healthcare ethics : हजारोंकरोड़ों लोग रोज अपनी जिंदगी की सलामती के लिए कामना करते हैं, लेकिन चंद लोग ऐसे भी हैं जो दिनरात मौत मांगते नहीं थकते क्योंकि वे एक ऐसी जिंदगी जी रहे होते हैं जो मौत से भी बदतर होती है. ये लोग ऐसे दोराहे पर खड़े होते हैं, जहां वे न तो जी सकते हैं और न ही मौत उन को गले लगाती है.
ऐसे में, अगर कोई इंसान या उस का परिवार इच्छामृत्यु की भी मांग करे तो कानून इस की इजाजत नहीं देता क्योंकि भारत में इच्छामृत्यु को पूरी तरह अवैध माना जाता है. अगर कोई इंसान या उस के परिवार वाले इच्छामृत्यु चाहते हैं, तो इस की इजाजत सुप्रीम कोर्ट ही दे सकता है।
हाल ही में 32 साल के एक लड़के हरीश राणा को, जो 13 साल से कोमा में था सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इच्छामृत्यु की इजाजत दी. लेकिन साथ ही यह हिदायत भी दी कि हरीश का लाइफ सपोर्ट हटाने के लिए एक खास योजना बनाई जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पूरी प्रक्रिया के दौरान पेशेंट की गरिमा और सम्मान बना रहे.
जब एक इंसान मौत के करीब है और वह कोमा में या वैंटिलेटर पर कई महीनों से है, उस के सारे और्गन फेल हो चुके हैं, तो फिर इच्छामृत्यु की इजाजत क्यों नहीं? यह गलत या गैरकानूनी क्यों माना जाता है? इच्छामृत्यु समाज या कानून की नजर में गलत क्यों है? एक बेबस और बीमार इंसान की इच्छामृत्यु की मांग, पीड़ा और इस से छुटकारा पाने की प्रक्रिया पर पेश है, एक नजर :
इच्छामृत्यु के खिलाफ कानून और अदालत क्यों है सख्त
एक बीमार इंसान जितना अपनी बीमारी से परेशान और दुखी होता है, उतना ही उस के परिवार वाले भी लंबे समय से बीमार इंसान की वजह से दुखी होते हैं क्योंकि एक बार बीमारी किसी इंसान को घेर ले और उस का इलाज लाइलाज हो तो परेशानी सिर्फ मरीज को ही नहीं, उस से जुड़े पूरे परिवार को होती है क्योंकि वैंटिलेटर, आईसीयू या हौस्पिटल में नौर्मल बैड का खर्चा इतना ज्यादा होता है कि उस मरीज का पूरा परिवार भयंकर आर्थिक संकट में घिर जाता है.
उस के परिवार वाले मरीज को बचाना चाहते हैं लेकिन जब कई महीनों तक कुछ फायदा नहीं होता, सारे और्गन फेल होने लगते हैं और पेशेंट वैंटिलेटर या आईसीयू में पहुंच जाता है, पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद जब मरीज उसी बेकार कंडीशन में होता है, तो ऐसे में इच्छामृत्यु की भावना पैदा होना शुरू होती है। पहले तो बीमार के परिवार वाले इच्छामृत्यु के सख्त खिलाफ होते हैं, लेकिन गंभीर हालत को देखते हुए वे भी इच्छामृत्यु के सहारे अपना पीछा छुड़ाना चाहते हैं।
वहीं दूसरी ओर वह मरीज जो महीनों से बिस्तर पर पड़ा है, उस को भी लगने लगता है कि मैं परिवार पर बोझ हूं और मेरा मर जाना ही सही है।
ऐसे नाजुक वक्त में सिर्फ डाक्टर ही निर्णय ले सकता है कि मरीज की हालत बचने वाली है या इच्छामृत्यु ही सही है. ऐसे पेशेंट के लिए डाक्टर का निर्णय सही निर्णय होता है, जिस में वह कह सकता है कि मैं आखिर तक बचाने की कोशिश करूंगा लेकिन अगर मौत हो गई तो मैं कुछ नहीं कर सकता.
