शिक्षा पर सरकारी विद्वेष

पढ़ाई चाहे आईआईटी में हो, आईआईएम में, किसी कालेज में या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में, सस्ती ही होनी चाहिए. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कट्टरपंथियों के प्रवेश को रोकने में असफल रहने पर केंद्र सकरार अब उस की फीस बढ़ा कर वहां से गरीब होनहार छात्रों को निकालना चाह रही है ताकि वहां केवल अमीर घरों के, जो आमतौर पर धर्मभीरु ही होते हैं, बचें और पुरातनपंथी गुणगान गाना शुरू कर दें.

शिक्षा का व्यापारीकरण कर के देशभर में धर्म को स्कूलों में पिछले दरवाजे से पहले ही दाखिला दिया जा चुका है. जातीय व्यवस्था, ऊंचनीच, धार्मिक भेदभाव, रीतिरिवाजों का अंधसमर्थन, पूजापाठ करने वाले सैकड़ों प्राइवेट स्कूलों के नाम ही देवीदेवताओं पर हैं.वहां से निकल रहे छात्र 12-13 साल पैसा तो जम कर खर्च करते हैं पर तार्किक व अलग सोच या ज्ञान से दूर रह कर रट्टूपीर बन कर रोबोटों की तरह डिगरियां लिए घूम रहे हैं.

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अमीरों के ये बच्चे बाद में अच्छे कालेजों में नहीं पहुंच पाते और जवाहरलाल नेहरू जैसे विश्वविद्यालयों में तो हरगिज नहीं. उन का काम सिर्फ मातापिता का मेहनत से कमाया पैसा बरबाद करना रह जाता है.

सरकारी स्कूलों से आने वाले बच्चे अभावों में पलते हैं पर उन्हें जीवन ठोकरों से बहुत कुछ सिखा रहा है. उन में कुछ करने की तमन्ना होती है, इसलिए वे प्रतियोगी परीक्षाओं पर कब्जा कर रहे हैं. जवाहरलाल नेहरू जैसे विश्वविद्यालयों में वे प्रवेश ले पाते हैं, क्योंकि सरकारी स्कूली शिक्षा की तरह ये सस्ते हैं. इन से एक पूरी व्यवस्था को चिढ़ होना स्वाभाविक ही है. भारत सरकार तो गुरुकुल चाहती है जहां छात्र नहीं शिष्य आएं जो भरपूर दक्षिणा दें, गुरुसेवा करें और धर्म की रक्षा करें.

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों का रोष बिलकुल सही है. भारत सरकार के पास चारधामों, आयोध्या में दीए जलाने, पटेल की मूर्ति बनवाने के लिए तो पैसा है पर स्वतंत्र विचारों को जन्म देने वाले शिक्षा संस्थानों के लिए नहीं. ऐसा कैसे हो सकता है? यह विद्वेष की भावना है.

सरकार अपनी धार्मिक नीति को आम जनता पर थोपने के लिए कुछ भी कर सकती है. फिर चाहे वह युवाओं को मानसिक गुलाम बनाना ही क्यों न हो.

क्या आपको भी है सोशल मीडिया की लत

क्या आप भी अपना अधिकतम समय facebook ,netflix ,youtube और instagram पर व्यतीत  करते है? यदि हाँ तो ये लेख आपके लिए है . मेरे इस लेख को पूरा पढ़े क्योंकि आधा सच झूठ से भी बुरा होता है.

आप तो ये जानते ही है की सोशल मीडिया कितना पावरफुल है. सोशल मीडिया की पॉवर इतनी है कि दुनिया के किसी भी इंसान से आपको मिलवा सकती है  और सोशल मीडिया की पॉवर इतनी है की आपको आपके परिवार के साथ रहते हुए भी उनसे दूर कर सकती है .

इससे कोई नहीं बच पाया है आदमी से औरत तक,बच्चे से बूढ़े तक,हर जाति ,हर देश, इस मानव निर्मित दुनिया में खोते से जा रहे हैं.हम दिन में 100 से 200 बार phone उठा रहे है .उठते- बैठते ,खाते- पीते,आते -जाते ,सोते -जागते बस mobile ,mobile, सोशल मीडिया ,mobile .खुद के लिए तो हम टाइम निकालना ही भूल गएँ है. ,आज की तारीख में खाने से ज्यादा जरूरी हो गयी है इन्टरनेट कनेक्टिविटी.

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कोई मर रहा है तो video ,कोई किसी को मार रहा है तो video ,कोई गाडी चला रहा है तो वीडियो.  हम इस इन्टरनेट के चक्कर में कितने नकली से हो गये हैं . एक दिन को अगर internet बन्द हो जाता है तो लगता है की न जाने हमारा क्या खो   गया .कितने likes ,कितने share ,कितने comment बस इन्ही की गिनती कर रहे है हम .अपनी असली कीमत को तो हम भूलते ही जा रहे हैं.

एजुकेशन की जगह एंटरटेनमेंट का नशा हो गया है. क्या आप जानते हैं की सीखने वालों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है ये इन्टरनेट और वहीँ टाइम पास करने वालों के लिए किसी शराब की लत से कम नहीं है इन्टरनेट.

गेम्स के राउंड पूरे करके लोग एक सफलता का अनुभव करते है पर मैं आपको बता दूं की वास्तविक जीवन के लक्ष्य पूरे करने पर जो सफलता मिलेगी उसका अनुभव अलग ही होगा .

इन्टरनेट एक अच्छा गुरु है इससे एक सवाल करो तो 1 सेकंड से कम में भी जवाब देता है. ये जो इन्टरनेट है ये चीज़ हमें सिखाने के लिए बनी है,हमें एक बेहतर इंसान बनाने के लिए ही बनी है ,किसी दूर बैठे को पास लाने के लिए बनी है,इस दुनिया में क्या हो रहा है ये बताने के लिए बनी है.

