Workation है जेन जी का नया वर्क कल्चर, जानें इसके बारे में सबकुछ

Workation : वर्केशन आजकल के युवाओं का नया वर्क कल्चर है जिस में वे घर से दूर रिमोट एरियाज में रह कर काम करना पसंद करते हैं. इंग्लिश वर्ड वर्क + वेकेशन से मिल कर बना यह शब्द उन युवाओं का सब से फेवरिट शब्द है जिस में वे एक जगह रुक कर काम करने के स्थान पर अलगअलग जगहों पर जा कर काम करते हैं.

कोरोना के बाद से ही कुछ कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को वर्क फ्रौम होम दे दिया है, जिस के कारण एक ही कमरे और एक ही स्थान पर निरंतर काम करने के कारण धीरेधीरे काम और जगह दोनों से ही बोरियत होना प्रारंभ हो जाती है और इस का असर सीधे उन के काम पर भी पड़ने लगता है. इस बोरियत से बचने के लिए युवा अपना लैपटौप और औफिस का अन्य जरूरी सामान ले कर दूरस्थ स्थानों पर चले जाते हैं और वहां रह कर जहां दिन में वे अपना कार्य करते हैं और शेष समय में वे आसपास के स्थानों पर घूमते हैं और इस तरह वे एकसाथ कई काम कर लेते हैं.

ताकि काम की प्रोडक्टिविटी बनी रहे

कई कंपनियां भी अपने कर्मचारियों को औफिस और घर से दूर रह कर कार्य करने को परमिट करती हैं ताकि काम में प्रोडक्टिविटी बनी रहे.

युवाओं में इस के लोकप्रिय होने का एक अन्य कारण यह भी है कि वर्केशन के दौरान घूमने के लिए उन्हें अतिरिक्त अवकाश की आवश्यकता नहीं होती.

वर्केशन के लाभ

एक मल्टीनैशनल कंपनी में घर से ही काम कर रही अनामिका कहती है,”पिछले 1 साल से उसी कमरे, लैपटौप और घर वालों के चेहरे देख कर मुझे बोरियत होने लगी थी तभी मेरी एक सहेली के साथ मैं ने हिमाचल प्रदेश के बिर नामक स्थान पर रह कर 1 माह तक काम किया. नो डाउट, इस दौरान मेरे काम की क्वालिटी और प्रोडक्टिविटी में बहुत सुधार आया था क्योंकि वहा का माहौल अलग था और मैं अपने काम पर पहले से अधिक फोकस कर पा रही थी.

अश्विन हर दूसरे माह 15 दिन के लिए अपनी वर्किंग वाइफ के साथ अपने घर से दूर किसी दूसरी जगह जा कर काम करता है. दोनों कामकाजी हैं और एकसाथ किसी भी होटल में जा कर काम करते हैं। वह कहता है कि पहले जहां हम दोनों एक ही फ्लैट के अलगअलग कमरे में बैठ कर काम करते थे, शाम तक एकदूसरे पर झींकना शुरू कर देते थे। पर अब हर दूसरे महीने नई जगह जाने का इंतजार रहता है और काम खत्म कर के उस जगह को घूमने का. इस तरह हम दोनों ही बहुत अच्छी तरह वर्क लाइफ बैलेंस कर पा रहे हैं.

वर्केशन के लिए युवा बहुत अधिक भीड़भाड़ वाले स्थानों की अपेक्षा शांति वाले स्थानों पर जाना अधिक पसंद करते हैं. इसलिए यहां पर उन के लिए घूमना भी काफी सस्ता होता है.

भोपाल में रहने वाली आकांक्षा ने 15 दिन तक मांडू के एक होमस्टे में रुक कर काम किया। वह कहती है,”यहां रहना काफी सस्ता तो पड़ा ही, साथ ही घूमने के लिए अलग से छुट्टियां भी नहीं लेनी पड़ीं, दूसरे 15 दिन रुकने से मैं यहां की सारी जगहों को अच्छी तरह से ऐक्सप्लोर भी कर पाई. नए लोगों और नई जगहों को देखने से मेरी सोच और काम को भी काफी प्रभावित किया.

वर्केशन के अपने अनुभव को साझा करते हुए पुलकित कहता है,“लंबे समय से घर में मम्मीपापा बीमार थे और मैं काम कर रहा था. कंपनी बारबार वार्निंग दे रही थी. अपनी पत्नी के कहने पर मैं ने कुछ दिनों के लिए घर से दूर जा कर रिमोट एरिया में एक होमस्टे से काम किया. इस दौरान निस्संदेह मैं अपने काम पर अच्छे से फोकस कर पाया.”

रखें इन बातों का भी ध्यान

अपनी कार्य क्षमता को बढ़ाने का बहुत अच्छा माध्यम है वर्केशन क्योंकि जब आप औफिस जाते हैं तो एक ही दिन में भांतिभांति के लोगों से मिलते हैं, गप्पें लगाते हैं जिस के कारण आप पर काम हावी नहीं होने पाता। वहीं घर से काम करते समय आप रोजरोज उसी स्थान और लोगों से बोर होना प्रारंभ हो जाते हैं. वर्केशन का प्लान करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है :

● जिस भी जगह पर आप जा रहे हैं उस का प्लान पहले से बनाएं ताकि अपने रहने की बुकिंग समय रहते कर सकें.

● चूंकि आजकल लगभग काम इंटरनैट से होते हैं इसलिए स्थान चुनने से पहले वहां नैट की उपलब्धता सुनिश्चित कर लें.

● जिस स्थान पर आप जा रहे हैं उस की समस्त जानकारी अपने किसी दोस्त या परिवार वालों को दे कर जाएं ताकि किसी भी मुसीबत के समय संपर्क किया जा सके.

● अकसर युवा अविवाहित बेटियों को इस तरह से भेजने के लिए माता हपिता तैयार नहीं होते। ऐसे में विद्रोह करने की जगह उन्हें प्यार से वर्केशन के बारे में डिटेल जानकारी दें। साथ ही प्रारंभ में कम दिनों का प्लान बनाएं ताकि मातापिता को आप आगे के लिए तैयार कर सकें.

● बजट फ्रैंडली स्थान का चयन करना आवश्यक है ताकि आप कम खर्चे में अपना काम कर सकें.

Teenage Love : कम उम्र में प्रेम, किस हद तक जाएं

Teenage Love : फिल्म ‘एकदूजे के लिए’ का एक मशहूर गीत है,’सोलह बरस की बाली उमर को सलाम, ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम…’ मगर अब यहां सवाल यह उठता है कि बाली उम्र को ही सलाम क्यों किया जा रहा है? उम्र तो 10 या 12 साल की भी हो सकती थी? तो इस का जवाब बायलौजी की किताबों में मिलता है.

पेरैंटिंग टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 13 से 18 साल की उम्र बदलाव और विकास की दृष्टि से सब से अहम होती है. यही वह उम्र है, जिस में टीनएजर्स बचपन की डगर छोड़ जवानी की दहलीज पर कदम रखते हैं. उन के शरीर में हारमोंस का उतारचढ़ाव होता है. इस दौरान उन का शरीर और मन तेजी से बदल रहा होता है. पहली बार उन के मन में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण देखने को मिलता है. यही वह उम्र होती है, जिस में टीनऐजर्स प्यार में पड़ते हैं.

टीनऐजर्स के रिश्ते की वजह इमोशन नहीं बायलौजी होती है

पेरैंटिंग टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 14-15 साल के टीनऐजर्स के प्यार की गिरफ्त में आने की असल वजह इमोशनल नहीं बल्कि बायलौजिकल होती है. इस उम्र में वे प्यार और इमोशन को ठीक से समझ भी नहीं पाते. वे सिर्फ नए अनुभवों से गुजरना चाहते हैं, जो उन्हें आनंद भी देता है.

बौलीवुड भी फिल्मों के माध्यम से टीनऐजर्स के इन रिश्ते को बयां करता रहता है

साल 2002 में एक फिल्म आई थी ‘एक छोटी सी लव स्टोरी’. इस फिल्म में 14-15 साल का एक लड़का अपने से बड़ी उम्र की औरत के प्रति आकर्षित हो जाता है और सामने वाले फ्लैट में उसे दूरबीन के माध्यम से हर पल देखता रहता है. वह उस महिला को अपने प्रेमी के साथ प्रेम करते हुए देखता है और गुस्स्से में आ जाता है. साथ ही महिला को भी बताता भी है कि वह उस से प्यार करता है.

तब महिला उसे समझती है यह प्यार नहीं आकर्षण है. अपोजिट सैक्स के प्रति सिर्फ 2 मिनट प्लेजर होता है. वह महिला अपने हाथों से उस का मास्टरबेशन कर उसे भ्रम से निकाल कर वास्तविकता से रूबरू कराने की कोशिश करती है. लेकिन वह लड़का नहीं समझता क्योंकि इतनी कम उम्र में उस का दिमाग परिपक्व नहीं होता. बहुत बातें उस की समझ से परे होती हैं.

महिला द्वारा ऐसा करने पर वह बुरी तरह से हर्ट होता है और अपने हाथ की नस काट लेता है.

ऐसी न जाने कितनी ही फिल्में बौलीवुड में आती हैं जहां टीनऐजर्स को अपना आकर्षण प्यार लगता है और उस के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाते हैं क्योंकि वे खुद को और अपनी फीलिंग्स को समझ ही नहीं पाते हैं.

पेरैंट्स का टीनऐजर्स के प्यार पर बंदिशें लगाना ठीक नहीं

● टीनऐजर्स की दोस्ती और प्यार पर नजर रखें. उन्हें सामान्य बातचीत के दौरान कैरियर पर फोकस करने को कहें

● अगर टीनऐजर्स बेटी या बेटे की दोस्ती के बारे में पता चले तो उन पर गुस्सा कर के रोकने के बजाए उन के प्यार के लिए हैल्दी बाउंड्री सैट करें.

● टीनऐजर्स से सैक्स और रिलेशनशिप के बारे में खुल कर बात करते रहें. उन्हें कम उम्र में सैक्स से होने वाली सामान्य बातों की जानकारी दें.

● टीनऐजर्स के दोस्त बन कर रहें ताकि वे अपनी हर बात आप से खुद शेयर करें और सलाह भी मांगें.

टीनऐजर्स का प्यार करना अनैतिक नहीं है पर इन बातों का भी ध्यान रखें

प्रैगनैंसी होने का खतरा बना रहता है : अगर आप यह सोच रही हैं कि संबध बनाने से पहले आप ने प्रोटैक्शन का यूज किया था इसलिए प्रैगनैंसी का तो सवाल ही नहीं उठता, तो आप को बता दें कि यह उतना भी सेफ नहीं है जितना आप सोच रही हैं.

कई बार ऐक्सीडैंट भी हो जाते हैं. आमतौर पर लड़कियों को 12 साल की उम्र में मासिकधर्म शुरू हो जाता है. एक बार मासिकधर्म शुरू होने के बाद कोई भी लड़की शारीरिक संबंध बनाने के बाद गर्भधारण कर सकती है. लड़कियों को पीरियड्स शुरू होने के बाद कभी भी शारीरिक संबंध बनाने पर प्रैगनैंसी का खतरा हो सकता है. अगर प्रैगनैंट हो गए तो घर पर बताने में भी डर और अगर छिपछिपा कर अबोर्शन करवाने की सोचती हैं तो इस में जान तक का खतरा होता है. इसलिए किसी से रिलेशन बनाने से पहले 100 बार सोचें.

गर्भाशय कैंसर का खतरा

कम उम्र में शारीरिक संबंध बनाने वाली महिलाओं में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.

एक रिसर्च के अनुसार, कम उम्र में ही शारीरिक संबंध बनाने के बाद महिलाओं के शरीर में यौन संचारित विषाणुओं की संख्या बढ़ सकती है जिस से सर्वाइकल कैंसर होने का खतरा मंडराता रहता है.

इन्फैक्शंस का खतरा

इस उम्र में सही जानकारी न होने के कारण यौन संबंध बनाते समय लड़कियां स्वच्छता नहीं बरत पाती हैं, जिस के कारण उन्हें यौन सं‍चारित संक्रमण/रोग (STD), हर्पिस (herpes), एचआईवी एड्स सहित अन्य यौन संचारित बीमारियां होने की संभावना सब से अधिक होती हैं.

दरअसल, यौन संबंध बनाने वाले टीनऐजर्स में सैक्सुअली ट्रांसमिटेड इन्फैक्शंस (एसटीआई) होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है. एसटीआई में सिफलिस, क्लैमाइडिया, एचआईवी या अन्य संक्रमण वाली बीमारियां शामिल हैं.

एक शोध में पाया गया है कि दुनियाभर में चिकित्सीय एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं की चपेट में आने की वजहों में यौन संबंधों से होने वाला संक्रमण सब से प्रमुख वजह है.

शोधकर्ताओं ने कहा है कि यह शोध दिखाता है कि कम उम्र में यौन संबंधों से एसटीआई से दोचार होने का जोखिम बढ़ता है.

सियोल के योनसेई विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस शोध के लिए कोरिया के युवाओं का एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण डाटा आजमाया. कोरियन सैंटर्स फौर डिसीज कंट्रोल ऐंड प्रीवेंशन द्वारा सालाना युवाओं का सर्वेक्षण कराया जाता है.

इस विश्लेषण में यौन संबंध स्थापित कर चुके 22,381 नाबालिगों के जवाबों को शामिल किया गया था. इन में से करीब 7.4% किशोरों एवं 7.5% किशोरियों ने एसटीआई से दोचार होने की बात कही.

शोधकर्ताओं ने पाया कि लड़के व लड़कियों दोनों में पहले यौन संबंध के वक्त उम्र कम होने की वजह से सैक्सुअली ट्रांसमिटेड इन्फैक्शंस बढ़ गए.

वैबसाइट ‘यूथ हैल्थ मैग डौट कौम’ की रिपोर्ट के अनुसार, 12वीं कक्षा में पहली बार यौन संबंध बनाने वाले किशोरों की तुलना में 7वीं कक्षा में पहली बार यौन संबंध बनाने वाले किशोरकिशोरियां एसटीआई से 3 गुना ज्यादा प्रभावित हुए.

