helping neighbors : हम सुबह उठते हैं, गेट खोलते हैं या लिफ्ट से नीचे उतरते हैं, सामने पड़ोसी दिखते हैं और हमारे मुंह से निकलता है, ‘‘गुड मौर्निंग आंटी’’ या ‘‘नमस्ते भैया/दीदी.’’
वे भी मुसकरा कर गुड मौर्निंग बेटा, रामरामजी बोलते हैं और हम अपने काम पर निकल जाते हैं. सालों तक यह सिलसिला चलता है. फिर एक दिन रात को 2 बजे घर में मैडिकल इमरजैंसी हो जाती है. पति औफिस टूर पर हैं, बच्चा बुखार में तप रहा है. आप भाग कर पड़ोसी का दरवाजा खटखटाती हैं. वे दरवाजा खोलते हैं लेकिन आप दोनों के बीच एक अजीब सी बेझिझक होती है क्योंकि 5 साल में आप ने उन से कभी पूछा ही नहीं, ‘‘आंटीदीदी, आप को कभी मेरी मदद चाहिए तो बताना.’’
यह झिझक ‘कनैक्शन डिफरैंस’ है. हम पड़ोसियों को ‘हायबाय’ वाले इंसान बना देते हैं लेकिन ‘सुखदुख के साथी’ नहीं. नतीजा होता है जरूरत पर अकेलापन. अपनी व्यस्तता में हम पेरैंट्स की उस सीख को नजरअंदाज कर देते हैं कि बेटा, पड़ोसियों से बना कर रखना.
फौर्मल ग्रीटिंग की दीवार
हम बात शुरू क्यों नहीं कर पाते? केवल हायहैलो, हाऊ आर यू या राधेराधे कह कर क्यों निकल जाते हैं? दरअसल, शहरों में खासकर बड़ीबड़ी सोसाइटीज में हमें इस बात की बेझिझक लगती है कि क्या पता कि ज्यादा बात करेंगे तो दखलंदाजी न समझने लगें. मगर सच तो यह है कि महानगरों में प्राइवेसी का डर रिश्तों को खा रहा है. हम अपने काम से काम रखना पसंद करते हैं या फिर अपने मोबाइल में घुसे रहते हैं. दूसरों की जिंदगी में क्या चल रहा है या कैसे किसी को अपनापन दिखा कर दिल के करीब लाया जाए इस की हमें परवाह नहीं रहती. बाद में यही बात तकलीफ देती है.
स्टेटस का फर्क
कुछ लोग इस वजह से भी पड़ोसियों से केवल हायहैलो का रिश्ता रखते हैं क्योंकि उन्हें स्टेटस की दीवार नजर आती है. आप की कार छोटी है, उन की बड़ी. आप को लगता है मैं मदद क्या दूंगी, जबकि वे सोचते हैं इन से क्या बात करू? जबकि हम यह नहीं सोचते कि एक बार स्टेटस भूल कर साथ बैठिए तो पता चलेगा हर कोई कितना अकेला है और किसी का साथ चाहता है. समय पर कोई साथ देने वाला हो तो उस से बड़ी कोई नियामत नहीं होती.
कई दफा हम अपनी जिंदगी और अपने कामों में इतने ज्यादा व्यस्त होते हैं कि उस भागदौड़ में लगता है कि 2 सैकंड की ‘गुडमौर्निंग’ ही बहुत है. मगर यह सोच सही नहीं. किसी के लिए समय निकालना इतना कठिन भी नहीं. सप्ताह म 10 मिनट की बातचीत भी रिश्ते में जान फूंक देती है.
खमियाजा कौन भरता है
इस का सब से ज्यादा खमियाजा महिलाएं भुगतती हैं. बच्चे को स्कूल से लाने में देरी हो जाए, सिलैंडर खत्म हो जाए, सासससुर की तबीयत बिगड़ जाए, इन सब में पहली मदद पड़ोसी ही कर सकता है. 2024 के ‘हैल्पएज इंडिया’ सर्वे के अनुसार 68% बुजुर्ग महिलाएं मानती हैं कि इमरजैंसी में बेटे से पहले पड़ोसी काम आता है. लेकिन हम रिश्ता बनाते ही नहीं.
क्या करें
‘हाय’ को ‘हैल्प’ में बदलें
आप पड़ोसियों के साथ संबोधन और ग्रीटिंग्स के शब्द बदलिए. संबंध खुद बदल जाएगा. रिश्ते में थोड़ा प्यार और अपनापन बढ़ाने के लिए ‘गुड मौर्निंग’ की जगह ये 5 वाक्य ट्राई करें:
हफ्ते में एक बार इस तरह की बात जरूर कहें ‘औफर’ जरूर दें. मदद मांगना नहीं है लेकिन समय पर मदद देने का भरोसा देना है.
पड़ोसियों से रिश्ता गहरा करने के 5 प्रैक्टिकल तरीके
10 मिनट की चाय: संडे सुबह पड़ोसी से कहें, ‘‘दीदी, आज चाय मेरे यहां पीना. मैं पकौड़े बना रही हूं. साथ बैठ कर चायपकौड़े खाएंगे.’’
इस तरह पड़ोसी के साथ चाय पीते हुए आप कितने ही तरह के टौपिक्स पर बातें कर सकते हैं मसलन, बच्चों की पढ़ाई, महंगाई, पुराने मुहल्लो, सोसाइटी की साफसफाई, किसी फंक्शन की तैयारी आदि. फिर तो इन 10 मिनट में आप का रिश्ता 10 साल पुराना लगने लगेगा.