पर क्या करें हम है तो इंसान ही ना ,किसी अच्छी  चीज़ की हम इतनी अति कर देते हैं की वो चीज़ हमारे लिए बुरी हो जाती  है. वही हो रहा है इन्टरनेट के साथ ,वही हो रहा है mobile के साथ ,वही हो रहा है सोशल मीडिया के साथ .

हम हर वक़्त अपने mobile से चिपके रहते हैं .mobile के बिना हम घर से बाहर  कदम नहीं निकालते. एक भी मेसेज ,एक भी नोटीफिकेशन को जाया नहीं जाने देते हर वक़्त चेक एंड रिप्लाई चलता रहता है. हद तो तब हो जाती है जब हम खुद के साथ- साथ अपने बच्चो को भी इसकी चपेट में ले आते है. हम खुद में इतना ज्यादा मशरूफ हो जाते है है की हमारे पास अपने बच्चो  से बात करने तक का समय नहीं रहता और हम उन्हें mobile में इन्टरनेट कनेक्ट करके दे देते है ताकि वो हमें परेशान न करें .

बच्चों  को व्यस्त  रखने का ये तरीका कहीं आपके बच्चे को आपसे दूर न कर दे. हाल ही में किये गए एक शोध के मुताबिक डिजिटल उपकरणों के अधिक उपयोग से बड़ों से लेकर बच्चो तक में  आंखों की रोशनी कम होना , आंखें खराब होना , सिर दर्द, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई जैसे लक्षण पाए गए  है.

क्या आप जानते है की इन्टरनेट पर गेम खेलने की वजह से बच्चों  के अन्दर मनोवैज्ञानिक बीमारियाँ भी आ रही है .इन्टरनेट पर गेम खेलने से रोकने पर बच्चे घबराहट महसूस करते है.

अगर आपके  बच्चे में  बेवज़ह गुस्सा करना या चिडचिडाना ,ज्यादातर अकेले रहने की आदत  या हर वक़्त ऑनलाइन रहने की आदत है तो यह इन्टरनेट एडिक्शन की निशानी है. ज्यादातर बच्चे super- heroes को अपना ideal  मानते है और उनसे एक जुडाव महसूस करते हैं. super- heroes के साथ जुडी बच्चों की दीवानगी जानलेवा भी साबित हो सकती है.

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भारत ने इन्टरनेट इस्तेमाल करने के मामले में अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है.एक अनुमान के हिसाब से सन 2021  में भारत में इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगभग 73 करोड़ होगी .ऐसे में इस देश के भविष्य (बच्चों)  को इस लत से बचाना होगा वरना इसका नतीजा बहुत भायानक होगा.

समझदार बनिए , इस इन्टरनेट के नौकर नहीं बल्कि मालिक बनिए  .ये आपको  use  न करे, आप  इसे use  करें .अपने परिवार के साथ ,अपने दोस्तों के साथ कीमती समय व्यतीत करें . Emoji के साथ- साथ लाइफ के real इमोशन भी फील करिए.फिर महसूस करिए की ये दुनिया कितनी खूबसूरत है.

बेईमानी की जय

महाराष्ट्र का राजनीतिक तमाशा आमतौर पर रसोई, पति और बच्चों में बिजी औरतों के सिर से गुजर जाता है पर यह पक्का है कि दिल्ली के पौल्यूशन की तरह यह हरेक को बराबर परेशान करता है. औरतें सोचती रहें कि हमें इस गंदी राजनीति से क्या लेनादेना पर असली कीमत तो वही चुकाती हैं.

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई देश की व्यावसायिक प्रौसपैरिटी में नंबर एक है. न सिर्फ वहीं सब से ज्यादा पैसा है, वहीं से टीवी चैनल्स चलते हैं, वहीं से हिंदी फिल्मों की बाढ़ आती है और जो नाटक विधायक कर रहे हैं वह इन परदे की कथाओं में भी आता है, उस के टिकट के पैसे भी उन के पतियों और बेटेबेटियों की जेबों से जाते हैं.

जब भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना ने अलग पार्टियों की तरह विधान सभा का चुनाव लड़ा था तो शिव सेना को आजादी थी कि वह परिणामों के बाद अपनी मरजी की पार्टियों के साथ सरकार बनाए.

सास की तरह केंद्र सरकार की कठपुतली राज्यपाल को ननद की शक्ल में बेटेबहू में दरार डालने की कोशिश करने और झगड़ा कराने की जरूरत न थी. यहां तो ननद की शक्ल में राज्यपाल ने बच्चों में भी झगड़ा करा दिया.

यह साफ संदेश दे दिया गया है कि जब राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, राज्यपाल, पार्टियों के नंबर 2 नेता सारे वादे, कसमों को तोड़ कर अपना उल्लू सीधा करने के लिए रोज पैतरे बदल सकते हैं तो घरों में सास, देवरानी, ननद, पड़ोसिनें और कामवालियां क्यों नहीं? किसी को अपने वादे पर टिकने की जरूरत नहीं. किसी पर भरोसा नहीं करा जा सकता.

अगर औरतों के पति घर में एक से दुलार करें और बाहर दूसरी से तो इस में हरज क्या है? जब संविधान को तोड़मरोड़ कर फेंका जा सकता है तो विवाह के वादों

या रेस्तरां में किए गए प्रोपोज को क्यों नहीं तोड़ा जा सकता? यह तो हमारे आका सिखा रहे हैं. ऐसे आका जो कहते हैं कि वे धर्मपुराणों से सीख कर ही काम करते हैं.

जय यह व जय वह के साथ जय बेईमानी, जय धोखा, जय फरेब भी आप की जम कर परोसा जा रहा है.

