Hindi Stories : बबीता एक समझदार तथा अनुशासनप्रिय महिला थी. पूरी कालोनी में उसे इस तरह जाना तथा पहचाना जाता था. बबीता की बेटी मिली भी बबीता की ही तरह थी. कालेज में पढ़ रही थी. उस में भी कुछ कर गुजरने का जज्बा था. वह व्यवहार मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रही थी. बबीता का एक भाई था. वह बबीता से 10 साल छोटा था. उस के पिता को लकवा हो गया था. इलाज चल रहा था.
मां भी नौकरी कर रही थी. मगर मां तो एक निजी स्कूल की अध्यापिका थी. कम वेतन था. पूरा नहीं पड़ता था. अत: बबीता और उस के पति ने साफसाफ देख लिया था कि उस के भाई की देखरेख के लिए घर पर रुपया नहीं है.
मां भी पिता की बीमारी के कारण बहुत ही अशांत रहा करती थी. बबीता भाई को साथ ले आई. उस ने भाई को 10वीं के बाद 12वीं की पढ़ाई खुद के खर्च से कराई. कालेज के लिए भाई को सरकारी सहायता मिल गई थी मगर वह बबीता के पास रह कर ही कालेज जाता था. बबीता ने देखा कि भाई को अब आत्मनिर्भर होने में अधिक समय नहीं है. भाई उस की बेटी के साथ खूब खेलता था और दोनों मामाभानजी में बहुत अच्छी बौंडिंग थी.
भाई को कालेज की पढ़ाई के साथ ही एक फाइनैंस कंपनी ने नौकरी दे दी. 2 घंटे काम करता था. ठीकठीक रुपए मिलते थे. ग्रैजुएट होने के बाद उस का भाई मुंबई चला गया. शेयर मार्केट में खुली दलाली का काम करने लगा. अब वह मां को हर हफ्ते 2-3 हजार भेजने लगा था. यह एक सुकून की बात थी.
मगर तब भी बबीता ने उस से कभी यह उम्मीद नहीं की कि वह उसे भी रुप दे. वह तो भाई की जिंदगी संवरती देख खुश थी. 3 साल बाद एक दिन भाई का फोन आया कि वह बहुत परेशान है. अभी 50 हजार रुपए चाहिए. दरअसल, किसी और दलाल की बात में फंस कर बबीता का भाई अपना रुपया लुटा बैठा था. बबीता ने अपने पति से बात की. तुरंत भाई को रुपया भेज दिया गया. हालांकि 3 महीने बाद भाई ने बबीता को वह सारा पैसा लौटा भी दिया था. मगर मौके पर मदद ही तो एक जरूरी कदम था और वह कदम बबीता ने अपने भाई के लिए उठाया था.
उस के बाद बबीता अपनी बेटी के पालनपोषण में व्यस्त हो गई. उधर मातापिता दोनों ही कमजोर हो रहे थे. पिता का लकवा अब ठीक था मगर वे 70 की आयु पूरी कर चुके थे. माताजी ने भी नौकरी छोड़ दी थी.
इस तरह वह 28 का हो गया था. एक दिन उस ने खबर सुनाई कि उस ने प्रेमविवाह कर लिया है. खैर, मातापिता तो खुश ही हुए थे. उन का बेटा बहू को ले कर घर आया. बबीता को भी बुलाया गया था. बबीता ने तो भाई को बेटे की तरह पाला था. मगर उस की पत्नी ने पहले दिन से ही अपनी कंजूसी की ?ालक दिखा दी. वह अपने साथ मैगजीन ले कर आई थी. 2 दिन बाद बबीता उन मैगजीन को पढ़ने लगी.
तब भाई की पत्नी ने हंगामा मचा दिया कि मैगजीन खो गई, मैगजीन खो गई. बबीता ने फट बरामदे के आले से वह उठा कर उसे सौंपी तब उसे चैन मिला. इसी तरह वह अपना साबुन और शैंपू भी बाथरूम से उठा लाती.
बबीता ये सब हरकतें देख न सकी और उसी समय विदा ले कर अपने घर जाने लगी. उस समय फिर उस के भाई की पत्नी ने अपनी नीयत दिखा दी. सब से साधारण साड़ी उसे उपहार में दी. बबीता को लगा था रेशम की साड़ी तो मिलेगी. यह उस का घोर अपमान था. वह अपने आंसू दबा कर चली आई.
तब से वह हर दिन भाई की बीवी को कभी चुड़ैल, कभी कमीनी आदि कह कर मन ही मन कोसती और फिर रोने लगती.
