भोपाल की ट्विशा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका और दिल्ली की काजल चौधरी की मौतों ने साबित कर दिया है कि आधुनिक और शिक्षित समाज में आज भी महिलाओं की स्थिति बेहद खराब है. वे एक बेकार सड़ चुकी शादी में रहने को मजबूर हैं, भले ही उन्हें इस के लिए अपनी जान से हाथ धोने पड़ें.
मगर क्या आप जानते हैं इन सभी मामलों में दोष आखिर है किस का? जो दोष है असलियत में वे धर्म का है, जिस ने लड़कियों के दिमाग में यह बचपन से ठूंस दिया है कि शादी को चलाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है. अगर यह शादी टूटी तो तुम ही गलत हो, तुम ही दोषी हो?
अगर तुम ने लड़के को छोड़ा तो तुम्हारे सारे करवाचौथ के व्रत बेकार हो जाएंगे, तुम्हारें सारे गहने, मंगलसूत्र खत्म हो जाएंगे, तुम्हें किसी शुभ काम में नहीं बुलाया जाएगा, तुम्हें किट्टी पार्टी से भी निकाल दिया जाएगा, दफ्तर में भी बौस तुम्हें फालतू ही सम?ोंगे, लैफ्ट आउट समझेंगे.
डोली में जाओ अर्थी पर आओ
धर्म की कहानियां इसलिए सुनाई जाती हैं कि देखों कैसे सावित्री अपने पति के प्राण ले आई, देखो लक्ष्मी बनो घर की, आप को ऐसे ही पतिव्रता बनना है और जब वह नहीं बन पाती है तो असली जिंदगी में ?ागड़े शुरू हो जाते हैं. फिर इन ?ागड़ों का अंत लड़की का ससुराल छोड़ देना नहीं होता क्योंकि धर्म यह कहता है तुम पति के घर डोली में जाओगी और अर्थी पर ही निकलेगी और इसी का नतीजा होता है यह भोपाल की ट्विशा जैसी लड़कियां का जो सबकुछ चुपचाप सहती हैं और एक दिन पति के घर से अर्थी पर ही निकलती हैं.
फिर शुरू होता है परिवार वालों का हाई वोल्टेज ड्रामा जहां लड़के के मांबाप और लड़के को फांसी पर चढ़ाने की मांग शुरू हो जाती है. लेकिन सवाल यह है कि अगर आप लड़के के मांबाप को फांसी पर चढ़ा भी दोगे तो क्या होगा?
लड़की की वापसी के सारे रास्ते बंद
लड़की को पता है मेरे पास कोई रास्ता है ही नहीं. मेरे सारे रास्ते धर्म ने बंद कर रखे हैं. जिम्मेदार भी धर्म ही हुआ न. पंडितजी ने कई घंटे लगा, मुहर्त के साथ जो 7 जन्मों तक निभाने वाली शादी कराई थी उस की पोल तो कुछ महीनों में ही खुल जाती है. लेकिन फिर भी कोई पंडितजी से नहीं पूछता कि आप ने जिस शादी की गारंटी ली थी उस का अंत इतना खौफनाक क्यों हुआ?
दरअसल, सिविल शादियों में ऐसे मामले कम होते हैं क्योंकि वहां कन्यादान जैसी कोई चीज नहीं होती. जब आप रजिस्टर मैरिज करते हो न तो आप के मन में भावनाएं ही कुछ और होती हैं. जहां इस ऐग्रीमैंट पर आप धर्म थोप देते हो तो बात एकदम बदल जाती है.
डोमैस्टिक वायलैंस दुनिया में हर जगह है लेकिन वहीं है जहां चर्च या मौस्क या गुरुद्वारा या मंदिर, पंडित, बाबा हावी हैं.
लड़कियों के साथ ससुरालों में यह जो हिंसा हो रही है वह इसलिए हो रही है और वे सूसाइड कराई है वह इसलिए कि क्योंकि उन्हें आगे का रास्ता नहीं दिखाई दे रहा. धर्म ने उन का वे रास्ता रोक रखा है. धर्म कहता है इस अपशकुनी को मत बुलाना, यह किसी शुभ काम में न आ पाए. यह अपने पति को छोड़ चुकी है.
मीडिया को टीआरपी से मतलब
जब इस तरह की घटनाएं हो जाती है तब पूरा समाज और मीडिया उस लड़की के साथ खड़ा हो 100-100 घडि़याली आंसू बहाता है और चीखचीख कर लड़के वालों के लिए फांसी की मांग कर अपनी टीआरपी बढ़ाता है.
कुछ समय से अखबार देखो या न्यूज सुनो या फिर सोशल मीडिया को देख लो हर जगह इन मारी हुए लड़कियों के लिए आवाज उठाने वालों का तांता लगा है. टाइम्स औफ इंडिया ने 2 पेज की स्टोरी लिखी, हिंदुस्तान टाइम्स ने यह छापा, जागरण ने यह छपा, न्यूज चैनल वाले बेकार में चिल्लाचिल्ला कर उस की रिपोर्टिंग कर अपना टाइम पास कर रहे हैं. लेकिन किसी भी अखबार ने यह नहीं कहा कि उस लड़की के रास्ते बंद किस ने किए?
