पिछले दिनों ब्रिटिश सांसद रूपर्ट लोवे ने संसद में कुछ ऐसी हकीकत बयान की कि वहां मौजूद सभी लोग सन्न रह गए. उन्होंने ब्रिटेन में सक्रिय पाकिस्तान मूल के ‘‘ग्रूमिंग गैंग्स’’ का मुद्दा उठाया. ये गैंग्स ब्रिटेन के कई राज्यों में बच्चों के हैवानियत पूर्ण यौन शोषण में शामिल रहे हैं. ब्रिटिश सरकार की जांच में पाया गया है कि संगठित रूप से बच्चों के यौन शोषण के अपराधी अधिकतर पाकिस्तानी मूल के टैक्सी ड्राइवर और मार्केट ट्रेडर हैं.
लोवे ने पीड़िताओं के बयान पढ़े जिन में एक पीडि़ता ने कहा कि 3 साल में 600-700 अलगअलग व्यक्तियों ने उस के साथ दुष्कर्म किया. कई गवाहियों में बच्चों के साथ हिंसा, सिगरेट से जलाना, सामूहिक दुष्कर्म और धमकी का जिक्र था. पीडि़ताओं ने बताया कि अपराधी गोरी और ईसाई लड़कियों को ‘‘कम नैतिक मूल्य’’ वाली कहते थे. ये मामला सिर्फ ब्रिटेन का नहीं बल्कि दुनिया भर के लिए चेतावनी है. संगठित अपराध तभी पनपता है जब सिस्टम आंख बंद कर ले. ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग केस ने एक बात बहुत साफ कर दी – महिलाओं और नाबालिग लड़कियों का शोषण सिर्फ व्यक्तिगत अपराध नहीं, अक्सर ये सिस्टमैटिक होता है. यानी शोषक अकेले नहीं आते बल्कि वो पैटर्न बनाते हैं. कमजोरी पहचानते हैं और समाज की चुप्पी का फायदा उठाते हैं. ब्रिटेन की ये कहानी दुनिया भर के मातापिता, टीचर, पुलिस और हम सब के लिए एक चेतावनी है. बच्चों की सुरक्षा पर बहस बाद में, एक्शन पहले. क्योंकि एक बच्ची का टूटा भरोसा पूरे समाज का आईना तोड़ देता है.
ब्रिटेन केस हमें महिलाओं और बच्चों के शोषण के बारे में क्या सिखाता है
1. शोषण हमेशा ताकत से नहीं बल्कि भरोसे से शुरू होता है
ग्रूमिंग गैंग्स ने टैक्सी में लिफ्ट देना, बच्चों को गिफ्ट देना, उन का दोस्त बनना जैसे हथकंडों का इस्तेमाल किया. इसका मतलब शोषक अक्सर सीधे हमला नहीं करते. वो पहले भरोसा जीतते हैं, फिर उस का दुरुपयोग. इसलिए महिलाओं और लड़कियों को सिखाना जरूरी है- ‘‘भला दिखने वाला हर इरादा भला नहीं होता.’’
2. शर्म और बदनामी का डर शोषक का सब से बड़ा हथियार है
ब्रिटेन की पीडि़ताएं सालों तक नहीं बोल पाईं. वजह थी लोग क्या कहेंगे?
‘मेरी इज्जत चली जाएगी’, ‘पुलिस यकीन नहीं करेग.’ दुनिया भर में महिलाओं के
शोषण के केस दबने की ये सब से बड़ी वजह है. जब तक समाज पीडि़ता को दोष
देने की बजाय उस के दिल की सुनने वाला नहीं बनेगा तब तक शोषक खुलेआम घूमेंगे.
3. शोषण में अक्सर नफरत का एंगल होता है
ब्रिटेन में अपराधी गोरी लड़कियों को ‘कम नैतिक’ कहकर टार्गेट करते थे.
