पिछला भाग- 3 सखियां: भाग-6
‘‘मैं आप के साथ हूं.’’ फिर एक दिन आभा को अचानक फेसबुक पर रितिका की खबर मिली. उस ने लिखा था, ‘तुम्हारा नाम फेसबुक पर देखा तो तुम से फिर संपर्क करने की तमन्ना हुई. युगों बीत गए तुम से बात किए या मिले हुए. अपना हालचाल बताना.’ आभा खुशी से उछल पड़ी. इतने सालों बाद अपनी सखी का संदेश पा कर वह भावुक हो गई. उस ने फौरन रितिका को फोन लगाया.
‘‘रितिका,’’ वह फोन पर चीखी.
‘‘आभा माई डियर, मैं बयान नहीं कर सकती कि मुझे तुम से बात कर के कितनी खुशी हो रही है. मैं ने सुना कि तू इंडिया आ गई है.’’
‘‘हां, और तू कहां है? इटली में?’’
‘‘अरे नहीं यार, इटली तो छूट चुका.’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘यह एक लंबी कहानी है, ऐंटोनियो बड़ा फरेबी निकला.’’
‘‘क्या कह रही है तू?’’
‘‘हां आभा. उस ने मुझे बड़ा धोखा दिया.’’
‘‘क्यों, क्या हुआ?’’
‘‘वह बड़ा झूठा था. वह गले तक कर्ज में डूबा हुआ था. उस का महल भी गिरवी पड़ा था.’’
‘‘तो उस का काम कैसे चलता था?’’
‘‘पता नहीं. उस ने मुझे अपने महल में टिका दिया. शुरूशुरू में वह मुझ से बहुत प्यार जताता था. पर जब उसे पता चला कि मैं इंडियन हूं पर किसी रियासत की राजकुमारी नहीं और न ही मेरे पास अगाध दौलत है जिसे वह हथिया सके, तो उस ने मेरी ओर से आंखें फेर लीं. उस ने गिरगिट की तरह रंग बदला. वह महीनों घर से गायब रहता. न मेरा हाल पूछता न अपने बारे में कुछ बताता. धीरेधीरे मुझे उस की असलियत मालूम हुई. उस के पास आमदनी का कोई जरीया नहीं था. वह अमीर औरतों को अपने जाल में फांसता था और उन से पैसे ऐंठता था. यही उस की जीविका का आधार था और यही उस का पेशा था. दरअसल, वह एक जिगोलो था. वह पैसे के लिए अपना तन बेचता था. भला ऐसे आदमी के साथ मैं कैसे रह सकती थी? उस ने तो मुझे भी धंधे में झोंकने की कोशिश की.’’
‘‘ओह नो.’’
‘‘हां. जब मुझे उस के नापाक इरादों की भनक मिली तो मैं चौकन्नी हो गई. मैं ने वहां से भागने का प्लान बनाया. हालांकि यह काम इतना आसान नहीं था. फिर भी मैं ने घर की एक बुढि़या नौकरानी को अपने कुछ गहने दिए और उस की मदद से मैं ने एक नाव किराए पर ली और नदी पार की. रोम पहुंच कर मैं सीधे इंडियन ऐंबैसी की शरण में गई. वहां अपनी राम कहानी सुनाई और फिर भारत वापस पहुंची. अब मैं अपनी मां के साथ रहती हूं, बिलकुल अकेली. न कोई संगी न साथी,’’ उस ने बुझे स्वर में कहा. ‘‘रितिका तेरी कहानी सुन कर तो रोना आता है. अभी तेरी उम्र ही क्या है. ये पहाड़ जैसी जिंदगी किस के सहारे काटेगी? बुरा न मान तो एक बात कहूं, तू दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेती?’’
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‘‘दूसरी शादी? राम भजो. 2 बार कर के तो पछता रही हूं. नहीं, शादी का सुख मेरी जिंदगी में नहीं है और इत्तफाक से बच्चे भी नहीं हुए, नहीं तो उन के लिए ही जी लेती. जब तक मां हैं हम दोनों एकदूसरे के सहारे दिन काट रही हैं. आगे की देखी जाएगी.’’
