ड्राइंगरूम सब थे. इतने सालों में प्रसून ने हर तरह से हर कदम पर उस का भरपूर साथ दिया था. सुख में, दुख में, हर परेशानी में, चाहे कभी प्रियांशु बीमार पड़ा हो, चाहे वह खुद.

डाक्टर को दिखाने से ले कर दवाइयां लाने तक हर जिम्मेदारी पूरे अपनेपन और ईमानदारी से निभाता है प्रसून. दोनों में एक अव्यक्त अनाम मगर बहुत ही गहरा रिश्ता बन गया था. प्रिया ने भी कभी प्रसून को रोका नहीं रचना की मदद करने से या उस के यहां आनेजाने से बल्कि जब भी होता वह खुद भी रचना की मदद करती. अब तो रचना अपने बेटे के साथ अपने इस नए परिवार और नए जीवन में पूरी तरह से रम गई थी. पुरानी यादें रात के बुरे सपने की तरह बीत चुकी थीं. अब जीवन की नई सुबह आ गई.

रोहन अंकलआंटी कभी मातापिता की कमी महसूस नहीं होने देते. एक बार जब प्रियांशु बहुत बीमार पड़ गया तो आंटी दिनरात उसे गोद में ले कर बैठी रहती थीं. रचना को कभी लगा ही नहीं कि उस की मां नहीं है. रचना के घाव भर चुके थे. वर्षों के संघर्ष के बाद अब वह आर्थिक एवं मानसिक रूप से समर्थ और स्वतंत्र व्यक्ति थी, पूरी तरह आत्मनिर्भर थी. पेपर समेटते हुए रचना की नजर घड़ी पर पड़ी उफ, आज तो वह काफी देर तक पेपर पढ़ती रह गई. बाकी काम उस ने काफी स्फूर्ति से निबटाए.

वह तैयार हो कर लंच बौक्स रख ही रही थी कि नीचे से प्रसून की बाइक का हौर्न सुनाई दिया. जल्दी से उस ने अपना पर्स संभाला और ताला लगा कर बाहर आ गई. प्रसून ने बाइक स्टार्ट की और रचना को ले कर सुपर मार्केट में ड्रौप कर के अपने औफिस चला गया. रचना की दिनचर्या और जीवन सुख से चल रहा था. दिन बीत रहे थे. सबकुछ व्यवस्थित था कि एक दिन अचानक उस के जीवन में एक भूचाल आ गया. एक दिन वह प्रसून के साथ शाम को घर लौटी तो दरवाजे पर आशीष को खड़ा देख कर बुरी तरह चौंक गई.

प्रसून ने उसे चौंकते हुए देख कर पूछा कि यह व्यक्ति कौन है? रचना पिछले सालों में बुरे अतीत के साथ आशीष को भी पूरी तरह से भूल चुकी थी. उस के नाम को, व्यक्तित्व को पूरी तरह से अपने जीवन से अलग कर चुकी थी. अब अचानक उसे सामने देख कर उस के मन में संदेह के कांटे चुभने लगे. उस ने धीरे से प्रसून से कहा कि यह आशीष है. बेचारा प्रसून हकबका गया इस नई परिस्थिति से सामना होने पर. वह भी रचना के जीवन में आशीष नाम के किसी प्राणी के अस्तित्व के बारे में भूल ही गया था.

आज आशीष को देख कर उसे रचना के साथ जोड़ कर देखने की कल्पना से ही उसे अजीब सा लग रहा था. कुछ पलों तक सब किंकर्तव्यविमूड़ से खड़े रह गए. ‘‘क्या हुआ रचना दरवाजा खोलो तुम्हारा पति आया है, उसे अंदर भी नहीं बैठाओगी क्या?’’ आशीष ने ही चुप्पी तोड़ी. आशीष के मुंह से पति शब्द सुन कर रचना के शरीर में वितृष्णा की एक लहर दौड़ गई. प्रसून के चेहरे के भाव भी सख्त हो गए क्योंकि वह रचना के दुखद और संघर्ष भरे अतीत से भलीभांति परिचित था. ‘‘मैं प्रियांशु को ले कर आता हूं,’’ और कुछ समझ न आने पर उसे असमंजस से उबरने का यही एक तरीका समझ आया. मगर अचानक रचना सख्त लहजे में बोली, ‘‘नहीं आप कहीं नहीं जाएंगे.’’

