Hindi Fiction : ‘‘निराश  न हो, संघर्ष से हारना नहीं मजबूत होना है तुम्हें…’’

वह सिसक पड़ी… मैं मजबूत बनूंगी दीदी हिम्मत नहीं हारूंगी. उस ने अपने गर्भ पर हाथ फेरा… कोई हलचल नहीं थी. नहीं… नहीं… उस की कोख का शिशु किसी की अमानत है. उस की बचपन से मौडल रही तारा दीदी ने उसे कितने ही अपने पेरैंट्स के दकियानूसी तानों से बचाया था और ढाढस बंधाया था. उस के पास आज उसी तारा दीदी की दोस्त की अमानत. वह उस की जान को रिस्क में नहीं डाल सकती.

उन का तुरंत फोन मिलाया तो सिंधु ने ही फोन उठाया. ‘‘प्रिया कैसी हो तुम?’’

‘‘मैं… मैं ठीक नहीं हूं,’’ बमुश्किल इतना ही कहा और बेहोश हो गई. होश आया तो सिरहाने में सिंधु और अविनाश दोनों बैठे मिले.

‘‘चिंता मत करो… हम तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे. हिम्मत नहीं हारना…’’ सिंधु बोली.

‘‘मु?ो अपनी नहीं उस की चिंता है जो आप की अमानत है जिसे मु?ो आप तक सहीसलामत पहुंचाना है.’’

प्रिया जौनपुर की निवासी थी. पढ़ने के लिए लखनऊ आई थी मगर अच्छी नौकरी के अभाव में उसे कुछ न सू?ा तो उस ने जरूरतमंद दंपतियों की मदद करने की सोची. तारा दीदी के ज्ञान का इतना असर तो था ही कि उसे एक स्त्री की सृजनात्मक शक्ति का एहसास था.

एक पत्रिका में प्रिया ने सैरोगेसी के बारे में पढ़ा था. जब दीदी से इस बारे में बताया

तो उन्होंने कहा किसी निसंतान को संतानसुख देने में हरज ही क्या है? काश, यह सुविधा उन के समय होती तो उन्हें घर निकाला न मिलता और उस के बाद से उस ने कई निसंतान दंपतियों की मदद की थी. इस में उसे पैसे भी अच्छे मिलते थे और उस के स्वास्थ्य का भी रखरखाव अच्छी तरह से हो रहा था. हालांकि नया कानून इस की इजाजत नहीं देता था पर सरकार और सांसदों को एक आम औरत की कोख पर हक मारने के कानून का आदर कैसे किया जा सकता है.

मगर इस बार मामला उस की तारा दीदी की नजदीकी सहेली का था. वह बहुत खुश थी कि उसे इतने अच्छे परिवार की मदद करने का अवसर मिला. उन के एक परीचित डाक्टर ने क्या किया यह तो वह नहीं जानती पर 4 महिने के प्रयास के बाद वह अविवाहिता गर्भवती थी.

समय रहते जब उस का उभार नहीं दिख रहा था तो वह पैसे मिलने की खुशी में गांव जा रही थी कि न जाने कैसे उस की स्कूटी फिसल गई और वह… उस के बाद तो उसे होश तब आया जब अस्पताल में थी. रहरह कर कभी बचपन याद करती तो कभी अपने क्लाइंट अविनाश और सिंधु के उस अजन्मे शिशु की फिक्र होती.

उसे अपनी जीजान की कोई चिंता न थी. गरीब का जीना क्या और मरना क्या मगर एक बड़े परिवार के कुलदीपक का जीवन रिस्क में डालने का हक नहीं था. किसी हाल में भी नहीं. आखिर उन लोगों ने उस पर इतना खर्च अपने बच्चे के लिए ही तो किया है. फिर वही न बचा तो…

उफ, यह तो बहुत बड़ी मुसीबत हो सकती है… जिस काम में उस ने हाथ डाला है इस में पैसे हैं तो रिस्क भी है. मगर इस के साथ ही जब किसी स्त्री के चेहरे पर मातृत्व की खुशी देखती है तो उस का मन भी ?ाम उठता है. ऐसा लगता जैसे वह स्वयं ही अपनी मां की गोद में पहुंच गई है. उसे भी तो इस के बदले खूब सारे पैसे मिलते हैं और तोहफे भी.