अगर मरीज डाक्टर से इच्छामृत्यु की मांग करे तो डाक्टर को उसे जीने के लिए प्रोत्साहित करना होगा यह कह कर कि तुम ठीक हो जाओगे और तुम्हें जीना है क्योंकि सच बात तो यह है कि कोई भी मौत नहीं चाहता लेकिन जब उस को लगता है कि वह घर वालों पर बोझ है और घर वाले भी अपने फायदे के लिए अपने परिवार के सदस्य मरीज से छुटकारा पाना चाहते हैं, इस में कई बार प्रौपर्टी का लालच भी होता है, जिस के चलते वह कई बार अपने पारिवारिक सदस्य की मौत की मांग करते हैं। इसलिए इन्हीं सब बातों के चलते इच्छामृत्यु पर सख्त कानून है.
इच्छा मृत्यु के बजाय ऐसे मरीज को पेलेटिव केयर संस्था को भी सौंपा जा सकता है
छोटेबड़े शहरों में कई ऐसी संस्थाएं हैं जो इस तरह के मरीजों को जो मौत के करीब है लेकिन मौत हो नहीं रही, ऐसे मरीजों को पेलेटिव केयर संस्था के हवाले किया जाता है। ऐसी कई संस्थाएं हैं जो काफी कम पैसे में इस तरह के मरीजों का खयाल रखती हैं. जब डाक्टर पेशेंट को बिना ठीक हुए घर जाने के लिए बोल देता है जबकि वह ठीक नहीं हुआ है, तो ऐसे में पेशेंट को संभालना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि उस पेशेंट का पलपल ध्यान रखना पड़ता है और परिवार वालों के पास न तो इतना पैसा होता है और न ही ताकत।
ऐसे लोग इच्छामृत्यु के बजाय मरीज को पेलेटिव केयर संस्था में रखना ज्यादा उचित समझते हैं। पेलेटिव केयर वालों को पेशेंट की केस हिस्ट्री देख कर यह समझ आ जाती है कि पेशेंट के पास कितना समय बचा है. एक डाक्टर की आखिर तक कोशिश रहती है कि वह पेशेंट को किसी तरह बचा ले और इच्छामृत्यु न होने दे. लेकिन अगर यह संभव नहीं है तो पेलेटिव केयर वाले ऐसे मरीजों का मरते दम तक खयाल रखते हैं.
इच्छामृत्यु पर बनी बौलीवुड फिल्में
बौलीवुड में इच्छामृत्यु और जीवन के अंतिम पलों के इमोशनल कहानी पर बनी फिल्मों की अगर बात करें, तो कई ऐसी फिल्में बनी हैं जो इच्छामृत्यु के विषय पर आधारित हैं.
गुजारिश : रितिक रोशन और ऐश्वर्या राय की मशहूर फिल्म गुजारिश एक ऐसी जादूगर की कहानी है जो लकवा का शिकार हो जाता है और वह अदालत से इच्छामृत्यु की मांग करता है.
मर्सी : इस फिल्म की कहानी बेटे की कहानी है जो अपनी मां के जीवन रक्षक लाइफ सपोर्ट को हटाने के संघर्ष को ले कर कानूनी लड़ाई लड़ता है। यह फिल्म इच्छामृत्यु को केंद्रित कर के बनाई गई है.
शायद : 1979 में नसीरुद्दीन शाह और सिमी ग्रेवाल की फिल्म ‘शायद’ इच्छामृत्यु पर केंद्रित थी।
सलाम वेंकी : विशाल जेठवा द्वारा अभिनीत ‘सलाम वेंकी’ एक ऐसे युवक की कहानी है जो गरिमापूर्ण मृत्यु और मृत्यु से पहले अपने अंगों को दान करने के लिए यूथ नेशिया की कानूनी लड़ाई लड़ता है और आखिर में अपनी इच्छानुसार जीत भी हासिल करता है.
इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि मांगने से अगर मौत मिलती तो कौन जीता इस जमाने में। इच्छामृत्यु एक मरीज की मजबूरी होती है, लेकिन बीमारियों से लड़ कर जिंदा रखना एक डाक्टर का फर्ज होता है। यही वजह है कि कानूनी तौर पर इच्छामृत्यु को पूरी तरह अवैध कर दिया गया है.
