story in hindi
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जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने वाली कट्टरपंथी हिंदू सोच की सरकारों को असल में औरतों के दुख की चिंता ही नहीं है. जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर वे न केवल औरतों का यौन सुख का हक छीन रही हैं, अगर गर्भ ठहर जाए तो उन्हें अपराधी की सी श्रेणी में डाल रही हैं. तीसरा बच्चा नाजायज है, अपराधी है, समाज विरोधी है, राज्य पर बोझ है जैसे शब्दों से चाहे जनसंख्या नियंत्रण कानून न भर हों, पर ये शब्द हैं जो केवल उन्हें दिखेंगे जो भुगतेंगी, सचिवालयों और मंत्रालयों में बैठने वालों को नहीं.
फ्रांस का उदाहरण लें. उस की प्रति व्यक्ति आय भारत की महज 2000 डौलर प्रतिवर्ष के मुकाबले 60,000 डौलर प्रति वर्ष है यानि वहां के लोग 30 गुना अमीर हैं. फिर भी वहां बहुत गर्भ ठहर जाते हैं क्योंकि लड़कियां गर्भनिरोधक नहीं खरीद पातीं. अब फ्रांस सरकार ने 25 वर्ष की आयु तक डाक्टर की फीस, दवाएं व गर्भपात सब फ्री कर दिया है. फ्रांस सरकार का मानना है कि यह मामला लडक़ी की इच्छा का है कि वह कब सेक्स सुख ले और कब बच्चा पैदा करे. सरकार को लडक़ी की इच्छा का आदर करना चाहिए.
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हमारे यहां लडक़ी को पहले ही दिन से बोझ माना जाता है. उस के सारे हक बनावटी हैं. दिखाऊ हैं. उसे धर्मकर्म में अकेला जाता है जहां और कुछ नहीं तो सेक्स सुख अवश्य मिल जाता है चाहे पति हो या न हो औरतें घरों में सेक्स सुख से वंचित रहें इसलिए ङ्क्षहदूमुसलिम के नाम पर उन के जननांग और कोख पर आदेशों के ताले लगाए गए हैं, उन्हें कहां गया है कि 2 बच्चों के बाद या तो ताला या सरकारी समाज से बाहर, न नौकरी मिलेगी न राशन, न चुनाव लडऩे की सुविधा. कहने को यह बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए पर असल में यह भ्रामक सोच पर आधारित है जो नरेंद्र मोदी ने जम कर गुजरात विधानसभा चुनावों में कही थी कि एक समाज 5 से 25 होता है और दूसरा 2 पर संतोष करता है.
मुसलमानों और दलितों के लिए गर्भ नियंत्रण कठिन है, मंहगा है यह इस कानून में सुलझाना नहीं गया है, सुविधाएं छीनने का खौफ दर्शाया गया है. आज यदि गर्भ निरोधक सस्ते या मुफ्त हो और गर्भपात्र जब चाहों जहां चाहो मुफ्त में करा लो तो नैतिकता नहीं खत्म होगी औरतों के अधिकारों की स्थापना होगी. हर युवती, चाहे विवाहित हो या अविवाहित अपने शरीर का कैसे इस्तेमाल करे, उस का अपना मामला है और वह खुद बेकार का गर्भ नहीं चाहती. आज की कामकाजी औरत बच्चों को चाहती है पर सीमा में. इस के लिए कानून चाहिए तो सुविधाएं देने वाले पर उस में खर्च होता है. सरकार तो ऐसा आदेश देना जानती है जिस से नागरिकों के हाथ पैर बंंधे, अब जननांग भी बांध रहे हैं.
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आपने कौर्न की कई तरह की रेसिपी ट्राय की है. लेकिन क्या आप कौर्न कोन की रेसिपी ट्राय की है, जिसे आप आसानी से शाम के नाश्ते में बना सकते हैं. आइए आपको बताते हैं कौर्न कोन की आसान रेसिपी…
सामग्री कोन की
– 1/2 कप मैदा
– 1 छोटा चम्मच घी
– 1/2 छोटा चम्मच अजवाइन
– कोन तलने के लिए पर्याप्त रिफाइंड औयल
– कोन बनाने का सांचा
– नमक स्वादानुसार.
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सामग्री कौर्न की
– 1/2 कप मक्की के दाने उबले
– 2 बड़े चम्मच हरे मटर उबले
– 1 बड़ा चम्मच टमाटर बारीक कटा
– 1 बड़ा चम्मच प्याज बारीक कटा
– 1 छोटा चम्मच मक्खन पिघला
– थोड़ी सी धनियापत्ती कटी
– थोड़े से सलादपत्ते
– चाटमसाला, लालमिर्च व नमक स्वादानुसार.
विधि
मैदे में घी, अजवाइन और नमक डाल कर पानी से पूरी लायक आटा गूंध लें. 15 मिनट ढक कर रखें फिर मोटीमोटी 2 लोइयां बनाएं और खूब बड़ी बेल लें. कांटे से गोद दें व 4 टुकड़े कर लें. प्रत्येक टुकड़े को कोन पर लपेटें और किनारों को पानी की सहायता से सील कर दें. धीमी आंच पर सारे कोन तल लें. मक्की के दानों में सारी सामग्री मिला लें. सलादपत्तों के छोटे टुकड़े कर लें. प्रत्येक कोन में थोड़ा सा सलादपत्ता लगाएं. फिर मक्की के दाने वाला मिश्रण भरें. स्पाइसी कौर्न इन कोन तैयार है. तुरंत सर्व करें.
स्वाति के मन में खुशी की लहर दौड़ रही थी. महीना चढ़े आज 15 दिन हो गए थे और अब तो उसे उबकाई भी आने लगी थी. खट्टा खाने का मन करने लगा था. वह खुशी से झूम रही थी. पर वह पूरी तरह आश्वस्त हो जाना चाहती थी. इतनी जल्दी इस राज को वह किसी पर प्रकट नहीं करना चाहती थी, खासकर पति के ऊपर. 15 दिन और बीत गए. दूसरा महीना भी निकल गया. अब वह पूरी तरह आश्वस्त थी. वह सचमुच गर्भवती थी. शादी के 10 वर्षों बाद वह मां बनने वाली थी, परंतु मां बनने के लिए उस ने क्याक्या खोया, यह केवल वही जानती थी. अभी तक उस के पति को भी मालूम नहीं था. पता चलेगा तो कैसा तूफान उस के जीवन में आएगा इस का अनुमान तो वह लगा सकती थी, लेकिन मां बनने के लिए वह किसी भी तूफान का सामना करने के लिए चट्टान की तरह खड़ी रह सकती थी. इस के लिए वह हर प्रकार का त्याग करने को तैयार थी. 10 वर्ष के विवाहित जीवन में बहुत कष्ट उस ने सहे थे. बांझ न होते हुए भी उस ने बांझ होने का दंश झेला था, सास की जलीकटी सुनी थीं, मातृत्वसुख से वंचित रहने का एहसास खोया था. आज वह उन सभी कष्टों, दुखों, व्यंग्यभरे तानों और उलाहनों को अपने शरीर से चिपके घिनौने कीड़ों की तरह झटक कर दूर कर देना चाहती थी, लोगों के मुंह बंद कर देना चाहती थी. वह सास के चेहरे पर खुशी की झलक देखना चाहती थी और पति…
पति को याद करते हुए उस के मन को झटका लगा, दिल में एक कड़वी सी कसक पैदा हुई, परंतु फिर उस के सुंदर मुखड़े पर एक व्यंग्यात्मक हंसी दौड़ गई. अपने होंठों को अपने दांतों से हलके से काटते हुए उस ने सोचा, पता नहीं उन को कैसा लगेगा? उन के दिल पर क्या गुजरेगी, जब उन को पता चलेगा कि मैं मां बनने वाली हूं. हां, मां, परंतु किस के बच्चे की मां? क्या पीयूष इस सत्य को आसानी से स्वीकार कर लेंगे कि वह मां बनने वाली है. उन के दिमाग में धमाका नहीं होगा, उन का दिल नहीं फट जाएगा? क्या वे यह पूछने का साहस कर पाएंगे कि स्वाति के पेट में किस का बच्चा पल रहा है या वे अपने दिल और दिमाग के दरवाजे बंद कर के अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए एक चुप्पी साध लेंगे? कुछ भी हो सकता है. परंतु स्वाति उस के बारे में चिंतित नहीं थी.