सर्दियों में बड़े काम का है गाजर

सर्दियों में गाजर सेहतमंद सब्जियों के श्रेणी में आता है , गाजर कंद प्रजाति की एक सब्जी है. गाजर विटामिन बी का अच्छा सोर्स है. इसके अलावा, इसमें ए, सी, डी, के, बी-1 और बी-6 काफी क्वॉन्टिटी में पाया जाता है. इसमें नैचरल शुगर पाया जाता है, जो सर्दी के मौसम में शरीर को ठंड से बचाता है. इस मौसम में होने वाले नाक, कान, गले के इन्फेक्शन और साइनस जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए गाजर या इससे बनी चीजों का सेवन फायदेमंद साबित होता है. यह सब्जी सलाद, अचार आदि बनाकर उपयोग की जाती है. आप इसे सलाद के तौर पर खाएं या गाजर का हलवा बनाकर, दोनों ही फायदेमंद है.

आयुर्वेद के अनुसार गाजर स्वाद में मधुर, गुणों में तीक्ष्ण, कफ और रक्तपित्त को नष्ट करने वाली है. इसमें पीले रंग का कैरोटीन नामक तत्व विटामिन ए बनाता है. हां, अगर कैलरीज से बचना चाहती हैं, तो गाजर का हलवा अवॉइड करें. 100 ग्राम गाजर में 0.9 प्रोटीन, 10.6 कैलरीज, 80 मिलीग्राम कैल्शियम, 0.03 मिलीग्राम आयरन पा सकते हैं. गाजर नेत्र ज्योति बढ़ाने वाली एक सर्वोत्तम जड़ है. इसे खाने से जबड़ों का व्यायाम हो जाता है. यह पेट साफ करती है रक्त बढ़ाती व शुध्द करती है. इसका हल्का चरपरापन रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाती है. शोध में इसमें हृदय उपचारक गुण पाए गए हैं. गाजर रक्त में खराब कोलेस्ट्राल का स्तर कम करती है. यह पेट के सभी रोगों में लाभ पहुंचाती है. यह कंद होकर भी लाभ फलों के समान पहुंचाती है. आईये एक नजर डालते है गाजर के औषधीय गुणों पर : –

-निम्न रक्तचाप के रोगियों को गाजर के रस में शहद मिलाकर लेना चाहिए. रक्तचाप सामान्य होने लगेगा.

-गाजर का रस, टमाटर का रस, संतरे का रस और चुकंदर का रस लगभग पच्चीस ग्राम की मात्रा में रोजाना दो माह तक लेने से चेहरे के मुँहासे, दाग, झाइयाँ आदि मिट जाते हैं.

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-पथरी की शिकायत में गाजर, चकुंदर और ककड़ी का रस समान मात्रा में लें.

-गाजर का सेवन उदर रोग, पित्त, कफ एवं कब्ज का नाश करता है. यह आँतों में जमा मल को तीव्रता से साफ करती है.

-गाजर को उबालकर रस निकाल लें. इसे ठंडा करके 1 कप रस में 1 चम्मच शहद मिलाकर पीने से सीने में उठने वाला दर्द मिट जाता है.

-बच्चों को कच्ची गाजर खिलाने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं.

-गाजर का नित्य सेवन रक्त की कमी को दूर कर रक्त में लौह तत्वों की मात्रा को बढ़ाता है.

-गाजर पीसकर आग पर सेंककर इसकी पुल्टिस बनाकर बाँधने से फोड़े ठीक हो जाते हैं.

-गाजर का अचार तिल्ली रोग को नष्ट करता है.

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-आग से त्वचा जल गई हो तो कच्ची गाजर को पीसकर लगाने से तुरंत लाभ होता है और जले हुए स्थान पर ठंडक पड़ जाती है.

-दिमाग को मजबूत बनाने के लिए गाजर का मुरब्बा प्रतिदिन सुबह लें.

-अनिद्रा रोग में प्रतिदिन सुबह-शाम एक कप गाजर का रस लें.

होंठो को मुस्कुराने दें

आपके होंठ आपकी स्किन से 3 गुना नाजुक होते हैं, इसलिए सर्दियों में आपकी स्किन से ज्यादा आपके होंठ रूखे और बेजान हो जाते हैं. कई बार तो उनका रूखापन इतना बढ़ जाता है कि उनसे खून निकलने लगता है. होंठों के ज्यादा फटने के कारण उनमें दर्द भी होने लगता है. ऐसे में उनकी खूबसूरती के साथ-साथ मुसकान भी कहीं गायब सी हो जाती है.सर्दियों में होंठों की खूबसूरती बरकरार रखने के लिए यूं तो बाजार में कई ब्रैंड के लिप बाम मौजूद हैं पर हिमालया लिप बाम के इस्तेमाल से होंठों को रूखेपन से बचा सकती हैं.

क्यों है फायदेमंद

– हिमालया लिप बाम 100% हर्बल एक्टिव्स से बना है. इसमें मौजूद व्हीट जर्म और कैरट सीड ऑयल होंठों को ड्राई होने से बचाता है.

– व्हीट जर्म ऑयल में विटामिन ई की मात्रा अधिक होती है, जो होंठों की चमक को बरकरार रखने के साथ-साथ स्किन को पोषण भी प्रदान करती है और नमी को भी बरकरार रखती है. इससे होंठों की कंडीशनिंग भी हो जाती है और होंठ नर्म दिखने लगते हैं.