इस तरह शोधकर्ताओं का कहना है कि कम उम्र में यौन संबंध बनाने से एसटीआई की चपेट में आने का जोखिम बढ़ जाता है.

कम उम्र में सैक्स करने से ब्रेन विकसित नहीं हो पता

अगर आप कम उम्र में शारीरिक संबंध बनाते हैं तो इस से आप के दिमाग पर निगेटिव असर पड़ता है और एक तरह से दिमाग विकसित होना बंद हो जाता है. इस उम्र में शारीरिक संबंध बनाने से दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ता है जिस के कारण शरीर एवं मस्तिष्क दोनों का विकास रुक जाता है.

कम उम्र में यौन संबंध स्‍थापित करने से मस्तिष्क एवं छोटेछोटे प्रजनन ऊतकों में भी इंटरकोर्स करने के बाद बड़ा परिवर्तन होता है जिस के कारण मस्तिष्क एवं बौडी का विकास प्रभावित होता है. यही कारण है कि कम उम्र में सैक्स करना नुकसानदायक होता है.

डिप्रैशन होने का खतरा भी बना रहता है

इस उम्र के आकर्षण को लड़कियां प्यार समझ बैठती हैं लेकिन एक बार शारीरिक संबंध बनाने के बाद मन भर जाता है और अन्य किसी भी वजह से रिश्ता टूट जाता है तो लड़कियां भावुक हो कर डिप्रैस्ड हो जाती हैं.

एचआईवी एड्स का खतरा

2011 में अमेरिका में जितने भी एचआईवी के केस आए उन में 21% मरीजों की उम्र 13 से 24 साल के बीच थी. यह खतरनाक संकेत है.

आई पिल के साइडइफैक्ट भी बहुत हैं

आई पिल टैबलेट में लेवोनोर्गेस्ट्रेल नामक एक सक्रिय घटक होता है, जो एलएच और एफएसएच हारमोन के उत्पादन को रोकता है. ये हारमोन ओव्यूलेशन को नियंत्रित करते हैं. आई पिल ओव्यूलेशन में देरी या शुक्राणु अंडे के निषेचन को बाधित करने का काम करती है.

लेकिन इस के कई तरह के साइडइफैक्ट्स भी हैं. जैसे मतली, थकान, सिरदर्द, पेट की ऐंठन, मासिकधर्म में अनियमितताएं (विलंबित या शुरुआती मासिकधर्म) लेवोनोर्गेस्ट्रेल, जो महिलाओं में ऐलर्जी पैदा कर सकता है, इस गोली का सक्रिय घटक हैं.

पीरियड्स में यह गड़बड़ी पैदा कर सकता है. यह पीरियड्स में अधिक ब्लीडिंग का कारण बन सकता है. इस से शारीरिक दर्द हो सकता है, जैसे थकान, चक्कर आना वगैरह. इस से स्किन ऐलर्जी भी हो सकती है.

यह अन्य दवाओं के साथ भी खराब प्रतिक्रिया कर सकता है. गोली में पाए जाने वाले हारमोन की भारी मात्रा के कारण इन में से अधिकांश दुष्प्रभाव होते हैं.

आई पिल और कंडोम की कोई गारंटी नहीं

कंडोम प्रैगनैंसी रोकने की 100% गारंटी नहीं देता. शायद आप ने ध्यान न दिया हो लेकिन कंडोम के पैकेट पर भी इस बारे में जिक्र किया गया होता है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, कंडोम लगाने से ले कर आखिर तक उस के इस्तेमाल में होने वाली चूक स्पर्म को रोक नहीं पाती, जो प्रैगनैंसी की वजह बनती है. साथ ही यह भी जरूरी नहीं है कि इस से प्रैगनैंसी रुक ही जाएगी. कई मामलों में आई पिल खाने के बाद भी गर्भ ठहर सकता है. अगर ऐसा हो गया तो आप क्या करेंगी, यह सोच लें.

सैक्स करने के लिए ओयो (OYO) में जाना भी खतरनाक हो सकता है

ओयो में जाना भी सुरक्षित नहीं होता है. वहां ये लोग ऐसे कम उम्र के लड़केलड़कियों को फंसाने के लिए छिपे हुए कैमरे लगाए रखते हैं जिस में सब कुछ रिकौर्ड होता है. ये लोग फिर आप को ब्लैकमेल करते हैं या फिर सोशल मीडिया पर आप के न्यूड वीडियो और फोटो वायरल कर देते हैं. दोनों ही सिचुएशन में आप खतरे में पड़ सकते हैं.

लड़का आप को ले कर अपने दोस्तों में रौब न मारे ऐसा हो नहीं सकता

कई बार लड़के शेखी बघारने के लिए लड़की के साथ अपने ऐसे वीडियो बनाते हैं और फोटो लेते हैं ताकि अपने दोस्तों में रौब झाड़ सकें. ऐसा होता है तो बदनामी लड़की की होती है. इस के आलावा जहां आप जा रहे हो वहां सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं. आप इकठे कहीं हाथ पकड़ कर जा रहे हों तो कहीं न कही रिकौर्ड हो रहा है. इसलिए आप बच नहीं सकते. इसलिए जो भी करें सोचसमझ कर ही.

Avantika Dasani: एक्टिंग में अपनी पहचान बनाने की कोशिश

Avantika Dasani: अभिनेत्री अवंतिका दसानी बौलीवुड हीरोइन भाग्यश्री और बिजनैसमैन हिमालय दसानी की बेटी हैं. अपनी मां के प्रभाव के बारे में वे बताती हैं कि मां लंबे समय से इंडस्ट्री से दूर हैं, इसलिए उन की परवरिश फिल्मी नहीं रही. लाइम लाइट से दूर एक बहुत ही सामान्य बचपन था उन का. लेकिन फिर भी एक अभिनेत्री की बेटी होने के नाते कुछ लाभ तो मिलते हैं, जैसे मीडिया अटैंशन और प्री बज. लेकिन अभिनय इंडस्ट्री में काम पाने के लिए अपनी प्रतिभा और मेहनत से ही आगे बढ़ना होता है.

अवंतिका ने अपने कैरियर की शुरुआत में ही समझ लिया था कि उन्हें संघर्ष करना पड़ेगा और अपनी योग्यता साबित करनी होगी, ताकि दर्शक और निर्देशक उन्हें एक अलग नजरिए से देखें.

अवंतिका 24 जनवरी, 1995 को मुंबई, महाराष्ट्र में पैदा हुईं. उन की परवरिश एक समृद्ध और सांस्कृतिक परिवेश में हुई, जहां आर्ट और बिजनैस दोनों की बौंडिंग थी.

अवंतिका के नाना विजय सिंहराव माधवराज परवर्धन, सांगली के महाराजा के वंशज हैं, जिस से उन का पारिवारिक इतिहास राजसी और सांस्कृतिक धरोहर से समृद्ध है. इन के बड़े भाई भिमान्यु दसानी भी बौलीवुड में डैब्यू कर चुके हैं.

अवंतिका ने मुंबई से अपनी आरंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद लंदन के कैस बिजनैस स्कूल से बिजनैस और मार्केटिंग की डिग्री हासिल की.

एकैडेमिक अचीवमैंट के साथसाथ उन्हें डांस और फैशन में इंट्रस्ट है जो उन की पर्सनैलिटी को वर्साटाइल बनाते हैं.

कौर्पोरेट क्षेत्र में कुछ समय तक काम करने के बाद अवंतिका ने महसूस किया कि उन की असली रुचि ऐक्टिंग में है. उन्होंने ऐक्टिंग में कैरियर बनाने का निर्णय लिया और इस के लिए कई ऐक्टिंग वर्कशौप और ट्रेनिंग प्रोग्राम्स में भाग लिया. उन्होंने अतुल मोंगिया, हेमंत खेर जैसे ट्रेनर से ट्रेनिंग ली और केरल स्थित आदि शक्ति थिएटर में संपन्न वर्कशौप में हिस्सा भी लिया. इस के अलावा उन्होंने डांस, वौयस ट्रेनिंग, बौक्सिंग और मार्शल आर्ट्स में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया.

अवंतिका दसानी ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत टीवी सीरीज ‘मिथ्या’ से की, जिस में उन्होंने रिया राजगुरु का किरदार निभाया. इस सीरीज में उन के सहकलाकारों में हुमा कुरैशी और परमब्रत चटर्जी शामिल थे. ‘मिथ्या’ एक साइकोलौजिकल थ्रिलर है, जो एक शिक्षक और छात्रा के बीच जटिल संबंधों पर आधारित है. इस सीरीज में अवंतिका के प्रदर्शन को समीक्षकों और दर्शकों द्वारा सराहा गया.

इस के बाद अवंतिका न तेलुगू फिल्म ‘नेनू स्टूडैंट सर’ में श्रुति वायुदेवन का किरदार निभाया. यह फिल्म एक युवा छात्र की कहानी है, जो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता है. फिल्म में अवंतिका के अभिनय को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली.

अवंतिका की आगामी फिल्म ‘यू शेप की गली’ है. इस में वे मुख्य भूमिका मे नजर आएंगी. यह फिल्म एक रोमांटिक, म्यूजिकल और सोशल ड्रामा है, इस फिल्म में उन के सहकलाकार विवान शाह, जावेद जाफरी, इश्तियाक खान, नमिता लाल, और सुशांत सिंह हैं. इस फिल्म की शूटिंग लखनऊ में हुई है जिसे अविनाश दास ने निर्देशित किया है.      अवंतिका दसानी ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत से ही विविध भूमिकाओं में अपने अभिनय कौशल का प्रदर्शन किया है. वे अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाते हुए फिल्म उद्योग में अपनी एक अलग पहचान बनाने की दिशा में अग्रसर हैं.

ग्लोबल इंडिया अवार्ड्स 2024 में अवंतिका दसानी ने अपनी उपस्थिति से सब का ध्यान आकर्षित किया. इस कार्यक्रम में उन्होंने अपने फैशन सैंस और आत्मविश्वास से सभी को प्रभावित किया.

अवंतिका सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं और अपने प्रशंसकों के साथ अपनी जीवनशैली, फैशन और काम से जुड़ी झलकियां शेयर करती रहती हैं. उन की ग्लैमरस और स्टाइलिश फोटोज अकसर इंटरनैट पर वायरल होती हैं जिस से उन की पौपुलैरिटी बढ़ी है. इंस्टाग्राम पर उन के 1.15 लाख फौलोअर्स हैं.

इस सब के लिए अवंतिका अपने परिवार के समर्थन के बारे में बताती हैं कि उन की मां भाग्यश्री और भाई अभिमन्यु ने उन्हें हमेशा एनकरेज किया है. उन की मां ने उन्हें सेट पर अच्छी तैयारी के साथ जाने और अपने काम का आनंद लेने की सलाह दी. अवंतिका बताती हैं कि मां ने उन्हें इमोशंस को आंखों से व्यक्त करने की महत्ता समझाई है क्योंकि यदि इमोशंस आंखों से न दिखें तो अभिनय का कोई फायदा नहीं.

फ्यूचर में अवंतिका का लक्ष्य है कि वे अपने एक्टिंग स्किल को और निखारें और विभिन्न प्रकार के किरदारों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करें. वे अपने परिवार की विरासत का सम्मान करते हुए फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती हैं.

Bigg Boss 19 में इस बार बड़ा बदलाव, यू ट्यूबर और इंफ्लुएंसर नहीं होंगे शो का हिस्सा

Bigg Boss 19 : पिछले कुछ समय से कलर्स के चर्चित शो बिग बौस को लेकर कई सारी खबरें चर्चा में थी, जैसे बिग बौस 19 का प्रसारण इस बार नहीं होगा. क्योंकि चैनल और प्रोडक्शन के बीच मतभेदों के चलते बिग बौस का अगला सीजन नहीं आएगा. लेकिन अब इन खबरों पर पूरी तरह रोक लग गई है , क्योंकि अब प्रोडक्शन और चैनल के बीच का मतभेद खत्म हो गया है. बिग बौस 19 का नया शो पूरी तरह से आने के लिए तैयार है लेकिन इस बार बिग बौस में कई सारे बदलाव होने वाले हैं जैसे की बिग बौस की समय अवधि इस बार साढ़े पांच महीना होगी, साथ ही इसके बदले में ओटीटी पर प्रस्तुत होने वाला बिग बौस नहीं प्रसारित होगा.

पूरा का पूरा ध्यान इस बार टीवी पर प्रसारित बिग बौस पर ही केंद्रित होगा. शो की होस्टिंग सलमान खान ही करेंगे , लेकिन इस बार शो में कोई भी यू ट्यूबर और इंफ्लेंसर बतौर प्रतियोगी हिस्सा नहीं ले पाएगा, शायद इसके पीछे की खास वजह यह है कि सोशल मीडिया से जुड़े यू ट्यूबर या इंफ्लुएंसर की पहले से ही अपनी औडियंस और फैन फौलोइंग होती है , जिसकी वजह से यह लोग बिना खेले ही विजेता घोषित हो जाते हैं. जिसकी वजह से टीवी और फिल्म से आए लोगों को हार का सामना करना पड़ता है.

इसी बात को मद्दे नजर रखते हुए खबरों के अनुसार बिग बौस 19 में सिर्फ फिल्म और टीवी के कलाकार ही शामिल होंगे. खबरों के मुताबिक बिग बौस 19 की शुरुआत 30 जुलाई 2025 से होगी समाप्ति 2026 जनवरी तक होगी.

प्राप्त सूत्रों के अनुसार कलर्स चैनल इस बार बिग बौस 19 में फिल्म इंडस्ट्री के पौपुलर चेहरों को लाने वाला है. बिग बौस 18 की असफलता के बाद इस बार कलर्स चैनल वाले और बिग बौस टीम अपने नए शो को लेकर बहुत सतर्क है. ऐसे में लग तो यही रहा है, इस बार बिग बौस 19 खास और धमाकेदार होगा.

