हेल्थ के साथ स्किन के लिए भी फायदेमंद है बादाम तेल

बादाम को सेहत और खूबसूरती दोनों के लिए लाभकारी माना जाता है. जितना फायदेमंद बादाम होता है वैसे ही फयदेमंद बादाम का तेल भी होता है. पोषक तत्वों से भरपूर बादाम का तेल कई बीमारियों से भी दूर रखने में सहायक है. बच्चों की मालिश से लेकर उनके दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए भी बादाम तेल का इस्तेमाल किया जाता है. आइए जानते हैं बादाम तेल के कुछ ऐसे गुणों के बारे में जो आपकी खूबसूरती बरकरार रखने के साथ आपको हेल्दी रखने में भी मदद करते हैं-

स्किन के लिए

वैसे तो बादाम तेल के अनगिनत फायदे हैं. लेकिन बात अगर खूबसूरती की करें तो इसे निखारने में इसका जवाब नहीं. यह स्किन को निखारने के साथ साथ उसे ग्लो देने में भी असरदार है. इस से स्किन को पोषण मिलता है. जिससे स्किन ज्यादा चमकदार और मुलायम हो जाती है. इस तेल में एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो स्किन के लिए फायदेमंद माना जाता है.

1. डार्क सर्कलस के लिए

डार्क सर्कलस जैसे समस्या से भी निजात पाने के लिए आप  बादाम तेल का इस्तेमाल कर सकती हैं. रात को सोने से पहले आंखों के नीचे इस तेल से हल्की मालिश करने से फायदा मिल सकता है. रोजाना इस्तेमाल करने से डार्क सर्कलस कम हो सकते हैं.

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2. जब हो जाए टैनिंग

विभिन्न गुणों से भरपूर है. यह तेल एक नैचुरल संस्क्रीन की तरह भी काम करता है. टैनिंग से बचने या टैनिंग रिमूव करने के लिए आप बादाम तेल का इस्तेमाल कर सकती हैं. यह सूरज की अल्ट्रावाइलैट किरणों से स्किन की रक्षा करने में मदद करता है.

3. बालों के लिए फायदेमंद

बालों के लिए बादाम तेल अच्छा टॉनिक माना जाता है. बादाम तेल की मालिश से बाल गिरना कम हो सकते हैं. इस में मौजूद मैग्निशियम और बायोटिन बालों को हेल्दी बनाने में मदद करता है.

इसके इस्तेमाल से बालों की ग्रोथ में भी सुधार देखने को मिलता है. बालों में मोइश्चर बरकरार रखने लिए  बादाम तेल बेहतर है.

4. डैंड्रफ में फायदेमंद

बादाम तेल से मालिश स्काल्प को हेल्दी कर डैंड्रफ में लाभकारी पाया गया है. बालों को पोषित और हेल्दी रखने के लिए इस तेल के मसाज के बाद हेयर स्टीम लें सकते हैं. इससे आपको बालों की सोफ्टनेस और वौल्यूम दोनों में फर्क नजर आएगा.

5. स्पिलट एंड्स से छुटकारा

बालों को स्प्लिट एंड्स से छूटकारा दिलाना है तो समय पर ट्रिमिंग कराने के साथ साथ हलके  गरम बादाम तेल को बालों के जड़ों और बालों के लंबाई के आखिर में लगाएं. इससे बालों का रूखापन खत्म होगा और स्प्लिट एन्ड्स से छुटकारा मिलेगा.

6. बच्चों के लिए फायदेमंद

शिशु के स्किन के लिए बादाम तेल फायदेमंद होता है क्योंकि इस में विटामिन ए, बी1, बी2, बी6 विटामिन ई और ओमेगा फैटी एसिड होते हैं, जो स्किन को पोषित करने के साथ साथ स्किन निखारने में भी मदद करता है. इससे शिशु की स्किन मुलायम रहती है.

शिशु के शारीरिक के विकास के लिए बादाम तेल से मालिश कर सकते हैं. शिशु के शरीर के मांशपेशियों को मजबूती मिलती है. सर्दियों के मौसम में तो यह और भी फायदेमंद होता है.

बादाम तेल में मौजूद औमेगा-6 फेटी एसिड दिमाग को स्वस्थ के लिए फायदेमंद है. इसे आप दूध में मिला कर बच्चों को दे सकती हैं.

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7. कब्ज में राहत

कब्ज की समस्या आजकल एक आम समस्या बन गई है. लगातार पेट दर्द, मल त्याग में तेज दर्द और घंटो बैठे रहने के बाद भी पेट साफ न होने की समस्या को बादाम का तेल खत्म कर सकता है. बादल तेल प्राकृतिक रूप से कब्ज की समस्या को दूर करता है. कब्‍ज की समस्‍या को दूर करने के लिए दो बड़े चम्‍मच बादाम के तेल का सेवन नियमित रूप से करें.

आसान नहीं तलाक की राह

हाई सोसायटी में भी तलाक लेना अब आम बात हो गई है. ऐसी महिलाएं जो अपने कार्यक्षेत्र में उच्च पदों पर पहुंच चुकी हैं, आर्थिक रूप से काफी सक्षम हैं, वे पारिवारिक बंधनों से मुक्त हो कर आजाद हवा में सांस लेने के लिए उतावली हैं. जहां पैसा है, पावर है वहां तलाक जल्दी और आसानी से मिल जाता है, मगर निम्न और मध्यवर्गीय तबके में तलाक लेना एक मुश्किल, लंबी और खर्चीली प्रक्रिया है.

यह लंबी, तनावपूर्ण और खर्चीली काररवाई पुरुषों पर उतना असर नहीं डालती, जितना स्त्रियों पर बुरा प्रभाव छोड़ती है. तलाक दिलाने का माध्यम बनने वाले वकील का खर्च, तमाम तरह के कानूनी दस्तावेज, बारबार अदालत में पड़ने वाली तारीखें, काउंसलिंग सैशन, घर और बच्चों के छूट जाने का डर स्त्री को बुरी तरह तोड़ देता है.

तारीख पर तारीख

कम पढ़ीलिखी और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को वकीलों की फौज खूब बेवकूफ बनाती है. वकील के हत्थे चढ़ने के बाद शुरू हो जाता है अदालत में तारीख पर तारीख मिलने का सिलसिला. ज्यादातर पारिवारिक कोर्ट्स में वकील आपस में दोस्त होते हैं. वहां पतिपत्नी तलाक के लिए जिन्हें अपना वकील चुनते हैं, वे आपस में मिल जाते हैं और फिर दोनों पार्टियों से अच्छीखासी धनउगाही करते हैं.

वकीलों की कोशिश यही होती है कि केस लंबा खिंचे ताकि हर पेशी पर उन्हें फीस मिलती रहे. वहीं दस्तावेज तैयार करने के लिए भी वे अपने क्लाइंट से अच्छी धनराशि वसूलते हैं. कम पढ़ीलिखी, कानून की कम जानकार और सीधीसादी औरतें कभीकभी तो ऐसे वकीलों के चक्कर में फंस कर अपना सबकुछ गंवा बैठती हैं.

निशा और उस के पति अमित की शादी को 5 साल हो गए थे. उन का 3 साल का एक बेटा भी था. दोनों के वैवाहिक जीवन में शुरू से ही निशा की मां काफी दखलंदाजी करती थी. बेटी को अपने ससुराल वालों और पति के खिलाफ भड़काती रहती थी. निशा अपनी मां के बहकावे में आ कर अपने बेटे को अपने सासससुर से दूर रखती थी. उन्हें अपने बच्चे के साथ खानेखेलने भी नहीं देती थी. यह बात अमित को बुरी लगती थी और दोनों में अकसर इस बात को ले कर लड़ाई होती थी.

आखिरकार रोजरोज की खटपट से तंग आ कर अमित ने निशा से मुक्ति पाने के लिए तलाक लेने का फैसला कर लिया. उस ने पारिवारिक कोर्ट परिसर में बैठने वाले एक वकील को हायर किया और तलाक का वाद दाखिल कर दिया. निशा को तलाक का नोटिस मिला तो वह भी अपनी मां और भाई के साथ पारिवारिक कोर्ट पहुंची और उस ने भी एक वकील हायर कर लिया.

अमित और निशा के वकील आपस में दोस्त थे. अत: दोनों मिल गए और फिर उन्होंने कोर्ट में तारीख पर तारीख लेनी शुरू कर दी. पारिवारिक कोर्ट में भी दांपत्य रिश्ते को तोड़ने की अपेक्षा मिलाने पर ज्यादा विश्वास किया जाता है लिहाजा, जज ने मामले को काउंसलिंग में भेज दिया. अब काउंसलिंग की तारीखें पड़ने लगीं.

इस दौरान जहां दोनों की जेबों से अच्छीखासी धनराशि वकीलों पर खर्च होने लगी, वहीं निशा को बच्चे को ले कर मायके में भी रहना पड़ा. काउंसलिंग के दौरान उस की मां उस के साथ जाती थी, जो मामले को किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने ही नहीं देती थी. वह निशा के जरीए अमित पर उत्पीड़न का दोष लगवाती थी. निशा अपनी मां और वकील के बीच चकरघिन्नी बनी हुई थी.

