Hindi Drama Story: दीया और सुमि- क्या हुआ था उसके साथ

Hindi Drama Story: “अरे दीया, चलो मुसकरा भी दो अब. इस दुनिया की सारी समस्याएं केवल तुम्हारी तो नहीं हैं,” सुमि ने कहा तो यह लाजवाब बात सुन कर दीया हंस दी और उस ने सुमि के गाल पर एक मीठी सी चपत भी लगा दी.

“अरे सुनो, हां, तो यह चाय कह रही है कि गरमगरम सुड़क लो ठंडी हो जाऊंगी तो चाय नहीं रहूंगी,” सुमि ने कहा.

“अच्छा, मेरी मां,” कह कर दीया ने कप हाथों में थामा और होंठों तक ले आई. सुमि के हाथ की गरम चाय घूंटघूंट पी कर मन सचमुच बागबाग हो गया उस का.

“चलो, अब मैं जरा हमारे दिसु बाबा को बाहर सैर करा लाती हूं. तुम अपना मन हलका करो और यह संगीत सुनो,” कह कर सुमि ने 80 के दशक के गीत लगा दिए और बेबी को ले कर बाहर निकल गई.

दीया ने दिसु के बाहर जाने से पहले उसे खूब प्यार किया…’10 महीने का दिसु कितना प्यारा है. इस को देख कर लगता है कि यह जीवन, यह संसार कितना सुंदर है,’ दीया ने मन ही मन सोचा और खयालों में डूबती चली गई.

यादों के सागर में दीया को याद आया 2 साल पहले वाला वह समय, जब मेकअप रूम में वह सुमि से टकरा गई थी. दीया तैयार हो रही थी और सुमि क्लब के मैनेजर से बहस करतेकरते मेकअप रूम तक आ गई थी. वह मैनेजर दीया को भी कुछ डांस शो देता था, पर दीया तो उस से भयंकर नफरत करती थी. दीया का मन होता कि उस के मुंह पर थूक दे, क्योंकि उस ने दीया को नशीली चीजें पिला कर जाने कितना बरबाद कर डाला था. आज वह मैनेजर सुमि को गालियां दे रहा था.

आखिरकार सुमि को हां करनी पड़ी, “हांहां, इसी बदन दिखाती ड्रैस को पहन कर नाच लूंगी.”

यह सुन कर वह धूर्त मैनेजर संतुष्ट हो कर वहां से तुरंत चला गया और जातेजाते बोलता रहा, “जल्दी तैयार हो जाना.”

“क्या तैयार होना है, यह रूमाल ही तो लपेटना है…” कह कर जब सुमि सुबक रही थी, तब दीया ने उसे खूब दिलासा दिया और कहा, “सुनो, मैं आप का नाम तो नहीं जानती, पर यही सच है कि हम को पेट भरना है और
उस कपटी मैनैजर को पैसा कमाना है. जानती हो न इस पूरी धरती की क्या बिसात, वहां स्वर्ग में भी यह दौलत ही सब से बड़ी चीज है.”

इस तरह माहौल हलका हुआ. सुमि ने अपना नाम बताया, तब उन दोनों ने एकदूसरे के मन को पढ़ा. कुछ बातें भी हुईं और उस रात क्लब में नाचने के बाद अगले दिन सुबह 10 बजे मिलने का वादा किया.

आधी रात तक खूबसूरत जवान लड़कियों से कमर मटका कर और जाम पर जाम छलका कर उन के मालिक, मैनेजर या आयोजक सब दोपहर बाद तक बेसुध ही रहने वाले थे. वे दोनों एक पार्क में मिलीं और बैंच पर बैठ गईं. दोनों कुछ पल खामोश रहीं और सुमि ने बात शुरू की थी, फिर तो एकदूसरे के शहर, कसबे, गांव, घरपरिवार और घुटन भरी जिंदगी की कितनी बातें एक के बाद एक निकल पड़ीं और लंबी सांस ले कर सुमि बोली, “कमाल है न कि यह समय भी कैसा खेल दिखाता है. जिन को हम ने अपना समझ कर अपनी हर समस्या साझा कर ली, वे ही दोस्त से देह के धंधेबाज बन गए, वह भी हमारी देह के.”

“हां सुमि, तुम सही कह रही हो. कल रात तुम को देखा तो लगा कि हम दोनों के सीने में शायद एकजैसा दर्द है,” कहते हुए दीया ने गहरी सांस ली. आज कितने दिनों के बाद वे दोनों दिल की बात कहसुन रही थीं.

सुमि को तब दीया ने बताया कि रामपुर में उस का पंडित परिवार किस तरह बस पूजा और अनुष्ठान के भरोसे ही चल रहा था, पर सारी दुनिया को कायदा सिखा रहे उस घर में तनिक भी मर्यादा नहीं थी. उस की मां को उस के सगे चाचा की गोद में नींद आती और पिता से तीसरेचौथे दिन शराब के बगैर सांस भी न ली जाती.

“तो तुम कुछ कहती नहीं थी?” सुमि ने पूछा.

“नहीं सुमि, मैं बहुत सांवली थी और हमारे परिवार मे सांवली लड़की किसी मुसीबत से कम नहीं होती, तो मैं घर पर कम रहती थी.”

“तुम कहां रहती थी?”

“सुमि, मैं न बहुत डरपोक थी और जब भी जरा फुरसत होती तो सेवा करने चली जाती. कभी कहीं किसी के बच्चों को पढ़ा देती तो किसी के कुत्तेबिल्ली की देखभाल करती बड़ी हो गई तो किसी की रसोई तक संभाल देती पर यह बात भीतर तक चुभ जाती कि कितनी सांवली है, इस को कोई पसंद नहीं करेगा,” दीया तब लगातार बोलती रही थी.

सुमि कितने गौर से सुन रही थी. अब वह एक सहेली पा कर उन यादों के अलबम पलटने लगी.

दीया बोलने लगी, “एक लड़का मेरा दोस्त बन गया. उस ने कभी नहीं कहा कि तुम सांवली हो और जब जरूरत होती वह खास सब्जैक्ट की किताबें और नोट्स आगे रखे हुए मुझे निहारता रहता.

“इस तरह मैं स्कूल से कालेज आई तो अलगअलग तरह की नईनई बातें सीख गई. मेरे कसबे के दोस्तों ने बताया था कि अगर कोई लड़का तुम से बारबार मिलना चाहे तो यही रूप सच्चे मददगार का भी रूप है और मैं ने आसानी से इस बात पर विश्वास कर लिया था.”

एक दिन इसी तरह कोई मुश्किल सब्जैक्ट समझाते हुए उस लड़के के एकाध बाल उलझ कर माथे पर आ गए थे तो दीया का मन महक गया. उस के चेहरे पर हलकीहलकी उमंग उठी थी.

हालांकि दीया की उम्र 20 साल से ज्यादा नहीं थी, पर उस के दिल पर एक स्थायी चाहत थी, जिस का रास्ता बारबार उसी अपने और करीबी से लगने वाले मददगार लड़के के पास जाता दिखाई देता था.

दीया कालेज में पढ़ने वाले उस लड़के का कोई इतिहासभूगोल जानती नहीं थी और जानना भी नहीं चाहती थी. सच्चा प्यार तो हमेशा ईमानदार होता है, वह सोचती थी. एक दिन वह अपने घर से रकम और गहने ले कर चुपचाप
रवाना हो गई. वह बेफिक्र थी, क्योंकि पूरे रास्ते उस का फरिश्ता उस को गोदी मे संभाले उस के साथ ही तो था और बहुत करीब भी था.

दीया उस लड़के के साथ बिलकुल निश्चिंत थी, क्योंकि उस को जब भी अपने मददगार यार के चेहरे पर मुसकराहट दिखाई देती थी, वह यही मान लेती थी कि भविष्य सुरक्षित है, जीवन बिलकुल मजेदार होने वाला है. आने वाले दिन तो और भी रसीले और चमकदार होंगे.

मगर दीया कहां जानती थी कि वे कोरे सपने थे, जो टूटने वाले थे. यह चांदनी 4-5 दिन में ही ढलने लगी. एक दिन वह लड़का अचानक उठ कर कहीं चला गया. दीया ने उस का इंतजार किया, पर वह लौटा नहीं, कभी नहीं.

उस के बाद दीया की जिंदगी बदल गई. वह ऐसे लोगों के चंगुल में फंस जो उसे यहांवहां नाचने के लिए मजबूर किया गया. इतना ही नहीं उस को धमकी मिलती कि तुम्हारी फिल्म बना कर रिलीज कर देंगे, फिर किसी कुएं या पोखर मे कूद जाना.

दीया को कुछ ऐसा खिलाया या पिलाया जाता कि वह सुबह खुद को किसी के बैडरूम में पाती और छटपटा जाती. कई दिनों तक यों ही शहरशहर एक अनाचारी से दूसरे दुराचारी के पलंग मे कुटने और पिसने के बाद वह सुमि से मिल गई.

सुमि ने दीया को पानी की बोतल थमा दी और बताया, “मैं खुद भी अपने मातापिता के मतभेद के बीच यों ही पिसती रही जैसे चक्की के 2 पाटों में गेहूं पिस जाता है. मां को आराम पसंद था पिता को सैरसपाटा और लापरवाही भरा जीवन. घर पर बस नौकर रहते थे. हमारे दादा के बगीचे थे. पूरे साल रुपया ही बरसता रहता था. अमरूद, आम से ले कर अंगूर, अनार के बगीचे.”

“अच्छा तो इतने पैसे मिलते थे…” दीया ने हैरानी से कहा.

“हां दीया, और मेरी मां बस बेफिक्र हो कर अपने ही आलस में रहती थी. पिता के बाहर न जाने कितने अफेयर चल रहे थे. वे बाजारू औरतों पर दौलत लुटा रहे थे, पर मां मस्तमगन रहती. इस कमजोरी के तो नौकर भी खूब मजे लेते. वे मां को सजधज कर तैयार हो कर बाहर सैरसपाटा करने में मदद करते और घर पर पिता को महंगी शराब के पैग पर पैग बना कर देते.

“मां और पिता दोनों से नौकरों को खूब बख्शीश मिलती और उन की मौज ही मौज होती, लेकिन जब भी मातापिता एक दूसरे के सामने पड़ते तो कुछ पल बाद ही उन दोनों में भयंकर बहस शुरू हो जाती, कभी रुपएपैसे के हिसाब को ले कर तो कभी मुझे ले कर कि मैं किस की जिम्मेदारी हूं.

“मेरा अकेला उदास मन मेरे हमउम्र पडो़सी मदन पर आ गया था. वह हर रोज मेरी बातें सुनता, मुझे पिक्चर दिखा लाता और पढ़ाई में मेरी मदद करता. कालेज में तो मेरा एक ही सहारा था और वह था मदन.

“पर एक दिन वह मेरे घर आया और शाम को तैयार रहना कह कर मुझे एक पार्टी में ले गया जहां मुझे होश आया तो सुबह के 5 बज रहे थे. मेरे अगलबगल 2 लड़के थे, मगर मदन का कोई अतापता ही नहीं था.

“मैं समझ गई थी कि मेरे साथ क्या हुआ है. मैं वहां से भागना चाहती थी, पर मुझे किसी ने बाल पकड़ कर रोक दिया और कहा कि कार में बैठो. वे लोग मुझे किसी दूसरे शहर ले गए और शाम को एक महफिल में सजधज कर शामिल होने को कहा.

“वह किसी बड़े आदमी की दावत थी. मैं अपने मातापिता से बात करने को बेचैन थी, मगर मुझे वहां कोई गोली खिला दी गई और मेरा खुद पर कोई कंट्रोल न रहा. फिर मेरी हर शाम नाचने में ही गुजरने लगी.”

“ओह, सुमि,” कह कर दीया ने उस के हाथ पर हाथ रख दिया था. आज 2 अजनबी मिले, पर अनजान होते हुए भी कई बातें समान थीं. उन की सरलता का फायदा उठाया गया था.

“देखो सुमि, हमारे फैसले और प्राथमिकता कैसे भी हों, वे होते तो हमारे ही हैं फिर उन के कारण यह दिनचर्या कितनी भी हताशनिराश करने वाली हो, दुविधा कितना भी हैरान करे, हम सब के पास 1-2 रास्ते तो हर हाल ही में रहते ही हैं और चुनते समय हम उन में से भी सब से बेहतरीन ही चुनते हैं, पर जब नाकाम हो जाते है, तो खुद को भरम में रखते हुए कहते हैं कि और कोई रास्ता ही नही था. इस से नजात पाए बिना दोबारा रास्ता तलाशना बेमानी है,” कह कर दीया चुप हो गई थी.

अब सुमि कहने लगी, “हमारे साथ एक बात तो है कि हम ने भरोसा किया और धोखा खाया, पर आज इस बुरे वक्त में हम दोनों अब अकेले नहीं रहेंगे. हम एकदूसरे की मदद के लिए खड़े हैं.”

“हां, मैं तैयार हूं,” कह कर दीया ने योजना बनानी शुरू की. तय हुआ कि 2 दिन बाद अपना कुछ रुपया ले कर रेल पकड़ कर निकल जाएंगी. उस के बाद जो होगा देखा जाएगा, अभी इस नरक से तो निकल लें.

यह बहुत अच्छा विचार था. 2 दिन बाद इस पर अमल किया. सबकुछ आराम से हो गया. वे दोनों चंडीगढ़ आ गईं. वहां उन्होंने एक बच्चा गोद लिया.

दीया यही सोच रही थी कि कुछ आवाज सी हुई. सुमि और दिसु लौट आए थे.