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उस ने बहुत सोचसमझ कर इतना बड़ा कदम उठाया था. मातृत्वसुख प्राप्त कर के अपने माथे से बांझपन का कलंक मिटाने के लिए उस ने परंपराओं का अतिक्रमण किया था और मर्यादा का उल्लंघन किया था. परंतु उस ने जो कुछ किया था, बहुत सोचसमझ कर किया था. शादी के वक्त स्वाति एक टीवी चैनल में न्यूजरीडर और एंकर थी. वह अपनी रुचि के अनुसार काम कर रही थी, परंतु शादी के पहले ही पीयूष की मम्मी ने कह दिया था कि शादी के बाद वह काम नहीं करेगी. मन मार कर उस ने यह शर्त मंजूर कर ली थी. पीयूष ने एमबीए किया था. एमबीए पूरा होते ही वह अपने पिता के साथ उन के व्यापार में हाथ बंटाने लगा था. उन्हीं दिनों उस के पिता की असामयिक मौत हो गई. उस के बाद उस ने अपने पिता का कारोबार संभाल लिया. उन दोनों की शादी के समय पीयूष के पिता जीवित नहीं थे.
दोनों की शादी धूमधाम से संपन्न हुई. स्वाति भी खुश थी कि उस को अपने सपनों का राजकुमार मिल गया. परंतु सुहागरात को ही उस की खुशियों पर तुषारापात हो गया, उस के अरमान बिखर गए और सपनों के पंख टूट गए. सुहागरात में दोनों का मिलन स्वाति के लिए बहुत दुखद रहा. पीयूष ने जैसे ही उड़ान भरी कि धड़ाम से जमीन पर आ गिरा, जैसे उड़ान भरने के पहले ही किसी ने पक्षी के पर काट दिए हों. वह लुढ़क कर लंबीलंबी सांसें लेने लगा. स्वाति का हृदय दहल गया. मन में एक डर बैठ गया, अगर ऐसा है तो दांपत्य जीवन कैसे पार होगा? फिर उस ने अपने मन को तसल्ली देने की कोशिश की. हो सकता है, पहली बार के कारण ऐसा हुआ हो. उस ने कहीं पढ़ा था कि प्रथम मिलन में लड़के अत्यधिक उत्तेजना के कारण जल्दी स्खलित हो जाते हैं. यह असामान्य बात नहीं होती है. धीरेधीरे सब सामान्य हो जाता है. काश, ऐसा ही हो, स्वाति ने सोचा. परंतु स्वाति की शंका निर्मूल नहीं थी. उस की आशाओं के पंख किसी ने नोंच कर फेंक दिए. उस की सोच भी सत्य सिद्ध नहीं हुई. पीयूष के पंख सचमुच कटे हुए थे. वह बहुत लंबी उड़ान भर सकने में असमर्थ था. स्वाति अपने पर रोती, परंतु कुछ कर नहीं सकती थी. दांपत्य जीवन के बंधन इतने कड़े होते हैं कि कोई भी उन को तोड़ने का साहस नहीं कर सकता है. अगर तोड़ता है तो शरीर में कहीं न कहीं घाव हो जाता है. स्वाति के जीवन में खुशियों के फूल मुरझाने लगे थे, परंतु वह पढ़ीलिखी थी. उस ने आशा का दामन नहीं छोड़ा. आधुनिक युग विज्ञान का युग था, हर प्रकार के मर्ज का इलाज संभव था.
स्वाति के मन में पीड़ा थी परंतु ऊपर से वह बहुत खुश रहने का प्रयास करती थी. घर के सारे काम करती थी. सासूमां उस के व्यवहार व कार्यकुशलता से खु थीं, उस का पूरा खयाल रखतीं. स्वाति के साथ घर के कामों में हाथ बंटातीं. स्वाति कहती, ‘‘मांजी, अब आप के आराम करने के दिन हैं, क्यों मेरे साथ लगी रहती हैं. मैं कर लूंगी न सबकुछ.’’
‘‘तू सब कर लेती है, मैं जानती हूं परंतु मैं अपंग नहीं हूं. तेरे साथ काम करती हूं तो शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है. काम न करूंगी तो बीमार हो कर बिस्तर से लग जाऊंगी.’’
‘‘फिर भी कुछ देर आराम कर लिया कीजिए,’’ स्वाति सासूमां को समझाने का प्रयास करती.
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‘‘तेरे आने से मुझे आराम ही आराम है. बस, 1 पोता दे कर तू मुझे बचीखुची खुशियां दे दे तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा,’’ मांजी ने स्वाति की तरफ ममताभरी निगाह से देखा.
स्वाति के हृदय में कुछ टूट गया. मांजी की तरफ देखने का उसे साहस नहीं हुआ. सिर झुका कर अपने काम में व्यस्त हो गई. समय बीतने के साथसाथ सासूमां की स्वाति से पोते पैदा करने की अपेक्षाएं बढ़ने लगीं. दिन बीतते जा रहे थे. उसी अनुपात में सासूमां की पोते के प्रति चाहत भी बढ़ती जा रही थी. एक दिन उन्होंने कहा, ‘‘स्वाति बेटा, अब और कितना इंतजार करवाओगी? तुम लोग कुछ करते क्यों नहीं? क्या कोई सावधानी बरत रहे हो?’’ उन्होंने संदेहपूर्ण निगाहों से स्वाति को देखा. ‘‘कैसी सावधानी, मां?’’ स्वाति ने अनजान बनते हुए पूछा. वह अपनी तरफ से क्या कहती, उसे ऐसे पुरुष के साथ बांध दिया था जिस में पुरुषत्व की कमी थी. इस में न उस के घर वालों का दोष था, न ससुरालपक्ष के लोगों का? दोष था तो केवल पीयूष का, जिस ने सबकुछ जानते हुए भी शादी की. स्वाति अभी तक चुप थी. शर्म और संकोच की दीवार उस के मन में थी, परंतु अब इस दीवार को उसे तोड़ना ही होगा. पीयूष से इस बारे में उसे बात करनी होगी, परंतु इस तरीके से कि उस के अहं को ठेस न पहुंचे और वह बात की गंभीरता को समझ कर अपना इलाज करवाने के लिए तैयार हो जाए.