‘‘तब तेरा समय कैसे कटता है?’’
रितिका ने एक आह भरी और कहा, ‘‘कट ही जाता है किसी तरह. सुबह होती है शाम होती है, जिंदगी यों ही तमाम होती है. दरअसल, हालात ही कुछ ऐसे बने कि मेरी कायापलट हो गई. वैसे कहते हैं कि शादी एक जुआ है. पर मैं तो कहूंगी कि जिंदगी एक जुआ है. किसी को बैठेबिठाए, अनायास ही जीवन की हर खुशी मिल जाती है. उस के सिर पर जीत का सेहरा लग जाता है और कोई आजीवन झींकता रहता है, संघर्ष करता रहता है पर उस के मन की एक भी मुराद पूरी नहीं होती. कभीकभी लगता है कि दुनिया हमारी मुट्ठी में है पर दूसरे ही क्षण पारे की तरह सब हाथ से फिसल जाता है. हम सब एक कठपुतली समान हैं और कोई अदृश्य शक्ति हमें नचाती रहती है. खैर छोड़ न यार, कोई और बात कर. हां, अपनी सखी शालिनी की सुना. उस के क्या हालचाल हैं?’’
‘‘उस की कुछ न पूछ,’’ आभा ने एक आह भर कर कहा.
‘‘भला क्यों?’’
‘‘वह अब इस दुनिया में नहीं है.’’
‘‘ये क्या कह रही है आभा? क्या हुआ था उसे?’’
‘‘कोई बीमारी नहीं थी उसे. उस के पति ने बहलाफुसला कर उसे वापस इंडिया भेजा और उस के लौटने के तुरंत बाद उसे तलाक के कागजात भेज दिए. उस के मांबाप तलाक देने के पक्ष में नहीं थे. पर शालिनी ने कागजात पर दस्तखत कर दिए. इस के बाद वह बिलकुल टूट सी गई. पार्थ को वह बहुत चाहती थी. वह बहुत गुमसुम रहने लगी. वह डिप्रैशन का शिकार हो गई और ड्रग्स भी लेने लगी. उस के मांबाप ने उस के लिए वर ढूंढ़ना शुरू कर दिया और एक अधेड़, दुहाजू वर तलाश भी कर लिया. फिर शालिनी को समझाबुझा कर शादी के लिए राजी भी कर लिया. पर शादी के एक दिन पहले शालिनी ने किसी ड्रग का ओवरडोज ले लिया. रात को सोई तो सोई ही रह गई.’’
‘‘हायहाय ये तो बहुत बुरा हुआ. बेचारी शालिनी.’’ ‘‘हां, समझ में नहीं आता कि उस की असमय मौत के लिए किसे दोष दें. उस के मांबाप की दकियानूसी सोच को, जो ये सोचते हैं कि शादी के बिना एक स्त्री का निस्तार नहीं है या उस के कू्रर पति को जिस ने उस के साथ वहशियाना बरताव किया और उस का जीना दूभर कर दिया या अपने समाज के संकीर्ण दृष्टिकोण को जो लड़कियों के प्रति हमेशा असहिष्णु रहा है और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक समझता है. खैर यह तो हुई शालिनी की कहानी. अब किसी दिन तुझे फुरसत से अपने बारे में बताऊंगी. अब फोन रखती हूं.’’
‘‘ठीक है. पर तू मुझे जबतब फोन करती रहना. इस से मुझे बहुत आत्मबल मिलता है.’’
‘‘अवश्य,’’ कह कर आभा ने फोन रख दिया.
उस की नजर बाहर बैठे राम पर पड़ी जो बड़ी लगन से बच्चों को पढ़ा रहे थे. वह मुग्ध भाव से उन का सौम्य मुखमंडल ताकती रही. यदि सहचर मन मुताबिक मिले तो एक स्त्री का जीवन सफल हो जाता है. अगर शादी के जुए में उस का पांसा सही पड़ गया तो समझो उस के पौबारह हैं, उस ने भावविभोर हो कर सोचा.
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