सुमि ने दीया की गीली आंखें देखीं और बोली, “ओह दीया, यह अतीत में डूबनाउतरना क्या होता है, क्यों होता है, किसलिए होता है, मैं नहीं जानती, क्योंकि मैं गुजरे समय के तिलिस्म में कभी पड़ी ही नहीं. मैं वर्तमान में जीना पसंद करती हूं. बीते समय और भविष्य की चिंता में वे लोग डूबे रहते हैं, जिन के पास डूबने का और कोई साधन नहीं होता…”

“अच्छा, मेरी मां,” कह कर दीया ने सुमि को अपने गले लगा लिया.

Hindi Drama Story

Emotional Story in Hindi: सिसकती दीवारें- क्यों अकेला पड़ गया वह

Emotional Story in Hindi: सामने वाले घर में खूब चहलपहल है. आलोकजी के पोते राघव का पहला बर्थडे है. पूरा परिवार तैयार हो कर इधर से उधर घूम रहा है. घर के बच्चों का उत्साह तो देखते ही बनता है. आलोकजी ने घर को ऐसे सजाया है जैसे किसी का विवाह हो. वैसे तो उन के घर में हमेशा ही रौनक रहती है. भरेपूरे घर में आलोकजी, उन की पत्नी, 2 बेटे और 1 बेटी, सब साथ रहते हैं. कितना अच्छा है सामने वाला घर, कितना बसा हुआ, जीवन से भरपूर. और एक मैं, लखनऊ के गोमतीनगर के सब से चहलपहल वाले इलाके में कोने में अकेला, वीरान, उजड़ा हुआ खड़ा हूं. मेरे कोनेकोने में सन्नाटा छाया है. सन्नाटा भी ऐसा कि सालों से खत्म होने का नाम नहीं ले रहा.

अब ऐसे अकेले जीना शायद मेरी नियति है. बस, हर तरफ धूलमिट्टी, जर्जर होती दीवारें, दीवारों से लटकते लंबे जाले, गेट पर लगा ताला जैसे कह रहा हो, खुशी के सब दरवाजे बंद हो चुके हैं. हर आहट पर किसी के आने का इंतजार रहता है मुझे. तरस गया हूं अपनों के चेहरे देखने के लिए, पर यादें हैं कि पीछा ही नहीं छोड़तीं.

मैं हमेशा से ऐसा नहीं था. मैं भी जीवन से भरपूर था. मेरा भी कोनाकोना चमकता था. मेरी सुंदरता भी देखते ही बनती थी. मालिक के कहकहों के साथ मेरी दीवारें भी मुसकराती थीं. सजीसंवरी मालकिन इधर से उधर पायल की आवाज करती घूमती थीं. मालिक के बेटे बसंत और शिषिर इसी आंगन में तो पलेबढ़े हैं. उन से छोटी कूहू और पीहू ने इसी आंगन में तो गुड्डेगुडि़या के खेल रचाए हैं. यह अमरूद का पेड़ मालिक ने ही तो लगाया था. इसी के नीचे तो चारों बच्चों ने अपना बचपन बिताया है.

हाय, एकएक घटना ऐसे याद आती है जैसे कल ही की बात हो. मालिक अंगरेजी के अध्यापक थे. बहुत ज्ञानी, धैर्यवान और बहुत ही हंसमुख. मालिक को पढ़नेलिखने का बहुत शौक था. कालेज से आते, खाना खा कर थोड़ा आराम करते, फिर अपने स्टडीरूम में कालेज के गरीब बच्चों को मुफ्त ट्यूशन पढ़ाते थे. कभीकभी तो उन्हें खाना भी खिला दिया करते थे. आज भी याद है मुझे उन बच्चों की आंखों में मालिक के प्रति सम्मान के भाव. जब भी मालिक को फुरसत होती, साफसफाई में लग जाते. किसी और पर हुक्म चलाते मैं ने कभी नहीं देखा उन्हें.

मालिक 50 के ही तो हुए थे तब, जब ऐसा सोए कि उठे ही नहीं. मेरा तो कोनाकोना उन की असामयिक मृत्यु पर दहाड़ें मारमार कर रोया. मालकिन के आंसू देखे नहीं जा रहे थे. शिषिर ही तो अपने पैरों पर खड़ा हो पाया था, बस. वह तो मालकिन ने हिम्मत की और बच्चों को चुप करवातेकरवाते खुद को भी संभाल लिया. याद है मुझे, मालिक के जो रिश्तेदार शोक प्रकट करने आए थे, सब धीरेधीरे यह कह कर चले गए थे कि कोई जरूरत हो तो बताना. उस के बाद तो सालों मैं ने किसी की शक्ल नहीं देखी. मालकिन भी इतिहास की टीचर थीं. मालिक के सहयोग से ही वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकी थीं. मालिक हमेशा यही तो कहते थे कि हर औरत को पढ़नालिखना चाहिए, तभी तो मालकिन मालिक के जाने के बाद सब संभाल सकीं.

चारों बच्चों के विवाह की जिम्मेदारी मालकिन ने मालिक को याद करते हुए बड़ी कुशलता से निभाई. सब अपनेअपने जीवन में व्यस्त होते जा रहे थे. बस, मैं मूकदर्शक, घर की बदलती हवा में सांस ले रहा था. घर में बदलाव की जो हवा चली थी उस में मुझे अपने भविष्य के प्रति कुछ चिंता सी होने लगी थी.

शिषिर की पोस्ंिटग दिल्ली हो गई. वह अपनी पत्नी रेखा और बेटे विपुल के साथ वहां चला गया. बसंत की पत्नी रेनू और उस की 2 बेटियों, तन्वी और शुभी से घर में बहुत रौनक रहती. कूहू और पीहू की शादी भी बहुत अच्छे घरों में हो गई. सब बच्चों की शादियों में, फिर उन के बच्चों के जन्म के समय मैं कई दिन तक रोशनी से जगमगाता रहा.

लेकिन फिर अचानक पता नहीं क्यों रेनू मालकिन से दुर्व्यवहार करने लगी. एक दिन मालकिन स्कूल से आईं तो रेनू ने उन के आराम के समय जोरजोर से टीवी चला दिया. मालकिन ने धीरे करने के लिए कहा तो रेनू ने कटु स्वर में कहा, ‘मां, आप तो बाहर से आई हैं, मैं घर के कामों से अब फ्री हुई हूं, क्या मैं थोड़ा टाइमपास नहीं कर सकती?’

मालकिन को गुस्सा आया पर वे बोलीं कुछ नहीं. फिर रोज छोटी बहू कोई न कोई बात छेड़ कर हंगामा करने लगी. मालकिन को भी गुस्सा आने लगा, बसंत से दबे शब्दों में कहा तो उस ने तो हद ही कर दी. उन्हें ही कहने लगा, ‘मां, आप को समझना चाहिए, रेनू भी क्या करे, घर के सारे काम, आप का खानापीना, कपड़े सब वह ही तो करती है.’

मालकिन की आंखों की नमी मुझे आज भी याद है, उन्होंने इतना ही कहा था, ‘उस से कह दे, कल से मेरा खाना न बनाए, मैं बना लूंगी.’ आज सोचता हूं तो लगता है मालिक शायद बहुत दूरदर्शी थे, क्या उन्हें अंदाजा था कभी यह दिन आएगा, मुझे उन्होंने इस तरह से ही बनाया था कि मेरे 2-2 कमरों के साथ 1-1 किचन था.

बसंत और रेनू शायद यही चाहते थे. 2 दिन के अंदर रेनू ने अपना किचन अलग कर लिया. मैं रो पड़ा, लेकिन मेरे आंसू तो कोई देख नहीं सकता था. बस, ऐसा लगा मालिक ने मेरी दीवारों को अपने हाथ से सहलाया हो.

हद तो तब हो गई जब बसंत ने शराब पीनी शुरू कर दी. अब वह रोज पी कर मालकिन से झगड़ा करने लगा. मालकिन का गुस्सा भी दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था. उन्हें लगता वे जब आत्मनिर्भर हैं तो क्यों किसी की बात सुनें. उन का स्वभाव भी दिन पर दिन उग्र होता जा रहा था. कूहूपीहू आतीं तो घर के बदले रंगढंग देख कर दुखी होतीं.

मालकिन ने एक दिन शिषिर को बुला कर सब बताया. उस ने बसंत को समझाया तो बसंत ने कहा, ‘मां की इतनी ही फिक्र है तो ले जाओ अपने साथ इन्हें.’

मालकिन फटी आंखों से बेटे के शब्दों के प्रहार झेलती रहीं.

बसंत गुर्राया, ‘इन्हें कहो, अपनी तनख्वाह हमें दे दिया करें, हम फिर रखेंगे इन का ध्यान.’

शिषिर चिल्लाया, ‘इतनी हिम्मत, दिमाग खराब हो गया तुम्हारा?’

दोनों में जम कर बहस हुई, नतीजा कुछ नहीं निकला. शिषिर के जाने के बाद बसंत और उपद्रव करने लगा.

मालकिन को कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने एक राजमिस्त्री को बुलवा कर मेरे बीचोंबीच दीवार खड़ी करवा दी, बसंत ने कहा, ‘हां, यह ठीक है, आप उधर चैन से रहो, हम इधर चैन से रहेंगे.’

और देखते ही देखते 2 दिन में मेरे 2 टुकड़े हो गए. मेरी आंखों से अश्रुधारा बह चली, मालिक को याद कर मैं फूटफूट कर रोया. ऐसा लगा मालिक बीच की दीवार को देख उदास खडे़ हैं. लगा कि काश, मालकिन और बसंत ने थोड़ा शांति से काम लिया होता तो मेरे यों 2 टुकड़े न होते.

बात यहीं थोड़े ही खत्म हुई. कुछ दिन बाद शिषिर, कूहू और पीहू आईं, मालकिन सब को देख कर खुश हुईं, शिषिर ने मालकिन, बसंत, कूहू, पीहू को एकसाथ बिठा कर कहा, ‘यह तो कोई बात नहीं हुई, इस मकान के 2 हिस्से आप लोगों ने अपने मन से कर लिए, मेरा हिस्सा कौन सा है?’

मालकिन चौंकी थीं, ‘क्या मतलब?’

‘मतलब यही, आधा आप ने ले लिया, आधा इस ने, मेरा हिस्सा कौन सा है?’

‘हिस्से थोड़े ही हुए हैं बेटा, मैं ने तो रोजरोज की किचकिच से तंग आ कर दीवार खड़ी करवा दी, मैं अपना कमातीखाती हूं, नहीं जरूरत है मुझे किसी की.’

बसंत गुर्राया, ‘बस, अब वही मेरा हिस्सा है, मेरा घर वहीं सैट हो गया.’

शिषिर ने कहा, ‘नहीं, यह नहीं हो सकता.’

कूहू बोली, ‘मां, हमें भैया ने इसलिए यहां आने के लिए कहा था. साफसाफ बात हो जाए, आजकल लड़कियों का भी हिस्सा है संपत्ति में, बसंत भैया, आधा नहीं मिल सकता आप को, घर में हमारा भी हिस्सा है.’

मालकिन सब के मुंह देख रही थीं. बसंत ने कहा, ‘दिखा दिया सब ने लालच. आ गए न सब अपनी औकात पर.’

खूब बहस हुई, मालकिन ने कहा, ‘ये झगड़े बंद करो, आराम से भी बात हो सकती है.’

बसंत पैर पटकते हुए अपने हिस्से वाली जगह में चला गया, शिषिर बाहर निकल गया, कूहूपीहू ने मां के गले में बांहें डाल दीं. बेटियों का स्नेह पा कर मालकिन की आंखें भर आई थीं. पीहू ने कहा, ‘मां, हमें गलत मत समझना, हम अपने लालची भाइयों को अच्छी तरह समझ गई हैं. हमें कुछ हिस्सा नहीं चाहिए, शिषिर भैया ने कहा था, मकान बेच देते हैं. मां किसी के साथ रहना चाहेंगी तो रह लेंगी या किराए पर रह लेंगी.’

कूहू ने कहा, ‘मां, यह घर हमें बहुत प्यारा है, हम इसे नहीं बेचने देंगी.’

मैं तो हमेशा की तरह चुपचाप सुन रहा था, घर की बेटियों पर बहुत प्यार आया मुझे.

कूहू और पीहू अगले दिन चली गई थीं. उन के जाने के बाद शिषिर इस बात पर अड़ गया कि उसे बताया जाए कि उस का हिस्सा कौन सा है, वह अपने हिस्से को बेच कर दिल्ली में ही मकान खरीदना चाहता था. झगड़ा बढ़ता ही जा रहा था. हाथापाई की नौबत आ गई थी.

अंतत: फैसला यह हुआ कि मुझे बेच कर 3 हिस्से कर दिए जाएंगे, आगे क्या करना है, इस विषय पर बहस कर शिषिर भी चला गया लेकिन फिर भी बसंत ने मालकिन को चैन से नहीं रहने दिया. थक कर मालकिन ने भी एक फैसला ले लिया, अपने हिस्से में ताला लगा कर अपना जरूरी सामान ले कर वे किराए के मकान में रहने चली गईं. मैं उन्हें आवाज देता रह गया. मेरी आहों ने किसी के दिल को नहीं छुआ. वे हवा में ही बिखर कर रह गईं.

तभी से मेरे दुर्दिन शुरू हो गए. जिस आंगन में मालिक अपनी मनमोहक आवाज में कबीर के दोहे गुनगुनाया करते थे वहां अब शराब और ताश की महफिलें जमतीं. छोटी बहू मना करती तो बसंत उस पर हाथ उठा देता. 2 भाइयों को मां के किराए पर रहने का अफसोस नहीं हुआ.