शादी की पहली वर्षगांठ बीत गई. कोई उत्साह उन के बीच में नहीं था. स्वाति कोई जश्न मनाना नहीं चाहती थी. पीयूष और मां दोनों की इच्छा थी कि घर में छोटामोटा जश्न मनाया जाए. केवल खास लोगों को बुलाया जाए परंतु स्वाति ने साफ मना कर दिया. वह लोगों की निगाहों में जगे हुए प्रश्नों की आग में तपना नहीं चाहती थी. अंत में पीयूष और स्वाति एक रेस्तरां में डिनर कर के लौट आए. उसी रात…स्वाति ने खुल कर बात की पीयूष से, ‘‘एक साल हो गया, अब हमें कुछ करना होगा. मम्मी की हम से कुछ अपेक्षाएं हैं.’’
पीयूष चौंका, परंतु बिना स्वाति की ओर करवट बदले पूछा, ‘‘कैसी अपेक्षाएं?’’
स्वाति मछली की तरह करवट बदल कर पीयूष की आंखों में देखती हुई बोली, ‘‘क्या आप नहीं जानते कि एक मां की बेटेबहू से क्या अपेक्षाएं होती हैं?’’
पीयूष की पलकें झुक गईं, ‘‘मैं क्या कर सकता हूं?’’ उस ने हताश स्वर में कहा. स्वाति ने अपनी कोमल उंगलियों से उस के सिर को सहलाते हुए कहा, ‘‘आप निराशाजनक बातें क्यों कर रहे हैं. दुनिया में हर चीज संभव है, हर मर्ज का इलाज है और प्रत्येक समस्या का समाधान है.’’
पीयूष ने उस की आंखों में देखते हुए पूछा, ‘‘तुम क्या चाहती हो?’’
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कैसे भूले जा सकते हैं वे दिन जब कोरोना महामारी के कारण देश में आपातकालीन लौकडाउन लगा दिया गया था. मानो तेज रफ्तार गाड़ी में अचानक हैंडब्रैक लगा दिया हो. हर तरफ अफरातफरी का माहौल था. एक तो अनजान बीमारी, दूसरे इलाज का अतापता नहीं. भय तो फैलना ही था. सब अंधेरे में तीर चला रहे थे. दवाओं के अलावा कोई काढ़ा-आसव तो कोई कुछ… जिसे जो समझ में आ रहा था वह वही आजमा कर देख रहा था.
न रेल चल रही थी, न ही बस. स्कूल, कालेज, कोचिंग और अन्य दूसरे होस्टल खाली करवाए जा रहे थे. ऐसे में उन लोगों को परेशानी हो गई जो किसी कारण से अपने ठिकाने से दूर थे.
निष्ठा के साथ भी यही हुआ. कहां तो वह अपना वीकैंड मृदुल के साथ बिताने आई थी और कहां इस झमेले में फंस गई. नहींनहीं, यह कोई पहली बार नहीं था जब वे दोनों इस तरह से एक साथ थे. वे अकसर इस तरह के शौर्ट ट्रिप प्लान करते रहते थे.
चूंकि दोनों ही अपनेअपने घरों से दूर यहां पुणे में जौब करते हैं, इसलिए कोई रोकटोक भी नहीं थी. भविष्य में शादी करेंगे या नहीं, इस फिक्र से दूर दोनों वर्तमान को जी रहे थे.
जनता कर्फ्यू की घोषणा के साथ ही आगामी दिनों में लौकडाउन लगने की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी. निष्ठा और मृदुल ने भी सोचा कि कौन जाने कितने दिन एकदूसरे से दूर रहना पड़े, इसलिए क्यों न खुल कर जी लिया जाए. निष्ठा चूंकि वर्किंग वुमन होस्टल में रहती थी और मृदुल कहीं पेइंगगैस्ट, इसलिए दोनों ने पणजी में मृदुल के दोस्त अभय के घर जाना तय किया. अभय अपने दोस्तों के साथ कहीं बाहर था, इसलिए उस का घर खाली था. मौके का फायदा उठाते हुए वे दोनों 2 दिन की अपनी जमा की हुई लीव ले कर पणजी चले गए.
अभी दोनों इस वीकैंड को एंजौय कर ही रहे थे कि देशव्यापी लौकडाउन घोषित कर दिया गया. खबर सुनते ही मृदुल की आंखें चमक उठीं.
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“हम तुम एक कमरे में बंद हों, और चाबी खो जाए…” वह शरारत से आंख दबाते हुए गुनगुनाया.
“तुम्हें बड़ा मजाक सूझ रहा है. क्या तुम्हें अंदाजा भी है कि हम किस मुश्किल में फंस चुके हैं?” निष्ठा ने उसे सीरियस करने की कोशिश की.
“इस में कौन सी मुसीबत हुई भला? जैसे हम यहां फंसे हैं वैसे अभय भी फंसा हुआ है. घर में राशन तो रखा ही हुआ है. बस, बनाओ और खाओ. अच्छा ही है, इस बहाने तुम्हारे हाथ के बने पकवान खाने को मिलेंगे.” मृदुल ने उसे बेफिक्र करना चाहा लेकिन निष्ठा तो दूसरी ही चिंता में घुली जा रही थी.
“एकसाथ एक घर में रहने का मतलब तुम समझ रहे हो न, वह भी बिना किसी सुरक्षा उपाय के.” निष्ठा ने कुछ संकोच के साथ कहा तो मृदुल खिलखिला दिया.
“तो क्या हुआ? नन्हा सा गुल खिलेगा, अंगना… सूनी बैंया सजेगी सजना.” गाते हुए उस ने निष्ठा को छेड़ा. वह गुस्से में पांव पटकती हुई वहां से हट गई.
यह पूरे 21 दिन का लौकडाउन था. जब तक थे तब तक तो सुरक्षा उपाय अपनाए गए, फिर मन मार कर कुछ दिन संयम भी रखा गया. जब धैर्य चूक गया तो महीने के सुरक्षित दिनों का हिसाब रखते हुए भी दोनों ने संबंध बनाए लेकिन उस में कोई आनंद न था.
एकएक दिन चिंता में गुजर रहा था. किसी को लौकडाउन खुलने का इंतजार होगा, लेकिन निष्ठा तो अपने मासिकधर्म के आने का इंतजार कर रही थी. आखिर जिस दिन उसे अपनी पैंटी पर कत्थई निशान दिखे, उस ने सुकून की सांस ली. जिंदगी में पहली बार अपना मासिकधर्म आने पर निष्ठा खुश हुई थी. इस से पहले तो यह पीरियड उसे बहुत ही असहज कर दिया करता था.
खैर, किसी तरह पहले लौकडाउन के 21 दिन बीते. हालांकि लौकडाउन को आगे भी बढ़ा दिया गया लेकिन पाबंदियों में कुछ ढील भी मिली. मृदुल और निष्ठा भी किसी तरह पणजी से निकले और पुणे आए. निष्ठा ने राहत महसूस की. बेशक निष्ठा आधुनिक विचारधारा की लड़की है लेकिन समाज में बिनब्याही मां की स्थिति से भी बखूबी वाकिफ है, इसलिए लौकडाउन में वह किसी मुसीबत में नहीं फंसी, इसी बात से वह बहुत राहत महसूस कर रही थी.
कहते हैं कि एक बार वर्जनाएं टूट जाएं तो उन के बारबार टूटने का अंदेशा बना रहता है. लौकडाउन की पाबंदियों के बीच फिर से जिंदगी न्यू नौर्मल होने लगी थी. यातायात के साधन खुलने लगे थे. इस बीच कहींकहीं पर्यटन उद्योग भी फिर से पटरी पर आने लगा था. निष्ठा और मृदुल की जिंदगी में पुराने समय के दौर ने फिर से गति पकड़ ली. दोनों फिर से हर वीकैंड में एकसाथ दिखने लगे. लेकिन इस कठिन समय ने निष्ठा को अपने रिश्ते के लिए अवश्य ही संजीदा कर दिया था. उस ने और मृदुल ने शादी करने का फैसला कर लिया.
