झारखंडओडिसा की सीमा पर बसे मुटुर खाम गांव में एक नाम बहुत इज्जत से लिया जाता है और वह है जमुना टुडू का. लोग प्यार से उन्हें ‘लेडी टार्जन’ कहते हैं. न उन के पास कोई बड़ी डिगरी है, न सरकारी पद. फिर भी पिछले 25 सालों से जमुना वह काम कर रही हैं जो बड़ेबड़े विभाग नहीं कर पाए. यह काम है साल के घने जंगलों को माफिया से बचाना.
ओडिशा के एक छोटे से गांव में जन्मीं जमुना को बचपन से ही पेड़पौधों से लगाव था. 1998 में शादी के बाद जब वे चाकूलिया आईं तो देखा कि गांव की औरतों की रोजीरोटी, चूल्हे की लकड़ी, जानवरों का चारा सबकुछ जंगल से आता है. पर लकड़ी माफिया धड़ल्ले से पेड़ काट रहे थे. कानून था पर सुनने वाला कोई नहीं था. तब जमुना ने ठान लिया कि जंगल बचेगा तभी गांव बचेगा.
डर को हिम्मत में बदला
जमुना ने शुरुआत अकेले ही की. हाथ में टौर्च और लाठी ले कर रात में जंगल में गश्त करने निकलीं. माफिया ने धमकाया, जानलेवा हमले भी हुए पर जमुना डरी नहीं. धीरेधीरे उन्होंने गांव की दूसरी औरतों को जोड़ा. समझाििीया कि ये पेड़ हमारे बच्चों की सांस हैं. गांव के पुरुषों ने साथ देने से इनकार कर दिया लेकिन औरतें आगे आईं. आज उन के साथ 1000 से ज्यादा गांवों की 10,000 महिलाएं हैं. 150 से ज्यादा वन सुरक्षा समितियां बन चुकी हैं जिन में 6,000 से ज्यादा ऐक्टिव सदस्य हैं.
बदल गया गांव का माहौल
महिला गश्ती दल: अब माफिया जंगल में घुसने से डरते हैं क्योंकि सामने 20-30 औरतें तीरधनुष, डंडे ले कर खड़ी मिलती हैं.
सोच बदली: पहले औरतें जंगल से सिर्फ लकड़ी लाती थीं. अब वे जंगल की मालकिन और रखवाली भी हैं.
नई परंपरा: जमुना के गांव में बेटी पैदा होने पर 18 साल के पेड़ लगाए जाते हैं और बेटी के ब्याह पर 10 साल के पेड़ परिवार को दिए जाते हैं. रक्षाबंधन पर पूरा गांव पेड़ों को राखी बांधता है.
विकास: वन विभाग ने गांव में स्कूल खुलवाया, पक्की सड़कें बनवाईं. जमुना ने खुद स्कूल और नलकूप के लिए अपनी जमीन दान दे दी.
जमुना का काम सिर्फ पर्यावरण का नहीं है. उन्होंने औरतों को ताकत दी है. जो महिला कभी घर से बाहर नहीं निकलती थी वह आज रात में जंगल में गश्त करती है, पंचायत में बोलती है. गांव वालों का कहना है कि दीदी ने हमें एक कर दिया.
जमुना टुडू को मिले प्रमुख सम्मान
पद्मश्री, 2019: भारत सरकार ने पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सम्मानित किया.
‘गाडफे्र फिलिप्स ब्रेवरी अवार्ड, 2013’: ‘एक्ट औफ सोशल करेज’ श्रेणी में.
स्त्री शक्ति पुरस्कार, 2014: कलर्स टीवी के मंच पर फिल्म निर्देशक सुभाष घई ने दिया.
वूमन ट्रांसफौर्मिंग इंडिया अवार्ड, 2017: नीति आयोग द्वारा.
भारत की प्रथम 100 महिलाएं, 2016: राष्ट्रपति भवन द्वारा चयनित और सम्मानित.
पीएम मोदी की ‘मन की बात’: 24 फरवरी, 2019 को प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के समक्ष उन की कहानी रखी.
राष्ट्रपति भवन में डिनर का न्योता: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 2024 में विशेष डिनर के लिए आमंत्रित किया.
बीबीसी और दिल्ली की टीम उन पर डौक्यूमैंट्री बना चुकी है.
जमुना टुडू हमें सिखाती हैं कि असली घर सिर्फ चारदीवारी नहीं बल्कि हमारे आसपास का पर्यावरण भी है. अगर पेड़ नहीं बचेंगे तो न साफ हवा मिलेगी, न बारिश, न अच्छा खाना.
जमुना के पास न बहुत पैसा था, न ताकत. था तो बस जज्बा. एक समय था जब वे कभी दिहाड़ी मजदूरी करती थीं. पति राजमिस्तिरी थे. उन्होंने दिखा दिया कि अगर औरतें ठान लें तो पहाड़ भी हिल सकता है.
कैसे बढ़ेंगी महिलाएं
गृहशोभा द्वारा इंस्पायर अवार्ड के रूप में की गई पहल की तारीफ करते हुए जमुना कहती हैं कि इस तरह देश के कोनेकोने से छिपी हुई काम करने वाली महिलाओं को दिल्ली बुला कर सम्मानित करना और उन का मनोबल बढ़ाना गृहशोभा का एक सार्थक प्रयास है.