कूहू और पीहू अपने ससुराल से ही कोशिश कर रही थीं कि सब ठीक हो जाए, फिर दोनों भाइयों ने मिल कर यह फैसला किया कि बसंत भी कहीं किराए पर रहेगा जिस से थोड़ी तोड़फोड़ के बाद मेरे 3 हिस्से करने में उसे कोई परेशानी न हो. उन्होंने एक बार भी यह नहीं सोचा कि मैं सिर्फ ईंटपत्थर का एक मकान ही नहीं हूं, मैं वह घर हूं जिसे बनाने में मालिक ने, उन के पिता ने, एक ईमानदार सहृदय अध्यापक ने अपनी सारी मेहनत से एकएक पाई जोड़ कर मजदूरों के साथ खुद भी रातदिन लग कर कभी अपने स्वास्थ्य की भी चिंता नहीं की थी.

हर बार मालकिन जब भी किसी काम से यहां आईं, मेरे मन का कोनाकोना खिल गया. लेकिन उन के जाते ही मैं ऐसे रोया जैसे मां अपने बच्चे को छोड़ कर चली गई हो. बसंत ने अभी जाने की जल्दी नहीं दिखाई तो शिषिर ने गुस्से में एक नोटिस भेज दिया. बात कानून तक पहुंचते ही बढ़ गई. मैं ने सुना, एक दिन शिषिर आया, कह रहा था, ‘कूहू और पीहू का क्या मतलब है मकान से. उन्हें एक घुड़की दूंगा, चुप हो जाएंगी. बस, अब तुम जल्दी जाओ यहां से. मुझे अपना हिस्सा बेच कर दिल्ली में मकान खरीदना है.’

बसंत की बातों से अंदाजा हुआ कि मालकिन भी अब यहां नहीं आना चाहतीं. मैं बुरी तरह आहत हुआ. बसंत भी चला गया. मैं खालीपन से भर गया. अब मेरे आकार, बनावट की नापतोल होने लगी. कोनाकोना नापा जाता, लोग आते मेरी बनावट, मेरे रूपरंग पर मोहित होते. एक दिन कोई कह रहा था, ‘इस घर की लड़कियां कोर्ट चली गई हैं, वे पेपर्स पर साइन नहीं कर रही हैं. सब बच्चों के साइन किए बिना मकान बिक भी तो नहीं सकता आजकल, उन्होंने केस कर दिया है.’

मैं उन की बात सुन कर हैरान रह गया, फिर एक दिन कुछ लोग आए, गेट पर एक बड़ा ताला लगा कर नोटिस चिपका कर चले गए, मेरा केस अब कानून के हाथ में चला गया है, नहीं जानता हूं कि मेरा क्या होगा.

काश, मालकिन कहीं न जातीं, बसंत भी यहीं रहता फिर मुझे वह सब देखने को नहीं मिलता जिसे देख कर मैं जोरजोर से रो रहा हूं. पिछले हफ्ते ही मेरे पीछे वाली दीवार कूद कर रात को 2 बजे 3 लड़के एक लड़की को जबरदस्ती पकड़ कर ले आए. उन्होंने लड़की के मुंह पर कपड़ा बांध दिया था. पहले लड़कों ने खूब शराब पी, फिर उस लड़की की इज्जत लूट ली. लड़की चीखने की कोशिश ही करती रह गई, दुष्ट लड़कों ने उस के हाथ भी बांध दिए थे. मैं रोकता रह गया लेकिन मेरी सुनता कौन है. मेरे अपनों ने मेरी नहीं सुनी, वे दुष्ट लड़के तो पराए थे. क्या करता. इस अनहोनी को होते देख, बस, आंसू ही बहाता रहा.

डर गया हूं मैं. क्या यह सब फिर तो नहीं देखना पडे़गा. मेरा भविष्य क्या है, मुझे नहीं पता. काश, मैं यों न उजड़ा होता. एक घरआंगन में कोमल भावनाओं, स्मृतियों व अपनत्व की अनुभूति के सिवा होता ही क्या है? मेरी आंखें झरझर बहती रहती हैं.

अरे, हैप्पी बर्थडे की आवाजें आ रही हैं. सामने राघव ने शायद केक काटा है. आह, कितनी रौनक है सामने, और यहां? नहींनहीं, मैं सामने वाले घर से ईर्ष्या नहीं कर रहा हूं, मैं तो अपने समय पर, अपने अकेलेपन पर रो रहा हूं और अपनों से पुनर्मिलन की प्रतीक्षा कर रहा हूं. सिसकती दीवारें कभी मालिक को याद करती हैं, कभी मालकिन को, कभी बच्चों को. पता नहीं कब तक यों रहना होगा, अकेले, उदास, वीरान.

Emotional Story in Hindi

Fictional Story: हस्तरेखा- शिखा ने कैसे निकाला रोहिणी की समस्या का हल

Fictional Story: अचानक ही मैं बहुत विचलित हो गई. मन इतना उद्वेलित था कि कोई भी काम नहीं कर पा रही थी. बिलकुल सांपछछूंदर जैसी स्थिति हो गई. न उगलते बनता न निगलते. मेरा अतीत यहां भी मेरे सामने आ खड़ा हुआ था.

देखा जाए तो बात बहुत छोटी सी थी. शिखा, मेरी 16 वर्षीय बेटी, शाम को जब स्कूल से लौटी तो आते ही उस ने कहा, ‘‘मां, वह शर्मीला है न.’’

मेरी आंखों में प्रश्नचिह्न देख कर उस ने आगे कहा, ‘‘अरे वही, जो उस दिन मेरे जन्मदिन पर साड़ी पहन कर आई थी.’’

हाथ की पत्रिका रख कर रसोई की तरफ जाते हुए मैं ने पूछा, ‘‘हां, तो क्या हुआ उसे?’’

‘‘उसे कुछ नहीं हुआ. उस की चचेरी दीदी आई हुई हैं, मुरादाबाद से. पता है, वे हस्तरेखाएं पढ़ना जानती हैं,’’ स्कूल बैग को वहीं बैठक में रख कर जूते खोलती हुई शिखा ने कहा.

मैं चौकन्नी हो उठी. रसोई की ओर जाते मेरे कदम वापस बैठक की तरफ लौट पड़े. शिखा इस सब से अनजान अब तक जूते और मोजे उतार चुकी थी. गले में बंधी टाई खोलते हुए वह बोली, ‘‘कल रविवार है, इसलिए हम सभी सहेलियां शर्मीला के यहां जाएंगी और अपनेअपने हाथ दिखा कर उन से अपना भविष्य पूछेंगी.’’

मैं सोच में डूब गई कि आज यह अचानक क्या हो गया? मेरे भीतर एक ठंडा शिलाखंड सा आ गिरा? क्या इतिहास फिर अपनेआप को दोहराने आ पहुंचा है? क्या यह प्रकृति का विधान है या फिर मेरी अपनी लापरवाही? क्या नाम दूं इसे? क्या समझूं और क्या समझाऊं इस शिखा को? क्या यह एक साधारण सी घटना ही है, रोजमर्रा की दूसरी कई बातों की तरह? लेकिन नहीं, मैं इसे इतने हलके रूप में नहीं ले सकती.

शाम को खाना बनाते समय भी मन इसी ऊहापोह में डूबा रहा. सब्जी में मसाला डालना भूल गई और दाल में नमक. खाने की मेज पर भी सिर्फ हम दोनों ही थीं. उस की लगातार चलती बातों का जवाब मैं ‘हूंहां’ से हमेशा की ही तरह देती रही. लेकिन दिमाग पूरे समय कहीं और ही उलझा रहा. क्या इसे सीधे ही वहां जाने से मना कर दूं? लेकिन फिर खयाल आया कि उम्र के इस नाजुक दौर पर यों अपने आदेश को थोपना सही होगा?

आज तक कितना सोचसमझ कर, एकएक पग पर इस के व्यक्तित्व को निखारने का हर संभव प्रयास करती रही हूं. तब ऐसी स्थिति में यों एकदम से उस के खुले व्यवहार पर अपने आदेश का द्वार कठोरता से बंद कर पाऊंगी मैं?

नहीं, मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती. तो क्या सबकुछ विस्तार से बता कर समझाना होगा उसे? अपना ही अतीत खोल कर रख देना पडे़गा इस तरह तो. अगर मैं ऐसा कर दूं तो शिखा की नजरों में मेरा तो अस्तित्व ही बिखर जाएगा. एक खंडित प्रतिमा बन कर क्या मैं उसे वह सहारा दे सकूंगी, जो उस के लिए हवा और पानी जैसा ही आवश्यक है?

मैं आगे सोचने लगी, ‘परंतु कुछ भी हो, यों ही मैं इसे किसी भी अनजान धारा में बहते हुए चुप रह कर नहीं देख सकती. शिखा के जन्म से ले कर आज तक मनचाहा वातावरण दे कर मैं इसे वैसा ही बना पाई हूं, जैसा चाहती थी सभ्य, सुशील, संवेदनशील और आत्मविश्वास से भरपूर. अपने जीवन की इस साधना को खंडित होने से बचाना है मुझे. ‘यही सब सोचतेविचारते मैं ने रात का काम निबटाया. अखिल दफ्तर के काम से बाहर गए हुए थे. अगर वे यहां होते तो मैं इतनी उद्विग्न न होती.

अखिल मेरे मन की व्यथा जानते हैं. मेरी भावनाओं की कद्र है उन के मन में. यही सोचते हुए मैं ने बची दाल, सब्जी फ्रिज में रखी, दूध को संभाला, रसोई का दरवाजा बंद किया और आ कर अपने बिस्तर पर लेट गई. शिखा मेरे हावभाव से कुछ हैरान तो थी, एकाध बार पूछा भी उस ने पर मैं ही मुसकरा कर टाल गई. उस से बात करने से पहले मैं अपनेआप को मथ लेना चाहती थी.

अंधेरे में भी आशा की एक किरण अचानक कौंधी. मैं सोचने लगी, ‘आवश्यक तो नहीं कि शिखा के हाथ की रेखाएं उस के विश्वासों और आकांक्षाओं के प्रतिकूल ही हों पर यह भी तो हो सकता है कि ऐसा न हो. तब क्या होगा? क्या वह भी मेरी तरह…?’ यह सोच कर ही मैं सिहर उठी, जैसे ठंडे पानी का घड़ा किसी ने मेरे बिस्तर पर उड़ेल दिया हो.

मेरा अतीत चलचित्र की तरह मेरी ही आंखों के सामने घूम गया…

मैं डाक्टर बनना चाहती थी. इसलिए प्री मैडिकल टैस्ट यानी  ‘पीएमटी’ की तैयारी में जीजान से जुटी थी. 11वीं तक हमेशा प्रथम आती रही. 80 प्रतिशत से कम अंक तो कभी आए ही नहीं. आत्मविश्वास मुझ में कूटकूट कर भरा था. बड़ी ही संतुलित जिंदगी थी. मातापिता का प्यार, विश्वास, भाइयों का स्नेह, उच्चमध्यवर्ग का आरामदेह जीवन और उज्ज्वल भविष्य.

प्रथम वर्ष का परीक्षाफल आने ही वाला था. इस के 1 दिन पहले की बात है. मैं सुबह 4 बजे से उठ कर अपनी पढ़ाई में जुटी थी. 10 बजतेबजते ऊब उठी. मां पंडितजी के पास किसी काम के लिए जा रही थीं. मैं भी यों ही उन के साथ हो ली, एकाध घंटा तफरीह मारने के अंदाज में.

पंडितजी ने मां के प्रणाम का उत्तर देते ही मुझे देख कर कहा, ‘अरे, यह तो रोहिणी बिटिया है. देखो तो, कितनी जल्दी बड़ी हो गई है. कौन सी कक्षा में आ गई इस वर्ष?’

मैं ने उन्हें बताया तो सुन कर बड़े प्रसन्न हुए और बोले, ‘अच्छाअच्छा, तो पीएमटी की तैयारी चल रही है. प्रथम वर्ष का परिणाम तो नहीं आया न अभी. वह क्या है, अपना सुरेश, मेरा नाती, उस ने भी प्रथम वर्ष की ही परीक्षा दी है.’

‘पंडितजी, आजकल में परिणाम आने ही वाला है,’ मां ने ही जवाब दिया था.

मैं तो अपनी आदत के अनुरूप उन के आसपास रखी पुस्तकों में उलझ गई थी.

मेरी ओर देख कर पंडितजी मुसकराए, ‘भई, यह तो हर वर्ष पूरे जिले में अपने विद्यालय का नाम रोशन करती है. आप तो मिठाई तैयार रखिए, इस बार भी अव्वल ही आएगी.’

मां भी इस प्रशंसा से खुश थीं. वे हंस कर बोलीं, ‘मुंह मीठा तो अवश्य ही होगा आप का. आज यह साथ आ ही गई है तो हाथ बांचिए न इस का.’

मां इन सब बातों में बहुत विश्वास रखती हैं, यह मुझे मालूम था. मुझे स्वयं भी जिज्ञासा हो आई. भविष्य में झांकने की आदिम लालसा मेरे भीतर एकाएक जाग उठी. मैं ने अपना हाथ पंडितजी की ओर फैला दिया.

उन्होंने भी सहज ही मेरा हाथ पकड़ा और लकीरों की उधेड़बुन में खो गए. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता गया, उन के माथे की लकीरें गहरी होती गईं. फिर कुछ झिझकते हुए से बोले, ‘बेटी, अपने व्यवसाय को ले कर अधिक ऊंचे सपने न देखो. बहुत अच्छा भविष्य है तुम्हारा. बहुत अच्छा घरवर…’

मैं आश्चर्यचकित उन की ओर देख रही थी और मां परेशान हो चली थीं. शायद सोच रही थीं कि नाहक इस लड़की को साथ लाई, घर पर ही रहती तो अच्छा था.