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– कैरट सीड ऑयल में बीटाकैरोटिन के रूप में विटामिन ए की मात्रा ज्यादा होती है, जो होंठों में टिशू ग्रोथ को बढ़ाने का काम करती है. विटामिन ए स्किन को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाता है. इसके इस्तेमाल से होंठ हमेशा हैल्दी नजर आएंगे. कैरट ऐंटीऑक्सीडैंट का अच्छा स्रोत है. इससे स्किन जवान नजर आती है. कैरेट सीड ऑयल स्किन के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है. यह होंठों की रंगत को भी निखारता है. इस ऑयल में ऐंटी फंगल और ऐंटीबैक्टीरियल तत्त्व होते हैं, जिनसे स्किन इन्फैक्शन होने का खतरा भी नहीं होता.

– हिमालया लिप बाम में ऐंटीऑक्सीडैंट के साथ नैचुरल ऐक्टिव्स प्रचुर मात्रा में होने के कारण यह होंठों पर वातावरण का प्रतिकूल असर नहीं पड़ने देता.

– यह सर्दियों में शुष्क हवा से होंठों को बचाता है और होंठों पर मॉइस्चर को बैलेंस रखने का काम करता है.

कैसे करें इस्तेमाल

– हिमालया लिप बाम की पतली लेयर को होंठों पर लगा कर अच्छी तरह मिला लें. यह काफी देर तक होंठों पर नमी बनाए रखता है.

– इसे आप पूरे दिन में कितनी भी बार इस्तेमाल कर सकती हैं.- हिमालया लिप बाम फटे और रूखे होंठों के लिए बहुत उपयोगी है.

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क्या आप भी इसी तरह अपने साथी का हाथ पकड़ती हैं

जब आप रिलेशनशिप में होते हैं तो हर कोई चाहता है कि वह अपने पार्टनर के साथ हाथों में हाथ डालकर कुछ समय बिताए और उन पलों को यादगार बनाए. हाथ थामना आपके रिलेशनशिप के प्यार को दर्शाता हैं.

जी हां, आपके हाथ पकड़ने के अंदाज से आपकी रिलेशनशिप की मजबूती और आपसी प्यार का पता चलता हैं. आज हम आपको यहीं बताने जा रहे हैं कि किस तरह से हाथ पकड़ने के स्टाइल से आपकी रिलेशनशिप के बारे में बताया जा सकता हैं.

इंटरलौक फिंगर

इस तरह से हाथ पकड़ने का स्टाइल दर्शाता है कि दोनों हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े हैं. अगर हाथ पकड़ने में हिचकिचाएं तो समझ लें कि दोनों एक-दूसरे को ज्यादा अहमियत नहीं दे रहे.

हाथ खींचना

अगर कोई पार्टनर दूसरे का हाथ पकड़ एक खींचता है तो इसका मतलब वे आप पर कंट्रोल करने के बारे में सोच रहा है. ऐसा रिश्ते में गलतफहमी होने का संकेत देता है.

सिर्फ एक अंगुली पकड़ना

कई बार हम देखते हैं कि कुछ पार्टनर एक-दूसरे का हाथ पकड़ने की बजाए सिर्फ अंगुली ही पकड़ते हैं. इस तरीके से अंगुली पकड़ने का मतलब है कि दोनों एक-दूसरे की प्राइवेसी का पूरा ख्याल रखने की कोशिश करते हैं. रिश्ते में किसी भी तरह की घुटन महसूस होने देना चाहते.

हाथ न पकड़ना

कुछ लोग अपने रिश्ते का दिखावा दिखाना पसंद नहीं करते. इस तरह के व्यवहार की वजह अनदेखी करना भी होता है.

लिंक्ड आर्म्स

लिंक्ड आर्म्स यानि हाथ में हाथ डालकर चलना. कुछ पार्टनर एक-दूसरे की इतना फिक्र करते हैं कि हाथ पकड़ कर ही चलते हैं. यह रिश्ते में असुरक्षित होने की भावना महसूस करवाता है. ऐसा भी कहा जा सकता है कि उनकी असुरक्षा की वजह है कि रिश्ते में कुछ गड़बड़ी चल रही है.

छोटी सरदारनी: लोहड़ी सेलिब्रेशन के दौरान मेहर को पता चलेगी परम की ये बात

कलर्स के शो छोटी सरदारनी में 2 महीने का लीप आ गया है, जिसके बाद परम के दस्तरबंदी और लोहरी सेलिब्रेशन के कारण गिल परिवार में खुशियों का माहौल है. वहीं मेहर भी अपने होने वाले बच्चे के साथ अपनी इस नई जिंदगी में खुश है, लेकिन क्या ये खुशियां बनीं रहेंगी. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…

मेहर और हरलीन के बीच बढ़ रही हैं दूरियां

अब तक आपने देखा कि हरलीन दस्तरबंदी सेलिब्रेशन के लिए परम को पगड़ी पहनाने की कोशिश करती है, लेकिन परम पग पहनने से इंकार कर देता है. इस बात से हरलीन अपनी सास और ननद के सामने अपमानित महसूस करती है और सोचती है कि इन सबके लिए मेहर जिम्मेदार है.

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लोहरी सेलिब्रेशन में सरब देता है मेहर को गिफ्ट

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मेहर और सरब की दोस्ती गहरी हो रही है. वहीं सरब, मेहर को पायल गिफ्ट करता है और फिर मेहर से सरब अपना गिफ्ट मांगता है. मेहर कहती है कि सरब जो मांगना चाहे मांग ले, मेहर उसकी हर ख्वाहिश पूरी करेगी. इस बात पर सरब, मेहर से उसके साथ सात जन्मों का साथ मांगता है.

मेहर को पता चलेगी परम की ये बात

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सेलिब्रेशन के दौरान, मेहर देखती है कि परम गायब है. मेहर परम को वौशरूम से बाहर निकलते हुए देखती है, जहां वह फ्लश करना भूल जाता है. यहां मेहर देखती है कि परम का यूरीन पीला है और उसमें खून भी आ रहा है. ये देखकर मेहर बुरी तरह घबरा जाती है.

