Drama Story: लंबी रेस का घोड़ा- अंबिका ने क्यों मांगी मां से माफी

Drama Story: ‘‘हर्षजी, टीवी आप का ध्यान दर्द से हटाने के लिए चल रहा है पर मेरा ध्यान तो न बटाएं. आप को फिर से अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए यह कसरतें दवा से भी अधिक आवश्यक हैं,’’ डा. अनुराधा अनमने स्वर में बोलीं.

‘‘सौरी, अनुराधाजी, कसरतों की जरूरत मैं भली प्रकार समझता हूं. मैं तो आप को केवल यह बताना चाह रहा था कि कभी मैं भी मैराथन रनर था.’’

‘‘अच्छा तो फिक्र मत करें, आप एक बार फिर दौड़ेंगे,’’ डा. अनुराधा मुसकराई थीं.

‘‘क्यों मजाक करती हैं, डा. साहिबा, उठ कर खडे़ होने का साहस भी नहीं है मुझ में और आप मैराथन दौड़ने की बात करती हैं. आप मेरे बारे में ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं,’’ हर्ष दर्द से कराहते हुए बोले.

‘‘मिस्टर हर्ष, कोई लक्ष्य सामने हो तो व्यक्ति बहुत जल्दी प्रगति करता है.’’

‘‘मेरे हाथों का हाल देखा है आप ने, कलाई से बेजान हो कर लटके हैं. अब तो मैं ने इन के ठीक होने की उम्मीद भी छोड़ दी है,’’ हर्ष ने एक मायूस दृष्टि अपने बेजान हाथों पर डाली.

‘‘जानती हूं मैं, आज आप छोटेछोटे कामों के लिए भी दूसरों पर निर्भर हैं पर पहले से आप की हालत में सुधार तो आया है, यह तो आप भी जानते हैं. छोटी दौड़ में हाथों का प्रयोग करने की तो आप को जरूरत नहीं होगी,’’ डा. अनुराधा इतना कह कर हर्ष को सोचता छोड़ चली गई.

‘‘क्या हुआ? कहां खोए हैं आप?’’ पत्नी टीना की आवाज से हर्ष की तंद्रा टूटी.

‘‘कहीं नहीं, टीना, अपनी यादों में खोया था. मेरे जैसे दीनहीन, अपाहिज के पास सोचने के अलावा

दूसरा विकल्प भी क्या है.

डा. अनुराधा ने कहा कि मैं भी अर्द्धमैराथन में भाग ले सकता हूं, जबकि मैं जानता हूं कि यह संभव नहीं,’’ हर्ष के स्वर में पीड़ा थी.

‘‘खबरदार, जो कभी स्वयं को दीनहीन और अपाहिज कहा तो. याद रखो, तुम्हें एक दिन पूरी तरह स्वस्थ होना ही होगा. वैसे भी डा. अनुराधा उन लोगों में से नहीं हैं जो केवल मरीज का मन रखने के लिए झूठे आश्वासन दें.’’

‘‘अच्छा छोड़ो यह सब और बताओ, बीमा एजेंट ने क्या कहा?’’ हर्ष ने टीना के चेहरे की गंभीरता को देख कर पूछा था.

‘‘वह कह रहा था, आप का व्यापार और उस में काम करने वाले कर्मचारी तो बीमा पालिसी के दायरे में आते हैं पर इस तरह असामाजिक तत्त्वों द्वारा किया गया हमला बीमा के दायरे में नहीं आता.’’

‘‘यानी बीमा से हमें फूटी कौड़ी भी नहीं मिलेगी?’’ हर्ष उत्तेजित हो उठे.

‘‘लगता तो ऐसा ही है हर्ष,’’ टीना बोली, ‘‘वैसे गलती हमारी ही है जो हम ने समय रहते मेडीक्लेम पालिसी नहीं ली.’’

‘‘मुझे क्या पता था कि मेरे साथ ऐसा भयंकर हादसा…’’ हर्ष का स्वर टूट गया.

‘‘छोड़ो, यह सब. आज की एक्सरसाइज पूरी हो गई हो तो घर चलें?’’ टीना ने बात टालते हुए कहा.

‘‘हां, डा. अनुराधा कह रही थीं कि आप अब एक दिन छोड़ कर आ सकते हैं, रोज आने की जरूरत नहीं.’’

टीना पहिए वाली कुरसी ले आई और उस की सहायता से हर्ष को कार में बैठाया फिर दूसरी ओर बैठ कर कार चलाने लगी. हर्ष पत्नी को सजल नेत्रों से कार चलाते देखता रहा.

हर्ष ने अपने दोनों हाथों पर एक नजर डाली जो आज दैनिक जरूरत के काम भी पूरा करने के लायक नहीं थे. अब तो खाने और बटन लगाने से ले कर जूतों के फीते बांधने में भी दूसरों की सहायता लेनी पड़ती थी. कार चलाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था. ऐसे अपाहिज जीवन का भी भला कोई मतलब है और कुछ नहीं तो कम से कम अपनी जीवन- लीला समाप्त कर के वह अपने परिवार को मुक्ति तो दे ही सकता है.

दूसरे ही क्षण हर्ष चौंक गए कि यह क्या सोचने लगे वह. अपने परिवार को वह और दुख नहीं दे सकते.

‘‘क्या हुआ? बहुत दर्द है क्या?’’ टीना ने प्रश्न किया.

‘‘नहीं, आज दर्द कम है. मैं तो बस, यह सोच रहा हूं कि मेरे इलाज में ही 6 लाख से ऊपर खर्च हो गए हैं. जमा पूंजी तो इसी में चली गई अब बीमे की राशि मिलेगी नहीं तो काम कैसे चलेगा? फ्लैट की किस्त, बच्चों की पढ़ाई, कार की किस्त और सैकड़ों छोटेबडे़ खर्चे कैसे पूरे होंगे?’’

‘‘मैं शाम को ट्यूशन ले लिया करूंगी. कुछ न कुछ पैसों का सहारा हो ही जाएगा.’’

‘‘ट्यूशन कर के कितना कमा लोगी तुम?’’

‘‘फिर तुम ही कोई रास्ता दिखाओ,’’ टीना मुसकराई.

‘‘मेरे विचार से तो हमें अपना फ्लैट बेच देना चाहिए. जब मैं ठीक हो जाऊंगा तो फिर खरीद लेंगे,’’ हर्ष ने सुझाव दिया.

उत्तर में टीना ने बेबसी से उस पर एक नजर डाली. उस की नजरों में जाने क्या था जिस ने हर्ष को भीतर तक छलनी कर दिया. इसी के साथ बीते समय की कुछ घटनाएं सागर की लहरों की भांति उस के मानसपटल से टकराने लगी थीं.

‘क्यों भाई, तुम्हारा मीटर तो ठीकठाक है?’ उस दिन आटोरिकशा से उतरते हुए हर्ष ने मजाक के लहजे में कहा था.

‘कैसी बातें कर रहे हैं साहब. मीटर ठीक न होता तो मैं गाड़ी सड़क पर उतारता ही नहीं,’ चालक ने जवाब दिया.

हर्ष ने अपना बटुआ खोल कर 75 रुपए 50 पैसे निकाले. इस से पहले कि वह किराया चालक को  दे पाते, किसी ने उन की कमर पर खंजर सा कुछ भोंक दिया.

दर्द से तड़प कर वह पीछे की ओर पलटे कि दाएं हाथ और फिर बाएं हाथ पर भी वार हुआ. वह कराह उठे. दायां हाथ तो कलाई से इस तरह लटक गया जैसे किसी भी क्षण अलग हो कर गिर पडे़गा.

हर्ष छटपटा कर जमीन पर गिर पडे़ थे. धुंधलाई आंखों से उन्होंने 3 लोगों को दौड़ कर कुछ दूर खड़ी कार में बैठते देखा.

‘नंबर….नंबर नोट करो,’ असहनीय दर्द के बीच भी वह चिल्ला पडे़े. आटोचालक, जो अब तक भौचक खड़ा था, कार की ओर लपका. उस ने तेजी से दूर जाती कार का नंबर नोट कर लिया.

‘मेरा बैग,’ कटे हाथों से हर्ष ने कार की तरफ संकेत किया. पर वे जानते थे कि इस से उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा.

‘चलिए, आप को पास के दवाखाने तक छोड़ दूं,’ चालक ने सहारा दे कर हर्ष को आटोरिकशा में बैठाया तो उन्होंने कृतज्ञतापूर्ण दृष्टि चालक पर डाली और पीछे की सीट पर ढेर हो गए.

दिव्या नर्सिंग होम के सामने आटो रिकशा रुका तो उस से बाहर निकलने के लिए हर्ष को पूरी शक्ति लगानी पड़ी. उन को डर लग रहा था कि कहीं उन का दायां हाथ शरीर से अलग ही न हो जाए. आखिर बाएं हाथ से उसे थाम कर वे नर्सिंग होम की सीढि़यां चढ़ गए थे.

‘क्या हुआ? कैसे हुआ यह सब?’ आपातकक्ष में डाक्टर के नेत्र उन्हें देखते ही विस्फारित हो गए थे.

‘गुंडों ने हमला किया…तलवार और चाकू से.’

‘तब तो पुलिस केस है. हम आप को हाथ तक नहीं लगा सकते. आप प्लीज, सरकारी अस्पताल जाइए.’

हर्ष उलटे पांव नर्सिंग होम से बाहर निकल आए और सरकारी अस्पताल तक छोड़ने की प्रार्थना करते हुए उन्होंने आतीजाती गाडि़यों से लिफ्ट मांगी पर किसी ने मदद नहीं की.

वह अपने को घसीटते हुए कुछ दूर चले पर इस अवस्था में सरकारी अस्पताल पहुंच पाना उन के लिए संभव नहीं था.

तभी एक पुलिस जीप उन के पास आ कर रुकी. उन्होंने सहायता के लिए प्रार्थना नहीं की क्योंकि जिस से आशा ही न हो उस से मदद की भीख मांगने से क्या लाभ?

‘क्या हुआ?’ जीप के अंदर से प्रश्न पूछा गया. उत्तर में हर्ष ने अपना बायां हाथ ऊपर उठा दिया.

दूसरे ही क्षण कुछ हाथों ने उठा कर उन्हें जीप में बैठा दिया. बेहोशी की हालत में भी उन्होंने टूटेफूटे शब्दों में अनुनय किया था, ‘मुझे अस्पताल ले चलो भैया…’

जीप में बैठे सिपाही गणेशी ने न केवल उन्हें सरकारी अस्पताल पहुंचाया बल्कि उन की जेब से ढूंढ़ कर कार्ड निकाला और उन के घर फोन भी किया.

‘आप हर्षजी की पत्नी बोल रही हैं क्या?’

गणेशी का स्वर सुन कर टीना के मुख से निकला, ‘देखिए, हर्षजी अभी घर नहीं लौटे हैं. आप कल सुबह फोन कीजिए.’

‘आप मेरी बात ध्यान से सुनिए. हर्षजी यहां उस्मानिया अस्पताल में भरती हैं. वे घायल हैं और यहां उन का इलाज चल रहा है. उन के पास न तो पैसे हैं और न कोई देखभाल करने वाला.’

‘क्या हुआ है उन्हें और उन के पैसे कहां गए?’ टीना बदहवास सी हो उठी थी. रिसीवर उस के हाथ से छूट गया. अपने को किसी तरह संभाल कर टीना लड़खड़ाते कदमों से पड़ोसी दवे के घर तक पहुंची तो वह तुरंत साथ चलने को तैयार हो गए. टीना ने घर में रखे पैसे पर्स में डाल लिए. मन किसी अनहोनी की आशंका से धड़क रहा था.

अस्पताल पहुंच कर हर्ष को ढूंढ़ने में टीना को अधिक समय नहीं लगा. घायल अवस्था में अस्पताल आने वाले वही एकमात्र व्यक्ति थे.

‘आप के पति की किसी से दुश्मनी है क्या?’ टीना को देखते ही गणेशी ने प्रश्न किया.

‘नहीं तो, वह बेचारे सीधेसादे इनसान हैं. मैं ने तो उन्हें कभी ऊंची आवाज में किसी से बात करते भी नहीं सुना,’ उत्तर दवे साहब ने दिया था.

‘तो क्या बहुत रुपए थे उन के पास?’

‘नहीं, उन का अधिकतर लेनदेन तो बैंकों के माध्यम से होता है.’

‘तो फिर ऐसा क्यों हुआ इन के साथ…?’ गणेशी ने प्रश्न बीच में ही छोड़ दिया था.

‘पर हुआ क्या है आप बताएंगे…?’ टीना अपना आपा खो रही थी.

‘गुंडों ने आप के पति पर जानलेवा हमला किया है. वह अभी तक जीवित हैं आप के लिए यह एक अच्छी खबर है,’  गणेशी ने सीधे सपाट स्वर में कहा.

हर्ष की दशा देख कर टीना और दवे दंपती सकते में आ गए थे.

‘गुंडों ने तलवार और छुरों से हमला किया था. कमर में बहुत गहरा जख्म है. हाथों को भारी नुकसान पहुंचा है. दायां हाथ तो कलाई से लगभग अलग ही हो गया है. मांसपेशियां, रक्तवाहिनियां सब कट गई हैं, इन का तुरंत आपरेशन करना पडे़गा,’ चिकित्सक ने सूचना दी थी.

हर्ष के मातापिता कुछ ही दूरी पर रहते थे. पिता को 2-3 वर्ष पहले पक्षाघात हुआ था पर मां अंबिका समाचार मिलते ही दौड़ी आईं.

‘मां, हर्ष को दूसरे अस्पताल ले जाएंगे, वहां के डा. मनुज रक्तवाहिनियों के कुशल शल्य चिकित्सक हैं,’ टीना बोली.

आपरेशन 4 घंटों से भी अधिक समय तक चला. 5 दिनों के बाद ही हर्ष को अस्पताल से छुट्टी भी मिल गई थी. पट्टियां खुलने के बाद भी दोनों हाथ बेकार थे. छोटेमोटे कामों के लिए भी हर्ष दूसरों पर निर्भर हो गए.

कुछ ही दिनों में हर्ष के पैरों में इतनी ताकत आ गई कि वह बिना किसी सहारे के अस्पताल चले जाते थे. टीना के वेतन पर ही सारा परिवार निर्भर था अत: सुबह 10 से 3 बजे तक वह हर्ष के साथ नहीं रह पाती थी.

कार झटके से रुकी तो हर्ष वर्तमान में आ गया.

‘‘क्या बात है, ऐसी रोनी सूरत क्यों बना रखी है?’’ कार से उतरते टीना ने कहा, ‘‘क्या हुआ जो बीमे की राशि नहीं मिलेगी. कुछ ही दिनों में तुम पूरी तरह स्वस्थ हो जाओगे और अपना व्यापार संभाल लोगे.’’

हर्ष और टीना घर पहुंचे तो हर्ष की मां अंबिका वहां आई हुई थीं.

‘‘तुम्हारी पसंद का भोजन बनाया है आज. याद है न आज कौन सा दिन है?’’ टिफिन खोल कर स्वादिष्ठ भोजन मेज पर सजाते हुए मां अंबिका बोलीं, ‘‘हर्ष, आज मैं ने तेरी पसंद की मखाने की खीर और दाल की कचौडि़यां बनाई हैं.’’

हर्ष और टीना को याद आया कि वह अपने विवाह की वर्षगांठ तक भूल गए थे.

‘‘अच्छा, मैं चलूंगी, घर में तेरे पापा अकेले हैं,’’  खाने के बाद चलने के लिए तैयार अंबिका ने कहा, ‘‘सब ठीक है ना हर्ष. तुम्हारा इलाज ठीक से चल रहा है न?’’

‘‘हां, सब ठीक है मां,’’ हर्ष ने जवाब दिया.

‘‘फिर तुम्हारा चेहरा क्यों उतरा हुआ है?’’