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यों तो आजकल प्रेम विवाह टैबू नहीं रहे लेकिन फिर भी अलग जातिधर्म के व्यक्ति को अपनी बिरादरी में शामिल करने से पहले पुराने लोग आज भी हिचकते हैं. शुरूआती आपत्ति के बाद दोनों परिवार इस रिश्ते के लिए राजी हो गए. नवंबर के महीने में जब सबकुछ बिलकुल ठीक सा लग रहा था तब कुछ निजी लोगों की उपस्थिति में निष्ठा और मृदुल की मंगनी हो गई.
हमारे समाज में मंगनी होने को शादी की गारंटी मान लिया जाता है. ऐसी स्थितियों में समाज और संस्कार दोनों ही लड़कालड़की के मिलन पर एतराज नहीं करते. ये दोनों तो वैसे भी खूब मिलतेजुलते थे, अब थोड़े से अधिक बेपरवाह होने लगे थे.
यह शादी अप्रैल के महीने में होने वाली थी लेकिन इस से पहले ही एक मनचाही समस्या सामने आ खड़ी हुई. निष्ठा ने इस बार अपना पीरियड मिस कर दिया. यह बात जब उस ने मृदुल को बताई तो उस ने आदतन लापरवाही से निष्ठा की फिक्र को हवा में उड़ा दिया.
“अरे यार, क्यों टैंशन ले रही हो. अब तो शादी होने ही वाली है न. वैसे, तुम चाहो तो एबौर्शन करवा सकती हो.” फ़िक्रमुक्त करने के साथ ही मृदुल ने उसे सलाह भी दे डाली.
“नहीं. कहते हैं, पहला बच्चा प्रकृति का उपहार होता है. पहले ही गर्भ को गिरवा दिया जाए तो बाद में गर्भ धारण करने में समस्याएं होने लगती हैं. मैं यह बच्चा नहीं गिरवाऊंगी,” कहते हुए निष्ठा ने एबौर्शन करवाने से इनकार कर दिया.
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लगभग 35 वर्षों से मॉडलिंग और थिएटर से कैरियर की शुरूआत कर टीवी सीरियलों व फिल्मों में अपनी एक अलग मौजूदगी दर्ज करा चुकी अदाकारा किट्टू गिडवाणी ने हिंदी के अलावा अंग्रेजी व फ्रेंच भाषा में भी अभिनय किया है. इन दिनों वह ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘सोनी लिव’’ पर वेब सीरीज ‘‘पॉटलक’’ में नजर आ रही हैं.
प्रस्तुत है किट्टू गिडवाणी से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश. .
अपनी अब तक की अभिनय यात्रा को किस तरह से देखती हैं?
-मेरी अभिनय यात्रा काफी रोचक व रचनात्मक रही. मैंने थिएटर, टीवी, फिल्म व ओटीटी प्लेटफार्म सहित हर प्लेटफार्म पर काम बेहतरीन काम किया. मुझ पर कोई इमेज चस्पा नही हो सकी. मैं वर्सेटाइल कलाकार हूं. मुझे सदैव रंगमंच पर काम करने में आनंद की अनुभूति होती है. मुझे बेहतरीन टीवी कार्यक्रमों में काम करना पसद है. फिल्में करना पसंद है. मैने ‘फैशन’सहित कुछ फिल्में करते हुए इंज्वॉय किया, तो वहीं मैने ‘तृष्णा’, ‘स्वाभिमान’, ‘जुनून’, ‘एअरहोस्टेस’और ‘खोज’ जैसे सीरियल करते हुए काफी इंज्वॉय किया. मुझे नहीं लगता कि मेरी तरह सभी कलाकार हर माध्यम में काम करने में सहज हों. मैने लंदन व पेरिस जाकर फिल्म व रंगमंच पर काम किया. मैने लंदन में एक अंग्रेजी नाटक में अभिनय किया. जबकि फ्रांस में मैने दो फ्रेंच फिल्मों में अभिनय किया. मैं पूरे संसार पर अंकुश नही लगा सकती, लेकिन मैने अपनी क्षमता के अनुरूप हर माध्यम पर कई प्रयोग किए. मुझे गर्व है कि मंैने अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जी है.
1985 में कैरियर शुरू किया था. उन दिनों जिस तरह के सीरियल किए थे, उनसे इसमें क्या अंतर पाती हैं?
-‘स्वाभिमान’’ 1995 में किया था. उससे पहले ‘एअरहोस्टेस’सहित कई सीरियल किए थे. वक्त के साथ बहुत कुछ बदलता है. लोगों की सोच बदलती है. एक्सपोजर जितना अधिक होता है, उसके अनुसार बहुत कुछ बदलता है. जैसे कि हमने ‘पॉटलक’में अपर मिडल क्लास परिवार को लिया है. इसलिए ‘पॉटलक’ के साथ ‘स्वाभिमान’ को जोड़कर नहीं देख सकते. ‘स्वाभिमान’ उच्च वर्ग की कहानी थी. उन दिनों हम सारे संवाद हिंदी में बोलते थे. अब तो हम हिंदी व अंग्रेजी मिश्रित संवाद बोलते हैं. हर जमाने में रचनात्मकता बदलती रहती है. हर जमाने में ताकत, अच्छाई व बुराई भी होती है. ऐसे में एक वक्त के सीरियल की तुलना दूसरे वक्त के सीरियल से करना ठीक नही है. पहले जब हम वीकली सीरियल कर रहे थे, उन दिनों बजट कम हुआ करते थे, जबकि अब बजट काफी हो गए हैं.
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मेरा सवाल कलाकार के तौर पर संतुष्टि को लेकर है?
-देखिए, कलाकार के तौर पर संतुष्टि मुझे ‘स्वाभिमान’ में भी मिली थी और ‘जुनून’ में भी मिली थी. मैने काम करते हुए काफी इंज्वॉय किया था. अब ‘पॉटलक’ करके भी काफी संतुष्टि मिली. मेरे लिए प्रोजेक्ट अच्छा होना चाहिए, तभी मैं उसके साथ जुड़ती हूं. फिर वह प्रोजेक्ट चाहे फिल्म हो, थिएटर हो या सीरियल हो या वेब सीरीज हो. हर प्रोजेक्ट की अपनी एक जान होती है. मेरी राय में हर कलाकार संतुष्टि के पीछे ही भागता रहता है.
वेब सीरीज ‘‘ पॉटलक ’’ से जुड़ने के लिए आपको किस बात ने प्रेरित किया?
-इसकी पटकथा काफी सुंदर है. निर्देशक काफी समझदार और एक नई व ताजी सोच वाली हैं. वह पूरे दस वर्ष तक अमरीका में रहने के बाद भारत वापस आयी हैं. संवादों की स्टाइल काफी नेच्युरल स्वाभाविक है. इसमें हास्य के पल भी हैं. इन सारी बातों ने मुझे इसके साथ जुड़ने के लिए आकर्षित किया.
‘‘पॉटलक’में आपका किरदार?