आखिर मां बोल उठीं,  ‘पंडितजी, छोडि़ए, मैं तो आप के पास किसी और काम से आई थी.’’

लेकिन अचानक मां की दृष्टि मेरे बदरंग होते चेहरे पर पड़ी और वे चुप हो गईं.

कुछ पलों की उस खामोशी में मेरे भीतर क्याक्या नहीं हुआ. पहले तो अपमान की ज्वाला से जैसे मेरे सर्वांग जल उठा. मुझे लगा, मेरे चेहरे से भाप निकल कर आसपास का सबकुछ जला डालेगी. अपने भीतर की इस आग से मैं स्वयं भयभीत थी कि अगले ही पल मेरा शरीर हिमशिला सा ठंडा हो गया. मैं पसीने से भीग गई.

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं कहां हूं और मेरे चारों ओर क्या हो रहा है. सन्नाटे के बीच मां की आवाज बहुत दूर से आती प्रतीत हुई, ‘चल, रोहिणी, तेरी तबीयत ठीक नहीं लगती. घर चलें.’

इस के बाद पंडितजी से उन्होंने क्या बोला, कब मैं खाना खा कर सो गई, मुझे कुछ याद नहीं. सब यंत्रचालित सा  होता रहा.

अगली सुबह जब मेरी नींद खुली तो मैं उस आरंभिक सदमे से बाहर आ चुकी थी. दिमाग की शून्यता फिर विचारों से धीरेधीरे भरने लगी थी. एकएक कर पिछले दिन का वृत्तांत मेरे सामने क्रम से आने लगा और विचार व्यवस्थित होने लगे.

मैं सोचने लगी कि यह मेरी कैसी पराजय है और क्यों? मैं तो पूरी मेहनत कर रही हूं. सामने ही तो सुखद परिणाम भी दिख रहे हैं, फिर यह सबकुछ मरीचिका कैसे बन सकता है? मैं अपने मन को दृढ़ करने के प्रयत्न में लगी थी. दरअसल, मां ने मुझे अकेला छोड़ दिया था.

पर यह सब तो मेरी जीवनसाधना पर कुठाराघात था. अब तक तो यही जाना था कि जीतोड़ कर की गई मेहनत कभी असफल नहीं होती. पर अब इस संदेह के बीज का क्या करूं? दादाजी भी तो कहते हैं कि हस्तरेखाओं में कुछ न कुछ तो लिखा ही रहता है. पर पढ़ना तो कोई विरला ही जानता है. मन को दिलासा दिया कि ंशायद पंडितजी पढ़ना जानते ही नहीं.

पर शक तो अपना फन फैलाए खड़ा था. असहाय हो कर मैं एकाएक रो पड़ी थी. पर फिर अपनेआप को संभाला, उठी और इस शक के फन को कुचलने की तैयारी में जुट गई. खूब मेहनत की मैं ने. मातापिता भी आश्वस्त थे मेरी पढ़ाई और आत्मविश्वास से. पर शक मेरे भीतर ही भीतर कुलबुला रहा था और शायद यही कुलबुलाहट उस दुर्घटना का कारण बनी.

मैं पहला पेपर देने जा रही थी. भाई मुझे परीक्षा भवन के बाहर तक छोड़ कर चला गया. अंदर जाने के लिए सड़क पार करने लगी कि जाने कहां से मेरा भविष्य निर्देशक बन एक ट्रक आया और मुझे एक जबरदस्त टक्कर लगा कर चलता बना. कुछ ही पलों में सब हो गया. समझ तब आया जब मैं हाथ में आई बाजी हार चुकी थी. अस्पताल में मेरी आंखें खुलीं. मेरे हाथों और सिर पर पट्टियां बंधी थीं. शरीर दर्द से अकड़ रहा था और मातापिता व भाई रोंआसे चेहरे लिए पास खड़े थे.

यहीं मुझ से दूसरी गलती हुई. मैं ने हार मान ली. मैं फिर उठ खड़ी होती, अगली बार परीक्षा देती तो मेरे सपने पूरे हो सकते थे. लेकिन मेरे साथसाथ घर में सभी मुझे छू कर लौटी मौत से आतंकित थे. सो, मेरे तथाकथित ‘भाग्य’ से सभी ने समझौता कर लिया. किसी ने मुझे इस दिशा में प्रोत्साहित नहीं किया. मेरा तो मन ही मर चुका था.

बीएससी 2 साल में पूरी की ही थी कि अखिल के घर से मेरे लिए रिश्ता आ गया.

अखिल को मैं बचपन से जानती थी. मैं ने ‘हां’ कर दी. उम्मीद थी, इन के साथ सुखी रहूंगी और सुखी भी रही. 18 साल हो गए विवाह को, कभी हमारे बीच कोई गंभीर मनमुटाव नहीं हुआ. घर में सभी सदस्य एकदूसरे को इज्जत व प्यार देते हैं.

मेरे मन में अपनी असफलता की फांस आरंभ में तो बहुत गहरी धंसी थी. लेकिन अखिल के प्यार ने इसे हलका कर दिया था. अनुकूल वातावरण में हृदय के घाव भर ही जाते हैं. लेकिन अनजाने में मेरी अपनी बेटी ने ही इस घाव को कुरेद कर हरा कर दिया था. मेरे सपनों, मेरी आकांक्षाओं और असफलताओं के बारे में कुछ भी तो नहीं जानती, शिखा.

मैं फिर सोच में डूब गई कि उसे किस तरह से समझाऊं. खुद की की गई गलतियां मैं उसे दोहराते हुए नहीं देख सकती थी. ऐसा नहीं कि मैं अपनी आकांक्षाएं उस के द्वारा पूरी कर लेना चाहती थी, लेकिन उस के अपने सपने मैं किसी भी सूरत में पूरे होते देखना चाहती थी. इस के लिए मुझे दुविधा के इस घेरे से बाहर निकलना ही था.

मैं बिस्तर से उठ खड़ी हुई. सोचा कि अभी देखूं शिखा क्या कर रही है? उस के कमरे का दरवाजा खुला था, बत्ती जल रही थी. मेज पर झुकी हुई शायद वह गणित के सूत्रों में उलझी हुई थी.

नंगे पैर जाने के कारण मेरे कदमों की आहट वह नहीं सुन सकी थी.

‘‘शिखा, सोई नहीं अभी तक?’’ मैं ने पूछा तो वह चौंक उठी.

‘‘ओह मां, आप भी, कैसे चुपके से आईं. डरा ही दिया मुझे. अभी तो सवा 11 ही हुए हैं. आप क्यों नहीं सोईं’’, झुंझलाते हुए वह मुझ से ही प्रश्न कर बैठी.

मैं धीरे से बोली, ‘‘बेटी, कल तुम शर्मीला के घर जाना चाहती हो न? उस की बहन, जो ज्योतिष…’’

‘‘अरे हां, लेकिन इस वक्त, यह कोई बात है करने की. यह तो फालतू की बात है. मैं तो विश्वास भी नहीं करती. बस, ऐसे ही थोड़ा सा परेशान करेंगे दीदी को,’’ शैतानी से हंसते हुए वह बोली.

मेरे चेहरे की तनी हुई रेखाओं को शायद ढीला पड़ते उस ने देख लिया था. तभी एकाएक गंभीर हो उठी और बोली, ‘‘मां, मालूम है, पिताजी क्या कहते हैं?’’

‘‘क्या?’’ मैं समझ नहीं पा रही थी किस संदर्भ में बात करना चाहती है मेरी शिखा.

‘‘पिताजी कहते हैं कि इंसान, उस की इच्छाशक्ति और उस की मेहनत, ये सब हर चीज से ऊपर होते हैं.’’

अपनी मासूम बिटिया के मुंह से इतनी बड़ी बात सुन कर मैं रुई के फाहे सी हलकी हो गई.

अपने कमरे में आ कर बिस्तर पर लेटते हुए मैं ने अनुभव किया कि शिखा मुझ पर नहीं गई, यह तो लाजवाब है. लेकिन नहीं, यह लड़की लाजवाब नहीं, यह तो मेरा जवाब है. फिर मुसकराते हुए मैं नींद के आगोश में समा गई.

Fictional Story

Short Story in Hindi: आत्मग्लानि- आखिर क्यों घुटती जा रही थी मोहनी

Short Story in Hindi: मधु ने तीसरी बार बेटी को आवाज दी,  ‘‘मोहनी… आ जा बेटी, नाश्ता ठंडा हो गया. तेरे पापा भी नाश्ता कर चुके हैं.’’

‘‘लगता है अभी सो रही है, सोने दो,’’ कह कर अजय औफिस चले गए.

मधु को मोहनी की बड़ी चिंता हो रही थी. वह जानती थी कि मोहनी सो नहीं रही, सिर्फ कमरा बंद कर के शून्य में ताक रही होगी.

‘क्या हो गया मेरी बेटी को? किस की नजर लग गई हमारे घर को?’ सोचते हुए मधु ने फिर से आवाज लगाई. इस बार दरवाजा खुल गया. वही बिखरे बाल, पथराई आंखें. मधु ने प्यार से उस के बालों में हाथ फेरा और कहा, ‘‘चलो, मुंह धो लो… तुम्हारी पसंद का नाश्ता है.’’

‘‘नहीं, मेरा मन नहीं है,’’ मोहनी ने उदासी से कहा.

‘‘ठीक है. जब मन करे खा लेना. अभी जूस ले लो. कब तक ऐसे गुमसुम रहोगी. हाथमुंह धो कर बाहर आओ लौन में बैठेंगे. तुम्हारे लिए ही पापा ने तबादला करवाया ताकि जगह बदलने से मन बदले.’’

‘‘यह इतना आसान नहीं मम्मी. घाव तो सूख भी जाएंगे पर मन पर लगी चोट का क्या करूं? आप नहीं समझेंगी,’’ फिर मोहनी रोने लगी.

‘‘पता है सबकुछ इतनी जल्दी नहीं बदलेगा, पर कोशिश तो कर ही सकते हैं,’’ मधु ने बाहर जाते हुए कहा.

‘‘कैसे भूल जाऊं सब? लाख कोशिश के बाद भी वह काली रात नहीं भूलती जो अमिट छाप छोड़ गई तन और मन पर भी.’’

मोहनी को उन दरिंदों की शक्ल तक याद नहीं, पता नहीं 2 थे या 3. वह अपनी सहेली के घर से आ रही थी. आगे थोड़े सुनसान रास्ते पर किसी ने जान कर स्कूटी रुकवा दी थी. जब तक वह कुछ समझ पाती 2-3 हाथों ने उसे खींच लिया था. मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. कपड़े फटते चले गए… चीख दबती गई, शायद जोरजबरदस्ती से बेहोश हो गई थी. आगे उसे याद भी नहीं. उस की इसी अवस्था में कोई गाड़ी में डाल कर घर के आगे फेंक गया और घंटी बजा कर लापता हो गया था.

मां ने जब दरवाजा खोला तो चीख पड़ीं. जब तक पापा औफिस से आए, मां कपड़े बदल चुकी थीं. पापा तो गुस्से से आगबबूला हो गए. ‘‘कौन थे वे दरिंदे… पहचान पाओगी? अभी पुलिस में जाता हूं.’’

पर मां ने रोक लिया, ‘‘ये हमारी बेटी की इज्जत का सवाल है. लोग क्या कहेंगे. पुलिस आज तक कुछ कर पाई है क्या? बेकार में हमारी बच्ची को परेशान करेंगे. बेतुके सवाल पूछे जाएंगे.’’

‘‘तो क्या बुजदिलों की तरह चुप रहें,’’ ‘‘नहीं मैं यह नहीं कह रही पर 3 महीने बाद इस की शादी है,’’ मां ने कहा.

पापा भी कुछ सोच कर चुप हो गए. बस, जल्दी से तबादला करवा लिया. मधु अब साए की तरह हर समय मोहनी के साथ रहती.

‘‘मोहनी बेटा, जो हुआ भूल जाओ. इस बात का जिक्र किसी से भी मत करना. कोई तुम्हारा दुख कम नहीं करेगा. मोहित से भी नहीं,’’ अब जब भी मोहित फोन करता. मां वहीं रहतीं.

मोहित अकसर पूछता, ‘‘क्या हुआ? आवाज से इतनी सुस्त क्यों लग रही हो?’’ तब मां हाथ से मोबाइल ले लेतीं और कहतीं, ‘‘बेटा, जब से तुम दुबई गए हो, तभी से इस का यह हाल है. अब जल्दी से आओ तो शादी कर दें.’’

‘‘चिंता मत करिए. अगले महीने ही आ रहा हूं. सब सही हो जाएगा.’’

मां को बस एक ही चिंता थी कहीं मैं मोहित को सबकुछ बता न दूं. लेकिन यह तो पूरी जिंदगी का सवाल था. कैसे सहज रह पाएगी वह? उसे तो अपने शरीर से घिन आती है. नफरत सी हो गई है, इस शरीर और शादी के नाम से.

‘‘सुनो, हमारी जो पड़ोसिन है, मिसेज कौशल, वह नाट्य संगीत कला संस्था की अध्यक्ष हैं. उन का एक कार्यक्रम है दिल्ली में. जब उन्हें मालूम हुआ कि तुम भी रंगमंच कलाकार हो तो, तुम्हें भी अपने साथ ले कर जाने की जिद करने लगी. बोल रही थी नया सीखने का मौका मिलेगा.’’

‘‘सच में तुम जाओ. मन हलका होगा. 2 दिन की ही तो बात है,’’ मां तो बस, बोले जा रही थीं. उन के आगे मोहनी की एक नहीं चली.