‘‘मां, मैं जिस बीमे की रकम की उम्मीद लगाए बैठा था वह अब नहीं मिलेगी,’’  इस बार उत्तर टीना ने दिया.

‘‘तो क्या सोचा है तुम ने?’’ अंबिका ने पूछा.

‘‘सोचता हूं मां, यह फ्लैट बेच दूं. बाद में फिर खरीद लेंगे,’’  हर्ष ने कहा.

‘‘मैं कई दिनों से एक बात सोच रही थी,’’  अंबिका गंभीर स्वर में बोलीं, ‘‘क्यों न तुम सपरिवार हमारे पास रहने आ जाओ. अपने फ्लैट को किराए पर उठाओगे तो किस्तों की समस्या हल हो जाएगी.’’

एकाएक सन्नाटा पसर गया था.

‘‘क्या हुआ?’’ मौन अंबिका ने ही तोड़ा. हर्ष ने कुछ नहीं कहा पर टीना रो पड़ी थी.

‘‘हम इस योग्य कहां मां, जो आप के साथ रह सकें. याद है जब पापा पर लकवे का असर हुआ था तो हम आप को अकेला छोड़ कर यहां रहने चले आए थे. तब लगा था कि वहां रहने पर हमें दिनरात की कुंठा और निराशा का सामना करना पडे़गा,’’  हर्ष ने ग्लानि भरे स्वर में कहा.

‘‘बेटा, मैं यह नहीं कहूंगी कि उस वक्त मुझे बुरा नहीं लगा था. पर मुसीबत का सामना करने के लिए मैं ने खुद को पत्थर सा कठोर बना लिया था. तुम लोग आज भी मेरे परिवार का हिस्सा हो और आज फिर मेरे परिवार पर आफत आई है,’’  अंबिका सधे स्वर में बोलीं.

‘‘मां, हो सके तो मुझे क्षमा कर देना. जो कुछ हुआ उस के लिए हर्ष से अधिक मैं दोषी हूं,’’ यह कह कर टीना अपनी सास के चरणों में झुक गई.

‘‘नदी हमेशा ऊपर से नीचे की ओर बहती है बेटी. मातापिता कभी अपनी ममता का प्रतिदान नहीं चाहते. हम जितना अपनी संतान के लिए करते हैं मातापिता के लिए कहां कर पाते,’’ यह कहते हुए अंबिका ने टीना को गले से लगा लिया.

‘‘आप जैसे मातापिता हों तो कोई भी औलाद बडे़ से बडे़ संकट से जूझ सकती है,’’  टीना बोली.

‘‘यह मत सोचना कि मेरा बेटा किसी से कम है. मैराथन का धावक रहा है मेरा बेटा. लंबी रेस का घोड़ा है यह,’’ अंबिका मुसकराईं.

‘‘अरे, हां, अच्छा याद दिलाया आप ने. शहर में अर्द्धमैराथन होने को है और हर्ष ने उस में भाग लेने का फैसला किया है,’’  टीना बोली.

‘‘सच? पर इस के लिए कडे़ अभ्यास की जरूरत होगी,’’ अंबिका ने कहा.

‘‘चिंता मत कीजिए दादी मां, हम दोनों भी पापा के साथ अभ्यास करेंगे,’’ कहते हुए ऋचा और ऋषि ने हाथ हवा में लहराए. आगे की बात उन सब की सम्मिलित हंसी में खो गई थी.

Drama Story

Family Story in Hindi: तजरबा- कैसे जाल में फंस कर रह गई रेणु

Family Story in Hindi: अगले मुलाकाती का नाम देखते ही ऋषिराज चौंक पड़ा. ‘डा. धवल पनंग.’ इस से पहले कि वह अपनी सेक्रेटरी सीपा से कुछ पूछता, उस ने आगंतुक के आने की सूचना दे दी. सीपा के सामने वह गाली तो दे नहीं सकता था फिर भी कहे बिना न रह सका, ‘‘तू अपना नर्सिंग होम छोड़ कर मेरे आफिस में क्या कर रहा है?’’

‘‘मास्टर डिटेक्टिव ऋषिराज से मुलाकात का इंतजार. भाई, क्लाइंट हूं आप का, बाकायदा फीस भर कर समय लिया…’’

‘‘मगर क्यों? घर पर नहीं आ सकता था?’’ ऋषि ने बात काटी.

‘‘जैसे मरीज के रोग का इलाज डाक्टर नर्सिंग होम में करते हैं वैसे ही मैं समझता हूं कि जासूस समस्या का सही समाधान अपने आफिस में करते होंगे,’’ धवल बोला.

‘‘वह तो है पर तू अपनी समस्या बता?’’

‘‘पिछले सप्ताह की बात है. एक दिन नर्सिंग होम में मोबाइल पर बात करते वक्त रेणु ने घबराए स्वर में कहा था, ‘कहा न मैं आऊंगी, फिर बारबार फोन क्यों…हां, जितना भी हो सकेगा करूंगी.’ रेणु के मायके वाले अपनी हर छोटीबड़ी घरेलू समस्या में रेणु को जरूर उलझाते हैं. सो यह सोच कर कि वहीं से फोन होगा, मैं ने कुछ नहीं पूछा. फिर मैं ने गौर किया कि रेणु काफी कोशिश कर के भी अपनी घबराहट छिपा नहीं पा रही है और अपने कुछ खास मरीज भी उस ने अपनी सहायक डा. सुरेखा के सिपुर्द कर दिए.

‘‘भले ही एकसाथ काम करते हैं, मगर मैं और रेणु अपनीअपनी गाड़ी से जाते हैं ताकि जिसे जब फुरसत मिले वह बच्चों को देखने घर आ जाए. उस दिन रेणु ने कहा कि उस का गाड़ी चलाने का मन नहीं है सो वह मेरे साथ चलेगी. मैं ने कहा कि शौक से चले, मगर वापस कैसे आएगी क्योंकि मुझे तो एक आपरेशन करने जल्दी आना है तो उस ने कहा कि सुरेखा से पिकअप करने को कह दिया है. रास्ते में मैं ने उस से पूछा कि किस का फोन था तो उस के चेहरे पर ऐसे डर के भाव आए जैसे कोई खून करते हुए वह रंगेहाथों पकड़ी गई हो.

‘‘वह सकपका कर बोली, ‘यहां तो सारे दिन ही फोन आते रहते हैं, आप किस की बात कर रहे हो?’ मैं चाह कर भी नहीं कह सका कि जिसे सुन कर तुम्हारा हाल बेहाल हो गया है, लेकिन ऋषि, घर पहुंचने पर रेणु के बाथरूम जाते ही मैं ने उस के मोबाइल में वह नंबर ढूंढ़ लिया. वह रेणु के मायके वालों का नंबर नहीं था…’’

‘‘नंबर बता, अभी नामपता मंगवा देता हूं,’’ ऋषि ने बात काटी.

‘‘तेरा खयाल है, मैं नंबर पता लगवाने तेरे पास आया हूं?’’ धवल सूखी सी हंसी हंसा. फिर कहने लगा, ‘‘खैर, अगली सुबह मैं तो जल्दी निकल गया और आपरेशन से फुरसत मिलने पर जब बाहर आया तो देखा कि रेणु आज नर्सिंग होम आई ही नहीं है. घर पर फोन किया तो पता चला कि मैडम वहां भी नहीं है और गाड़ी नर्सिंग होम में खड़ी है. उस के मोबाइल पर फोन किया तो बोली कि किसी जरूरी काम से सिविल लाइन आई थी, अब ट्रैफिक में फंसी हुई हूं. सिविल लाइन में मेरी ससुराल है सो सोचा कि मायके की परदादारी रखना चाह रही है तो रखे.

‘‘मगर परसों शाम जब रेणु एक डिलीवरी केस में व्यस्त थी, मैं बच्चों को ले कर डिजनी वर्ल्ड चला गया. वहां जिस बैंक में हमारा खाता है उस के मैनेजर भी सपरिवार घूम रहे थे. उन्होंने मजाक में पूछा कि क्या डाक्टर साहिबा अभी भी खरीदारी में व्यस्त हैं, कल उन्होंने खरीदारी करने के लिए 1 लाख रुपए निकलवाए थे.

‘‘मैं यह सुन कर स्तब्ध रह गया. रेणु जो घरखर्च के लिए भी मुझ से पूछ कर पैसे निकलवाती थी, चुपचाप 1 लाख रुपए निकलवा ले, यकीन नहीं आया. अभी इस उलझन से उबर नहीं पाया था कि मेरी छोटी साली और साला मिल गए. वह हमारे घर गए थे, पता चलने पर कि हम यहां हैं, वह भी यहीं आ गए. बच्चों को उन के मामा को सौंप कर मैं साली के साथ बैठ गया और पूछा कि घर में ऐसी क्या परेशानी है जिसे फोन पर सुनते ही रेणु भी परेशान हो जाती है.

‘‘सुनते ही मीनू चौंक पड़ी. बोली, ‘क्या कह रहे हैं, जीजाजी? दीदी को घर पर आए 15 रोज से ज्यादा हो गए हैं और पिछले 4-5 रोज से उन्होंने फोन भी नहीं किया. तभी तो मां ने हमें उन का हालचाल जानने को भेजा है क्योंकि हमें फोन करने को तो जीजी ने मना कर रखा है.’

‘‘अब चौंकने की मेरी बारी थी, ‘रेणु ने कब से तुम्हें फोन करने को मना किया हुआ है?’

‘‘‘हमेशा से बहुत ही जरूरी काम होने पर हम उन्हें फोन करते हैं, फुरसत मिलने पर वह खुद ही रोज सब से बात कर लेती हैं, कभीकभी तो दिन में 2 बार भी. सो 4-5 रोज से फोन न आने पर सब को चिंता हो रही है.’

‘‘‘चिंता की कोई बात नहीं है, रेणु आजकल थोड़ी व्यस्त है,’ अपनी चिंता को दरकिनार करते हुए मैं ने मीनू की चिंता दूर की. वह अनजान फोन नंबर जो मैं ने अपने मोबाइल में नोट कर लिया था, दिखा कर मीनू से पूछा कि यह किस का नंबर है?

‘‘‘यह तो अपने पड़ोसी डा. शिवमोहन चाचा का नंबर है. छोटीमोटी बीमारी में हम उन्हीं के पास जाते हैं. समझ में आ गया जीजाजी, इस नंबर से फोन आने पर जीजी क्यों परेशान हुई थीं और क्यों काम छोड़ कर उन से मिलने गई थीं. डा. चाचा का एक डाक्टर बेटा रतन मोहन है. भोपाल के सरकारी अस्पताल में पोस्टमार्टम करता था. एक गलत रिपोर्ट देने के सिलसिले में नौकरी से निलंबित कर दिया गया सो यहां आ गया है. चाचाजी जीजी के पीछे पड़े होंगे कि उसे अपने नर्सिंग होम में रख लें और जीजी परेशान होंगी कि पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर का नर्सिंग होम में क्या काम?’

‘‘मैं ने जब मीनू से पूछा कि रतन की उम्र क्या है? तो वह बताने लगी कि वह मेडिकल कालिज में रेणु दीदी से 2 साल सीनियर था. पहले उस का घर में बेहद आनाजाना था लेकिन फिर मां ने मुर्दे चीरने वाले रतन के घर में आनेजाने पर रोक लगा दी.

‘‘मैं बुरी तरह आहत हो गया. साफ जाहिर था कि रेणु ने वह 1 लाख रुपए रतन को पुरानी दोस्ती की खातिर दिए थे. जब किसी अपने से किसी गैर के लिए धोखा मिले तो बहुत तकलीफ होती है, ऋषि. खैर, जब मैं बच्चों के साथ घर पहुंचा तो रेणु आ चुकी थी. बच्चों से यह सुन कर कि उन्हें डिजनी वर्ल्ड में बड़ा मजा आया, रेणु के चेहरे पर अजीब से राहत और संतुष्टि के भाव उभरे और मैं ने उसे बुदबुदाते हुए सुना, ‘चलो, यह तसल्ली तो हुई कि मेरे जाने के बाद धवल बच्चों को बहला लेंगे.’ उस की यह बात सुनते ही मैं स्तब्ध रह गया. ऋषि, रेणु मुझे छोड़ने की सोच रही है.’’

‘‘तू ने भाभी से इस बुदबुदाने का मतलब नहीं पूछा?’’ ऋषि ने धवल से पूछा.

‘‘नहीं, ऋषि, मैं उस से अभी कुछ भी पूछना नहीं चाहता. तू मुझे रेणु और रतन के सही संबंधों के बारे में जो भी पता लगा कर दे सकता है, दे. उस के बाद मैं सोचूंगा कि क्या करना है. कितना समय लगेगा यह सब पता लगाने में?’’

‘‘अगर रतन के कालिज का नाम, किस साल से किस साल तक उस ने पढ़ाई की और उस के अन्य सहपाठियों के नाम का पता चल जाए तो 2-3 रोज में गड़े मुर्दे उखड़ जाएंगे और फिलहाल क्या हो रहा है, यह जानने के लिए भाभी और रतन की गतिविधियों पर पहरा बैठा देता हूं. रतन का अतापता मालूम है?’’

धवल को जो भी मालूम था वह ऋषि को बता कर थके कदमों से लौट आया. उस का खयाल था कि ऋषि 2-3 रोज से पहले क्या फोन करेगा लेकिन ऋषि ने उसी शाम फोन किया.

‘‘धवल, या तो अभी मेरे आफिस में आजा या फिर रात में खाने के बाद मेरे घर पर आ जाना.’’

‘‘अभी आया,’’ कह कर धवल ने फोन रख दिया. काम में दिल नहीं लग रहा था सो उस ने कल से ही नए मरीजों को समय देने से मना किया हुआ था.

ऋषि रिपोर्ट ले कर बैठा हुआ था. ‘‘रेणु और रतन मोहन में आज कोई संपर्क नहीं हुआ है,’’ ऋषि ने बताया, ‘‘पुराने सहपाठियों को कभी रेणु और रतन का रिश्ता आपत्तिजनक नहीं लगा. पड़ोसियों और पारिवारिक जानपहचान वालों में जैसा व्यवहार होता है वैसा ही था. रेणु अपनी और अपने सहपाठियों की समस्याएं ले कर रतन के पास जाया करती थी. वह कोई बहुत काबिल डाक्टर नहीं था, लेकिन सीनियर होने के नाते सुझाव तो दे ही देता था.

‘‘रतन जिस अस्पताल में काम कर रहा था वहीं रेणु और उस के साथ की कुछ लड़कियों ने इंटर्नशिप की थी और तब रतन ने उन सब की बहुत मदद की. उसी दौरान रेणु के साथ इंटर्नशिप कर रही एक लड़की डाक्टर रैचेल का अचानक हार्ट फेल हो गया. रेणु सहेली की मौत के बाद ज्यादा सहमी सी लगने लगी और रतन को देखते ही और ज्यादा सहम जाती थी. इंटर्नशिप खत्म होते ही रेणु तुझ से शादी कर के विदेश चली गई. जब तुम लोग विदेश से लौटे तब तक रतन कहीं और नौकरी पर जा चुका था. अच्छा, यह बता धवल, जब तुम लोग लंदन में थे तो रतन के साथ संपर्क थे भाभी के?’’

‘‘मुझे तो रतन के अस्तित्व के बारे में अभी पता चला है, रहा सवाल लंदन का तो उस जमाने में ई-मेल और एसएमएस जैसी सुविधाएं तो थीं नहीं और चिट्ठी लिखने की रेणु को फुरसत नहीं थी.’’

‘‘अब तक जो सूत्र हाथ लगे हैं उन से तो नहीं लगता कि भाभी और रतन में प्रेम या अनैतिक संबंध हैं. हां, ब्लैकमेल का मामला हो सकता है लेकिन किस बिना पर इस का पता लगवा रहा हूं.’’

‘‘रैचेल की मौत से कुछ संबंध हो सकता है?’’

‘‘खैर, मैं रैचेल की मौत की सही वजह पता लगाता हूं. तू यह पता कर सकता है कि रतन अभी तक कुंआरा क्यों है?’’