आशीष की ओर कठोर नजरों से देखते हुए रचना ने उस से पूछा, ‘‘आप यहां क्यों आए हैं?’’ ‘‘क्यों आया? क्या मतलब? मैं पति हूं तुम्हारा. प्रियांशु का बाप हूं,’’ आशीष ने अपने स्वर में भरसक अधिकार भाव भरते हुए कहा. ‘‘वाह इतने सालों बाद आप को याद आया है कि आप का हम से क्या रिश्ता है?’’ रचना के स्वर में व्यंग्य था. प्रसून ने रचना से कहा कि अंदर बैठ कर बातें करते हैं यहां पासपड़ोस वाले सुनेंगे तो क्या कहेंगे.

आशीष को प्रसून की उपस्थिति नागवार लग रही थी. रचना ने ताला खोला और सब अंदर आ गए. जब प्रसून भी अंदर आ गया और सोफे पर बैठ गया तो आशीष गुस्सा भरे स्वर में बोला, ‘‘ये महाशय कौन हैं? हम पतिपत्नी के बीच में इन का क्या काम?’’ बारबार आशीष के मुंह से पति शब्द सुन कर रचना झल्ला पड़ी, ‘‘कौन पति, कैसा पति, किस का पति?’’ ‘‘मैं तुम्हारा पति,’’ आशीष उस के चिल्लाने से अचकचा गया. ‘‘कोई रिश्ता नहीं है मेरा तुम से. आज तुम्हें याद आ रहा है कि तुम मेरे पति हो, तब क्यों नहीं याद आया जब मैं नौकरों की तरह तुम्हारे घर पर काम करती थी और तुम्हारा कर्ज चुकाने के लिए स्कूल की नौकरी में पिस कर भी पैसेपैसे को मुहताज थी.

तब कहां थे तुम जब मैं अपने छोटे बच्चे को ले कर नौकरी की तलाश में दरदर भटक रही थी?’’ रचना क्षोभ से भर कर बोली. ‘‘कोई रिश्ता कैसे नहीं है, धर्म को साक्षी मान कर विवाह हुआ है हमारा. मैं तुम्हारा पति हूं,’’ आशीष ने फिर अपने स्वर में अधिकार भाव ला कर रचना पर हावी होना चाहा. ‘‘धर्म को साक्षी मान कर तुम्हारे जैसा पति मिलता है तो मैं आज उस धर्म को ही मानने से इनकार करती हूं. मैं तुम्हें बहुत अच्छे से पहचानती हूं. जरूर उस घर से तुम्हें धक्के मार कर बाहर निकाल दिया गया होगा तभी तुम तलाश करते हुए यहां आ धमके हो. मगर कान खोल कर सुन लो अब यहां तुम्हारी दाल नहीं गलेगी. बरसों की मेहनत के बाद मेरे जीवन में इज्जत और चैन के दिन आए हैं. मैं अब किसी को भी उन्हें छीनने नहीं दूंगी. बहुत मेहनत से यह छोटा सा नीड बनाया है मैं ने.

अब इसे किसी कीमत पर बरबाद नहीं होने दूंगी. तुम अभी के अभी इस घर से निकल जाओ और फिर जिंदगी में कभी मुझे अपनी सूरत मत दिखाना,’’ रचना तलख स्वर में बोली. ‘‘क्यों निकल जाऊं मेरा पूरा हक है तुम पर. कानूनन भी मैं ही तुम्हारा पति हूं,’’ आशीष अब भी अपनी बात पर बेशर्मों की तरह अड़ा रहा. ‘‘कोई हक नहीं है तुम्हारा मुझ पर. मैं तुम्हारे जैसे निकम्मे, नकारा आदमी के साथ रहना तो दूर सूरत तक देखना नहीं चाहती और कानून की धमकी मु?ो मत दो. मैं वैसे भी 7 साल से तुम से अलग रह रही हूं.