Alia Bhatt Career: डिसअपियरंस की कगार पर आलिया भट्ट

Alia Bhatt Career: बौलीवुड अभिनेत्री आलिया भट्ट एक नैपोकिड हैं और यह कहने में कोई दोराय नहीं कि कैरियर की शुरुआत से ही उन्हें टौप प्रोडक्शन हाउस और प्रोड्यूसर ने काम दिया है. लेकिन उन्होंने अपने काम से लोगों को ज्यादा दिन तक गौसिप करने का मौका नहीं दिया. 2012 में अपनी पहली फिल्म से ले कर आज तक उन्होंने साबित किया कि अच्छे टैलेंट को कोई नहीं रोक सकता. आलिया का एक दशक लंबा ऐक्टिंग कैरियर उन की कड़ी मेहनत और वर्सटैलिटी को दिखाता है.

देश की टौप ऐक्ट्रैसेज में से एक आलिया भट्ट अब तक कई माइलस्टोन अचीव कर चुकी हैं. हालांकि इस बात में कोई दोराय नहीं कि ‘स्टूडैंट औफ द ईयर’ की नईनवेली ऐक्ट्रैस से ले कर ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ की दमदार अदाकारा तक उन्होंने इंडियन सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. लेकिन ऐक्टिंग उन की दुनिया का सिर्फ एक पहलू है. आज वे एक ग्लोबल आइकन, फैशन आइडल, एंटरप्रिन्योर, एक पत्नी और एक मां भी बन चुकी हैं.

शादी और बच्चे से पहले या बाद में आलिया के पास काम की कमी नहीं रही. लेकिन अपने पोस्टमार्टम पीरियड के बाद जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म की तो वह बौक्सऔफिस पर औंधेमुंह गिर गई. सवाल तो बनता है कि क्या आलिया दर्शकों की नजरों से गायब होती जा रही हैं? उन के शुरुआती जीवन से ले कर अब तक के उन के सफर पर यहां एक नजर डालते हैं.

बौलीवुड में डैब्यू

15 मार्च, 1993 को मशहूर भट्ट परिवार में जन्मी आलिया का कैरियर सिल्वर स्क्रीन पर होना तय सा था. उन के पिता महेश भट्ट मशहूर फिल्म निर्माता हैं और उन की मां सोनी राजदान एक ऐक्ट्रैस. परिवार की बात की जाए तो बहन पूजा भट्ट भी अपने समय में कमाल की ऐक्ट्रैस रहीं और खूबसूरती तो खानदानी थी ही.

आलिया ने 2012 में करण जौहर की फिल्म ‘स्टूडैंट औफ द ईयर’ से बौलीवुड में डैब्यू किया था. इस फिल्म ने उन्हें एक स्टाइलिश, ग्लैमरस अभिनेत्री के रूप में पेश किया और वे अपने क्यूट लुक और वर्सटैलिटी के चलते जल्द ही पूरे देश की चहेती बन गईं. वे फिल्म में अपनी पसंदीदा ऐक्ट्रैस करीना कपूर की तरह नक़ल करती दिखीं.

यह फिल्म बौक्सऔफिस पर अच्छा परफौर्म कर रही थी, लेकिन क्रिटिक्स को शक था कि क्या वे मेनस्ट्रीम रोल्स में आगे बढ़ पाएंगी. उन्हें नहीं पता था कि आलिया उन्हें गलत साबित करने वाली हैं और 2014 में आलिया ने इम्तियाज अली के डायरैक्शन में ‘हाइवे’ फिल्म की. फिल्म भले ज्यादा न चली हो मगर आलिया ने अपनी ऐक्टिंग की रेंज इस फिल्म से दिखा दी और क्रिटिक के मुंह पर ताले जड़ दिए.

आलिया भट्ट की हिट्स

इस के बाद आलिया भट्ट ने न सिर्फ कमर्शियली कई हिट फिल्में दीं, साथ ही, साबित किया कि वे अपने प्रोफैशन में किसी से कम नहीं. जैसे, साल 2016 में ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म आई, आलिया के हिस्से में ज्यादा बड़ा रोल नहीं था इस फिल्म में मगर वे एक देहाती लड़की की भूमिका में ऐसी जमीं कि सब ने उन की तारीफों के पुल बांधे.

‘उड़ता पंजाब’ में आलिया भट्ट का एक अलग ही रूप देखने को मिला. उन के गंभीर अभिनय ने उन्हें बेस्ट ऐक्ट्रैस का फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया जिस से साबित हो गया कि वे एक ग्लैमरस स्टार से कहीं बढ़ कर हैं. इस के बाद 2018 में ‘राजी’ उन के हिस्से आई. यह फिल्म काफी सफल रही. 37 करोड़ रुपए की लागत में बनी इस फिल्म ने 195 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की थी.

ऐसे ही 2019 में आई ‘गली बौय’ में उन के डायलौग्स और उन की एनर्जी ने उन की अचीवमैंट्स में एक और अचीवमैंट जोड़ दी. इस में वे सपोर्टिंग रोल में थीं, फिर भी सब से ज्यादा पौपुलैरिटी उन्होंने ही बंटोरी. ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ आलिया के कैरियर की सब से बेहतरीन फिल्मों में से एक मानी जाती है. इस में उन्हें बिलकुल नए अवतार में दिखाया गया. उन की दमदार परफौर्मेंस से देश ही नहीं, विदेशों से भी उन्हें व्यापक प्रशंसा और कई पुरस्कार मिले.

 क्या गिर सकता है आलिया का ग्राफ?

आलिया ने कई हिट फिल्में दीं. हाल में ‘रोक्की और रानी की प्रेम कहानी’ में आलिया नजर आईं जिस में वे शानदार लगीं. मगर उन की कुछ फिल्में बुरी तरह पिटी भी हैं. इन में करन जौहर की प्रोड्यूस फिल्म ‘कलंक’ का नाम सब से पहले आता है. उस के बाद उन्होंने ‘सड़क 2’ में देखा गया और वह भी फ्लौप रही. यही नहीं, आलिया हौलीवुड फिल्म में भी डैब्यू कर चुकी हैं. लेकिन वहां उन की दाल नहीं गल पाई.

इस के बाद आलिया ने अपनी प्रैग्नैंसी के बाद ‘जिगरा’ फिल्म में काम किया और वह आलिया भट्ट की सब से बड़ी फ्लौप फिल्म बन गई. बौक्सऔफिस पर इस की हालत खस्ता नजर आई. ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या आलिया की ऐक्टिंग में दम ख़त्म हो चुका है या वे भी शादी व बच्चे के बाद से घरगृहथी को प्रायरिटी दे रही हैं, इसलिए ऐक्टिंग से दूर हो चुकी हैं.

आलिया भट्ट ने रणबीर कपूर से अप्रैल 2022 में शादी की थी और उसी साल नवंबर में उन की बेटी राहा का जन्म हुआ था. आलिया ने शादी के कुछ समय बाद ही जून 2022 में अपनी प्रैग्नैंसी की घोषणा की थी और अब वो अपनी बेटी के साथ मदरहुड को एंजौय कर रही हैं.

आलिया एक नैपोकिड हैं, वहीं उन्होंने अपनी कई फिल्मों से यह साबित किया है कि ऐक्टिंग में उन्हें महारत हासिल है. उन्होंने वेश्या, जासूस और टीनएजर जैसे रोल्स से अपनी वर्सटैलिटी को प्रूव किया है. सो, बौलीवुड में उन के लिए काम की कमी नहीं.

मगर हकीकत यह भी है कि अकसर किसी ऐक्ट्रैस के शादी और बच्चा कर लेने के बाद उसे प्रोड्यूसर्स से पहले जैसा अटैंशन व काम नहीं मिल पाता. बौलीवुड में ऐक्ट्रैसेज के बारे में माना जाता है कि उन का ऐक्टिंग कैरियर बहुत कम समय तक चलता है. शादी करने या बच्चे पैदा करने का मतलब मानो ऐक्टिंग कैरियर पर फुलस्टौप लगाना हो. इस का उदाहरण हैं, ट्विंकल खन्ना, नीतू कपूर, अनुष्का शर्मा, आसीन, भाग्यश्री आदि. इन में से कई ऐक्ट्रैस अपनी मरजी से भी कैरियर को विराम दे चुकी हैं. लेकिन बड़ा कारण दर्शकों की नजर में शादीशुदा ऐक्ट्रैस का अपीलिंग न लगना है.

लेकिन आलिया के साथ ऐसा नहीं हुआ. शादी और बच्चे के बाद उन्होंने कुछ फिल्में कीं जिन में से एक ही फिल्म फ्लौप रही. आलिया की अपकमिंग फिल्मों में ‘अल्फा’, ‘लव एंड वार’ और ‘ब्रह्मास्त्र-2’ शामिल हैं. ये सभी बड़े बजट की फ़िल्में हैं. आलिया भट्ट के पास काम की कमी नहीं है. लेकिन देखना होगा कि क्या वे मां बनने के बाद भी पहले की तरह सुपरहिट फिल्में दे पाएंगी? क्या लोग उन्हें और उन के काम को देखना पसंद करेंगे?

Social Story : काश – क्या सिया अपनी मरजी से जिंदगी जी पाई?

Social Story :  रैस्टोरैंट में बैठी हुई सिया मानव का इंतजार कर रही थी. मानव को सिया से आज 27 साल बाद मिलना है. मानव का इंतजार करतेकरते सिया अपने अतीत में डूब गई…

27 साल पहले की हर घटना उस की आंखों के सामने घूमने लगी. उस का मानव से मिलना, मानव का भी उस के प्रति आकर्षित हो जाना. दोनों अलगअलग शहर से थे और उस जमाने में एसटीडी फोन भी काफी महंगे हुआ करते थे. मानव उस वक्त पढ़ाई कर रहा था और सिया एक प्राइवेट फर्म में जौब कर रही थी. इस अंतर को सिया समझती थी.

मानव का हाथ तंग ही रहता था. इसलिए वह कभी भी मानव पर मिलने आने या फोन करने का दबाव नहीं बनाती थी. बस कभीकभी फोन कर लेती थी सिया. उस की स्त्रीसुलभ लज्जा उसे ज्यादा खुलने से रोक देती थी और मानव को उस के हालात रोक देते थे. किंतु कुछ था जो उन के रिश्ते की डोर को बहुत मजबूती से बंधे हुए था.

मानव और सिया की मुलाकात सिया की एक सहेली के घर हुई थी और दोनों एकदूसरे पर मन ही मन मर मिटे थे. किंतु प्रत्यक्ष में मानव ने सिया से कोई वादा नही किया था, किंतु एक अनकहा अनुबंध था दोनों के बीच. समय अपनी गति से बढ़ रहा था. मानव का चयन प्रशासनिक सेवा में हुआ था. अब शायद दोनों को भविष्य की दिशा तय करनी थी कि आगे का सफर साथसाथ होगा या अलगअलग राहों पर चलना होगा.

पारिवारिक हालात के चलते दोनों एकदूसरे के न हो सके और वक्त ऐसा बदला कि दोनों एकदूसरे के लिए अजनबी हो गए. लेकिन हालात को भी शायद कुछ और ही मंजूर था. एक दिन अचानक सिया को मानव एक मौल में मिल गया. दोनों एकदूसरे को देखते ही पहचान गए. सिया कतरा कर निकलना चाह रही थी किंतु मानव ने उसे आवाज दे कर रोक लिया. अब तो उसे रुकना ही पड़ा. फिर एक मुलाकात का वादा दिन, तारीख के साथ मानव ने तय कर के ही उसे जाने दिया. कुछ था कि सिया भी मना नहीं कर सकी और तय समय पर पूर्वनिर्धारित रैस्टोरैंट में मानव के आने का इंतजार कर रही थी.

तभी सिया को मानव आता दिखाई दिया. वह तेज नजरों से सिया को ही ढूंढ़ रहा था.

मानव एक अधिकारी बन चुका था रुतबा और रोब उस की शख्सियत में चार चांद लगा रहा था. वहीं सिया उसे देख कर सोच रही थी कि कभी यह मानव कितना सीधासादा था, जिस के साथ उस ने अपने आगे के जीवन का सपना देखा था. इतने में मानव की नजरों ने उसे देख लिया और सीधा उस के पास आ गया. दोनों की आंखें मिलीं फिर दोनों ही एकदूसरे से आंख चुराने लगे.

ऐसा लगता था शायद आंखें वह सब एकदूसरे को बता देंगी जो वे एकदूसरे से छिपा रहे हैं. फिर भी कुछ बात तो करनी ही थी. सिया सोच रही थी जिंदगी भी अजीब इम्तिहान लेती है जिस से हर रोज वह इतना कुछ कहना चाहती थी आज वह सामने बैठा है तो शब्द खो चुके हैं, जबान तालू से चिपक गई है, गला सूख रहा है.

खैर, मानव ने कोल्ड ड्रिंक और्डर किया और सिया से पूछा कि कैसी हो सिया? शादी कब की? किस से की? अपने बारे मे भी बताया उस ने कि उस की पत्नी विश्वविद्यालय में प्रवक्ता है, एक बेटा है जो एमबीए कर रहा है. कुल मिला कर सब अच्छा है.

सिया ने भी बताया अपने बारे में कि एक बेटी है जो बीएड कर रही है और बेटा अभी 12वीं कक्षा में है. सब अच्छा है. दोनों की जिंदगी भी ठीक चल रही थी. किंतु एक टीस तो थी ही दोनों के मन में. मानव कुछ ज्यादा ही बेचैन दिख रहा था. उसे शायद अपने फैसले पर अफसोस हो रहा था. काश, उस ने कुछ और प्रयत्न किया होता तो सिया आज उस की होती. मानव को शायद सिया उस वक्त मामूली लड़की लगी थी और सिया तो बस मानव को चोर नजरों से बस देखे जा रही थी.

सिया के मध्यवर्गीय परिवार वाले अंधविश्वासी पंडों के सिखाए संस्कारों ने कभी उसे जो दिल चाहे वह करने की इजाजत नहीं दी. हमेशा उसे मन को मारना ही सिखाया गया था और मन को मारने में वह बहुत महारथ हासिल कर चुकी थी. सो वह मानव को जी भर कर देखने की इच्छा को भी मारने में कोई संकोच नहीं कर रही थी.