-निजी जीवन में मेरी अपनी कोई संतान नही है. मगर वेब सीरीज ‘पॉटलक’में मैं मैने प्रमिला शास्त्रीका किरदार निभाया है, जिनके दो बेटे व एक बेटी है. बेटों की शादी हो चुकी है, पर बेटी की शादी की उसे चिंता है. इसमें सिचुएशनल कॉमेडी है, जो आजकल कम देखने को मिलती है.
जब आपने ‘जुनून’ या ‘स्वाभिमान’में अभिनय किया था, उन दिनों समाज के हर तबके में परिवार व संयुक्त परिवार बहुत मायने रखता था. आज आधुनिक युग में संयुक्त परिवारों की जगह एकाकी परिवार आ गए हैं. ऐसे में ‘पॉटलक’ से क्या सीख मिलेगी?
-‘पॉटलक’ लोगों से कहती है कि हम बहुत मुश्किल जमाने से गुजर रहे हैं, ऐसे वक्त में हमें इस बात का ख्याल रखना है कि कहीं अहम विखर न जाएं. इसके लिए जरुरी है कि आप सभी एक दूसरे को समझने का प्रयास करेंं, कुछ चीजों को नजरंदाज करें. वर्तमान समय में बच्चों को लगता है कि उनके माता पिता बेवजह बकवास करते रहते हैं, तो वहीं माता पिता को लगता है कि बच्चे उनसे जुदा हो गए हैं, परिवार विखर गया है, बच्चे अपनी अलग सोच के साथ जिंदगी जी रहे हैं. बच्चे पूरे दिन मोबाइल पर लगे रहते हैं, परिवार के साथ उनका कोई जुड़ाव ही नहीं रहता है. इन सारी शिकायतों के बावजूद यदि आप एक दूसरे के करीब आने की कोशिश करते हैंं, तो क्या होता है, इसका परिणाम अच्छा होता है या बुरा होता है, यही सब ‘पॉटलक’ में बताया गया है. ‘पॉटलक’में दिखाया है कि कभी अच्छा, तो कभी बुरा होता है, मगर अंत में परिवार तो परिवार ही होता है. लेकिन ‘पॉटलक’ देखने के बाद लोगांे की सहमति या असहमति हो सकती है. लेकिन हमने तो यही कहने की कोशिश की है कि साथ रहने में ही फायदा है. एकता में ताकत है, यह बात हर इंसान को समझनी चाहिए.
आपने कई बेहतरीन फिल्में व सीरियल किए, पर बीच में काफी समय तक गायब रही?
-ऐसा न कहें. मैं गायब तो नही हुई. देखिए, जब मुझे अच्छी फिल्म या सीरियल करने का अवसर मिलता है, तो मैं करती हूं. महज संख्या गिनाने के लिए कोई भी फिल्म या सीरियल नही करती. मैं अच्छा काम नही मिलता तो नही करती. मैं जबरन ख्ुाद को व्यस्त रखने में यकीन नहीं करती.
यह सच है कि मैंने लंबे समय से टीवी करना बंद कर रखा है. मैने पिछले 15 वर्षों से सीरियल नहीं किए हैं. इसकी मूल वजह यह है कि अब टीवी का कंटेंट ही अच्छा नही है. सच कह रही हूं और आप भी मेरी इस बात से सहमत होंगे कि अब टीवी का कंटेंट काफी बुरा हो गया है. मैं अपने कैरियर के इस मुकाम पर ‘सास बहू मार्का ’ सीरियल नहीं कर सकती. मैं किचन पोलीटिक्स वाले सीरियलो में फिट ही नही होती. एसे सीरियलों में कलाकार के तौर पर मेरे लिए कोई जगह ही नही है.
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इन दिनों नारी स्वतंत्रता, फेमेनिजम आदि की काफी चर्चाएं हो रही हैं. आपके लिए फेमेनिजम क्या है?
-फेमेनिजम को परिभाषित नहीं किया जा सकता. हर औरत की अपनी एक यात्रा होती है. हर औरत के लिए फेमेनिजम की अपनी परिभाषा होती है. फेमेनिज्म के बारे में हर किसी का एक सिद्धांतवादी दृष्टिकोण होता है. मुझे नहीं लगता कि किसी को मुझे बताने की जरुरत है कि फेमेनिजम क्या है. मेरे लिए फेमेनिजम की परिभाषा यह है कि मैं एक औरत होने के नाते जो करना चाहूं, वह कर सकूं. जो मुझे सही लगता है, उसे लेकर मैं किसी को भी उसका फायदा लेने नहीं दूंूगी. मैं अपनी क्षमता के अनुरूप काम करती रहूंगी. किसी भी संस्था को अधिकार नही है कि वह फेमेनिजम को परिभाषित करे.
जब आप शूटिंग नही कर रही होती हैं, उस वक्त आपकी क्या गतिविधियां होती हैं?
-मैं बहुत कुछ पढ़ती हूं. राजनीति व अर्थशास्त्र को लेकर काफी कुछ पढ़ती हूं. मैं भारतीय दर्शन शास्त्र पढ़ती व सीखती हूं. नृत्य भी सीखती हूं. यात्राएं करने का भी शौक है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में प्रदेश में वृहद टीकाकरण अभियान के तहत ‘सबका साथ, सबका विकास, सबको वैक्सीन, मुफ्त वैक्सीन’ के मूल मंत्र पर टीकाकरण किया जा रहा है.
सबको मुफ्त वैक्सीन अभियान का आयोजन हो रहा है. ये बातें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अलीगढ़ के संबोधन में कहीं. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में अब तक 8 करोड़ से अधिक वैक्सीन के साथ एक दिन में सबसे ज्यादा वैक्सीन लगाने का रिकॉर्ड भी उत्तर प्रदेश के ही नाम है.
यूपी ने टीकाकरण में दूसरे प्रदेशों को पीछे छोड़ते हुए रोजाना नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं. महाराष्ट्र, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, वेस्ट बंगाल समेत दूसरे कई राज्यों से आगे निकल आठ करोड़ 94 लाख से अधिक टीकाकरण की डोज दी हैं. यह आंकड़ा देश के दूसरे प्रदेशों से कहीं अधिक है. यूपी टीकाकरण के साथ ही सर्वाधिक जांच करने वाला प्रदेश है. ट्रिपल टी की रणनीति व टीकाकरण से यूपी में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर नियंत्रण में हैं. प्रदेश में वैक्सीन की पहली खुराक 7 करोड़ 42 लाख से अधिक और वैक्सीन की दूसरी डोज 1 करोड़ 51 लाख से अधिक को दी जा चुकी है.
स्टार प्लस के सीरियल अनुपमा (Anupama) में वनराज (Sudhanshu Panday) की अनुज कपाड़िया (Gaurav Khanna) की तरफ बढ़ती नफरत नया मोड़ लेने वाली हैं. जहां एक तरफ वह और काव्या (Madalsa Sharma) डील ना मिलने से नाखुश हैं तो वहीं अनुज का घर आना तोषू को खल रहा है. इसी बीच अपकमिंग एपिसोड में अनुपमा (Rupali Ganguly) अपने हक और सपने के लिए खड़ी होने वाली है. हालांकि इसमें उसके खिलाफ बा और वनराज होते नजर आएंगे. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…
वनराज ने उठाए अनुपमा पर सवाल
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अब तक आपने देखा कि अनुज, अनुपमा के घर पर आकर उसे डील मिलने और अपना पार्टनर बनाने की बात कहता है, जिसे सुनकर वनराज, काव्या और पूरी फैमिली हैरान हो जाती है. हालांकि अनुपमा इस बारे में सोचने के लिए वक्त मांगती है, जिसके बाद अनुज शाह निवास से चला जाता है. वहीं इसके बाद वनराज अनुपमा की अनुज की दोस्ती पर सवाल उठाते हुए कहता है कि यह डील सिर्फ उसे इसलिए मिली है, क्योंकि वह उसके कौलेज का प्यार है.