यह शादी तो वैसे भी टूट चुकी है और जल्द ही मैं कागजी काररवाई भी कर दूंगी अब तो,’’ रचना का स्वर दृढ़ था. ‘‘तो इस के कारण तुम मुझे दुत्कार रही हो. अच्छा यार फंसा रखा है. पति को तो छोड़ दिया इस को रख लिया,’’ जब रचना पर जोर नहीं चला तो आशीष प्रसून की ओर इशारा कर के अभद्र तरीके से उस पर लांछन लगाते हुए बोला. इस अपमान पर प्रसून और रचना दोनों ही स्तब्ध रह गए.

स्त्रीपुरुष में पवित्र और मर्यादित सखा भाव वाला शालीन रिश्ता भी हो सकता है यह तो समाज सोच ही नहीं सकता. स्त्रीपुरुष को साथ देखा नहीं की सब की शक भरी उंगलियां ही उठती हैं उन की ओर. कोई स्वस्थ नजरिए से तो देख ही नहीं सकता. 2 लोगों के बीच इंसानियत का रिश्ता भी हो सकता है यह समाज पचा नहीं पाता. ‘‘तुम जैसा बेशर्म और गिरा हुआ इंसान और सोच भी क्या सकता है. जब मनुष्य की स्वयं की नजर ही कीचड़ से सनी हो तो उसे सब ओर गंदगी ही नजर आती है. इस से पहले कि मैं तुम्हें धक्के मार कर बाहर निकालूं चुपचाप यहां से चले जाओ,’’ प्रसून कठोर स्वर में बोला.

आशीष प्रसून को नीचा दिखाने और रचना को अपमानित कर उस पर हावी होने की आखिरी कोशिश करने में दोनों के संबंधों को ले कर अनर्गल और अनापशनाप बोलने लगा. प्रसून का मन किया कि आशीष को 2-4 तमाचे जड़ दे मगर वह संयम रख कर खड़ा रहा. मगर रचना का और अधिक अपमान उस से सहा नहीं गया. ‘‘मेरा दोस्त शहर का एसपी है. अगर तुम चुपचाप यहां से दफा नहीं हो गए तो मैं अभी तुम्हें थाने में बंद करवा दूंगा. सारी जिंदगी जेल में सड़ते रहोगे. जाओ यहां से और आइंदा रचना के आसपास नजर भी मत आना,’’ प्रसून ने गुस्से से हुए कहा. धमकी असर कर गई.

आशीष अचानक बौखला गया जब उस ने देखा कि प्रसून ने अपनी जेब से अपना मोबाइल निकाला और किसी को फोन करने लगा. आशीष की जबान तालू से चिपक गई. वह चुपचाप उठा और वहां से खिसक गया. प्रसून ने रचना की ओर देखा. किस मुश्किल से रचना ने अपनेआप को संभाल कर जीवन को व्यवस्थित किया था, मगर आज आशीष आ कर सब अस्तव्यस्त कर गया. बेचारी आशीष के घिनौने इलजाम सुन कर प्रसून से नजर नहीं मिल पा रही थी. प्रसून जानता था कि रचना के मन में उसे ले कर कोई ऐसीवैसी भावना या इच्छा नहीं है.

उस का मन शीशे की तरह साफ है. ‘‘छोड़ो रचना, आशीष जैसों की बातों से अपना मन खराब नहीं करते. मुझे तुम पर भी पूरा भरोसा है और अपनेआप पर भी. हमारे मन पूरी तरह साफ हैं और हमारा रिश्ता भी. हम दोस्त हैं बस और कुछ नहीं और इसी रिश्ते में सारी पवित्रता है. यह तो कुछ लोगों का नजरिया ही गंदा होता है कि वे औरतमर्द के रिश्ते को ले कर कभी स्वस्थ सोच रख ही नहीं सकते. हमेशा गंदा ही सोचते हैं. मगर हमें इन लोगों से क्या लेनादेना. हमारी अपनी एक सुंदर साफसुथरी खुशहाल दुनिया है,’’ प्रसून ने रचना के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे सांत्वना दी. ‘‘हां बेटी प्रसून ठीक कह रहा है. हमें भी तुम पर पूरा भरोसा है. आशीष की बातों से अपना मन खराब मत करो और डरो मत, हम सब तुम्हारे साथ हैं,’’ रोहन दंपती प्रियांशु को ले कर अंदर आए.