प्रिया को होश में आए हुए 1 घंटा हुआ. इतने में उसे बड़े अस्पताल में भरती किया गया. यह शहर का एक मैटरनिटी हौस्पिटल था. इमरजैंसी में डाक्टर ईशा को बुलाया गया. उन के आने के पहले ही उस का इलाज शुरू हो चुका था. मगर डाक्टर ईशा ने आते ही सिंधु और अविनाश दोनों से अलगअलग बातचीत की. मगर क्या यह उसे समझ में नहीं आया. अगली सुबह उसे स्पैशल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया. उस की देखभाल बढ़ा दी गई. अब उस के लिए फल और मिठाइयां ले कर अविनाश और सिंधु अकसर आने लगे. यह सब देख कर उस की घबराहट कम हुई और स्वास्थ्य में भी सुधार होने लगा.

समाज में फैली आर्थिक विषमता को इस से पहले इतने करीब से कभी न देखा था. जहां अपने परिवार में बर्थडे या त्योहार पर कभी फल व मिठाई चखने के लिए नसीब होती वहां इस वक्त तरहतरह की चीजें उस के कदमों में पड़ी थीं. उस का ख्याल रखने में अविनाश और सिंधु ने जमीनआसमान एक कर दिया था. यह बात दूसरी थी कि वह उन चीजों में से कुछ ही खा पाती थी क्योंकि उसे अपने वजन पर कंट्रोल रखना था.

इस से पहले भी उस ने इसी अस्पताल में एक संभ्रांत परिवार के लिए प्रैगनैंसी की थी. इस तरह अविवाहित स्त्री का सैरोगेसी करना सही नहीं है. मगर सिंधु मैडम को भी वह सालों से जानती थी. बारबार हुए मिसकैरेज ने उस बुरी तरह तोड़ दिया था. उस के मातृत्व की ललक से भिज्ञ थी. डाक्टर होने के अलावा एक औरत भी तो थी. तभी तो प्रिया की असलियत जानते हुए भी उस ने इंसानियत के नाते अविनाश और सिंधु की मदद करने की ठानी. अब तो वह भी सिंधु की गोद भरने की दिल से प्रतीक्षा कर रही थी.

प्रिया को अस्पताल में पड़ेपड़े 1 महीना बीत गया. 7वां महिना चढ़ गया था. सुबह से ही मन कुछ बेचैन हो रहा था तो बिस्तर से उठ कर बाहर आई. गार्डन में मुश्किल से 10 कदम ही चली होगी कि दर्द सा महसूस हुआ. सिस्टर ने आ कर चैक किया तो उस के चेहरे की घबराहट ने प्रिया को भी डरा दिया.

‘‘ओह नो… पल्स रेट कम है.’’ बड़बड़ाती हुई तेज कदमों से बाहर भागी और कुछ ही मिनटों बाद प्रिया औपरेशन थिएटर में थी. उसे सचमुच कुछ न सू?ा रहा था सिवा इस बात कि 10 लाख एडवांस के बाद दसियों लाख उस के इलाज पर खर्च करने वाले दंपती के हाथ निराशा न लगे.

अंत भला तो सब भला, डाक्टर ईशा ने स्वयं अपने हाथों डिलिवरी कराई. औपरेशन

सफल रहा, ‘पृथा’ ने जन्म लिया.

अविनाश और सिंधु के चेहरे पर असीम संतोष था. विवाह के 20 वर्ष उपरांत मातापिता बने, वे खुशी से ?ाम उठे थे. शिशु को ब्रैस्ट पंप

के जरीए दूध पिला कर आईसीयू में रखा गया.

4-5 दिन होते ही बच्चे में विकास देखा गया. यही देख कर डाक्टर ईशा ने उसे ‘पृथा’ नाम दिया.

‘पृथा’ यानी धरती की बेटी. सचमुच

6 महीने की गर्भवती जमीन पर गिरी धूलधूसरित प्रिया जब अस्पताल आई थी तब कौन कह

सकता था कि जच्चाबच्चा स्वस्थ व सकुशल रहेंगे. यह तो किसी जिजीविषा वाले का ही काम हो सकता है. तभी तो उसे धरतीपुत्री की संज्ञा देना श्रेयस्कर लगा.

पृथा को अविनाश और सिंधु को दे कर प्रिया कुछ मिनट दुख तो हुआ पर जो प्यार और देखभाल उन्होंने उस की की उस से लगा कि उस का औरत होना कोई अपराध नहीं है. उस के पास एक ऐसा गुण है जो किसी ताकतवर पुरुष के पास भी नहीं है. धर्म भी उस को मां बनने पर रोक नहीं सकता. प्रिया कैसे पैसे बना रही थी यह बात न उस के पिता जानते थे, न मां ही. उन्हें पैसों से मतलब था और प्रिया को उन चेहरों की खुशी जो उस के एक शिशु के जन्म देते ही बायलोजिकता पेरैंट्स के चेहरे पर आती हैं. उस ने जितने बच्चे पैदा किए थे तब आईवीएफ तकनीक से थे और सब में स्पर्म व एग उस में इंप्लांट किया गया था.

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