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अनुपमा ने दिया करारा जवाब
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वनराज के इल्जामों से तंग आकर अनुपमा के सब्र का बांध टूट जाएगा और वह वनराज पर चिल्लाएगी और उसे कहेगी कि अब उसकी जिंदगी के फैसलों पर कोई हक नही है क्योंकि उनका तलाक हो चुका है. इसी बीच बा, वनराज के साथ आकर खड़ी होगी और उससे डील को नामंजूर करने के लिए कहेगी. इसी के साथ गुस्से में अनुपमा फैसला लेगी कि वह अब अपना करियर बनाना चाहती है और वह बा के खिलाफ जाकर अनुज कपाड़िया की डील को मंजूर कर लेगी. हालांकि इस फैसले में बापूजी, समर, किंजल और नंदिनी उसका साथ देंगे, जिसके चलते घर में ड्रामा देखने को मिलेगा. दूसर तरफ अनुज अनुपमा के फैसले का इंतजार करता नजर आएगा.
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लेखक- रानी दर
आश्चर्य में डूबी रश्मि मुझे ढूंढ़ती हुई रसोईघर में पहुंची तो उस की नाक ने उसे एक और आश्चर्य में डुबो दिया, ‘‘अरे वाह, कचौरियां, बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है. किस के लिए बना रही हो, मां?’’
‘‘तेरे पिताजी के दोस्त आ रहे हैं आज,’’ उड़ती हुई दृष्टि उस के थके, कुम्हलाए चेहरे पर डाल मैं फिर चकले पर झुक गई.
‘‘कौन से दोस्त?’’ हाथ की किताबें बरतनों की अलमारी पर रखते हुए उस ने पूछा.
‘‘कोई पुराने साथी हैं कालिज के. मुंबई में रहते हैं आजकल.’’
जितनी उत्सुकता से उस के प्रश्न आ रहे थे, मैं उतनी ही सहजता से और संक्षेप में उत्तर दिए जा रही थी. डर रही थी, झूठ बोलते कहीं पकड़ी न जाऊं.
गरमागरम कचौरी का टुकड़ा तोड़ कर मुंह में ठूंसते हुए उस ने एक और तीर छोड़ा, ‘‘इतनी बढि़या कचौरियां आप ने हमारे लिए तो कभी नहीं बनाईं.’’
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उस का फूला हुआ मुंह और उस के साथ उलाहना. मैं हंस दी, ‘‘लगता है, तेरे कालिज की कैंटीन में आज तेरे लिए कुछ नहीं बचा. तभी कचौरियों में ज्यादा स्वाद आ रहा है. वरना वही हाथ हैं और वही कचौरियां.’’
‘‘अच्छा, तो पिताजी के यह दोस्त कितने दिन ठहरेंगे हमारे यहां?’’ उस ने दूसरी कचौरी तोड़ कर मुंह में ठूंस ली थी.
‘‘ठहरे तो वह रमाशंकरजी के यहां हैं. उन से रिश्तेदारी है कुछ. तुम्हारे पिताजी ने तो उन्हें आज चाय पर बुलाया है. तू हाथ तो धो ले, फिर आराम से प्लेट में ले कर खाना. जरा सब्जी में भी नमक चख ले.’’
उस ने हाथ धो कर झरना मेरे हाथ से ले लिया, ‘‘वह सब चखनावखना बाद में होगा. पहले आप बेलबेल कर देती जाइए, मैं तलती जाती हूं. आशु नहीं आया अभी तक स्कूल से?’’
‘‘अभी से कैसे आ जाएगा? कोई तेरा कालिज है क्या, जो जब मन किया कक्षा छोड़ कर भाग आए? छुट्टी होगी, बस चलेगी, तभी तो आएगा.’’
‘‘तो हम क्या करें? अर्थशास्त्र के अध्यापक पढ़ाते ही नहीं कुछ. जब खुद ही पढ़ना है तो घर में बैठ कर क्यों न पढ़ें. कक्षा में क्यों मक्खियां मारें?’’ उस ने अकसर कक्षा छोड़ कर आने की सफाई पेश कर दी.
4 हाथ लगते ही मिनटों में फूलीफूली कचौरियों से परात भर गई थी. दहीबड़े पहले ही बन चुके थे. मिठाई इन से दफ्तर से आते वक्त लाने को कह दिया था.
‘‘अच्छा, ऐसा कर रश्मि, 2-4 और बची हैं न, मैं उतार देती हूं. तू हाथमुंह धो कर जरा आराम कर ले. फिर तैयार हो कर जरा बैठक ठीक कर ले. मुझे वे फूलवूल सजाने नहीं आते तेरी तरह. समझी? तब तक तेरे पिताजी और आशु भी आ जाएंगे.’’
‘‘अरे, सब ठीक है मां. मैं पहले ही देख आई हूं. एकदम ठीक है आप की सजावट. और फिर पिताजी के दोस्त ही तो आ रहे हैं, कोई समधी थोड़े ही हैं जो इतनी परेशान हो रही हो,’’ लापरवाही से मुझे आश्वस्त कर वह अपनी किताबें उठा कर रसोई से निकल गई. दूर से गुनगुनाने की आवाज आ रही थी, ‘रजनीगंधा फूल तुम्हारे, महके यों ही जीवन में…’
मैं अवाक् रह गई. अनजाने में वह कितना बड़ा सत्य कह गई थी, वह नहीं जानती थी. सचमुच इन के कोई दोस्त नहीं वरन दफ्तर के साथी रमाशंकर की बहन और बहनोई आ रहे थे रश्मि को देखने.
लेकिन बेटे वालों के जितने नाजनखरे होते हैं, उस के हिसाब से कितनी बार यह नाटक दोहराना पड़ेगा, कौन जानता है. और लाड़दुलार में पली, पढ़ीलिखी लड़कियों का मन हर इनकार के साथ विद्रोह की जिस आग से भड़क उठता है, मैं नहीं चाहती थी, मेरी सीधीसादी सांवली सी बिटिया उस आग में झुलस कर अभी से किसी हीनभावना से ग्रस्त हो जाए.
इसी वजह से वह जितनी सहज थी, मैं उतनी ही घबरा रही थी. कहीं उसे संदेह हो गया तो…
भारतीय परंपरा के अनुरूप हमारे माननीय अतिथि पूरे डेढ़ घंटे देर से आए. प्रतीक्षा से ऊबे रश्मि और आशु अपने पिता पर अपनी खीज निकाल रहे थे, ‘‘रमाशंकर चाचाजी ने जरूर आप का अप्रैल फूल बनाया है. आप हैं भी तो भोले बाबा, कोई भी आप को आसानी से बुद्धू बना लेता है.’’
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‘‘नहीं, बेटा, रमाशंकरजी अकेले होते तो ऐसा संभव था, क्योंकि वह अकसर ऐसी हरकतें किया करते हैं. पर उन के साथ जो मेहमान आ रहे हैं न, वे ऐसा नहीं करेंगे. नए शहर में पहली बार आए हैं इसलिए घूमनेघामने में देर हो गई होगी. पर वे आएंगे जरूर…’’
‘‘मान लीजिए, पिताजी, वे लोग न आए तो इतनी सारी खानेपीने की चीजों का क्या होगा?’’ रश्मि को मिठाई और मेहनत से बनाई कचौरियों की चिंता सता रही थी.