कुछ देर बैठने के बाद दोनों ने एकदूसरे से विदा ली. किंतु मानव का मन शायद सिया के पास ही छूट गया था. आज उसी मामूली लड़की की ?ाकी हुई नजरें मानव के मन से उतर ही नहीं रही थीं. वह सिया से मिलने के साथ ही उस पुराने मानव से भी मिल रहा था जो इस चमकदमक की दुनिया की चकाचौंध में मानव की अंदर ही कहीं गुम हो गया था. कभीकभी सिया को फोन करता तो सहज ही प्रश्न होता कि क्या कर रही हो और सिया कहती खाना बना रही हूं या सब्जी काट रही हूं या कोई और घरेलू काम बताती तो मानव को भी उस की मां याद आ जाती जो ऐसे ही घर के काम करते हुए उस के बाबूजी का फोन उठाती थीं. मानव को शायद सिया से दोबारा इश्क हो रहा था क्योंकि मानव के घर में सबकुछ था बस नहीं था तो एक घरेलू माहौल.

जहां पत्नी आई लव यू नहीं बोलती बस चुपचाप पति की पसंद का खाना बना कर मुसकरा देती है और पति को पूर्ण समर्पण का सुख मिल जाता है. पति भी पत्नी के लिए कोई गिफ्ट ला कर अपनी भावना का इजहार हो गया ऐसा सम?ा लेता. इंसान जिस परिवेश में पलाबढ़ा होता है वह उस में ही सुकून महसूस करता है. शायद मानव के साथ भी यही हो रहा था. शुरू में तो मानव अपनी शादी के बाद समझ ही नहीं सका कि वह अंदर से अधूरा क्यों है? आज सिया से मिल तो उसे लगा कि शायद सिया ही उस की जिंदगी का खालीपन भर सकती है और सिया अपने मध्यवर्गीय विश्वासी परिवार में मिले संस्कारों के साथ बड़ी तेजी से अपने जज्बातों को मन में ही मार रही थी.

एक दिन मानव ने सिया से कह ही दिया कि सिया क्या हम अपनी अधूरी चाहत को पूरा कर सकते हैं? शायद इसीलिए हालात ने हमें मिलाया है? सिया इस पर चुप रह गई.

सिया को मानव का बारबार फोन करना, उस का जरूरत से ज्यादा खयाल रखना, 27 सालों में मानव ने उसे कितना खोजा, मानव उस के लिए कितना भटका ये सब मानव ने बताया तो सिया भी मानव की तरफ चुंबक की तरह खिंच गई. आखिर उस के अंधविश्वासी संस्कारों पर प्यार भारी पड़ गया.

वैसे सिया भी कहां भूल सकी थी मानव को. बस मन को मार लिया था और सम?ाता ही जिंदगी का नाम है, ऐसा सोच कर जिंदगी में आगे बढ़ गई थी.

मगर मानव का बारबार उस के साथ की कामना करना, उसे उस का मन खुदबखुद मानव की तरफ धकेल रहा था.

एक दिन मानव ने कहा सिया क्या तुम एक दिन के लिए मुझे वह जिंदगी दे सकती हो जैसी हम हमसफर बन कर हमेशा गुजारना चाहते थे.

सिया कुछ बोल ही नहीं पा रही थी. उसे सम?ा ही नहीं आ रहा था कि वह क्या जवाब दे. उस ने कुछ नहीं कहा बस एक गहरी सांस ले कर रह गई.

मानव सिया के मन की उल?ान सम?ा रहा था. उस ने कहा कि सिया तुम एक दिन मुझे अपने हाथों से बना कर खाना खिला देना. मेरी शर्ट के बटन बंद कर देना. मुझे अपने हाथ की बनी चाय पिला देना. उसे एक बार गले से लगा कर उस के बालों में हाथ फिरा देना. अगर इतना तुम कर दो सिया तो मैं अपनी बाकी की जिंदगी इसी याद के सहारे काट दूंगा. वैसे सिया अगर तुम न भी कहोगी तो भी मुझे कोई दिक्कत नहीं है. मेरे लिए तुम्हारे चंद शब्द ही काफी हैं. मुझ जैसे व्यक्ति के लिए शायद यही कुदरत को मंजूर है.

मानव के दोबारा पूछने पर सिया ने कहा कि मानव मैं एक बार तुम्हें खो चुकी हूं. अब जो दोबारा मिले हो तो शायद हालात से भी हम दोनों का खालीपन देखा नहीं गया शायद इसीलिए उन्होंने हमें मिलाया है. घर, समाज, मांबाप, परिवार के लिए बहुत जी लिया हम ने अब अपनी बची हुई जिंदगी के कुछ पल हमें अपने मुताबिक जी लेनी चाहिए.

आज पहली बार सिया ने अपने मन को मारा नही बल्कि दुलारा. आज उस ने मन की सुनी. अपराधबोध एक बार को सिया को भी अपराधबोध हुआ किंतु फिर उस ने सोचा कि वह ऐसा कुछ नहीं कर रही है जो गलत हो. मानव ने अगर 27 साल तक उसे याद रखा है और वह भी कहां भूली थी मानव को तो इस का मतलब यह मन का रिश्ता है. वही उस का मन मीत है और अपने मन की भी सुननी चाहिए.

और जो सिया ने मन की सुनी तो फिर उस का मुरझाया मन हरा हो गया. तनमन के सुकून ने सिया की सुंदरता में चार चांद लगा दिए. वह नई ऊर्जा से अपने घरपरिवार और अपने और मानव के संबंधों को भी संभाल रही थी. सिया और मानव को इस बात की खुशी थी कि पहली बार जो सफर में वे बिछड़ गए थे और हमसफर न बन सके आज दोबारा जिंदगी ने उन्हें एक मौका दिया है चंद कदमों का हमकदम बनने का.

Famous Hindi Stories : सच्चा प्रेम – क्या हुआ था प्रताप के साथ

Famous Hindi Stories :  कनाट प्लेस की उस दसमंजिली इमारत की नौवीं मंजिल पर अपने औफिस में बैठे प्रताप ने घड़ी पर नजर डाली. रात के आठ बज रहे थे. वैसे तो वह शाम सात, साढ़े सात बजे तक औफिस से निकल जाता था, लेकिन आज नवीन ने आने के लिए कहा था, इसलिए वह औफिस में बैठा उसी का इंतजार कर रहा था.

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नवीन की अभी नईनई शादी हुई थी. उसी के उपलक्ष्य में आज उस ने पीनेपिलाने का इंतजाम किया था.

आखिर साढ़े आठ बजे नवीन आया. उस के साथ अश्विनी और राजन भी थे. नवीन ने नीचे से ही प्रताप को फोन किया, तो वह नीचे आ गया था.

जनवरी का महीना और फिर हलकीफुलकी बूंदाबांदी होने से ठंड एकदम से बढ़ गई थी. शाम होते ही कोहरे ने भी अपना साम्राज्य फैलाना शुरू कर दिया था.

प्रताप के नीचे आते ही नवीन ने कहा, “यार, जल्दी गाड़ी निकाल. ठंड बहुत है…”

प्रताप को भी ठंड लग रही थी. उस ने जैकेट का कौलर खड़ा कर के कान ढकने का प्रयास किया. फिर दोनों हथेलियां रगड़ते हुए पार्किंग की ओर बढ़ गया. उस के गाड़ी लाते ही तीनों जल्दीजल्दी गाड़ी में घुस गए. गाड़ी बिल्डिंग के गेट तक पहुंचती, उस के पहले ही तीनों ने तय कर लिया कि कहां खानापीना होगा.
बिल्डिंग के गेट से गाड़ी सड़क पर आई, तो सड़क पर वाहनों की रेलमपेल थी. धीरेधीरे चलते हुए वे एक शराब की दुकान पर पहुंचे. शराब खरीदने के बाद उन्होंने एक रेस्टोरेंंट से खाना पैक कराया और चल पड़े राजन के घर की ओर.

राजन वहीं करीब ही रहता था. गाड़ी इमारत के नीचे खड़ी कर सभी राजन के फ्लैट में पहुंच गए.

राजन उन दिनों अकेला ही था, इसलिए उस का घर अस्तव्यस्त था. उस ने पानी वगैरह का इंतजाम किया और फिर सभी पीने बैठ गए. दोदो पैग गले से नीचे उतरे, तो सब के मुंह खुलने लगे.

नवीन ने प्रताप के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, “यार प्रताप, तुझे भाभी की याद नहीं आती?”

“मुझे छोड़ कर चली गई. उस की याद करने से क्या फायदा…” प्रताप ने उदास हो कर कहा.

“क्या अब वह वापस नहीं आ सकती?” अश्विनी ने पूछा.

“यदि उसे वापस आना होता, तो जाती ही क्यों?” सिगरेट सुलगाते हुए प्रताप ने कहा.

शराब के साथ इसी तरह की बातों में किसी को समय का भी खयाल नहीं रहा. शराब खत्म हुई, तभी उन्हें खाने का खयाल आया. तब प्रताप ने कहा, “यार जल्दी करो. बहुत देर हो गई.”

“तू तो ऐसे कह रहा है, जैसे घर में बीवी तेरा इंतजार कर रही है.”

“भई बीवी नहीं है तो क्या हुआ, ल्यूसी तो है. वैसे भी दो दिनों से वह ठीक से खाना नहीं खा रही है,” प्रताप ने बाहर की ओर देखते हुए कहा.

फिर जल्दीजल्दी खाना खा कर प्रताप चलने के लिए तैयार हुआ. अश्विनी और नवीन का राजन के यहां ही रुकने का प्रोग्राम था. वे प्रताप को भी रोक रहे थे, लेकिन उसे तो ल्यूसी की चिंता थी.

प्रताप नीचे आया, तो वातावरण में कोहरे की सफेद चादर फैल गई थी. ठंड भी बहुत तेज थी. प्रताप ने पीछे की सीट पर रखे औफिस बैग से टोपी निकाल कर लगाई और घर की ओर चल पड़ा. सड़कें सूनी थीं, फिर भी कोहरे की वजह से वह गाड़ी बहुत तेज नहीं चला पा रहा था. घर पहुंचतेपहुंचते उसे रात के 1 बज गए. नोएडा के सेक्टर 56 में साढ़े तीन सौ गज में बनी उस की कोठी में अंधेरा छाया था. उस ने गेट का ताला खोला, गाड़ी अंदर की. फिर घर का ताला खोल कर अंदर घुसते ही आवाज लगाई, “ल्यूसी… ल्यूसी…”

उस के ये शब्द दीवारों से टकरा कर वापस आ गए.
“ल्यूसी… ल्यूसी… मैं यहां हूं,” कहते हुए प्रताप ड्राइंगरूम से अंदर कमरे की ओर बढ़ा, तो उस ने महसूस किया कि किचन से ‘कूं… कूं…’ की आवाज आ रही है. उस ने किचन में जा कर देखा, तो ल्यूसी उस तेज ठंड में भी पैर फैलाए लेटी थी.

प्रताप ने उसे सहलाते हुए कहा, “तू यहां है?”

ल्यूसी ने गरदन उठा कर अधखुली आंखों से प्रताप की ओर देखा, लेकिन उठी नहीं. ऐसा लग रहा था, जैसे आज उस में उठने की शक्ति नहीं रह गई है. प्रताप उस की बगल में बैठ गया. उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “लगता है, आज तू ने कुछ खाया नहीं है.”

ल्यूसी बिना कुछ बोले गरदन नीची कर आंखें बंद कर ली. प्रताप ने उस की गरदन पर हाथ रख कर कहा, “इस तरह नाराज नहीं होते. चल, मैं तुझे खाना खिलाता हूं.”

ल्यूसी ने कोई हरकत नहीं की. प्रताप ने ध्यान से देखा, तो उसे लगा कि ल्यूसी की सांसें भारी हैं. उस की खुली निश्चल आंखों के खालीपन ने उसे द्रवित कर दिया. उस का नशा गायब हो गया. कपड़े बदलने का इरादा छोड़ कर वह बड़बड़ाया, “लगता है, तुझे डाक्टर के पास ले जाना होगा. मुझे पता है, अब तू कुछ बोलेगी नहीं.”

ल्यूसी ने धीरे से ‘कूं… कूं…’ किया. प्रताप की चिंता दोगुनी हो गई. वह बड़बड़ाया, ‘इसे डाक्टर के पास तो ले ही जाना पड़ेगा.’

डाक्टर उस का परिचित था. ल्यूसी को गाड़ी में ले कर वह डाक्टर के यहां पहुंच गया. ल्यूसी को देखने के बाद डाक्टर ने कहा, “प्रताप, लगता है, इसे न्यूमोनिया हो गया है. इसे यहीं छोड़ दो, हमारा नौकर इस की देखभाल कर लेगा.”

प्रताप ल्यूसी का सिर चूम कर लौट आया. कपड़े उतार कर वह बेड पर लेटा, तो रात के ढाई बज रहे थे. इतनी भागदौड़ के बाद भी उसे नींद नहीं आ रही थी. विरह की वह रात बड़ी लंबी लग रही थी.

वह उठ कर बैठ गया. आज वह एकदम अकेला था. उस की ओर कोई भी देखने वाला नहीं था. उसे कोई प्यार करने वाला भी नहीं था. बिना किसी के जीना भी कोई जीना है. कोई तो चाहने वाला होना ही चाहिए, चाहे वह जानवर ही क्यों न हो. कोई साथ होता है, तो आनंद से जीवन बीतता है. वह लेट गया. ल्यूसी की याद में करवटें बदलता रहा. बेचैन मन में ल्यूसी की याद आती रही. वह सोना चाहता था, पर ल्यूसी की यादें सोने नहीं दे रही थीं. तभी टेलीफोन की घंटी बजी. वह फट से उठ कर बैठ गया. झट से रिसीवर उठा कर कान से इस तरह लगाया, जैसे किसी की आवाज सुनने को उतावला हो.

“प्रताप… प्रताप…” उसे विषादयुक्त स्वर सुनाई दिया.

“जी…” सामने वाले व्यक्ति की आवाज प्रताप को परिचित लगी. लेकिन यह आवाज काफी दिनों बाद उसे सुनाई दी थी.

“इतनी रात को फोन करने के लिए माफ करना?”

“ठीक है,” प्रताप से वह बात करना चाहता है, यह जान कर उसे प्रसन्नता हुई.
“एक बैड न्यूज है.” सामने वाले व्यक्ति ने कहा.