बेटी मिली सम?ा गई कि इस तरह दुखी और निराश रहने से उस की मां धीरेधीरे एक मानसिक रोगी बनती जा रही है. मां को सही रास्ते पर लाना होगा. वह तरहतरह के मनोविज्ञान के प्रयोग करती रहती. एक दिन वह अपने साथ एक महिला को घर लाई. बहाना बना दिया कि वह महिला बबीता से लहसुन का अचार बनाना सीखना चाहती है. बबीता को ऐसे सामाजिक काम बहुत पसंद थे. उस ने महिला का आदर किया. मिली ने भी अपनी मां बबीता को उस महिला से गपशप करने बैठा दिया.
वह महिला लगातार अपनी ननद और सास की बुराई करती रही. 1 घंटे तक बबीता सुनती रही. फिर तंग आ कर बबीता ने खुद ही कह दिया. ‘‘देखिए बहनजी अगर लंबे समय तक किसी से नफरत की जाए तो उस का असर शरीर पर दिखने लगता है. यह खतरनाक भावना इंसान को ऐंग्जाइटी, बेचैनी और शक में घेर कर उसे मानसिक रूप से बीमार कर देती है. कई बार इंसान पैरानोया यानी पागलपन तक का भी शिकार हो जाता है. इस बात पर कई अध्ययन किए गए हैं कि नफरत शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से कैसे हम पर बुरा प्रभाव डालती है.
‘‘इन सभी अध्ययनों से यह पता चला है कि नफरत हमारे शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित करने से पहले हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करती है. जब आप नफरत की ज्वाला में सुलग रहे होते हैं तो मस्तिष्क हमेशा खतरे या नुकसान की संभावना महसूस करता है, जिस के फलस्वरूप हमारे मस्तिष्क में मौजूद लाखों फाइबर तंत्रिकाएं पूरे शरीर में कुछ विशेष प्रकार के रसायन छोड़ती हैं. ये रसायन इतने जहरीले होते हैं जितना जहर होता, यह हमें घृणा की अवस्था में आक्रामक रूप से प्रतिक्रिया करने के लिए तैयार करता है, यह आक्रामक प्रतिक्रिया या तो खुद के बचाव में होती है या सामने वाले के ऊपर हमले के रूप में.
‘‘जब हम नफरत की इस ज्वाला में नियमित रूप से झुलसते रहते हैं तो यह रसायन शरीर में बारबार और तेजी से जारी होता रहता है, जिस की वजह से हमारी पूरी देह प्रभावित होती है जो वजन बढ़ाने, अनिद्रा, चिंता, अवसाद और अन्य पुरानी बीमारी को सक्रिय करने का कारण बन सकता है. धीरेधीरे इन रसायनों की हमारे शरीर की प्रतिक्रिया तंत्रिका, प्रतिरक्षा और अंत:स्रावी प्रणाली पर एक विशेष प्रकार की निर्भरता बन जाती है, जिस से विभिन्न बीमारियां होने की संभावना बन जाती हैं जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर और औटोइम्यून डिजीज आदि.’’
मिली तो मजे से उन की यह बातचीत रिकौर्ड कर रही थी. मगर वह महिला चुपचाप सुन रही थी. वह सचमुच तो ऐसी नहीं थी. इसलिए उस से और अधिक नाटक या अभिनय न हो सका. वह माफी मांग कर चलने की इजाजत मांगने लगी. अचार की विधि सिखाने के लिए बबीता का बारबार शुक्रिया करती रही.
वह चली गई तो बबीता ने मिली से कहा, ‘‘मिली बेटी यह तो बहुत ही अजीब महिला थी. इसे अपनी नफरत की वजह से भूख नहीं लगती. यह दालरोटी नहीं खाती. अचार और ब्रैड खाती है. यही शुरुआत है अवसाद की.’’ कह कर बबीता जैसे चुप हुई.
मिली ने कहा, ‘‘हां… हां मां.’’
‘‘मिली बेटी मैं ने तो खुद देखा है जो लोग अकसर अपनी नफरत की भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं या अपनी नफरत के लिए दूसरों को दोष देते हैं. उन में समय के साथ अनसुल?ा नकारात्मक भावनाएं बढ़तीं और तीव्र होती हैं जो मन और शरीर को प्रभावित करती हैं.’’
ओह तो इस का उपाय होगा न मां?’’ मिली ने मां से फिर पूछ लिया.
‘‘अरे बहुत सारे तरीके हैं. देखो अगर आप नफरत से छुटकारा पाने की चाह रखते हैं तो इसे स्वीकार करें कि आप इस बीमारी के शिकार हो गए है. आप मन ही मन घृणा महसूस करने लगते हैं. जिस पल इसे स्वीकार कर लिया बस उसी पल से इस भावना से निबटना शुरू किया जा सकता है और समस्या का समाधान खोजा जा सकता है.
‘‘नफरत का मूल कारण समझें. नफरत आमतौर पर डर, असुरक्षा या अविश्वास से उत्पन्न होती है. अपनी तुलना दूसरों से न करें. इस के बजाय स्वयं का सर्वश्रेष्ठ संस्करण बनने का प्रयास करें.