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उस की मां जहां तलाक के एवज में निशा को अमित से अच्छीखासी धनराशि दिलवाने की साजिश में लगी हुई थी, वहीं उस का वकील भी इस बात का आश्वासन दे कर निशा  से अच्छीखासी रकम वसूल रहा था. फिर बच्चे की कस्टडी का मुकदमा दोनों ने अलग से फाइल किया. केस को चलते 2 साल बीत गए. इस बीच निशा की सारी जमापूंजी खत्म हो गई, यहां तक कि वकील की फीस, बच्चे की परवरिश और अपने जरूरी खर्चे में उस के सारे गहने भी बिक गए.

4 साल बाद निशा को तलाक तो मिल गया, बच्चे की कस्टडी भी किसी तरह मिल गई, मगर अमित से वह बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त नहीं कर पाई, जो उस के पूरे जीवन को सुचारु रूप से चला सके.

बच्चे को ठीक तरीके से पालने के लिए अब वह महल्ले के एक स्कूल में मिड डे मील बनाने का कार्य करती है. यही नहीं, बच्चे की कस्टडी भले ही निशा के पास हो, मगर कोर्ट ने महीने में 4 दिन पिता को बच्चे से मिलने का अवसर दिया है, जिस के लिए किसी पब्लिक प्लेस पर निशा को बच्चे को ले कर आना होता है, जहां 3-4 घंटे अमित बच्चे के साथ रहता है.

इस के लिए निशा को महीने में 4 दिन काम से छुट्टी लेनी पड़ती है. इस से उस की तनख्वाह कटती है.

निशा वहां अमित को सामने देख पूरा समय असहज रहती है. वह उस दिन को कोसती है जब उस ने मां की बातों में आ कर अमित से अलग होने का फैसला किया था. जबकि अमित उसे हमेशा खुश नजर आता था, बल्कि सच पूछें तो वह खुश ही है, क्योंकि निशा से तलाक लेने के बाद उस के घर में शांति आ गई है. रोजरोज की कलह खत्म हो गई है. निशा की मां और भाई की धमकियों से मुक्ति मिल गई है. निशा और बच्चे पर रोज होने वाला खर्च बचने लगा है. उसे तो हर महीने बस थोड़ा सा मैंटेनैंस का पैसा निशा के बैंक अकाउंट में डलवाना होता है.

महिलाओं की आर्थिक निर्भरता

दरअसल, भारत में ज्यादातर महिलाएं आर्थिक रूप से पुरुष पर ही निर्भर हैं. इसलिए तलाक के बाद उन की समस्याएं बहुत बढ़ जाती हैं. तलाक भावनात्मक स्तर पर महिलाओं को ही ज्यादा चोट पहुंचाता है और फिर उस के आर्थिक परिणाम भी कम गंभीर नहीं होते हैं. इमोशनल ट्रौमा की वजह से कई बार महिलाओं की सोच सही तरह से काम नहीं करती और न ही परिवार वाले उन्हें ठीक से सम झा पाते हैं. इसलिए वे तार्किक ढंग से फैसला नहीं ले पाती हैं और तलाक के बाद कई तरह की परेशानियों में घिर जाती हैं.

रजनी शिवाकांत ने जब अपने पति से शादी के 10 साल बाद अलग होने का फैसला किया, तब उस ने संपत्ति में से अपना हिस्सा नहीं मांगा, जिस पर दोनों का अधिकार था. रजनी वर्किंग वूमन थी और इस बात से ही संतुष्ट थी कि उस के पति ने उस का बेटा उस के पास ही रहने दिया. लिहाजा, रजनी ने उस संपत्ति की ओर देखा भी नहीं, जिस में वह घर भी शामिल था, जिस पर दोनों का बराबर का अधिकार था, क्योंकि घर खरीदने में उस के पति ने अपनी जमापूंजी के साथ उस की बचत के पैसे और उस के तमाम गहने बेच कर भी पैसे लगाए थे.

तब रजनी ने अपने आर्थिक पहलुओं की ओर कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब बेटे को ले कर अलग रहने के कारण उस पर भारी आर्थिक बो झ पड़ने लगा, तब उसे यह बात सम झ में आई कि सारी संपत्ति पति के पास छोड़ कर उस ने अच्छा नहीं किया. उसे लगा कि कम से कम वह उस घर में तो अपना हिस्सा मांग लेती जो दोनों ने मिल कर खरीदा था.

कानून के मुताबिक, अगर शादी के बाद कोई भी प्रौपर्टी खरीदी गई है, तो उस पर पत्नी का भी मालिकाना हिस्सा होता है. यह नियम तब भी लागू होता है, जब पत्नी ने एसेट खरीदने में आर्थिक मदद न दी हो. लेकिन रजनी के वकील ने कभी उसे इस बारे में कोई राय नहीं दी. वह तो उसे बस इतना सम झाता रहा कि बच्चा मिल गया है, यही बहुत बड़ी बात है. दरअसल, रजनी का वकील उस के पति के वकील से मिला था. उसे उधर से भी पैसा मिल रहा था. लिहाजा, प्रौपर्टी में हिस्से वाली बात या पति से मैंटेनैंस की मांग की ही नहीं गई.

तलाक के वक्त पति से बच्चे की परवरिश के लिए मुआवजे की मांग न करने के कारण अब रजनी को अपनी कमाई के बूते बच्चे की परवरिश में दिक्कत हो रही है. खासतौर पर तब, जब उसे बच्चे के साथ रहने के लिए अलग से घर किराए पर लेना पड़ा. अगर रजनी ने प्रौपर्टी में अपने हिस्से की मांग की होती, तो वह या तो अपने लिए नया घर खरीद सकती थी या फिर उसे सैटलमैंट के तौर पर पति से एकमुश्त बड़ी रकम मिली होती, जिसे बच्चे के नाम पर फिक्स कर के वह उस की चिंता से मुक्त हो सकती थी.

आसान नहीं प्रक्रिया

भारत में तलाक का प्रोसैस आसान नहीं है. इस में काफी दांवपेंच हैं. कई लूपहोल्स हैं, जो आमतौर पर महिलाओं को सम झ नहीं आते हैं. इसलिए जहां तलाक के लिए अपने अधिकारों और कानून की ठीक जानकारी जरूरी है, वहीं एक अच्छे और ईमानदार वकील की तलाश भी आवश्यक है. ऐसा कठिन निर्णय लेने की घड़ी में महिलाओं का भावनाओं में बहना उन की आगे की जिंदगी के लिए बहुत खतरनाक साबित होता है, इसलिए बहुत सोचसम झ कर कदम उठाने की जरूरत होती है.

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तलाक के मामलों में कोर्ट को भी व्यावहारिक होने की जरूरत है. अदालतों को सोचना चाहिए कि 2 या 10 साल तलाक के मामले चलने पर पतिपत्नी दोनों की जिंदगियां तबाह हो जाती हैं. इतना लंबा वक्त उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी तोड़ देता है.

वकीलों की बदमाशियों और दांवपेंच पर भी कोर्ट को नजर और नियंत्रण रखने की जरूरत है. उसे सोचना चाहिए कि जब 2 व्यक्तियों का दिल आपस में नहीं मिल रहा है, तो साथ रहने का कोई फायदा नहीं है. ऐसे में अगर उन्होंने तलाक का फैसला कर ही लिया है तो उन्हें जल्दी तलाक मिल जाना चाहिए. बेवजह 10-10 साल तक कोर्ट के चक्कर काटते रहने से वे दूसरी शादी करने और जिंदगी को फिर से शुरू करने के बारे में भी नहीं सोच पाते हैं.

भारत में तलाक के बाद पुरुषों की शादी तो 40-45 या 50 की उम्र में भी आसानी से हो जाती है, मगर महिलाओं की दूसरी शादी आसानी से नहीं होती है. ज्यादातर महिलाएं तलाक लेने के बाद पूरा जीवन एकाकी ही व्यतीत करती हैं. ऐसे में अदालतों को चाहिए कि तलाक की प्रक्रिया को एक तय समयसीमा में खत्म कर के दोनों को नई जिंदगी शुरू करने का अवसर प्रदान करें.

आमतौर पर पारिवारिक कोर्ट में तलाक की याचिका दायर करने के बाद अदालत दंपती को अपने रिश्ते को बचाने का एक और मौका देने के लिए 6 माह का समय और सलाह देता है. इन 6 महीनों में दंपती का मन बदल जाए और वे एकदूसरे के साथ रहने के लिए फिर से तैयार हों तो वे तलाक की याचिका वापस ले सकते हैं. लेकिन अगर 6 महीने की अवधि के बाद भी वे एकसाथ रहने के लिए तैयार नहीं हैं तो अदालत उन्हें उन की सुनवाई और जांच के बाद तलाक देती है. इस के बाद वे कानूनी तौर पर अलग हो जाते हैं. यह प्रक्रिया कभीकभी 6 महीने से ले कर 1 साल के भीतर खत्म हो जाती है तो कभीकभी बच्चे, प्रौपर्टी, क्रिमिनल ऐक्टिविटी आदि के कारण 10-10, 12-12 साल तक चलती रहती है.

तलाक के तरीके

देश में तलाक के 2 तरीके हैं- एक आपसी सहमति से तलाक और दूसरा एकतरफा अर्जी लगा कर. आपसी सहमति से तलाक प्राप्त करने की प्रक्रिया थोड़ी आसान है, लेकिन इस में अपने बच्चों की जिंदगी, कस्टडी, प्रौपर्टी जैसे मामलों को उन्हें आपस में निबटाना होता है वरना मामला कोर्ट में लंबा खिंच सकता है. आपसी सहमति में दोनों की राजीखुशी से संबंध खत्म होते हैं. इस में वादविवाद, एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप जैसी बातें नहीं होती हैं. इस वजह से इस बेहद अहम रिश्ते से निकलना अपेक्षाकृत आसान होता है.