“बैड न्यूज…?” आवाज में आशंका उपजी. हृदय धड़का, “क्या है बैड न्यूज…?”

“तुम्हारी पत्नी…” सामने वाले की आवाज धीमी पड़ गई.

“मेरी पत्नी…?”

“मेरा मतलब है, तुम्हारी एक्स पत्नी अब इस दुनिया में नहीं रही…” कहते हुए सामने वाले व्यक्ति भी आवाज लड़खड़ा गई.
प्रताप चुप रह गया. उस की आंखों के सामने अंतिम बार देखा गया अनुपमा का चेहरा उभर आया. अनुपमा अब इस दुनिया में नहीं रही.

प्रताप के चुप रह जाने पर सामने वाला व्यक्ति बोला, “प्रताप, तुम ठीक तो हो?”

“हां, मैं ठीक हूं, फोन करने के लिए धन्यवाद,” बात को आगे न बढ़ाते हुए प्रताप ने फोन रख दिया. एकांत और अकेलेपन ने उसे फिर घेर लिया. वह क्या मिस कर रहा, किस से कहे. ‘सुन कर उसे बहुत दुख हुआ’, जैसे शब्द भी वह नहीं कह पाया था. उसे इस बात पर आश्चर्य हुआ. इस का मतलब वह बदल गया है. अब अनुपमा के प्रति न उस के मन में प्रेम था, न तिरस्कार. इसलिए वह क्या कहे. इस संसार में आने वाला हर कोई जाता है. उस का अनुपमा से पहले ही संबंध विच्छेद हो चुका था. जीवन का एक खूबसूरत मोड़ दिखा कर वह गायब हो गई थी. अब तो ल्युसी ही उस के जीवन में सबकुछ थी.

प्रताप के दिल से आवाज आई. अनुपमा के लिए अपने हृदय के किसी कोने में थोड़ाबहुत प्रेम खोजना चाहिए. उस की मृत्यु का उसे दुख तो मनाना ही चाहिए. इस के लिए उसे थोड़ा रोना चाहिए. कम से कम आंखें तो नम कर ही लेनी चाहिए. आखिर तीन साल वह उस के साथ रही थी. उस के साथ कुछ रेखाएं तो खींची थीं, भले ही चित्र नहीं बन पाया. लोग दूसरे की मृत्यु पर ही दुखी होते हैं. अनुपमा तो कभी उस की अपनी थी. मृत्यु पर शोक प्रकट करने की जो हमारे यहां परंपरा है, उसे निभाना ही चाहिए. वह इनसान है, इसलिए उस के अंदर इनसानियत तो होनी ही चाहिए. इतने प्रयास के बाद भी अंदर से ऐसा भाव नहीं उपजा कि आंखें नम हो जातीं. वह लाचारी का अनुभव करने लगा. इस बेरुखी का उपाय वह खोजने लगा. अनुपमा के लिए थोड़े आंसू हृदय से निकालने के लिए वह प्रयास करता रहा, पर सफल नहीं हुआ. इसी कशमकश में वह करवट बदलता रहा. ऐसे में ही उस की आंखें लग गईं, तो सुबह फोन की घंटी बजने पर खुलीं. आंखों की पलकें भारी थीं. काफी कोशिश के बाद खुलीं तो देखा धूप निकल आई थी.

जम्हाई लेते हुए प्रताप ने रिसीवर उठा कर कान से लगाते हुए कहा, “हैलो?”

“प्रताप…” सामने वाले ने कहा, “लगता है, फोन की घंटी सुन कर उठे हो.”

“कोई बात नहीं डाक्टर साहब, दरअसल, रात सोने में देर हो गई थी न. अब ल्यूसी की तबीयत कैसी है?” प्रताप ने पूछा.

“प्रताप, ल्युसी तो नहीं रही. काफी प्रयास के बाद भी मैं उसे नहीं बचा सका.”

“हे भगवान…”

“प्रताप… प्रताप…”
लेकिन प्रताप तो खामोश. उस का हृदय जोर से धड़क उठा. उस की देह उस ठंड में भी पसीने से भीग गई. रिसीवर उस के हाथ से छूट गया. उस का सिर जैसे चकरा रहा था. वह वहीं पड़ी कुरसी पर बैठ गया. दोनों हथेलियां उस ने आंखों पर रख लीं. आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली. फिर वह फफक कर रो पड़ा.

#हमारा सवाल, पाठकों का जबाव# क्या प्रताप को विवाह की कोशिश करनी चाहिए या कोई पशु पालना चाहिए. इसका छोटा या लंबा सा जबाव +91 85888 43415 पर व्हाट्सएप से भेजें. अपना और अपने शहर का नाम अवश्य लिखें. अच्छे उत्तर बाद में कहानी के साथ वैब एडीशन में प्रकाशित किए जाएंगे.

Latest Hindi Stories : काला दरिंदा

Latest Hindi Stories :  19 साल की उम्र में वह माहिर ड्राइवर बन गया था. तभी से वह टैक्सी चला रहा था. अब उस की उम्र 35 साल के करीब थी. थोड़ी देर पहले एक ऐक्सप्रैस ट्रेन प्लेटफार्म पर आ कर रुकी थी. कुछ सवारियां गेट से बाहर निकलीं, तो काला मुस्तैदी से खड़ा हो गया. कुछ सवारियों से उस ने टैक्सी के लिए पूछा भी था लेकिन सवारियों ने मना कर दिया.

कुछ सवारियों को टैक्सी की जरूरत नहीं थी और जिन्हें जरूरत थी, वे अपने परिवार के साथ थे. उन्होंने शक्ल देखते ही काला को मना कर दिया था, क्योंकि शराब के नशे में डूबा काला शक्ल से ही बदमाश लगता था.

काला ने कलाई में बंधी घड़ी की तरफ देखा. रात के 10 बज रहे थे. समता ऐक्सप्रैस ट्रेन के आने का समय हो गया था. शायद उसे कोई सवारी मिल जाए, यह सोच कर काला ने बीड़ी सुलगा ली.

काला का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था. 3 भाइयों में वह अकेला जिंदा बचा था. उस ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था. उस की मां तो उसे स्कूल भेजना चाहती थी, पर उस का बाप उसे स्कूल भेजने के सख्त खिलाफ था.

काला की उम्र जब 10 साल की थी, तभी उस की मां मर गई थी और उस के बाप ने उसे एक लुहार के यहां काम पर लगा दिया था. सारा दिन भट्ठी के आगे बैठ कर वह लोहे का पंखा चलाता था. महीने में उसे मेहनत के जो पैसे मिलते थे, उन पैसों को उस का बाप शराब में उड़ा देता था.

7 साल तक काला ने लुहार की दुकान पर काम किया था. तभी उस के शराबी बाप की मौत हो गई थी. बाप के मरने का उसे जरा भी दुख नहीं हुआ था, क्योंकि अब वह पूरी तरह आजाद हो गया था.

कुछ गलत लड़कों के साथ काला का उठनाबैठना हो गया था. 20 साल का होतेहोते वह पक्का शराबीजुआरी बन चुका था. एक करीबी रिश्तेदार को उस पर दया आ गई थी. उसी ने भागदौड़ कर के उस की शादी करा दी थी. उस की औरत ज्यादा खूबसूरत तो नहीं थी, पर उस से कई गुना अच्छी थी.

काला ने हमेशा से ही अपनी बीवी को इस्तेमाल की चीज समझा था. अब वह 4 बच्चों का बाप बन चुका था. फिर भी बच्चों के लिए एक बाप की क्या जिम्मेदारियां होती हैं, इस का उसे पता नहीं था.

काला जितना शौकीन था, उस से कहीं ज्यादा मेहनती भी था. वह सुबह 7 बजे टैक्सी ले कर घर से निकल जाता था और रात 12 बजे के बाद ही लौटता था.

वह 300 से 500 रुपए तक रोजाना कमा लेता था. इतना कमाने के बाद भी उस के घर की माली हालत ठीक नहीं थी, क्योंकि उसे शराब पीने के अलावा कोठे पर जाने का भी शौक था.

रात 11 बजे समता ऐक्सप्रैस ट्रेन प्लेटफार्म पर आई. ट्रेन पूरे एक घंटा लेट थी. सवारियां जल्दीजल्दी स्टेशन के गेट से बाहर निकल रही थीं. काला सवारियों पर नजरें दौड़ाने लगा. अचानक उस की नजर एक लड़की पर पड़ी तो उस की आंखों में एक अजीब सी चमक उभर आई.

काला तेजी से उस लड़की की तरफ लपका और उस से पूछा, ‘‘मैडम क्या आप को टैक्सी चाहिए?’’

‘‘हां चाहिए,’’ लड़की ने उस की तरफ बिना देखे ही जवाब दिया.

‘‘कहां जाना है आप को?’’

‘‘विजय नगर,’’ लड़की ने बताया.

‘‘चलिए,’’ कह कर काला ने लड़की के हाथ से बैग ले लिया.

कुछ ही दूर टैक्सी स्टैंड पर काला की टैक्सी खड़ी थी.

काला ने डिक्की खोल कर बैग उस में रखा और फिर अपनी सीट पर जा कर बैठ गया. तब तक लड़की पिछली सीट पर बैठ चुकी थी.

उस लड़की की उम्र 22-23 साल के आसपास थी. वह बेहद खूबसूरत थी. पहनावे से वह अमीर और हाई सोसायटी की लग रही थी. वह शायद किसी सोच में गुम थी, तभी तो उस ने काला के ऊपर ध्यान नहीं दिया था, वरना काला का चेहरा और शराब के नशे में डूबी उस की आंखें देख कर वह उस की टैक्सी में कभी न बैठती.

लड़की पिछली सीट पर अधलेटी सी आंखें बंद किए हुए थी. काला सामने लगे शीशे में से उसे बारबार देख रहा था.

रेलवे स्टेशन से विजय नगर का रास्ता महज आधे घंटे का था. काला धीमी रफ्तार से टैक्सी चला रहा था. उस लड़की ने काला के अंदर उथलपुथल मचा रखी थी.

काला का ध्यान टैक्सी चलाने में कम, उस लड़की पर ज्यादा था. वह जितना उस लड़की को देख रहा था, उस पर उतना ही एक नशा सा छा रहा था.

काला एक नंबर का आवारा था. जवान लड़कियों को देख कर उस के खून में गरमी पैदा हो जाती थी.

एक बार स्कूटर पर जा रही एक लड़की को घूरते हुए वह अपने होश खो बैठा था. नतीजतन, उस की टैक्सी एक बस के पिछले हिस्से से जा टकराई थी. इत्तिफाक से वह बच गया था, मगर टैक्सी को काफी नुकसान पहुंचा था. लेकिन इस के बाद भी वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया था.

काला का दिमाग और ध्यान कार में बैठी लड़की पर ही लगा था. अचानक

5 महीने पहले की एक घटना याद कर उस के अंदर धीरेधीरे वासना का शैतान जागने लगा.

हुआ यों था कि उस रात वह कुछ सवारियों को रेलवे स्टेशन छोड़ने आया था. रात के तकरीबन साढ़े 11 बज रहे थे. शायद कोई सवारी मिल जाए, इस उम्मीद के साथ वह सवारी मिलने का इंतजार करने लगा था.

कुछ ही देर में उसे एक सवारी मिल गई थी. वह एक लड़की थी और उसे अशोक नगर जाना था. उसे टैक्सी की जरूरत थी. उस ने कई टैक्सी वालों से बात की थी. रेलवे स्टेशन से अशोक नगर काफी दूर था, तकरीबन एक घंटे का रास्ता था.

ज्यादातर टैक्सी वालों ने रात को इतनी दूर जाने से मना कर दिया था. कुछ टैक्सी वाले वहां जाने के लिए तैयार हुए भी, मगर उन्होंने किराया बहुत ज्यादा मांगा.

आखिर में लड़की का सौदा काला से पट गया था. वह लड़की कम उम्र की व खूबसूरत थी. सफर में बोरियत से बचने के लिए लड़की टाइमपास करने की नीयत से काला को ‘अंकल’ पुकार कर बातें करने लगी थी.

काला उस के सवालों के जवाब देने के साथसाथ खुद भी उस के बारे में पूछताछ करने लगा था.

उस लड़की का नाम श्वेता था. वह एक अमीर घर की लड़की थी. श्वेता अपने घर से दूर एक शहर में पढ़ती थी. वहां वह होस्टल में रहती थी. कुछ दिनों की छुट्टियों में वह अपने घर चली आई थी. श्वेता ने अपने आने की खबर घर वालों को नहीं दी थी. अगर वह फोन कर देती, तो उसे स्टेशन पर लेने घर से कार आ जाती.

श्वेता ने जानबूझ नहीं बताया था, क्योंकि अगले दिन उस का जन्मदिन था और वह अचानक अपने घर पहुंच कर घर वालों को चौंका देना चाहती थी.

श्वेता अब तक अपने घर पहुंच भी चुकी होती, अगर ट्रेन 2 घंटे लेट नहीं हुई होती. रात का समय था. जाड़े का मौसम होने की वजह से सड़क पर दूरदूर तक सन्नाटा था.

श्वेता से बात करते हुए काला टैक्सी चला जरूर रहा था, मगर उस का मन कहीं और भटक रहा था. उस के साथ गोरी रंग की जवान और हसीन लड़की थी, जिस के जिस्म से भीनीभीनी मदहोश कर देने वाली खुशबू आ रही थी.

काला पर एक अजीब सा नशा हावी होता जा रहा था. काला ने एक बेहद घटिया और भयानक फैसला कर लिया.

उस रात काला ड्राइवर से दरिंदा बन गया था. उस ने टैक्सी एक सुनसान जगह पर रोक दी थी. इस से पहले कि श्वेता कुछ समझ पाती, काला कार के अंदर ही उस पर टूट पड़ा था. श्वेता तो जैसे एकदम से हैरान ही रह गई थी. उसे काला से ऐसी उम्मीद हरगिज नहीं थी.

श्वेता रोते हुए काला से छोड़ देने के लिए गिड़गिड़ाने लगी थी, पर उस के रोनेगिड़गिड़ाने का असर काला पर नहीं हुआ था. फिर श्वेता रोनागिड़गिड़ाना छोड़ काला का विरोध करने लगी थी.