धवल कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, ‘‘मैं बच्चों को नानी से मिलवाने ले जाता हूं और फिर किसी तरह रतन का जिक्र चला कर उस के बारे में मालूम करूंगा.’’

धवल की उम्मीद के मुताबिक उस की सास ने उसे बच्चों के साथ अकेला देख कर पूछा, ‘‘रेणु आजकल इतनी व्यस्त कैसे हो गई?’’

‘‘कुछ तो रोज ही 1-2 डिलीवरी के मामले आ जाते हैं, मां. दूसरे, जब से उसे डा. रतन मोहन ने फोन किया है वह न जाने क्या सोचती रहती है.’’

‘‘उस कफन फाड़ रतन की इतनी हिम्मत कि रेणु को फोन करे?’’ मां चिल्लाईं, ‘‘मीनू, लगा तो फोन अपने बाबूजी को, पूछती हूं उन से कि उन्होंने रेणु का नंबर रतन को दिया क्यों?’’

‘‘बाबूजी से जवाबतलब करने से क्या फायदा, मां,’’ मीनू ने कहा, ‘‘अब तो आप डा. रतन मोहन को बुला कर फटकारिए कि आइंदा जीजी को परेशान न करे.’’

‘‘मैं मुंह नहीं लगती उस मरघट के ठेकेदार के. तेरे बाबूजी के आते ही उन से फोन करवाऊंगी.’’

‘‘अरे, नहीं मां, इस सब की कोई जरूरत नहीं है. मगर यह रतन है कौन और रेणु से क्या चाहता है?’’ धवल ने पूछा.

जो कुछ मां ने बताया, वह वही था जो मीनू बता चुकी थी.

धवल के यह पूछने पर कि रतन के बीवीबच्चे कहां हैं? मां ने मुंह बिचका कर कहा, ‘‘उस आलसी निखट्टू से शादी कौन करेगा? किसी तरह लेदे कर डाक्टरी तो बाप ने पास करवा दी लेकिन बेटे ने मरीज देखने की सिरदर्दी से बचने के लिए पोस्टमार्टम करना आसान समझा. बगैर मेहनत के काम में इतना पैसा तो मिलने से रहा कि कोई अपनी बेटी का हाथ थमा दे.’’

‘‘खैर, ऐसी बात तो नहीं है, मांजी, सरकारी डाक्टर को भी अच्छी तनख्वाह मिलती है. हो सकता है वह खुद ही शादी न करना चाहता हो. क्या नाम था रेणु की उस सहेली का, जिस की मौत हो गई थी?’’ धवल ने कुरेदा.

‘‘रैचेल. उस से रतन का क्या लेनादेना? उस आलसी को लड़कियों में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही. उसे तो दिन भर लेट कर टीवी देखने या उपन्यास पढ़ने का शौक है. सरकारी नौकरी में भी दुर्घटना की रिपोर्ट पर हार्ट फेल लिख दिया. वह किसी नेता के बेटे की लाश थी. उन का मुआवजा मारा गया सो उन्होंने उस की छुट्टी करवा दी,’’ मां ने कहा, ‘‘रेणु भी इसीलिए परेशान होगी कि इसे क्या काम दे.’’

सास से यह कह कर कि वह बच्चों को खाने के बाद घर छोड़ आएं और इसी बहाने रेणु से भी मिल लें, धवल ऋषि के घर आया. इस से पहले कि उस से सब सुन कर ऋषि कोई प्रतिक्रिया जाहिर करता, एक फोन आ गया.

‘‘रेणु भाभी पर नजर रख रही लड़की का फोन था. भाभी इस समय एडवोकेट कादिरी के चैंबर में हैं,’’ ऋषि ने फोन सुनने के बाद बताया, ‘‘घबरा मत यार, कादिरी तलाक के नहीं फौजदारी के मुकदमे का वकील है.’’

‘‘यह तो और भी घबराने की बात है. रेणु किस गुनाह में फंसी हुई है?’’

‘‘यह अगर तू खुद भाभी से पूछे तो बेहतर रहेगा. यह तो पक्का है कि वह तेरे से बेवफाई नहीं कर रही हैं सो वह जिस परेशानी में हैं उस में से उन्हें निकालना तेरा फर्ज है. अगर समस्या सुलझाने में कहीं भी मेरी जरूरत हो तो बताना.’’

जब धवल घर पहुंचा तो रेणु अपने मातापिता के साथ बैठी अनमने ढंग से बात कर रही थी. कुछ देर के बाद वे लोग उठ खड़े हुए और उस के पिता ने चलतेचलते कहा, ‘‘तू बेफिक्र रह बेटी, मैं रतन को आश्वासन दे देता हूं कि मैं उस की नौकरी लगवा दूंगा, वह तुझे परेशान न करे.’’

रेणु चुप रही मगर उस के चेहरे पर अविश्वास की मुसकान थी. सासससुर के जाते ही धवल ने मौका लपका.

‘‘यह डा. रतन मोहन है कौन, रेणु, जो सभी उस के लिए इतने परेशान हैं?’’

पहले तो रेणु सकपकाई फिर संभल कर बोली, ‘‘बाबूजी के करीबी दोस्त का बेटा है.’’

‘‘तब तो मेरा साला हुआ न, उसे तो अपने यहां काम मिलना ही चाहिए. भई, बाबूजी को फोन कर देता हूं कि उसे कल ही भेज दें, मरीज की केस हिस्ट्री नोट करने के लिए मुंहमांगी तनख्वाह पर रख लूंगा. बाबूजी का मोबाइल नंबर बोलो?’’

‘‘रहने दो, धवल. रतन को नौकरी नहीं चाहिए,’’ रेणु थके स्वर में बोली.

‘‘तो फिर क्या चाहिए?’’ धवल ने लपक कर रेणु को बांहों में भर लिया. धवल के स्पर्श की ऊष्मा से रेणु पिघल कर फूटफूट कर रोने लगी. धवल पहले तो चुपचाप उस की पीठ सहलाता रहा, फिर धीरे से बोला, ‘‘बताओ न, रेणु, रतन क्यों परेशान कर रहा है तुम्हें, क्या चाहिए उसे?’’

‘‘मेरी जान.’’

‘‘वह किस खुशी में, भई?’’

‘‘मेरी बेवकूफी की.’’

‘‘ऐसी कैसी बेवकूफी जिस की भरपाई जान दे कर हो? अगर तुम को मुझ पर भरोसा है तो मुझे सबकुछ खुल कर बताओ.’’

‘‘कैसी बात करते हो, धवल. तुम पर नहीं तो और किस पर भरोसा करूंगी? तुम्हें बेकार में परेशान नहीं करना चाहती थी सो अब तक चुप थी पर अब सहन नहीं होता,’’ रेणु ने सुबकते हुए कहा, ‘‘मैं ने गांधी अस्पताल में इंटर्नशिप की थी और उन दिनों रतन की नियुक्ति भी उसी अस्पताल में थी.

‘‘एक रोज मैं और मेरी सहेली रैचेल रतन के कमरे में बैठे हुए आपस में बात कर रहे थे कि नींद की गोलियों में कौन से ब्रांड की गोली सब से असरदायक होती है. रतन ने कहा कि किसी भी ब्रांड की गोली खाने से पहले अगर 1-2 घूंट ह्विस्की पी लो तो गोली जबरदस्त असर करती है. मेरे पूछने पर कि उसे कैसे मालूम, रतन ने कहा कि उस ने किसी उपन्यास में पढ़ा है और रासायनिक तथ्यों को देखते हुए बात ठीक भी हो सकती है.

‘‘रैचेल ने कहा कि अनिंद्रा की बीमारी से पीडि़त लोगों के लिए तो यह नुस्खा बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है लेकिन बगैर आजमाए तो किसी को बताना नहीं चाहिए. मुझे पता था कि रैचेल के घर में शराब का कोई परहेज नहीं है और ज्यादा थके होने पर रैचेल भी 1-2 घूंट लगा लेती है. मैं ने उस से कहा कि वह खुद पर ही यह फार्मूला आजमा के देख ले. भरपूर नींद सो लेगी तो अगले दिन तरोताजा हो जाएगी. रैचेल बोली कि ह्विस्की की तो कोई समस्या नहीं है लेकिन नींद की गोली बगैर डाक्टर के नुस्खे के नहीं मिलती, रतन अगर नुस्खा लिख दे तो वह तजरबा करने को तैयार है.

‘‘रतन ने कहा कि नुस्खे की क्या जरूरत है. रेणु की नाइट ड्यूटी आजकल आरथोपीडिक वार्ड में है, जहां आमतौर पर सब को ही गोली दे कर सुलाना पड़ता है. सो इस से कह, यह किसी मरीज के नाम पर तुम्हें भी एक गोली ला देगी. उस रात बहुत से मरीजों के लिए एक ही ब्रांड की गोली लिखी गई थी सो नर्स स्टोर से पूरी शीशी ले आई. आधी रात को सब की नजर बचा कर मैं ने वह शीशी अपने पर्स में रख ली और मौका मिलते ही रैचेल को दे दी.

‘‘अगले दिन हमारी छुट्टी थी. रात के 10 बजे के करीब रैचेल के पिता का फोन आया कि बहुत पुकारने पर भी रैचेल जब रात का खाना खाने नहीं आई तो उन्होंने उस के कमरे में जा कर देखा कि वह एकदम बेसुध पड़ी है. मैं ने उन्हें रैचेल को फौरन अस्पताल लाने को कहा और आश्वासन दिया कि मैं भी वहां पहुंच रही हूं. संयोग से रतन की उस रात नाइट ड्यूटी थी, मैं ने तुरंत उसे फोन पर सब बता कर कहा कि मुझे लगता है कि रैचेल ने तजरबा कर लिया. मैं ने उसे वार्ड से चुरा कर नींद की गोलियों की शीशी दी थी.

‘‘रतन बोला कि वह तो उसे मालूम है. आधी शीशी नींद की गोलियां गायब होने से वार्ड में काफी शोर मचा हुआ था, जिसे सुनते ही वह समझ गया था कि यह किस का काम है. खैर, चिंता की कोई बात नहीं, उसे बता दिया है सो वह सब संभाल लेगा और उस ने संभाला भी. अस्पताल पहुंचने से पहले ही रैचेल की मौत हो चुकी थी. रतन ने मौत की वजह मैसिव हार्ट अटैक बता कर किसी और डाक्टर के आने से पहले आननफानन में पोस्टमार्टम कर बौडी रैचेल के घर वालों को दे दी.

‘‘अगले रोज उस ने मुझे अकेले में बताया कि उस ने मुझे बचा लिया है. रैचेल ने काफी मात्रा में नींद की गोलियां खाई थीं. पलंग के पास पड़ी नींद की गोलियों की खाली शीशी भी उस के बाप को मिल गई थी, मगर रतन के समझाने पर कि आत्महत्या का पुलिस केस बनने पर उन की बहुत बदनामी होगी, उन्होंने चुपचाप रैचेल का जल्दी से अंतिम संस्कार कर दिया. यही नहीं जच्चाबच्चा वार्ड जहां रैचेल की ड्यूटी थी, वहां भी एक नर्स ने मुझे अचानक वार्ड में आ कर हंसते हुए रैचेल को कुछ पकड़ाते हुए देखा था. रतन ने उसे भी डांट कर चुप करा दिया कि सब के सामने हंसते हुए च्युंगम दी जाती है चुराई हुई नींद की गोलियों की शीशी नहीं.

‘‘मेरे आभार प्रकट करने पर रतन ने कहा कि खाली धन्यवाद कहने से काम नहीं चलेगा. जब वह किसी परेशानी में होगा तो वह जो कहेगा मुझे उस के लिए करना पड़ेगा. हामी भरने के सिवा कोई चारा भी नहीं था. उस के बाद से मैं रतन से डरने लगी थी, हालांकि उस ने दोबारा वह विषय कभी नहीं छेड़ा.

‘‘कुछ अरसे के बाद रैचेल की गोलियां खाने की वजह भी समझ में आ गई. डा. राममूर्ति ने एक रोज बताया कि वह और रैचेल एकदूसरे से प्यार करते थे और जल्दी ही शादी करने वाले थे लेकिन उस के घर वालों ने उस की शादी कहीं और तय कर दी थी.

राममूर्ति ने रैचेल को आश्वासन दिया था कि छुट्टी मिलते ही चेन्नई जा कर अपने घर वालों को सब बता कर वह रिश्ता खत्म कर देगा, लेकिन काफी कोशिश के बाद भी उसे छुट्टी नहीं मिल रही थी और रैचेल इसे उस की टालमटोल समझ कर काफी बेचैन थी. शायद इसी वजह से उस का हार्ट फेल हो गया. यह जान कर मेरे मन से एक बोझ उतर गया कि रैचेल की जान मेरे मजाक के कारण नहीं गई. वह आत्महत्या करने का फैसला कर चुकी थी. फिर मैं तुम से शादी कर के लंदन चली गई. वापस आने पर भी रतन से कभी मुलाकात नहीं हुई.

‘‘अब अचानक इतने साल बाद उस ने मुझे ब्लैकमेल करना शुरू किया है कि रैचेल की सही पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विसरा वगैरा उस के पास सुरक्षित है, जिस के बल पर वह मुझे कभी भी सलाखों के पीछे भेज सकता है. अपना मुंह बंद रखने की कीमत उस ने 1 लाख रुपए मांगी थी जो मैं ने चुपचाप उसे दे दी. आसानी से मिले पैसे ने उस की भूख और भी बढ़ा दी. उस ने मुझे कहा कि मैं और भी मेहनत कर के पैसे कमाऊं क्योंकि अब वह अपनी नहीं मेरी कमाई पर जीएगा…’’

‘‘जुर्म के सुबूत छिपाने वाला जुर्म करने वाले जितना ही अपराधी होता है सो रतन तुम्हें फंसाने की कोशिश में खुद भी पकड़ा जाएगा,’’ धवल ने रेणु की बात काटी.

‘‘यह बात मैं ने रतन से कही थी तब वह बोला, ‘कह दूंगा कि तुम्हारे रूपजाल में फंस कर मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी लेकिन अब विवेक जागा है तो मैं आत्मसमर्पण करना चाहता हूं. मुझे थोड़ीबहुत सजा हो जाएगी, तुम शायद सुबूतों के अभाव में बरी भी हो जाओ लेकिन यह सोचो कि तुम्हारी कितनी बदनामी होगी, तुम्हारे नर्सिंग होम की ख्याति और पति की प्रतिष्ठा पर कितना बुरा असर पड़ेगा?’

‘‘उस की दलील में दम था, फिर भी मैं ने एक जानेमाने वकील से सलाह ली तो उन्होंने भी यही कहा कि सजा तो मुझे नहीं होने देंगे लेकिन बदनामी और उस से होने वाली हानि से नहीं बचा सकते. अब तुम ही बताओ, धवल, मैं क्या करूं?’’ रेणु ने पस्त मन से पूछा.

‘‘अब तुम्हें कुछ करने या परेशान होने की जरूरत नहीं है. जो भी करना है, अब मैं सोचसमझ कर करूंगा. फिलहाल तो चलो, आराम किया जाए,’’ धवल ने रेणु को बांहों में भर कर पलंग पर लिटा दिया.

अगले रोज धवल ऋषि से मिला.

‘‘भाभी को कह कि यह टेप रिकार्डर हरदम अपने पास रखें और जब भी रतन का फोन आए, इसे आन कर दें, ताकि वह जो भी कहे इस में रिकार्ड हो जाए,’’ ऋषि ने सब सुन कर एक छोटी सी डिबिया धवल को पकड़ाई, ‘‘फिर रतन को देने के लिए जो भी पैसा बैंक से निकाले उन नोटों के नंबर वहां दर्ज करवा दे जिन की बुनियाद पर हम पुलिसकर्मी बन कर उसे ब्लैकमेल के जुर्म में गिरफ्तार करने का नाटक कर के उसे इतना डराएंगे कि वह फिर कभी भाभी के सामने आने की हिम्मत नहीं करेगा. उस के पकड़े जाने पर उस के डाक्टर बाप की इज्जत या प्रेक्टिस की साख पर असर नहीं पड़ेगा?’’

