कई  साल तक दुनिया की सब से तेज बढ़ने वाली इकौनौमी, विश्वगुरु, भारत का डंका विश्व में बजाने वाला देश, इंडियन कल्चर, इंडियन योगा, इंडिया ग्रेट का ढोल पीटने के बाद 10 मई को देश की पोल खोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मान लिया कि यह देश तो दलदल में फंसा है और देशवासियों से देश को बचाने की कई अपीलें कीं.

लोगों से कहा कि 1 साल तक गोल्ड न खरीदें क्योंकि बाहर से इंपोर्ट करने पर बहुत सी फौरेन ऐक्सचेंज खर्च होती है और फौरेन मनी रिजर्व कम होता जा रहा है. देश की औरतों से आंसू भरे शब्दों में मानो कहा हो, हे देवियो, देश को बचा लो, कुछ सैक्रिफाइस कर लो. हमारा क्या हम तो खर्च करते रहेंगे, फाइवस्टार होटल बनाते रहेंगे, मंदिरों पर गोल्ड चढ़ाते रहेंगे पर देवियों से कहा कि वे 1 साल तक गोल्ड न खरीदें. मंगलसूत्र भी नहीं, ये शब्द नहीं कहे पर पहले उन्होंने मंगलसूत्र और सिंदूर को चुनावी हथकंडा बनाया था.

उन्होंने देवियों से यह भी कहा कि देश के बाहर सैर को न जाएं. उस में बहुत फौरेन करेंसी खर्च होती है. उस का टोटा पड़ने लगा है. डर है कि खाड़ी के देशों से मजदूर भारत वापस न आ जाएं जिन की भेजी फौरेन करेंसी फौरेन रिजर्व का खजाना भरती है. देवियों से कह कर बड़े लावलश्कर के साथ 4 दिनों के लिए 4 यूरोप के देशों के लिए निकल गए.

उन्होंने कोरोना के थालीवाली के दिन भी याद दिलाए. वर्क फ्रौम होम का फौर्मूला अपनाने को कहा. वे तो शायद चाहते ही हैं औरतें घरों में बद रहें. जो घरों में दोपहर को सुस्ता सकती हैं उन के सिर पर औफिस न जाने वाले हसबैंडों का बो?ा 24 घंटों के लिए डालने का सजैशन दे डाला.

भाषण में कहीं नहीं था कि चारधाम मत जाना, उज्जैन के कुंभ में मत जाना, इस बार कांवड़ यात्राएं नहीं होंगी, रामनवमी के जुलूस नहीं निकलेंगे. इन सब पर प्रधानमंत्री की पार्टी का पूरा कंट्रोल है. इन्हीं के बल पर इस महान सलाह से कई दिन पहले वे सैकड़ों ट्रिप पश्चिम बंगाल को फतह करने के लिए अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों से पश्चिम बंगाल को लगवा रहे थे.

आजकल इलैक्शन प्राइवेट जेटों और हैलिकौप्टरों से लड़े जाते हैं जो भारत में नहीं बनते. ऐविएशन कंपनी चुनावों के लिए फौरेन करेंसी दे कर ये उड़न खटोले बाहर से किराए पर मंगाए जाते हैं या औपरेटरों द्वारा खरीदे जाते हैं. 28 फरवरी को ही पता चल गया था कि खाड़ी का युद्ध शुरू हो चुका है, बचत शुरू कर लो पर 30 अप्रैल तक वैस्ट बंगाल को पार्टी के लिए जीतना जरूरी था, देश जरूरी नहीं था. ममता बनर्जी मानो कोई फौरेन रूलर थीं जिन से इंडिया को लिबरेट कराना था.

उन्होंने देवियों से खाने के तेल की बचत करने को भी कहा. कभी पकौड़ों की दुकान लगाने को सही असली रोजगार बताने वाले प्रधानमंत्री ने तेल न लगाने का संदेश सुना दिया. अब नारों की कड़ाही में लड्डू बनेंगे जो देवताओं पर चढ़ेंगे न?

देश की हालत सही नहीं है, यह काफी सालों से दिख रहा है और इसी वादे पर कि अच्छे दिन आएंगे नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आए थे. इन 12 सालों में क्या हुआ? क्यों किसी दूसरे देश में हो रही लड़ाई से हमें ऐसा फर्क पड़ा कि यहां फाके मारने की नौबत आ गई लगता है?

और अगर देश के साथ कुछ हो रहा है तो पहले मंदिरों में हो रही बरबादी को रोकें, सरकारी ठेकों में हो रही गड़बड़ी को रोकें, मिनिस्टर्स के काफिलों को रोकें, ईडी, सीबीआई की रेडों से हो रहे खर्च को रोकें जिन का द एंड जीरो में निकलता है, ऐग्जामों में चीटिंग की वजह से 2-2 बार होने वाले ऐग्जामों को रोकें, 12वीं के बाद बच्चों को फिर 2-3 ऐग्जाम देने के कंपल्शन से देश को बचाएं.

फ्यूल बचाना है तो सड़कों को ऐनक्रोचमैंट से रोकें ताकि व्हीकल्स जल्दी निकल सकें, देशभर में खराब स्टौप लाइट्स ठीक करें ताकि क्रौसिंग पर टै्रफिक जाम न हो, टूटी सड़कें न हों यह इंतजाम करें.

देवियों पर देश का भार न डालें, अपने कंधों पर लें. पार्टी को ढूंढ़ढूंढ़ कर मुसलमानों को तंग करने की जगह हर जगह करप्शन को रोकने पर लगाएं. लेकिन ऐसा कुछ न होगा. प्राइम मिनिस्टर ने कहा और भक्त मीडिया ने ढोल पीटना शुरू कर दिया. गोल्ड मर्चेंट खाली बैठ गए. ट्रैवल एजेंट चिरशैया पर चले गए. देश फिर सुस्त होने की तैयारी में लग गया. बाकी सब वैसा का वैसा.

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