‘‘अरे बेटा, होना क्या है. इसी बहाने हमतुम बैठ कर खाएंगे और रमाशंकरजी और अपने दोस्त को दुआ देंगे.’’
बच्चों को आश्वस्त कर इन्होंने खिड़की का परदा सरका कर बाहर झांका तो एकदम हड़बड़ा गए.
‘‘अरे, रमाशंकरजी की गाड़ी तो खड़ी है बाहर. लगता है, आ गए हैं वे लोग.’’
‘‘माफ कीजिए, राजकिशोरजी, आप लोगों को इतनी देर प्रतीक्षा करनी पड़ी, जिस के लिए हम बेहद शर्मिंदा हैं,’’ क्षमायाचना के साथसाथ रमाशंकरजी ने घर में प्रवेश किया, ‘‘पर यह औरतों का मामला जहां होता है, आप तो जानते ही हैं, हमें इंडियन स्टैंडर्ड टाइम पर उतरना पड़ता है.’’
वह अपनी बहन की ओर कनखियों से देख मुसकरा रहे थे, ‘‘हां, तो मिलिए मेरी बहन नलिनीजी और इन के पति नरेशजी से, और यह इन के सुपुत्र अनुपम तथा अनुराग. और नलिनी बहन, यह हैं राजकिशोरजी और इन का हम 2, हमारे 2 वाला छोटा सा परिवार, रश्मि बिटिया और इन के युवराज आशीष.’’
‘‘रमाशंकरजी, हमारे बच्चों को यह गलतफहमी होने लगी थी कि कहीं आप भूल तो नहीं गए आज का कार्यक्रम,’’ सब को बिठा कर यह बैठते हुए बोले.
रमाशंकरजी ने गोलगोल आंख मटकाते हुए आशु की तरफ देखा, ‘‘वाह, मेरे प्यारे बच्चो, ऐसी शानदार पार्टी भी कोई भूलने की चीज होती है भला? अरे, आशु बेटा, दरवाजा बंद कर लो. कहीं ऐसा न हो कि इतनी अच्छी महक से बहक कर कोई राह चलता अपना घर भूल इधर ही घुस आए,’’ अपने चिरपरिचित हास्यमिश्रित अभिनय के साथ जिस नाटकीय अदा से रमाशंकरजी ने ये शब्द कहे उस से पूरा कमरा ठहाकों से गूंज गया.
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39 साल की देविका की त्वचा संवेदनशील है. एक दिन उस ने अपनी जांघ पर छोटेछोटे लाल रंग के चकत्ते देखे जिन में दर्द हो रहा था. उस ने इन चकत्तों को अनदेखा कर दिया. वैसे भी 2 बच्चों की मां की व्यस्त दिनचर्या में खुद के लिए वक्त कहां मिलता है. मगर धीरेधीरे देविका ने महसूस किया कि वह अकसर थकीथकी सी रहने लगी है. कुछ हफ्तों बाद एक दिन जब वह सोफे पर आराम कर रही थी तो उस ने अपने कूल्हे के पास एक गांठ देखी. वह घबरा गई और यह सोच कर रोने लगी कि उसे कैंसर हो गया है.
पति के कहने पर वह अस्पताल गई और वहां जांच कराई. तब डाक्टर ने बताया कि उसे शिंगल्ज नाम का चर्मरोग है और गांठ बनना इस बीमारी का एक लक्षण है जो लिंफ नोड की सूजन के कारण था. तुंरत डाक्टर के पास जाने से देविका जल्दी ठीक हो गई. ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है. जब भी त्वचा से जुड़ी कोई परेशानी दिखे तो डाक्टर से सलाह लें. ध्यान रखें कि ऐसी बहुत सी छोटीछोटी बीमारियां हैं जो घातक नहीं, मगर कभीकभी कैंसर जैसे घातक रोग का कारण भी हो सकती हैं. सो, इन बीमारियों के बारे में जानना जरूरी है.
सोरायसिस
यह एक त्वचा रोग है जिस में त्वचा पर लाल, परतदार चकत्ते दिखाई देते हैं. इन में खुजली व दर्द का एहसास भी होता है. हालांकि यह रोग शरीर के किसी भी हिस्से पर हो सकता है किंतु ज्यादातर यह सिर, हाथपैर, हथेलियों, पांव के तलवों, कुहनी तथा घुटनों पर होता है. अकसर यह 10 से 30 वर्ष की आयु में शुरू होता है. यह बीमारी बारबार हो सकती है. कभीकभी यह पूरी जिंदगी भी रहती है.
कैसे होता है :
शरीर के इम्यून सिस्टम यानी रोगप्रतिरोधक प्रणाली की गड़गड़ी से यह बीमारी होती है. जिस से त्वचा की बाहरी परत यानी एपिडर्मिस कोशिकाएं बहुत तेजी से बनने लगती हैं. बाद में चकत्ते दिखने लगते हैं. हालांकि, यह छूत की बीमारी नहीं है. शोधकर्ताओं का मानना है कि इस रोग के पीछे आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारक जिम्मेदार होते हैं. सोरायसिस होने का एक कारण तनाव, धूम्रपान और अधिक शराब का सेवन भी है. शरीर में विटामिन ‘डी’ की कमी व उच्च रक्तचाप की दवाइयां खाने से भी यह हो सकता है. इस के अलावा यदि घर में कोई इस बीमारी से पीडि़त है तो यह आप को भी हो सकती है.
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सोरायसिस के लक्षण प्रत्येक व्यक्ति में अलगअलग दिखाई देते हैं. ये लक्षण इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि व्यक्ति को किस तरह का सोरायसिस है. इलाज : सोरायसिस पर काबू पाने के लिए पहले स्टैप के तौर पर टौपिकल स्टीरौयड एक से 2 सप्ताह तक लगाया जा सकता है. जिस से चकत्ते घटने लगते हैं. हलकी धूप लेने से भी आराम मिलता है. विटामिन ‘डी’ सिंथेटिक फौर्म में, मैडिकेटेड शैंपू आदि भी तकलीफ घटाते हैं.
ध्यान रखें : सोरायसिस के लगभग 10 से 30 प्रतिशत मरीजों में गठिया होने की आशंका रहती है. इस के अलावा टाइप 2 डायबिटीज और कार्डियो वैस्कुलर डिजीज भी सोरायसिस की वजह से हो सकती हैं. शिंगल्ज
शिंगल्ज
एक त्वचा संक्रमण है. यह आमतौर पर जोड़ों में होता है. इस के अलावा यह पेट, चेहरे अथवा त्वचा के किसी भी हिस्से में हो सकता है. आम बोलचाल की भाषा में इसे दाद भी कहा जाता है. शिंगल्ज के कारण : यह रोग तब होता है जब चिकनपौक्स फैलाने वाला वायरस शरीर में दोबारा सक्रिय हो जाता है. जब आप चिकनपौक्स से उबर जाते हैं तो यह वायरस आप के शरीर की तंत्रिका प्रणाली में सुप्तावस्था में चला जाता है. कुछ लोगों में यह आजीवन इसी अवस्था में रहता है. वहीं कुछ व्यक्तियों में अधिक उम्र के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली में होने वाली कमजोरी के चलते यह फिर सक्रिय हो जाता है. कुछ मामलों में दवाएं भी इस वायरस को जागृत करने में अहम भूमिका निभाती हैं और व्यक्ति को शिन्गाल्ज की शिकायत हो जाती है.
