हरियाणा के राखीगढ़ी में हुई ताजा खुदाई ने हड़प्पा काल की महिलाओं के जीवन को नई रोशनी दी है. टीला-7 से मिले एक महिला कंकाल की कमर के पास करीब 1000 कीमती ‘अमेट’ पत्थरों के मनके मिले हैं जिन्हें पुरातत्वविद तगड़ी का हिस्सा मान रहे हैं. साथ में शंख की चूडिय़ां और सोने के मनके भी मिले हैं. आभूषण और शृंगार के प्रमाण बताते हैं कि हड़प्पा समाज में महिलाओं की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका महत्वपूर्ण थी. महिलाएं तब भी ट्रेंडसेटर थीं.

सिर्फ बर्तन-मिट्टी तक सीमित नहीं थीं हड़प्पा की महिलाएं. गहने, शृंगार, स्टाइल सब में उनकी पसंद साफ दिखती है. इस बार कुल 7 कंकाल मिले – 3 महिला और 4 पुरुष. पहली बार किसी महिला कंकाल की कमर पर तगड़ी जैसे आभूषण के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं. अब ये कंकाल कोलकाता स्थित एंथ्रोपोलौजिकल सर्वे ऑफ इंडिया भेजे जाएंगे, जहां ष्ठहृ्र टेस्ट और वैज्ञानिक अध्ययन से पता चलेगा कि उस समय लोग कैसे जीते थे, क्या खाते थे और मृत्यु के क्या कारण थे.

सोचिए 5000 साल पहले राखीगढ़ी की एक महिला अपनी कमर पर चमचमाती तगड़ी बांधकर चलती होगी. कमर पर 1000 नगीनों की झंकार, हाथों में शंख की खनकती चूडिय़ां, और गले में सोने के मनके. बिल्कुल वही स्टाइल जो आज भी करवा चौथ पर हरियाणवी दुल्हनें फौलो करती हैं.

इस से साबित होता है कि फैशन की जड़ें हजारों साल पुरानी है. आज हम तगड़ी, चूडिय़ां, सोने के गहने पहनते हैं. राखीगढ़ी की खोज बताती है कि ये शौक नई नहीं बल्कि हड़प्पा काल से चली आ रही सांस्कृतिक निरंतरता है.

विरासत बचाना जरूरी है

राखीगढ़ी जैसी जगहें हमारी जड़ों की कहानी कहती हैं. अगर इन्हें नहीं बचाया तो हम अपने इतिहास से कट जाएंगे. राखीगढ़ी, धोलावीरा जैसी हड़प्पा साइटों पर बच्चों को ले जाएं. इतिहास किताबों से नहीं, मिट्टी से समझ आता है. शंख की चूडय़िां, मनकों का काम आज भी हरियाणा और गुजरात में जीवित है. इन्हें खरीदकर कारीगरों को प्रोत्साहन दें. खुदाई के बाद मिले अवशेषों का स्थानीय संग्रहालय में प्रदर्शन हो ताकि हरियाणा के लोग अपनी 5000 साल पुरानी विरासत को नजदीक से देख सकें.

एक तगड़ी और कुछ मनकों ने बता दिया कि हमारी संस्कृति कितनी पुरानी और गहरी है. हड़प्पा की महिलाएं जो गहने पहनती थीं वही आज भी हमारी पहचान हैं. अगर हम इस कड़ी को समझेंगे तभी अपनी जड़ों पर गर्व कर पाएंगे. राखीगढ़ी सिर्फ मिट्टी का टीला नहीं ये हमारी 5000 साल पुराने समाज का दर्पण है. इंडस वैली सिबीलाइजेशन के खंडहरों की खुदाई में कहीं कोई मंदिरनुमा स्ट्रक्चर नहीं मिले हैं, यह बड़े आश्चय की बात है.

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