जब देर तक आज प्रसून या रचना उसे लेने नहीं आए तो उन्हें चिंता हुई और वे खुद ही चले आए. बाहर उन्होंने सारी बातें सुन ली थीं. ‘‘तुम्हे लोगों की बातों की परवाह करने की कोई जरूरत नहीं. आप भला तो जग भला. दुनिया की सोच की जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं है, तुम केवल अपने सहीगलत की जिम्मेदार हो और हम जानते हैं कि तुम सही हो,’’ सुनीता आंटी ने रचना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा. रचना के सिर से मानो बोझ हट गया. समाज में आशीष जैसे गिरी हुई सोच वाले व्यक्ति हैं तो प्रसून और रोहन दंपती जैसे परिपक्व व स्वस्थ विचारों वाले व्यक्ति भी हैं. प्रियांशु प्रसून से खेल रहा था.

रचना ने कृतज्ञ और संतुष्टि भरी नजर अपने इस खुशहाल परिवार पर डाली. बाहर अंधेरा घिरने लगा था, मगर उस के जीवन में आज संबंधों का एक नया उजाला छा गया था. ‘‘भई दिमाग बड़ा पक गया आज तो, इस समय मुझे तो गरमागरम चाय की सख्त जरूरत है,’’ रोहन अंकल बोले. ‘‘और मुझे भी,’’ प्रसून भी बोला तो सुनीता आंटी हंसने लगीं. ‘‘अभी लाती हूं मैं सब के लिए गरमगरम चाय और साथ में कुछ नाश्ता भी. आप प्रिया दीदी और बच्चों को भी फोन कर के यहीं बुला लीजिए. आज डिनर पूरा परिवार साथ ही करेगा,’’ रचना मुसकराते हुए चाय बनाने किचन में चली गई.

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Surname After Marriage: विवाह बाद सरनेम एकतरफा परंपरा क्यों

Surname After Marriage: लड़कियों के नाम के साथ 2 सरनेम देखा जाना आम हो गया है. एक पिता का, दूसरा पति का. कुछ महिलाएं विवाह के बाद पति का सरनेम पहले और पिता का बाद में लगाती हैं, तो कुछ ने अपने पूर्व नाम को अपरिवर्तित रखते हुए पति का नाम केवल जोड़ा है. यह बात अब केवल नाम तक सीमित नहीं रह गई है. यह पहचान, सामाजिक सत्ता, लैंगिक समानता और व्यक्तिगत अधिकार से जुड़ गया है.

अब यह सिर्फ पारिवारिक परंपरा या दस्तावेजों की सुविधा का विषय नहीं है. यह इस बात की अभिव्यक्ति है कि एक स्त्री अपनी पूर्व पहचान को कितना स्वीकारती है और विवाह के बाद उस में कितना और क्या जोड़ना चाहती है. एक तबका इसे महिलाओं की प्रगतिशीलता से जोड़ कर देखता है और कहता है कि अब तक केवल स्त्री ही विवाह के बाद अपना सरनेम बदलती आई है, पुरुष नहीं. यह एक असंतुलित सामाजिक संरचना को दर्शाता है.

व्यावहारिक यथार्थ: नाम बदलना आसान नहीं

आज एक सामान्य युवती के पास शैक्षणिक, आर्थिक, डिजिटल, मैडिकल और शासकीय दर्जनों दस्तावेज होते हैं. विवाह के बाद उन में नाम बदलना एक जटिल और कभीकभी अपमानजनक प्रक्रिया बन जाती है. अगर विवाह टूटे तो उस पहचान को फिर से बदलना, सिर्फ मानसिक ही नहीं, तकनीकी त्रासदी भी बन सकता है.