धर्म ने लड़की को ये सब सहने पर मजबूर किया हुआ है तो उस का विरोध ये अखबार वाले क्यों नहीं करते?
सवाल है पंडितजी द्वारा पूरे रीतिरिवाजों के साथ कराई गई शादी फेल कैसे हो सकती है?
पंडितजी शादी में आ कर सारे देवीदेवताओं का आह्वान करते हैं. वे उपस्थित हो कर इन को
7 जन्मों और जन्मजन्मांतर का साथी बनाते हैं. पंडितजी ने अपनी फीस ली थी. फिर क्या पंडितजी का दोष नहीं है क्या अगर शादी नहीं चली तो?
जब शादी मुहर्त निकाल कर की तो गलती क्यों हुई? जब हम ने पंडित की बात को मानते हुए पूरे रीतिरिवाजों से शादी की, पूरे पैसे दिए शादी करवाने के जितने भी उन्होंने मांगे तो फिर अब शादी में दिक्कत क्यों आई? आई भी तो हल पंडितजी क्यों नहीं निकाल पाए? इसे इस तरह सम?ों जैसे एसी खरीदा लेकिन उस की सर्विस ठीक नहीं है वह कूलिंग नहीं कर रहा तो हम एसी लगाने वाले को पकड़ेंगे. उस से कहेंगे इसे सही कर के दे यह गरम हवा दे रहा है तो फिर अगर पंडितजी की कराई हुए शादी नहीं चल पा रही तो पंडितजी को ही पकड़ कर कहना चाहिए न कि जब आप को पूरी फीस दी तो शादी चलने की गारंटी भी तो आप की ही थी.
सच तो यह है कि पंडितजी ने मंडप में बैठ कर मंत्र पढ़ दिए लेकिन क्या वे विदाई के बाद पतिपत्नी के बैडरूम में होने वाली बातचीत को नियंत्रित कर सकते हैं? क्या वे ससुराल वालों के व्यवहार, उन के ताने या पति की हिंसक मानसिकता (अगर है तो) को बदल सकते हैं?
धर्म ने बताया पति परमेश्वर है
धर्म ने हर जगह ‘पति परमेश्वर’ जैसी धार्मिक और सांस्कृतिक अवधारणाएं समाज में फैलाई हुई हैं. कई मामलों में इस विचार का इस्तेमाल पुरुषों या ससुराल पक्ष द्वारा अपने वर्चस्व को सही ठहराने और महिलाओं को अधीन रखने के लिए किया गया.
इस रूढि़वादी सोच के कारण कई बार महिलाओं को यह सिखाया जाता है कि उन्हें बिना किसी विरोध के सबकुछ सहना है, जिस से हिंसा करने वालों के हौसले और बढ़ जाते हैं.
धर्म की आड़ ले कर दहेज और उत्पीड़न जैसी सामाजिक बुराइयों को परंपरा का नाम दे दिया जाता है जो पूरी तरह गलत है. लड़कियों को दहेज के लिए मार देना, ससुराल वालों का बहू को तंग करना इन कुरीतियों का ही परिणाम है जो धर्म के द्वारा महिलाओं को दबाने के लिए फैलाई जाती हैं ताकि इस पितृसत्तात्म समाज में लड़कियां पुरुषों की दासी बानी रहें और पति को परमेश्वर मान कर पूजती रहें, चाहे पति उन पर कितना भी अत्याचार क्यों न करे लेकिन वे जवाब न दे सकें और अपनी आजादी की मांग न कर सकें. जबकि सच यह है कि किसी भी ऐसी संस्कृति या विचार को किसी इंसान के जीवन, सम्मान और समानता के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता.
आज की आवश्यकता यह है कि ऐसी कुप्रथाओं और रूढि़वादी विचारों को पूरी तरह खारिज किया जाए और महिलाओं को उन के कानूनी व सामाजिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए.
कानूनी अधिकार: भारतीय कानून भी किसी भी तरह की घरेलू हिंसा, उत्पीड़न या पति परमेश्वर के नाम पर किए जाने वाले अपराधों को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है. कानून की नजर में दोनों साथी समान हैं और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून जैसे धारा 498, घरेलू हिंसा अधिनियम मौजूद हैं.
धर्म ने महिलाओं के ‘सबकुछ चुपचाप सहने’ को एक महान गुण (सहनशीलता) के रूप में प्रचारित किया. इस ?ाठी महिमा के जाल में फंस कर महिलाएं खुद को प्रताडि़त होते हुए भी चुप रहने को मजबूर पाती थीं ताकि उन के मातापिता या भाईबहनों को समाज में नीचा न देखना पड़े.