शिंगल्ज का इलाज :
अगर शिंगल्ज के लक्षण नजर आएं तो तुरंत डाक्टर के पास जाना चाहिए. इसे दवाओं से ठीक किया जा सकता है. इन दवाओं में एंटीवायरल मैडिसिन और दर्दनिवारक दवाएं शामिल होती हैं. लगभग 72 घंटे के अंदर एंटीवायरल दवाएं लेने से रेशेज जल्दी ठीक हो जाते हैं और दर्द भी कम हो जाता है. इसे अनदेखा करने पर रिकवरी में 3 माह से 1 साल तक का समय लग सकता है.
एक्जिमा
यह ऐसा चर्मरोग है जिस में त्वचा लाल, शुष्क व पपड़ीदार हो जाती है. त्वचा की ऊपरी सतह पर नमी की कमी हो जाने के कारण रोगी को, खासतौर पर रात में, बहुत खुजली महसूस होती है. एक्जिमा के रैशेज आमतौर पर कुहनी, टखने के पास और घुटने के पीछे, जोड़ों के पास होते हैं. अगर इन का इलाज न किया जाए तो त्वचा खुरदरी होने लगती है. त्वचा के रंग में भी परिवर्तन आ जाता है.
एक्जिमा के कारण : यदि मातापिता इस बीमारी से पीडि़त हों तो संतान में भी एक्जिमा होने की आशंका बढ़ जाती है. इस के अलावा किसी चीज की एलर्जी से भी एक्जिमा हो सकता है. आप के आहार में भी कुछ तत्त्व एक्जिमा को ट्रिगर कर सकते हैं. यदि आप के मातापिता को अस्थमा, फीवर जैसी कोई बीमारी है तब भी आप को एक्जिमा होना संभव है.
उपाय : हर दिन स्नान करने के बाद तथा सोने से पहले अपनी त्वचा को मौइश्चराइज करना न भूलें. गंभीर स्थिति में टौपिकल कोर्टिको स्टेराइड क्रीम का उपयोग करें. जिद्दी एक्जिमा के उपचार हेतु फोटोथेरैपी जैसी तकनीक अपनाई जाती है, जिस में यूवीबी लाइट से गंभीर सूजन का इलाज होता है.
याद रखें : एक्जिमा भी त्वचा के कैंसर का लक्षण हो सकता है. त्वचा पर यदि 4 सप्ताह से अधिक समय तक धब्बे हों तो ये त्वचा के कैंसर का संकेत हो सकते हैं.
पित्ती
पित्ती (आर्टिकारिया) त्वचा रोग है जिस में शरीर पर खुजली वाले लाल चकत्ते निकल आते हैं. ये चकत्ते शरीर पर कुछ घंटों से ले कर कुछ हफ्ते तक रह सकते हैं. हलके पड़ने पर ये किसी नई जगह पर निकल आते हैं. पित्ती को आमतौर पर 2 भागों में बांटा जाता है. पहला, एक्यूट या अल्पकालिक जो कुछ समय के लिए रहती है और शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है. दूसरा, क्रोनिक या दीर्घकालिक पित्ती 6 हफ्ते से अधिक रहती है.
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पित्ती के कारण :
पित्ती निकलने के बहुत से कारण हो सकते हैं लेकिन ये अधिकतर शरीर से निकलने वाले हिस्टामिन्स से प्रतिक्रिया होने के कारण होते हैं जो आप को किसी खाद्य पदार्थ, दवा या अन्य किसी चीज की एलर्जी के कारण रिलीज होते हैं. हालांकि पित्ती होने के ज्यादातर मामलों में वजह का पता नहीं चलता. इस के कारणों में वायरल संक्रमण तथा अंदरूनी बीमारियां भी मानी जाती हैं.
पित्ती का इलाज : पित्ती के लक्षणों को कम करने और उस की रोकथाम के लिए ओवर द काउंटर एंटीहिस्टमीन का सेवन करना चाहिए. यदि आप को दीर्घकालिक पित्ती की समस्या है तो डाक्टर आप को एंटीहिस्टमीन की स्ट्रौंग डोज तथा एंटीइनफ्लैमेटरी दवाओं की सलाह देते हैं.
रौसेसिया
यह एक त्वचा संबंधी रोग है जो चेहरे की त्वचा पर दिखाई देता है. चेहरे की रक्त नलिकाएं जब लंबे समय तक बड़ी हो कर उसी अवस्था में रहती हैं तो यह स्थिति रौसेसिया कहलाती है. इस की वजह से चेहरे की त्वचा पर लालिमा के साथ दर्द भी रहता है जो पिंपल की तरह दिखाई देते हैं. कई बार यह छोटे लाल दानों की तरह भी निकल आता है. रौसेसिया से पीडि़त व्यक्ति की नाक के पास की त्वचा मोटी हो जाती है जिस की वजह से नाक उभरी हुई दिखाई देने लगती है.
रौसेसिया के कारण :
एक्जिमा की ही तरह यदि मातापिता रौसेसिया से पीडि़त हों तो संतान में भी इस के होने की आशंका बढ़ जाती है. इस के अलावा सूरज की तेज किरणों के संपर्क में आने से भी यह रोग हो सकता है. कुछ दवाओं के गलत प्रभाव से भी रक्त नलियां आकार में बड़ी हो जाती हैं. आमतौर पर ये गुलाबी मुंहासे हलकी त्वचा के रंग वालों में 35 वर्ष की आयु में आरंभ होने लगते हैं और उम्र बढ़ने के साथ गंभीर रूप धारण कर लेते हैं. रौसेसिया का इलाज : इस के इलाज के लिए कुछ ओरल एंटीबायोक्टिस व कुछ स्किन क्रीम वगैरह दी जाती हैं. छोटी रक्त वाहिकाओं से हुई त्वचा की लाली का सब से अच्छा उपचार लेजर द्वारा किया जा सकता है.
त्वचाशोथ या कौंटेक्ट डर्मेटाइटिस
त्वचाशोथ या त्वचा की सूजन और एक्जिमा दोनों को त्वचा की एक ही तरह की समस्या माना जाता है, क्योंकि दोनों ही बीमारियों में जलन, सूजन, खुजली तथा त्वचा लाल होने जैसे लक्षण देखे जाते हैं. वास्तव में डर्मेटाइटिस एक्जिमा की तरह कोई गंभीर समस्या नहीं है. यह रोग दाने के रूप में केवल उन हिस्सों में होता है जो हिस्से वैसी चीजों के संपर्क में आते हैं जिन से त्वचा को एलर्जी होती है.
कारण :
पौयजनस आईवी के पौधे, गहने, इत्र, फेसक्रीम या अन्य सौंदर्य उत्पादों से एलर्जी आदि त्वचाशोथ के मुख्य कारण हैं.
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इलाज :
यदि रोगी को सूजन है और साथ में अन्य कोई सक्रमण है तो उस के लिए एंटीबायोटिक दवा की आवश्यकता होती है. एक्जिमा की भांति त्वचाशोथ भी त्वचा के कैंसर का लक्षण हो सकता है. इसलिए सही उपचार हेतु विशेषज्ञ डाक्टर से संपर्क करें.