आपसी सहमति से तलाक में कुछ खास चीजों का ध्यान रखना होता है. इस में गुजाराभत्ता सब से अहम है. पति या पत्नी में से एक अगर आर्थिक तौर पर दूसरे पर निर्भर है तो तलाक के बाद जीवनयापन के लिए सक्षम साथी को दूसरे को गुजाराभत्ता देना होता है. इस भत्ते की कोई सीमा नहीं होती है. यह दोनों पक्षों की आपसी सम झ और जरूरतों पर निर्भर करता है. इसी तरह से अगर शादी से बच्चे हैं तो उन की कस्टडी भी एक अहम मसला है. चाइल्ड कस्टडी शेयर्ड यानी मिलजुल कर या अलगअलग हो सकती है. कोई एक पेरैंट भी बच्चों को संभालने का जिम्मा ले सकता है, लेकिन दूसरे पेरैंट को उस की आर्थिक मदद करनी होती है.

आसानी से नहीं मिलता रास्ता

तलाक लेने से पहले कई बार सोच लें. तलाक का फैसला लेने के बाद वकील से मिल कर उस का आधार तय करें. जिस वजह से तलाक चाहते हैं उस के पर्याप्त सुबूत आप के पास होने चाहिए. साक्ष्यों की कमी से केस कमजोर हो सकता है और प्रक्रिया ज्यादा मुश्किल और लंबी हो जाएगी.

अर्जी देने के बाद कोर्ट की ओर से दूसरे पक्ष को नोटिस दिया जाता है. इस के बाद अगर दोनों पार्टियां कोर्ट में हाजिर हों तो कोर्ट की ओर से सारा मामला सुन कर पहली कोशिश सुलह की होती है. अगर ऐसा न हो तो कोर्ट में लिखित में बयान देना होता है. लिखित काररवाई के बाद कोर्ट में सुनवाई शुरू होती है. इस में मामले की जटिलता के आधार पर कम या ज्यादा वक्त लग सकता है.

हिंदू विवाह अधिनियम

हिंदुओं में विवाह को एक पवित्र संस्कार माना गया है और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी इसे इसी रूप में बनाए रखने की चेष्टा की गई है, किंतु विवाह, जो पहले एक पवित्र एवं अटूट बंधन था, अधिनियम के अंतर्गत ऐसा नहीं रह गया है. यह विचारधारा अब शिथिल पड़ गई है. अब यह जन्मजन्मांतर का संबंध अथवा बंधन नहीं रह गया है, बल्कि विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर यह संबंध अधिनियम के अंतर्गत विघटित किया जा सकता है.

भारत की संसद द्वारा 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम पारित हुआ. इसी कालावधि में 3 अन्य महत्त्पूर्ण कानून पारित हुए-हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1955), हिंदू अल्पसंख्यक तथा अभिभावक अधिनियम (1956) और हिंदू ऐडौप्शन और भरणपोषण अधिनियम (1956). ये सभी नियम हिंदुओं की वैधिक परंपराओं को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से लागू किए गए थे. न्यायालयों पर यह वैधानिक कर्तव्य नियत किया गया कि हर वैवाहिक  झगड़े में प्रथम प्रयास सुलह कराने का करें. इस के लिए काउंसलर्स की व्यवस्था की गई. न्यायालयों को इस बात का अधिकार दे दिया गया है कि अवयस्क बच्चों की देखरेख एवं भरणपोषण की व्यवस्था करें.

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अधिनियम की धारा 10 के अनुसार न्यायिक पृथक्करण इन आधारों पर न्यायालय से प्राप्त हो सकता है. 2 वर्ष से अधिक समय से पति पत्नी अलग रह रहे हों, पति या पत्नी एकदूसरे को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताडि़त करे, 1 वर्ष से ज्यादा समय से कुष्ठ रोग हो, 3 वर्ष से अधिक रतिजरोग, विकृतिमन 2 वर्ष तथा परपुरुष अथवा परस्त्री गमन 1 बार में भी.

अधिनियम की धारा 13 के अनुसार, संसर्ग, धर्मपरिवर्तन, पागलपन (3 वर्ष), कुष्ट रोग (3 वर्ष), रतिज रोग (3 वर्ष), संन्यास, मृत्यु निष्कर्ष (7 वर्ष), पर नैयायिक पृथक्करण की डिक्री पास होने के 2 वर्ष बाद तथा दांपत्याधिकार प्रदान करने वाली डिक्री पास होने के 2 साल बाद ‘संबंधविच्छेद’ प्राप्त हो सकता है.

स्त्रियों को निम्न आधारों पर भी संबंधविच्छेद प्राप्त हो सकता है- द्विविवाह, बलात्कार, पुंमैथुन तथा पशुमैथुन. धारा 11 एवं 12 के अंतर्गत न्यायालय ‘विवाहशून्यता’ की घोषणा कर सकता है.

धारा 125 – दंड प्रक्रिया संहिता

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 के अंतर्गत पत्नी अपने पति से भरणपोषण पाने का दावा करती है. इस कानून के कुछ आधार हैं, जो अगर किसी महिला के भरणपोषण के दावे में मौजूद नहीं हैं तो फिर हो सकता है कि पति भरणपोषण देने के दायित्व से मुक्त हो जाए.

भरणपोषण राशि को निश्चित करने के लिए अदालत कई कारणों को ध्यान में रख कर अपना फैसला देती है. इस के अंतर्गत अदालत देखती है-

– भरणपोषण देने और मांगने वाले दोनों की आय और दूसरी संपत्तियां.

– भरणपोषण देने और मांगने वाले दोनों की कमाई के साधन.

– भरणपोषण मांगने वाले की उचित जरूरतें.

– यदि दोनों अलग रह रहे हैं तो उस के उचित कारण.

– भरणपोषण मांगने वाले उचित हकदारों की संख्या.

वह पत्नी भरणपोषण मांगने की हकदार नहीं है, जो परगमन में रह रही हो या वह बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है या आपसी सम झौते से अलग रह रही हो.

अनिल बनाम मिसेज सुनीता के केस में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह कह कर भरणपोषण के आवेदन को खारिज कर दिया था कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के अपने पति से दूर रह रही थी.

पति लेते हैं इस तर्क से प्रतिरक्षा

यदि पत्नी नौकरी कर रही है तो कई बार पति की ओर से यह तर्क  दे कर अपना बचाव किया जाता है कि पत्नी अपने भरणपोषण लायक स्वयं कमा रही है. दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 में भी कहा गया है कि पति उस पत्नी को भरणपोषण देगा जो खुद अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है. अगर पत्नी नौकरी करती है तो भरणपोषण के केस में पति की ओर से यह प्रतिरक्षा आमतौर पर ली जाती है कि पत्नी असमर्थ नहीं है जैसाकि अधिनियम में कहा गया है. यही नहीं, अलग रहने के दौरान बेरोजगार पति अपनी कमाऊ पत्नी से भरणपोषण की मांग कर सकता है.

भरणपोषण के केस में जिस पक्ष के पास पूर्ण तथ्य हैं और अदालत में अगर वे साबित किए जाते हैं तो फैसला उस के पक्ष में हो सकता है.

मुस्लिम  विवाह

मुस्लिम  विवाह (निकाह) मुस्लिम  पर्सनल लौ (शरीयत) के तहत होता है. शिया और सुन्नी समुदायों के लिए कई प्रावधान अलगअलग हैं.

मुस्लिम  विवाह में यह जरूरी है कि एक पक्ष विवाह का प्रस्ताव रखे और दूसरा उसे स्वीकार करे. इसे इजब व कबूल कहते हैं. प्रस्ताव और स्वीकृति लिखित और मौखिक दोनों प्रकार से हो सकती है. हनफी विचारधारा के मुताबिक सुन्नी मुस्लिम  विवाह 2 मुसलमान पुरुष गवाह या 1 पुरुष और 2 स्त्री गवाहों की मौजूदगी में होना जरूरी है. मुस्लिम  विवाह की वैधता के लिए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती है. कोई पुरुष अथवा महिला 15 वर्ष की उम्र होने पर विवाह कर सकती है. 15 साल से कम उम्र का पुरुष या महिला निकाह नहीं कर सकती है.

सुन्नी मुसलमान पुरुष पर दूसरे धर्म की महिला से विवाह करने पर पाबंदी है. लेकिन सुन्नी पुरुष यहूदी अथवा ईसाई महिला से विवाह कर सकता है. लेकिन सुन्नी मुसलमान महिला किसी अन्य धर्म के पुरुष से विवाह नहीं कर सकती है.

शिया मुसलमान गैरमुस्लिम  महिला से अस्थाई ढंग से विवाह कर सकता है, जिसे मुक्ता कहते हैं. शिया महिला गैरमुसलमान पुरुष से किसी भी ढंग से विवाह नहीं कर सकती है. वर्जित नजदीकी रिश्तों में निकाह नहीं हो सकता है.

मुस्लिम  पुरुष अपनी मां या दादी से, अपनी बेटी या पोती से, अपनी बहन से, अपनी भानजी, भतीजी, पोती या नातिन से, अपनी बूआ या चाची या पिता की बूआ या चाची से, मुंह बोली मां या बेटी से, अपनी पत्नी के पूर्वज या वंशज से शादी नहीं कर सकता है.

चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रेन ऐक्ट 1929 के अंतर्गत 21 वर्ष से कम आयु के लड़के तथा 18 वर्ष से कम आयु की लड़की का विवाह संपन्न कराना अपराध है. इस निषेध के भंग होने का भी मुस्लिम  विवाह की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं है.

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मुस्लिम  विवाह में तलाक

मुस्लिम  तलाक की 2 विधियां हैं – तलाकएसुन्ना (मान्य विधि) और तलाकउलबिद्दत (अमान्य विधि).

तलाकएसुन्ना (मान्य विधि)- अहसन पद्धति में पति 2ऋतुकालों (मासिकधर्म के बीच) की अवधि तुहर के बीच 1 बार तलाक देता है और इद्दत (तलाक के बाद के करीब 3 महीनों की अवधि) में पत्नी से शारीरिक संबंध नहीं बनाता है, तो इद्दत की अवधि खत्म होने पर तलाक हो जाता है.

हसन पद्धति में पति 3 तुहरों के दौरान 3 बार तलाक देने के अपने इरादे की घोषणा करता है और पत्नी से शारीरिक संबंध नहीं बनाता है तो तीसरी बार तलाक कहने के उपरांत विवाह विच्छेद हो जाता है.

तलाकउलबिद्दत (अमान्य विधि)- इस विधि में पति एक ही तुहर में मैं तुम्हें 3 बार तलाक देता हूं या 3 बार ‘मैं तुम्हें तलाक देता हूं’ कह कर तलाक दे सकता था. इस विधि को अब समाप्त कर इसे दंडनीय अपराध घोषित किया जा चुका है.

खुला- (पत्नी की ओर से तलाक) के द्वारा मुस्लिम  पत्नी अपने पति को तलाक दे सकती है. इस के लिए शर्त यह है कि पत्नी को पति से जो मेहर (इवद) मिली है, वह उसे लौटा दे. मुस्लिम  पत्नी अपने पति की रजामंदी से तलाक हासिल कर सकती है. मुस्लिम  पत्नी कुछ प्रतिफल के बदले भी तलाक हासिल कर सकती है. भविष्य में किसी घटना के होने या न होने की स्थिति में भी दंपती तलाक के लिए रजामंद हो सकते हैं.

स्पैशल मैरिज एक्ट

इस ऐक्ट के तहत किसी भी धर्म के लोग आपस में शादी के बंधन में बंध सकते हैं और इस के लिए उन्हें अपना धर्म बदलने की जरूरत नहीं है. दोनों का अपनाअपना धर्म शादी के बाद भी कायम रहता है. शादी चाहे किसी भी तरीके से हो, शादी के बाद पत्नी को तमाम कानूनी अधिकार मिल जाते हैं.

अगर लड़का और लड़की दोनों पहले से शादीशुदा न हों, दोनों बालिग हों और आपसी सहमति देने लायक मानसिक स्थिति में हों, तो वे स्पैशल मैरिज ऐक्ट 1954 के तहत शादी कर सकते हैं.

स्पैशल मैरिज ऐक्ट के तहत विदेशी लोग भी भारतीय लोगों से शादी कर सकते हैं. इस के लिए दोनों को इलाके के एडीएम औफिस में शादी की अर्जी दाखिल करनी होती है. इस अर्जी के साथ उम्र का सर्टिफिकेट लगता है और साथ ही यह ऐफिडैविट देना होता है कि दोनों बालिग हैं. दोनों की फिजिकल वैरिफिकेशन कर उन्हें 1 महीने बाद आने के लिए कहा जाता है.

इस दौरान नोटिस बोर्ड पर उन के बारे में सूचना चिपकाई जाती है अगर किसी को आपत्ति है तो बताए. नोटिस पीरियड के बाद गवाहों के सामने मैरिज रजिस्ट्रार उन से शपथ दिलवाते हैं और फिर शादी का सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है.

कैसे देते हैं तलाक की अर्जी

आपसी सहमति से तलाक की अपील तभी संभव है जब पतिपत्नी सालभर से अलगअलग रह रहे हों. पहले दोनों ही पक्षों को कोर्ट में याचिका दायर करनी होती है. दूसरे चरण में दोनों पक्षों के अलगअलग बयान लिए जाते हैं और दस्तखत की औपचारिकता होती है. तीसरे चरण में कोर्ट दोनों को 6 महीने का वक्त देता है ताकि वे अपने फैसले को ले कर दोबारा सोच सकें. कई बार इसी दौरान मेल हो जाता है और घर दोबारा बस जाता है. 6 महीने के बाद दोनों पक्षों को फिर से कोर्ट में बुलाया जाता है. इसी दौरान फैसला बदल जाए तो अलग तरह की औपचारिकताएं होती हैं. आखिरी चरण में कोर्ट अपना फैसला सुनाता है और रिश्ते के खात्मे पर कानूनी मुहर लग जाती है.

स्पैशल मैरिज ऐक्ट की जरूरी बातें

वर और वधू क्रमश: 21 और 18 वर्ष के होने चाहिए और मानसिक रूप से स्वस्थ होने चाहिए.

– समान या अलग धर्मो के प्रेमी इस ऐक्ट के तहत शादी कर सकते हैं और इस के लिए उन्हें अपना धर्म बदलने की आवश्यकता नहीं है.

– यह शादी कोर्ट में सब डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) या ऐडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा संपन्न कराई जाती है.

– इस ऐक्ट के तहत शादी कराने के लिए कोई पंडित, मौलवी या पादरी अथवा किसी धर्मग्रंथ की जरूरत नहीं पड़ती.

– इस के तहत विवाह के वक्त 3 गवाहों का होना अनिवार्य है.

सेक्सुअल Dysfunction की शिकार महिलाएं

अगर आप अपने पार्टनर को काफी समय से सेक्‍स के लिए न कह रही हैं, तो यह चिंता का विषय हो सकता है. ये भी संभव है कि आपका पार्टनर सेक्‍स के प्रति आपका रुझान न होने की समस्‍या से परेशान हो. इसे  यौन अक्षमता भी कहा जाता है. इस शब्द का उपयोग किसी ऐसे व्यक्ति को परिभाषित करने के लिए किया जाता है जो अपने साथी को सेक्‍स के दौरान सहयोग नहीं करता. महिलाओं में एफएसडी होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे सेक्स के दौरान दर्द या मनोवैज्ञानिक कारण. ज्यादातर मामलों में, हालांकि, एफएसडी को मनोवैज्ञानिक कारणों के लिए जिम्मेदार माना जाता है. इस परिदृश्य में, महिलाओं के लिए किसी पेशेवर से मदद लेना महत्वपूर्ण होता है. डौ. अनुप धीर ने एफएसडी के निम्‍न  मुख्‍य कारण बताएं हैं-

1. मनोवैज्ञानिक कारण

डॉ. धीर कहते हैं, पुरुषों के लिए सेक्‍स एक शारीरिक मुद्दा हो सकता है, लेकिन महिलाओं के लिए यह एक भावनात्मक मुद्दा है. पिछले बुरे अनुभवों के कारण कुछ महिलाएं भावनात्मक रूप से टूट जाती हैं. वर्तमान में बुरे अनुभवों के कारण मनोवैज्ञानिक मुद्दे या फिर अवसाद इसका कारण हो सकता है.

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2. और्गेज्‍म तक न पहुंच पाना

एनोर्गस्मिया के बारे में समझाते हुए डॉ. धीर कहते हैं, एफएसडी का दूसरा भाग एनोर्गस्मिया कहलाता है. यह स्थिति तब होती है जब व्‍यक्ति को या तो कभी ऑर्गेज्‍म नहीं होता या वह कभी इस तक पहुंच ही नहीं पाता. ऑर्गेज्‍म तक पहुंचने में असमर्थता भी एक मेडिकल कंडीशन है. सेक्स में रुचि की कमी और ऑर्गेज्‍म तक पहुंचने में असमर्थता दोनों ही स्थिति गंभीर हैं. यह मुख्य रूप इसलिए होता है क्योंकि महिलाएं अधिक फोरप्ले पसंद करती हैं. अगर ऐसा नहीं हो रहा तो ऑर्गेज्‍म तक पहुंचना मुश्किल है. इसका मनोचिकित्सा के माध्यम से इलाज किया जा सकता है.महिलाओं को अपने रिश्ते में सेक्स के साथ समस्याएं होती हैं. अगर आपको ऐसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, तो आपको अपने एंड्रॉजिस्ट को जल्द से जल्द दिखाना चाहिए ताकि समस्या संबंधों को प्रभावित न करे.

3. एफएसडी का इलाज और उपचार

डौ. धीर कहते हैं, जहां तक घरेलू उपचार का सवाल है, एफएसडी के इलाज में वास्तव में यह बहुत प्रभावी नहीं होते. बाजार में कई तरह के महिला वियाग्रा मौजूद हैं लेकिन ये आमतौर पर अपेक्षित नतीजे नहीं दे पाते. महिलाएं लेजर के साथ योनि कायाकल्प ट्राई कर सकती हैं.

4. पीआरपी थेरेपी

आप चाहें तो पीआरपी थेरेपी भी अपना सकती हैं. इस क्षेत्र में रक्त परिसंचरण में सुधार करने के लिए योनि के पास इंजेक्शन दिया जाता है. इसे ओ-शॉट के रूप में जाना जाता है.