भारत में भी औनर किलिंग, दहेज, एसिड अटैक जैसे मामलों के पीछे ‘औरत को
कंट्रोल करने’ की सोच है. मतलब साफ है, महिला का शरीर, उस की मर्जी, उसका
जीवन- जब भी किसी की ‘संपत्ति’ या ‘इज्जत’ मान लिया जाता है तो शोषण शुरू
हो जाता है.
4. सिस्टम की नाकामी यानी शोषक को खुली छूटब्रिटेन में पुलिस कदाचार और केस दबाने के आरोप लगे. भारत में भी कई बार FIR लिखने में आनाकानी, मेडिकल जांच में देरी, कोर्ट में सालों घसीटना कौमन है. ये सब शोषक को ये मैसेज देता है कि ‘तुम बच जाओगे.’ जब सिस्टम सख्त नहीं होगा तो शोषण रुकेगा नहीं.
महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम
सामाजिक स्तर पर :
– बेटियों के साथ साथ बेटों को भी सिखाएं कि ना का मतलब ‘‘न’’ होता है.
सहमति के बिना छूना भी शोषण है.
– पीडि़ता को ‘‘तूने क्या पहना था,’’ ‘‘तू रात को क्यों गई थी?’’ जैसे सवाल
पूछने की बजाय पूछें – ‘‘तुम ठीक हो? मैं कैसे मदद करूं?’’
– बच्चों को ‘स्मार्ट’ बनाना होगा. उन्हें समझाएं कि अगर कोई भी अंकल कहे
‘ये बात किसी को मत बताना’ तो वो रेड सिग्नल है.
– स्कूलों में ‘बौडी सेफ्टी’ के साथ ‘इमोशनल ग्रूमिंग’ भी पढ़ाई जाए.
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कानून और पुलिस स्तर पर
– महिला हेल्पलाइन 181, वन स्टाप सेंटर जैसी सुविधाएं हर जिले में असल में काम करें, सिर्फ कागज पर नहीं.
– शिकायत दर्ज करने वाली महिला को बार बार बयान न देना पड़े. एक बार का संवेदनशील बयान काफी होना चाहिए.
– पुलिस थाने में बच्चों के लिए अलग, ट्रेड आफिसर हों. बारबार बयान न लिए जाएं, ताकि दोबारा ट्रामा न हो.
– शिकायत दबाने वाले अफसर पर भी कार्रवाई हो. कदाचार की कीमत चुकानी पड़े.
कार्यस्थल और पब्लिक स्पेस में :
– टैक्सी, बस, औफिस हर जगह ष्टष्टञ्जङ्क, पैनिक बटन और शिकायत पेटी
होनी चाहिए और उस पर कार्रवाई भी हो.
– ‘‘कैरेक्टर सर्टिफिकेट’’ मांगकर महिला को जज करने की मानसिकता खत्म
हो. शोषण का दोषी शोषक है पीडि़ता नहीं.
सोच बदलने की जरुरत :
– इज्जत को महिला के शरीर से जोडऩा बंद किया जाए. इज्जत उसके काम,
उसकी मेहनत और उसकी इंसानियत से जुड़ी होती है न कि शरीर से.
– मीडिया और फिल्में महिलाओं को या तो देवी या माल न दिखाएं. उन्हें
एक इंसान दिखाएं जिस की अपनी सोच अपनी इंटेलिजेंस और अपने हक हैं.
ब्रिटेन का 600-700 वाला आंकड़ा चौंकाता है पर भारत में भी हृष्टक्रक्च के आंकड़े बताते हैं कि हर दिन औसतन 86 रेप केस दर्ज होते हैं और ये तो वो हैं
जो दर्ज हुए. असली संख्या कहीं ज्यादा है.
महिलाओं का शोषण तब तक नहीं रुकेगा जब तक हम इसे उसकी गलती मानते रहेंगे. ये हमारी, पूरे समाज की जिम्मेदारी है उस की सुनने की और साथ खड़े होने की. क्योंकि जिस समाज में औरत सुरक्षित नहीं वह समाज कभी आगे
नहीं बढ़ सकता.
