Indian Hockey : हरियाणा के एक छोटे से गांव से आने वाली 5 फुट 7 इंच लंबी सविता पूनिया अपनी शानदार गोलकीपिंग के कारण ‘भारतीय हौकी की दीवार’ (द ग्रेट वौल औफ इंडिया) के नाम से भी जानी जाती हैं. भारतीय महिला हौकी टीम की पूर्व कप्तान और दिग्गज गोलकीपर सविता पूनिया को 26 जनवरी, 2026 को खेल के मैदान में उन के उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. उन्हें 2018 में अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है.
गृहशोभा के साथ इस खास बातचीत में सविता खुल कर बात कर रही हैं खेल, संघर्ष, परिवार और उन लाखों महिलाओं के बारे में जो रोज अपनी जिंदगी का गोल बचाने में लगी हैं.
17 साल की उम्र में सविता को 2007 में राष्ट्रीय टीम के लिए चुना गया था. 2008 में सविता ने नीदरलैंड और जरमनी में आयोजित चार देशों के एक टूरनामैंट में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय पदार्पण किया.
2009 में जूनियर एशिया कप में उन्होंने हौकी टीम के सदस्य के रूप में भाग लिया. 2011 में उन्होंने अपना पहला सीनियर स्तर का अंतरराष्ट्रीय मैच खेला. पूनिया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 100 से अधिक मैच खेल चुकी हैं. 2013 में मलेशिया में आयोजित 8वें महिला एशियाई कप में उन्होंने भाग लिया और पैनल्टी शूटआउट में 2 महत्त्वपूर्ण गोल बचा कर भारत को कांस्य पदक दिलाया. 2014 में इंचियोन एशियाई खेलों में वे भारतीय हौकी टीम का हिस्सा थीं जिस ने कांस्य पदक जीता था. 2015 में हौकी इंडिया के वार्षिक पुरस्कारों में पूनिया को ‘बलजीत सिंह गोलकीपर औफ द ईयर’ पुरस्कार के साथ 1 लाख रुपए का नक्द पुरस्कार प्रदान किया गया. हौकी खेल में उन के उत्कृष्ट प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय योगदान के लिए उन्हें यह सम्मान मिला.
2016 में, पूनिया ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन तब किया जब मैच के आखिरी एक मिनट में उन्होंने जापान के खिलाफ पैनाल्टी कौर्नर पर शानदार बचाव किया जिस से भारत को 1-0 से जीत मिली. इस जीत की बदौलत भारतीय महिला हौकी टीम 36 साल बाद रियो ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई करने में सफल रही. 2017 में न्यूजीलैंड में आयोजित हाक्स बे कप में उन के शानदार प्रदर्शन के कारण भारतीय हौकी टीम टूरनामैंट में छठे स्थान पर रही.
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2018 में एशिया कप के फाइनल मैच में उन्होंने चीन के खिलाफ एक शानदार बचाव किया. इस मैच में उन्हें टूरनामैंट की सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर का पुरस्कार मिला. इस जीत की बदौलत भारतीय हौकी टीम ने लंदन में आयोजित 2018 विश्व कप के लिए क्वालीफाई किया. पूनिया को 2018 में अर्जुन पुरस्कार मिला था.
कैसा रहा यह सफर
2003 में मैं ने करीब 13 साल की उम्र में महाराजा अग्रसेन स्कूल सिरसा में ट्रायल दिया था. वहां मेरा सलैक्शन हुई थी. मैं ने अपना जो पहला ट्रायल दिया वह सलवारसूट और नौर्मल स्कूल शूज पहन कर दिया था. मेरे स्कूल के एक टीचर ने मेरे पापा को आ कर इस की जानकारी दी थी.
मैं और मेरी कजन ट्रायल के लिए सिरसा जाने वाले थे. मैं ने दादाजी को बताया कि मु?ो कल सिरसा जाना है और वहां पर जूडो, बैडमिंटन ऐंड हौकी का ट्रायल है तो मेरे दादाजी ने बोला कि हौकी का ट्रायल देना बेटा. मैं ने पूछा कि हौकी ही क्यों? तो वे बोले, ‘‘मैं ने आज से 25 साल पहले दिल्ली में हौकी का एक मैच देखा था जो काफी इंटरैस्टिंग था.’’