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5. यौन परामर्श

अगर आप यौन संबंध का आनंद नहीं ले रही हैं तो डॉक्टर को दिखाना जरूरी है. उसके बाद डॉक्टर जांच करेगा. दोनों भागीदारों के लिए यौन परामर्श उपयोगी हो सकता है. दिनचर्या बदलने और अलग-अलग पदों की कोशिश करके इसे और अधिक रोचक बनाने की कोशिश करना उपयोगी हो सकता है. योनि क्रीम या स्नेहक ट्राई की  जा सकती है. ज्यादातर महिलाएं, विशेष रूप से जब वे 50+ हो जाती हैं तो संभोग शुरू करने से पहले अधिक उत्तेजना और फोरप्ले की आवश्यकता होती है. योनि प्रवेश के साथ ज्यादातर महिलाओं को संभोग के दौरान उत्तेजना नहीं होती . उस समय हस्तमैथुन या मौखिक सेक्स जैसी अन्य यौन गतिविधियां सहायक होती है.

खतरों से भरा फिश पैडीक्योर

कुछ दिन पहले एक युवती न्यूयार्क, अमेरिका के एक डाक्टर के पास पैर के नाखूनों की शिकायत ले कर गई. उस के पैरों के नाखून पहले तो काले पड़ गए थे और फिर पूरी तरह निकल गए थे. उस के परिवार में यह रोग किसी को नहीं था. टैस्ट के बाद पता चला कि 6 माह पूर्व उस ने फिश पैडीक्योर कराया था जिस में पैरों को मछलियों के टैंक में डाल कर बैठना होता है.

मछलियों ने नाखूनों के मैट्रिक्स काट डाले थे और उसे औनिकोमाडेसिस की बीमारी हो गई थी. इस से न सिर्फ नाखूनों का बढ़ना बंद हो गया था, बल्कि वे त्वचा से अलग भी हो गए थे.

यह मामला स्किन की बीमारियों की पत्रिका जामा डर्मैटोलौजी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. फिश पैडीक्योर से स्टैफीलोकोकस और माइकोबैक्टिरियोसिस बीमारियां भी होती हैं. इन से त्वचा की कई बीमारियां पूरे बदन में हो सकती हैं जिन में पिंपल्स, सैल्युटाइटिस, न्यूमोनिया तक शामिल हैं.

सड़े पैरों को खाना मजबूरी

स्टैफीलोकोकस वर्षों तक शरीर में निष्क्रिय पड़ा रहता है. पर जब सक्रिय होने लगे तो जानलेवा बन जाता है. खून में घुस कर यह बैक्टीरिया शरीर के दूसरे हिस्सों और अंगों पर बीमारी फैला सकता है. अगर ऐंटीबायोटिक न दी जाए तो बचने के चांस 20% रह जाते हैं. ऐंटीबायोटिक से इलाज काफी हद तक सफल रहता है.

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फिश पैडीक्योर असल में खतरों से भरा है पर फैशन की अंधी दौड़ में देश के बहुत सारे ब्यूटीपार्लरों में दिख सकता है. थाईलैंड, कंबोडिया, सिंगापुर आदि के बाजारों में बहुत जगह टैंकों में तैरती मछलियां दिखेंगी जिस के पानी में पैर लटका कर लोग अपना फिश पैडीक्योर कराते हैं. यह प्रचार का बल है कि मछलियां कोई डाक्टर न होते हुए भी पैडीक्योर ऐक्सपर्ट मान ली गई हैं.

गारा रुफा नाम की छोटी मछलियां असल में पैरों की खाल खाती हैं क्योंकि उन्हें भूखा रखा जाता है. इन मछलियों का भारत में आयात किया जाता है. इन्हें अपना प्राकृतिक खाना नहीं मिलता और ग्राहकों के सड़े पैरों को खाना इन की मजबूरी होती है जबकि ग्राहक इन के काटने से होने वाली गुदगुदी को पैडीक्योर समझ लेते हैं.

मनोरंजन के नाम पर अनदेखी

इन मछलियों का पानी अकसर साफ नहीं किया जाता और मरी मछलियां और मछलियों का मल भी पानी में घुलता रहता है जो ग्राहकों के पैरों के पोरों में घुसता रहता है. इस में तरहतरह के बैक्टीरिया होते हैं. इन से हैपाटाइटिस सी और एचआईवी जैसी गंभीर बीमारी होने की भी पूरी संभावना होती है.

चूंकि ये मछलियां ट्रैंड या प्रशिक्षित नहीं होतीं, ये पैरों की स्किन को कहीं से भी काट सकती हैं, जिस से पैर में जगहजगह महीन घाव हो सकते हैं. इन घावों को केवल ऐंटीबायोटिक से ही ठीक किया जा सकता है पर यदि बैक्टीरिया ब्लड स्ट्रीम में चला जाए तो खतरा बड़ा हो जाता है.

कुछ देशों ने इन स्पा पर बैन लगा दिया है पर कुछ देश पर्यटकों को मनोरंजन का एक और अवसर देने के नाम पर इस की अनदेखी कर रहे हैं. भारत में अभी कोई बैन नहीं है. इन आयातित मछलियों को क्व8 से ले कर क्व30 प्रति मछली के हिसाब से होलसेल में खरीदा जा सकता है.

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घर के कामों के लिए टी बैग्स का ऐसे करें इस्तेमाल

हम अपने दिन की शुरुआत चाय या कॉफी के कप से करते हैं. सुबह की चाय अगर मजेदार हो तो दिन भी बहुत अच्छा बीतता है. आजकल ऐतिहासिक सॉसपैन वाली चाय का चलन कम और टी बैग्स का चलन बढ़ रहा है. इसमें कोई बुराई भी नहीं है. हम रोजाना टी बैग्स का इस्तेमाल करते हैं. ग्रीन टी हो या ब्लैक टी. पर टी बैग्स एक बार चाय बनाने के बाद बर्बाद हो जाते हैं, और हम उसे फेंक देते हैं. पर क्या आप जानते हैं कि टी बैग्स चाय बनाने के अलावा भी बहुत काम आते हैं. चाय बनाने के बाद भी टी बैग्स बहुत काम आ सकते हैं. रियूज करें यूज्ड टी बैग्स-

1. पास्ता और ओट्स में मिलाएं एक्सट्रा फ्लेवर

पास्ता, बच्चे हो या बड़े पर एक बाउल चीज पास्ता को देखकार सभी के मुंह में पानी आ जाता है. पास्ता या ओट्स बनाने से पहले, उसे जैस्मीन या ग्रीन टी बैग के साथ रखें. टी बैग से पास्ता और टेस्टी बनेगा. ये ऐक्सपेरीमेंट तभी करें जब आपको नई-नई चीजें खाने का शौक हो.

2. घर की बदबू को करे दूर

फ्रिज की बदबू से हम काफी परेशान रहते हैं. कई बार हफ्तों निकल जाते हैं और हम फ्रिज की सफाई नहीं कर पाते. ऐसे में फ्रिज से बदबू आना तो लाजमी है. पर टी बैग्स से इस समस्या को आसानी से सुलझाया जा सकता है. इस्तेमाल किए हुए टी बैग्स को फ्रिज में रखें. इसके अलावा ड्राई टी बैग को अगर ऐश ट्रे या डस्टबिन में रखा जाए तो इनकी भी बदबू दूर हो जाती है.

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3. नैचुरल माउथवाश

ग्रीन टी या पेपरमिंट टी के टी बैग्स को हल्के गर्म पानी में भिगोएं. अब इसे रूम टेमप्रेचर पर ठंडा करें. आपका घर पर बना नैचुरल अल्कोहल फ्री माउथवाश तैयार है.

4. ग्लास की सफाई

टी बैग्स से आप अपनी खिड़कियों के शीशे और ड्रेसिंग टेबल के आईने को भी साफ कर सकते हैं. यूज्ड टी बैग्स को खिड़कियों और ड्रेसिंग टेबल के शीशों पर रगड़ें, खिड़कियों और शीशे बिल्कुल नए जैसे हो जाएंगे.

5. होम-मेड ऐयरफ्रेशनर

एक ड्राई टी बैग लें और अपने मनपसंद ऑयल की कुछ बूंदें डालें. आपका होम-मेड ऐयरफ्रेशनर तैयार है. इसे अपने कार, किचन या बाथरूम कहीं भी लगाएं.

6. चूहों की छुट्टी

चूहे यानि की आफत का दूसरा नाम. ये समस्या बहुत ही आम है. पर इन छोटे शैतानों से निजात पाना उतना ही मुश्किल है. पर छोटे से टी बैग से आप चूहों से निजात पा सकती हैं. ड्राई, अनयूज्ड टी बैग्स को अल्मारी, क्लोजेट, रैक कहीं पर भी रखें. चूहों की आवाजाही पर रोक लग जाएगी. टी बैग्स में पेपरमिंट ऑयल की कुछ बूंदें डाल दें तो मकड़ी और चींटियों से भी निजात पाया जा सकता है.

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7. पेपर या कपड़े को करें डाई

पेपर या कपड़े को भी टी बैग्स से डाई कर सकते हैं. इससे पेपर और कपड़ों को ऐंटिक लुक दिया जा सकता है.

8. बर्तनों से हटाए चिकनाई

बर्तनों से चिकनाई हटाना किसी युद्ध जीतने से कम नहीं है. जिद्दी दाग हटाने में बहुत मेहनत लगती है. पर टी बैग्स से आप ये काम भी आसानी से कर सकती हैं. सिंक में हल्का गर्म पानी और 2-3 यूज किए हुए टी बैग्स डालें. इससे बर्तनों की चिकनाई कम हो जाएगी और आपको बर्तन धोने में आसानी होगी.