बाहर निकल कर सुकून तो मिला. काफी लड़कियां थीं साथ में. कुछ बाहर से भी आई थीं. उस के साथ एक विदेशी बाला थी, आशी. वह लंदन से थी. दोनों साथ ठहरे थे, एक ही कमरे में. जल्दी ही मोहनी और वे दोस्त बन गए, पर फिर भी मोहनी अपने दुख के कवच से निकल नहीं पा रही थी. एक रात जब वे होटल के कमरे में आईं तो मोहनी उस से पूछ बैठी, ‘‘आशी, तुम भी तो कभी देर से घर ती होंगी? तुम्हें डर नहीं लगता?’’

‘‘डर? क्यों डरूं मैं? कोई क्या कर लेगा. मार देगा या रेप कर लेगा. कर ले. मैं तो कहती हूं, जस्ट ऐंजौय.’’

‘‘क्या? जस्ट ऐंजौय…’ मोहनी का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘अरे, कम औन यार. मेरा मतलब है कोई रेप करे तो मैं क्यों जान दूं? मेरी क्या गलती? दूसरे की गलती की सजा मैं क्यों भुगतूं. हम मरने के लिए थोड़ी आए हैं. वैसे भी जो डर गया समझो मर गया.’’

आशी की बात से मोहनी को संबल मिला. उसे लगा आज कितने दिन बाद दुख के बादल छंटे हैं और उसे इस आत्मग्लानि से मुक्ति मिली है. फिर दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं.

Short Story in Hindi

Ridhima Pandit: बोल्ड एक्ट्रेस की ग्लैमरस एंट्री, रोमांस और ड्रामा का नया ट्विस्ट

Ridhima Pandit: छोटे पर्दे की रोबोट बहू के नाम से फेमस एक्ट्रेस रिद्धिमा पंडित सोनी सब के ‘उफ़्फ़… ये लव है मुश्किल’ शो की कहानी में शामिल हो रही हैं. इसमें वो लता का रोल निभा रही है.

खूबसूरत और ग्लैमरस रोल

अपने नए किरदार के बारे में बात करते हुए रिद्धिमा पंडित ने कहा, “लता का किरदार मुझे उसकी जटिलता के कारण बहुत आकर्षक लगा. वह खूबसूरत और ग्लैमरस है, लेकिन उसकी पहचान सिर्फ यही नहीं है. वह समझदार, रणनीतिक और धाराप्रवाह बोलने वाली है, जो परिस्थितियों को अपने हिसाब से मोड़ना जानती है.

एक नजर रिद्धिमा के करियर पर –

रिद्धिमा पंडित ने 2016 में आए शो ‘बहू हमारी रजनी कांत’ से डेब्यू किया था. लेकिन इससे पहले इन्होंने कई बड़े ब्रांड्स के लिए बतौर मॉडल काम किया था. डेब्यू शो के लिए इन्हे गोल्ड अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था. इन्होंने ‘खतरों के खिलाड़ी 9’ किया था और सेकेंड रनर-अप रही थीं. वहीं, ‘बिग बॉस ओटीटी सीजन 1’ भी किया लेकिन जल्द ही शो से आउट हो गई थीं. इसके अलावा रिधिमा ने डांस चैंपियंस भी होस्ट किया है.

सोशल मीडिया पर लाइमलाइट बटोरती-

बोल्ड एक्ट्रेस रिद्धिमा पंडित अक्सर प्रोफेशनल लाइफ से ज्यादा पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में रहती हैं. इसके अलावा वह अपनी हॉट एंड ग्लैमर स्टाइल से इंटरनेट पर तहलका मचाती रहती हैं. अपने बोल्ड और स्टनिंग लुक्स के चलते सोशल मीडिया पर लाइमलाइट बटौरती रहती हैं. उनका हर एक लुक इंटरनेट पर शेयर होते ही तेजी से वायरल होने लगता है.

Ridhima Pandit

Amitabh Bachchan: 82 साल की उम्र में दालचावल और आलू खाकर हैं फिट

Amitabh Bachchan: 82 वर्ष की उम्र में कई बीमारियां होने के बावजूद, बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन इतना फिट और ऊर्जा से भरपूर कैसे हैं? यह बात हर कोई जानना चाहता है कि बिग बी ऐसा क्या खाते हैं? उनकी इस एनर्जी का राज क्या है? राज से पर्दा हटाते हुए अमिताभ बच्चन ने एक इंटरव्यू में बताया कि उनकी सेहत का राज कोई हेल्थ सप्लीमेंट या डाइट फूड नहीं बल्कि वह खाना हैं जो वे बचपन से खाते आए हैं.

अमित जी के अनुसार, “मैं बहुत ज्यादा फूडी नहीं हूं, सादा खाना ही पसंद है. मैं पूरी तरह से शाकाहारी हूं. मेरा फेवरेट फूड दाल चावल और आलू की सब्जी है, जो मैं कभी भी खाने के लिए तैयार रहता हूं. यह खाना मैंने बचपन से खाया है. दाल चावल और आलू की सब्जी खाने के बाद सिर्फ पेट हीं नहीं भरता, बल्कि आत्मा भी तृप्त हो जाती है.

मुझे रोजमर्रा की जिंदगी में भी ऐसा ही खाना पसंद है जो आराम से डाइजेस्ट हो जाए मजेदार भी हो. अब उम्र हो रही है इसलिए खाने में सावधानी बरतना भी जरूरी हो गया है. मैं खाने के साथ-साथ अपने जिम इंस्ट्रक्टर के साथ हल्की-फुल्की एक्सरसाइज और योग जरूर करता हूं.” सच बात तो ये है कि अगर आप हल्का-फुल्का खाना और योगा अगर नियमित रूप से करते हैं, तो आपका शरीर हमेशा स्वस्थ और तंदुरुस्त रह सकता है.

अमिताभ बच्चन का वर्कआउट रूटीन

अमिताभ बच्चन वर्कआउट रूटीन में जरा भी लापरवाही नहीं बरतते हैं. वह वेट ट्रेनिंग और जॉगिंग जैसी एक्सरसाइज करते हैं.  मेंटल हेल्थ सही रखने के लिए 8 घंटे की प्रॉपर नींद लेते हैं. सुबह जल्दी उठकर वर्कआउट करते हैं. इसके अलावा फिजिकल स्ट्रैंथ मसल ट्रेनिंग के अलावा स्ट्रेस मैनेजमेंट के लिए योग और मेडिटेशन का सहारा लेते हैं. खाने में शक्कर का इस्तेमाल वह बिल्कुल नहीं करते.

सुबह में खाली पेट दो गिलास गुनगुना पानी पीते हैं, एक कप आवले का जूस पीते हैं, वह चाय, कॉफी, सॉफ्ट ड्रिंक बिल्कुल नहीं लेते, बल्कि फ्रेश फ्रूट का जूस और हरी सब्जियों का सूप लेना पसंद करते हैं. अमित जी शराब का सेवन भी नहीं करते और 20 मिनट की वॉक जरूर करते हैं.

अमित जी के अनुसार उनके बाबूजी कहां करते थे, “अगर जीवन में स्वस्थ और खुश रहना है तो सादा जीवन उच्च विचार रखने की कोशिश करो, क्योंकि आपकी अच्छी और पॉजिटिव सोच आपकी जिंदगी को आसान बना देती है. चाहे कितनी ही मुसीबत आ जाए आपकी अच्छी सोच आपको कभी हारने नहीं देती, अपने बाबूजी की यह बात मैंने गांठ बांध ली है. उसी को फॉलो करते हुए मैंने अपनी अब तक की जिंदगी बिताई है और आगे भी अपने बाबूजी की दी हुई शिक्षा को हमेशा फॉलो करुंगा.

Amitabh Bachchan

Wife’s Extramarital Affair: पति, पत्नी के प्रेमी को सहज स्वीकार कर लें

Wife’s Extramarital Affair: पति और पत्नी का रिश्ता एक सामाजिक और कानूनी रूप से मान्य बंधन है, जबकि प्रेमी और प्रेमिका का रिश्ता भावनात्मक और व्यक्तिगत होता है. कई बार ऐसी स्थिति आ जाती है कि पति को पत्नी के प्रेमी को सहज में लेना पड़ता है.

दरअसल, आज पतिपत्नी दोनों कमा रहे हैं. पत्नी सरकारी स्कूल में टीचर है. वहां उस का किसी से अफेयर चल रहा है. पति बेचारा क्या करेगा. बच्चों के लिए साथ रहना भी जरूरी है इसलिए छोड़ भी नहीं पा रहा है. पत्नी कहती है कि तुम मुझे छोड़ना चाहते हो तो छोड़ दो. लेकिन तलाक ले कर तुम करोगे क्या? अब मैं तुम्हारा घर तो संभालती हूं न. तलाक दोगे तो एलिमनी भी देनी पड़ेगी. दूसरा, इस उम्र में अब कोई दोबारा तो तुम से शादी करेगी नहीं. मेरा तो प्रेमी है में उस के साथ घर बसा लूंगी, तुम कहां ढूंढ़ते रहोगे एक पार्टनर. तुम्हारे पास तो घर संभालने वाली औरत भी नहीं बचेगी.

यह स्थिति बिलकुल ऐसी ही है जैसे एक ऐक्सीडेंट में आप का हाथ काट जाए तो आप क्या करते हैं? उसी बौडी के साथ मैनेज करते हैं न. पूरी बौडी को तो नहीं फेक देते. इसी तरह पत्नी की यह बाहर की लाइफ है. आप पत्नी के साथ घर पर एक लाइफ अलग से जिएं. आइए, जानें कैसे जिएं ऐसी जिंदगी :

पत्नी आप की मिल्कियत नहीं

अगर आप को लगता है कि शादी कर के आप ने पत्नी को खरीद लिया है और जिंदगीभर के लिए अब उस पर आप का मालिकाना हक हो गया है तो भूल जाएं। पत्नी की अपनी मरजी है। उसे अगर लगता है कि अब वह आप से प्यार नहीं करती और किसी और के साथ उसे ज्यादा अच्छा लग रहा है, वह ज्यादा सुकून महसूस कर रही है तो आप ऐसे ऐसा न करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते क्योंकि आज की पत्नी आप पर आश्रित नहीं है। वह भी कमा रही है. किसी पर बोझ नहीं है. इसलिए वह जो चाहे कर सकती है.

मुश्किल है पर असंभव नहीं

इस बात को हजम करना वाकई बड़ा मुश्किल है कि अब आप के बच्चों की मां को किसी और से प्यार हो गया है और आप के लिए न उसे छोड़ते बन रहा है और न ही साथ रखते बन रहा है. लेकिन यह फैसला तो लेना ही होगा. पत्नी को देख हर वक्त के गुस्से से कुछ नहीं होने वाला. तलाक लेना ही कौन सा आसान है तो फिर साथ रहने का फैसला कर लिया है तो चीजों को उसी तरह से हैंडल करें. धीरेधीरे आप भी यूज टू हो जाएंगे. वैसे भी गुस्सा पत्नी पर आता है पर अब वह पत्नी कहां रही, अब तो वह केवल आप के बच्चों की मां है. उसे उसी नजर से देखें और बरदाश्त कर लें.

घर टूटने से बच जाएगा

अगर तलाक लिया तो घर टूट जाएगा. पत्नी के हाथ में तो उस का बौयफ्रैंड है. लेकिन आप का हाथ खाली है और तलाक के बाद एक अच्छी पत्नी की तलाश करना बहुत मुश्किल है. पता चला, पूरी जिंदगी अकेले काटनी पङ रही है या फिर कोई इस से भी बेकार पत्नी आ जाए तो जिंदगी बेकार है. बच्चे भी मुश्किल में पङ जाएंगे। इसलिए  ऐसा करने से पहले 100 बार सोचें.

बच्चों के लिए तो गुजारा करना ही पड़ता है

बच्चे अकेले आप के नहीं हैं, पत्नी के भी हैं और अब वह आप से प्यार नहीं करती. ऐसे में अफेयर होने के बाद भी आप के साथ रहने का फैसला करना उस के लिए भी उतना ही मुश्किल है जितना आप के लिए. लेकिन बच्चों के लिए सब करना पड़ता है. इसलिए स्थिति को समझें और साथ बैठ कर इस का कोई हल निकालें।

पत्नी भी समझे अपनी जिम्मेदारियां

पत्नी के प्रेमी को पति स्वीकार कर रहा है और उसे तलाक नहीं दे रहा. यह बहुत बड़ी बात है. जब वह इस रिश्ते को निभा रहा है तो आप को भी तो अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटना चाहिए. घर के काम आप पहले जैसे करती थीं वैसे ही करें. घर को संभालती थीं टाइम से, बच्चों और पति को खाना दे रही थीं, तो अभी भी दें. पति के बीमार होने पर उस की देखभाल भी करें क्योंकि न भूलें कि आप अभी भी उन के घर में रह रही हैं. अपनी किसी जिम्मेदारी से पल्ला न झाड़ें.

अपने रिश्ते के दायरे तय करें

अगर साथ रहने का सोच ही लिया है, तो उसे पहले जैसे ही अपना घर समझ कर रहें. आप को जो करना है घर के बाहर करें. घर में अपने बौयफ्रैंड को बुलाने की इजाजत आप को नहीं है. घर में हर वक्त उस से फोन पर बात करना भी गलत है. घर पर उस का जिक्र करना भी ठीक नहीं है. आप का जो भी रिश्ता है उसे बाहर निभाएं, वह घर तक नहीं आना चाहिए.