तभी मैं ने हौकी को चुना था. वैसे उस समय हौकी के बारे में मुझे ज्यादा कुछ पता नहीं था. वहां पर फिजिकल टैस्ट हुए थे और इसी आधार पर एज ए डिफैंडर सलैक्शन हुआ. लेकिन उस के बाद मेरा हौस्टल में मन नहीं लगा. करीब डेढ़ साल बाद पापा मुझे लेने आए क्योंकि मम्मी की कंडीशन ठीक नहीं थी. उन्हें अर्थराइटिस था और इस वजह से उन के जौइंट्स में बहुत दर्द था. उन्हें बैड रैस्ट मिली थी. खाना भी हम उन्हें अपने हाथों से खिलाते थे. कंडीशन काफी खराब थी. मगर उस समय भी मेरे पेरैंट्स ने डिसाइड किया कि मेरे कैरियर के लिए वे मुझे खेलने भेजेंगे. इस बात ने मुझे बहुत मोटिवेट किया. नौर्मली हम यही सुनते थे और टीवी में भी यही देखने को मिलता था कि हरियाणा में बेटियों को ज्यादा बढ़ावा नहीं मिलता है, बेटाबेटी में भेदभाव होता है.
लेकिन मैं इस चीज में बहुत ब्लैस्ड रही हूं कि मेरे पेरैंट्स इस से बिलकुल अपोजिट हैं. मेरा भाई 10वीं तक गांव में पढ़ा लेकिन मु?ो मेरे फ्यूचर के लिए मेरे पेरैंट्स ने बाहर भेजा.
मैं ने अपनी आंखों से मम्मी की कंडीशन देखी थी और फिर हौस्टल जा कर भी वही याद आता रहा कि अब उन का ध्यान कौन रख रहा होगा. तब मैं ने 2005 में हौस्टल छोड़ कर घर लौटने का डिसीजन लिया. इस के लिए पापा को बुलाया. तभी मेरे कोच ने पापा से कहा कि इस की हाइट अच्छी है. हम इसे गोलकीपर बना देते हैं. क्या पता एक दिन इंडिया खेल जाए. उस एक वाक्य ने पापा को फिर से मोटिवेट किया. उन्हें लगा कि सच में क्या पता बेटी इंडिया खेल जाए. फिर मैं गोलकीपर बनी तो करीब 18 हजार की गोलकीपर किट मेरे पापाजी ने खरीदी. मैं बहुत दुखी हुई थी कि किट के पीछे इतने पैसे क्यों खराब कर दिए जबकि मेरा तो स्पोर्ट्स में मन नहीं लगता है. पापा ने मेरे ऊपर इतने रुपए इन्वैस्ट किए थे इस वजह से भी मैं चाहती थी कि मैं इंडिया खेलूं ताकि वे सैटिस्फाई हो जाएं. तब 2006 के एंड में मैं हिसार चली गई और 2007 में नेशनल कैंप में आई. फिर 19 साल की उम्र में मेरा फर्स्ट डेब्यू हुआ.
मैं ने जो भी किया सिर्फ अपने पेरैंट्स को ध्यान में रख कर किया. मैं एक बहुत ही नौर्मल फैमिली से आती हूं और बहुत शरमीली लड़की हूं. उस समय तो इतना भी कौंफिडैंस नहीं था कि मैं अपने पड़ोसी के घर भी अकेली चली जाऊं. लेकिन फिर स्पोर्ट्स के कारण मेरे अंदर कौन्फिडैंस आया और मैं स्ट्रौंग भी बनी. जब आप विरोधी के साथ यह सोच कर खेलते हो कि मैं इंडिया के लिए खेल रही हूं तो डैफिनेटली बहुत अच्छा लगता है. उस वक्त बहुत प्राउड फील होता है जब आप अपनी कंट्री को रिप्रेजैंट करते हैं और जीतते हैं. वहां पर नैशनल ऐंथम बजता है. यह अनुभव अद्वितीय होता है. मुझे स्पोर्ट्स की वजह से बहुत कुछ मिला है. मुझे बस मेहनत करनी है. अपने मम्मी पापा को प्राउड फील करवाना है.