‘‘यह तो मैं ने सोचा ही नहीं था. रेणु के तजरबे के सुझाव ने खुद रेणु को फंसा दिया था पर लगता है तुम्हारा रतन को डराने का तजरबा सफल रहेगा.’’

‘‘होना भी चाहिए, यार. भाभी अपने गलत सुझाव के लिए काफी आर्थिक और मानसिक यातना भुगत चुकी हैं.’’

Family Story in Hindi

Romantic Story: रागरागिनी

Romantic Story: आज सुबह से ही बारिश ने शहर को आ घेरा है. उमड़घुमड़ कर आते बादलों ने आकाश की नीली स्वच्छंदता को अपनी तरह श्यामल बना लिया है. लेकिन अगर ये बूंदें जिद्दी हैं तो रागिनी भी कम नहीं. रहरह कर बरसती इन बूंदों के कारण रागिनी का प्रण नहीं हारने वाला.

ग्रीन टी पीने के पश्चात रागिनी ट्रैक सूट और स्पोर्ट शूज में तैयार खड़ी है कि बारिश थमे और वह निकल पड़े अपनी मौर्निंग जौग के लिए.

कमर तक लहराते अपने केशों को उस ने हाई पोनी टेल में बांध लिया. एक बार जब वह कुछ ठान लेती है, तो फिर उसे डिगाना लगभग असंभव ही समझो.

पिछले कुछ समय से अपने काल सैंटर के बिजनेस को जमाने में रातदिन एक करने के कारण न तो उसे सोने का होश रहा और न ही खाने का. इसी कारण उस का वजन भी थोड़ा बढ़ गया. उसे जितना लगाव अपने बिजनेस से है, उतना ही अपनी परफेक्ट फिगर से भी. इसलिए उस ने मौर्निंग जौग शुरू कर दी, और कुछ ही समय में असर भी दिखने लगा.

लंबी छरहरी काया और श्वेतवर्ण बेंगनी ट्रैक सूट में उस का चेहरा और भी निखर रहा था. उस ने अपनी कार निकाली और चल पड़ी पास के जौगर्स पार्क की ओर.

यों तो रागिनी के परिवार की गिनती उस के शहर के संभ्रांत परिवारों में होती है. मगर उस का अपने पैरों पर खड़े होने का सपना इतना उग्र रहा कि उस ने केवल अपने दम पर एक बिजनेस खड़ा करने का बीड़ा उठाया. तभी तो एमबीए करते ही कोई नौकरी जौइन करने की जगह उस ने अपने आंत्रिप्रिन्यौर प्रोग्राम का लाभ उठाते हुए बिजनेस शुरू किया. बैंक से लोन लिया और एक काल सैंटर डालने का मन बनाया. उस का शहर इस के लिए उतना उचित नहीं था, जितना ये महानगर.

जब उस ने यहां अकेले रह कर काल सैंटर का बिजनेस करने का निर्णय अपने परिवार से साझा किया, तो मां ने भी साथ आने की जिद की.

“आप साथ रहोगी तो हर समय खाना खाया, आराम कर ले, आज संडे है, आज क्यों काम कर रही है, कितने बजे घर लौटेगी, और न जाने क्याक्या रटती रहोगी. इसलिए अच्छा यही रहेगा कि शुरू में मैं अकेले ही अपना काम सेट करूं,” उस ने भी हठ कर लिया. घर वालों को आखिर झुकना ही पड़ा.

इस महानगर में रहने के लिए उस ने एक वन बेडरूम का स्टूडियो अपार्टमेंट किराए पर ले लिया. हर दो हफ्तों में एकलौता बड़ा भाई आ कर उस का हालचाल देख जाता है और हर महीने वो भी घर हो आती है. इस व्यवस्था से घर वाले भी खुश हैं और वह भी.

पार्क के बाहर कार खड़ी कर के रागिनी ने आउटर बाउंडरी का एक चक्कर लगा कर वार्मअप किया, और फिर धीरेधीरे दौड़ना आरंभ कर दिया.

आज पार्क के जौगिंग ट्रैक पर भी कीचड़ हो रहा था. बारिश के कारण रागिनी संभल कर दौड़ने लगी. मगर इन बूंदों ने भी मानो आज उसे टक्कर देने का मन बना रखा था, फिर उतरने लगीं नभ से.

भीगने से बचने के लिए रागिनी ने अपनी स्पीड बढ़ाई और कुछ दूर स्थित एक शेल्टर के नीचे पहुंचने के लिए जैसे ही मुड़ी, उस का पैर भी मुड़ गया. शायद मोच आ गई.

“उई…” दर्द के मारे वह चीख पड़ी. अपने पांव के टखने को दबाते हुए उसे वहीं बैठना पड़ा. असहनीय पीड़ा ने उसे आ दबोचा. आसपास नजर दौड़ाई, किंतु आज के मौसम के कारण शायद कोई भी पार्क में नहीं आया था. अब वह कैसे उठेगी, कैसे पहुंचेगी अपने घर. वह सोच ही रही थी कि अचानक उसे एक मर्दाना स्वर सुनाई पड़ा, “कहां रहती हैं आप?”

आंसुओं से धुंधली उस की दृष्टि के कारण वह उस शख्स की शक्ल साफ नहीं देख पाई. वह कुछ कहने का प्रयास कर रही थी कि उस शख्स ने उसे अपनी बलिष्ठ बाजुओं में भर कर उठा लिया.

“मेरी कार पार्क के गेट पर खड़ी है. मैं पास ही में रहती हूं,” रागिनी इतना ही कह पाई.

रिमझिम होती बरसात, हर ओर हरियाली, सुहावना मौसम, शीतल ठंडी बयार और किसी की बांहों के घेरे में वह खुद – उसे लगने लगा जैसे मिल्स एंड बूंस के एक रोमांटिक उपन्यास का पन्ना फड़फड़ाता हुआ यहां आ गया हो. इतने दर्द में भी उस के अधरों पर स्मित की लकीर खिंच गई.

उस ने रागिनी को कार की साइड सीट पर बैठा दिया और स्वयं ड्राइव कर के चल दिया.

“आप को पहले नहीं देखा इस पार्क में,” उस शख्स ने बातचीत की शुरुआत की.

रागिनी ने देखा कि ये परिपक्व उम्र का आदमी है – साल्टपेपर बाल, कसा हुआ क्लीन शेव चेहरा, सुतवा नाक, अनुपम देहयष्टि, लुभावनी रंगत पर गंभीर मुख मुद्रा. बैठे हुए भी उस के लंबे कद का अंदाजा हो रहा था.

“अभी कुछ ही दिनों से मैं ने यहां आना आरंभ किया है. आप भी आसपास रहते हैं क्या?” रागिनी बोली. वह उस की भारी मर्दानी आवाज की कायल हुई जा रही थी.

“जी, मैं यहीं पास में सेल्फ फाइनेंस फ्लैट में रहता हूं. अभीअभी रिटायर हुआ हूं. अब तक काफी बचत की. उसी के सहारे अब जिंदगी की सेकंड इनिंग खेलने की तैयारी है,” उस के हंसते ही मोती सी दंतपंक्ति झलकी.

“उफ्फ, कौन कह सकता है कि ये रिटायर्ड हैं. इन का इतना टोंड बौडी, आकर्षक व्यक्तित्व, मनमोहक हंसी, और ये कातिलाना आवाज,” रागिनी सोचने पर विवश होने लगी.

“बस, पास ही है मेरा घर,” वह बोली. पार्क के इतना समीप घर लेने पर उसे कोफ्त होने लगी.

किंतु घर ले जाने की जगह पहले वे रागिनी को निकटतम अस्पताल ले चले, “पहले आप को अस्पताल में डाक्टर को दिखा लेते हैं.”

उन्होंने रागिनी को फिर अपनी भुजाओं में उठाया और बिना हांफे उसे अंदर तक ले गए. वहां कागजी कार्यवाही कर के उन्होंने डाक्टर से बात की और रागिनी का चेकअप करवाया. उस की जांच कर के बताया गया कि पैर की हड्डी चटक गई है. 4 हफ्ते के लिए प्लास्टर लगवाना होगा. सुन कर रागिनी कुछ उदास हो उठी.

“आप के परिवार वाले कहां रहते हैं? बताइए, मैं बुलवा लेता हूं,” उसे चिंताग्रस्त देख वे बोले.

“वे सब दूसरे शहर में रहते हैं. यहां मैं अकेली हूं.”

“मैं हूं आप के साथ, आप बिलकुल चिंता मत कीजिए,” कहते हुए वे रागिनी को ले कर उस के घर छोड़ने चल पड़े.

घर में प्रवेश करते ही एक थ्री सीटर सोफा और एक सैंटर टेबल रखी थी. टेबल पर कुछ बिजनेस मैगजीन और सोफे पर कुछ कपड़े बेतरतीब पड़े थे.

घर की हालत देख रागिनी झेंप गई, “माफ कीजिएगा, घर थोड़ा अस्तव्यस्त है. वो मैं सुबहसुबह जल्दी में निकली तो…”

सोफे पर रागिनी को बिठा कर वे चलने को हुए कि रागिनी ने रोक लिया, “ऐसे नहीं… चाय तो चलेगी. मौसम की भी यही डिमांड है आज.”

“पर, आप की हालत तो अभी उठने लायक नहीं है,” उन्होंने कहा.

“डोंट वरी, मैं पूरा रेस्ट करूंगी. रही चाय की बात… तो वह तो आप भी बना सकते हैं. बना सकते हैं न?” रागिनी की इस बात पर उस के साथसाथ वे भी हंस पड़े.

रागिनी ने किचन का रास्ता दिखा दिया और उन्होंने चाय बनाना शुरू किया. दोनों ने चाय पी और एकदूसरे का नाम जाना. चाय पी कर वे लौटने लगे.

“फिर आएंगे न आप?” रागिनी के स्वर में थोड़ी व्याकुलता घुल गई.

“बिलकुल, जल्दी आऊंगा आप का हालचाल पूछने.”

“मुझे सुबह 7 बजे चाय पीने की आदत है,” जीभ काटते हुए रागिनी बोल पड़ी.

“हाहाहा…” अनुराग की उन्मुक्त हंसी से रागिनी का घर गुंजायमान हो उठा. “जैसी आप की मरजी. कल सुबह पौने 7 बजे हाजिर हो जाऊंगा.”

अनुराग से मिल कर रागिनी जैसे खिल उठी. आज उस का मन शारीरिक पीड़ा होने के बाद भी प्रफुल्लित हो रहा था. ऐसा क्या था आज की मुलाकात में जिस ने उस के अंदर एक उजास भर दिया. उस का चेहरा गुलाबी आभा से दमकने लगा. पैर के दर्द को भुला कर वह गुनगुनाने लगी, “मैं रंग शरबतों का, तू मीठे घाट का पानी, मुझ से खुद में घोल दे तो मेरे यार बात बन जानी…”

अगली सुबह जब तक अनुराग आए, रागिनी नहाधो कर अपने गीले केश लहराती किचन के पास आरामकुरसी डाल कर बैठ चुकी थी. उस का एक मन अनुराग के आकर्षण में बंधा प्रतीक्षारत अवश्य था, परंतु दूसरा मन उन के निजी जीवन में उपस्थित लोगों के प्रति चिंताग्रस्त था. उन का अपना परिवार भी तो होगा, यही विचार रागिनी के उफनते उत्साह पर ठंडे पानी के छींटे का काम कर रहा था.

“तो आप अर्ली राइजर हैं,” उसे एकदम फ्रेश देख कर अनुराग बोले.

“बस, आप का इंतजार कर रही थी, इसलिए आज जल्दी नींद खुल गई,” रागिनी की आंखों में अलग सा आकर्षण उतर आया. उस की भावोद्वेलित दृष्टि देख अनुराग कुछ विचलित हो गए. आगे बात न करते हुए वे चाय बनाने लगे.

“तो तय रहा कि अगले एक महीने तक आप यों ही रोज मेरे लिए चाय बनाएंगे,” रागिनी कह तो गई, पर सामने से कोई प्रतिक्रिया न आने पर संशय से घिर गई, “आप के घर वाले… आई मीन… आप की वाइफ और बच्चे… कहीं उन्हें बुरा तो नहीं लगा आप का मेरे घर इतनी सुबह आना.”

कुछ क्षण मौन रहने के पश्चात अनुराग कहने लगे, “मेरे कोई बच्चा नहीं है. एक अदद बीवी थी, पर उस से तलाक हुए एक अरसा बीत चुका है. मैं यहां अकेला रहता हूं.”

“तो फिर कोई दिक्कत नहीं. आज से मौर्निंग टी हम दोनों साथ में पिएंगे. यही पक्का रहा…?” कहते हुए उस ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया. अनुराग ने भी खुश हो कर उस से हाथ मिला लिया.

“आप की जेनेरेशन की यही बात मुझे बेहद पसंद है – नई चीजें, नए आयाम करने में आप लोग घबराते नहीं हैं. एक हम थे – बस लकीर के फकीर बने रहे ताउम्र,” रागिनी के बिजनेस के बारे में जान कर अनुराग बोले.

“चलिए, आप की जेनेरेशन का एक गाना सुनाती हूं,” कहते हुए रागिनी ने यूट्यूब पर एक गाना लगा दिया, “मैं तेरी, तू मेरा, दुनिया से क्या लेना…” उस का विचार था कि संगीत वातावरण को और भी रूमानी और खुशनुमा बनाता है.

“ये भी मेरे जमाने का गाना नहीं है,” कह कर अनुराग हंस पड़े, “अपने जमाने का गाना मैं सुनाता हूं,” और वे गाने लगे, “जीवन से भरी तेरी आंखें, मजबूर करें जीने के लिए…”

उन की मदहोश करने वाली आवाज में किशोर कुमार का ये अमर गीत जादू करने लगा. सभवतः रागिनी की नजरों में उठतेगिरते भावों को पढ़ने में अनुराग सक्षम थे. उन्होंने अपनी बात गीत के जरीए रागिनी तक पहुंचा दी. गीत के बोलों ने पूरे समां को रंगीन कर दिया. आज की सुबह का नशा रागिनी पर शाम तक बना रहा.

अगले दिन सवेरे जब अनुराग आए तो देखा, रागिनी का बड़ा भाई आया हुआ है. उस के प्लास्टर की बात सुन कर वह उस की खैरखबर लेने आ पहुंचा.

“ये हैं मेरे भैया… और ये हैं अनुरागजी, मेरे दोस्त,” रागिनी ने दोनों का परिचय करवाया.

“अंकलजी, अच्छा हुआ कि आप पास में रहते हैं. आप जैसे बुजुर्ग की छत्रछाया में रागू को छोड़ने में हमें भी इस की चिंता नहीं रहेगी,” भाई ने बोला, तो रागिनी का मुंह बन गया.

“अनुरागजी, बैठिए न. आज चाय बनाने की जिम्मेदारी मेरे भैया की. आप बस मेरे साथ चाय का लुत्फ उठाइए,” उस ने फौरन बीच में बोला.

अनुराग रागिनी की बात का मर्म समझ गए शायद, तभी तो मंदमंद मुसकराहट के साथ उस के पास ही बैठ गए.

चाय पीने के बाद इधरउधर की बातें कर रागिनी के भैया ने कहा, “अंकलजी, कल मैं लौट जाऊंगा. प्लीज, रागू का ध्यान रखिएगा.”

“क्या बारबार अनुरागजी को अंकलजी बोल रहे हो, भैया,” इस बार रागिनी से चुप नहीं रहा गया. उस के दिल का हाल भैया की समझ से परे था, सो बड़े शहरों के चोंचले समझ कर चुप रह गए.