अचानक काला ने सीट के नीचे रखा चाकू निकाल लिया और बोला था, ‘सुन लड़की, अगर ज्यादा फड़फड़ाएगी तो इसी चाकू से तेरी गरदन काट डालूंगा. इस सुनसान जगह पर कोई तुझे बचाने नहीं आएगा. जान प्यारी है तो जैसा मैं कहता हूं वैसा ही कर.’

श्वेता पर इस धमकी का असर फौरन हुआ था. वह मासूम लड़की मौत के डर से बुत सी बन गई थी.

अपनी इच्छा पूरी करने के बाद काला बेहोशी की हालत में श्वेता और उस के सामान को सड़क के किनारे छोड़ कर रफूचक्कर हो गया था.

आज बहुत दिनों बाद काला को सुनहरा मौका मिला था, जिसे वह हाथ से नहीं जाने देना चाहता था. उस लड़की को अपना शिकार बनाने से पहले काला उस के और उस के घरपरिवार के बारे में जानना चाहता था.

काला ने अपनी तरफ से बातचीत की शुरुआत की, पर लड़की ने उस के किसी भी सवाल का जवाब ‘हां’ या ‘न’ से ज्यादा शब्दों में नहीं दिया.

पहले वाली लड़की श्वेता हंसमुख, चंचल और मिलनसार थी, जबकि यह उस के बिलकुल उलट, गंभीर, मगरूर और नकचढ़ी थी.

काफी सोचनेसमझने के बाद काला ने फैसला किया कि लड़की का संबंध चाहे किसी भी घर से हो, वह उस के साथ मनमानी जरूर करेगा, बाद में चाहे जो कुछ भी होता रहे.

सड़क पर सन्नाटा था. काला मन ही मन लड़की की इज्जत से खेलने का तानाबाना बुनने लगा था. विजय नगर से एक किलोमीटर पहले एक दूसरे शहर को सड़क जाती थी. वह सड़क ज्यादातर सुनसान रहती थी. काला ने टैक्सी उसी सड़क पर मोड़ दी थी.

कार में बैठी लड़की को अपने रास्ते का पता था, इसलिए उस ने फौरन काला से गलत रास्ता होने की बात की, पर काला ने उस की बात अनसुनी कर दी.

खतरा महसूस कर के लड़की विरोध करने लगी, तो काला ने एक जगह टैक्सी रोक दी और सीट के नीचे से चाकू निकाल कर दहाड़ा, ‘‘सुन लड़की, अगर जरा सी भी आनाकानी की तो पेट फाड़ दूंगा.’’

काला की भयानक आंखों में वासना के लाललाल डोरे तैर रहे थे. लड़की को धमकी दे कर काला उस पर टूट पड़ा.

अगले दिन जब काला को होश आया तो अपनेआप को अस्पताल में देख कर वह चौंक पड़ा. दर्द से उस का पूरा बदन दुख रहा था. कल रात के सीन उस के जेहन में घूमे तो उस का पूरा जिस्म कांप उठा. वह 2 बार दरिंदा बना था, एक बार उस दिन जिस दिन उस ने मासूम श्वेता की इज्जत लूटी थी और दूसरी बार कल रात.

कल रात वह दरिंदा बना जरूर था, लेकिन कामयाब नहीं हो सका था, क्योंकि कल रात वाली लड़की पहले वाली लड़की की तरह कमजोर नहीं थी. वह लड़की मुक्केबाजी और कराटे में माहिर थी. उस लड़की ने काला को बहुत पीटा था.

लड़की ने एक जोरदार लात काला की दोनों टांगों के बीच मारी थी. इस

के बाद उसे कुछ होश नहीं था. वह अस्पताल कैसे पहुंचा? कब पहुंचा और किस ने पहुंचाया? इस का उसे कुछ पता नहीं था.

काला ने डाक्टरों से जब यह खबर सुनी तो मानो उस की जान ही निकल गई. डाक्टरों ने उसे बताया कि उन्होंने उस की जान तो बचा ली, मगर अब वह कभी दरिंदा नहीं बन सकता था, क्योंकि टांगों के बीच चोट लग जाने से वह हमेशा के लिए नामर्द बन चुका था.

Hindi Kahani : मन का घोड़ा

Hindi Kahani : ‘‘अंकुरकी शादी के बाद कौन सा कमरा उन्हें दिया जाए, सभी कमरे मेहमानों से भरे हैं. बस एक कमरा ऊपर वाला खाली है,’’ अपने बड़े बेटे अरुण से चाय पीते हुए सविता बोलीं.

‘‘अरे मां, इस में इतना क्या सोचना? हमारे वाला कमरा न्यूलीवैड के लिए अच्छा रहेगा. हम ऊपर वाले कमरे में शिफ्ट हो जाएंगे,’’ अरुण तुरंत बोला.

यह सुन पास बैठी माला मन ही मन बुदबुदा उठी कि आज तक जो कमरा हमारा था, वह अब श्वेता और अंकुर का हो जाएगा. हद हो गई, अरुण ने मेरी इच्छा जानने की भी जरूरत नहीं समझा और कह दिया कि न्यूलीवैड के लिए यह अच्छा रहेगा. तो क्या 15 दिन पूर्व की हमारी शादी अब पुरानी हो गई?

तभी ताईजी ने अपनी सलाह देते हुए कहा, ‘‘अरुण, तुम अपना कमरा क्यों छोड़ते हो? ऊपर वाला कमरा अच्छाभला है. उसे लड़कियां सजासंवार देंगी. और हां, अपनी दुलहन से भी तो पूछ लो. क्या वह अपना सुहागकक्ष छोड़ने को तैयार है?’’ और फिर हलके से मुसकरा दीं.

पर अरुण ने तो त्याग की मूर्ति बन झट से कह डाला, ‘‘अरे, इस में पूछने वाली क्या बात है? ये नए दूल्हादुलहन होंगे और हम 15 दिन पुराने हो गए हैं.’’

ये शब्द माला को उदास कर गए पर गहमागहमी में किसी का उस की ओर ध्यान न गया. ससुराल की रीति अनुसार घर की बड़ी महिलाएं और नई बहू माला बरात में नहीं गए थे. अत: बरात की वापसी पर दुलहन को देखने की बेसब्री हो रही थी. गहनों से लदी छमछम करती श्वेता ने अंकुर के संग जैसे ही घर में प्रवेश किया वैसे ही कई स्वर उभर उठे, वाह, कितनी सुंदर जोड़ी है.

‘‘कैसी दूध सी उजली बहू है, अंकुर की यही तो इच्छा थी कि लड़की चांद सी उजली हो,’’ बूआ सास दूल्हादुलहन पर रुपए वारते हुए बोलीं.

माला चुपचाप एक तरफ खड़ी देखसुन रही थी. तभी सविताजी ने माला को नेग वाली थाली लाने को कहा और इसी बीच कंगन खुलाई की रस्म की तैयारी होने लगी. महिलाओं की हंसीठिठोली और ठहाके गूंज रहे थे पर माला अपनी कंगन खुलाई की यादों में खो गई…

फूल और पानी भरी परात से जब माला ने 3 बार अंगूठी ढूंढ़ निकाली तब सभी ने एलान कर डाला, ‘‘भई, अब तो माला ही राज करेगी और अरुण इस का दीवाना बना घूमेगा.’’

पर माला तो अरुण का चेहरा देखने को भी तरसती रही. भाई की शादी की व्यस्तता व मेहमानों, दोस्तों की गहमागहमी में माला का ध्यान ही नहीं आया. माला के कुंआरे सपने साकार होने को तड़पते और मन में उदासी भर देते, फिर भी माला सब के सामने मुसकराती बैठी रहती.

शाम 4 बजे रीता ने आवाज लगाई, ‘‘जिसे भी चाय पीनी हो वह जल्दी से यहां आ जाए. मैं दोबारा चाय नहीं बनाऊंगी.’’

‘‘ला, मुझे 1 कप चाय पकड़ा दे. फिर बाहर काम से जाना है,’’ अरुण ने भीतर आते हुए कहा.

‘‘ठहरो भाई, पहले एक बात बताओ. वह आप के हस्तविज्ञान व दावे का क्या रहा जब आप ने कहा था कि मेरी दुलहन एकदम गोरीचिट्टी होगी. यह बात तो अंकुर भाई पर फिट हो गई,’’ कह रीता जोरजोर से हंसने लगी.

‘‘अच्छा, एक बात बता, मन का लड्डू खाने में कोई बंदिश है क्या?’’ अरुण ने हंसते हुए कहा.

तभी ताई सास ने अपनी बेटी रीता को डपट दिया, ‘‘यह क्या बेहूदगी है? नईनवेली बहुएं हैं, सोचसम?ा कर बोलना चाहिए… और अरुण तेरी भी मति मारी गई है क्या, जो बेकार की बातों में समय बरबाद कर रहा है?’’

शादी के बाद अंकुर और श्वेता हनीमून पर ऊटी चले गए ताकि अधिकतम समय एकदूसरे के साथ व्यतीत कर सकें, क्योंकि 20 दिनों के बाद ही अंकुर को लंदन लौटना था. श्वेता तो पासपोर्ट और वीजा लगने के बाद ही जा पाएगी. हनीमून पर जाने का प्रबंध अरुण ने ही किया था. ये सब बातें माला को पिछले दिन रीता ने बताई थीं. घर के सभी लोग अरुण की प्रशंसा के पुल बांध रहे थे पर माला के मन में कांटा सा गड़ गया. मन में अरुण के प्रति क्रोध की ज्वाला उठने लगी.

‘हमारा हनीमून कहां गया? अपने लिए इन्होंने क्यों कुछ नहीं सोचा? क्यों? रोऊं, लडं़ू… क्या करूं?’ ये सवाल, जिन्हें संकोचवश अरुण से स्पष्ट नहीं कर पा रही थी, उस के मन को लहूलुहान कर रहे थे.

समय का पहिया अंकुर को लंदन ले गया. ऐसे में श्वेता अकेलापन अनुभव न करे, इसलिए घर का हर सदस्य उस का ध्यान रखने लगा था. भानजी गीता तो उसे हर समय घेरे रहती. माला तो जैसे कहीं पीछे ही छूटती जा रही थी. तभी तो माला शाम के धुंधलके में अकेली छत पर खड़ी स्वयं से बतिया रही थी कि मानती हूं कि श्वेता को अंकुर की याद सताती होगी. पर सारा परिवार उसी से चिपका रहे, यह तो कोई बात न हुई. मैं भी तो 2 माह से यहीं रह रही हूं और अरुण भी तो दिल्ली से सप्ताह के अंत में 1 दिन के लिए आते हैं. मु?ा से हमदर्दी क्यों नहीं?

तभी किसी के आने की आहट से उस की विचारधारा भंग हो गई.

‘‘माला, तुम यहां अकेली क्यों खड़ी हो? चलो, नीचे मां तुम्हें बुला रही हैं. और हां कल सुबह की ट्रेन से दिल्ली निकल जाऊंगा. तुम श्वेता का ध्यान रखना कि वह उदास न हो. वैसे तो सभी ध्यान रखते हैं पर तुम्हारा ध्यान रखना और अच्छा रहेगा…’’

अरुण आगे कुछ और कहता उस से पहले ही माला गुस्से से चिल्ला पड़ी, ‘‘उफ, सब के लिए आप के मन में कोमल भावनाएं हैं पर मेरे लिए नहीं. क्या मैं इतनी बड़ी हो गई हूं कि

मैं सब का ध्यान रखूं और खुद को भूल जाऊं? मेरी इच्छाएं, मेरी कल्पनाएं, मेरा हनीमून उस का क्या?’’

अरुण हैरान सा माला को देखता रह गया, ‘‘आज तुम्हें यह क्या हो गया है माला? तुम श्वेता से अपनी तुलना कर रही हो क्या? उस के नाम से तुम इतना अपसैट क्यों हो गईं?’’

‘‘नहीं, मैं किसी से तुलना क्यों करूंगी? मु?ो अपना स्थान चाहिए आप के दिल में… परसों कौशल्या बाई बता रही थी कि अरुण भैया तो ब्याह के लिए तैयार ही नहीं थे. वह तो मांजी

3 सालों से पीछे लगी थीं तब उन्होंने हामी भरी थी. तो क्या आप के साथ शादी की जबरदस्ती हुई है? और उस दिन रीता ने जो हस्तविज्ञान वाली बात कही थी, इस से लगता है कि आप की चाहत शायद कोई और थी पर…’’ माला ने बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘उफ, तुम औरतों का दिमागी घोड़ा बिना लगाम के दौड़ता है. तुम इन छोटीछोटी व्यर्थ की बातों का बतंगड़ बनाना छोड़ो और मन शांत करो. अब नीचे चलो. सब खाने पर इंतजार कर रहे हैं.’’

वह दिन भी आ गया जब माला अरुण के साथ दिल्ली आ गई. यहां अपना घर सजातेसंवारते उस के सपने भी संवर रहे थे. अरुण के औफिस से लौटने से पहले वह स्वयं को आकर्षक बनाने के साथ ही कुछ न कुछ नया पकवान, चाय आदि बनाती. फिर दोनों की गप्पों व कुछ टीवी सीरियल देखतेदेखते रात गहरा जाती तो दोनों एकदूसरे के आगोश में समा जाते.

हां, एक बार छुट्टी के दिन माला ने दिल्ली दर्शन की इच्छा भी व्यक्त की थी तो, ‘‘ये रोमानी घडि़यां साथ बिताने के लिए हैं, हमारा हनीमून पीरियड है यह. फिर दिल्ली तो घूमना होता ही रहेगा जानेमन,’’ अरुण का यह जवाब गुदगुदा गया था.

शनिवार की छुट्टी में अरुण अलसाया सा लेटा था कि तभी मोबाइल बज उठा. अरुण फोन उठा कर बोला, ‘‘हैलो… अच्छा ठीक है, मैं कल स्टेशन पहुंच जाऊंगा. ओ.के. बाय.’’

‘‘किस का फोन था?’’ चाय की ट्रे ले कर आती माला ने पूछा.

‘‘श्वेता का. वह कल आ रही है. उसे मैं रिसीव करने जाऊंगा,’’ कह अरुण ने चाय का कप उठा लिया.