मुझे आज भी याद है 2007 में जब मेरे पापा पासपोर्ट बनवाने चंडीगढ़ गए थे और उन्हें बहुत दिक्कत हुई थी. उस के बाद जब पहली बार 2008 में अनाउंस हुआ कि मेरा जरमनी के लिए सलैक्शन हुआ तो मैं ने जस्ट पापा को फोन किया कि पापा मेरा नाम टीम में आ गया है. उस वक्तपापा लिटरली रो पड़े थे. उन का सपना साकार हो गया था. उन की बेटी इंडियन टीम के लिए खेलने जा रही थी. जब मैं जरमनी पहुंची तो वहां हर चीज अपने पेरैंट्स के साथ शेयर करती थी. फर्स्ट ट्रिप मेरे लिए बहुत ही अमेजिंग रहा क्योंकि मेरे सीनियर्स ने भी मेरी बहुत हेल्प की. वापस आने के बाद भी मैं पापा मम्मी को यही बोलती थी कि यकीन ही नहीं हो रहा कि मेरी जर्सी के पीछे इंडिया लिखा हुआ है.
बहुत ही रिस्पौंसिबल है गोलकीपर की जौब
गोलकीपर पर हमेशा प्रैशर रहता है क्योंकि बाकी सबकी गलती कोई न कोई रिकवर करने के लिए होता है मगर गोलकीपर की गलती कोई रिकवर नहीं कर सकता. वह सिर्फ स्कोरबोर्ड पर दिखता है. आप का ऐक्सपीरियंस जितना बढ़ता है उतना खेलने में मजा आता है. जब फर्स्ट मैच था तब भी प्रैशर था और आज 300 प्लस मैच हो चुके हैं मगर प्रैशर आज भी है. बस आप को ऐक्सपीरियंस के साथ सब हैंडल करना आ जाता है कि ओके मैं ग्राउंड में हूं तो कैसे अपनेआप को बाकी चीजों से हटा कर सिर्फ मैच पर फोकस रखना है.
गोलकीपर के रूप में मेरे ऊपर रिस्पौंसिबिलिटी बहुत है मगर मेरा खुद का नेचर ही ऐसा है कि जितनी ज्यादा मुझे रिस्पौंसबिलिटी मिलती है मैं उतनी फोकस्ड रहती हूं और उसे ऐंजौय करती हूं. आज यह बोल सकती हूं कि मैं गोलकीपिंग को ऐंजौय करती हूं और गोल पोस्ट में मजा आता है. मगर एक समय था जब मुझे डर लगता था.
प्रेरणास्रोत
सविता बताती हैं, ‘‘मेरे इस सफर में मुझे अपने दादाजी रणजीत सिंह पूनिया से काफी प्रेरणा मिली है. हौकी का ट्रायल देने की बात उन्होंने ही मुझ से की थी. फिर फर्स्ट डेब्यू के बाद मैं घर आई. अखबार में मेरा एक आर्टिकल आया हुआ था. जब मेरे भाई ने वह आर्टिकल पढ़ कर दादाजी को सुनाया तो उन्होंने उस पेपर को कबर्ड में रख लिया और मेरे घर आने पर मुझ से बोले कि बेटा आज की डेट देख ले. आज से 1 साल बाद मैं यह न्यूज खुद पढ़ कर दिखाऊंगा. वे पढ़ेलिखे नहीं थे मगर 1 साल बाद उन्होंने वह सच में कर के दिखाया. उन्होंने पढ़ना सीखा और मेरी न्यूज पढ़ते हुए उन की आंखों में खुशी के आंसू आ गए कि एक वे अनपढ़ हैं मगर उन की पोती की वजह से उन का नाम न्यूज पेपर में आया है.
गांव से भी उन के पास फोन आ रहे थे कि रणजीत सिंह पूनिया की पोती सिरसा की पहली हौकी प्लेयर बनी है. ये सब बातें मेरे लिए बहुत मोटिवेशनल थी. मेरे दादाजी अगर 67 साल की उम्र में इंस्पायर हो सकते हैं और मेरी हौकी की वजह से पढ़ना स्टार्ट कर सकते हैं तो फिर मुझे अपनी हौकी पर पूरा ध्यान भला क्यों नहीं देना चाहिए.’’