9. लकड़ी के फर्नीचर और फर्श की सफाई

टी बैग्स को पानी में उबालें. कुछ देर के लिए ठंडा करें. अब इसमें एक नर्म कपड़े को भिगोएं और लकड़ी के फर्नीचर या फर्श को इससे साफ करें. सूखे कपड़े से पोंछ लें. फर्नीचर नए जैसे हो जाएंगे.

कुछ पौपुलर फिल्मों में भी दिखाए गए हैं एनकाउंटर सीन

आज पूरा देश हैदराबाद रेप केस पर हुए एनकाउंटर पर तेलंगाना पुलिस की वाहवाही कर रहा है. उनपर फूल बरसा रहा है.लोगों को इस एनकाउंटर से खुशी है वो जश्न मना रहे हैं.वैसे तो ये असल जिंदगी में हुआ है लेकिन एनकाउंटर पर बनी कुछ फिल्में भी खूब मशहूर हुई हैं.जिसमें कई नामी हीरो ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट का रोल निभाया है और उन्हें इसके लिए खूब सराहना भी मिली है.आइए आपको बताते हैं कुछ ऐसे ही फिल्मों के बारे में जिसमें जुर्म को खतम करने के लिए एनकाउंटर को बड़ी ही बेबाकी से दिखाया गया है.ये संदेश भी देने की कोशिश की गई है कि जब जुर्म हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो कुछ ऐसे ही कदम उठाने पड़ते हैं.

1. बाटला हाउस

फिल्म बाटला हाउस तो आप सबको याद ही होगी.ये फिल्म ज्यादा पुरानी नहीं है. ये फिल्म 2019 में ही आयी थी. जामिया नगर के बाटला हाउस में कुछ आतंकी छिपे थें और इन्हीं आतंकियों ने 2008 में दिल्ली में पांच जगहों पर बम धमाके किये थे जिसके कारण कई लोगों की जान चली गई कई घायल हो गए.पुलिस को ये सूचना मिलने पर की आतंकी बाटला हाउस में छुपे हैं तब पुलिस वहां पहुंची जहां पर आतंकियों और पुलिस के बीच में मुठभेड़ हुई और पुलिस ने आतंकियों का एनकाउंटर कर दिया.इसी पर आधारित फिल्म बनी थी बाटला हाउस जिसमें मुख्य भूमिका निभाई थी जॉन अब्राहम ने.इस फिल्म को काफी पसंद किया था.

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2. थेरी

2016 में एक फिल्म आई थी थेरी जिसमें जबरदस्त एनकाउंटर सीन को दिखाया गया था….इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा दिया था और खूब कमाई की थी.हालांकि ये फिल्म तमिल थी लेकिन फिर भी इसे काफी पसंद किया थी.

3. गर्व

फिल्म गर्व 2004 की सलमान खान की खाफी चर्चित फिल्म है.इस फिल्म में सलमान खान ने एक ईमानदार पुलिस अफसर का रोल निभाया है.इस फिल्म में सलमान खान की बहन के साथ कई गुंडे मिलकर रेप करते हैं और ऐसे में सलमान खान अकेले ही उन सबका एनकाउंटर कर देते हैं.इस सीन की काफी सराहना की गई थी.ये फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर खूब चली थी.

4. सिंबा

फिल्म सिंबा भी खूब चर्चित फिल्म है.इस फिल्म में रणवीर सिंह मुख्य भूमिका में हैं, उन्होंने एक पुलिस वाले का रोल निभाया है. इस फिल्म में रणवीर सिंह की एक मुंह बोली बहन रहती है जिसका कुछ गुंडे रेप करके उसे मार देते हैं.रणवीर सिंह उन सबका एनकाउंटर प्लान करके उन सभी गुंडों का एनकाउंटर कर देते हैं.इस फिल्म ने भी काफी धूम मचाई थी.और तब भी दर्शकों ने सिनेमा हॉल में खड़े होकर तालियां बजाई थी जैसा की आज हैदराबाद में पुलिस वालों पर जनता फूल बरसा रही है और उनकी तारीफ कर रही है.

5. सिंघम

फिल्म सिंघम को तो कोई नहीं भूल सकता है.2011 में आई इस फिल्म में अजय देवगन ने एक पुलिस वाले का किरदार निभाया है.इस फिल्म में भी एनकाउंटर सीन दिखाया गया है.सिंघम यानी की अजय देवगन की मुलाकात एक भ्रष्ट नेता जयकांत शिकरे से होती है.वो बेहद ही भ्रष्ट नेता रहता है जिसके कारण एक पुलिस अफसर आत्महत्या कर लेता है क्यों कि वो ईमानदार रहता है और जयकांत उस पर रिश्वत लेने का आरोप लगवा देता है.अजय देवगन इसी भ्रष्ट नेता का एनकाउंटर करता है.

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इन फिल्मों के बारें में बताने का मकसद केवल इतना है कि ऐसी और भी ऐसी कई फिल्में हैं जिसमें एनकाउंटर सीन बहुत ही जबरदस्त तरीके से दिखाया गया है और ऐसे ही जनता का सर्पोट उन्हें मिलता है.जैसे आज तेलंगाना पुलिस को मिल रहा है और अब तो फिल्में भी ऐसे सीन से अछूते नहीं रहे हैं.लोगों को ऐसी फिल्में पसंद भी आती हैं.

छोटी सरदारनी: रियल लाइफ में ऐसे ‘परम’ का होमवर्क कराती हैं ‘मेहर मम्मा’

कलर्स के शो ‘छोटी सरदारनी’ में ‘परम’ की मां ‘मेहर’ के रोल में नजर आने वाली निमृत कौर सीरियल में ‘परम’ को कितना प्यार करती हैं ये सभी को दिखता है, लेकिन रियल लाइफ में भी ‘मेहर’ ‘परम’ का ख्याल रखने का कोई मौका नही छोड़तीं, जिसका सबूत ये फोटो है. आइए आपको दिखाते हैं किस तरह औफस्क्रीन मां ‘मेहर’ ‘परम’ का ख्याल रखती हैं.

औन स्क्रीन मां के साथ वक्त बिताता है परम

निमृत कौर और ‘परम’ सीरियल में मां बेटे का रोल निभाते-निभाते इतने करीब आ गए हैं कि दोनों सेट पर शूटिंग के दौरान काफी समय बिताते हुए नजर आते हैं, इसलिए उनका रिश्ता समय के साथ काफी मजबूत हो गया है.

 

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‘परम’ का होमवर्क करवातीं हैं औनस्क्रीन मां ‘मेहर’

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हाल ही में ब्रेक टाइम के दौरान निमृत को ‘परम’ का डेली होमवर्क कराते और पढ़ाई में मदद कराते हुए देखा गया था, जिसका सबूत ये फोटो है. एक इंटरव्यू में निमृत ने कहा था,- “पर्सनली, मुझे बच्चे बहुत पसंद है और ‘परम’ के आसपास रहना मेरे लिए एक एंजायमेंट है. ‘परम’ एक स्मार्ट बच्चा है और मुझे खुशी है कि मैं उसे पढ़ाई और होमवर्क में मदद कर रही हूं. ज्यादा समय तक शूटिंग होने के बावजूद मुझे ‘परम’ के साथ थकान महसूस नही होती.”

 

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शो में इन दिनों दिखा रहे हैं कि कितनी मुश्किलों से गुजर के आखिरकार मेहर वापस आ गई है. वहीं दूसरी तरफ सरब पर लगाया हुआ मेहर के मर्डर का आरोप रद्द हो गया है. पूरा परिवार मेहर को जिंदा देखकर बेहद खुश है. अब देखना ये है कि क्या मेहर, सरब और परम फिर से साथ रहेंगे. क्या होगा जानने के लिए देखना न भूलें ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, शाम 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर. ’

खतरनाक हैं टाइट कपड़े

अभी हाल की ही घटना है दिल्ली के ही पीतमपुरा निवासी 30 वर्षीय सौरभ कुछ समय पहले टाइट जींस पहन अपनी नई कार से दोस्तों के साथ ऋषिकेश के लिए रवाना हुए थे. करीब चार से पांच घंटे की यात्रा करने के बाद उन्हें पैर सोने का एहसास हुआ, लेकिन दोस्तों का साथ होने की वजह से उन्होंने इस पर गौर नहीं किया.तीन दिन बाद वापस दिल्ली आने के बाद उन्हें सांस फूलने में तकलीफ हुई तो अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि उन्हें हार्ट अटैक आया है. डौक्टरों ने पल्मोनरी इम्बौल्मिंग  की पुष्टि की.

क्या है ये

पल्मोनरी इम्बौल्मिंग (पीई) एक ऐसी स्थिति है जिसमें टाइट कपड़े या लंबे समय तक एक ही स्थान पर बैठे रहने से रक्त संचार शरीर में रुकता है और रक्त का थक्का जमने लगता है. ऐसा होने से इंसान को दिल या दिमाग का अटैक आ सकता है.फेफड़ों में जब रक्त संचार रुकने लगता है तो मरीज जानलेवा स्थिति में आ जाता है. भारत में हर साल करीब 10 लाख मामले ऐसे सामने आ रहे हैं.

खुद  डॉक्टरों का कहना है कि टाइट कपड़े पहनना बहुत लोगों की पसंद होती है, उन्हें लगता है ऐसा पहनने से हम ज्यादा स्मार्ट नजर आएंगे. लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. ऐसा करने से एक दिन आपके सेहत को भारी नुकसान हो सकता है. रिसर्च में भी ये बात सामने आ चुकी है उनके यहां हर महीने एक या दो मामले आ ही जाते हैं.