इसी तरह अगर पति भी किसी के साथ डेट कर रहा है तो उस का जिक्र भी घर में न करें. इस से बच्चों को इन्सिक्योरिटी होगी कि हमारे मांबाप अपनाअपना सोच रहे हैं, अब हमारा क्या होगा.

लड़ाईझगड़ा किसी समस्या का हल नहीं

जब यह सोच ही लिया है कि साथ रहना है, तलाक नहीं लेना तो हर वक्त एकदूसरे को ताने मारने से कुछ हासिल नहीं होगा. इस के बजाए सोचें कि इस तरह आगे का जीवन आप कैसे चलाने वाले हैं. जिन चीजों को बदल नहीं सकते उन पर अफसोस करना बेकार है. बल्कि बिना झगड़े एकदूसरे को कैसे बरदाश्त किया जाए इस के बारे में सोचें.

बच्चों पर गलत असर न पड़े

आखिर इस तरह इस रिश्ते में रहने का मकसद एक ही है कि बच्चे परेशान न हों. लेकिन अगर रोज आप बच्चों के सामने पत्नी को उस के अफेयर का ताना देंगे या पत्नी आप को बेकार बताएगी तो बच्चे और भी ज्यादा दुखी होंगे और गलत सीखेंगे. इसलिए जो भी बात करनी है घर से बहार जा कर करें या जब बच्चे न हों तब करें. बच्चों के सामने घर के माहौल को बिलकुल सही बनाए रखें, तभी फायदा है.

Wife’s Extramarital Affair

Life After Divorce: बिना बच्चों के जिंदगी समस्या नहीं, जानें ऐक्सपर्ट की राय

Life After Divorce: एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करने वाली सिमरन की शादी के केवल 2 साल ही हुए थे कि उसे अपने पति की नशे की आदत और डोमेस्टिक वायलेंस से तंग आ कर डिवोर्स लेना पड़ा. हालांकि यह डिवोर्स म्यूचुअली था, इसलिए 1 साल के अंदर उसे तलाक मिल गया. सिमरन को बच्चा नहीं है, जौब कर रही है और रोजरोज के झगड़े से निकल कर अकेले रहना पसंद कर रही है. परिवार वालों के प्रेशर पर भी वह दूसरी शादी नहीं करना चाहती, क्योंकि वह आत्मनिर्भर है और अपने फ्यूचर का प्लान खुद करना जानती है.

यह तो अच्छा हुआ कि शादी के बाद जब सिमरन ने पति की बुरी आदतों को देखा तो मन में निश्चय कर लिया था कि वह उसे तलाक देगी. इस में इतनी देर होने की वजह बारबार उस के पति का फिर से नशा न करने और मारपीट न करने का कसम खाना रहा.

हर बार उसे लगता था कि वह सुधर जाएगा या सुधरने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उस के व्यवहार में जरा सा भी परिवर्तन सिमरन को नहीं दिखा. सिमरन ने कई बार उस के पेरैंट्स से इस की शिकायत भी की. उन्होंने भी उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह कहां मानने वाला था. थोड़े दिनों तक ठीक रहने के बाद फिर से वही नशा और गालीगलौच करता रहता था. यह अच्छा हुआ कि सिमरन  पति की इन आदतों से डर कर प्रैगनैंट नहीं हुई, जिस से आज वह अपनी उन्मुक्त जिंदगी जी पा रही है.

असल में तलाक के बाद खासकर जब बच्चे न हों, तो जीवन को फिर से शुरू करना कई बार मुश्किल होता है, क्योंकि लोगों के ताने सुन कर खुद को दोषी मान लेना अधिकतर स्त्रियां करती हैं, लेकिन अगर आप आत्मनिर्भर हैं, तो निर्णय लेने में समस्या नहीं होती, जो इस हालात में सब से अधिक जरूरी होता है और आगे बढ़ना मुश्किल नहीं होता. इस में बच्चे की जिम्मेदारी का बोझ सिमरन को नहीं था, जिस से उसे किसी निर्णय पर पहुंचना आसान हुआ. उस के लिए अकेले रह कर तलाक लेना अच्छा साबित हुआ है, जबकि इस में उस के परिवार वालों ने भी उस का साथ दिया.

समझें ऐक्सपर्ट की राय

मनोवैज्ञानिक, राशिदा कपाडिया कहती हैं कि ऐसा कई बार देखा गया है कि तलाक के बाद अकेले जिंदगी गुजरना उन स्त्रियों के लिए भारी पड़ता है, जो आत्मनिर्भर नहीं. आज की लड़कियां और उन के परिवार डिवोर्स को अच्छी तरह से स्वीकार करती हैं, क्योंकि रोजरोज के कौन्फ्लिक्ट्स उन्हें पसंद नहीं.

इस में डिवोर्स के बाद अपने लिए एक नया जीवन जीने के लिए आप को अपनी भावनाओं को काबू करने की जरूरत होती है. साथ ही अपने लक्ष्यों को फिर से परिभाषित करने और अपने जीवन को फिर से व्यवस्थित करने की आवश्यकता होती है. इस में कुछ स्टैप्स निम्न हैं, जिस के द्वारा आप एक अच्छी और स्वस्थ जीवन बीता सकते हैं :

डिवोर्स को करें स्वीकार

पहले तलाक एक दर्दनाक अनुभव माना जाता रहा है, लेकिन आज इस में काफी परिवर्तन आया है, क्योंकि आज कई लड़कियां पढ़ीलिखी और आत्मनिर्भर होती हैं. यही वजह है कि आज डिवोर्स की संख्या लगातार बढ़ रही है, क्योंकि किसी भी गलत बात को वे सहन नहीं करतीं, बल्कि उस से निकल कर एक अच्छी जिंदगी जीना पसंद करती हैं. इस में अपनी भावनाओं को स्वीकार करना और उन्हें प्रोसेस्ड करना महत्त्वपूर्ण होता है, जिस में आप के दोस्त और परिवारजनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है.

कुछ लड़कियां डिवोर्स को अच्छा नहीं मानतीं जबकि कुछ इसे मानसिक अशांति से नजात पाना समझती हैं. तलाक के बाद खुद को दुखी होने, गुस्सा करने या निराश होने की अब जरूरत नहीं होती.

प्रोफैशनल्स की लें सहायता

किसी दोस्त, परिवार के सदस्य, चिकित्सक या सहायता समूह से बात करना इस दौरान काफी आवश्यक होता है, ताकि आप को अकेलापन महसूस न हो, जिस के साथ अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और उन से निबटने के लिए अच्छी सुझाव मिल सके. इस दौरान किसी प्रकार की काउंसलिंग या थेरैपी कई बार अच्छी साबित होती है.

उन ग्रुप्स में शामिल हों, जिन्होंने डिवोर्स लिया हो और एक अच्छी जिंदगी जी रही हों, इस से आप के अंदर आत्मविश्वास जल्दी आ सकेगा.

बनाएं मजबूत सपोर्ट सिस्टम

डिवोर्स के बाद खुद को घर में बंद न कर लें, बल्कि बाहर निकलें और खुद की जिंदगी को अपनी तरह से जीने की कोशिश करें मसलन दोस्त बनाएं और कहीं घूमने जाएं. इस से आप का सपोर्ट सिस्टम मजबूत बनेगा और आप जब मन चाहे, उन से खुल कर अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकेंगी.

बनें आत्मनिर्भर

डिवोर्स के बाद कई बार लड़कियां आत्मनिर्भर नहीं होतीं. ऐसे में उन्हें अधिक ताने सुनने पड़ते हैं. ऐसी लड़कियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रयास करना चाहिए. अगर पढ़ाई कम है, तो उसे पूरा करें. वोकेशनल ट्रेनिंग लें और काम पर लग जाएं, इस से आप जल्दी आत्मनिर्भर बन कर अपने फ्यूचर का प्लान कर सकती हैं.

अपनेआप को दें समय

तलाक के बाद नौर्मल होने में समय लगता है. अपनेआप पर कठोर न बनें और अपनेआप को ठीक होने के लिए पर्याप्त समय दें.

करें सेल्फ केयर

फिजिकल और मैंटल हैल्थ पर पूरा ध्यान दें, जिस में हैल्दी फूड, डेली वर्कआउट, मनोरंजन आदि पर ध्यान दें और अपनी नींद पूरी करें. समय मिलने पर खुद की हौबीज को आगे बढ़ाएं, दोस्तों और प्रियजनों के साथ समय बिताएं.

फाइनैंस को करें और्गेनाइज

अपने राइट्स को किसी कानून विशेषज्ञ से मिल कर जान लें. संपत्ति और उस के लाइबिलिटीज के अनुसार बजट की प्लानिंग करें.

रखें हैल्दी बाउंड्री

ऐक्स स्पाउस के साथ साफ और हैल्दी बाउंड्री रखें, ताकि किसी प्रकार की कौंफ्लिक्ट्स या इमोशनल संलिप्तता न हो. साथ ही खुद में आत्मविश्वास रखें, इस से आप इस परिस्थिति से आराम से निकल जाएंगी.

फ्यूचर की करें प्लानिंग

अपने लिए स्मार्ट गोल्स बनाएं, जो वास्तविक हो और आप उस तक पहुंचने में कामयाब हो सकें. किसी भी अवसर या चुनौती को लेने से कभी न घबराएं, तभी आप सफल हो सकती हैं.

इस प्रकार डिवोर्स के बाद अगर बच्चे न हों, तो जिंदगी अकेली नहीं होती. इस में जरूरत होती है खुद को स्मार्ट तरीके से जीने और आगे बढ़ने की, जिस में आप का आत्मविश्वास, आत्मशक्ति और आत्मनिर्भरता ही आप को आगे ले जाने में समर्थ होती है और यह आज की किसी भी नारी के लिए असंभव नहीं है.

Life After Divorce

National Nutrition Week: महिलाओं के जीवन के हर चरण में कैसी हो आहार की भूमिका

Dr. Vinay Purohit, MBBS, MD- Pharmaceutical Physician & Head – Medical Affairs, Bayer Consumer Health, India

(डॉ. विनय पुरोहित, एमबीबीएस, एमडी – फ़ार्मास्यूटिकल फ़िज़ीशियन और हेड– मेडिकल अफेयर्स, बेयर कंज़्यूमर हेल्थ, इंडिया)

National Nutrition Week: किसी गर्भवती महिला को दी जाने वाली यह सलाह अक्सर सुनने को मिलती है कि— “अब तुम्हें दो लोगों के लिए खाना चाहिए !”

गर्भावस्था के दौरान बढ़ी हुई भूख या प्रेग्नेंसी क्रेविंग्स को पूरा करने के लिए आमतौर पर पारंपरिक भोजन की मात्रा बढ़ा दी जाती है. लेकिन असली सवाल यह है कि कितने लोग सच में जानते हैं कि इस समय शरीर को किन पोषक तत्वों की सबसे अधिक ज़रूरत होती है? सच तो यह है कि बहुत कम लोग इसकी सही जानकारी रखते हैं, और कई शोध भी इस बात की पुष्टि करते हैं. भारत में आधे से अधिक गर्भवती महिलाओं में कुछ माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी पाई जाती है. इस स्थिति को ही ‘हिडन हंगर’ यानी छिपी हुई भूख कहा जाता है.

सितंबर में राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है और इस मौके पर यह समझना जरूरी है कि महिलाओं के जीवन में हर पड़ाव पर पोषण की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान ही नहीं, पूरी जिंदगी कुछ खास पोषण संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था और महिलाओं की पोषण संबंधी जरूरतों को लेकर कम समझ इसका कारण है. ऐतिहासिक रूप से पोषण को लेकर किए जाने वाले विभिन्न शोध में भी महिलाओं की पोषण संबंधी जरूरतों की अनदेखी कर दी जाती है.  लैंसेट में हाल ही में ‘ग्लोबल एस्टिमेशन ऑफ डायटरी माइक्रोन्यूट्रिएंट इनएडिक्वेसीज: ए मॉडलिंग एनालिसिस’  शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन में सामने आया कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं को खराब पोषण का सामना करना पड़ता है. साथ ही इसमें महिलाओं में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी को लेकर डाटा की कमी का उल्लेख भी किया गया.

पूरे जीवन में महिलाएं किशोरावस्था से लेकर मीनोपॉज तक कई तरह के फिजियोलॉजिकल, न्यूरोलॉजिकल और हार्मोनल बदलावों से गुजरती हैं, जिसमें बहुत सोच समझकर न्यूट्रिशनल सपोर्ट की जरूरत होती है.

महिलाओं के जीवन के हर चरण में पोषण संबंधी जरूरतों को समझना:

युवावस्था – जब विकास एवं सपनों को पंख देने के लिए पोषण की जरूरत होती है

किशोरावस्था एक ऐसे कैटरपिलर की तरह है जो अपने ककून में बंद होकर तितली बनने की तैयारी कर रहा हो. इस समय शरीर और मन भीतर ही भीतर खुद को युवावस्था के लिए तैयार कर रहे होते हैं. यौवनारंभ यानी प्यूबर्टी के दौरान कई तरह के शारीरिक, भावनात्मक एवं मानसिक बदलाव होते हैं और इस बदलाव में मदद के लिए पर्याप्त पोषण बहुत जरूरी होता है.  इन बदलावों से शारीरिक तौर पर ही नहीं, बल्कि भावनात्मक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है.

आयरन से भरपूर आहार जैसे पालक, दाल और फोर्टिफाइड अनाज से मासिक धर्म के दौरान होने वाले आयरन लॉस  की भरपाई करने में मदद मिलती है. वहीं, दूध, दही और बादाम जैसे कैल्शियम से भरपूर स्रोत हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए जरूरी हैं.  विटामिन बी से मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है और एनर्जी लेवल सही रहता है.  साबुत अनाज, प्रोटीन और फलों से भरपूर बैलेंस्ड डाइट ये युवावस्था में महिलाओं को शरीर मजबूत बनाने और बड़े सपने देखने में मदद मिलती है. अगर आहार में कुछ कमी रह जाए तो मल्टीविटामिन सप्लीमेंट्स से भी इसकी भरपाई की जा सकती है.