श्वेता के आने की खबर से माला का उदास चेहरा अरुण से छिपा न रह सका, ‘‘क्या हुआ? अचानक तुम गुमसुम सी क्यों हो गईं?’’ अरुण ने उस की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘अभी दिन ही कितने हुए हैं हमें साथ समय बिताते कि…’’

‘‘अरे यार, उस के आने से रौनक हो जाएगी, कितना हंसतीबोलती है. तुम्हारा भी पूरा दिन मन लगा रहेगा. सारा दिन अकेले बोर होती हो,’’ माला की बात बीच में ही काटते हुए अरुण ने कहा.

माला चुपचाप चाय की ट्रे उठा कर रसोई की ओर बढ़ गई.

‘फिर वही श्वेता. क्या वह अपने मायके या ससुराल में नहीं रह सकती थी कुछ महीने? फिर चली आ रही है दालभात में मूसलचंद. ‘खैर, मुसकराहट तो ओढ़नी ही होगी वरना अरुण न जाने क्या सोचने लगें.’ मन ही मन सोच माला नाश्ते की तैयारी करने लगी.

छुट्टी के दिन अरुण श्वेता और माला को एक मौल में ले गया. वहां की चहलपहल और भीड़ का कोई छोर ही न था. श्वेता की खुशी देखते ही बन रही थी, ‘‘भाभी, आप तो बस जब मन आए यहीं चली आया करो. यहां शौपिंग का मजा ही कुछ और है,’’ माला की ओर देख उस ने कहा.

‘‘मुझे तो अरुण, पहले कभी यहां लाए ही नहीं. यह सब तो तुम्हारे कारण हो रहा है,’’ माला उदासी भरे स्वर से बोली.

‘‘अच्छा,’’ श्वेता का स्वर उत्साहित हो उठा.

वहीं मौल में खाना खाते हुए श्वेता की आंखें चमक रही थीं. बोली, ‘‘वाह, खाना कितना स्वादिष्ठ है.’’

इस पर अरुण ने हंस कर कहा, ‘‘मु?ो मालूम था कि श्वेता तुम ऐंजौय करोगी. तभी तो यहां लंच लेने की सोची.’’

‘‘और मैं?’’ माला ने अरुण से पूछ ही लिया.

‘‘अरे, तुम तो मेरी अर्द्धांगिनी हो, जो मुझे पसंद वही तुम्हें भी पसंद आता है, अब तक मैं यह तो जान ही गया हूं. इसलिए तुम्हें भी यहां आना तो अच्छा ही लगा होगा.’’

बुधवार की सुबह अखबार थामे श्वेता बोली, ‘‘बिग बाजार में 50% की बचत पर सेल लगी है. भैया, मुझे क्व5,000 दे देंगे? क्व2000 तो हैं मेरे पास. मैं और भाभी ड्रैसेज लाएंगी. ठीक है न भाभी? लंदन में यही ड्रैसेज काम आ जाएंगी.’’

‘‘हांहां, क्रैडिट कार्ड ले लेगी माला… दोनों शौपिंग कर लेना.’’

माला अरुण को मुंह बाए खड़ी देखती रह गई कि क्या ये वही अरुण हैं, जिन्होंने कहा था कि पहले शादी में मिली ड्रैसेज को यूज करो, फिर नई खरीदना. तो क्या श्वेता को ड्रैसेज का ढेर नहीं मिला है शादी में? ये छोटीबड़ी बातें माला का मन कड़वाहट से भरती जा रही थीं.

उस दिन तो माला का मन जोर से चिल्लाना चाहा था जब श्वेता बिस्तर में सुबह 9 बजे तक चैन की नींद ले रही थी और वह रसोई में लगी हुई थी. तभी अरुण ने श्वेता को चाय दे कर जगाने को कह दिया. वह जानती थी कि अरुण को देर तक बिस्तर में पड़े रहना पसंद नहीं. फिर श्वेता से कुछ भी क्यों नहीं कहा जाता? मन में उठता विचारों का ज्वार, सुहागरात की ओर बहा ले गया कि मु?ो तो प्रथम मिलन की रात्रि में प्यार के पलों से पहले संस्कार, परिवार के नियमों आदि का पाठ पढ़ाया था अरुण ने… फिर तभी चाय उफनने की आवाज उसे वर्तमान में ले आई.

मैं आज और अभी अरुण से पूछ कर ही रहूंगी, सोच माला बाथरूम में शेव करते अरुण के पास जा खड़ी हुई.

‘‘क्या बात है? कोई काम है क्या?’’ शेविंग रोक अरुण ने पूछा.

‘‘क्या मैं जबरदस्ती आप के गले मढ़ी गई हूं? क्या मुझ में कोई अच्छाई नहीं है?’’

अरुण हाथ में शेविंगब्रश लिए हैरान सा खड़ा रहा.

पर माला बोलती रही, ‘‘हर समय बस श्वेताश्वेता. मु?ा से तो परंपरा निभाने की बात करते रहे और इस का बिंदासपन अच्छा लगता है. आखिर क्यों?’’ माला का चेहरा लाल होने के साथसाथ आंसुओं से भी भीग चला था.

‘‘तुम्हारा तो दिमाग खराब हो गया है. तुम्हारे मन में इतनी जलन, ईर्ष्या कहां से आ गई? श्वेता के नाम से चिढ़ क्यों हो रही है? देवरानी तो छोटी बहन जैसी होती है और तुम तो न जाने…’’

‘‘बस फिर शुरू हो गया मेरे लिए आप का प्रवचन. उस की हर बात गुणों से भरी होती है और मेरी बुराई से,’’ कह पांव पटकती माला अपने कमरे में चली गई.

अरुण बिना नाश्ता किए व लंच टिफिन लिए औफिस चला गया.

उस दिन माला को माइग्रेन का अटैक पड़ गया. सिरदर्द धीरेधीरे बढ़ता उस की सहनशक्ति से बाहर हो गया. उलटियों के साथसाथ चक्कर भी आ रहा था. श्वेता ने मैडिकल किट छान मारी पर दर्द की कोई गोली नहीं मिली. उस ने अरुण को फोन किया तो सैक्रेटरी ने बताया कि वे मीटिंग में व्यस्त हैं.

इधर माला अपना सिर पकड़ रोए जा रही थी. तभी श्वेता 10 मिनट के अंदर औटो द्वारा मैडिकल स्टोर से दर्द की दवा ले आई और कुछ मानमनुहार तथा कुछ जबरदस्ती से माला को दवा खिलाई. माथे पर बाम मल कर धीरेधीरे सिरमाथे को तब तक दबाती रही जब तक माला को नींद नहीं आ गई.

करीब 2 घंटे बाद माला की आंखें खुलीं. तबीयत में काफी सुधार था. सिर हलका लग रहा था. उस ने उठ कर इधरउधर नजर दौड़ाई तो

देखा श्वेता 2 कप चाय व स्नैक्स ले कर आ रही है.

‘‘अरे भाभी, आप उठो नहीं… यह लो चाय और कुछ खा लो. शाम के खाने की चिंता मत करना, मैं बना लूंगी. हां, आप जैसा तो नहीं बना पाऊंगी पर ठीकठाक बना लूंगी,’’ कह उस ने चाय का प्याला माला को थमा दिया.

माला श्वेता के इस व्यवहार को देख उसे ठगी सी देखती रह गई.

‘‘क्या हुआ भाभी?’’

‘‘मुझे माफ कर दो श्वेता, मैं ने तो न मालूम क्याक्या सोच लिया था… तुम्हें प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रही थी. और…’’

‘‘नहींनहीं भाभी, और कुछ मत कहिए आप, अब मैं आप से कुछ भी नहीं छिपाऊंगी. सच में ही मु?ो अपने रंगरूप पर अभिमान रहा है. मु?ा में उतना धैर्य नहीं जितना आप में है. इसीलिए मैं आप को चिढ़ाने के लिए अपने में व्यस्त रही… आप की कोई मदद नहीं करती थी. भाभी, आप मुझे माफ कर दीजिए. आज से हम रिश्ते में भले ही देवरानीजेठानी हैं पर रहेंगी छोटीबड़ी बहनों की तरह,’’ और फिर दोनों एकदूसरे के गले से लग गईं.

‘‘सच श्वेता. मैं आज से अपने मन को गलत दिशा की तरफ भटकने से रोकूंगी और तुम्हारे भैया से माफी भी मांगूंगी.’’

अब श्वेता व माला एकदूसरे को देख कर मुसकरा रही थीं.

Hindi Moral Tales : बाटी चोखा – क्या हुआ था छबीली के साथ

Hindi Moral Tales :  ‘‘बिहार से हम मजदूरों को मुंबई तुम ले कर आए थे… अब हम अपनी समस्या तुम से न कहें तो भला किस से कहने जाएं?’’ छबीली ने कल्लू ठेकेदार से मदद मांगते हुए कहा.

कल्लू ठेकेदार ने बुरा सा मुंह बनाया और बोला, ‘‘माना कि मैं तुम सब को बिहार से यहां मजदूरी करने के लिए लाया था, पर अब अगर तुम्हारा पति मजदूरी करते समय अपना पैर तुड़ा बैठा तो इस में मेरा तो कोई कुसूर नहीं है.

‘‘हां… 2-4 सौ रुपए की जरूरत हो, तो मैं अभी दे देता हूं.’’

छबीली ने कल्लू के आगे हाथ जोड़ लिए और बोली, ‘‘2-4 सौ से तो कुछ न होगा… बल्कि हमें तो अपनी जीविका चलाने और धंधा जमाने के लिए कम से कम 20 हजार रुपए की जरूरत होगी.’’

‘‘20 हजार… रुपए… मान ले कि मैं ने तुझे 20 हजार रुपए दे भी दिए, तो तू वापस कहां से करेगी… ऐसा क्या है तेरे पास?’’ कल्लू ने छबीली के सीने को घूरते हुए कहा, जिस पर छबीली ने उस की एकएक पाई धीरेधीरे लौटा देने का वादा किया, पर कल्लू की नजर तो छबीली की कसी हुई जवानी पर थी, इसलिए वह उसे परेशान कर रहा था.

‘‘इस दुनिया में, इस हाथ दे… उस हाथ ले का नियम चलता है छबीली,’’ कल्लू ने अपनी आंखों को सिकोड़ते  हुए कहा.

छबीली अब तक कल्लू की नीयत को अच्छी तरह भांपने लगी थी, फिर भी वह चुपचाप खड़ी रही.

‘‘देख छबीली, मैं तुझे 20 हजार रुपए दे तो दूंगा, पर उस के बदले तुझे अपनी जवानी को मेरे नाम करना होगा. जब तक तू पूरा पैसा मुझे लौटा नहीं देगी, तब तक तेरी हर रात पर मेरा हक होगा,’’ कल्लू ठेकेदार छबीली की हर रात का सौदा करना चाह रहा था.

छबीली को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, पर वह पैर के अंगूठे से जमीन की मिट्टी को कुरेदने लगी थी.

वैसे भी छबीली का मर्द जोखू लंगड़ा हो चुका था और मजदूरी के लायक नहीं था. मुंबई जैसे शहर में उन्हें पेट भरने के लिए कुछ धंधा जमाना था, जिस के लिए एकमुश्त रकम चाहिए थी, जो सिर्फ कल्लू ठेकेदार ही दे सकता था.

छबीली ने अपने बिहार के गांव में सुन रखा था कि बड़ीबड़ी हीरोइनें भी फिल्मों में काम पाने के लिए लोगों के साथ सोने में नहीं हिचकती हैं और वह तो एक मामूली मजदूर की बीवी है… मजबूरी इनसान से क्याक्या नहीं कराती… और फिर अपनी इज्जत के सौदे वाली बात वह अपने मरद को थोड़े ही बताएगी.

काफी देर तक सोचविचार के बाद छबीली ने 20 हजार रुपए के बदले अपनी हर रात कल्लू ठेकेदार के नाम करने का फैसला कर लिया.

बिहार से लाए गए सारे मजदूर अपने परिवार के साथ एक बिल्डिंग में काम करते थे और उसी बिल्डिंग के एक कोने में इन सभी मजदूरों ने अपने रहने की जगह बना रखी थीं.

छबीली उसी बिल्डिंग के तीसरे फ्लोर पर बने एक कमरे में चली गई

रात में अपने मरद को खिलापिला कर सुलाने के बाद छबीली उसी बिल्डिंग के तीसरे फ्लोर पर बने एक कमरे में चली गई, जहां ठेकेदार रहता था. रातभर कल्लू ठेकेदार ने छबीली के शरीर को ऐसे नोचा, जैसे कोई भूखा भेडि़या मांस के टुकड़े को नोचता है.

सुबह छबीली का पोरपोर दुख रहा था, पर उस के हाथ में 20 हजार रुपए आ चुके थे, जिन से वह अपने लंगड़े आदमी के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ कर सकेगी.

अपने पति को बिना कुछ बताए ही छबीली ने उन पैसों से एक छोटा सा ठेला खरीद तो लिया, पर अब वह यह सोचने लगी कि इस पर धंधा क्या किया जाए?

यह मुंबई का ऐसा एरिया था, जहां पर तमाम कंपनियों के औफिस थे. लिहाजा, खानेपीने का सामान अच्छा बिक सकता था. यहां तो पावभाजी और वडा पाव जैसी चीजें ही लोग खाते थे और छबीली तो ठेठ बिहार से आई थी. उसे तो इन चीजों को बनाना ही नहीं आता था. अपने मरद जोखू से उस ने ये बातें कीं, तो उस ने समाधान बताया कि जब वह मजदूरी करने जाता था, तो उस के गमछे मे बंधे हुए बाटीचोखे को देख कर मुंबई के लोकल लोगों के मुंह में भी पानी आ जाता था.

मुंबई में भी लोग बाटीचोखा के दीवाने हैं, इसलिए हमें भी वही काम करना होगा.

अपने मरद की यह बात छबीली को जम गई थी. उस ने ठेले पर ही एक बड़ा सा तसला रख लिया, जिस में वह आटे की लोई को आग में पका सकती थी. कुछ लकडि़यां और उपले और एक तरफ चोखे के लिए जरूरी सब्जियां जैसे आलू, प्याज, टमाटर वगैरह रख लीं.