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जानते हैं कैसे–

टाइट जीन्स न केवल आपके सवेंदनशील अंगो को नुक्सान पंहुचा सकता हैं. बल्कि ये ओवर आल हेल्थ को बिगाड़ सकता हैं.

1. टाइट जींस पहनने की वजह से महिलाओं को कमर से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.बहुत ज्यादा टाइट जींस पूरा दिन पहने रहने से कमर दर्द के अलावा धीरे-धीरे स्लिप डिस्क होने की आशंका भी बढ़ सकती है.

2. पुरुषों की सेहत के लिए भी टाइट जींस पहनना हानिकारक हो सकता है. दरअसल, इससे अंडकोष तक होने वाला रक्त-संचार रुकने के साथ ही अंडकोष में विकृति भी हो सकती है.जींस पहनने से रक्त-संचार की स्वाभाविक प्रक्रिया बाधित हो जाती

3. टाइट जींस पहनने से वेरिकोज वैन बीमारी जिसमें बढ़ी हुई नसें,जो आमतौर पर पैरों और तलवों में दिखती हैं, होने की आशंका रहती है.इसके अलावा टाइट जींस के कारण पैरों में ऐंठ की समस्या भी बढ़ सकती है.

4. ऐसा भी माना जाता है कि टाइट जींस पहनने से गर्भाशय का संकुचन और बांझपन का खतरा भी बढ़ सकता है.साथ ही टाइट होने की वजह से पेट पर काफी जोर पड़ता है जो आगे चलकर समस्या पैदा कर सकता है.

5. बहुत ज्यादा टाइट कपड़े पहनने से आपको उठने-बैठने में तो दिक्कत होती ही हैं साथ में आपके शरीर का शेप खराब हो जाता है. आपके पैरों की नसें दब जाती हैंजिस से आपके शरीर में झंझनाहट, सुन्न पड़ना या फिर दर्द होना शुरू हो जाता है.

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6. ज्‍यादा देर तक टाइट कपड़े पहनने से सांस लेने में भी दिक्‍कत होने लगती है. इससे शरीर में ऑक्‍सीजन प्रवाह पर दबाव पड़ता है जिस वजह से घबराहट और बैचेनी होने के साथ ही बेहोश होने की स्थिति भी हो सकती है. इसके अलावा ज्‍यादा ही टाइट कपड़े पहनने से खून प्रवाह भी बाधित हो सकता है.

7. ज्यादा टाइट जीन्स या फिर स्कर्ट पहनने से आपके पेट में दिक्कत आ सकती है. ज्यादा टाइट कपड़े पहनने से आपके पेट का फूड पाइप दब जाता है जिससे आपके फूड पाइप में एसिड बनना शुरू हो जाता है. अगर आपको भी बहुत ज्यादा टाइट कपड़े पहनने का शौक है, तो सावधान हो जाइए.

एकेडमी ऑफ फेमेली फिजिशियंस औफ इंडिया नोएडा के अध्यक्ष ,डॉ. रमन कुमार से बातचीत पर आधारित..

गौर सिटी 1 ,नोएडा एक्सटेंशन, सेक्टर 4

मेकअप करने के लिए ऐसे करें लिप्स की केयर

सर्दियों में स्किन के साथसाथ लिप्स को भी खास केयर की जरूरत होती है, क्योंकि वे बहुत ही कोमल होते हैं. उन पर सर्द व शुष्क हवाओं का सीधा प्रभाव पड़ता है. ऐसे में फटे लिप्स जहां इरिटेशन पैदा करते हैं, वहीं हमारे विंटर चार्म को भी खत्म करते हैं. इसलिए उन की खास केयर की जरूरत होती है. लिप्स की केयर के संबंध में जानते हैं गैट सैट यूनिसैक्स सैलून के ऐक्सपर्ट समीर से.

सर्दियों का मौसम यानी रूखी स्किन और पपड़ीदार होंठों का मौसम. यही वजह है कि इस मौसम में आप को बहुत ध्यान से ऐसी लिपस्टिक चुननी चाहिए, जो रूखी व नमीरहित स्किन पर अच्छी तरह वर्क कर सके.

अलग हैं रूल्स

लिपस्टिक लगाने के भी अलगअलग रूल्स होते हैं, जैसे दिन के वक्त लाइट कलर की लिपस्टिक लगानी चाहिए तो रात को ब्राइट व डार्क कलर की. इसी तरह मौसम के हिसाब लिपस्टिक लगानी चाहिए. जरूरी नहीं कि आप जो लिपस्टिक गरमी के मौसम में यूज कर रही हैं सर्दी के मौसम में भी वही आप को सूट करे.

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मैट लिपस्टिक आप को चाहे कितनी भी पसंद क्यों न हो, लेकिन सर्दियों में उसे लगाने के बाद आप के होंठ रूखे हो सकते हैं. आप जब भी मैट लिपस्टिक खासतौर पर लिक्विड मैट लिपस्टिक लगाने के बारे में सोचें तो आप को इस की तैयारी पहले से करनी होगी ताकि अपने होंठों को रूखा व पपड़ीदार होने से बचा सकें.

जब लगाएं मैट लिपस्टिक

लिक्विड मैट लिपस्टिक लगाने से पहले इन बातों का ध्यान रखें:

– होंठों पर वैस्लीन अप्लाई करें ताकि मौइस्चर बरकरार रहे.

– फिर ब्रश का इस्तेमाल कर होंठों को ऐक्सफोलिएट करें और उस के बाद उन पर लिप बाम लगाएं.

– अब लिक्विड लिप कलर लगाएं.

– इस के ऊपर प्राइमर लगाएं ताकि लिपस्टिक लंबे समय तक टिकी रहे.

– आखिर में होंठों के बीचोंबीच हाईलाइटर लगाएं ताकि होंठ भरेभरे दिखाई दें. ऐसा से आप के लिप्स पर काफी अच्छा रिजल्ट आएगा.

यदि आप सर्दियों में होंठों को भराभरा दिखाने के लिए ग्लौसी लिपस्टिक लगाना चाहती हैं तो यह एक अच्छा औप्शन है. मैट लिपस्टिक के बजाय ग्लौसी लिपस्टिक रिफ्लैक्शन के कारण चमकदार दिखाती है. इसे आप सीधे भी अप्लाई कर सकती हैं या फिर मैट लिपस्टिक के टौप कोट की तरह इस्तेमाल कर सकती हैं. कुछ ग्लौसी लिपस्टिक्स में आर्गन औयल के गुण मौजूद होते हैं, जिन की वजह से आप के होंठ नम बने रहते हैं और उन का ग्लौसी टैक्सचर सर्दियों में आप के होंठों को सेहतमंद लुक देता है.

ग्लौसी लिपस्टिक के साथ साटन लिपस्टिक को भी सर्दियों के लिए परफैक्ट माना जाता है. साटन लिपस्टिक का टैक्सचर लिपस्टिक का सब से सामान्य सा टैक्सचर होता है, जो सर्दियों के लिए परफैक्ट होता है, बिलकुल टिंटेड बाम की तरह.

घरेलू नुस्खे

अकसर तेज हवाएं या तेज धूप के संपर्क में आने से होंठ शुष्क पड़ जाते हैं और फिर फटने लगते हैं. अगर आप भी होंठों के फटने की समस्या से गुजर रही हैं तो उन के बचाव के लिए सही लिपस्टिक व लिप बाम का प्रयोग करें. इस के अलावा निम्न घरेलू नुसखों को भी अपना सकती हैं:

नाभि में तेल लगाएं

सुबह नहाने से पहले नाभि में तेल लगाने से फटे होंठों की समस्या से छुटकारा मिलता है.

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होंठों पर घी लगाएं

अगर आप फटे होंठों की समस्या से परेशान हैं तो उन पर घी लगाएं. इस के अलावा मक्खन में नमक डाल कर लगाने से भी होंठ नम होते हैं.

शक्कर से स्क्रब करें

चीनी में ग्लाइकोलिक और अल्फा हाइड्रौक्सी ऐसिड होता है, जिस से नमी बरकरार रहती है. ब्राउन और व्हाइट शुगर से होंठों को स्क्रब करें. समस्या छूमंतर हो जाएगी.

महिलाओं की कमाई पर पुरुषों का हक क्यों

आज जब महिलाएं पुरुषों के बराबर और कई बार उन से भी ज्यादा सैलरी ले रही हैं, तो यह उन का अधिकार बनता है कि वे अपने कमाए पैसों को अपनी इच्छानुसार खर्च करें.

मगर पुरुष हमेशा स्त्री पर शासन करता आया है और आज भी पत्नी पर अपना अधिकार सम झता है.

प्रोफैशनल कालेज में लैक्चरर इला चौधरी के फोन पर मैसेज आया कि उन के पति ने उन के जौइंट अकाउंट से क्व40 हजार निकाले हैं. उन का मूड खराब हो गया. वे  झल्ला उठीं.

घर आ कर अपनेआप को बहुत रोकतेरोकते कुछ तीखी आवाज में बोल ही पड़ीं, ‘‘कालेज के फंक्शन के लिए मैं ने मौल में एक ड्रैस और मैचिंग सैंडल पसंद किए थे. मेरे अकाउंट में अब केवल क्व10 हजार बचे हैं और अभी पूरा महीना पड़ा है. क्या वह ड्रैस बिकने से बची रहेगी भला?’’