‘‘जब आप नफरत या क्रोध महसूस करते हैं तो बेहतर होगा कि आप एक कदम पीछे हट जाएं और क्षणिक उत्तेजना में प्रतिक्रिया करने से बचें.
‘‘जब आप घृणा और क्रोध महसूस कर रहे हों तो सही निर्णय लेना कठिन होता है. घृणा या क्रोध महसूस करते समय, अगर अपनी मानसिक दशा को अपने ढंग से ठीक करना चाहते हैं तो कर सकते हैं. जैसेकि किसी की सेवा करें, किसी परेशान की मदद कर हैं.
‘‘सार्वजनिक जगह पर टहलने जाने वाले भी अपनी नफरत को मिटा सकते हैं. दरअसल, तब आप आम इंसान के जीवन को गौर से देखते हैं. आप के मन में करुणा और दया उपजने लगती है जो नफरत को गलाने में मदद करती है. साथ ही पालतू जानवरों के साथ खेलने या कोई ऐसी गतिविधि करने पर विचार कर सकते हैं जो आप को आनंददायक लगे. समस्या को नजरअंदाज करने के बजाय उस का सामना करें.
‘‘समस्या का समाधान ढूंढ़ने का प्रयास करें. आप किसी ऐसे व्यक्ति से बात करने पर विचार कर सकते हैं जिस पर आप भरोसा करते हैं जैसे कोई करीबी दोस्त, परिवार या साथी. आप किसी थेरैपिस्ट या काउंसलर की मदद लेने पर भी विचार कर सकते हैं.’’
उधर मिली अपनी मां की हर बात को फोन में रिकौर्ड कर रही थी. वह मन ही मन हैरान थी कि मां इतनी सम?ादार है. तब भी सुबह से शाम तक मामा और मामी को इतना बुराभला कहते हुए खुद भावुक हो कर इतना रोने क्यों लग जाती हैं? अब जैसे ही बबीता चुप हुई मिली ने जानबूझ कर मामा और मामी का नाम ले लिया. उन का नाम लेते ही बबीता पर क्रोध सवार हो गया. वह 1 मिनट तक उन दोनों को लानत भेजती रही. तभी मिली ने मां का अभी कुछ देर पहले का रिकौर्ड चला दिया.
बबीता कह रही थी कि अगर किसी से नफरत की जाए…
‘‘हैं… हैं मेरी आवाज,’’ कह कर हैरान हो कर बबीता अपनी ही बात सुन कर अचरज में थी, ‘‘तो ये मेरे विचार हैं मिली?’’ बबीता ने पूछा, ‘‘आप ही के हैं. अभी कुछ मिनट पहले के.’’
‘‘ओह अच्छा,’’ ऐसा कह कर बबीता खामोश हो गई.
अब मिली ने कहा, ‘‘मां आप ने मामी से बेकार ही नाराजगी पाल रखी है. वे बहुत
गरीब परिवार से हैं. इसलिए कंजूस हैं. आप सबकुछ भूल जाओ और मगन रहो. आप खुद को निराशा तथा अवसाद में किसलिए धकेल रही हो?’’
‘‘मम्मी परिवार ही नहीं पूरा समाज और देश नफरत की आग में कुछ साल नहीं पीढि़यों तक ?ालसता रहता है और ये अपने बच्चों को ये सब विरासत में दे जाते हैं. इन देशों के नेता ऊपर के उदाहरण की तरह मामा से जीवनभर ही नहीं पीढ़ी दर पीढ़ी नफरत करते हैं.
‘‘यहूदियों से ईसाईयों की नफरत ने 1940 से 1945 तक विश्व को युद्ध में धकेल दिया और कई करोड़ लोग मारे गए. आज भी दुनिया के बहुत से हिस्सों में नफरत की राजनीति चल रही है जिस का एक रूप घरों तक छनछना कर पहुंच जाता है.
‘‘हमारी अपनी राजनीति आज नफरत पर टिकी है जो धर्म और जाति के नाम पर हमारे खून में बसी है. महाभारत जिस की गीता के गुणगान हम करते नहीं थकते हैं असल में बबीता वाली नफरत की कहानी है जिस में चचेरे भाइयों और द्रौपदी की नफरत सब से ज्यादा दिखती है.
‘‘मौम यह नफरत आप के दरवाजे पर आएगी ही. इसे कैसे हैंडल करना है, यह आप को देखना होगा.’’
बबीता मुंह खोले बेटी को देख रही थी कि वह खुद समझदार होते हुए भी कैसे अपने भाई और मामी से नाराज हो रही है जबकि बेटी को मामामामी से कोई खास शिकायत नहीं है. खुश रहना है तो नाराज रहना बंद करो.