प्लास्टर बंधे 2 हफ्ते बीत चुके थे. अनुराग हर सुबह रागिनी के घर आते, चाय बनाते, कभीकभी नाश्ता भी, और दोनों एक अच्छा समय साथ बिताते.

अनुराग की मदद से रागिनी अपने कई काम निबटा लेती. दोनों का सामीप्य काफी बढ़ गया था. दोनों एकदूसरे के गुणोंअवगुणों से वाकिफ होने लगे थे. एक रिश्ते को सुदृढ़ बनाने के लिए ये आवश्यक हो जाता है कि एकदूसरे की खूबियां और कमियां पहचानी जाएं और पूरक बन कर एकदूजे की दुर्बलताओं की पूर्ति की जाए. जिन कामों में रागिनी अक्षम थी जैसे अच्छा खाना पकाना, उसे अनुराग सिखाते. और जिन कामों में अनुराग पीछे थे जैसे आर्थिक संबलता के काम उन में वे रागिनी से सलाह लेने लगे थे. दोनों को एकदूसरे पर विश्वास होने लगा था.

प्लास्टर लगा होने के कारण रागिनी अपने काल सैंटर नहीं जा पा रही थी. बिजनेस पर इस का प्रभाव पड़ने लगा.

रागिनी की परेशानी अनुराग के अनुभव भरे जीवन के तजरबों ने दूर कर दी. बिना किसी नियुक्तिपत्र या वेतन के अनुराग ने रागिनी के काल सैंटर जाना आरंभ कर दिया. अब वे प्रतिदिन तकरीबन 5-6 घंटों के लिए उस के औफिस जाने लगे. मालिक के आने से मातहतों की उत्पादकता में फर्क आना वाजिब है. काल सैंटर का बिजनेस पहले से भी बेहतर चलने लगा.

“आप के अनुभव मेरे बहुत काम आ रहे हैं. इस के लिए आप को ट्रीट दूंगी,” रागिनी अपनी बैलेंस शीट देख कर उत्साहित थी.

“क्या ट्रीट दोगी? मुझे कोई भजन की सीडी दे देना.”

“व्हाट? भजन… मेरे पापा भी भजन नहीं सुनते हैं. खैर, वो आप से उम्र में छोटे भी तो हैं,” कह कर रागिनी ने कुटिलता से मुसकरा कर अनुराग की ओर देखा. फिर पेट पकड़ कर वह हंसते हुए कहने लगी, “आप की लेग पुलिंग करने में बड़ा मजा आता है. पर अगर आप सीरियस हैं तो मैं आप को बिग बैंग थ्योरी पर एक वीडियो शेयर करूंगी, ताकि आप की सारी गलतफहमी दूर हो जाए कि ये दुनिया कैसे बनी.” “मैं मजाक कर रहा हूं. जानता हूं कि दुनिया कैसे बनी. मैं तो बस तुम्हें अपनी उम्र याद दिलाना चाह रहा था,” अनुराग अब भी गंभीर थे. शायद मन में उठती भावनाओं को स्वीकारना उन के लिए कठिन हो रहा था. परंतु रागिनी की इस रिश्ते को ले कर सहजता, सुलभता और स्पष्टता उन्हें अकसर चकित कर देती.

एक दिन रागिनी ने अनुराग को अपने घर लंच पर न्योता दिया, “हर बार आप के हाथ का इंडियन खाना खाते हैं. आज मेरा हाथ का लेबनीज क्विजीन ट्राई कीजिए. वीडियो देख कर सीखा है मैं ने.”

“तुम खाना पकाओगी?” अनुराग ने रागिनी की खिंचाई की.

“मैं तो पका लूंगी, पर तुम को पच जाएगा कि नहीं, ये नहीं कह सकती,” आज रागिनी अनुराग को ‘आप’ संबोधन से ‘तुम’ पर ले आई. समीप आने के पायदान पर एक और सीढ़ी चढ़ते हुए.

“क्यों नहीं पचेगा? मुझे बुड्ढा समझा है?” अनुराग ने ठिठोली में आंखें तरेरीं. “अर्ज किया है – उम्र का बढ़ना तो दस्तूरेजहां है, महसूस न करें तो बढ़ती कहां है.”

“वाह… वाह… तो शायरी का भी शौक रखते हैं जनाब. आई मीन, माई ओल्ड मैन,” हंसते हुए रागिनी कम शब्दों में काफी कुछ कह गई.

“चलो, तुम कहती हो तो मान लेता हूं. हो सकता है कि मैं सच में बूढ़ा हो गया हूं. तुम्हारे बड़े भैया तो मुझे अंकलजी पुकारते हैं.”

“ऊंह… उन का तो दिमाग खराब है. तुम्हें पता है उन की एक गर्लफ्रेंड है – फिरंगी. फेसबुक पर मुलाकात हुई. फिर भैया उस से मिलने उस के देश हंगरी भी गए. पता चला, उसे भैया पर तभी विश्वास हुआ जब भैया ने प्रत्यक्ष रूप से उसे विश्वास दिलाया कि वे उस से प्यार करते हैं. इस का कारण – वह प्यार में 2 बार धोखा खा चुकी है. एक फिरंगी लड़की प्यार में धोखा खाए, इस का मतलब समझते हो न? उन के यहां शादी बाद में होती है, बच्चे पहले. तो फिर हुई न वो 2 बार शादीशुदा… लेकिन, मेरी फैमिली को कोई एतराज नहीं है. मुझे भी नहीं है. पर यही आजादी मुझे अपनी जिंदगी में भी चाहिए. मैं समाज का दोगलापन नहीं सह सकती. मैं हिपोक्रेट नहीं हूं. जो मुझे पसंद आएगा, उसे मेरे परिवार को भी पसंद करना पड़ेगा. उस समय कोई अगरमगर नहीं चलने दूंगी,” रागिनी बेसाख्ता कहती चली गई. अपने विचार प्रकट करने में वह निडर और बेबाक थी. अनुराग इशारा समझ चुके थे.

“वो क्या कहती है तुम्हारी जेनेरेशन… इस बात पर तुम्हें हग करने को जी चाह रहा है,” अनुराग ने माहौल को हलका बनाते हुए कहा.

“ऐज यू प्लीज,” कहते हुए रागिनी ने अनुराग को गले लगा लिया. स्पर्श में अजीब शक्ति होती है, उसे शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती. आलिंगनबद्ध होते ही दोनों एकदूसरे की धड़कन सुनने के साथसाथ, एकदूसरे का भोवोद्वेलन भी समझ गए. बात आगे बढ़ती, इस से पहले अनुराग ने रागिनी को स्वयं से दूर कर दिया.

“दिन में सपने देख रही हो?” अनुराग ने पूछ लिया.

“दिन में सपने देखने को प्लानिंग कहते हैं… और, मैं अपनी लाइफ की हीरो हूं, इसलिए इस के सपने भी मैं ही डिसाइड करूंगी,” रागिनी का अपने दिल पर काबू नहीं था. उस की चाहतों की टोह लेते हुए अनुराग को वहां से चले जाने में ही समझदारी लगने लगी.

अगले दिन जब अनुराग आए तो रागिनी के घर का नक्शा बदला हुआ था. लिविंग रूम के बीचोंबीच रखी सैंटर टेबल पर लाल गुलाबों का बड़ा सा गुलदस्ता सजा था. आसपास लाल रिबन से बने हुए ‘बो’ रखे थे. सोफे के ऊपर वाली दीवार पर एक कोने से दूसरे कोने तक एक डोरी में रागिनी की तसवीरें टंगी हुई थीं, जिन में वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

अनुराग की नजर कभी किसी फोटो पर अटक जाती तो कभी दूसरी पर. हर तसवीर में एक से एक पोज में रागिनी की मनमोहक छटा सारे कक्ष को दीप्तिमान कर रही थी. आज कमरे के परदे खींच कर हलका अंधियारा किया हुआ था, जिन में दीवारों पर सजी फेयरी लाइट्स जगमगा रही थीं. पार्श्व में संगीत की धुन बज रही थी. शायद कोई रोमांटिक गीत का इंसट्रूमेंटल म्यूजिक चलाया हुआ था.

अनुराग अचकचा गए. आज ये घर कल से बिलकुल भिन्न था. “रागिनी,” उन्होंने पुकारा.

पिंडली तक की गुलाबी नाइटी में रागिनी अंदर से आई. उस के रक्ताभ कपोल, अधरों पर फैली मुसकान, आंखों में छाई मदहोशी, और खुले हुए गेसू – एक पल को अनुराग का दिल धक्क से रह गया. लगा जैसे वो उम्र के तीस वर्ष पीछे खिंचते चले गए हों. उन की नजर में भी एक शरारत उभर आई. नेह बंधन की कच्ची डोर ने दोनों को पहले से ही कस कर पकड़ना शुरू कर दिया था. आज के माहौल से आंदोलित हुई भावनाएं तभी थमीं, जब शरमोहया के सारे परदे खुल गए. आज जो गुजरा, उस के बारे में अनुराग ने सोचा न था. परंतु जो भी हुआ, दोनों को आनंदित कर गया.

अंगड़ाई लेते हुए रागिनी के मुंह से अस्फुट शब्द निकले, “आज सारे जोड़ खुले गए… कहीं कोई अड़चन नहीं बची.”

उसे प्रसन्न देख अनुराग भी प्रफुल्लित हो गए, “जानती हो रागिनी,” उस के बालों में उंगली फिराते हुए उन्होंने कहा, “मेरी शादी बहुत कड़वी रही. बहुत घुटन थी उस में. ऐसा तो नहीं हो सकता न कि हम सांस भी न लें और जिंदा भी रहें. खैर, मैं भी पता नहीं क्या बात ले बैठा… इस समय, तुम से… न जाने क्यों?”

“मुझे अच्छा लगा यह जान कर कि तुम ने मेरे समक्ष अपने दिल की परत खोली. प्रेम केवल अच्छी बातें, सुख और कामना नहीं. प्रेम में मन का कसेलापन भी शामिल होता है. प्रेम में हम दुखतकलीफें न बांट सकें तो फिर ये तकल्लुफ हुआ, प्यार नहीं,” रागिनी अनुराग के और निकट आ कर संतुष्ट हुई.

बाहर टिपटिप गिरती बूंदें एक राग सुनाने लगीं. कमरे के अंदर आती पवन चंपई गंध लिए थी. आज की खामोशी में एक संगीत लहरा रहा था. प्यार उम्र नहीं देखता, समर्पण चाहता है.

इस प्रकरण के बाद रागिनी और अनुराग के बीच एक अटूट रिश्ता बन गया. अब उन्हें बातों की आवश्यकता नहीं पड़ती. आंखों से संपर्क साधना सीख लिया था उन के रिश्ते ने. दोनों के बीच एक लहर प्रवाहित होती जो मौन में भी सबकुछ कह जाती. मन के सभी संशय मीठे अनुनाद में बदल चुके थे. यही तो सच्चा और अकूत प्रेम है.

जब रागिनी का प्लास्टर उतरा, तब वह पहली बार अनुराग के घर गई.

“तो यहां रहते हैं आप?” बिना किसी तसवीर या चित्रकारी के नीरस दीवारें, बेसिक सा सामान, पुराने बरतन, पुराना फर्नीचर. घर में कुछ भी आकर्षक नहीं था. लेकिन रागिनी चुप रही. हर किसी का जीने का अपना एक ढंग होता है. उस पर आक्रमण किसी को नहीं भाता. जो कुछ बदलाव लाएगी, वो धीरेधीरे.

“अपने फोटो एलबम दिखाइए,” रागिनी की डिमांड पर अनुराग कुछ एलबम ले आए. उन में अनुराग के बचपन की, जवानी की तसवीरें देख रागिनी हंसती रही.

“पहले मेरे बाल काफी काले थे,” अपने खिचड़ी बालों की वजह से सकुचाते हुए अनुराग बोले, “क्या फिर कलर कर लूं इन्हें?”

“नहीं, आप साल्ट एंड पेपर बालों में ही जंचते हैं. ये तो आजकल का फैशन है. मैच्यौर्ड लुक, यू सी,” रागिनी ने कहा. फिर मौके का फायदा उठाते हुए वह कहने लगी, “अगर कुछ चेंज करना ही है तो इस घर में थोड़े बदलाव कर दूं? यदि आप कहें?”

“मेरा सबकुछ तुम्हारा ही तो है. जो चाहो करो,” अनुराग से अनुमति पा कर रागिनी हर्षित हो उठी.

“ठीक है, तो कल से ही काम चालू,” कह कर रागिनी खिलखिला पड़ी.

अब रागिनी अकसर अनुराग के घर आती, और वो उस के. दोनों एकदूसरे के हो चुके थे – तन से भी, मन से भी और काम से भी. एक खुशहाल साथ बसर करते दोनों को कुछ हफ्ते बीत चुके थे कि एक दिन अनुराग कहने लगे, “ऐसे कब तक चलेगा, रागिनी? मेरा मतलब है कि बिना शादी किए हम यों ही…”

“क्यों, आप को कोई परेशानी है इस अरेंजमेंट से?”

“नहीं, मुझे गलत मत समझो रागिनी, तुम्हारे आने से मेरे मुरदा जीवन में जैसे प्राण आने लगे हैं. इस बेजान मकान को एक घर की सूरत मिलने लगी है. तुम ने इस की शक्ल बदल कर मुझ पर बड़ा एहसान किया है. पर तुम एक जवान लड़की हो, क्या तुम्हारे परिवार वाले मुझे स्वीकारेंगे?” अनुराग ने अपने मन में उठती शंकाओं के पट खोल दिए.

“शादी किसी रिश्ते को शक्ति व सामर्थ्य देने का ढंग है, बस. जब हम दोनों एकदूसरे के हो चुके हैं, तो फिर हमें किसी बाहरी ठप्पे की जरूरत नहीं है. हम जैसे हैं, खुश हैं.

“रही बात समाज की, तो समाज हम से ही बनता है. हमारी नीयत में जब खोट नहीं तो हम किसी से क्यों डरें?”

रागिनी के विचार सच में आज की पीढ़ी की बेबाक सोच प्रस्तुत कर रहे थे. जबकि अनुराग के विचार अपनी पीढ़ी के ‘लोग क्या कहेंगे’ की परिपाटी दर्शा रहे थे. यही तो फर्क है दोनों में. मगर जब सोच लिया कि साथ निभाना है तो फिर घबराना कैसा? मुश्किलों का आना तो पार्ट औफ लाइफ है. उन में से हंस कर बाहर आना, यही आर्ट औफ लाइफ है.

Romantic Story

Relationship Advice: जिससे प्यार करती हूं वह शादीशुदा है, क्या करूं?

Relationship Advice

मैं 3 महीने से रिलेशनशिप में हूं. पिछले दिनों मुझे पता चला कि मैं जिस लड़के से प्यार करती हूं वह पहले से ही शादीशुदा है और उस के 2 बच्चे भी हैं. यह सब मुझे उस के फोन के फोटोज के जरिए पता चला. उसे इस बारे में नहीं पता कि मैं सब जान गई हूं. ऐसी स्थिति में आप बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए?

आप को यह बात फोटो के जरिए पता चली है, यह बहुत बड़ा संकेत है, लेकिन पूरी तसवीर जानना जरूरी है. क्या यह वही इंसान है? क्या उस की शादी अब भी कायम है या वह अलग हो चुका है? क्या वह आप से झूठ बोल कर रिलेशनशिप में आया है? इसलिए पहला कदम यह हो कि एक बार खुद से शांत दिमाग से सब जानने की कोशिश करें, बिना उसे बताए.

अब बात आती है भावनाओं की कि क्या आप ऐसा रिश्ता चाहती हैं? अगर वह आदमी शादीशुदा हैं और उस के बच्चे हैं, तो आप को खुद से यह सवाल करना होगा- क्या मैं ऐसे इंसान के साथ रिश्ता चाहती हूं जिस ने मुझे सच्चाई नहीं बताई? अगर वह अपने परिवार को धोखा दे सकता है, तो क्या मुझे नहीं देगा? क्या मैं किसी के घरपरिवार के बीच दरार बनने का हिस्सा बनना चाहती हूं?