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अब देखना ये है कि आखिर क्या हुआ है परम को? क्या मेहर और सरब की जिंदगी में आने वाला है कोई बड़ा तूफान? जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, रात 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

मां जल्दी आना: भाग-3

‘‘कहां हो भाई खानावाना मिलेगा… 9 बजने जा रहे हैं.’’ मैं ने अपने खुले बालों का जूड़ा बनाया और फटाफट किचन में जा पहुंची. देखा तो मां ने रात के डिनर की पूरी तैयारी कर ही दी थी बस केवल परांठे बनाने शेष थे. मैं ने फुर्ती से गैस जलाई और सब को गरमागरम परांठे खिलाए. सारे काम समाप्त कर के मैं अपने बैडरूम में आ गई. अमन तो लेटते ही खर्राटे लेने लगे थे पर मैं तो अभी अपने विगत से ही बाहर नहीं आ पाई थी. आज भी वह दिन मुझे याद है जब मां को देखने गई मैं वापस मां को अपने साथ ले कर लौटी थी. मुझे एअरपोर्ट पर लेने आए अमन ने मां के आने पर उत्साह नहीं दिखाया था बल्कि घर आ कर तल्ख स्वर में बोले,’’ ये सब क्या है विनू मुझ से बिना पूछे इतना बड़ा निर्णय तुम ने कैसे ले लिया.

‘‘कैसे मतलब… अपनी मां को अपने साथ लाने के लिए मुझे तुम से परमीशन लेनी पड़ेगी.’’ मैं ने भी कुछ व्यंग्यात्मक स्वर में उतर दिया था.

‘‘क्यों अब क्यों नहीं ले गया इन का सगा बेटा इन्हें अपने साथ जिस के लिए इन्होंने बेटी तो क्या दामादों तक को सदैव नजरंदाज किया.’’

‘‘अमन आखिर वे मेरी मां हैं… वह नहीं ले गया तभी तो मैं ले कर आई हूं. मां हैं वो मेरी ऐसे ही तो नहीं छोड़ दूंगी.’’ मेरी बात सुन कर अमन चुप तो हो गए पर कहीं न कहीं अपनी बातों से मुझे जता गए कि मां का यहां लाना उन्हें जंचा नहीं. इस के बाद मेरी असली परीक्षा प्रारंभ हो गई थी. अपने 20 साल के वैवाहिक जीवन में मैं ने अमन का जो रूप आज तक नहीं देखा था वह अब मेरे सामने आ रहा था.

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घर आ कर सब से बड़ा यक्षप्रश्न था हमारे 2 बैडरूम के घर में मां को ठहराने का. 10 वर्षीय बेटी अवनि के रूम में मां का सामान रखा तो अवनि एकदम बिदक गई. अपने कमरे में साम्राज्ञी की भांति अब तक एकछत्र राज करती आई अवनि नानी के साथ कमरा शेयर करने को तैयार नहीं थी. बड़ी मुश्किल से मैं ने उसे समझाया तब कहीं मानी पर रात को तो अपना तकिया और चादर ले कर उस ने हमारे बैड पर ही अपने पैर पसार लिए कि ‘‘आज तो मैं आप लोगों के साथ सोउंगी भले ही कल से नानी के साथ सो जाउंगी.’’

पर जैसे ही अमन सोने के लिए कमरे में आए तो अवनि को बैडरूम में देख कर चौंक गए.

‘‘लो अब प्राइवेसी भी नहीं रही.’’

‘‘आज के लिए थोड़ा एडजस्ट कर लो कल से तो अवनि नानी के साथ ही सोएगी.’’ मैं ने दबी आवाज में कहा कि कहीं मां न सुन लें.

‘‘एडजस्ट ही तो करना है, और कर भी क्या सकते हैं.’’ अमन ने कुछ इस अंदाज में कहा मानो जो हो रहा है वह उन्हें लेशमात्र भी पसंद नहीं आ रहा पर उन्हें इग्नोर करने के अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था. मां को सुबह जल्दी उठने की आदत रही है सो सुबह 5 बजे उठ कर उन्होंने किचन में बर्तन खड़खड़ाने प्रारंभ कर दिए थे. मैं मुंह के ऊपर से चादर तान कर सब कुछ अनसुना करने का प्रयास करने लगी. अभी मेरी फिर से आंख लगी ही थी कि अमन की आवाज मेरे कानों में पड़ी.

‘‘विनू ये मम्मी की घंटी की आवाज बंद कराओ मैं सो नहीं पा रहा हूं.’’ मैं ने लपक कर मुंह से चादर हटाई तो मां की मंदिर की घंटी की आवाज मेरे कानों में भी शोर मचाने लगी. सुबह के सर्दी भरे दिनों में भी मैं रजाई में से बाहर आई और किसी तरह मां की घंटी की आवाज को शांत किया. जब से मां आईं मेरे लिए हर दिन एक नई चुनौती ले कर आता. 2 दिन बाद रात को जैसे ही मैं सोने की तैयारी कर रही थी कि अवनि ने पिनपिनाते हुए बैडरूम में प्रवेश किया.

‘‘मम्मी मैं नानी के पास तो नहीं सो सकती, वे इतने खर्राटे लेती हैं कि

मैं सो ही नहीं पाती.’’ और वह रजाई तान कर सो गई. अमन का रात का कुछ प्लान था जो पूरी तरह चौपट हो गया था और वे मुझे घूरते हुए करवट ले कर सो गए थे बस मेरी आंखों में नींद नहीं थी. अगले दिन अमन को जल्दी औफिस जाना था पर जैसे ही वे सुबह उठे तो बाथरूम पर मां का कब्जा था उन्हें सुबह जल्दी नहाने का आदत जो थी. बाथरूम बंद देख कर अमन अपना आपा खो बैठे.