नाम बदलना अब भावनात्मक नहीं

इस में सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पुरुषों के लिए यह कभी प्रश्न ही नहीं बनता.

उन का नाम अडिग रहता है, अपरिवर्तनीय और प्रतिष्ठित.

कभी आप ने सुना कि किसी पुरुष ने विवाह के बाद पत्नी का सरनेम अपनाया हो? नहीं न? क्योंकि सरनेम अब भी एक पितृसत्तात्मक गौरव का प्रतीक बना हुआ है खासकर जो जातियां या समुदाय ‘श्रेष्ठ’ समझे जाते हैं वे अपने सरनेम को छोड़ना तो दूर उस में तनिक भी बदलाव को अपमान समझते हैं. उन के लिए यह जातिगत मान का प्रतीक है, एक ब्रैंड है.

तो क्या स्त्रियां उस व्यवस्था में समाहित हो कर ही अपनी पहचान बनाएंगी, जहां उन का नाम हर चरण पर बदला जाता है?

फिल्म और समाज की हलचल

इस विमर्श को व्यापक पहचान तब मिली जब कुछ फिल्म अभिनेत्रियों के नाम चर्चा में आए- सोनम कपूर आहूजा, करीना कपूर खान, ऐश्वर्या राय बच्चन जैसे उदाहरणों ने लोगों का ध्यान इस ओर खींचा. वहीं दूसरी ओर शबाना आजमी, किरण राव, विद्याबालन जैसी कलाकारों ने यह दिखाया कि विवाह पहचान बदलने का कारण नहीं बनना चाहिए.

‘‘नाम, शादी की उपाधि नहीं है. वह आप की यात्रा की पहचान है.’’

बच्चों के नाम: जाति और वंश से परे

बात सिर्फ स्त्रियों तक सीमित नहीं है. बच्चों के नामों में जाति, उपजाति, स्थान या वंश के संकेत जोड़ना भी पुनर्विचार योग्य है. एक लोकतांत्रिक समाज में नाम समानता का प्रतीक होना चाहिए, श्रेष्ठता या वंशवाद का नहीं. यदि हम एक समतामूलक समाज की ओर बढ़ना चाहते हैं तो बच्चों के नामों से जातिगत, क्षेत्रीय या कुल विशेष के संकेतों को हटाना जरूरी है. नाम सिर्फ व्यक्ति की पहचान हो न कि विशेषाधिकार या पूर्वाग्रह का सूचक.

दो नाम क्यों नहीं

कुछ स्त्रियां दोनों नामों को रखती हैं, पिता और पति का. उन का तर्क है कि पति का सरनेम हमारे साथ जुड़ता है पर पिता का त्याग क्यों करें?

श्रुति कस्बेकर जोशी कहती हैं, ‘‘यह प्रतिस्पर्धा नहीं, आत्मसम्मान की बात है. पति के नाम के प्रति आदर है पर अपनी पूर्व पहचान का भी सम्मान है.’’

इस में कोई विरोध नहीं. यह तो सम्मिलन है. लेकिन सब से बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई महिला चाहे तो दोनों नाम न रखे या कोई भी न रखे, क्या यह स्वतंत्रता समाज उसे देगा?

और अब आगे

यह बहस यहीं खत्म नहीं होती. क्या विवाह स्त्री के लिए नई पहचान की शुरुआत है या पूर्व की समाप्ति? क्या ‘मिस’ से ‘मिसेज’ बनना एक सामाजिक परिवर्तन है या केवल एक नामांतरण? अब वक्त आ गया है कि नाम को एक विकल्प माना जाए न कि बंधन. स्त्री चाहे तो अपना नाम न बदले, चाहे तो पतिपिता दोनों के नाम रखे या न रखे. यह निर्णय उस का हो, समाज का नहीं.

Surname After Marriage

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