अगर इन सब का जवाब आप के पक्ष में न हो तो इस रिश्ते को तोड़ लेना ही बेहतर उपाय है. अपने मन को यह समझाइए कि आप जिस इंसान से जुड़ी थीं वह ईमानदार नहीं था. दर्द होगा, लेकिन सच्चाई जानना अपनेआप में ताकत है. यह आप की गलती नहीं है. प्यार करने में कोई गलती नहीं. किसी के झूठ पर यकीन कर लेना आप की मासूमियत दिखाता है, बेवकूफी नहीं.

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मेरी भाई का फ्रैंड, जिस का हमारे घर खूब आनाजाना था, मुझे पसंद करने लगा है और मैं भी उसे चाहती हूं. अभी हम दोनों पढ़ाई कर रहे हैं. इस बात की खबर भाई को नहीं है जबकि मां को शक है. मां भाई के फ्रैंड को घर नहीं आने देतीं. मैं उसे भूल नहीं सकती. क्या मैं उस के साथ भाग जाऊं?

आप की भावनाएं बिलकुल सच्ची हैं और यह बहुत सामान्य है कि उम्र के इस पड़ाव पर जब कोई आप की परवा करता है, समझता है और करीब होता है, तो दिल जुड़ ही जाता है. आप की बातों से साफ है कि आप दोनों एकदूसरे को चाहते हैं लेकिन अभी आप दोनों पढ़ाई कर रहे हैं और अपने भविष्य की नींव बना रहे हैं, ऐसे में किसी भी बड़े कदम, जैसे कि घर से भाग जाना, का फैसला बेहद जोखिमभरा हो सकता है. यह न सिर्फ आप के परिवार को तोड़ेगा बल्कि आप के खुद के सपनों और कैरियर पर असर भी डाल सकता है.

आप का रिश्ता अभी छिपा हुआ है. मां को शक है और भाई को पता तक नहीं. ऐसे में यह रिश्ता भरोसे और पारदर्शिता के बिना आगे नहीं बढ़ सकता. रिश्तों को मजबूत करने के लिए जरूरी होता है कि वे समाज और परिवार की नजरों में भी ईमानदार हों.

भाग जाना एक पल की राहत जरूर देगा लेकिन उस से आप के और उस के जीवन में लंबे समय तक तनाव, आर्थिक परेशानियां और भावनात्मक टूटन आ सकती है.

अगर आप उसे सच में चाहती हैं तो उसे खोने का डर नहीं बल्कि उस के साथ ठीक तरीके से जिंदगी बिताने की कोशिश करनी चाहिए. अभी पढ़ाई पूरी करें, खुद को आत्मनिर्भर बनाएं, फिर अपने रिश्ते को परिवार के सामने इज्ज़त से रखें. यकीन मानिए, वक्त और समझदारी से लिया गया फैसला ही सच्चे प्यार को टिकाऊ बनाता है. प्यार में भाग जाना नहीं, साथ मिल कर आगे बढ़ना जरूरी होता है.

Relationship Advice

Bikini Influencers: क्या बिकिनी मौडलिंग ही ब्यूटी है

Bikini Influencers: सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम, पर फैशन इन्फ्लुएंसर्स की लंबीचौड़ी फौज खड़ी हो गई है. इन का एक सैक्शन खुद को सोशल मीडिया मौडल कहता है. दिलचस्प यह है कि इन में फीमेल मौडल ही सोशल मीडिया पर टिक पाती हैं. उन्हीं को फौलोअर्स और लाइक्स भरभर कर मिल रहे होते हैं. मेल मौडल का तो अतापता तक नहीं चलता.

सोचने वाली बात यह है कि ये इन्फ्लुएंसर्स, जो खुद को मौडल कहती हैं, मौडलिंग के नाम पर सिर्फ अपना शरीर दिखाती हैं. बेशक इस में कोई हर्ज नहीं, वे चाहे जैसा दिखें या दिखाएं. वे दिखाती हैं क्योंकि उन के पास मौडलिंग का महज यही सैंस है. मगर समस्या उन की है जो उन्हें देखते हैं, उन्हें लाइक करते हैं और फौलो करते हैं. इन्हें न मौडलिंग का सैंस है न इस बात का कि वे इन्हें फौलो-लाइक कर के हासिल क्या कर रहे हैं. सोशल मीडिया की मौडल तो यह कर के पैसा कमा रही हैं मगर देखने वाले क्या कमा रहे हैं?

यहां कुछ ऐसे इंस्टा मौडल के नाम हैं जो रैगुलर्ली बिकिनी फोटोज पोस्ट करती हैं और कई बार वायरल भी होती हैं-

केट शर्मा ये हौट बिकिनी लुक्स में फोटोज शेयर करती हैं और ब्यूटीफुल कर्व्स के लिए जानी जाती हैं. इन की अधिकतर पिक्चर्स में मौडलिंग के नाम पर अंग प्रदर्शन दिखाई पड़ता है.

नेहा मलिक इंस्टा पर स्ट्रिंग बिकिनी में बोल्ड पोज देती हैं ये और बहुत फास्ट ग्रो कर रही हैं. इन्हें खूब लाइक्स और शेयर मिलते हैं. लोग इन के कमैंट में सैक्सी, बोल्ड, और हौट खूब लिखते हैं.

साक्षी मलिक  ‘बम डिग्गी डिग्गी’ गर्ल अब इंस्टा पर बिकिनी शूट्स के लिए ट्रैंड में रहती हैं.

उर्फी जावेद डिफरैंट और एक्स्ट्रा एक्सपोजिंग आउटफिट्स के लिए फेमस हैं ये. हालांकि बीते समय में इन्होंने अपनी इस छवि पर काम करना शुरू किया है.

आभा पौल ये स्टिमी फोटोशूट्स के लिए जानी जाती हैं. इंस्टा पर 1.5 मिलियन फौलोअर्स हैं इन के. इन के पोज ख़ास इंटैंशन से भरे रहते हैं.

सोफिया अंसारी 1 करोड़ 50 लाख से ज्यादा फौलोअर्स के साथ, बिकिनी में डांस और ट्रैंडिंग वीडियो पोस्ट करती हैं ये. ये फैशन पोस्ट कम जबकि हौट फोटो और रील ज्यादा अपलोड करती हैं.

खुशी मुखर्जी – हाल में काफी ट्रैंड में रही हैं ये. अजीबोगरीब कपड़े पहनने में माहिर है ये. हाल में इन्होंने ऐसी साइड स्लिट ड्रैस पहनी जिस के अंदर उन्होंने इनरवियर नहीं पहनी थी, जिसे ले कर ये काफी ट्रौल हुईं.

दरअसल, इन का मेजर फोकस फिजिकल अट्रैक्शन और सैंसुअल प्रजैंस पर होता है. इन्हें मौडलिंग की समझ न के बराबर होती है मगर इन्हें यह समझ खूब होती है कि सोशल मीडिया पर लोग क्या देखना चाहते हैं. यह भी हो सकता है कि इन्हें मौडलिंग की समझ हो मगर ये अच्छे से जानती हैं कि इन के फौलोअर्स और व्यूअर्स को क्या देखना अच्छा लगता है.

प्रोज और कौन्स

 पौजिटिव पौइंट्स

  • ये इंफ्लुएंसर्स अपने बौडी टाइप को कौन्फिडैंस के साथ शो करती हैं, जिस से बौडी पौजिटिविटी को बढ़ावा मिलता है.
  • ब्रैंड्स इन्हें प्रमोशन्स, शूट्स और स्पौंसरशिप के लिए अप्रोच करते हैं, जिस से ये फाइनैंशियली इंडिपेंडैंट बनती हैं.
  • ये जल्दी वायरल हो जाती हैं और इन्हें ढेरों फौलोअर्स मिल जाते हैं.
  • इन की रील पर करोड़ से भी अधिक व्यूज मिल जाते हैं और इन की एंगेजमैंट भी बढ़िया रहती है.

नैगेटिव पौइंट्स

  • लगातार बिकिनी फोटोज से ब्यूटी का स्टैंडर्ड सिर्फ फिजिकल अपीयरैंस तक सिमट जाता है.
  • यंग गर्ल्स पर यह प्रैशर बन जाता है कि फेमस होने के लिए उन्हें भी ऐसा करना पड़ेगा.
  • कभीकभी ये कंटैंट बौर्डर लाइन औब्जेक्टिफाइंग हो जाते हैं जहां सिर्फ बौडी दिखाना ही मेन कंटैंट बन जाता है.
  • अश्लील कमैंट झेलने पड़ते हैं.
  • इन का कैरियर ज्यादा दिनों तक टिकता नहीं, क्योंकि बौडी को मेंटेन भी खूब करना पड़ता है.
  • ये इस के लिए सर्जरी करवाती हैं, मगर कभीकभी इन का रिस्क भी बढ़ जाता है.

क्लास बनाम औब्जेक्टिफिकेशन

बोल्ड होना गलत नहीं है, लेकिन अगर बोल्ड का मतलब सिर्फ शरीर दिखाना बन जाए तो वो एक्सप्रेशन नहीं, औब्जेक्टिफिकेशन बन जाता है. ऐसी कई इंस्टा इंफ्लुएंसर हैं, जैसे कोमल पांडे, कृतिका खुराना (बोहो गर्ल), जो पूरे कपड़ों में भी स्टाइल, ग्रेस और पर्सनैलिटी शो करती हैं. उन का कंटैंट आर्टिस्टिक और ट्रैंडी होने के साथसाथ रिस्पैक्टफुल भी होता है.

अगर हर पोस्ट सिर्फ एक्सपोजर पर बेस्ड हो, तो मैसेज यह जाता है कि ‘लुक्स इज एवरीथिंग’. हमें ऐसा एनवायरनमैंट बनाना चाहिए जहां ग्रेस, इंटैलिजैंस और एथिक्स भी फौलोअर्स और लाइक्स डिसाइड करें. मगर सोशल मीडिया पर ऐसी उम्मीद की नहीं जा सकती.

बिकिनी पहनना चौइस है, कोई गलत चीज नहीं. लेकिन जब वही बिकिनी हर पोस्ट की जान बन जाए और सिर्फ फिजिकल अट्रैक्शन से ही फौलोअर्स बढ़ें, तो फिर सोचने की जरूरत है कि क्या हम ब्यूटी को बहुत ही लिमिटेड तरीके से डिफाइन तो नहीं कर रहे?

खूबसूरती सिर्फ स्किन या बौडी में नहीं होती वह होती है सोच, बिहेवियर और ग्रेस में. बिकिनी में कौन्फिडैंट लगना एक स्ट्रैंथ हो सकती है, लेकिन इस में जब तक क्रिएटिविटी नहीं हो तो वह सपाट और बेहूदा लगने लगती है.

Bikini Influencers

Masoom Minawala: फैशन इंफ्लुएंसर का रौयल चेहरा

Masoom Minawala भारत की उन चंद विमेंस में से एक हैं जिन्होंने इंटरनैशनल फैशन सर्किल में अपनी जगह बनाई है. खासकर, पैरिस फैशन वीक और कान्स फिल्म फैस्टिवल जैसे ग्लैमरस इवैंट्स में उन की मौजूदगी हर बार चर्चा का विषय बनती है.

उन की स्टाइल काफी एलिगेंट और क्लासिक होती है जिस में अकसर हाईएंड लग्जरी ब्रैंड्स, जैसे लुई विटों, डिओर, शनेल, फेंदी, बालमेन आदि के आउटफिट्स देखने को मिलते हैं. वे ट्रेडिशनल इंडियन वियर और वैस्टर्न स्टाइल दोनों को ही बखूबी कैरी करती हैं. उन का स्टाइल ‘रौयल और रिफाइंड’ की परिभाषा बन चुका है.

मासूम की 14 लाख की इंस्टा फौलोइंग उन्हें इंडिया की टौप फैशन क्रिएटर्स में गिनती है. मासूम मीनावाला का इंस्टा कंटैंट उन लोगों के लिए है जो लक्जरी, ग्लोबल फैशन और एलिवेटेड इंडियन स्टाइल में इंट्रैस्टेड हैं. वो इंडियन आउटफिट्स को भी इंटरनैशनल टच के साथ प्रेजैंट करती हैं, जैसे साड़ी विद ग्लव्स, लीला ज्वेलरी विद वैस्टर्न हेयरडू आदि. उन्होंने कान्स फिल्म फैस्टिवल, मिलान फैशन वीक, पैरिस फैशन वीक जैसे इंटरनैशनल इवैंट्स को कवर किया है. वहां के उन के आउटफिट्स और व्लौग-स्टाइल वीडियोज बहुत वायरल होते हैं.

उन के पोस्ट्स में अकसर एंपौवर प्रोजैक्ट का जिक्र होता है जहां वो वुमन लीडरशिप, बिजनैस और प्रोफैशनल ग्रोथ को प्रमोट करती हैं.

कभीकभी इंटरव्यूज, पोडकास्ट क्लिप्स और मोटिवेशनल कैप्शन भी डालती हैं वे. उन के आउटफिट्स और व्लौग-स्टाइल वीडियोज बहुत वायरल होते हैं.

मासूम मीनावाला का जन्म मुंबई, महाराष्ट्र में एक गुजराती बिजनैस फैमिली में हुआ. उन का बचपन एक प्रिविलेज्ड और कल्चर्ड माहौल में बीता जहां एजुकेशन, ट्रेडिशन और ग्रेस को खास अहमियत दी जाती थी. उन के पेरैंट्स हमेशा उन्हें इंडिपेंडैंट और कैरियरओरिएंटेड बनने के लिए मोटिवेट करते रहे. उन का इंट्रैस्ट बचपन से ही फैशन, डांस और क्रिएटिव आर्ट्स में था.

मासूम ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मुंबई से की. उस के बाद उन्होंने बौम्बे स्कौटिश स्कूल से स्कूलिंग पूरी की और आगे की पढ़ाई के लिए एचआर कालेज औफ कौमर्स एंड इकोनौमिक्स जौइन किया.

ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने फैशन में प्रौपर ट्रेनिंग और डिजिटल मीडिया पर ध्यान देना शुरू किया. उन्होंने फुलटाइम कोई फैशन कोर्स नहीं किया बल्कि हैंड्स-औन एक्सपीरियंस और इंटरनैट रिसर्च से ही खुद को ग्रूम किया.

वर्ष 2010 के आसपास मासूम ने एक फैशन व्लौग शुरू किया– ‘स्टाइल फिएस्टा’. तब भारत में व्लौगिंग और फैशन इंफ्लुएंसर का ट्रैंड नया था. उन्होंने उस स्पेस को बखूबी कैप्चर किया. धीरेधीरे उन के व्लौग ने पौपुलैरिटी पाई और उन्होंने स्टाइल फिएस्टा को एक ईकौमर्स फैशन वैबसाइट में कन्वर्ट कर दिया. बाद में उन्होंने इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर भी ऐक्टिव होना शुरू किया और ग्लोबल औडियंस को टारगेट किया.

मासूम मीनावाला आज भारत की टौप फैशन और लग्जरी इंफ्लुएंसर्स में गिनी जाती हैं. शुरुआत से ही मासूम ने ऐसा फ्रेमवर्क तैयार किया जो इंडियन फैशन को वर्ल्ड मैप पर लाने का काम करता है चाहे वह उन के कौन्टेन्ट के जरिए हो या फिर उन के एंटरप्रेन्योरियल इनिशिएटिव्स के जरिए.

मासूम मीनावाला ने अपनी जर्नी की शुरुआत एक ऐसे विजन के साथ की जिस में उन्होंने इंडियन फैशन को वर्ल्ड मैप पर लाने की बात कही. लेकिन उन का यह सफर हमेशा हाईएंड ब्रैंड्स, इंटरनैशनल प्लेटफौर्म्स और ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के इर्दगिर्द ही रहा है जो सीधेतौर पर आम लोगों से जुड़ता नहीं दिखता.

