Literary Arts Achiever Award : जब बात हिंदी साहित्य में नारीवादी स्वर की होती है तो डा. अनामिका का नाम सब से प्रभावशाली आवाजों में आता है. दिल्ली में रहने वाली पर मुजफ्फरपुर, बिहार की मिट्टी से जुड़ी अनामिका सिर्फ कवयित्री ही नहीं हैं बल्कि उन लाखों औरतों की आवाज भी हैं जिन की कहानियां इतिहास में दर्ज ही नहीं हुईं. 1978 से आज तक यानी पिछले 48 सालों से वे लगातार लिख रही हैं, साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में अंगरेजी साहित्य की प्रोफैसर भी हैं.

अनामिका को 2020 में उन की किताब ‘टोकरी में दिगंत-थेरीगाथा 2014’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. इस संग्रह में उन्होंने 2500 साल पुरानी बौद्ध भिक्षुणियों की कविताओं को आज की औरत से जोड़ा. जो आवाजें कभी दब गई थीं अनामिका ने उन्हें नया जीवन दिया. यही उन की सब से बड़ी खूबी है- पुराने पुराणों, इतिहास और रोजमर्रा की जिंदगी से औरत के अनुभव को निकाल कर सामने रखना.

अनामिका की कलम कविता तक सीमित नहीं है. ‘खुरदरी हथेलियां,’ ‘दूब-धान,’ ‘अनुष्टुप,’ ‘बीजाक्षर,’ ‘गलत पते की चिट्ठी’ जैसे कविता संग्रहों के साथसाथ उन्होंने ‘दस द्वारे का पिंजरा,’ ‘अवांतर कथा,’ ‘तिनका तिनके पास’ जैसे उपन्यास भी लिखे हैं. वे साहित्यिक आलोचना और नारीवादी निबंध भी लिखती हैं. उन के लेखन में घरगृहस्थी का दर्द, औरत की मेहनत, उस की स्मृतियां और उस का रोज का संघर्ष, सबकुछ कविता बन जाता है.

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साहित्य अकादमी के अलावा उन्हें ‘भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार,’ ‘गिरिजा कुमार माथुर पुरस्कार,’ ‘साहित्यकार सम्मान,’ ‘परंपरा सम्मान’ और ‘साहित्य सेतु सम्मान’ भी मिल चुका है.

आज उन्हें हिंदी की सब से बड़ी नारीवादी कवयित्रियों में गिना जाता है. उन की किताबें कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवादित हो चुकी हैं.

यंग जैनरेशन के लिए मैसेज

डा. अनामिका कहती हैं कि कभी भी आदमी को किसी क्रिया की तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए. आप को उस समय अपनी भावनाओं को जज्ब करना चाहिए. ठहर कर बाद में लिख कर जवाब देनी चाहिए. ध्यान रखिए खौलते पानी में चेहरा नहीं दिखता मगर जब पानी शांत हो जाता है तब चेहरा साफ दिखता है. इसलिए कभी भी गुस्से में कोई जवाब नहीं देना चाहिए.

लेखन के लिए हिंदी भाषा चुनने की वजह

डा. अनामिका कहती हैं कि हिंदी हमारी मातृभाषा है. यह हमारे परिवेश की भाषा है. मेरे जितने लोग हैं, बच्चियां हों या वृद्ध हों, महिलाएं हों, प्रौढ़ाएं हों या मजदूर और किसान हों, इस भाषा में मैं सब से गप्प कर सकती हूं, उन के जीवन का दर्द देख सकती हूं. इस भाषा में लोग खुद को अभिव्यक्त करते हैं और उस से समाज बदलता है. लोगों की जिंदगी में बदलाव आ सकता है. जब कोई इंसान अपना दर्द बताता है तो धीरेधीरे दुनिया और परिवेश में बदलाव आता है.

राइटिंग प्रोफैशन

बकौल अनामिका, अभिव्यक्ति के गर्भ में ही व्यक्ति बैठा है. दुनिया के जितने दुखसुख हैं, आपबीती हो या जगबीती, उस को बहुत करीने से, फोर्स के साथ, खूबसूरती से और मार्मिक ढंग से अगर सामने लाना हो तो हृदय परिवर्तन हो सकता है. हम गांधीवादी ढंग से अगर कोई संघर्ष करते हैं तो भाषा के आसरे ही करते हैं. हमें यह दुनिया बदलनी है. यह दुनिया गरीबों के लिए, दलितों के लिए, महिलाओं के लिए, अश्वेत और देहात के लोगों के लिए सरल नहीं है. दुनिया उन के साथ अन्याय करती आई है.

अब समय आया है कि ये अपनी कहानियां सुनाएं. एक अश्वेत लेखक जब अपने मुंह से गुलामी की दास्तां सुनाता है तो उस का असर पड़ता है. एक स्त्री जिस के साथ अन्याय हुआ है, लगातार उसे शरीर सम?ा गया. किसी ने नहीं समझा कि उस के पास दिल भी है जो आहत होता है, उस के पास प्रज्ञा भी है लेकिन उसे सिर्फ शरीर माना गया. ऐसे में जब वे स्त्रियां लिखती हैं, एक रूपक एक किरदार के सहारे आपबीती और जगबीती की विडंबनाएं सामने रखती हैं तो उसे इज्जत से देखा जाता है. जिस के भी दिल में दुखों का खजाना है उसे धारण करने के लिए साहित्य ही जरीया है.

आज जब हम ‘नारी सशक्तीकरण’ की बात करते हैं तो अनामिका जैसी लेखिकाएं उसे शब्द और दिशा देती हैं. वे हमें याद दिलाती हैं कि चूल्हेचौके से ले कर कविता के पन्नों तक हर जगह औरत का हक है और उस हक को पहचानना ही असली गृहशोभा है.

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