आजादी मिले और महिलाओं को बराबर के हक मिले. अब 7 दशक से ज्यादा हो गए हैं पर पुरुषों ने आज भी मेल डौमिनेटेड सोसायटी बना रखी है. इस का एक बड़ा ऐग्जांपल है हरियाणा का जैंडर रेशो जिस में पिछले 2 सालों में 1000 लड़कों के पीछे 825 लड़कियों के बर्थ हो रहे हैं.

यह एक बड़ी कौंस्पिरेसी का हिस्सा है जिस में सब से बड़ा कलप्रिट धर्म है. यह धर्म ही है जो बारबार दोहराता है कि औरतों को छुईमुई बन कर पति को परमेश्वर मानना चाहिए और पिता, पति या बेटों के अधीन रहना चाहिए. हरियाणा जहां की लड़कियां अब खेलों में लड़कों से ज्यादा मैडल लाती हैं, अभी भी धर्म की लाठी लिए खाप पंचायतों के टैरर में जीती हैं.

देश के दूसरे हिस्से भी इन से आजाद नहीं. सुप्रीम कोर्ट में केरल के सबरीमाला टैंपल का विवाद चल रहा है जहां मैंसूरेट करने वाली औरतों का प्रवेश बैन है. वैसे तो महिलाओं को किसी भी ऐसी जगह जाने की इच्छा ही नहीं करनी चाहिए जहां उन को नीचा दिखाने की कौंस्पिरेसी हो फिर भी जहां तक राइट्स की बात है, यह तो राइट मांगना चाहिए कि जब बच्चे पैदा कर सकने वाला मेल किसी भी जगह जा सकता है तो बच्चा पैदा कर सकने वाली फीमेल क्यों नहीं.

जब यह नियम बना था तब तो औरतों को उतनी शिक्षा भी नहीं मिली थी कि वे कुछ बोल सकें. अभी 50 साल पहले तक लड़कियों को 8-10 साल की आयु में शादी कर के दूसरे घरों में भेज दिया जाता था. एक सीरियल ‘बालिका वधू’ खूब पौपुलर हुआ क्योंकि यह उस कौंस्पिरेसी को और स्ट्रौंग करता है कि लड़कियों की शादी जल्दी कर देनी चाहिए.

आज प्रीनेटल टैस्ट बहुत पौपुलर हो रहे हैं. गर्भ में पलते फीटस की हैल्थ की जांच के नाम पर कुछ भी कर दिया जाता है और जो डाक्टर कुछ पैसों के लिए यह काम करते हैं वे सोचते हैं कि वे तो धर्म को मजबूत करने का काम कर रहे हैं जहां औरतों को पाप की गठरी या न जाने क्याक्या कहा गया है.

आज तक किसी ऐसे प्रवचनकर्ता को बुरा सुनने को नहीं मिला होगा जो हजारों की भीड़ में खुल कर कहता है कि पति की सेवा ही सही धर्म की सेवा है. बराबर के स्पर्म और एग से पैदा हुई लड़की कैसे किसी लड़के से कम हो सकती है?

सदियों से धर्म ने इस धोखे को फैलाया है ताकि धर्म को इन औरतों से ही तनमनधन की सेवा मिलती रहे जिन्हें वे कमजोर साबित करते हैं.

जैंडर डिफरैंस ही नहीं आज भी डाउरी डैथ हो रही हैं. दिल्ली में पिछले साल 107 मामले डाउरी डैथ के फाइल किए गए. हर ऐसे मामले में लड़की के मातापिता का दर्द छिपा होता है जिन्होंने समाज और धर्म के आदेश पर अपनी बेटी भी दी, उस के साथ भरपूर सामान भी दिया. यदि किसी भी कारण पतिपत्नी में नहीं बनी, ससुराल में वह इस बुरी तरह रही कि उसे या तो मारा गया या उस ने सुसाइड किया तो दोष वह धर्म का है जिस ने पट्टी पढ़ाई है कि लड़कियां तो दूसरे घर में जाने के लिए ही पैदा होती हैं.

पेरैंट्स ऐसी स्थिति में प्रैगनैंसी के पता चलते ही अगर उस का जैंडर जानना चाहते हैं तो इस में सरप्राइज की बात क्या है?

हमारे यहां कानून बन गए हैं कि औरतों को सम्मान देना होगा. प्रीनेटल जांच नहीं होगी, डाउरी डैथ पर लाइफ इंप्रिजनमैंट होगी पर यह कहां लिखा है कि करवाचौथ की महिमा गाने वाले, मंगलसूत्र को महान बताने वाले, पति को परमेश्वर बताने वाले यदि दंड के नहीं तो सोशल क्रिटिज्म का निशाना तो बनेंगे. यहां तो पौराणिक गाथाओं की बाढ़ आई हुई है और हरेक में औरतों को बेचारी, दयनीय, कमजोर, पिता या पति पर आश्रित दर्शाया जाता है. ऐसे माहौल में कौन पहली लड़की या 2 लड़कियों का जोखिम लेगा.

कंपीटिटिव ऐग्जामों में लड़कियां जितनी चाहे अच्छी परफौर्मैंस कर लें, शादी के बाद 75% वर्किंग गर्ल्स घर बैठने को मजबूर हैं.

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