फिर क्या था. पति आदेश नाराज हो कर चीखने लगे, ‘‘न जाने अपने पैसों का कितना घमंड हो गया है. ड्रैसों और सैंडलों की भरमार है, लेकिन नहीं पौलिसी ऐक्सपायर हो जाती, इसलिए मैं ने पैसे निकाल लिए.’’

इला चौधरी कहने लगी, ‘‘मेरी सैलरी क्व60 हजार है. मु झे कालेज में अच्छी तरह ड्रैसअप हो कर जाना पड़ता है. लेकिन जैसे ही मैं कुछ नया खरीदना चाहती हूं, आप गुस्सा दिखा कर मु झे मेरे मन का नहीं करने देते.’’

पति ने बनाया बेवकूफ

एक बड़े स्टोर में मैनेजर के पद पर काम कर रहीं मृदुला अवस्थी कहती हैं, ‘‘हमारे अपने स्टोर के मैनेजर ने रकम में काफी हेरफेर किया. इसलिए उसे हटा दिया. पति परेशान थे. मैं घर पर खाली रहने के कारण दिनभर ऊबती थी, इसलिए मैं ने कहा कि मैं एमबीए हूं. यदि आप कहें तो स्टोर संभाल लूं. लेकिन मेरी शर्त है कि मैं पूरी सैलरी यानी उतनी ही जितनी मैनेजर लेता था लूंगी.’’

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पति अमर खुश हो कर बोले, ‘‘हां, तुम पूरी सैलरी ले लेना… वैसे सबकुछ तुम्हारा ही तो है.’’

पहले महीने तो कई बार मांगने पर दे दी, लेकिन अगले महीने से कुछ नहीं. ‘सबकुछ तुम्हारा वाला’ डायलौग बेवकूफ बनाने के लिए काफी है.

इस के साथ ही कोई भी गलती हो जाने पर सारे स्टाफ के सामने अपमानित करने से भी नहीं चूकते.

मध्यवर्गीय परिवार की इशिता शादी से पहले से ही काम करती थीं. वे अपने भाई को अपने पैसों से पढ़ा रही थीं और फिर शादी के दौरान दहेज आदि में भी उन का पैसा काफी खर्च हुआ था.

पति आशीष ने सीधे तो नहीं, लेकिन घुमाफिरा कर पूछा कि तुम तो पिछले कई सालों से काम कर रही थीं, बैंक बैलेंस तो कुछ भी नहीं है.

पति की बात सुनते ही इशिता हैरान हो उठीं. वे ऐडवर्टाइजिंग फील्ड में थीं, साथ ही कपड़ों का भी बहुत शौक था. पार्लर जाना उन के लिए आवश्यक था पर पति के लिए फुजूलखर्ची. पत्नी का औफिस अच्छी तरह ड्रैसअप हो कर जाना पति को पसंद नहीं आता था.

इशिता की सैलरी बाद में आती उस के पहले ही खर्च और इनवैस्टमैंट की प्लानिंग तैयार रहती. यदि वे कुछ बोलतीं, तो रिश्तों में खटास. इसलिए मन मार कर रहतीं.

मुंबई की रीना जौहरी अपना दर्द सा झा करते हुए कहती हैं, ‘‘मेरी सब की उंगलियों में डायमंड रिंग देख कर खुद भी पहनने की बहुत इच्छा थी. मैं ने पति को बता कर एक रिकरिंग स्कीम से 1 लाख जोड़े. जब वह रकम मैच्योर हुई तो मैं ने जब अंगूठी की बात कही, तो पति सुधीर बोले,

‘‘क्या फर्क पड़ता है कि अंगूठी डायमंड की है या गोल्ड की?’’

मैं ने रुपए म्यूचुअल फंड में इनवैस्ट कर दिए हैं. वे रुपए तुम्हारे ही रहेंगे. तुम्हारे नाम से ही इनवैस्ट किए हैं. रीना की आंखों में आंसू आ गए. सवाल है कि पैसा पत्नी का, फैसला पति क्यों लें?

पति का फर्ज

लखनऊ की नीरजा त्रिपाठी की शादी बहुत संपन्न परिवार में हुई थी. वे बताने लगीं, ‘‘मैं ने ससुराल जा कर कुछ दिनों बाद फिर से जौब जौइन की. औफिस लगभग 10 किलोमीटर दूर था. मैं पति से स्कूटी या गाड़ी दिलवाने को कहती रही, लेकन वे अपनी आदत के अनुसार टालते रहे कि तुम कैब से जा सकती हो, टैक्सी से जा सकती हो आदि. मगर लखनऊ में ये आसानी से नहीं मिलतीं.’’

जब उन्होंने अपने पैसों से स्कूटी खरीदने की बात कही तो घर में  झगड़ा हुआ.

आवश्यकता यह है कि पति पत्नी की जरूरतों को सम झे, पत्नी की आवश्यकता, इच्छा, जरूरतों का सम्मान करे. उस की प्राथमिकताओं को सम झने की कोशिश करे.

मल्टीनैशनल कंपनी में काम करने वाली रिद्धि की बहन सिद्धि उस के घर पहली बार आई थी. वह छोटी बहन को मुंबई घुमाने के लिए रोज कहीं न कहीं जाती. उस समय पति अर्पित भी उन लोगों के साथ ही रहते. एक दिन वह औफिस गए थे. दोनों बहनें मौल में शौपिंग करने गईं. उस ने छोटी बहन को 2-3 महंगी ड्रैसेज खरीदवा दीं. पेमैंट करते ही पति के फोन पर मैसेज पहुंचा.

अर्पित ने घर आते ही गुस्से में रिद्धि से कहा, ‘‘खर्च करने की कोई लिमिट होती है. तुम तो इस तरह से पैसे उड़ा रही हो जैसे हम करोड़पति हों.’’

छोटी बहन के सामने रिद्धि से अपनी बेइज्जती सहन नहीं हुई और जरा सी बात पर अच्छाखासा  झगड़ा शुरू हो गया.

समय की जरूरत

आज समय की जरूरत है कि पतिपत्नी दोनों मिल कर अपने परिवार को आधुनिक सुखसुविधाएं प्रदान करें. आर्थिक रूप से स्वावलंबी होना महिलाओं को कामकाजी होने के लिए सब से ज्यादा प्रेरित करता है. काम करने से महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ता है.

वर्किंग कपल्स में अधिकतर पति अपनी पत्नी की सैलरी पर अपना पूरा हक सम झते हैं. वे चाहते हैं कि पत्नी की सैलरी भी वही अपनी मरजी के अनुसार खर्च करें.

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शुरू में कुछ महीने पत्नी भले ही संकोच में यह बरदाश्त कर ले हो सकता है कि वह मुंह से न बोले, लेकिन मन में तो सोचेगी कि जब वह पति से उस की सैलरी नहीं मांगती तो आखिर पति को क्या हक है कि वह हर महीने उस की सैलरी हथिया ले?

पतिपत्नी का रिश्ता तर्क नहीं वरन समर्पण और सम झौते से चलता है. आजकल वर्किंग कपल्स में पैसों को ले कर अकसर विवाद सुनने को मिल रहे हैं. कई बार विवाद की यह नौबत तलाक तक पहुंच जाती है.

अलग-अलग प्राथमिकताएं

आजकल मांबाप बेटियों को बेहद स्पैशल ट्रीटमैंट दे कर पालते हैं, जिस की वजह से वे ससुराल में भी स्पैशल ट्रीटमैंट चाहती हैं और जहां यह नहीं मिल पाता वहीं यह  झगड़े और असंतोष का कारण बन जाता है.

पतिपत्नी दोनों अलगअलग परिवेश, विचार एवं परिस्थितियों से गुजरे होते हैं. इसलिए दोनों की प्राथमिकताएं अलगअलग होती हैं.

पतिपत्नी में कोई भी डौमिनेटिंग नेचर का हो सकता है. ऐसी स्थिति में दूसरा हर्ट हो जाता है.

यदि पति पत्नी की किसी गलती पर नाराज होता है तो वह तुरंत चिढ़ जाती है कि आखिर उसे किसी का ऐटिट्यूड सहने की क्या जरूरत है. वह भी तो कमाती है.

कई बार कामकाजी पत्नी छोटी सी बात पर ओवररिएक्ट कर के चिढ़ कर नाराज हो बात का बतंगड़ बना देती है.

ऐसा कौन सा रिश्ता है, जिस में थोड़ाबहुत लड़ाई झगड़ा न हो. पतिपत्नी का रिश्ता तो छोटे बच्चों की दोस्ती की तरह होना चाहिए. पल में कुट्टी, पल में सुलह. खुशियां तो हमारे आसपास ही बिखरी पड़ी हैं. बस उन्हें ढूंढ़ने की जरूरत होती है. इसलिए जीवन में हर पल खुशियां ढूंढ़ें. -पद्मा अग्रवाल –

इन बातों पर ध्यान दें

पति-पत्नी का रिश्ता बहुत नाजुक होता है. इसलिए जरूरी है वे कि इन बातों पर अमल करें:

– एकदूसरे की इज्जत करें.

– एकदूसरे पर विश्वास करें.

– गुस्से को बीच में न आने दें.

– हर समय दूसरे की गलतियां, कमियां न निकालें.

– माफी मांगना सीखें.

– अपने पार्टनर को अपनी फरमाइश या इच्छा जरूर बताएं.

– परिवार के फैसले दोनों मिल कर करें.

– मुंह पर अपशब्द न लाएं.

– एकदूसरे की तारीफ जरूर करें.

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