उन के कौन्टेन्ट और एंटरप्रेन्योर इनिशिएटिव्स एक ऐसे क्लास के लोगों के लिए हैं जो पहले से ही फाइनैंशियली स्ट्रौंग हैं, जिन के लिए फैशन एक लग्जरी है, जरूरत नहीं.

500 से ज्यादा इंटरनैशनल ब्रैंड्स के साथ कोलैब करना, हाईप्रोफाइल इवैंट्स में दिखना, या फिर स्टार्टअप्स में एंजेल इन्वेस्टमैंट करना आदि सबकुछ उस क्लास की बाते हैं जो पहले से ही प्रिविलेज्ड है.

मासूम की एंपौवर इनिशिएटिव सुनने में काफी मोटिवेटिंग लगती है लेकिन उस का टारगेट ग्रुप वही महिलाएं हैं जो या तो पहले से बिज़नैस में हैं या जिन्हें एक्सपोजर, नैटवर्क और रिसोर्सेज मिल रहे हैं. गांवकसबों या मिडिल क्लास वर्किंग वीमेन से इस का कोई डायरैक्ट कनैक्शन नहीं दिखता.

वे भले ही ‘कम्युनिटी में इंपैक्ट’ और ‘सोशल रिस्पौन्सिबिलिटी’ की बात करती हों, लेकिन उन की कम्युनिटी वही है जो ब्रैंडेड बैग्स, डिज़ाइनर ड्रैस और इंटरनैशनल ट्रैवल से जुड़ी है.

मासूम की जर्नी इंस्पायरिंग जरूर है लेकिन सिर्फ उस दुनिया के लिए जहां स्टाइल, ब्रैंड्स और पैसा ही पहली पहचान है. आम लोग उसे, बस, देख सकते हैं, महसूस नहीं कर सकते.

अगर आप भी उसी लक्जरी वर्ल्ड का हिस्सा हैं तो शायद आप उन के कौन्टेन्ट से कुछ सीख सकते हैं. लेकिन अगर आप एक आम मिडिल क्लास फैमिली से आते हैं तो ये सब एक ड्रीम जैसा शोऔफ ही लगेगा.

Masoom Minawala

Aryan Khan: शाहरुख के बेटे बने डायरेक्टर, मीडिया के सामने छूटे पसीने

Aryan Khan: शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान 4 साल के कड़े संघर्ष के बाद बतौर डायरेक्टर अपनी नई वेब सीरीज द बेड्स औफ बौलीवुड जो कि नेटफ्लिक्स पर 18 सितंबर 2025 को रिलीज हो रही है, की पहली झलक ले कर जब मीडिया के सामने रूबरू हुए तो घबराहट के मारे आर्यन खान के पसीने छूटने लगे और मीडिया को देख कर वह बहुत ही नर्वस नजर आए.

अपने बेटे को बतौर डेब्यू डायरेक्टर इंट्रोड्यूस करने के लिए खुद शाहरुख खान एक हाथ में प्लास्टर चढ़ाए हुए स्टेज पर पधारे, शाहरुख खान ने मीडिया से रूबरू होते हुए कहा उन के हाथ में सर्जरी की वजह से प्लास्टर चढ़ा है जो दोतीन महीने तक रहेगा. इस के साथ ही अपने मजाकिया स्टाइल में शाहरुख खान ने मीडिया का न सिर्फ स्वागत किया, बल्कि अपने बेटे आर्यन खान को भी मीडिया से इंट्रोड्यूस करवाया. क्योंकि आर्यन खान पहली बार मीडिया के सामने थे उन्होंने अपनी घबराहट को कुबूल करते हुए अपनी स्पीच में कहा कि वह इतने नर्वस है कि आर्यन खान ने अपनी स्पीच शाहरुख खान की पीठ पर भी लिख कर चिपका रखी थी.

अपनी स्पीच के जरिए आर्यन खान ने पिता शाहरुख खान की तरह अच्छे सेंस औफ ह्यूमर की झलक दिखला दी, साथ ही सबको इस बात का सब से ज्यादा आश्चर्य हुआ की आर्यन खान की आवाज और अंदाज हूबहू शाहरुख खान जैसी ही है.

हालांकि आर्यन खान हमेशा की तरह गंभीर ही नजर आ रहे थे साथ ही अपने काम को ले कर वह बहुत उत्साहित नजर आए, अपनी स्पीच के आखिर में आर्यन खान ने कहां, अब मेरे पास कुछ कहने को नहीं है, क्योंकि अब मेरा काम बोलेगा.

खबरों के अनुसार द बेड्स औफ बौलीवुड वेब सीरीज में कई बड़े सितारे काम करने वाले हैं जैसे सलमान खान, खुद शाहरुख खान, रणवीर सिंह, रणबीर कपूर, सारा अली खान और इब्राहिम अली खान आदि सितारे बतौर मेहमान काम करते नजर आएंगे.

यह शो रेड चिलीज एंटरटेनमेंट के बैनर तले बना है, इस वेब सीरीज के निर्माता गौरी खान, क्रिएटरस बिलाल सिद्दीकी और मानव चौहान है, इस वेब सीरीज में मुख्य कलाकार बौबी देओल, लक्ष्य रजत बेदी, मोना सिंह, राघव जुयाल आदि है.

Aryan Khan

Satire: आया सासबहू का जमाना

Satire: ‘आया सासबहू का जमाना…’ मगर यह बताइए कब नहीं था? अरे, इन का जमाना तो पहले भी था अब भी है और इन का ही रहेगा. हां, पर अब  और पहले में फर्क है. तब सास तख्ते पर विराजमान बहू पर हुक्म चलाती थीं और बहू सहमी सी उन के कहे अनुसार करती थी.

पर हम पुरुष… हम तो तब भी बस तमाशबीन थे, नारी विवश नर जो हैं. तो बस हमें तो दृष्टा ही बने रहना है क्योंकि इन के तरकश में शब्दभेदी बाणों का अंबार है, वह भी कई तरह के- नुकीले, कटीले, हठिले, तीखे और भी न जाने कितने. हमें तो नाम भी पता नहीं.

हां, पर इतना पता है कि इन का असर एकदूजे पर असर करे न करे, पर मारे जाते हैं हम लाचार पुरुष.

सदियों से सह रहे हैं यह वार पर तब से ज्यादा अब क्योंकि सास अपना रुतबा झाड़ना चाहे तो बहू करारे जवाब के साथ हाजिर है, जिस का परिणाम- महाभारत.

फिर हमें टीवी पर चलती रोमांटिक फिल्म बंद कर इन के महाभारत का एपिसोड देखना पड़ता है और मजाल है जो टीवी की तरह रिमोट से इन के एपिसोड का अंत कर दें.  ऐसा रिमोट बना भी नहीं है, साहब और यह गलती की तो सारे शब्दभेदी बाण हमें घायल करेंगे जो अलग, साथ ही हमारे खाने की छुट्टी.

बस, फिर लाचार पुरुष की भांति दृष्टा बने इंतजार करते हैं एपिसोड के अंत का. अंत होने पर सोचते हैं कि अब कहीं भोजनपानी का प्रबंध हो जाएं. पर नहीं, कुछ नहीं होता है जी. दोनों अपनेअपने कमरे में औंधे मुंह बिस्तर पर पड़ी होती हैं.

तरस तो आता ही नहीं इन को और क्यों आए आखिर इन्हें ‘महाभारत’ के एपिसोड भी तो पूरे करने हैं.

भविष्य में यही तो टीवी पर आने हैं.

फिर क्या रसोईघर में जा कर खाना पकाते हैं या बाहर से मंगाते हैं हम पुरुष. इतना ही नहीं, फिर थाली सजा कर इन देवियों को मनाते भी  हैं.

धन्य है ये देवियां.

और तो और इन की आपसी होड़ में भी हम ही पिसते हैं. यदि बहू को उस के पति ने उपहार ला कर दिया तो सास के पति के प्राण समझ सकते हैं न आप?

ऐसा ही बहू का हाल. वह तो सीधे ही बोलती है,”कुछ तो सीख लिया होता अपने पापा से. बड़ी विडंबना है, साहब.

यों ही किट्टी पार्टी की होड़. कपड़ों की होड़ और पिसता कौन बेचारा पुरुष ही न.

बहू को देखिए, जरा किसी ने कह दिया कि तेरी सास तो बड़ी जवान दिखती है अब भी… तब तो  तिलमिला जाती है वह, बिन पानी के मछली की तरह.

और हां, बहू के मौडर्न वस्त्र पहनने पर सास कुछ रोक लगा कर तो देखे. शर्म, हया का पाठ पढ़ा कर तो देखे.

सीधे करारा जवाब, “आप भी पहनो न, कौन मना करता है? शर्म आंखों में होती है, मांजी. कहो तो ला दूं? पर बस अपना फिगर देख लीजिए…” बहू का सब से तीव्र और खतरनाक बाण जो सास के दिलोदिमाग को झकझोर देता है.

फिर 100-200 बाण बिना अंतराल के बहू पर चल उठते हैं सास के. अंत में एक दमदार बाण सास का, “अपना हुलिया तो देख. 1 बच्चे के बाद ही यह हाल है. हम तो 4-4 बच्चों के बाद भी जवान दिखते थे. वे तो अब घुटनों के दर्द के कारण घूम नहीं पाते सो जरा मुटया गए हैं बस हां…”

बस फिर क्या इन के पार्लर के, जिम के खर्चे और बढ़ जाते हैं और हम पुरुष कुछ बोल के तो देखें. ये तब  एक हो जाती हैं, साहब. और हमें जो सुनाती हैं न, वह सुनिए,”क्या हम सुंदर न दिखें? इन पैसों का क्या आचार डालोगे? कमाते किसलिए हो? अपने शरीर का तो जरा ध्यान नहीं. औफिस के बाद घर में पड़े रहते हो. देखा न तोंद कहां जा रही है?”

ऐसे बाणों को सहने से बेहतर  चुपचाप नोट वार देते हैं इन की खूबसूरती के लिए और हैरान हो कर सोचते रह जाते कि यह क्या हुआ, नदी के 2 छोर मिल गए, अजूबा…

सचमुच इन के रिश्ते को समझना टेढ़ी खीर है. तो अंत में मौन पुरुषों को हिम्मत बंधाते हुए यही कहता हूं :

“आया सासबहू का जमाना,

आगे और भी आएगा इन का जमाना,

पर पुरुषो, यों ही हिम्मत रखना और

जरा भी न घबराना,

कमाना और इन पर लुटाना…”

व्यंग : गीता लकवाल

Satire

Cookie Jarring Relationship: कहीं आप तो नहीं अगला शिकार

Cookie Jarring Relationship: कुकी जारिंग तब होता है जब कोई किसी रिश्ते को बैकअप प्लान या सिक्योरिटी ब्लैंकेट की तरह रखता है, बिना किसी लौंग टर्म रिलेशनशिप के असली इरादे के. यानि कुकी जारिंग एक डेटिंग टर्म है, जिस में पार्टनर एक से रिलेशन बनाने के बावजूद अन्य लोगों से भी रिलेशन बनाने में दिलचस्पी रखता है. ऐसे में दूसरे पार्टनर को समझ नहीं आता है कि वह अपने पार्टनर के लिए कितना जरूरी है. उसे हमेशा उलझन महसूस होती है कि क्या वह एकमात्र है या उसे बैकअप के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.

कुछ ऐसे समझें

यह ठीक वैसे ही है जैसे आप कुकी जार में कुछ कुकीज बचा कर रखते हैं और आप उन्हें तुरंत नहीं खाते, बल्कि तब खाते हैं जब आप को कुछ मीठा खाने का मन करता है या आप के पास कोई और विकल्प नहीं होता. जैसेकि एक कुकी जार में कुकी रखी हो और जरूरत पड़ी तो निकाल ली.

रोमा का कहना है कि मैं एक लड़के के साथ 2 साल से रिलेशनशिप में हूं लेकिन पिछले 4-5 महीने से उस ने मुझ से मिलनाजुलना काफी बंद कर दिया है. हालांकि उस ने मुझे छोड़ा नहीं है पर मैं जानती हूं कि अब वह किसी और को डेट कर रहा है. लेकिन जब कभी उस से बात नहीं होती तो वह मुझ से मिलने आ जाता है या फिर कभी जब वह लड़की बिजी होती है तो मुझ से टेक्स्ट मैसेज पर बात कर लेता है. मैं जानती हूं कि अब वह मुझे सिर्फ एक बैकअप के तौर पर यूज कर रहा है लेकिन फिर भी मैं उस के साथ यह सोच कर हूं कि क्या पता कल वह मेरे पास फिर से लौट आए.

हालांकि यह सिचुएशन किसी भी तरह सही नहीं है. किसी के नाम पर अपनी जिंदगी को रोक नहीं सकते. अगर एक व्यक्ति चला गया है तो सामने वाले को भी पूरा हक है आगे बढ़ने का. लेकिन इस रिलेशनशिप में मुश्किल यह है कि मैं तुम्हें छोड़ चुका हूं या छोड़ चुकी हूं, यह पूरी तरह से नहीं कहा जाता. इसलिए कई बार कोई एक अपनी जिंदगी रोक लेता है.

कुकी जारिंग क्यों करते हैं लोग

कई बार लोग बहुत अकेले होते हैं और उन्हें लगता है कि अकेलेपन से बचने के लिए कुकी जारिंग करना जरूरी है. अपने इगो को तसल्ली देने के लिए भी लोग ऐसा करते हैं. उन्हें लगता है कि देखो, कोई मेरे पीछे कितना दीवाना है.

किसी को बैकअप में रखने के लिए

यह सोच कर कि अगर कुछ नहीं हुआ तो कम से कम यह इंसान तो है, सारे जहान की खाक छानने पर भी अकसर कोई नहीं मिला तो पहले वाला तो है ही, उसे क्यों छोड़ना. पता चला बाद में उस जैसा भी नहीं मिला इसलिए उसे तो बैकअप में रखना ही समझदारी है.

कैसे पता करें कि आप कुकी जारिंग में हैं

अगर सामने वाला इंसान सिर्फ जरूरत के वक्त ही बात करता है और आप के बात करने पर कोई रिस्पौंस नहीं दे रहा.

कुकी जारिंग करने वाला व्यक्ति अकसर अपने ऐक्स की भावनाओं का फायदा उठाता है. वे उन्हें उम्मीद देते हैं कि शायद भविष्य में उन के बीच कुछ हो सकता है, लेकिन कभी भी पूरी तरह से प्रतिबद्ध नहीं होते.

अगर अब भी वे किसी डेटिंग ऐप पर हैं तो इस का मतलब वे नया साथी ढूंढ़ रहे हैं.

संपर्क अनियमित होता है

कभी वे बहुत अधिक बातचीत करेंगे और कभी लंबे समय तक कोई संपर्क नहीं होगा. यह सब कुकी जार करने वाले व्यक्ति की अपनी जरूरतों और वर्तमान संबंधों पर निर्भर करता है.

वह आप को इमोशनली अटैच तो रखता है लेकिन कभी क्लियर कमिटमैंट नहीं करता. हर बार इस रिलेशनशिप के बारे में बात करने पर टाल जाता है. आप को अकसर कन्फ्यूज या इस्तेमाल किया हुआ महसूस होता है.

इस जाल से कैसे बाहर निकलें :

सच को स्वीकार करें

आप इस सच को स्वीकार करें कि वह व्यक्ति सिर्फ आप को इस्तेमाल कर रहा है और उसे आप की जरूरत नहीं है. आप उस के इस ट्रैप में न फंसें. आप किसी के लिए कोई औप्शन नहीं अपना मन, अपनी सोच और अपना आत्मसम्मान भी हैं.

हमेशा उपलब्ध न रहें

अगर आप हमेशा उपलब्ध रहते हैं, तो वह आप को कुकी जार में ही रखेंगे. इसलिए बात करने के समय कम करें. अपनी मरजी से बात करें उन की नहीं. लेट नाइट चैट्स का जवाब न दें. इमोशनल अवेलेबिलिटी धीरेधीरे कम करें और इस बात को समझें कि साथी धीरेधीरे आप से दूर हो रहा है.