मातृत्व – जब आपको दो लोगों के लिए पोषण की जरूरत होती है

मातृत्व जीवन का एक ऐसा पड़ाव है जहां मां और बच्चे, दोनों की सेहत के लिए अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है. हालांकि पीढ़ियों से बनी धारणा और जानकारी की कमी के कारण अक्सर ऐसा हो नहीं पाता है.

जागरूकता की इस कमी के कारण कई तरह की जटिलताएं आ सकती हैं. गर्भावस्था के दौरान एनीमिया सबसे आम समस्या है, जिससे प्रसव के समय मुश्किल आ सकती है.8 गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त पोषण से स्वस्थ रहने और प्रसव के बाद जल्दी रिकवर होने में मदद मिलती है. आयरन से भरपूर आहार लेने से गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में मदद मिलती है, साथ ही मां के शरीर में रेड ब्लड सेल्स की सप्लाई बेहतर होती है.9 फोलिक एसिड भी एक महत्वपूर्ण सप्लीमेंट है, जो गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में मदद करता है.  हालांकि इस दौरान सिर्फ आयरन और फोलिक एसिड ही नहीं, बल्कि विटामिन बी12, विटामिन बी6, जिंक और कॉपर जैसे कई अन्य माइक्रोन्यूट्रिएंट्स को भी आहार में शामिल करना चाहिए. विटामिन बी12  और बी6  से मां को जी मचलाने जैसी की समस्या से राहत मिलती है और बच्चे में न्यूरोजेनेसिस और साइनेप्टिक कनेक्टिविटी बनाने में मदद मिलती है. वहीं, जिंक और कॉपर बच्चे के मस्तिष्क के विकास के लिए जरूरी हैं और इनसे गर्भावस्था से जुड़े अन्य खतरे भी कम होते हैं.

कैल्शियम, विटामिन डी और मैग्नीशियम भी मां और बच्चे दोनों के विकास में मदद करते हुए गर्भावस्था के दौरान स्वास्थ्य सही रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.  कैल्शियम बच्चे की हड्डियों एवं दांतों के विकास के लिए बहुत जरूरी है, वहीं विटामिन डी से शरीर में कैल्शियम का अवशोषण सही होता है और इम्यून मजबूत होता है.  मैग्नीशियम से मांसपेशियों को आराम मिलता है, ऐंठन की समस्या और समयपूर्व प्रसव का खतरा कम होता है. यह ब्लड प्रेशर को नियमित करने में भी मदद करता है.  ये न्यूट्रिएंट्स गर्भावस्था के दौरान होने वाली हाई बीपी की समस्या, जन्म के समय बच्चे का कम वजन और कमजोर विकास जैसी परेशानियों को कम करने में मदद करते हैं. इसलिए गर्भावस्था के दौरान इनके सप्लीमेंट को अपने आहार का हिस्सा बनाना चाहिए. विशेष रूप से ऐसे लोगों को, जिनके लिए डायटरी इनटेक अपर्याप्त है.  वैसे तो कैल्शियम, विटामिन डी और मैग्नीशियम पूरी गर्भावस्था के दौरान महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन दूसरी और तीसरी तिमाही के दौरान इनकी जरूरत सबसे ज्यादा रहती है.

गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद महिलाओं को संतुलित आहार लेना चाहिए, जिसमें पर्याप्त न्यूट्रिएंट्स हों. उन्हें अपने आहार में फलियों को शामिल करना चाहिए. हेल्दी फैट (नट्स एवं फिश से मिलने वाले ओमेगा-3 फैटी एसिड्स) भी जरूरी हैं. साथ ही ज्यादा चीनी एवं सैचुरेटेड फैट वाले प्रोसेस्ड फूड से बचना चाहिए.

दूध और दही कैल्शियम के बेहतरीन स्रोत हैं. इनसे हड्डियों के विकास में मदद मिलती है और मां का भी बोन लॉस नहीं होता है. विटामिन डी के लिए सैलमन जैसी फैटी फिश और फोर्टिफाइड मिल्क को आहार में शामिल कर सकते हैं. विटामिन डी से शरीर में कैल्शियम का अवशोषण बढ़ता है और इम्यून फंक्शन बेहतर होता है.  पालक, कद्दू के बीज और साबुत अनाज से मैग्नीशियम मिलता है.

मीनोपॉज और उसके बाद – फिर से मजबूती पाने के लिए होती है पोषण की जरूरत

महिलाओं में आमतौर पर 45 से 50 साल की उम्र के आसपास मीनोपॉज होता है. कुछ महिलाओं में यह पहले भी हो सकता है. इस दौरान कई तरह की मुश्किलें हो सकती है. अध्ययन बताते हैं कि 75 से 80 प्रतिशत महिलाओं में इस दौरान वैसोमोटर लक्षण, जैसे हॉट फ्लैश और रात में पसीना आना आदि दिखते हैं.  इनसे मानसिक स्वास्थ्य, भूख और नींद की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

हड्डियों को मजबूत बनाए रखने और हार्मोनल बदलाव के दौरान स्वास्थ्य को सही रखने के लिए कैल्शियम , विटामिन डी  और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर आहार की जरूरत होती है. इससे मीनोपॉज से जुड़ी कुछ परेशनियों को कम करने में मदद मिलती है. इसके अतिरिक्त, अपर्याप्त डाइट के कारण होने वाली कमी को सप्लीमेंट्स की मदद से पूरा करना भी महत्वपूर्ण है.

महिलाओं को जीवन के हर पड़ाव पर पर्याप्त पोषण की जरूरत होती है. पोषण से भरपूर आहार और उसके साथ जरूरी सप्लीमेंट्स को बढ़ावा देने की जरूरत है, जिससे न्यूट्रिएंट्स का संतुलन बने और सही पोषण सुनिश्चित हो. आहार से जुड़ी इन जरूरतों को जानने और समझने से महिलाओं में होने वाली पोषण संबंधी कमियों को दूर करने में मदद मिलेगी, जिनकी अक्सर अनदेखी हो जाती है. साथ मिलकर हम स्वास्थ्य एवं कल्याण को लेकर ज्यादा व्यापक दृष्टिकोण अपना सकते हैं.

National Nutrition Week

Drama Story: यादों के नश्तर- क्या मां से दूर हो पाई सियोना

Drama Story: सियोना का मोबाइल काफी देर से बज रहा था. वह  जानबूझ कर अपनी मां के फोन को इग्नोर कर रही थी. बारबार फोन कटता और फिर से उस की मां उसे कौल करतीं. लेकिन शायद वह फैसला कर चुकी थी कि आज फोन नहीं उठाएगी. मगर उस की मां थीं कि बारबार फोन मिलाए जा रही थीं. हार कर उस ने मोबाइल बंद कर दिया और लैपटौप औन कर अपने ब्लौग पर कुछ नया टाइप करने लगी.

डायरी से शुरू हुआ सफर अब ब्लौग का रूप ले चुका था. अपने फैंस के कमैंट पढ़ कर सियोना एक पल को मुसकरा उठती पर दूसरे ही पल उस की आंखें नम भी हो जातीं.

ऐसा आज पहली बार नहीं हुआ था. सियोना अकसर अपनी मां का फोन आते देख विचलित हो उठती. उस के मन में गुस्से का ज्वार अपने चरम पर होता और वह मां का फोन इग्नोर कर देती. यदि कभी फोन उठाती भी तो नपेतुले शब्दों में बात करती और फिर मैं बिजी हूं कह कर फोन काट देती.

सियोना की मां एकाकी जीवन जी रही थीं. पिताजी तो अपने दफ्तर के काम में अति व्यस्त रहते. कभीकभार अपनी बेटी के लिए समय निकाल कर उस से बात करते या यों कहें कि अपनी बेटी के बारे में जानकारी लेते.

सौफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाली सियोना चेहरे से आकर्षक, बोलने में बहुत सभ्य थी, लेकिन उस के व्यवहार में कुछ कमियां उसे दूसरों से कमतर ही रखतीं. न तो वह किसी से खुल कर बात कर पाती और न ही किसी को अपने करीब आने देती. अपनेआप को खुद में समेटे बहुत अकेली सी थी. बस ब्लौग ही उस का एकमात्र सहारा था जहां वह अपने दर्द को शब्दों में ढाल देती.

आज सुबह जब सियोना उठी तो व्हाट्सऐप पर मां का मैसेज था कि सियोना तुम्हें कितने फोन किए. उठाती क्यों नहीं? फिर फोन बंद आने लगा… क्या बात है बेटी?

संदेश पढ़ कर उस के होंठों पर कुटिल मुसकान तैर गई. फिर धीरे से

बुदबुदाई कि अब तुम्हें मेरी याद सताने लगी मां जब मैं ने खुद को अपने अंदर समेट लिया है.

तभी उस के पिताजी का फोन आया. बोली, ‘‘जी पापा, कहिए कैसे हैं?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं बेटी पर तुम्हारी मां बहुत परेशान हो रही है… तुम से बात करना चाहती है. कहती है कि तुम फोन नहीं उठा रही सो मैं ने अपने फोन से तुम्हारा नंबर डायल कर के देखा… लो अपनी मां से बात कर लो.’’

मजबूरन सियोना को मां से बात करनी पड़ी, ‘‘हां, बोलो मां क्या बात है? कहो किसलिए फोन कर रही थीं?’’

‘‘किसलिए? क्या मैं अपनी बेटी को बिना कारण फोन नहीं कर सकती?’’

सियोना को अपनी मां द्वारा उस पर हक जताने पर उलझन सी महसूस होने लगी थी. मन का कसैलापन उस के चेहरे पर साफ दिखने लगा था. उस के नथुने फूल गए थे और आंखों से अंगारे बरस रहे थे. कुछ सोच कर बोली, ‘‘क्या बात है आज कहीं बाहर जाने को नहीं मिला क्या? वह तुम्हारा सत्संग गु्रप क्या बंद है आजकल?’’

‘‘हां, वह तो धीरेधीरे छूट ही गया. घुटने में दर्द जो हो रहा है… अब कहां बाहर आनाजाना होता है… सारा दिन घर में अकेली पड़ी रहती हूं… अपने पापा को तो तू जानती ही है. पहले तो अपने दफ्तर के काम में व्यस्त रहते हैं और फिर उस के बाद अपनी किताबों में आंखें गड़ाए रहते हैं.’’

‘‘अच्छा अब और कुछ कहना है? मुझे दफ्तर जाने को देर हो रही है. नईर् नौकरी है न बहुत सोच कर चलना पड़ता है,’’ सियोना बोली.

‘‘कहां बेटी तू दूसरे शहर चली गई… यहीं रहती हमारे पास तो अच्छा रहता… इतना बड़ा घर काटने को दौड़ता है… कामवाली सफाई कर देती है, कुक 3 समय का खाना एकसाथ ही नाश्ते के समय बना देती है. ठंडा खाना फ्रिज से निकाल कर माइक्रोवैव में गरम करती हूं, न कोई स्वाद न कोईर् नई रैसिपी. बस वही एक ही तरह की दाल रोज बना देती है. तड़के में प्याज नहीं डालती. बस दाल के साथ उबाल देती है. ऐसा लगता है अब जीवन यहीं समाप्त हो गया है… तू रहती तो कम से कम कामवाली से काम तो करवा लेती.’’

‘‘हां मां समझती हूं तुम्हें बेटी नहीं, अभी भी एक टाइमपास और जरूरत पूरा करने वाला जिन्न चाहिए जो जैसा तुम कहो करे, जहां तुम कहो तुम्हें ले जाए और जब तुम चाहो तुम्हारे सामने मुंह खोले,’’ कहतेकहते उस की आंखें नम हो आईं और फिर उस ने फोन काट दिया.

दफ्तर पहुंच अपने काम में जुट गई. हां, दफ्तर में उस के बौस उस से हमेशा खुश रहते. काम की कीड़ा जो है वह… जब तक पूरा न कर ले चैन की सांस नहीं लेती. कई बार तो टी ब्रेक और लंच टाइम में भी अपने लैपटौप में घुसी रहती है. आज भी उस की नजरें तो लैपटौप में ही गड़ी थीं, लेकिन दिमाग पुरानी स्मृतियों में खोया था. हर वाकेआ उस की निगाहों के आगे ऐसे तैर रहा था जैसे अभी की बात हो… कहां भूल पाती है वह एक पल को भी हर उलाहने, हर बेइज्जती को…

जब सियोना मात्र 10 साल की थी तो एक सहेली के जन्मदिन की पार्टी में गई. सब सहेलियां सजधज कर पहुंचीं. स्कूल में 2 चोटियां करने वाली सारा ने आज बाल धो कर खोले हुए थे. सभी कह रहे थे कि तुम्हारे बाल कितने सिल्की और शाइनी हैं… बिलकुल स्ट्रेट, सामने से कटी फ्रिज कितनी सुंदर लग रही है. ऊपर से तुम्हारा गुलाबी फ्रौक, तुम बेबी लग रही हो. सब के साथ सियोना को भी यही एहसास हुआ था. किंतु वह स्वयं तो अपने कपड़ों के बटन भी ठीक से नहीं लगा पाई थी.