छबीली ने हरे पत्ते के बने हुए दोने भी पास ही रख लिए थे और अब उस का ठेला तैयार हो चुका था अपने पहले दिन की बिक्री के लिए.

ठेले को एक ओर लगा कर छबीली गरमागरम बाटी बनाने लगी.

छबीली को झिझक लग रही थी, आतेजाते लोग उसे घूर रहे थे.

‘‘तुम यूपी, बिहार वाले मजदूर… हमारे यहां पर आ कर गंदगी बढ़ाते हो,’’ एक गुंडे सा दिखने वाला मोटा आदमी अपने 1-2 गुरगों के साथ छबीली की तरफ देखते हुए कह रहा था.

‘‘भैया… हम गरीब मजदूर लोग हैं… पेट भरने के लिए कुछ काम तो करना ही है… तभी तो यह ठेला…’’ छबीली हाथ जोड़ कर कह रही थी.

‘‘ऐ… ऐ… यह भैयावैया से काम नहीं चलने वाला… अपन इस इलाके का भाई है… बोले तो अन्ना… मतलब डौन… और तेरे को ठेला लगाना है, तो इस जगह का भाड़ा देना होगा.’’

उस का लंगड़ा मरद जोखू भी निराश हो रहा था

‘‘पर, अभी तक तो बोहनी भी नहीं…’’ छबीली ने कहा, तो उस गुंडे ने शाम तक आने की बात कही और अपने आदमियों के साथ वहां से चला गया.

छबीली ने राहत की सांस ली, पर अभी तक ग्राहक उस के ठेले के पास नहीं आ रहे थे. उस का लंगड़ा मरद जोखू भी निराश हो रहा था.

‘‘लग रहा है कि हमारी लागत भी बेकार जाएगी और हम एक दिन ऐसे ही बिना रोजीरोटी के मर जाएंगे,’’ जोखू ने कहा, तो छबीली ने उसे उम्मीद बंधाई कि अभी नयानया मामला है, थोड़ा समय तो लगेगा ही.

छबीली ने ध्यान दिया कि लोगों की भीड़ तो खाने के लिए आ रही है, पर ज्यादातर लोग सड़क के दूसरी ओर लगे हुए एक फास्ट फूड के एक बढि़या से खोखे पर जा रहे हैं, जहां पर बुरी सी शक्ल का 40-45 साल का आदमी बैठा था, जिस ने अपने सिर के बालों को रंगवा रखा था और उस के बाल किसी कालेभूरे पक्षी के बालों की तरह लग  रहे थे.

उस खोखे पर चाऊमीन, बर्गर, मोमोज वगैरह बिकते थे, जिन्हें नेपाली सी लगने वाली एक लड़की बनाती थी और लोग बहुत चाव से ये सारी चीजें न केवल खाते थे, बल्कि उन्हें पैक करवा कर भी ले जाते थे.

छबीली के काम में इस भीड़ को अपने ठेले की तरफ खींचना पहली चुनौती थी. उसे याद आया कि गांव के मेले में कैसे एक चीनी की मीठीमीठी चिडि़या बनाने वाला गाना गागा कर लोगों को रिझाता था और लोग भी उस की चिडि़या से ज्यादा उस के गाने को सुनने के लिए उस के पास खिंचे चले आते थे.

छबीली मन ही मन कुछ गुनगुनाने लगी थी, पर तेज आवाज में गाने में उसे हिचक सी लग रही थी. उस ने उड़ती हुई एक नजर अपने लाचार पति पर डाली और अचानक ही उसे हिम्मत आ गई और उस के गले से आवाज फूट पड़ी…

‘‘छैल छबीली आई है…

बाटीचोखा लाई है…

जो न इस को खाएगा…

जीवनभर पछताएगा.’’

लोगों के ध्यान को तो छबीली ने खींच लिया था, पर कुछ लोग ठिठक भी गए थे, लेकिन उस का ठेला अब भी कस्टमरों से खाली था.

छबीली अब तक लोगों की नजरों को पढ़ चुकी थी. वह समझ गई थी कि फास्ट फूड वाले खोखे पर बहुत सारे लोग तो अपनी आंखें सेंकने जाते हैं और उस लड़की से हंसीठिठोली का भी मजा लेते हैं. बस, फिर क्या था. छबीली ने तुरंत ही अपनी चोली के ऊपर का एक बटन खोल दिया, जिस से उस के सीने की गोलाइयां दिखने लगी थीं और जिस्मदिखाऊ अंदाज के साथ जब इस बार छबीली ने अपना गाना गाया, तो लोग उस के पास आने लगे.

कुछ बाटीचोखा का स्वाद लेने, तो कुछ उस के नंगे सीने को निहारने. वहीं पर कुछ लोग ऐसे भी थे जो ये दोनों काम साथ में कर रहे थे.

वजह चाहे जो भी थी, शाम तक छबीली के ठेले पर बना हुआ सारा माल खप चुका था और अच्छीखासी दुकानदारी भी हो चुकी थी. छबीली की आंखें खुशी से नम हो गई थीं.

शाम ढली तो अन्ना के आदमी छबीली से उस जगह का हफ्ता मांगने आ गए. छबीली ने सौ का नोट बढ़ाया, तो उन्होंने 2 सौ रुपए मांगे. इस के बाद छबीली ने एक 50 का नोट और दे दिया.

अन्ना के आदमी संतुष्ट होते दिखे और अगले हफ्ते फिर से आने की बात कह कर चले गए.

छबीली एक काम से फुरसत पाती, तो दूसरा काम सामने आ खड़ा होता. दिनभर की थकी हुई छबीली वापस आई, तो अपने और जोखू के लिए खाना बनाया. अभी तो उसे ठेकेदार की हवस भी तो बुझाने जाना था, जहां पर न जाने पर वह छबीली के साथ क्याक्या करेगा? पर छबीली करती भी क्या… फिलहाल तो उस के सामने कोई चारा भी नहीं था.

छबीली ग्राहकों को अपनी ओर खींचने का मंत्र जान चुकी थी. यहां कंपनी में काम करने वाले और सड़कों पर आतेजाते लोग जबान के स्वाद के साथसाथ बदन भी देखना चाह रहे थे और साथ ही कुछ भद्दे मजाक भी करना और सुनना पसंद करते थे.

मसलन, छबीली, तेरा मरद तो लंगड़ा है… यह तो कुछ कर नहीं पाता होगा… फिर तू अपना काम कैसे चलाती है?

ऐसी बातें सुन कर जोखू का मन करता कि उसे मौत क्यों नहीं आती, पर वह जानता था कि इस दुनिया में एक विधवा का जीना कितना मुश्किल होता है, इसलिए वह छबीली के लिए जिंदा रहना चाह रहा था.

छबीली उन लोगों की बातें और हाथ के गंदे इशारे समझ कर मन ही मन उन्हें गरियाती, पर सामने बस मुसकरा कर यही कहती, ‘‘हाय दइया… मत पूछो… बस चला लेती हूं काम किसी तरह… कभी बाटी आग के नीचे तो कभी बाटी आग के ऊपर,’’ और फिर भद्दी सी हंसी का एक फव्वारा छूट पड़ता.

धीरेधीरे छबीली की इन्हीं रसीली बातों के चलते ही उस का ठेला इस इलाके में नंबर वन हो गया था. छबीली को सिर उठाने की फुरसत ही नहीं मिलती, दिनभर काम करती, पर रात को उस ठेकेदार का बिस्तर गरम करने के लिए जाने में मन टीसता था.

दूसरी तरफ उस फास्ट फूड वाली दुकान पर इक्कादुक्का लोग ही नजर आते थे और हालात ये होने लगे थे कि फास्ट फूड वाले को अपनी दुकान बंद करने की नौबत लग रही थी.

फास्ट फूड दुकान चलाने वाले आदमी का नाम चीका था. वह एक शातिर आदमी था. उसे यह बात समझने में देर नहीं लगी कि छबीली के जिस्म और उस की बाटीचोखा के तिलिस्म को तोड़ना आसान नहीं है, इसलिए उस ने छबीली से मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया. इस के पीछे उस की मंशा छबीली के ठेले को यहां से हटा देने की थी, जिस से उस की दुकान पहले की तरह ही चलने लगती.

चीका अपना काम छोड़ कर छबीली के ठेले पर रोज जाता और उस की बाटीचोखा खा कर खूब तारीफ करता और कभीकभी तो कुछ छोटेमोटे तोहफे भी छबीली के लिए ले जाता. चीका छबीली को प्यार के झांसे में ले रहा था. साथ ही, चीका ने जोखू से भी जानपहचान बढ़ाई. वह जोखू को भी शराब पिला कर उसे पटाने की कोशिश कर रहा था.

छबीली भी उस की इन मेहरबानियों को खूब समझ रही थी, पर उसे भी चीका से अपना काम निकलवाना था, इसलिए वह भी चीका को रिझा रही थी.

‘‘मैं तुम से प्यार करने लगा हूं,’’ चीका ने छबीली की कमर पर कुहनी का दाब बढ़ाते हुए कहा.

‘‘पर, मैं कैसे मानूं…?’’ छबीली काम करतेकरते इठला कर बोली.

‘‘आजमा ले कभी,’’ चीका ने कहा, तो छबीली ने उसे रात में 10 बजे बिल्डिंग के दूसरे फ्लोर वाले कमरे में आने को कहा.

छबीली के इस बुलावे को चीका उस का प्रेम समर्पण समझ रहा था और मन ही मन में जल्दी से रात आने का और छबीली के साथ मजे करने का ख्वाब देखने लगा.

रात में जोखू के सोने के बाद छबीली ठेकेदार के कमरे पर पहुंच गई. ठेकेदार शराब के नशे में धुत्त था. उस ने जैसे ही छबीली को दबोचने की कोशिश की, छबीली वैसे ही दूर भागती हुई बोली, ‘‘क्या रोजरोज एक ही स्टाइल… कभी कुछ नया तो करो.’’

छबीली की इस बात पर ठेकेदार मुसकराते हुए बोला कि वह आखिर उस से क्या चाहती है?

इस पर छबीली ने उसे बताया कि जैसा फिल्मों में दिखाते हैं न कि हीरोइन आगेआगे भागती है और एक गंदा आदमी उस का पीछा करता और उस के कपड़े फाड़ देता है और उस की इज्जत लूट लेता है, वैसा ही कुछ करो न.

‘‘बलात्कार वाला सीन चाह रही है…’’ ठेकेदार ने खुश होते हुए कहा और फिर नशे में झूमते हुए छबीली का पीछा करने लगा, छबीली भी भागने लगी

और जोरजोर से ‘बचाओबचाओ’ चिल्लाने लगी.

तभी छबीली की चोली ठेकेदार के हाथों में फंस गई और झर्र की आवाज के साथ फट गई. ठीक उसी समय वहां पर चीका आ गया था. उस ने छबीली की आवाज सुनी, तो कमरे में झांका. अंदर का सीन देख कर उसे काटो तो खून नहीं. दोनों हाथों से अपने उभारों को छिपाए हुए छबीली पूरे कमरे में दौड़ रही थी और ठेकेदार उस की इज्जत लूटने की कोशिश कर रहा था.

यह देख कर चीका को गुस्सा आ गया. वह अंदर कूद पड़ा और छबीली के प्रेम की खातिर ठेकेदार को मारने लगा.

चीका ने उस पर लातघूंसों और डंडों की बरसात कर दी और मारता ही रहा. छबीली कोने में खड़ीखड़ी मजे ले  रही थी.

चीका ने ठेकेदार को इतना मारा कि  उस की दोनों टांगें तोड़ दीं.

ठेकेदार ने छबीली के आगे हाथ जोड़ लिए. चीका की ओर रुकने का इशारा करते हुए छबीली ने ठेकेदार  से कहा, ‘‘क्यों और पैसे नहीं  चाहिए तुझे?’’

‘‘न… नहीं… मुझे कुछ नहीं चाहिए… मैं कल  ही यहां से चला जाऊंगा… बस मेरी जान बख्श दो.’’

छबीली ने चीका को बताया कि कैसे वह ठेकेदार लोगों की मदद के नाम पर उन की मजबूरी का फायदा उठाता था और लड़कियों और औरतों की इज्जत लूटता था.

छबीली की ये बातें सुन कर चीका को फिर से गुस्सा आया और उस ने पास में पड़ा हुआ एक ईंट का टुकड़ा उठाया और ठेकेदार के मर्दाना हिस्से पर दे मारा. ठेकेदार मारे दर्द के दोहरा हो गया था.

‘‘मत घबरा छबीली, आज के बाद यह किसी औरत के जिस्म को हाथ लगाने लायक ही नहीं रहेगा,’’ चीका  ने कहा.

छबीली किसी शातिर की तरह मुसकरा उठी थी. आज ठेकेदार से उस का इंतकाम पूरा हो गया था.

इस घटना के कुछ दिन बाद चीका ने छबीली से कहा, ‘‘लगता है, मुझे ही यह दुकान छोड़ कर अपना धंधा कहीं और जमाने के लिए यहां से जाना पड़ेगा, क्योंकि तू तो अपने ग्राहक छोड़ कर जाएगी नहीं.’’

‘‘तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है… तुम चाहो तो हम दोनों साथ में काम शुरू कर सकते हैं,’’ छबीली ने कहा. जोखू भी वहीं खड़ा था.

‘‘पर, कैसे…?’’ चीका ने पूछा.

‘‘देख… अब से हम दोनों फास्ट फूड और बिहार की मशहूर बाटीचोखा एकसाथ बेचेंगे… जिस को जो खाना है खाए… जो मुनाफा होगा, वह आधाआधा,’’ छबीली ने चहकते हुए कहा.

चीका की दुकान का बोर्ड अब छबीली के ठेले पर लगा हुआ था, जिस पर लिखा था…

‘फास्ट फूड सैंटर…

बिहार की मशहूर बाटीचोखा

एक बार खाएंगे… बारबार आएंगे.’

वहां आने वालों को छबीली का गाना भी मुफ्त में सुनने को मिलता था…

‘‘छैल छबीली आई है,

बाटीचोखा लाई है,

जो न इस को खाएगा,

जीवनभर पछताएगा.’’

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