‘‘विनू मैं लेट हो जाऊंगा मम्मी से कहो हमारे औफिस जाने के बाद नहाया करें उन्हें कौन सा औफिस जाना है.’’

‘‘अरे औफिस नहीं जाना है तो क्या हुआ बेटा चाय तो पीनी है न और तुम जानते हो कि मैं बिना नहाए चाय भी नहीं पीती.’’ मां ने बाथरूम से बाहर निकल कर सफाई देते हुए कहा. जिंदगीभर अपनी शर्तों पर जीतीं आईं मां के लिए स्वयं को बदलना बहुत मुश्किल था और अमन मेरे साथ कोऔपरेट करने को तैयार नहीं थे. इस सब के बीच मैं खुद को तो भूल ही गई थी. किसी तरह तैयार हो कर लेटलतीफ बैंक पहुंचती और शाम को बैंक से निकलते समय दिमाग में बस घर की समस्याएं ही घूमतीं. इस से मेरा काम भी प्रभावित होने लगा था. मेरी हालत ज्यादा दिनों तक बैंक मैनेजर से छुपी नहीं रह सकी और एक दिन मैनेजर ने मुझे अपने केबिन में बुला ही भेजा.

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‘‘बैठो विनीता क्या बात है पिछले कुछ दिनों से देख रही हूं तुम कुछ परेशान सी लग रही हो. यदि कोई ऐसी समस्या है जिस में मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं तो बताओ. अपने काम में सदैव परफैक्शन को इंपोर्टैंस देने वाली विनीता के काम में अब खामियां आ रही हैं इसीलिए मैं ने तुम्हें बुलाया.’’

‘‘नहीं मैम ऐसी कोई बात नहीं है बस कुछ दिनों से तबियत ठीक नहीं चल रही है. सौरी अब मैं आगे से ध्यान रखूंगी.’’ कह कर मैं मैडम के केबिन से बाहर आ गई. क्या कहूं मैडम से कि बेटियां कितनी भी पढ़ लिख लें, आत्मनिर्भर हो जाएं पर अपने मातापिता को अपने साथ रखने या उन की जिम्मेदारी उठाने के लिए पति का मुंह ही देखना पड़ता है.

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नए साल में और अधिक अच्छा काम करने की इच्छा रखती हूं – तृप्ति टोडरमल   

मराठी फिल्म और नाटक ‘सविता दामोदर परांजपे’ फिल्म से चर्चा में आने वाली निर्माता और मराठी अभिनेत्री तृप्ति टोडरमल मुंबई की है. उसके पिता मधुकर टोडरमल भी जाने – माने अभिनेता और लेखक थे. बचपन से ही तृप्ति को कला का माहौल मिला है और आज इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को देती है, जिन्होंने हमेशा उसे हर काम में साथ देने के अलावा आज़ादी भी दी है. तृप्ति अपने इस कामयाब जिंदगी से बहुत खुश है और उन्होंने इसे शेयर किया है ख़ास गृहशोभिका के लिए, पेश है कुछ अंश.

सवाल-इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा कैसे मिली?

मेरे पिता मराठी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े रहने की वजह से बचपन से ही मुझे ये माहौल मिला है. वे इस इंडस्ट्री के पायोनियर माने जाते थे, ऐसे में कुछ और सोचना संभव नहीं था. इसके अलावा जॉन अब्राहम मेरा अच्छा दोस्त है और उन्हें एक मराठी फिल्म बनानी थी,जिसमें उन्होंने मुझे ही प्रोड्यूस करने के साथ-साथ अभिनय करने को कहा और मैंने किया. ये फिल्म ‘सविता दामोदर परांजपे’ थी और यही से मेरी जर्नी शुरू हो गयी. इसके बाद मैंने कई फिल्में मराठी में की है.

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सवाल-क्या बचपन से कला का माहौल होने के बावजूद भी आपने किसी प्रकार का प्रशिक्षण अभिनय के लिए लिया?

अभिनय मेरे खून में है और मुझे इसका पैशन है, जो मुझे मेरे पिता से ही मिला है.मैंने किसी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं लिया. सविता की भूमिका को निभाने के लिए मैंने निर्देशक का सहारा लिया. असल में ये रीमा लागू की एक नाटक थी, जो मुझे बहुत पसंद थी. इसमें मेरी भूमिका स्प्लिट पर्सनालिटी की थी. ये एक सच्ची कहानी थी. इसे ही मैंने फिल्म बनाने की सोची. उसके लिए मैंने खुद बहुत ट्रेनिंग ली ,क्योंकि इसमें मुझे दो भूमिका निभानी थी. आवाज पर भी मुझे बहुत काम करना था. मैंने इसकी राईट ली थी. मेहनत बहुत थी, 6 महीने तक मैं बाहर नहीं निकली थी. ये एक थ्रिलर फिल्म थी. अलग वोकल पर बहुत काम किया. लेखक ने इसमें बहुत सहयोग दिया. सॉफ्ट वाला चरित्र आसान था और वह मैं हूं. उसके साथ मेरा लगाव बहुत हो गया था.

सवाल-इंटेंस चरित्र से निकलना कितना मुश्किल होता है?

बहुत मुश्किल होता है. भावनात्मक जुड़ाव बहुत अधिक हो जाता है. उससे निकलना पड़ता है और इसे मैंने अब सीख लिया है.

सवाल-आपकी जर्नी कैसी रही?