साथ में त्योहार मनाएं: होली पर सिर्फ रंग न लगाएं बल्कि एक प्लेट गुझिया उनके घर दे करआएं. दीवाली पर 2 दीए उन की दहलीज पर भी जला दें और बोलें, ‘‘आप से ही तो रौनक है.’’ त्योहार कोई भी हो पड़ोसियों के साथ उसे ऐंजौय करना न भूलें.
इमरजैंसी नंबर ऐक्सचैंज: उन से कहें, ‘‘दीदी, मेरा नंबर सेव कर लो. रातबिरात कभी जरूरत हो तो बेझिझक कौल करना,’’ अपना नंबर देने के साथ ही उन का नंबर भी ले लें. यह ऐक्सचेंज 100 ‘गुड मौर्निंग’ से भारी है.
उन के लिए शौपिंग: कभी मार्केट जा रही हैं या पास की सब्जी मार्केट जा रही है तो उन से पूछ लें कि उन के यहां क्या खत्म हो रहा है.
मंडी से आप उन के लिए 5 किलोग्राम आलू लाती हैं और अगले हफ्ते वे अगर आप के लिए धनिया भी ले आती हैं तो इसे कम न समझें. छोटी मदद मगर बड़ा भरोसा.
अगर औनलाइन कुछ मंगा रही हैं तो पड़ोसी से पूछ लें कि उन्हें कुछ मंगाना है तो वह भी मंगा लें. औनलाइन कौर्ल्स कंपनी 5000 की खरीद पर छूट दे रही है पर उसे सिर्फ 3000 का सामान मंगाना है, दोनों साथ मगांएगे तो दोनों को फायदा हो जाएगा.
बीमारी में साथ: अगर आप को पता चले कि पड़ोसी की तबीयत खराब है तो एक टाइम का खाना बनाकर भेज दें. साथ में प्यार से बोले, ‘‘जल्दी ठीक हो जाओ. कोई काम हो तो बताना.’’
आप की यह पहल और केयर उन्हें हमेशा याद रहेगी. समय आने पर वे भी आप की मदद से पीछे नहीं हटेंगे.
मनोविज्ञान क्या कहता है
रिसिप्रोसिटी प्रिंसिपल: इंसान का नेचर है कि जब कोई बिना मतलब हमारी मदद करता है तो हम भी लौटाना चाहते हैं. आप एक बार सब्जी ला कर देंगी तो वे 3 बार आप के बच्चे को स्कूल से ले आएंगे.
वल्नेरेबिलिटी/ट्रस्ट: ‘मुझे आप की हैल्प चाहिए’ कहने में पड़ोसी को शर्म महसूस हो सकती है. लेकिन जब आप कहेंगी कि ‘आप को मेरी हैल्प चाहिए तो बताना’. इस से सामने वाला सेफ फील करता है. वह धीरेधीरे अपनी दिक्कत शेयर करने लगता है.
प्रौक्सिमिटी लाइकिंग: साइकोलौजी का नियम है कि हम उन के करीब आते हैं जो फिजिकली करीब हैं और इमोशनली अवेलेबल हैं. पड़ोसी दोनों हैं. बस आप को पहला कदम उठाना है.
डिप्रैशन से नजात: कामकाजी महिला हो या हाउसवाइफ, दोपहर में एक कप चाय के साथ 10 मिनट की गपशप डिप्रैशन की सब से सस्ती दवा है. बीमारी, सासबहू की टैंशन, पति का स्ट्रैस सब हलका हो जाता है जब कोई कहता है कि ‘मैं हूं न.’
लोग फायदा तो नहीं उठाएंगे यह डर वाजिब है, इसलिए 3 बातों का ध्यान रखें पैसा उधार न दें, केवल मदद दें. सब्जी लाकर देना मदद है जबकि क्व5,000 उधार देना रिस्क है.
हर बार हां मत करें. 3 बार में 1 बार मना कर दें जैसेकि ‘दीदी आज टाइम नहीं है, कल पक्का.’ बाउंड्री जरूरी है.
कोई भी काम परिवार को बता कर करें. पति/सास को बताएं कि आज आप नेहा आंटी की दवाई ले कर आई हैं. ट्रांसपेरैंसी से गलतफहमी नहीं होती.
याद रखें: 90% लोग अच्छे हैं. 10% के डर से 90% का साथ मत खोइए.
पुराना तरीका नया तरीका असर
गुडमौर्निंग आंटी आंटी, सब ठीक है न? कोई काम हो तो बताइए. सामने वाले को एहसास होता है कि आप उन के अपने हैं.
कैसे हैं भैया भैया, कल आप को सब्जी लाते देखा नहीं. सब खैरियत तो है? केयर दिखती है, बातचीत बढ़ती है.
जय श्री राम दीदी, इस संडे फ्री हैं? बच्चों को पार्क ले चलते है. रिश्ता घर से निकल कर बाहर घूमने तक पहुंचता है.
क्या हाल है भाभी, आप को मार्केट जाना हो तो बता देना, मैं भी जा रही हूं. मदद का औफर बिना एहसान के.
नमस्ते अंकल, दवाई वगैरह लानी हो तो बता दीजिए. बुजुर्ग पड़ोसी के लिए आप का मैं मैडिकल स्टोर जा रही हूं.
औफर बहुत राहत देने वाला होता है.