शुरुआती संघर्ष
सब से पहले तो हम इकोनौमिकली बहुत स्ट्रौंग नहीं थे. पापा ने 18 हजार की किट खरीद कर दी. उस के बाद जब इंटरनेशनल लैवल पर आई तो सब के पास एक खास कंपनी की किट थी और मेरे पास एक लोकल किट थी. जब कोच उस का रेट पूछा तो पता चला कि वह किट तो 2,20,000 की है. मैं ने यह बात घर पर नहीं कही. यह सोच कर कि अगर पापा को बता दूंगी तो वे तो यह भी लेके देने की कोशिश करेंगे. मगर मैं अपने घर वालों का इतना खर्चा नहीं करवा सकती थी. ट्रैवलिंग में हमें बहुत दिक्कत होती थी. क्योंकि शुरुआत में बस या ट्रेन से आनाजाना होता था.
मैं 2008 में टीम में आई और मुझे 2018 तक जौब नहीं मिली थी यानी आलमोस्ट 9 साल. वह एक ऐसा टाइम पीरियड था कि मुझे मम्मी के लिए हमेशा टैंशन रहती थी. मम्मी से रिश्तेदार पूछते कि बेटी खेल रही है तो नौकरी तो मिल गई होगी. मां को यह भी टैंशन रहती थी कि कोई इंजरी हो गई तो क्या होगा? इधर मेरे दिमाग में यह था कि मम्मी की टेंशन कैसे दूर करूं.
मेरा जौब में बहुत इंटरैस्ट नहीं है कि हर महीने सैलरी आएगी मगर मम्मी की खुशी इसी में थी और उसे पूरा करना मेरा फर्ज था. पापा की खुशी मेरे खेलने में थी जिसे मैं ने पूरा कर दिया था. मगर मम्मी की खुशी को भी फुलफिल करना था. उस प्रैशर के साथ मैं बहुत समय तक खेली हूं. 3-4 साल ऐसे थे कि मैं लिटरली डीपली उस चीज के बारे में सोचने लगी थी. उस के बाद में 2018 में मेरा अर्जुन अवार्ड के लिए नाम अनाउंस हुआ. मैं घर पर ही थी. मैं ऐक्सप्रैस ही नहीं कर पाऊंगी कि वह खुशी कैसी थी. पापा बोले कि बस बेटा मेरा सपना पूरा हो गया कि मेरी बेटी को एक नैशनल अवार्ड मिल रहा है.
उस के बाद मैं अंदर गई मम्मी को बताने कि मुझे अवार्ड मिल रहा है. मम्मी ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं हैं. उन का सवाल था कि बेटा अब नौकरी मिल जाएगी? यह सुन कर मुझे रोना आ गया. मैं समझ गई कि मेरी मां आज भी उसी तकलीफ में है कि मुझे जौब नहीं मिली जबकि उन्हें नहीं पता कि अर्जुन अवार्ड क्या है.
पापा ने मम्मी को समझाया कि यह जौब से भी कहीं बड़ा अवार्ड है. आज यह मिला है तो कल नौकरी भी मिल जाएगी. आज मैं स्पोर्ट्स अथौरिटी औफ इंडिया में कोच हूं मगर पहले का समय बहुत चैलेंजिंग रहा है क्योंकि बहुत खर्चे होते हैं और आप को चीजें देख कर चलना पड़ता है.
महिला ऐथलीटों की चुनौतियां
महिलाओं के लिए हर दिन चुनौतीपूर्ण है चाहे आप घर पर हैं या घर से बाहर जा रही हैं, पढ़ाई के लिए जा रही हैं, खेलने के लिए जा रही हैं, शादी किस परिवार में होगी, शादी के बाद जीवन कैसा चलेगा वगैरहवगैरह. जरूरी है कि सभी पेरैंट्स अपनी बेटियों को इतना स्ट्रांग बनाएं कि लाइफ में जो भी चैलेंज आएं उन से वे निबट सकें. हर सिचुएशन में वे शांत हो कर सोचें कि उन्हें लाइफ में क्या चाहिए.