क्या करती मां तो घर पर थीं नहीं… हर संडे उन का किसी न किसी के घर भजनसत्संग जो होता है… और बाल तो उस ने भी सुबह धोए थे. लंबे बाल शाम तक उलझ गए थे, जिन्हें ठीक करना उसे नहीं आता था. सो वह एक रबड़बैंड बांध कर ऐसे ही पार्टी में आ गई थी. आज उसे पहली बार अपनी मां की अनदेखी का एहसास हुआ था और शर्मिंदगी भी.

जिस लड़की के जन्मदिन की पार्टी थी उस की मां ने पार्टी में थोड़ा खाना भी हाथ से बनाया था, केक भी स्वयं बेक किया था. केक इतना स्वादिष्ठ था कि देखते ही सभी उस पर जैसे लपक पड़े थे. उस की मां के हाथ के बनाए खाने की भी सब तारीफ कर रहे थे और केक से तो जैसे मन ही नहीं भर रहा था.

सियोना को अपने जन्मदिन की याद हो आई जब उस की मां ने सारी सहेलियों को बुला कर बाजार से लाया केक काटा और बाजार के बौक्स में पैक्ड खाना सब को हाथ में दिया और कहा घर जा कर खा लेना. इस बात को पहले तो वह समझ नहीं थी, किंतु अब उसे एहसास हुआ था कि उस की सहेली की मां ने कितने शौक से अपनी बेटी के जन्मदिन की तैयारी की थी. वह स्वयं भी उस की मां के बनाए खाने को खा कर उंगलियां चाटती रह गई थी और फिर पार्टी के अंत में अपनी सहेली की मां से बोली, ‘‘आंटी, क्या मैं घर के लिए भी खाना ले जा सकती हूं?’’

वह मासूम नहीं समझती थी कि यह समाज की नजर में एक व्यावहारिक दोष है, पेटभर खाना खाने के बाद भी वह मांग रही है. उस की सहेली की मां ने उसे घर के लिए खाना तो दिया, किंतु अगले दिन उस की सहेलियां उस की खिल्ली उड़ा रही थीं कि यह खाना मांग कर ले जाती है और वह जवाब में कुछ न बोल पाई. बस मन मसोस कर रह गई. कैसे बताती वह सब को कि उस के घर में तो कुक ही खाना बनाती है. सो वह स्वादिष्ठ खाने को देख अपनेआप को रोक न पाई.

उस की मां तो सहेलियों के साथ कभी इस तीर्थ पर जातीं, तो कभी उस तीर्थ पर. कभी उस पंडे की कथा सुनने 10 दिनों तक बनठन कर जाने का समय हमेशा रहता था जहां नाचना और भरपूर खाना होता था पर बेटी के लिए समय नहीं होता.

4-5 दिन पहले ही फिर उस की मां का फोन आया. उस ने न चाहते हुए भी फोन उठाया, क्योंकि वह जानती थी कि यदि उस ने मां से बात न की तो पिताजी जरूर फोन करेंगे.

फोन उठाते ही मां कहने लगीं, ‘‘मन नहीं लगता सारा दिन घर में पड़ेपड़े.’’

‘‘क्यों मां तुम्हारे पास तो स्मार्ट फोन है… अपनी सहेलियों से वीडियो कौल कर लिया करो… तुम्हें उन के दर्शन हो जाएंगे और उन्हें तुम्हारे या कभी उन्हें घर ही बुला लिया करो… अब तुम तो चलफिर नहीं सकतीं.’’

‘‘किसे कर लूं फोन? सब की सब अपने परिवारों में मस्त हैं. किसी के बेटीदामाद अमेरिका से आए हैं, तो कोई अपने पोते से मिलने बेटे के घर गई है. जो थोड़ी जवान औरतें हैं वे अपने बच्चों में व्यस्त हैं. किसी को फुरसत नहीं मेरे लिए… तेरे पापा भी अब तो दूरदूर रहते हैं. कुछ बोलती हूं तो कहते हैं भजन लगा देता हूं म्यूजिक सिस्टम में या फिर टीवी देख लो… कोई पास बैठ कर बात नहीं करना चाहता.’’

‘‘अच्छा मां मैं फोन रखती हूं हमारे बौस का तबादला दूसरे शहर में हो रहा है. सभी को मिल कर उन की फेयरवैल पार्टी की तैयारी करनी है,’’ कह उस ने फोन काट दिया और अपने बौस के लिए गिफ्ट लेने बाजार निकल गई.

रिकशे में बैठेबैठे उसे फिर अपने अतीत का एक नश्तर चुभ गया… जब वह 12 साल की थी. उस की एक सहेली के पिताजी का तबादला हुआ था और वह सपरिवार पुणे जा रही थी. सभी सहेलियों को मिल कर उस के लिए स्नैक्स लाने थे. उस सहेली को जो गिफ्ट देना चाहे वह गिफ्ट भी ले जा सकती थी.

शाम 5 बजे का समय तय कर सभी लौन में पहुंचने वाले थे कि अचानक मौसम बदला और बारिश आ गई. एक सहेली की मां ने सलाह दी कि उस के घर में पार्टी कर लो वरना तुम्हारा सारा मजा किरकिरा हो जाएगा. सारी सहेलियां उस के घर पहुंच अपनाअपना स्नैक्स एकदूसरे को दिखा रही थीं. जब सियोना की सहेली ने उस से पूछा कि तुम क्या लाई हो तो उस का जवाब था, ‘‘मेरे घर में कुछ था ही नहीं तो मैं क्या लाती?’’

तभी दूसरी सहेली आई और बोली, ‘‘मैं बाहर सुपर मार्केट से कुछ स्नैक्स ले कर आती हूं. सियोना तुम भी सुपर मार्केट से ले आओ स्नैक्स.’’

सियोना ने मां से फोन पर बात की तो मां ने कहा, ‘‘बिस्कुट रखे हैं घर में ले जाओ.’’

‘‘मां, जब घर में कुछ था तो मुझे खाली हाथ क्यों भेज दिया तुम ने? क्यों किसी न किसी तरह मुझे दूसरों के सामने नीचा दिखाती हो मां,’’ और गिफ्ट तो कुछ ले कर ही नहीं गई थी वह अपनी सहेली के लिए. जब फेयरवैल पार्टी कर सब ने उसे गिफ्ट दिया तो वह खाली हाथ थी. बस सब को गिफ्ट देते देखती रही.

सियोना की समझ में नहीं आता कि आखिर ऐसा क्यों करती थीं मां. वे गरीब तो नहीं थे… पिताजी की अच्छी आमदनी थी. घर में कुक और कामवाली तो तब भी आती थीं. मां स्वयं सोशल सर्किल मैंटेन करती थीं, लेकिन उस के बारे में कभी क्यों न सोचा? न जाने उस के रहनसहन और मूर्खताभरे व्यवहार के चलते लोग उस के बारे में क्या बातें बनाते होंगे… कभीकभी तो ऐसा लगता जैसे सारी सहेलियां उसे इग्नोर करने लगी हैं… सब एकसाथ खेलतीं पर कई बार उसे बताया भी न जाता कि सब किस के घर खेलेंगी. वह सब को इंटरकौम करती तब कहीं जा कर उसे कुछ मालूम होता.

अगली सुबह 6 बजे ही मां का फोन आया. सियोना ने नींद से जाग कर देखा और फिर से चादर ओढ़ कर सो गई. फिर जब वह जागी तो देखा मां का मैसेज था कि बेटी, मैं तुम से मिलने आ रही हूं. तुम्हारे पिताजी को बोला है कि मुझे सियोना के पास छोड़ आओ… कुछ दिन तुम्हारे साथ रहूंगी तो जी बहल जाएगा.

अब तो सियोना का गुस्सा 7वें आसमान पर था कि मां तुम मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़तीं… वह बड़बड़ाते हुए नहाधो कर दफ्तर पहुंची. लैपटौप औन किया और काम में लग गई. किंतु आज कहां काम में मन लगने वाला था. दिमाग में तो जैसे कोई हथौड़े मार रहा था. उस का सिर चकराने लगा था. उस ने बैग से सिरदर्द की दवा निकाली और पानी के साथ गटक ली.

अब मां को आने को तो मना नहीं कर सकती. कुछ दिन बाद मां उस के घर आ पहुंची थी. मां के आते ही उस का रूटीन बिगड़ गया. सियोना उन्हें समय पर नाश्ताखाना दे देती, किंतु बात कम ही करती. उस की मां उस के आगेपीछे घूमतीं तो वह कह देती, ‘‘मां क्यों हर वक्त मुझे डिस्टर्ब करती हो… लेट कर आराम करो वरना तुम्हारे घुटने का दर्द बढ़ जाएगा.’’

जैसे ही वह दफ्तर से आती उस की मां चाय की रट लगा देतीं. जब तक वह हाथमुंह धो कर आती तब तक तो उस की मां का स्वर तेज हो चुका होता, ‘‘अरे, पूरा दिन अकेली पड़ी रहती हूं बेटी… अब तो तू चाय बना कर मेरे पास आ जा 2 घड़ी के लिए.’’

‘‘मां तुम भी न बस क्या कहूं… तुम्हें तो चौबीसों घंटे की नौकरानी चाहिए… मुझ से कोई लेनादेना नहीं तुम्हें.’’

‘‘कैसी बातें करती है तू… भला मां को चाय बना कर देने से कोई

नौकरानी हो जाती है… तुम्हें पालपोस कर बड़ा किया है मैं ने तो क्या इतना भी हक नहीं कि तुम से चाय बनवा लूं?’’

‘‘हूं… तो मुझे हिसाब चुकता करना है तुम्हारा… तुम ने मुझे पैदा किया, लेकिन सही परवरिश नहीं दी मां.’’

‘‘अरे, कैसी बातें करती हो… सारा दिन अकेले पड़ेपड़े मेरी पीठ थक जाती है… जरा कुछ बोलती हूं तो तू काटने को दौड़ती है.’’

‘‘तो मां बाहर खुली जगह में थोड़ा टहल आया करो.’’

अगले दिन जब सियोना दफ्तर से आई तो टेबल पर चाय के कप लुढ़के पड़े थे. रसोई में स्लैब पर चायपत्ती व चीनी बिखरी थी और चींटियां घूम रही थीं. बिस्कुट का डब्बा भी खुला पड़ा था.

सियोना रसोई से ही चीखी, ‘‘मां, आज घर में कोई आया था क्या मेरे पीछे से?’’

‘‘चीखती क्यों है, यहीं बाहर एक सहेली बनी थी कल… मैं ने उसे आज घर बुला लिया. सारा दिन घर पर पड़े बोर होती हूं. तु?ो तो मेरे लिए फुरसत नहीं. किसी से थोड़ा बोलचाल लूं तो मन हलका हो जाता है.’’

‘‘मां अपना बोलनाचालना बाहर तक ही सीमित रखो. रसोई का कितना बुरा हाल किया है… घर में मिट्टी ही मिट्टी हो रही है. सहेली से बोल देतीं कि चप्पलें बाहर ही खोले.’’

‘‘उफ, तुम्हारे घर क्या आई तू तो बड़ा एहसान दिखा रही है मुझ पर जैसे मैं तो तेरी कुछ लगती ही नहीं… क्या तुम्हारी पहचान के लोग नहीं आते घर पर?’’

‘‘नहीं आते मां, मुझे आदत नहीं किसी को घर बुलाने की. तुम ने क्या कभी मुझे अपनी सहेलियों को घर बुलाने दिया था? तुम हमेशा कह देतीं कि घर गंदा हो जाता है जब तुम्हारी सहेलियां आती हैं. सारा सामान इधरउधर कर देती हैं. बारिश और गरमियों के दिनों में मैं अकेली घर पर पड़ी रहती थी. तुम तो सत्संग और मंदिरों के फेरे लगाने में व्यस्त रहीं और मैं सदा घर पर अकेली. बाहर तुम नहीं निकलने देतीं और यदि किसी को बुलाना चाहती तो तुम सदा ही टोक दिया करतीं.’’

‘‘हद हो गई… कब की बातें मन में लिए बैठी है… मुझे तो ये सब याद भी नहीं.’’

‘‘पर मैं भूलने वाली नहीं मां. तुम्हारा दिया हर दंश अच्छी तरह याद है मुझे. न भरने वाले नासूर दिए हैं तुम ने मुझे.’’

तभी पिताजी का फोन आया तो बोली, ‘‘पापा, मां का वापसी का टिकट बुक करा दीजिए… मां यहां बोर हो रही हैं… मुझे तो समय नहीं मिलता…’’

‘‘हां बेटी, मैं स्वयं ही आ कर ले जाता हूं. मैं तो पहले ही जानता था कि वह तुम से ज्यादा दिन नहीं निभा पाएगी.’’

‘‘जातेजाते मां ने भरे मन से सियोना से कह दिया, ‘‘अब मैं तभी आऊंगी जब तू बुलाएगी.

‘‘अलविदा मां, मैं तुम्हें कभी नहीं बुलाऊंगी. तुम से पीछा छुड़ाने के लिए ही मैं ने नौकरी के लिए दूसरा शहर चुना पर तुम तो यहां भी मुझे चैन से नहीं रहने देती,’’ उस के नथुने फूले हुए थे और मन ही मन सोच रही थी कि हो सका तो किसी दूसरे देश में नौकरी ढूंढ़ेगी मां ताकि तुम से छुटकारा मिल सके. तुम्हारे दिए घाव न जाने क्यों भरते ही नहीं मां. काश, तुम मुझे जन्म ही न देतीं और फिर भरे मन से दफ्तर रवाना हो गई.

आज लैपटौप खोलते ही सब से पहले उस ने मां को फेसबुक पर ब्लौक किया. उस के बाद फोन उठाया और व्हाट्सऐप पर भी ब्लौक कर दिया… एक गहरी सांस ले कर काम में जुट गई.

Drama Story

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