खुल कर बात करें

उन से स्पष्ट बात करें. उन से पूछें कि क्या यह रिलेशनशिप सिर्फ कैज़ुअल है या कुछ सीरियस? अगर वे बातों को घूमाना शुरू करते हैं तो समझ जाएं कि अब आप में इंट्रेस्ट कम है और अब वक्त आ गया है कि आप इस रिलेशनशिप को खत्म करने के बारे में सोचें.

खुद को वैल्यू करें

आप कोई फालतू नहीं हैं कि जब चाहे आप को कोई छोड़ दे और जब चाहे वापस आ जाए. अपने साथ यह न होने दें. जब आप खुद को वैल्यू देंगे, तो आप उन लोगों से दूर हो पाएंगे जो आप को कम आंकते हैं.

उन से कोई कौन्टैक्ट न रखें

यदि संभव हो, तो अपने ऐक्स से पूरी तरह से नो कौन्टैक्ट नियम अपनाएं. इस का मतलब है कि कोई कौल नहीं, कोई मैसेज नहीं, कोई सोशल मीडिया इंटरैक्शन नहीं. यह आप को उन की उपस्थिति के बिना अपनी भावनाओं पर कंट्रोल करने और आगे बढ़ने का मौका देगा.

Cookie Jarring Relationship

Social Story: जी उठी हूं मैं- क्या थी एक मां की इच्छा

Social Story: रिया ने चहकते हुए मुझे बताया, ‘‘मौम, नेहा, आ रही है शनिवार को. सोचो मौम, नेहा, आई एम सो एक्साइटेड.’’

उस ने मुझे कंधे से पकड़ कर गोलगोल घुमा दिया. उस की आंखों की चमक पर मैं निहाल हो गई. मैं ने भी उत्साहित स्वर में कहा, ‘‘अरे वाह, तुम तो बहुत एंजौय करने वाली हो.’’

‘‘हां, मौम. बहुत मजा आएगा. इस वीकैंड तो बस मजे ही मजे, 2 दिन पढ़ाई से बे्रक, मैं बस अपने बाकी दोस्तों को भी बता दूं.’’

वह अपने फोन पर व्यस्त हो गई और मैं चहकती हुई अपनी बेटी को निहारने में.

रिया 23 साल की होने वाली है. वह बीकौम की शिक्षा हासिल कर चुकी है. आजकल वह सीए फाइनल की परीक्षा के लिए घर पर है. नेहा भी सीए कर रही है. वह दिल्ली में रहती है. 2 साल पहले ही उस के पापा का ट्रांसफर मुंबई से दिल्ली हुआ है. उस की मम्मी मेरी दोस्त हैं. नेहा यहां हमारे घर ही रुकेगी, यह स्पष्ट है. अब इस ग्रुप के पांचों बच्चे अमोल, सुयोग, रीना, रिया और नेहा भरपूर मस्ती करने वाले हैं. यह ग्रुप 5वीं कक्षा से साथ पढ़ा है. बहुत मजबूत है इन की दोस्ती. बड़े होने पर कालेज चाहे बदल गए हों, पर इन की दोस्ती समय के साथसाथ बढ़ती ही गई है.

अब मैं फिर हमेशा की तरह इन बच्चों की जीवनशैली का निरीक्षण करती रहूंगी, कितनी सरलता और सहजता से जीते हैं ये. बच्चों को हमारे यहां ही इकट्ठा होना था. सब आ गए. घर में रौनक आ गई. नेहा तो हमेशा की तरह गले लग गई मेरे. अमोल और सुयोग शुरू से थोड़ा शरमाते हैं. वे ‘हलो आंटी’ बोल कर चुपचाप बैठ गए. तीनों लड़कियां घर में रंगबिरंगी तितलियों की तरह इधरउधर घूमती रहीं. अमित औफिस से आए तो सब ने उन से थोड़ीबहुत बातें कीं, फिर सब रिया के कमरे में चले गए. अमित से बच्चे एक दूरी सी रखते हैं. अमित पहली नजर में धीरगंभीर व्यक्ति दिखते हैं. लेकिन मैं ही जानती हूं वे स्वभाव और व्यवहार से बच्चों से घुलनामिलना पसंद करते हैं.  लेकिन जैसा कि रिया कहती है, ‘पापा, मेरे फ्रैंड्स कहते हैं आप बहुत सीरियस दिखते हैं और मम्मी बहुत कूल.’ हम दोनों इस बात पर हंस देते हैं.

तन्मय आया तो वह भी सब से मिल कर खेलने चला गया. नेहा ने बड़े आराम से आ कर मुझ से कहा, ‘‘हम सब डिनर बाहर ही करेंगे, आंटी.’’

‘‘अरे नहीं, घर पर ही बनाऊंगी तुम लोगों की पसंद का खाना.’’

‘‘नहीं आंटी, बेकार में आप का काम बढ़ेगा और आप को तो पता ही है कि हम लोग ‘चाइना बिस्ट्रो’ जाने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक है, जैसी तुम लोगों की मरजी.’’

डिनर के बाद सुयोग और अमोल तो अपनेअपने घर चले गए थे, तीनों लड़कियां घर वापस आ गईं. रीना ने भी अपनी मम्मी को बता दिया था कि वह रात को हमारे घर पर ही रुकेगी. हमेशा किसी भी स्थिति में अपना बैड न छोड़ने वाला तन्मय चुपचाप ड्राइंगरूम में रखे दीवान पर सोने के लिए चला गया. हम दोनों भी सोने के लिए अपने कमरे में चले गए. रात में 2 बजे मैं ने कुछ आहट सुनी तो उठ कर देखा, तीनों मैगी बना कर खा रही थीं, साथ ही साथ बहुत धीरेधीरे बातें भी चल रही थीं. मैं जानती थी अभी तीनों लैपटौप पर कोई मूवी देखेंगी, फिर तीनों की बातें रातभर चलेंगी. कौन सी बातें, इस का अंदाजा मैं लगा ही सकती हूं. सुयोग और अमोल की गर्लफ्रैंड्स को ले कर उन के हंसीमजाक से मैं खूब परिचित हूं. रिया मुझ से काफी कुछ शेयर करती है. फिर तीनों सब परिचित लड़कों के किस्से कहसुन कर हंसतेहंसते लोटपोट होती रहेंगी.

मैं फिर लेट गई थी. 4 बजे फिर मेरी आंख खुली, जा कर देखा, रीना फ्रिज में रखा रात का खाना गरम कर के खा रही थी. मुझे देख कर मुसकराई और सब के लिए उस ने कौफी चढ़ा दी. मैं पानी पी कर फिर जा कर लेट गई.

मैं ने सुबह उठ कर अपने फोन पर रिया का मैसेज पढ़ा, ‘मौम, हम तीनों को उठाना मत, हम 5 बजे ही सोए हैं और मेड को मत भेजना. हम उठ कर कमरा साफ कर देंगी.’

मैसेज पढ़ कर मैं मुसकराई तो वहीं बैठे अमित ने मुसकराने का कारण पूछा. मैं ने उन्हें लड़कियों की रातभर की हलचल बताते हुए कहा, ‘‘ये लड़कियां मुझे बहुत अच्छी लगती हैं, न कोई फिक्र न कोई चिंता, पढ़ने के समय पढ़ाई और मस्ती के समय मस्ती. क्या लाइफ है इन की, क्या उम्र है, ये दिन फिर कभी वापस नहीं आते.’’

‘‘तुम क्या कर रही थीं इस उम्र में? याद है?’’

‘‘मैं कुछ समझी नहीं.’’

‘‘तुम तो इन्हें गोद में खिला रही थीं इस उम्र में.’’

‘‘सही कह रहे हो.’’

20 वर्षीय तन्मय रिया की तरह मुझ से हर बात शेयर तो नहीं करता लेकिन मुझे उस के बारे में काफीकुछ पता रहता है. सालों से स्वाति से उस की कुछ विशेष दोस्ती है. यह बात मुझे काफी पहले पता चली थी तो मैं ने उसे साफसाफ छेड़ते हुए पूछा था, ‘‘स्वाति तुम्हारी गर्लफ्रैंड है क्या?’’

‘‘हां, मौम.’’

उस ने भी साफसाफ जवाब दिया था और मैं उस का मुंह देखती रह गई थी. उस के बाद तो वह मुझे जबतब उस के किस्से सुनाता रहता है और मैं भरपूर आनंद लेती हूं उस की उम्र के इन किस्सों का.

अमित ने कई बार मुझ से कहा है, ‘‘प्रिया, तुम हंस कर कैसे सुनती हो उस की बातें? मैं तो अपनी मां से ऐसी बातें करने की कभी सोच भी नहीं सकता था.’’

मैं हंस कर कहती हूं, ‘‘माई डियर हस- बैंड, वह जमाना और था, यह जमाना और है. तुम तो बस इस जमाने के बच्चों की बातों का जीभर कर आनंद लो और खुश रहो.’’

मुझे याद है एक बार तन्मय का बेस्ट फ्रैंड आलोक आया. तन्मय के पेपर्स चल रहे थे. वह पढ़ रहा था. दोनों सिर जोड़ कर धीरेधीरे कुछ बात कर रहे थे. मैं जैसे ही उन के कमरे में किसी काम से जाती, आलोक फौरन पढ़ाई की बात जोरजोर से करने लगता. जब तक मैं आसपास रहती, सिर्फ पढ़ाई की बातें होतीं. मैं जैसे ही दूसरी तरफ जाती, दोनों की आवाज धीमी हो जाती. मुझे बहुत हंसी आती. कितना बेवकूफ समझते हैं ये बच्चे बड़ों को, क्या मैं जानती नहीं सिर जोड़े धीरेधीरे पढ़ाई की बातें तो हो नहीं रही होंगी.

तन्मय फुटबाल खेलता है. पिछली जुलाई में वह एक दिन खेलने गया हुआ था. अचानक उस के दोस्त का फोन आया, ‘‘आंटी, तन्मय को चोट लग गई है. हम उसे हौस्पिटल ले आए हैं. आप परेशान मत होना. बस, आप आ जाओ.’’

अमित टूर पर थे, रिया औफिस में, उस की सीए की आर्टिकलशिप चल रही थी. मैं अकेली आटो से हौस्पिटल पहुंची. बाहर ही 15-20 लड़के खड़े मेरा इंतजार कर रहे थे. बहुत तेज बारिश में बिना छाते के बिलकुल भीगे हुए.

एक लड़के ने मेरे पूछने पर बताया, ‘‘आंटी, उस का माथा फट गया है, डाक्टर टांके लगा रहे हैं.’’

मेरे हाथपैर फूल गए. मैं अंदर दौड़ पड़ी. कमरे तक लड़कों की लंबी लाइन थी. इतनी देर में पता नहीं उस के कितने दोस्त इकट्ठा हो गए थे. तन्मय औपरेशन थिएटर से बाहर निकला. सिर पर पट्टी बंधी थी. डाक्टर साहब को मैं जानती थी. उन्होंने बताया, ‘‘6 टांके लगे हैं. 1 घंटे बाद घर ले जा सकती हैं.’’

तन्मय की चोट देख कर मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था पर वह मुसकराया, ‘‘मौम, आई एम फाइन, डोंट वरी.’’

मैं कुछ बोल नहीं पाई. मेरी आंखें डबडबा गईं. फिर 5 मिनट के अंदर ही उस के दोस्तों का हंसीमजाक शुरू हो गया. पूरा माहौल देखते ही देखते बदल गया. मैं हैरान थी. अब वे लड़के तन्मय से विक्टरी का ङ्क साइन बनवा कर ‘फेसबुक’ पर डालने के लिए उस की फोटो खींच रहे थे. तन्मय लेटालेटा पोज दे रहा था. नर्स भी खड़ी हंस रही थी.

तन्मय ने एक दोस्त से कहा, ‘‘विकास, मेरा क्लोजअप खींचना. डैड टूर पर हैं. उन्हें ‘वाट्सऐप’ पर भेज देता हूं.’’

देखते ही देखते यह काम भी हो गया. अमित से उस ने बैड पर बैठेबैठे ही फोन पर बात भी कर ली. मैं हैरान थी. किस मिट्टी के बने हैं ये बच्चे. इन्हें कहां कोई बात देर तक परेशान कर सकती है.

रिया को बताया तो वह भी औफिस से निकल पड़ी. रात 9 बजे तन्मय के एक दोस्त का भाई अपनी कार से हम दोनों को घर छोड़ गया था. तन्मय पूरी तरह शांत था, चोट उसे लगी थी और वह मुझे हंसाने की कोशिश कर रहा था. तन्मय को डाक्टर ने 3 हफ्ते का रैस्ट बताया था. अमित टूर से आ गए थे. 3 हफ्ते आनेजाने वालों का सिलसिला चलता रहा. एक दिन उस ने कहा, ‘‘मौम, देखो, आप की फ्रैंड्स और मेरे फ्रैंड्स की सोच में कितना फर्क है. मेरे फ्रैंड्स कहते हैं, जल्दी ठीक हो यार, इतने दिन बिना खेले कैसे रहेगा और आप की हर फ्रैंड यह कह कर जाती है कि अब इस का खेलना बंद करो, बस. बहुत चोट लगती है इसे.’’

उन 3 हफ्तों में मैं ने उस के और उस के दोस्तों के साथ जो समय बिताया, इस उम्र के स्वभाव और व्यवहार का जो जायजा लिया, मेरा मन खिल उठा.

इन बच्चों की और अपनी उस उम्र की तुलना करती हूं तो मन में एक कसक सी होती है. मन करता है कि काश, कहीं से कैसे भी उस उम्र में पहुंच जाऊं. इन बच्चों के बेवजह हंसने की, खिलखिलाने की, छोटीछोटी बातों पर खुश होने की, अपने दर्दतकलीफ को भूल दोस्तों के साथ ठहाके लगाने की, खाने की छोटी से छोटी मनपसंद चीज देख कर चहकने की प्रवृत्ति को देख सोचती हूं, मैं ऐसी क्यों नहीं थी. मेरी तो कभी हिम्मत ही नहीं हुई कि घर में किसी बात को नकार अपनी मरजी बताऊं. जो मिलता रहा उसी में संतुष्ट रही हमेशा. न कभी कोई जिद न कभी कोई मांग.

13 साल की उम्र में पिता को खो कर, मम्मी और भैया के सख्त अनुशासन में रही. अंधेरा होने से पहले भैया का घर लौटने का सख्त निर्देश, ज्यादा हंसनेबोलने पर मम्मी की घूरती कठोर आंखें, मुझे याद ही नहीं आता मैं जीवन में कभी 6 बजे के बाद उठी होऊं, विशेषकर विवाह से पहले. और यहां मेरे बच्चे जब मैसेज डालते हैं, ‘उठाना मत.’ तो मुझे कभी गुस्सा नहीं आता. मुझे अच्छा लगता है.

मेरे बच्चे आराम से अपने मन की बात पूरी कर सकते हैं. मेरी प्लेट में तो जो भी कुछ आया, मैं ने हमेशा बिना शिकायत के खाया है और जब मेरे बच्चे अपनी फरमाइश जाहिर करकर के मुझे नचाते हैं, मैं खुश होती हूं. मेरी कोई सहेली जब अपने किसी युवा बच्चे की शिकायत करती है जैसे देर से घर आने की, ज्यादा टीवी देखने की, देर तक सोने की आदि तो मैं यही कहती हूं–जीने दो उन्हें, कल घरगृहस्थी की जिम्मेदारी संभालनी है, जी लेने दो उन्हें.

मुझे लगता है मैं तो बहुत सी बातों में हमेशा मन मार कर अब तक जीती आई थी पर इन बच्चों को खुश, अपनी इच्छा पूरी करने के लिए बात मनवाते देख कर सच कहती हूं, जी उठी हूं मैं.

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