हमेशा उम्मीद की जाती है कि लड़कियों को एक स्टैप नीचे लेना चाहिए जैसे बहुत खेल लिया बहुत पढ़ लिया, अब शादी कर ले. जौब पर जा रही है मगर रात की जौब नहीं करनी है. ऐसे में पेरैंट्स ही अपनी बच्ची को स्ट्रांग बना सकते हैं. लड़कियां जितना ही चैलेंज को ऐक्सैप्ट करेंगी उतनी ही स्ट्रांग बनेंगी और जिंदगी उतनी ही आसान लगती है.
अगर स्पोर्ट्स पर्सन न होतीं तो सविता क्या होतीं
मेरे ऐसे कोई सपने नहीं थे. जब मैं बहुत छोटी थी तभी हौकी खेलना स्टार्ट कर दिया था मगर हां मेरे पापा की विश थी कि मैं डाक्टर बनूं. मेरे पापा फार्मासिस्ट हैं. उस टाइम पर पैसों की कमी की वजह से दादाजी पापा को इतना ही पढ़ा सके थे. फिर पापा जौब करने लग गए लेकिन उन का डाक्टर बनने का सपना अधूरा रह गया था. उन्हें लगा कि मैं डाक्टर नहीं बन सका तो क्या हुआ.
अब अपनी बेटी को डाक्टर बनते हुए देखना है. मैं ने भी सोच लिया था कि मुझे पापा का ड्रीम पूरा करना है. इस के लिए आफ्टर 10 मैं मेडिकल लाइन में जाऊंगी और डाक्टर बनने की कोशिश करूंगी. मगर वक्त ने मुझे स्पोर्ट्स पर्सन बना दिया और पापा इस में भी बहुत खुश हैं.
स्पोर्ट्स है एक अच्छा कैरियर औप्शन
आज स्पोर्ट्स की फील्ड काफी बेहतर हो गई है. अगर आप के बच्चों ने थोड़ा सा भी स्पोर्ट्स में इंटरैस्ट ले लिया और आप की सपोर्ट उन्हें मिलती है तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं. देखा जाए तो गवर्नमेंट बहुत अच्छा काम कर रही है. खेलो इंडिया और दूसरी बहुत से स्कीम्स हैं जहां स्पोर्ट्स में बहुत ग्रास रूट पर ध्यान दिया जा रहा है. बस पेरैंट्स को थोड़ा पेशंस रखनी बहुत जरुरी है.
मेरे पास भी बहुत से पेरैंट्स मिलने आते हैं कि हमें भी अपने बच्चे को स्पोर्ट्स खिलाना है. मगर वह कब इंडिया खेलना शुरू करेगा, कब जौब मिल जाएगी जैसे सवाल पूछने लगते हैं. मैं उन को अपना एग्जांपल देती हूं कि मेरे खुद इंडिया टीम में आने के नौ साल बाद जौब मिली. मेरे पापा कहते थे कि बेटा तू फ्री माइंड हो कर खेल आज नहीं तो कल जौब मिल ही जाएगी.
आज सब लोग सोशल मीडिया पर बिजी हैं. कितनी भी छोटी ऐज हो मगर हाथ में फोन होता है. बच्चे इधरउधर के वीडियो देखते हैं. सोशल मीडिया पर आप अपना कैरियर भी बना सकते हो मगर छोटी सी उम्र में भी बच्चों के हाथ में फोन दिखता है जहां उन को कुछ पता भी नहीं है. यह एक आदत है जो नुकसानदायक है. मगर जब आप बच्चे को स्पोर्ट्स में भेजोगे तो वह फिजिकली ऐक्टिव और हैल्दी रहेगा, उसे अच्छी नींद आएगी, अच्छा खाना खाएगा. आज एक ऐज के बाद हमारे बहुत से बच्चे नशा करते हैं.
अगर बच्चा स्पौर्ट्स जौइन करता है तो वह इन सब चीजों से बच जाएगा. उस की बौडी और माइंड हेल्दी डैवलप होगा. बच्चा स्पोर्ट्स में अपना कैरियर अच्छा बना सकता है. इसलिए पेरैंट्स को अपने बच्चे की हैल्थ और कैरियर की सोच कर भी उसे स्पोर्ट्स में भेजना स्टार्ट करना चाहिए. स्पोर्ट्स लाइफ में बहुत कुछ सीखने को देता है. यह आप को ब्रेव बनाता है और डिसिप्लिन भी सिखाता है.