मैं अपने चरित्र को लेकर बहुत चूजी हूं,क्योंकि पहली फिल्म में मैंने मुख्य भूमिका निभाई और बहुत सारे अवार्ड मिले. दर्शकों ने इसे पसंद भी किया. इसके बाद मैंने बहुत सारी फिल्मों को मना भी किया. मुझे ऐतिहासिक चरित्र निभाना बहुत पसंद है. मेरी मराठी फिल्म ‘फत्ते शिकस्त’ में मैंने एक योद्धा की भूमिका निभाई है, जो मेरे लिए चुनौतीपूर्ण थी. उसके लिए मैंने घुड़सवारी और तलवार चलाना सीखा है. इससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. इसके अलावा सोहैल खान के साथ एक वेब शो हिंदी में कर रही हूं. उसमें भी मेरी मुख्य भूमिका है. इसके अलावा ‘जंग जौहर’ में भी अभिनय करने वाली हूं.

सवाल-अभी आपकी संघर्ष क्या रहती है?

एक कलाकार हमेशा आगे अच्छा काम करने की इच्छा रखता है. किसी चरित्र को ना कहना हाँ कहने से आसान होता है. हाँ करने के बाद जर्नी उस फिल्म के साथ शुरू हो जाती है, ऐसे में आपको पिछले फिल्म से अच्छा करने की चुनौती रहती है. अवार्ड है तो आशाएं अधिक हो जाती है. ये प्रतियोगिता खुद से ही होता है. ये लगातार अंदर से चलता रहता है और यही सोच उसे आगे ले जाती है अगर किसी ने ये समझ लिया है कि वह परफेक्ट है तो उसकी ग्रोथ रुक जाती है. मैं बहुत मेहनती हूं. सोशल मीडिया पर मुझे कोई रूचि नहीं. पर्सनल लाइफ को शेयर करना पसंद नहीं. मैं एक प्राइवेट पर्सन हूं और अभिनय को जॉब समझती हूं.

सवाल-पिता की किस सीख को जीवन में उतरती है?

मेरे माता-पिता दोनों अब नहीं रहे. पहली फिल्म के रिलीज से पहले ही पिता की तबियत ख़राब हो गयी थी,लेकिन उन्होंने रिलीज से पहले उस फिल्म को देखा और मुझे आशीर्वाद दिया था, जिसका फल मुझे आज मिल रहा है. माँ ने मेरी जर्नी थोड़ी देखी है. एक साल बाद उनकी भी मृत्यु हो गयी. मैं उनके आदर्शों को हमेशा फोलो करती हूं.

सवाल-निर्माता और अभिनेत्री में किसे अधिक एन्जॉय करती है?

मुझे अभिनय करना पसंद है, क्योंकि उसमें अधिक सोचना नहीं पड़ता और रात को आप अच्छी नीद ले सकते है, जबकि निर्माता बनने पर आपको फिल्म की पूरी जिम्मेदारी लेनी पड़ती है और ये एक बच्चे को पालने के जैसा होता है.

सवाल-क्या कोई ड्रीम प्रोजेक्ट है?

मुझे संजय लीला भंसाली की फिल्म करने की इच्छा है. वे बहुत अच्छा काम करते है. भूमिका मैं मराठी ‘तारा रानी’ की करना चाहती हूं, जो एक योद्धा थी. इसके अलावा एक लिजेंड्री एक्ट्रेस की भूमिका करना चाहती हूं.

सवाल-कितनी फूडी है और फैशन कितना पसंद करती है?

मुझे हर तरह के व्यंजन पसंद है. सबकुछ खाती हूं, किसी प्रकार की डाइटिंग नहीं करती. मैं हर तरह की खाना बना लेती हूं. फैशन में मुझे ब्रांडेड और क्लासी कपड़े अधिक पसंद है. निवेदिता साबू और मनीष मल्होत्रा के कपड़े मैं अधिक पहनती हूं.

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सवाल-नए साल में क्या संकल्प है?

मुझे अच्छा काम करने की इच्छा है, ताकि मैं अपने पिता के नाम को आगे ले जा सकूँ.

सवाल-गृहशोभिका के जरिये क्या संदेश देना चाहती है?

नए साल में महिलाओं को सम्मान करना सीखे. उनका अपमान करना बंद करें.

हीरो से ज्यादा एक्टर बनने की जरुरत है – सनी सिंह

फिल्म ‘प्यार का पंचनामा 2’ से अभिनय कैरियर में चर्चित होने वाले सनी सिंह, एक्शन डायरेक्टर जय सिंह निज्जर के बेटे है. बचपन से ही उन्हें कला का माहौल मिला है इसलिए इससे परे उन्होंने कुछ नहीं सोचा. उन्हें कॉमेडी फिल्में बहुत पसंद है और कई ऐसी फिल्में कर चुके है. टीवी पर भी उन्होंने काम किया है. उनकी फिल्म ‘जय मम्मी जी’ में वे कार्तिक भाटिया की भूमिका निभा रहे है, शांत और खुश मिजाज़ सनी सिंह से हुई बातचीत के कुछ अंश इस प्रकार है.

सवाल-इस फिल्म का आकर्षण आपके लिए क्या थी?

इस फिल्म में मम्मी मेरे लिए ख़ास थी, क्योंकि कई कॉमेडी की फिल्में बनती है,पर ये फिल्म कई मम्मियों को केंद्र में रखकर बनायीं गयी पहली फिल्म है. शूट करते हुए और माँ को बताते हुए बहुत मज़ा आया. मैं माँ की डांट को हमेशा यहाँ पर मिस करता हूं. नहीं डांटे तो खाली-खाली लगता है. ये सब इस फिल्म में है और यही मुझे अच्छा लगा था.

सवाल-रियल लाइफ में आप मम्मास बॉय कितने है और कितनी डांट सुननी पड़ती है?

जब डांटती है तो हर कोई हिल जाता है, मेरी दो बहने बड़ी है. मैं सबसे छोटा हूं. इसलिए पैमपर्ड चाइल्ड हूं. परीक्षा में फेल होने पर भी अधिक नहीं डांटती थी, लेकिन कई बार कुछ गलत करने पर बहुत गुस्सा हो जाती थी, पर मैं मना तो लेता हूं. माँ से मैं हर बात शेयर करता हूं, कॉलेज में कई बार लड़कियों की चिट्ठियां आने पर मुझे डांटती थी पर अपनी सहेलियों को बताकर खुश होती थी. मुझे प्यार और शादी उस लड़की से करनी है जो अपने माता-पिता से प्यार करें और रूटेड हो.

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सवाल-आपके भविष्य में मां की भूमिका कितनी है? इस बारें में आपकी सोच क्या है?

उसे कह पाना मुश्किल है. उनसे ही मेरा संसार है, एक माँ बिना शर्तों के बच्चे से प्यार करती है. बचपन में मैं बहुत शरारती था. पहले कुछ कहने पर वे मना करती थी पर बाद में हां कर देती थी. मैं कितनी भी व्यस्त रहूं, माँ को समय हर दिन देता हूं. मैंने उनके लिए एक ट्रोफी बनाकर दी है, क्योंकि वह मेरी बेस्ट माँ है. वह घरेलू माँ है, इसलिए मैं कभी-कभी उन्हें कुछ अच्छी सरप्राइज गिफ्ट भी देता हूं. समय मिलने पर फिल्में देखने या घूमने भी साथ में जाता हूं.

सवाल-आप अपनी जर्नी को कैसे देखते है?

मुझे लगता है कि मैंने कई फिल्में की है और कर भी रहा हूं, इतना काम मेरे लिए काफी है और मैं संतुष्ट हूं. फिल्मों के हिट होने या फ्लॉप होने से मैं अधिक समबन्ध नहीं रखता.मैंने मेहनत की है और फिल्म सफल होनी चाहिए. हर सफल कलाकार फ्लॉप फिल्में देता है. वह किये बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते, क्योंकि फैल्योर आपको जिंदगी के बारें में बताती है और उससे आप बहुत कुछ सीखते है. काम करना कभी बंद नहीं करना चाहिए, इससे उसका फल अवश्य मिलता है. काम के लिए अधिक सोचने की जरुरत होती है. काम के बाद का समय मेरे परिवार के लिए होता है.

सवाल-किसी फिल्म को चुनते समय किस बात का खास ध्यान रखते है?

मैं कभी भी अधिक नहीं सोचता.स्क्रिप्ट पढने के बाद अगर अच्छी लगती है तो मैं निर्देशक के बारें में भी नहीं सोचता. प्रोड्यूसर के बारें में अधिक सोचता हूं, क्योंकि वही फिल्म को अच्छी तरह से पर्दे पर लाने की कोशिश करता है. हीरो से अधिक एक्टर बनना अधिक जरुरी है. मैं अच्छा काम करने की इच्छा रखता हूं.

सवाल-फिल्मों के सफल होने की वजह क्या मानते है?

निर्देशक और कहानी ये दोनों चीजे सबसे पहले आती है, इसके बाद कलाकार की बारी आती है. मेरी पहली फिल्म में निर्देशक ने सभी नए कलाकारों को मौका दिया ये बड़ी बात थी, लेकिन फिल्म सफल रही और सभी अच्छा काम कर रहे है. मेरे पिता जय सिंह निज्जर एक एक्शन डायरेक्टर है. उनके साथ भी एक फिल्म मैंने की थी, जो नहीं चल पायी. उनके सेट पर मैं बहुत कम जाता था.

सवाल-क्या पिता की वजह से इंडस्ट्री में काम मिलना आसान हुआ?

मैं काफी लोगों को जानता था, क्योंकि पार्टी में लोग आते थे. बचपन में मैंने देखा है, पर मुझे एक्टिंग करना है, उसकी तैयारी मुझे करनी पड़ी. मैं असफलता को अधिक महत्व नहीं देता. एक फिल्म का मिलना ही मेरे लिए बड़ी बात है. मैं छोटी भूमिका भी अच्छी हो, तो करने के लिए मना नहीं करता. डिजिटल पर भी काम करने की इच्छा रखता हूं.

सवाल-क्या पिता से एक्शन की तकनीक सीखी है?

मैंने अधिक नहीं सीखा है, वे ज्योही कुछ सीखाने की कोशिश करते थे मैं कुछ बहाना बना देता था. वे अभी भी एक्टिव है और फिल्मों में एक्शन का काम कर रहे है. उन्होंने कामयाबी बहुत मुश्किल से पायी है, कई बार मैंने उन्हें चोट लगते हुए भी देखा है. वे स्टंट बहुत बहादुरी से करते थे.  आज चाहते है कि मैं भी सफलता प्राप्त करूँ. वे जो भी कहते है हम आँख मूदकर फोलो करते है.

सवाल-किसकी बायोपिक करना चाहते है?

अक्षय कुमार, अजय देवगन, भगत सिंह जैसे किसी की भी बायोपिक में काम करने की इच्छा रखता हूं.

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सवाल-माँ के हाथ का बनाया क्या खाना पसंद करते है?

गुड़ शक्कर और रोटी. पंजाब के गाँव में बनने वाली ये डिश मुझे बहुत पसंद है.

सवाल-यूथ को क्या सन्देश देना चाहते है?

आज के यूथ किसी भी चीज से बहुत अधिक प्रभावित हो जाते है, उनसे मेरा कहना है कि किसी भी नशे की लत में न पड़े. अपनी जर्नी पर ध्यान दे, दूसरे की दिशा में न चले. समय मिले तो परिवार के साथ बिताएं.

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